Adhyaya 113
Bhishma ParvaAdhyaya 11364 Versesकौरव-पक्ष भीष्म के सहारे स्थिर दिखता है, पर अर्जुन का दबाव बढ़ता जाता है; संघर्ष निर्णायक मोड़ की ओर अग्रसर।

Adhyaya 113

भीष्मस्य अप्रतिमपराक्रमः — शिखण्डिपुरस्कृतः प्रहारः (Bhīṣma’s unmatched momentum and the assault with Śikhaṇḍin in the lead)

Upa-parva: Bhīṣma-vadha-prastāva (Prelude to the neutralization of Bhīṣma)

Saṃjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that as formations dissolve into close intermixture, the engagement becomes indiscriminate and highly destructive across chariots, cavalry, infantry, and elephants. Bhīṣma is described as repeatedly inflicting severe attrition, empowered by prior weapons-training attributed to Rāma, and producing large-scale losses on successive days, especially by the tenth day. The narrative then pivots to an explicit strategic assessment: Kṛṣṇa tells Arjuna that victory is unattainable without first neutralizing Bhīṣma, urging concentrated effort where the Pāṇḍava line breaks. Arjuna responds by obscuring Bhīṣma with volleys of arrows. A broad coalition of Pāṇḍava-aligned leaders advances, and Śikhaṇḍin charges directly while being protected by Arjuna. Bhīṣma’s deliberate non-targeting of Śikhaṇḍin—grounded in remembered identity constraints—becomes a tactical opening, even as Bhīṣma continues to repel and damage the converging forces.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है कि रणभूमि में भीष्म का अद्भुत पराक्रम देखकर भी अर्जुन विचलित नहीं होता; वह प्रतिज्ञा-सा निश्चय करता है कि भीष्म से भय नहीं और वह उन्हें तीक्ष्ण शरों से रथोत्तम से गिराएगा। → अर्जुन शिखण्डी को आगे कर भीष्म-रथ की ओर बढ़ने का संकेत देता है; उधर कौरव-पक्ष से विशेषतः दुःशासन का उग्र प्रतिरोध उठता है—वह अर्जुन और कृष्ण पर बाण-वर्षा करता है, और अर्जुन के प्रहारों को रोकने/काटने का अद्भुत कौशल दिखता है। वृद्ध विराट और द्रुपद भी संग्राम-क्षेत्र में उपस्थित होकर तनाव को और घना करते हैं; अश्वत्थामा क्रुद्ध होकर रोकने का प्रयास करता है। → दुःशासन द्वारा वासुदेव (कृष्ण) को बीस बाणों से आहत देखकर अर्जुन का क्रोध प्रचंड होता है; वह दुःशासन पर सौ नाराचों की वर्षा कर देता है—क्षण भर को युद्ध का केंद्र अर्जुन-क्रोध और कृष्ण-रक्षा बन जाता है। → अर्जुन के तीव्र प्रत्याघात के बाद भी कौरव-प्रतिरोध पूरी तरह टूटता नहीं; दुःशासन भी बाण काटकर/प्रत्युत्तर देकर अर्जुन को भेदता है। फिर भी अर्जुन का मुख्य लक्ष्य स्पष्ट रहता है—वह अन्य संघर्षों को पीछे छोड़ भीष्म-रथ की ओर बढ़ता है, मानो डूबते पक्ष के लिए भीष्म एक ‘द्वीप’ हों। → भीष्म की ओर बढ़ते अर्जुन-शिखण्डी के रथ के सामने कौरवों का घेरा कसता है—अगले क्षणों में यह टकराव भीष्म-वध की दिशा तय करने वाला है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म-दुर्योधन-संवादविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०९ ॥। ऑपन--#ह< बछ। ] अत्ऑकशाएड दशाधिकशततमो< ध्याय: अर्जुनके प्रोत्साहनसे शिखण्डीका भीष्मपर आक्रमण और दोनों सेनाओंके प्रमुख वीरोंका परस्पर युद्ध तथा दुःशासनका अर्जुनके साथ घोर युद्ध संजय उवाच अर्जुनस्तु रणे राजन्‌ दृष्टवा भीष्मस्य विक्रमम्‌ । शिखण्डिनमथोवाच सम भ्येहि पितामहम्‌,संजय कहते हैं--राजन! रणभूमिमें भीष्मका पराक्रम देखकर अर्जुनने शिखण्डीसे कहा--“वीर! तुम पितामहका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो। आज भीष्मजीसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। मैं स्वयं अपने पैने बाणोंद्वारा इनको उत्तम रथसे मार गिराऊँगा”

قال سنجيا: أيها الملك، لما رأى أرجونا بأسَ بهيشما في ساحة القتال، خاطب شيخانْدين قائلاً: «تقدّم ولاقِ الجدَّ الأكبر.»

Verse 2

न चापि भीस्त्वया कार्या भीष्मादद्य कथंचन | अहमेनं शरैस्तीक्ष्गै: पातयिष्ये रथोत्तमात्‌,संजय कहते हैं--राजन! रणभूमिमें भीष्मका पराक्रम देखकर अर्जुनने शिखण्डीसे कहा--“वीर! तुम पितामहका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो। आज भीष्मजीसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। मैं स्वयं अपने पैने बाणोंद्वारा इनको उत्तम रथसे मार गिराऊँगा”

قال سنجيا: «أيها الملك، لا ينبغي لك اليوم أن تخاف من بهيشما بحال. سأصيبه بسهامي الحادّة وأُسقطه عن عربته الممتازة.»

Verse 3

एवमुक्तस्तु पार्थेन शिखण्डी भरतर्षभ | अभ्यद्रवत गाड़ियं श्र॒त्वा पार्थस्य भाषितम्‌,भरतश्रेष्ठी] जब अर्जुनने शिखण्डीसे ऐसा कहा, तब उसने पार्थके उस कथनको सुनकर गंगानन्दन भीष्मपर धावा किया

قال سنجيا: وهكذا، لما خاطبه بارثا، اندفع شيخانْدي—يا فحلَ آلِ بهاراتا—بعد أن سمع كلام بارثا، هجومًا مستقيمًا نحو بهيشما ابن الغانغا.

Verse 4

धृष्टद्युम्नस्तथा राजन सौभद्रश्न महारथ: । हृष्टावाद्रवतां भीष्म॑ श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम्‌,राजन! पार्थका वह भाषण सुनकर धृष्टद्युम्न तथा सुभद्राकुमार महारथी अभिमन्यु--ये दोनों वीर हर्ष और उत्साहमें भरकर भीष्मकी ओर दौड़े

قال سنجيا: أيها الملك، لما سمع دْهْرِشْتَدْيُومْنَ وسَوْبَهَدْرَة (أبهيمنيو) —وهو من عظماء فرسان العربة— كلامَ بارثا، امتلآ فرحًا وحماسةً، واندفعا مسرعين نحو بهيشما.

Verse 5

विराटद्रुपदौ वृद्धौ कुन्तिभोजश्च दंशित: । अभ्यद्रवन्त गाड़ेयं पुत्रस्य तव पश्यत:,दोनों वृद्ध नरेश विराट और द्रुपद तथा कवचधारी कुन्तिभोज भी आपके पुत्रके देखते- देखते गंगानन्दन भीष्मपर टूट पड़े

قال سانجيا: إنّ الملكين الشيخين فيرَاطا ودروبادا، ومعهما كونتيبوجا لابسَ الدِّرع، اندفعوا مباشرةً نحو بهيشما ابن الغانغا—أمام عيني ابنك.

Verse 6

नकुल: सहदेवश्च धर्मराजश्न वीर्यवान्‌ । तथेतराणि सैन्यानि सर्वाण्येव विशाम्पते

قال سانجيا: «ناكولا وسهاديفا، وكذلك دارماراجا (يودهيشثيرا) الجسور—وكذلك سائرُ فرقِ الجيش كلِّها، يا سيّدَ الناس.»

Verse 7

प्रत्युद्ययुस्तावका श्व समेतांस्तान्‌ महारथान्‌

قال سانجيا: إنّ قوات الكورو، وقد اجتمعت سريعًا، خرجت لتلاقي أولئك المقاتلين العظام على المركبات.

Verse 8

यथाशक्ति यथोत्साहं तन्मे निगदत: शृणु । इस प्रकार एकत्र हुए पाण्डव महारथियोंपर आपके पुत्रोंने भी जिस प्रकार अपनी शक्ति और उत्साहके अनुसार आक्रमण किया, वह सब बताता हूँ, सुनिये ।। चित्रसेनो महाराज चेकितानं समभ्ययात्‌

قال سانجيا: «اصغِ إليّ وأنا أسرد. بحسب ما لكلٍّ منهم من قوةٍ وحماسة، شنّ أبناؤك هجومهم على عظماء مقاتلي المركبات من الباندافا وقد اجتمعوا. وفي ذلك اللقاء، أيها الملك، تقدّم تشيتراسينا لملاقاة تشيكيتانا.»

Verse 9

भीष्पप्रेप्सुं रणे यान्तं वृष॑ व्याप्रशिशुर्यथा । महाराज! चित्रसेनने भीष्मके पास पहुँचनेकी इच्छासे रणमें जाते हुए चेकितानका सामना किया, मानो बाघका बच्चा बैलका सामना कर रहा हो ।। ८ है || धृष्टद्युम्न॑ महाराज भीष्मान्तिकमुपागतम्‌

قال سانجيا: أيها الملك، بينما كان تشيكيتانا يتقدّم في المعركة متلهّفًا لبلوغ بهيشما، اعترضه تشيتراسينا وواجهه—كشبلِ نمرٍ يتحدّى ثورًا.

Verse 10

त्वरमाणं रणे यत्तं कृतवर्मा न्यवारयत्‌ | राजन! कृतवर्माने भीष्मजीके निकट पहुँचकर युद्धके लिये उतावलीपूर्वक प्रयत्न करनेवाले धृष्टद्युम्नको रोका ।। भीमसेन सुसंक्रुद्धं गाड़ेयस्य वधैषिणम्‌

قال سنجيا: أيها الملك، إن كريتافَرما قد كفَّ دريشتاديومنا حين اندفع مسرعًا في ساحة القتال، متلهّفًا إلى المضيّ والاشتباك بعدما اقترب من بهيشما. وفي الوقت نفسه كان بهيماسينا مستعر الغضب، عازمًا على قتل غاديا، يتقدّم بقصدٍ قاتل لا يلين.

Verse 11

तथैव नकुलं शूरं किरन्तं सायकान्‌ बहून्‌

قال سنجيا: «وكذلك كان ناكولا، البطل الشجاع، يُرى وهو يمطر السهام الكثيرة، مواصلًا تبادل المقذوفات العنيف في ساحة القتال.»

Verse 12

सहदेवं तथा राजन्‌ यान्तं भीष्मरथं प्रति

قال سنجيا: «أيها الملك، إن سهاديڤا أيضًا كان يتقدّم، متجهًا نحو عربة بهيشما.»

Verse 13

राक्षसं क्रूरकर्माणं भैमसेनिं महाबलम्‌

قال سنجيا: «(ورأى/ذكر) ابن بهيماسينا، عظيم القوة، شديد البطش، يقاتل بضراوةٍ كضراوة الراكشاسا.»

Verse 14

सात्यकिं समरे यान्तं तव पुत्रो न्‍न्यवारयत्‌,(भीष्मस्य वधमिच्छन्तं पाण्डवप्रीतिकाम्यया ।) पाण्डवोंकी प्रसन्नताके लिये भीष्मका वध चाहनेवाले सात्यकिको युद्धके लिये जाते देख आपके पुत्र दुर्योधनने रोका

قال سنجيا: لما رأى ساتياكي يتوجّه إلى القتال—يريد قتل بهيشما طلبًا لرضا آل باندافا—حاول ابنك (دوريودhana) أن يكفّه ويمنعه.

Verse 15

अभिमन्युं महाराज यान्तं भीष्मरथं प्रति । सुदक्षिणो महाराज काम्बोज: प्रत्यवारयत्‌,महाराज! भीष्मके रथकी ओर अग्रसर होनेवाले अभिमन्युको काम्बोजराज सुदक्षिणने रोका

قال سنجيا: أيها الملك، لما اندفع أبهيمانيو نحو عربة بهيشما، اعترضه سودكشينا—ملك الكامبوجا—فأوقفه وأجبره على التراجع. ففي زحمة القتال، حتى اندفاعة البطل تُقابَل بمقاومة يقِظة؛ وتظهر الواجبات في كلا الجانبين ثباتًا في حماية القائد والتشكيل.

Verse 16

विराटद्रुपदौ वृद्धौ समेतावरिमर्दनौ । अश्रृत्थामा ततः क्रुद्धो वारयामास भारत

قال سنجيا: يا بهاراتا، إن الملكين الشيخين فيراتا ودروبادا—وكلاهما مشهور بسحق الأعداء—تقدّما معًا. ثم إن أشوَتّھاما، وقد اشتعل غضبًا، تحرّك ليصدّهما ويكبحهما. تُبرز الآية كيف يحوّل الغيظ في ساحة القتال اللقاءات إلى مبارزات قوة، وكيف يُساق الشيوخ أيضًا إلى الخطر رغم الثقل الأخلاقي للسنّ والمقام.

Verse 17

भारत! एक साथ आये हुए शत्रुमर्दन बूढ़े नरेश विराट और द्रुपदको क्रोधमें भरे हुए अश्व॒त्थामाने रोक दिया ।। तथा पाण्डुसुतं ज्येष्ठ भीष्मस्य वधकाड्क्षिणम्‌ । भारद्वाजो रणे यत्तो धर्मपुत्रमवारयत्‌,भीष्मके वधकी अभिलाषा रखनेवाले ज्येष्ठ पाण्डव धर्मपुत्र युधिष्ठिरको युद्धमें द्रोणाचार्यने यत्नपूर्वक रोका

قال سنجيا: يا بهاراتا، إن الملكين الشيخين فيراتا ودروبادا—وهما من قهّاري الأعداء—قد أقبلا معًا ممتلئين غضبًا؛ فصدّهما أشوَتّھاما. وكذلك في خضمّ القتال، بذل بهارادفاجا (درونا) جهده ليكبح دارمابوترا يودهيشثيرا، أكبر أبناء باندو، الذي كان يتوق إلى قتل بهيشما. ويُظهر المشهد كيف أنّ بين غضب يُحسبه المرء حقًّا وبين ضرورة التدبير الحربي، يُقصَد إلى حبس المحاربين الكبار أو مصادمتهم، فيتشكّل بذلك مجرى حربٍ موثوقة العُرى بالدهرما.

Verse 18

अर्जुन रभसं युद्धे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम्‌ । भीष्मप्रेप्सु महाराज भासयन्तं दिशो दश

قال سنجيا: أيها الملك، إن أرجونا في حميّة القتال قد قدّم شيكاندين أمامه، ثم اندفع قاصدًا بلوغ بهيشما؛ حتى بدا اندفاعه كأنه يُشعل الجهات العشر. وهكذا تتجلى استراتيجية الحرب القاتمة، إذ يضطر حتى المحارب البارّ إلى استعمال الوسائل التكتيكية لمواجهة شيخٍ يكاد لا يُقهر.

Verse 19

अन्ये च तावका योधा: पाण्डवानां महारथान्‌

قال سنجيا: «وكذلك تقدّم محاربون آخرون من جانبك لملاقاة عظماء المقاتلين على العجلات من آل باندافا.»

Verse 20

धष्टद्युम्नस्तु सैन्यानि प्राक्रोशत पुन: पुन:

قال سنجيا: كان دْهريشتاديومنَ يصرخ في الجيوش مرارًا وتكرارًا—يرفع صوته مرة بعد مرة ليشحذ الهمم، ويوجّه الصفوف، ويثبّت قلوب المقاتلين وسط اضطراب المعركة، حيث يغدو القَود والعزم قوى أخلاقية حاسمة في سلوك الحرب.

Verse 21

अभिद्रवत संरब्धा भीष्ममेक॑ महाबलम्‌ । एषोअर्जुनो रणे भीष्म प्रयाति कुरुनन्दन:

قال سنجيا: «مندفعًا بعزمٍ محتدم نحو بهيشما وحده—ذلك الجبار العظيم القوة. انظر يا بهيشما! أرجونا، بهجة آل كورو، يتقدّم إلى ساحة القتال». وتُبرز العبارة قصد أرجونا المركّز لمواجهة أقدم المحاربين وأعلاهم شأنًا، وما بين واجب الحرب وثِقَل الأخلاق حين يُواجَه أبٌ مُهاب من آباء السلالة.

Verse 22

अभिद्रवत मा भैष्ट भीष्मो हि प्राप्स्यते न व: । अर्जुनं समरे योद्धुं नोत्सहेतापि वासव:

قال سنجيا: «اندفعوا—لا تخافوا. إن بهيشما لن يقدر أن يبلغكم. وحتى فاسافا (إندرا) لا يجرؤ أن يقاتل أرجونا في ساحة الوغى».

Verse 23

किमु भीष्मो रणे वीरा गतसत्त्वोडल्पजीवित: । धृष्टद्युम्न अपने सैनिकोंसे बारंबार पुकार-पुकारकर कहने लगे--“वीरो! तुम सब लोग उत्साहित होकर एकमात्र महाबली भीष्मपर आक्रमण करो। ये कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले अर्जुन रणक्षेत्रमें भीष्मपर चढ़ाई करते हैं। तुम भी उनपर टूट पड़ो। डरो मत। भीष्म तुमलोगोंको नहीं पा सकेंगे। इन्द्र भी समरांगणमें अर्जुनके साथ युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; फिर ये धैर्य और शक्तिसे शून्य भीष्म रणक्षेत्रमें उनका सामना कैसे कर सकते हैं? अब इनका जीवन थोड़ा ही शेष रहा है” || २०--२२ है || इति सेनापते: श्रुत्वा पाण्डवानां महारथा:

قال سنجيا: «يا أبطال، ماذا عسى بهيشما أن يصنع في القتال الآن—وقد نَفِدَت همّته ورقّت قوة حياته؟» وهكذا كان قائد جيش الباندافا يكرّر حثَّ جنوده على جمع الشجاعة والانقضاض مجتمعين على بهيشما، جاعلًا الهجوم ضرورةً حربيةً ورافعةً معنويةً وأخلاقيةً لمعسكره.

Verse 24

अभ्यद्रवन्त संदह्ृष्टा गाज़ेयस्य रथं प्रति । सेनापतिका यह वचन सुनकर पाण्डव महारथी अत्यन्त हर्षमें भरकर गंगानन्दन भीष्मके रथपर टूट पड़े ।। आगच्छमानान्‌ समरे वार्योघान्‌ प्रलयानिव

قال سنجيا: لما سمع عظماءُ فرسان العجلات من الباندافا تلك الكلمات، امتلأوا ابتهاجًا واندفعوا مباشرةً نحو عربة بهيشما، ابن الغانغا. وفي زحمة القتال انداحوا كسيولٍ جارفة تتقدّم زمن الفناء الكوني—صورةٌ تُبرز اندفاع الحرب العنيف وخطر الحماسة القتالية إذا انفلتت من العقال.

Verse 25

दुःशासनो महाराज भयं त्यक्त्वा महारथ:

قال سانجيا: «يا أيها الملك العظيم، دُحشاسانا—ذلك المقاتل الجبّار على العربة—قد طرح الخوف جانبًا…»

Verse 26

तथैव पाण्डवा: शूरा गाड्ेयस्य रथं प्रति

وكذلك تقدّم محاربو الباندافا الشجعان نحو عربة غادِيا، يلاقون القوة بالقوة في غضب القتال العادل.

Verse 27

तत्राद्भुतमपश्याम चित्ररूपं विशाम्पते

هناك، يا سيّد الناس، أبصرنا مشهدًا عجيبًا ذا صور شتّى وألوان متنوّعة، يدهش العقل وسط ما كان يتكشّف من أحداث.

Verse 28

यथा वारयते वेला क्षुब्धतोयं महार्णवम्‌

قال سانجيا: «كما يحجز الشاطئُ المحيطَ العظيم حين تُهيَّج مياهه بعنف.»

Verse 29

उभौ तौ रथिनां श्रेष्ठावुभी भारत दुर्जयौ

قال سانجيا: «كلاهما كان من خيرة مقاتلي العربات؛ ويا بهاراتا، كلاهما شديد العسر على القهر.»

Verse 30

उभौ चन्द्रार्कसदृशौ कान्त्या दीप्त्या च भारत | तथा तौ जातसंरम्भावन्योन्यवधकाड्क्षिणौ

قال سانجيا: يا بهاراتا، لقد كانا كليهما يلمعان كالقمر والشمس جمالًا وبريقًا متأجّجًا. غير أنّهما كانا أيضًا قد استبدّت بهما سَورةُ الغضب، وكلٌّ منهما عازمٌ على موت الآخر—بهاءٌ مقرونٌ بعزمٍ قاتمٍ من عزمِ المعركة.

Verse 31

(दुःशासनार्जुनौ वीरीौ वृत्रेन्द्रसममतेजसौ ।) समीयतुर्महासंख्ये मयशक्रौ यथा पुरा । भारत! वे दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ और दुर्जय वीर थे। दोनों ही कान्ति और दीप्तिमें चन्द्रमा और सूर्यके समान जान पड़ते थे और भारत! दुःशासन तथा अर्जुन दोनों वीर वृत्रासुर एवं इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे दोनों क्रोधमें भरकर एक-दूसरेके वधकी अभिलाषा रखते थे। उस महायुद्धमें वे उसी प्रकार एक-दूसरेसे भिड़े हुए थे, जैसे पूर्वकालमें मयासुर और इन्द्र आपसमें लड़ते थे || २९-३० ई ।। दुःशासनो महाराज पाण्डवं विशिखैस्त्रिभि:

قال سانجيا: في تلك المعركة العظمى، تقارب البطلان—دُهشاسانا وأرجونا—وكان لمعانهما مكافئًا لتألّق فِرِترا وإندرا. وكما التقى مايا وشَكرا (إندرا) قديمًا في قتال، كذلك تواجه هذان الآن—مدفوعَين بالغضب، عازمَين على إفناء أحدهما الآخر، فاشتدّت وطأةُ العبء الأخلاقي للحرب، حيث يصطدم الحقدُ الشخصي بواجب الكشترية (المحارب).

Verse 32

ततोडर्जुनो जातमन्युर्वाष्णेयं वीक्ष्य पीडितम्‌

قال سانجيا: ثم إن أرجونا، وقد استثار الغضبُ في صدره، لما رأى فاسْنِيَة (كريشنا) يُؤذى ويُكابد، اشتعل حنقًا—فارتفعت سَورةُ غضبه استجابةً لألم سائقه وهادِيه وسط اضطراب ساحة القتال.

Verse 33

ते तस्य कवचं भित्त्वा पपु: शोणितमाहवे,(यथैव पन्नगा राजंस्तटाकं तृषितास्तथा ।) वे नाराच रणक्षेत्रमें दःशासनका कवच विदीर्ण करके उसका रक्त पीने लगे, मानो प्यासे सर्प तालाबमें घुस गये हों

قال سانجيا: بعدما حطّموا درعه في غمار القتال، شربوا دمه—كما تدخل الأفاعي العطشى، أيها الملك، إلى الغدير. وتُبرز هذه الصورة انحدار الحرب إلى ضراوةٍ لا رحمة فيها، حيث تُطمَس حدودُ سلوك الكشترية المعتاد تحت وطأة الثأر وهياج الذبح.

Verse 34

दुःशासनस्सत्रिभि: क्रुद्धः पार्थ विव्याध पत्रिभि: | ललाटे भरतश्रेष्ठ शरै: संनतपर्वभि:,भरतश्रेष्ठ) तब दुःशासनने कुपित होकर अर्जुनके ललाटमें झुकी हुई गाँठवाले तीन पंखयुक्त बाण मारे

قال سانجيا: وقد استبدّ الغضبُ بدُهشاسانا، طعن بارثا (أرجونا) بثلاثة سهامٍ مُريَّشة، يا خيرَ آلِ بهاراتا—سهامٍ كانت عُقَدُها منحنيةً إلى أسفل—فأصابته في جبهته. ويُبرز المشهد كيف يدفع الغضبُ في ساحة القتال إلى عنفٍ مُوجَّه، بينما يُمتحَن المحاربُ البارّ في الصبر وضبط النفس تحت الاستفزاز.

Verse 35

ललाटस्थैस्तु तैर्बाणै: शुशुभे पाण्डवो रणे | यथा मेरुर्महाराज शज्ैरत्यर्थमुच्छितै:,ललाटमें लगे हुए उन बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुन युद्धमें उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे मेरुपर्वत अपने तीन अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे सुशोभित होता है

قال سنجيا: وبِتلك السهام المغروسة في جبهته، أشرق ابنُ باندو في ساحة القتال. أيها الملك العظيم، بدا كجبل ميرو، بهيًّا بقممه الشاهقة جدًّا—فغدت جراحه، في خُلُق المحارب الثابت، علاماتٍ على عزيمة لا تنكسر وسط صليل السلاح.

Verse 36

सो&5तिविद्धो महेष्वास: पुत्रेण तव धन्विना । व्यराजत रणे पार्थ: किंशुकः पुष्पवानिव,आपके धनुर्धर पुत्रद्वारा युद्धमें अधिक घायल किये जानेपर महाधनुर्धर अर्जुन खिले हुए पलाशवृक्षके समान शोभा पाने लगे

قال سنجيا: مع أن ابنك حامل القوس أصابه مرارًا وتكرارًا، فإن الرامي العظيم بارثا لمع في ساحة القتال كأنّه شجرة كِمْشُكَة في تمام الإزهار. تؤكد الآية ثبات المحارب: فحتى وهو جريح لا تخبو عزيمة أرجونا ولا بهاؤه في القتال الحق، بل يبدوان أشد ظهورًا، كالأزهار الزاهية فوق أرض الحرب.

Verse 37

दुःशासनं ततः क्रुद्ध पीडयामास पाण्डव: । पर्वणीय सुसंक्रुद्धो राहु: पूर्ण निशाकरम्‌,तदनन्तर कुपित हुए पाण्डुपुत्र अर्जुन दुःशासनको उसी प्रकार पीड़ा देने लगे, जैसे पूर्णिमाके दिन अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ राहु पूर्ण चन्द्रमाको पीड़ा देता है

قال سنجيا: ثم إن الباندفي، وقد اشتعل غضبًا، أخذ يرهق دُحشاسَنا—كما يفعل راهو، هائجًا في ليلة البدر، حين يُعذِّب قرص القمر المكتمل.

Verse 38

पीड्यमानो बलवता पुत्रस्तव विशाम्पते । विव्याध समरे पार्थ कड्कपत्रै: शिलाशितै:,प्रजानाथ! बलवान अर्जुनके द्वारा पीड़ित होनेपर आपके पुत्रने शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कंक-पत्रयुक्त बाणोंद्वारा समरभूमिमें उन कुन्तीकुमारको बींध डाला

قال سنجيا: يا سيدَ الرعية، يا حاكمَ الرجال! مع أنه كان مُضغَطًا عليه من أرجونا الجبار، فإن ابنك في غمار القتال طعن ابنَ برثا، بارثا، بسهامٍ ريشُها كريش البلشون، ونصالُها قد شُحِذت على الحجر.

Verse 39

तस्य पार्थो धनुश्कछित्त्वा रथं चास्य त्रिभि: शरै: । आजघान ततः पश्चात्‌ पुत्र ते निशितै: शरैः,तब अर्जुनने तीन बाणोंसे दुःशासनके रथ और धनुषको छिन्न-भिन्न करके आपके उस पुत्रको पैने बाणोंद्वारा अच्छी तरह घायल किया

قال سنجيا: ثم إن بارثا (أرجونا) قطع قوسه، وبثلاثة سهام حطّم مركبته. وبعد ذلك، أيها الملك، أخذ يضرب ابنك مرارًا بسهامٍ حادّة، فأثخنه جراحًا.

Verse 40

सोअन्यत्‌ कार्मुकमादाय भीष्मस्य प्रमुखे स्थित: । अर्जुनं पञ्चविंशत्या बाह्दोरुरसि चार्पयत्‌,तब दुःशासनने दूसरा धनुष ले भीष्मके सामने खड़े होकर अर्जुनकी दोनों भुजाओं और छातीमें पचीस बाण मारे

قال سانجيا: ثم تناول دُحشاسَنَة قوسًا آخر، ووقف أمام بهيشما، فأصاب أرجونا—في ذراعيه كليهما وفي صدره—بخمسٍ وعشرين سهمًا.

Verse 41

तस्य क़रुद्धो महाराज पाण्डव: शत्रुतापन: । अप्रैषीद्‌ विशिखान्‌ घोरान्‌ यमदण्डोपमान्‌ बहून्‌,महाराज! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो दुःशासनपर यमदण्डके समान भयंकर बहुत-से बाण चलाये

قال سانجيا: أيها الملك، عندئذٍ غضب أرجونا الباندفي، مُحرق الأعداء، فأطلق على دُحشاسَنَة سهامًا كثيرةً مروّعة، كأنها عصا عقاب ياما.

Verse 42

अप्राप्तानेव तान्‌ बाणांश्विच्छेद तनयस्तव । यतमानस्य पार्थस्य तदद्भुतमिवाभवत्‌,परंतु आपके पुत्रने अर्जुनके प्रयत्नशील होते हुए भी उन बाणोंको अपने पास आनेके पहले ही काट डाला। वह एक अद्भुत-सी बात थी

قال سانجيا: غير أن ابنك قطع تلك السهام قبل أن تبلغَه. ومع أن بارثا (أرجونا) كان يبذل غاية الجهد، بدا ذلك كأنه معجزة—مشهدًا مدهشًا في خضم القتال.

Verse 43

पार्थ च निशितैर्बाणैरविध्यत्‌ तनयस्तव । ततः क्रुद्धों रणे पार्थ: शरान्‌ संधाय कार्मुके

قال سانجيا: لقد أصاب ابنك بارثا (أرجونا) بسهامٍ حادّة. فغضب بارثا في ساحة القتال، وركّب سهامه على قوسه استعدادًا للرد.

Verse 44

न्यमज्जंस्ते महाराज तस्य काये महात्मन:

قال سانجيا: «أيها الملك، لقد غاصت تلك السهام في جسد ذلك المحارب العظيم النفس.»

Verse 45

यथा हंसा महाराज तडागं प्राप्प भारत । महाराज! भरतनन्दन! जैसे हंस तालाबमें पहुँचकर उसके भीतर गोते लगाते हैं, उसी प्रकार वे बाण महामना दुःशासनके शरीरमें धँस गये ।। ४४ है ।। पीडितश्रैव पुत्रस्ते पाण्डवेन महात्मना,इस प्रकार महामना पाण्डुनन्दन अर्जुनके द्वारा पीड़ित होकर आपका पुत्र दुःशासन युद्धमें अर्जुनको छोड़कर तुरंत ही भीष्मके रथपर जा बैठा। उस समय अगाध समुद्रमें डूबते हुए दुःशासनके लिये भीष्मजी द्वीप हो गये

قال سَنْجَيا: «يا أيها الملك العظيم، يا سليل بهاراتا—كما تبلغ الإوزّاتُ البحيرةَ ثم تغوص في مياهها، كذلك غاصت تلك السهام عميقًا في جسد دُحشاسَنَة ذي النفس السامية. وقد عذّبه أرجونا الباندفيّ العظيم القلب، فترك ابنُك دُحشاسَنَة أرجونا في القتال، وصعد من فوره إلى عربة بهيشما. وفي تلك اللحظة، كان بهيشما لدُحشاسَنَة—كمن يغرق في بحرٍ لا قرار له—جزيرةَ نجاةٍ وملاذًا.»

Verse 46

हित्वा पार्थ रणे तूर्ण भीष्मस्य रथमाव्रजत्‌ । अगाधे मज्जतस्तस्य द्वीपो भीष्मो5भवत्‌ तदा,इस प्रकार महामना पाण्डुनन्दन अर्जुनके द्वारा पीड़ित होकर आपका पुत्र दुःशासन युद्धमें अर्जुनको छोड़कर तुरंत ही भीष्मके रथपर जा बैठा। उस समय अगाध समुद्रमें डूबते हुए दुःशासनके लिये भीष्मजी द्वीप हो गये

قال سَنْجَيا: «ترك دُحشاسَنَة أرجونا في ساحة القتال، ومضى مسرعًا يلتمس الملجأ على عربة بهيشما. وفي تلك اللحظة، كان بهيشما لدُحشاسَنَة—كأنه يغوص في بحرٍ لا قرار له—جزيرةً وسندًا منجّيًا.»

Verse 47

प्रतिलभ्य तत: संज्ञां पुत्रस्तव विशाम्पते । अवारयत्‌ तत: शूरो भूय एव पराक्रमी,प्रजानाथ! तदनन्तर होश-हवास ठीक होनेपर आपके पराक्रमी एवं शूरवीर पुत्र दुःशासनने पुनः अत्यन्त तीखे बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको रोका, मानो इन्द्रने वृत्रासुरकी गतिको अवरुद्ध कर दिया हो। महाकाय दुःशासनने अर्जुनको अपने बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया; परंतु वे तनिक भी व्यथित नहीं हुए

قال سَنْجَيا: «ثم إن ابنك—يا سيدَ الناس—لما استعاد وعيه أظهر بأسه من جديد. ذلك البطل الجسور القويّ كبح أرجونا ابنَ كونتي مرةً أخرى بسهامٍ بالغة الحدّة، كأن إندرا يعترض مجرى فِرِترا. ومع أن دُحشاسَنَة عظيم الجثة طعن أرجونا ومزّقه بنباله، لم يضطرب أرجونا قيد أنملة.»

Verse 48

शरै: सुनिशितै: पार्थ यथा वृत्र पुरंदर: । निर्बिभेद महाकायो विव्यथे नैव चार्जुन:,प्रजानाथ! तदनन्तर होश-हवास ठीक होनेपर आपके पराक्रमी एवं शूरवीर पुत्र दुःशासनने पुनः अत्यन्त तीखे बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको रोका, मानो इन्द्रने वृत्रासुरकी गतिको अवरुद्ध कर दिया हो। महाकाय दुःशासनने अर्जुनको अपने बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया; परंतु वे तनिक भी व्यथित नहीं हुए

قال سَنْجَيا: «وبسهامٍ مسنونةٍ حدَّها كحدِّ الموسى، طعن ذلك المقاتل الجبار أرجونا، كما يكبح إندرا قاتلُ فِرِترا فِرِترا ويقهره. ومع أنه ثُقِب وقُطِّع بتلك النبال، لم يتزعزع أرجونا ولم يشعر بضيقٍ قطّ، مُظهِرًا ثباتًا في قلب عصف المعركة.»

Verse 66

समाद्रवन्त गाड़ेयं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम्‌ । प्रजानाथ! नकुल, सहदेव, पराक्रमी धर्मराज युधिष्ठिर तथा दूसरे समस्त सैनिक अर्जुनका उपर्युक्त वचन सुनकर भीष्मजीकी ओर बढ़ने लगे

قال سَنْجَيا: «يا سيدَ الناس، لما سمعوا كلام بارثا (أرجونا)، اندفع ناكولا وسهاديفا، ودارماراجا يودهيشثيرا الشجاع، وسائر الجنود، متقدمين نحو بهيشما.»

Verse 106

त्वरमाणो महाराज सौमदत्तिन्यवारयत्‌ । महाराज! भीमसेन भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर गंगानन्दन भीष्मका वध करना चाहते थे; परंतु सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाने तुरंत आकर उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया

قال سنجيا: «أيها الملك، لما اندفع مسرعًا إلى الأمام كفَّه ابنُ سَوْمَدَتَّا». وفي لهيب المعركة كان بهيما—وقد غمرته ثورةٌ عاتية وعزم على قتل بهيشما، الابن المحبوب للغانغا—فأوقفه بُهُورِيشرَفَس، ابنُ سَوْمَدَتَّا، إذ تدخّل ليمنع هجومًا أعمى مندفعًا بدافع الغضب.

Verse 110

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अर्जुनदुःशासनसमागमे दशाधिकशततमोड<ध्याय:

قال سنجيا: هكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «بهِيشما پرفا»—وخاصة في القسم المتعلّق بسقوط (موت) بهيشما—تنتهي هنا المئة والعاشرة من الفصول، واصفةً لقاء أرجونا بدُهشاسانا. ويؤطّر هذا الخاتمةُ الحدثَ ضمن المسار الأخلاقي والاستراتيجي الأوسع للحرب، حيث تتكشف العداوات والعهود الشخصية تحت مقتضيات الدارما في ميدان القتال.

Verse 116

विकर्णो वारयामास इच्छन्‌ भीष्मस्य जीवितम्‌ | इसी प्रकार शूरवीर नकुल बहुत-से सायकोंकी वर्षा कर रहे थे, परंतु भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले विकर्णने उन्हें रोक दिया

قال سنجيا: رغبةً في صون حياة بهيشما، كفَّ فيكارنا الهجوم. ومع أن ناكولا البطل كان يمطر السهام مطرًا، فإن فيكارنا—وقد عزم على حماية بهيشما—أوقفه، مبيّنًا كيف قد تتغلب الأمانة والواجب نحو القائد على اندفاع الضربة العاجلة في ساحة القتال.

Verse 126

वारयामास संक्रुद्ध: कृप: शारद्वतो युधि । राजन! युद्धस्थलमें भीष्मके रथकी ओर जाते हुए सहदेवको कुपित हुए शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यने रोक दिया

قال سنجيا: في خضمّ القتال، كَرِپَ—ابنُ شارَدْوَت—غضبانَ ثابتَ العزم، أوقف سَهَدِيفا وهو يتقدّم نحو عربة بهيشما. وهكذا، حتى في ساحة الحرب، كان الشيوخ والأساتذة يسعون إلى كبح اندفاعةٍ خطرة وتوجيه مجرى القتال بتدخّلٍ منضبط، لا بغضبٍ منفلت.

Verse 136

भीष्मस्य निधन प्रेप्सुं दुर्मुखो 5भ्यद्रवद्‌ बली । भीष्मकी मृत्यु चाहनेवाले क्रूरकर्मा राक्षस महाबली भीमसेनकुमार घटोत्कचपर बलवान दुर्मुखने आक्रमण किया

قال سنجيا: رغبةً في إيقاع موت بهيشما، اندفع دُورموخا الجبّار إلى الأمام مهاجمًا. وفي المناخ الأخلاقي للحرب يعكس هذا الفعل تصلّب النية؛ إذ لم يعد النصر يُطلب بمجرد مواجهة الخصم، بل بتعمد إسقاط شيخٍ جليلٍ مهيب، كانت هيبته ووجوده يسندان النظام الحربي لسلالة الكورو.

Verse 186

दुःशासनो महेष्वासो वारयामास संयुगे | महाराज! दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए वेगशाली वीर अर्जुन युद्धमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको मारना चाहते थे। उस समय महाधनुर्धर दुःशासनने युद्धके मैदानमें आकर उन्हें रोका

قال سانجيا: أيها الملك، إن أرجونا، البطل السريع كأنه يضيء الجهات العشر، أراد في ساحة القتال أن يصرع بهيشما جاعلًا شيكاندي أمامه. وفي تلك اللحظة أقبل دوحشاسانا، الرامي الجبار، إلى ميدان الحرب فاعترضه وكفَّه.

Verse 196

भीष्मस्याभिमुखान्‌ यातान्‌ वारयामासुराहवे । राजन! इसी प्रकार आपके अन्य योद्धाओंने भीष्मके सम्मुख गये हुए पाण्डव महारथियोंको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया

قال سانجيا: في خضم القتال كفّوا أولئك الذين كانوا يتقدمون مواجهةً لبهيشما. أيها الملك، وعلى هذا النحو أيضًا منع مقاتلوك الآخرون في المعركة محاربي الباندافا العظام على العربات، الذين تحركوا لملاقاة بهيشما، من أن يواصلوا الاندفاع إلى الأمام.

Verse 246

अवारयन्त संहृष्टास्तावका: पुरुषर्षभा: । युद्धमें प्रलयकालीन जलप्रवाहके समान आते हुए उन वीरोंको आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुषोंने हर्ष और उत्साहमें भरकर रोका

قال سانجيا: إن خيرة رجال جيشك، وقد امتلأوا فرحًا وحماسة، كفّوا أولئك الأبطال وهم يندفعون كسيول المياه في زمن البرالايا، زمن الفناء الكوني.

Verse 256

भीष्मस्य जीविताकाड्क्षी धनंजयमुपाद्रवत्‌ महाराज! महारथी दुःशासनने भय छोड़कर भीष्मकी जीवन-रक्षाके लिये धनंजयपर धावा किया

قال سانجيا: أيها الملك، إذ كان حريصًا على بقاء بهيشما حيًّا، طرح المحارب العظيم على العربة دوحشاسانا الخوف جانبًا واندفع نحو دهننجايا (أرجونا) ليحمي حياة بهيشما.

Verse 266

अभ्यद्रवन्त संग्रामे तव पुत्रान्‌ महारथा: । इसी प्रकार शूरवीर महारथी पाण्डवोंने युद्धमें गंगानन्दन भीष्मके रथकी ओर खड़े हुए आपके पुत्रोंपर आक्रमण किया

قال سانجيا: في خضم القتال اندفع المحاربون العظام على العربات نحو أبنائك. وهكذا هاجم أبطال الباندافا من المَهاراثا، الواقفون قرب عربة بهيشما—ابن الغانغا—أبناءك بهجوم حازم شديد.

Verse 276

दुःशासनर थं प्राप्य यत्‌ पार्थो नात्यवर्तत । प्रजानाथ! वहाँ हमने सबसे अद्भुत और विचित्र बात यह देखी कि अर्जुन दुःशासनके रथके पास पहुँचकर वहाँसे आगे न बढ़ सके

قال سنجيا: لما بلغ بارثا (أرجونا) عربة دُحشاسَنَة لم يستطع أن يتجاوزها إلى الأمام. يا سيد الرجال! لقد شهدنا هناك أمراً بالغ العجب وغريباً—أن أرجونا، بعدما دنا من عربة دُحشاسَنَة، عجز عن التقدم خطوةً أخرى.

Verse 283

तथैव पाण्डवं क्रुद्धं तव पुत्रो न्‍्यवारयत्‌ । जैसे तटकी भूमि विक्षुब्ध जलराशिवाले महासागरको रोके रहती है, उसी प्रकार आपके पुत्रने क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको रोक दिया था

قال سنجيا: وعلى النحو نفسه كبح ابنك الباندفيَّ الغضبان (أرجونا). وكما يحبس الشاطئُ المحيطَ العظيم حين تضطرب مياهه اضطراباً عنيفاً، كذلك قيّده في لهيب السخط.

Verse 316

वासुदेवं च विंशत्या ताडयामास संयुगे । महाराज! दुःशासनने तीन बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुनको और बीस बाणोंसे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको युद्धमें घायल किया

قال سنجيا: أيها الملك! في غمار القتال ضرب دُحشاسَنَة أرجونا ابن باندو بثلاثة سهام، وجرح شري كريشنا ابن فاسوديفا بعشرين سهماً.

Verse 326

दुःशासनं शतेनाजौ नाराचानां समार्पयत्‌ | भगवान्‌ श्रीकृष्णको बाणोंसे पीड़ित हुआ देख अर्जुनका क्रोध उभड़ आया और उन्होंने दुःशासनको युद्धमें सौ नाराचोंसे घायल कर दिया

قال سنجيا: في غمار القتال، لما رأى أرجونا الربَّ شري كريشنا يتألم من سهامٍ أصابته، فاض غضبه. فاندفع في ساحة الحرب وضرب دُحشاسَنَة بمئةٍ من سهام «ناراجا»، فأثخنه جراحاً.

Verse 436

प्रेषयामास समरे स्वर्णपुड्खाजञ्छिलाशितान्‌ | बाणोंको काटनेके पश्चात्‌ आपके पुत्रने कुन्तीकुमार अर्जुनको तीखे बाणोंद्वारा बींध डाला, तब रफक्षेत्रमें अर्जुनने कुपित होकर अपने धनुषपर स्वर्णमय पंखसे युक्त एवं शिलापर रगड़कर तेज किये हुए बाणोंका संधान किया और उन्हें दुःशासनपर चलाया

قال سنجيا: في ساحة القتال أطلق سهاماً ذات ريشٍ من ذهب، مصقولةً على الحجر حتى اشتدّ حدُّها. وبعد أن قُطِّعت تلك السهام، عاد ابنك فطعن أرجونا ابن كونتي بسهامٍ حادّة. عندئذٍ، في ميدان الحرب، غضب أرجونا، فركّب على قوسه سهاماً ذات أجنحةٍ ذهبية، قد شُحِذت بدلكها على الحجر، وأطلقها على دُحشاسَنَة.

Frequently Asked Questions

The chapter implicitly stages the conflict between strategic necessity and vow-bound restraint: Bhīṣma remains militarily central, yet his personal code constrains how he engages Śikhaṇḍin, creating an ethically conditioned tactical vulnerability.

The takeaway is decision-clarity under complexity: identify the decisive impediment to a justifiable objective, concentrate effort there, and act with disciplined focus rather than dispersing agency across secondary engagements.

No explicit phalaśruti is presented in this chapter; its meta-level function is structural—reframing the campaign around the necessity of addressing Bhīṣma as a decisive condition for subsequent narrative resolution.