Adhyaya 62
Shalya ParvaAdhyaya 6253 Versesयुद्धोत्तर अवस्था; पाण्डवों का स्पष्ट प्रभुत्व और कौरव-शिविर का पतन/रिक्तता

Adhyaya 62

गान्धारी-प्रशमनम् — Pacification of Gāndhārī and Kṛṣṇa’s Counsel at Hāstinapura

Upa-parva: Gāndhārī-Śamana (Pacification of Gāndhārī) Episode

Janamejaya asks why Yudhiṣṭhira again sent Kṛṣṇa to Gāndhārī after victory. Vaiśaṃpāyana explains that Yudhiṣṭhira, alarmed by the irregularity perceived in Duryodhana’s defeat and anticipating Gāndhārī’s wrath empowered by severe austerities, seeks preemptive reconciliation. Yudhiṣṭhira credits Kṛṣṇa’s strategic support (including charioteership) for victory and requests him to neutralize Gāndhārī’s anger. Kṛṣṇa proceeds to Hāstinapura with Dāruka, meets Dhṛtarāṣṭra and Gāndhārī, and speaks in a composed, causality-focused register: peace proposals were previously rejected, kāla (time/inevitability) and prior choices shaped the outcome, and the Pāṇḍavas should not be targeted with resentment. He praises Gāndhārī’s moral counsel given earlier and discourages thoughts of harming the Pāṇḍavas, acknowledging her ascetic potency while urging restraint. Gāndhārī’s agitation subsides; she accepts Kṛṣṇa’s framing while grieving. Kṛṣṇa then perceives Aśvatthāman’s hostile nocturnal intent and departs urgently to protect the Pāṇḍavas, after which Vyāsa consoles the elders and Kṛṣṇa returns to the camp to report and rejoin the Pāṇḍavas.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है—युद्ध की धूल बैठते ही विजयी पाण्डव-सेना शंखनाद करती हुई विश्राम को चलती है; पर उसी शांति के भीतर एक असाधारण घटना छिपी है—दुर्योधन के शिविर में प्रवेश। → धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदेय और अन्य महाधनुर्धर पाण्डवों के पीछे-पीछे बढ़ते हैं। वे पहले दुर्योधन के शिविर में घुसते हैं—हतशत्रु, हतनेता, और भयाक्रान्त जनों से रिक्त उस शिविर में—और फिर कौरव-सम्पदा, कोश-रत्न और भण्डारों पर अधिकार की तैयारी करते हैं। → पाण्डव जब अर्जुन के रथ को अग्नि से भस्म हुआ देखते हैं तो विस्मय से हाथ जोड़कर कृष्ण से पूछते हैं—यह रथ, जो अभी-अभी युद्ध में अजेय था, अचानक कैसे जल गया? कृष्ण उद्घाटित करते हैं कि यह रथ दिव्य संरक्षण से अब तक टिका था; कार्य पूर्ण होते ही वह संचित तेज/अस्त्र-प्रभाव से मुक्त होकर भस्म हो गया—यह विजय का नहीं, नियति का संकेत है। → कृष्ण पाण्डवों को सावधान करते हैं कि रात्रि-रक्षा और मर्यादा हेतु शिविर से बाहर ठहरना उचित है; पाण्डव गान्धारी—हतपुत्रा माता—के प्रति शोक-सम्मान का स्मरण करते हुए कृष्ण से आगे की नीति पूछते हैं। अंततः पाण्डव कृष्ण को दारुक सहित हस्तिनापुर भेजने का निश्चय करते हैं, ताकि शेष राजनीतिक-धार्मिक दायित्व निभाए जा सकें। → कृष्ण का हस्तिनापुर-प्रस्थान एक नए नैतिक-सामाजिक टकराव की भूमिका बनता है—विजय के बाद शोक, प्रतिशोध और धर्म-निर्णय की अगली परीक्षा अब राजसभा और गान्धारी के सम्मुख होगी।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं।) पम्प बछ। अ-काज जा द्विषष्टितमो<5 ध्याय: पाण्डवोंका कौरव शिबिरमें पहुँचना, अर्जुनके रथका दग्ध होना और पाण्डवोंका है श्रीकृष्णको हस्तिनापुर जना संजय उवाच ततस्ते प्रययु: सर्वे निवासाय महीक्षित: । शड्खान्‌ प्रध्मापयन्तो वै हृष्टा: परिघबाहव:

三阇耶说道:随后,那些诸王都动身去安歇过夜,欢然吹响各自的海螺号——臂力雄健如铁棍——在战意的昂扬中群起而行。

Verse 2

संजय कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर परिघके समान मोटी भुजाओंवाले सब नरेश अपना-अपना शंख बजाते हुए शिबिरमें विश्राम करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक चल दिये ।। पाण्डवान्‌ गच्छतश्चापि शिबिरं नो विशाम्पते | महेष्वासो<न्वगात्‌ पश्चाद्‌ युयुत्सु: सात्यकिस्तथा,प्रजानाथ! हमारे शिबिरकी ओर जाते हुए पाण्डवोंके पीछे-पीछे महाधनुर्धर युयुत्सु, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके सभी पुत्र तथा अन्य सब धनुर्धर योद्धा भी उन शिबिरोंमें गये

三阇耶说道:大王啊!其后诸位君王——臂膀粗壮如铁棍——各自吹响海螺号,心怀满足地回营歇息。又当般度诸子朝我军营地行进之时,噢,人中之主,那些大弓手也在后随行——尤尤兹苏与萨提亚基亦然。

Verse 3

धृष्टद्युम्न: शिखण्डी च द्रौपदेयाश्न सर्वश: । सर्वे चान्ये महेष्वासा: प्रययु: शिबिराण्युत,प्रजानाथ! हमारे शिबिरकी ओर जाते हुए पाण्डवोंके पीछे-पीछे महाधनुर्धर युयुत्सु, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके सभी पुत्र तथा अन्य सब धनुर्धर योद्धा भी उन शिबिरोंमें गये

三阇耶说道:持军(Dhṛṣṭadyumna)与尸佉ṇḍī(Śikhaṇḍī),连同德罗帕蒂(Draupadī)诸子以及其他伟大的弓手,也在般度族(Pāṇḍava)之后列队随行,当他们朝各自营帐进发之时,噫,人中之主。

Verse 4

ततस्ते प्राविशन्‌ पार्था हतत्विट्कं हतेश्वरम्‌ | दुर्योधनस्य शिबिरं रड्भवद्धिसृते जने,तत्पश्चात्‌ कुन्तीके पुत्रोंने पहले दुर्योधनके शिबिरमें प्रवेश किया। जैसे दर्शकोंके चले जानेपर सूना रंगमण्डप शोभाहीन दिखायी देता है, उसी प्रकार जिसका स्वामी मारा गया था, वह शिबिर उत्सवशून्य नगर और नागरहित सरोवरके समान श्रीहीन जान पड़ता था। वहाँ रहनेवाले लोगोंमें अधिकांश स्त्रियाँ और नपुंसक थे तथा बूढ़े मन्त्री अधिष्ठाता बनकर उस शिबिरका संरक्षण कर रहे थे

三阇耶说道:随后,普利塔(Pṛthā)之子进入了兜利约陀那(Duryodhana)的营帐——其主已亡,光华尽灭。众人散去之后,它宛如观众离席后的空剧场:无庆典、无辉耀,恰似无节庆之城,或失却那伽(nāga)的湖泊。营中所余多为妇女与阉人,而年迈的大臣则为监护者,守护着营帐残存的一切。

Verse 5

गतोत्सवं पुरमिव हृतनागमिव हृदम्‌ | स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठं वृद्धामात्यैरधिष्ठितम्‌,तत्पश्चात्‌ कुन्तीके पुत्रोंने पहले दुर्योधनके शिबिरमें प्रवेश किया। जैसे दर्शकोंके चले जानेपर सूना रंगमण्डप शोभाहीन दिखायी देता है, उसी प्रकार जिसका स्वामी मारा गया था, वह शिबिर उत्सवशून्य नगर और नागरहित सरोवरके समान श्रीहीन जान पड़ता था। वहाँ रहनेवाले लोगोंमें अधिकांश स्त्रियाँ और नपुंसक थे तथा बूढ़े मन्त्री अधिष्ठाता बनकर उस शिबिरका संरक्षण कर रहे थे

三阇耶说道:其后,昆蒂(Kuntī)之子进入兜利约陀那的营帐。它如同庆典已尽的城邑,又如失却那伽的湖泊——荣光被剥夺。正如观众散尽后剧场黯然无色,那营帐在其主被杀之后,也显得无欢而凄凉。营中所余多为妇女与阉人;年迈的大臣则为监护与总理之人,守护并料理其营务,直至主帅倾覆之后。

Verse 6

तत्रैतान्‌ पर्युपातिष्ठन्‌ दुर्योधनपुर:सरा: । कृताञ्जलिपुटा राजन्‌ काषायमलिनाम्बरा:,राजन! वहाँ दुर्योधनके आगे-आगे चलनेवाले सेवकगण मलिन भगवा वस्त्र पहनकर हाथ जोड़े हुए इन पाण्डवोंके समक्ष उपस्थित हुए

三阇耶说道:在那里,王啊,那些素来走在兜利约陀那前方的侍从,身着污浊的赭色衣,合掌致敬,来到这些般度族面前侍立。

Verse 7

शिबिरं समनुप्राप्य कुरुराजस्य पाण्डवा: । अवतेरुम॑हाराज रथेभ्यो रथसत्तमा:,महाराज! कुरुराजके शिबिरमें पहुँचकर रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डव अपने रथोंसे नीचे उतरे

三阇耶说道:抵达俱卢王的营帐之后,伟大的王啊,般度族——车战之中最卓绝的勇士——从战车上跃下。

Verse 8

ततो गाण्डीवधन्वानमभ्यभाषत केशव: । स्थित: प्रियहिते नित्यमतीव भरतर्षभ

三阇耶说:于是,凯沙瓦(奎师那)对执持甘狄婆神弓者说道——他恒常坚守于自己所珍爱且有益之事,噢,婆罗多族中的雄杰。

Verse 9

अवरोपय गाण्डीवमक्षयौ च महेषुधी । अथाहमवरोक्ष्यामि पश्चाद्‌ भरतसत्तम

三阇耶说:“放下甘狄婆神弓,也放下那两只巨大的、取之不尽的箭囊。然后我也将随后下车,噢,婆罗多族之最胜者。”

Verse 10

स्वयं चैवावरोह त्वमेतच्छेयस्तवानघ । भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात्‌ सदा अर्जुनके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनसे कहा--“भरतवंशशिरोमणे! तुम गाण्डीव धनुषको और इन दोनों बाणोंसे भरे हुए अक्षय तरकसोंको उतार लो। फिर स्वयं भी उतर जाओ! इसके बाद मैं उतरूँगा! अनघ! ऐसा करनेमें ही तुम्हारी भलाई है” ।। तच्चाकरोत्‌ तथा वीर: पाण्डुपुत्रो धनंजय:,वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनने वह सब वैसे ही किया। तदनन्तर परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर गाण्डीवधारी अर्जुनके रथसे स्वयं भी उतर पड़े

三阇耶说:奎师那常以阿周那所珍爱且有益之事为念,便对执持甘狄婆者说道:“噢,婆罗多族之最胜者,噢,无垢者——你当先下车;此举确为你的福祉。卸下甘狄婆神弓,并取下这两只装满箭矢、取之不尽的箭囊;然后你自己下车。你之后,我再下。”般度之子、英勇的檀那ंज耶(阿周那)悉依其言而行。随后,至智的世尊室利奎师那放开缰绳,也从阿周那的战车上亲自下车。

Verse 11

अथ पश्चात्‌ ततः कृष्णो रश्मीनुत्सृज्य वाजिनाम्‌ । अवारोहत मेधावी रथाद्‌ गाण्डीवधन्चन:,वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनने वह सब वैसे ही किया। तदनन्तर परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर गाण्डीवधारी अर्जुनके रथसे स्वयं भी उतर पड़े

随后,奎师那放开马缰,从战车上下来;智者檀那ंज耶(阿周那),执持甘狄婆者,也从车上下来。

Verse 12

अथावतीर्णे भूतानामीश्वरे सुमहात्मनि । कपिरन्तर्दथे दिव्यो ध्वजो गाण्डीवधन्चन:,समस्त प्राणियोंके ईश्वर परमात्मा श्रीकृष्णके उतरते ही गाण्डीवधारी अर्जुनका ध्वजस्वरूप दिव्य वानर उस रथसे अन्तर्धान हो गया

三阇耶说:当至上之主——伟大的灵魂、万有众生之主宰——从战车上下来之时,作为阿周那战车旗帜的天界神猴便隐没不见。

Verse 13

स दग्धो द्रोणकर्णाभ्यां दिव्यैरस्त्रमहारथ: । अथादीप्तोडग्निना हयाशु प्रजज्वाल महीपते,पृथ्वीनाथ! इसके बाद अर्जुनका वह विशाल रथ, जो द्रोण और कर्णके दिव्यास्त्रोंद्वारा दग्धप्राय हो गया था, तुरंत ही आगसे प्रज्वलित हो उठा

三阇耶说道:大王啊,那辆伟大的战车——先前已几乎被德罗那与迦尔那的天授神兵所焚毁——此刻又迅疾被火点燃,轰然腾起烈焰,噢,大地之主。

Verse 14

सोपासड्र: सरश्मिश्न साश्वः सयुगबन्धुर: । भस्मी भूतो 5पतद्‌ भूमौ रथो गाण्डीवधन्चन:,गाण्डीवधारीका वह रथ उपासंग, बागडोर, जूआ, बन्धुरकाष्ठ और घोड़ोंसहित भस्म होकर भूमिपर गिर पड़ा

三阇耶说道:阿周那的战车——连同其一切装具、缰绳、战马、轭具以及系缚马队的车辕——尽成灰烬,坠落于大地之上。

Verse 15

त॑ तथा भस्मभूतं तु दृष्टवा पाण्डुसुता: प्रभो । अभवन्‌ विस्मिता राजन्नर्जुनश्वेदमब्रवीत्‌,प्रभो! नरेश्वर! उस रथको भस्मीभूत हुआ देख समस्त पाण्डव आश्चर्यचकित हो उठे और अर्जुनने भी हाथ जोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें बारंबार प्रणाम करके प्रेमपूर्वक पूछा --“गोविन्द! यह रथ अकस्मात्‌ कैसे आगसे जल गया? भगवन्‌! यदुनन्दन! यह कैसी महान्‌ आश्चवर्यकी बात हो गयी? महाबाहो! यदि आप सुनने-योग्य समझें तो इसका रहस्य मुझे बतावें'

三阇耶说道:主上啊,般度之子们见那战车化为灰烬,皆惊骇莫名。于是阿周那怀着敬意开口,向戈文达求问这骤然焚烧的隐秘缘由——在战后余烬之中,宛如一桩宏大的奇异之谜。

Verse 16

कृताञ्जलि: सप्रणयं प्रणिपत्याभिवाद्य ह । गोविन्द कस्माद्‌ भगवन्‌ रथो दग्धोडयमग्निना,प्रभो! नरेश्वर! उस रथको भस्मीभूत हुआ देख समस्त पाण्डव आश्चर्यचकित हो उठे और अर्जुनने भी हाथ जोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें बारंबार प्रणाम करके प्रेमपूर्वक पूछा --“गोविन्द! यह रथ अकस्मात्‌ कैसे आगसे जल गया? भगवन्‌! यदुनन्दन! यह कैसी महान्‌ आश्चवर्यकी बात हो गयी? महाबाहो! यदि आप सुनने-योग्य समझें तो इसका रहस्य मुझे बतावें'

三阇耶说道:阿周那合掌,怀着亲敬之心俯身顶礼,屡屡向戈文达致敬,继而问道:“戈文达啊,具福之主啊,为何此车忽被烈火焚烧?主宰啊,人中之主啊!此事大为奇异。若你认为可说,愿为我揭示其中秘因。”

Verse 17

किमेतन्महदा क्षर्यम भवद्‌ यदुनन्दन । तन्मे ब्रूहि महाबाहो श्रोतव्यं यदि मन्‍्यसे,प्रभो! नरेश्वर! उस रथको भस्मीभूत हुआ देख समस्त पाण्डव आश्चर्यचकित हो उठे और अर्जुनने भी हाथ जोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें बारंबार प्रणाम करके प्रेमपूर्वक पूछा --“गोविन्द! यह रथ अकस्मात्‌ कैसे आगसे जल गया? भगवन्‌! यदुनन्दन! यह कैसी महान्‌ आश्चवर्यकी बात हो गयी? महाबाहो! यदि आप सुनने-योग्य समझें तो इसका रहस्य मुझे बतावें'

“耶度之子啊,这发生的巨大奇事究竟是什么?大臂者啊,若你认为可听可说,便请告知于我。”

Verse 18

वायुदेव उवाच अस्त्रैरबहुविधैर्दग्ध: पूर्वमेवायमर्जुन । मदधिषछितत्वात्‌ समरे न विशीर्ण: परंतप,श्रीकृष्णने कहा--शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन! यह रथ नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा पहले ही दग्ध हो चुका था; परंतु मेरे बैठे रहनेके कारण समरांगणमें भस्म होकर गिर न सका

风神伐由说道:“阿周那啊,焚灼敌人的勇士!此战车早已被种种飞射之兵器烧灼殆尽;然而因我端坐其上,它才未在战场上化作灰烬而崩塌。”

Verse 19

इदानीं तु विशीर्णो<यं दग्धो ब्रह्मास्त्रतेजसा । मया विमुक्त: कौन्तेय त्वय्यद्य कृतकर्मणि,युद्धके अन्तमें अर्जुनके रथका दाह कुन्तीनन्दन! आज जब तुम अपना अभीष्ट कार्य पूर्ण कर चुके हो, तब मैंने इसे छोड़ दिया है; इसलिये पहलेसे ही ब्रह्मास्त्रके तेजसे दग्ध हुआ यह रथ इस समय बिखरकर गिर पड़ा है

伐由说道:“如今,这辆战车早已被梵天神箭(Brahmāstra)的炽烈威光灼烧,终于支离破碎而坠落。昆蒂之子啊,今日你既已在战斗中成就所愿,我便撤去扶持;因此,那久被此神兵光焰焚灼的战车,直到此刻才崩塌。”

Verse 20

ईषदुत्स्मयमानस्तु भगवान्‌ केशवो$रिहा । परिष्वज्य च राजानं युधिष्ठिरमभाषत,इसके बाद शत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णने किंचित्‌ मुसकराते हुए वहाँ राजा युधिष्ठिरको हृदयसे लगाकर कहा--

随后,圣者计舍婆(克里希那)——灭敌者——微微含笑,将尤提希提罗王紧紧拥入怀中,继而对他说道。

Verse 21

दिष्टया जयसि कौन्तेय दिष्ट्या ते शत्रवो जिता: । दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च भीमसेनश्नू पाण्डव:,“कुन्तीनन्दन! सौभाग्यसे आपकी विजय हुई और सारे शत्रु परास्त हो गये। राजन! गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डुकुमार भीमसेन, आप और माद्रीपुत्र पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव --ये सब-के-सब सकुशल हैं तथा जहाँ वीरोंका विनाश हुआ और तुम्हारे सारे शत्रु कालके गालमें चले गये, उस घोर संग्रामसे तुमलोग जीवित बच गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है

伐由说道:“昆蒂之子啊,幸而你得胜;幸而你的仇敌已被征服。幸而执持甘狄婆弓的阿周那,以及般度之子毗摩塞那,也都安然无恙。”

Verse 22

त्वं चापि कुशली राजन माद्रीपुत्रौो च पाण्डवौ | मुक्ता वीरक्षयादस्मात्‌ संग्रामान्निहतद्विष:,“कुन्तीनन्दन! सौभाग्यसे आपकी विजय हुई और सारे शत्रु परास्त हो गये। राजन! गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डुकुमार भीमसेन, आप और माद्रीपुत्र पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव --ये सब-के-सब सकुशल हैं तथा जहाँ वीरोंका विनाश हुआ और तुम्हारे सारे शत्रु कालके गालमें चले गये, उस घोर संग्रामसे तुमलोग जीवित बच गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है

伐由说道:“大王啊,你亦安然无恙;摩德丽所生的两位般度之子也同样平安。你们既已诛灭仇敌,便都得以生还,脱离这可怖的战场——英雄覆灭之地。此实为大幸。”

Verse 23

क्षिप्रमुत्ततकालानि कुरु कार्याणि भारत | उपायातमुपप्लव्यं सह गाण्डीवधन्चना

风神伐由说道:“噢,婆罗多啊,速速行事,立刻完成当做之事。执持甘狄婆神弓的阿周那已然到来——随时可被引入战阵。”

Verse 24

आनीय मधुपर्क मां यत्‌ पुरा त्वमवोचथा: । एष भ्राता सखा चैव तव कृष्ण धनंजय:

“把蜜乳礼(madhuparka)带来给我,正如你昔日所许。看哪,噢檀那阇耶,这位既是你的兄弟,也是你的挚友——克里希那。”

Verse 25

रक्षितव्यो महाबाहो सर्वास्वापत्स्विति प्रभो । “भरतनन्दन! अब आगे समयानुसार जो कार्य प्राप्त हो उसे शीघ्र कर डालिये। पहले गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जब मैं उपलव्य नगरमें आया था, उस समय मेरे लिये मधुपर्क अर्पित करके आपने मुझसे यह बात कही थी कि “श्रीकृष्ण! यह अर्जुन तुम्हारा भाई और सखा है। प्रभो! महाबाहो! तुम्हें इसकी सब आपत्तियोंसे रक्षा करनी चाहिये” || २३-२४ ३ || तव चैव ब्रुवाणस्य तथेत्येवाहमब्रुवम्‌,मुक्तो वीरक्षयादस्मात्‌ संग्रामाललोमहर्षणात्‌ । “आपने जब ऐसा कहा, तब मैंने “तथास्तु/ कहकर वह आज्ञा स्वीकार कर ली थी। जनेश्वर! राजेन्द्र! आपका वह शूरवीर, सत्यपराक्रमी भाई सव्यसाची अर्जुन मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर विजयी हुआ है तथा वीरोंका विनाश करनेवाले इस रोमांचकारी संग्रामसे भाइयोंसहित जीवित बच गया है”

风神伐由说道:“噢,大臂之主啊,你当在一切危难之中护佑他。”

Verse 26

स सव्यसाची गुप्तस्ते विजयी च जनेश्वर । भ्रातृभि: सह राजेन्द्र शूर: सत्यपराक्रम:

风神伐由说道:“那位左右开弓的神射手,为了你而受护佑,噢人中王;他注定得胜。与诸兄弟同在,噢诸王之最,他是勇士,真力不虚,志气不移。”

Verse 27

एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिर:

克里希那如此开言之后,法王——坚守正法的犹提士提罗——便作了回应。

Verse 28

युधिछिर उवाच प्रमुक्त द्रोणकर्णाभ्यां ब्रह्मास्त्रमरिमर्दन

坚战说道:“噢,降伏仇敌者,德罗纳与迦尔纳已放出了梵天神兵(Brahmāstra)。”

Verse 29

भवततस्तु प्रसादेन संशप्तकगणा जिता:

坚战说道:“承蒙你的恩泽,誓死军(Saṁśaptaka)的诸队已被击败。”

Verse 30

महारणगत: पार्थो यच्च नासीत्‌ पराड्मुख: । आपकी ही कृपासे संशप्तकगण परास्त हुए हैं और कुन्तीकुमार अर्जुनने उस महासमरमें जो कभी पीठ नहीं दिखायी है, वह भी आपके ही अनुग्रहका फल है || २९६ || तथैव च महाबाहो परयिर्बहुभिर्मया

坚战说道:“帕尔塔(阿周那)投入大决战而从未回身退却,这也是你恩泽的果报。承你之助,誓死军(Saṁśaptaka)被击溃;昆蒂之子阿周那在那浩大战阵中亦坚如磐石。同样地,噢,臂力无双者,我也因你的扶持,历经诸多考验而得以维系并受引导。”

Verse 31

कर्मणामनुसंतानं तेजसश्न गती: शुभा: । महाबाहो! आपके द्वारा अनेकों बार हमारे कार्योकी सिद्धि हुई है और हमें तेजके शुभ परिणाम प्राप्त हुए हैं || ३० ई ।। उपप्लवब्ये महर्षिमें कृष्णद्वेपायनो5ब्रवीत्‌

坚战说道:“我等事业的延续,以及我等威力所行的吉祥之途,皆得以维系。噢,臂力无双者,因你之故,我们的谋划屡屡成就,并得到了勇武与威势最为殊胜的果报。”

Verse 32

इत्येवमुक्ते ते वीरा: शिबिरं तव भारत

坚战说道:“如此言毕,那些英雄,噢,婆罗多啊,便转向你的营帐而去。”

Verse 33

रजतं जातरूपं च मणीनथ च मौक्तिकान्‌,चाँदी, सोना, मोती, मणि, अच्छे-अच्छे आभूषण, कम्बल (कालीन), मृगचर्म, असंख्य दास-दासी तथा राज्यके बहुत-से सामान उनके हाथ लगे

坚战(Yudhiṣṭhira)说道:“他们得到了白银与黄金、宝石与珍珠——又得精美的饰物、毯被与地毯、兽皮、无数男女奴仆,以及许多属于王国的器物与财货。”

Verse 34

भूषणान्यथ मुख्यानि कम्बलान्यजिनानि च । दासीदासमसंख्येयं राज्योपकरणानि च,चाँदी, सोना, मोती, मणि, अच्छे-अच्छे आभूषण, कम्बल (कालीन), मृगचर्म, असंख्य दास-दासी तथा राज्यके बहुत-से सामान उनके हाथ लगे

坚战说道:“他们得了上等的饰物、毯被与席毡,以及兽皮;又得无数男女奴仆;并得许多王权所用的器具与资具。”

Verse 35

ते प्राप्प धनमक्षय्यं त्वदीयं भरतर्षभ | उदक्रोशन्महा भागा नरेन्द्र विजितारय:,भरतश्रेष्ठ! नरेश्वरर आपके धनका अक्षय भण्डार पाकर शत्रुविजयी महाभाग पाण्डव जोर-जोरसे हर्षध्वनि करने लगे

坚战说道:“噢,婆罗多族之雄牛,噢,大王!当他们得到了你那取之不尽的宝藏,那些有福的般度五子——既已战胜仇敌——便高声欢呼。”

Verse 36

ते तु वीरा: समाश्वस्य वाहनान्यवमुच्य च । अतिष्ठ न्त मुहुः सर्वे पाण्डवा: सात्यकिस्तथा,वे सारे वीर अपने वाहनोंको खोलकर वहीं विश्राम करने लगे। समस्त पाण्डव और सात्यकि वहाँ एक साथ बैठे हुए थे

那些英雄们恢复镇定后,解下坐骑的轭具,便在原地停留片刻歇息。众般度兄弟与萨提亚基也都一同留在那处。

Verse 37

अथाब्रवीन्महाराज वासुदेवो महायशा: । अस्माभिरमर्मड्नलार्थाय वस्तव्यं शिबिराद्‌ बहि:,महाराज! तदनन्तर महायशस्वी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण-ने कहा--'आजकी रातमें हमलोगोंको अपने मंगलके लिये शिविरसे बाहर ही रहना चाहिये”

这时,声名显赫的婆苏提婆(Vāsudeva)说道:“大王,为了我们的安稳与福祉,今夜我们应当留在营外。”

Verse 38

तथेत्युक्त्वा हि ते सर्वे पाण्डवा: सात्यकिस्तथा । वासुदेवेन सहिता मड़लार्थ बहिर्ययु:,तब “बहुत अच्छा” कहकर समस्त पाण्डव और सात्यकि श्रीकृष्णके साथ अपने मंगलके लिये छावनीसे बाहर चले गये

众般度五子与萨底耶迦同声说道:“就如此吧。”遂在婆苏提婆(奎师那)陪同下,为求吉祥而出营——于战争重压之中,希冀得一合乎法(达摩)的善果。

Verse 39

ते समासाद्य सरितं पुण्यामोघवतीं नृप । न्यवसन्नथ तां रात्रिं पाण्डवा हतशत्रव:,नरेश्वर! जिनके शत्रु मारे गये थे, उन पाण्डवोंने उस रातमें पुण्यमलिला ओघवती नदीके तटपर जाकर निवास किया

大王啊,众般度五子抵达圣河奥伽伐底(Oghavatī)之后——其仇敌已被诛灭——便在那河岸度过一夜。此偈显出血战之后的片刻停歇:胜者亦需寻一处清净吉祥之地安息,以复其心、重归礼法与德行(达摩)之中。

Verse 40

युधिष्ठिरस्ततो राजा प्राप्तकालमचिन्तयत्‌ । तत्र ते गमनं प्राप्त रोचते तव माधव

于是,尤提希提罗王思忖:决断之时已至。他对摩陀婆(奎师那)说道:“时机到了,你当往彼处去;我赞同你此行。”

Verse 41

गान्धार्या: क्रोधदीप्ताया: प्रशमार्थमरिंदम । तब राजा युधिष्ठिरने वहाँ समयोचित कार्यका विचार किया और कहा--'शत्रुदमन माधव! एक बार क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त करनेके लिये आपका हस्तिनापुरमें जाना उचित जान पड़ता है ।। हेतुकारणयुक्तैश्न वाक्यै: कालसमीरितै:

尤提希提罗说道:“摩陀婆啊,制敌者!为平息那因愤怒而炽燃的甘陀利王后,你前往象城(哈斯提那补罗)最为相宜。”当时,尤提希提罗王思量时势所需,以合乎因由、切合时宜之言而陈述。

Verse 42

क्षिप्रमेव महाभाग गान्धारीं प्रशमिष्यसि । पितामहश्न भगवान्‌ व्यासस्तत्र भविष्यति

尤提希提罗说道:“尊贵者啊,你必能很快抚慰并安慰甘陀利。且那位可敬的祖长、圣贤毗耶娑也将在那里。”

Verse 43

“महाभाग! आप युक्ति और कारणोंसहित समयोचित बातें कहकर गान्धारी देवीको शीघ्र ही शान्त कर सकेंगे। हमारे पितामह भगवान्‌ व्यास भी इस समय वहीं होंगे! ।। वैशम्पायन उवाच ततः सम्प्रेषयामासुर्यादवं नागसाह्नयम्‌ | स च प्रायाज्जवेनाशु वासुदेव: प्रतापवान्‌

毗湿摩波耶那说道:“噢,高贵之人!你若以合乎时宜之言,辅以周密的理据与明晰的因由,便能迅速安抚甘陀梨王后。此时此刻,我们的祖师、可敬的圣贤毗耶娑也将在那里。”于是众人遣派那位阎陀婆英雄、屠龙(那伽)者奎师那前往;而威武的婆苏提婆当即启程,疾速而行。

Verse 44

तमूचु: सम्प्रयास्यन्तं शैब्यसुग्रीववाहनम्‌

当他正欲启程之际——那乘驾由名马“舍毗耶”与“苏格利婆”牵引者——众人向他说道:此乃战事叙事中一瞬决断之时,劝谏与决心在行动的门槛上相会。

Verse 45

प्रत्याश्चासय गान्धारीं हतपुत्रां यशस्विनीम्‌ । शैब्य और सुग्रीव नामक अश्व जिनके वाहन हैं, उन भगवान्‌ श्रीकृष्णके जाते समय पाण्डवोंने फिर उनसे कहा--'प्रभो! यशस्विनी गान्धारी देवीके पुत्र मारे गये हैं; अतः आप उस दु:खिया माताको धीरज बँधावें' ।। स प्रायात्‌ पाण्डवैरुक्तस्तत्‌ पुरं सात्वतां वर: । आससाद ततः: क्षिप्रं गान्धारीं निहतात्मजाम्‌

当奎师那——以名马“舍毗耶”与“苏格利婆”为驾者——将要启程时,般度五子又对他说:“主啊!声名显赫的甘陀梨王后已失其子;愿你抚慰那悲苦的母亲,使其心志得以安定。”受般度五子所托,奎师那——萨特瓦塔族中之最胜者——遂往城中而去,迅速来到丧子之甘陀梨面前,好使那哀恸的母亲在战祸之后得以慰藉与坚忍。

Verse 61

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापरववमें श्रीकृष्ण पाण्डव और दुर्योधनका संवादविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

三阇耶说道:如是,在《圣摩诃婆罗多》中,于《沙利耶篇》之内——尤指论及棍棒决斗之“伽陀分章”——以圣奎师那、般度五子与难敌(杜尔约陀那)之对话为题的第六十一章至此告终。此结语为战事叙述之转折标记,强调谋议与道德立场与武事并行;而将临之暴烈,亦被置于对正法(dharma)与果报的审思框架之中。

Verse 62

पाण्डवोंके ऐसा कहनेपर सात्वतवंशके श्रेष्ठ पुरुष भगवान्‌ श्रीकृष्ण जिनके पुत्र मारे गये थे, उन गान्धारी देवीके पास हस्तिनापुरमें शीघ्र जा पहुँचे ।। इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि वासुदेवप्रेषणे द्विषष्टितमो5ध्याय: ।। ६२ || इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत यदापरववमें पाण्डवोंका भगवान्‌ श्रीकृष्णको हस्तिनापुर भेजनाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ

般度五子既如此言,薄伽梵圣奎师那——萨特瓦塔族中之最胜者,虽自身亦因丧子而悲恸——仍迅速抵达哈斯提那补罗,前去会见甘陀梨王后,那位诸子已被杀戮的母亲。于是,《摩诃婆罗多》之《沙利耶篇》“伽陀分章”中,关于遣派婆苏提婆一事的第六十二章至此终了。

Verse 266

मुक्तो वीरक्षयादस्मात्‌ संग्रामाललोमहर्षणात्‌ । “आपने जब ऐसा कहा, तब मैंने “तथास्तु/ कहकर वह आज्ञा स्वीकार कर ली थी। जनेश्वर! राजेन्द्र! आपका वह शूरवीर, सत्यपराक्रमी भाई सव्यसाची अर्जुन मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर विजयी हुआ है तथा वीरोंका विनाश करनेवाले इस रोमांचकारी संग्रामसे भाइयोंसहित जीवित बच गया है”

我已从这场令人毛发悚然、摧折英雄的战阵中脱身;先前我曾以“如是(tathāstu)”应诺,领受了你的命令。噫,人中之主,诸王之最!你那位英勇的兄弟——真勇无伪的萨维亚萨奇·阿周那——在我的护持之下,已得胜而出,并与诸弟兄一道,从这场惊心动魄、屠戮英雄的大战中生还。

Verse 276

हृष्टरोमा महाराज प्रत्युवाच जनार्दनम्‌ | महाराज! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरके शरीरमें रोमांच हो आया। वे उनसे इस प्रकार बोले

听闻这些对圣克里希那所说的话,护持法(dharma)的尤提希提罗王顿生敬畏之颤,毛发皆竖。其心为言辞中的法义重担所撼动,遂以如下之辞答复贾那尔达那。

Verse 286

कस्त्वदन्यः सहेत्‌ साक्षादपि वज्ी पुरंदर: । युधिष्ठिरने कहा--शत्रुमर्दन श्रीकृष्ण! द्रोणाचार्य और कर्णने जिस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सह सकता था। साक्षात्‌ वज्रधारी इन्द्र भी उसका आघात नहीं सह सकते थे

尤提希提罗说道:“噫,克里希那,摧敌者!除你之外,谁还能承受?即便是手执金刚杵的破城者——因陀罗——也无法抵挡那武器的正面一击。”

Verse 313

यतो धर्मस्तत: कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जय: । उपप्लव्य नगरमें महर्षि द्वैपायनने मुझसे कहा था कि “जहाँ धर्म है, वहाँ श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है”

尤提希提罗说道:“法(dharma)所在之处,即有克里希那;克里希那所在之处,即有胜利。在优帕普拉维亚城,大圣者岛生(德瓦伊帕亚那)曾对我说:‘有法之处有圣克里希那;有圣克里希那之处,必有凯旋。’”

Verse 323

प्रविश्य प्रत्यपद्यन्त कोशरत्नर्थिसंचयान्‌ | भारत! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर पाण्डव वीरोंने आपके शिबिरमें प्रवेश करके खजाना, रत्नोंकी ढेरी तथा भण्डारघरपर अधिकार कर लिया

尤提希提罗说道:“他们进入(敌营)之后,便夺取了所聚敛的财物——库藏与成堆的珠宝。”

Verse 433

दारुकं रथमारोप्य येन राजाम्बिकासुत: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर पाण्डवोंने यदुकुल॒तिलक भगवान्‌ श्रीकृष्णको हस्तिनापुर भेजा। प्रतापी वासुदेव दारुकको रथपर बिठाकर स्वयं भी बैठे और जहाँ अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र थे, वहाँ पहुँचनेके लिये बड़े वेगसे चले

毗舍波耶那说道:安置达鲁迦登上战车之后,婆苏提婆(圣克里希纳)亦亲自登车,疾驰而去,奔向安比迦之子——国王持国(Dhṛtarāṣṭra)所驻之处。叙事强调在更大责任面前的有目的、守纪律的行动:在政治与道德后果攸关之际,以迅捷的步伐与清明的意志行事。

Frequently Asked Questions

How to manage victory when it is shadowed by perceived rule-breach and collective grief: whether the victors should fear retaliatory moral power (tapas) and how to pursue reconciliation without denying responsibility.

De-escalation requires truthful causal analysis: acknowledge prior choices and the role of kāla, avoid misdirected blame, and use disciplined speech to prevent grief from becoming destructive policy.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as narrative meta-commentary by showing how dharmic stabilization (śama) and timely prevention of further harm are integral to the epic’s broader movement toward post-war moral repair.