Adhyaya 5
Shalya ParvaAdhyaya 558 Versesयुद्ध-पूर्व/रणनीतिक चरण: सन्धि की संभावना क्षीण; कौरव पक्ष का संकल्प कठोर होकर युद्ध की ओर निर्णायक रूप से मुड़ता है।

Adhyaya 5

शल्यस्य सेनापत्याभ्युपगमः | Śalya’s Acceptance of Command

Upa-parva: Śalya-senāpatyābhiṣeka (Appointment of Śalya as Commander)

Sañjaya reports that Kaurava-aligned warriors regroup on the Haimavata plateau after Karṇa’s death, seeking refuge and organizational coherence. Key figures—Śalya, Citraseṇa, Śakuni, Aśvatthāmā, Kṛpa, and Kṛtavarmā—are enumerated among those assembled. The narrative then shifts to a portrait-like encomium of Aśvatthāmā, emphasizing martial competence, learning (veda-vidyā and śāstra), and exceptional origin traditions, establishing his authority as a recommender in matters of command. Aśvatthāmā proposes Śalya as camūpati on grounds of lineage, valor, radiance, reputation, and gratitude/loyalty; the gathered rulers affirm with victory acclamations and resolve for continued engagement. Duryodhana approaches Śalya with formal humility and persuasive rhetoric about friendship-testing in adversity, requesting him to lead the vanguard. Śalya consents, declaring readiness to prioritize Duryodhana’s aims, and Duryodhana urges an anointment-like assumption of command, framing victory as contingent upon Śalya’s leadership.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को सुनाते हैं—तपस्वी गौतम-वंशी कृपाचार्य की हितकारी वाणी सुनकर भी दुर्योधन भीतर-ही-भीतर उबल उठता है; वह सन्धि की बात को अपने अपमान और दुर्बलता का संकेत मानता है। → दुर्योधन कुछ घड़ियाँ मौन होकर सोचता है, फिर कृप से कहता है कि आपने जो भी हितैषी वचन कहने योग्य था, सब कह दिया—पर वह अपने मन की गाँठ खोलता है: द्रौपदी का सभामध्य का विलाप, राज्य-हरण, और कृष्ण-पक्ष के प्रति अपनी असह्य कटुता को वह क्षमा नहीं कर सकता। वह ‘क्षत्रिय-धर्म’ का आवरण ओढ़कर घर में मरने को निन्दित बताता है और युद्ध को ही प्रतिष्ठा का मार्ग ठहराता है। → दुर्योधन निर्णायक स्वर में कह देता है—“सन्धि मुझे किसी प्रकार भी प्राप्तकाल नहीं लगती; यह कायर होने का समय नहीं, संयोद्धा होने का समय है।” वह अपने विनाशकारी संकल्प को भी ‘स्वर्ग-प्राप्ति’ की भाषा में सजाता है: उत्तम युद्ध से त्रिविष्टप में वास निश्चित है। → कृप की नीति-परक, स्नेह-परक सलाह को औपचारिक सम्मान देकर भी दुर्योधन उसे अस्वीकार कर देता है; उसका निष्कर्ष स्थिर है—युद्ध ही नीति, युद्ध ही धर्म, युद्ध ही गति। → सन्धि का द्वार बंद होते ही अगला प्रश्न तीखा हो उठता है—कौरव पक्ष किस रणनीति और किस सेनानायक-व्यवस्था के साथ निर्णायक संघर्ष में उतरेगा?

Shlokas

Verse 1

पञठ्चमो<ध्याय: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना संजय उवाच एवमुक्तस्ततो राजा गौतमेन तपस्विना । नि:श्वस्य दीर्घमुष्णं च तृष्णीमासीदू विशाम्पते,संजय कहते हैं--प्रजानाथ! तपस्वी कृपाचार्यके ऐसा कहनेपर दुर्योधन जोर-जोरसे गरम साँस खींचता हुआ कुछ देरतक चुपचाप बैठा रहा

三阇耶说道:当那位苦行者乔达摩(Gautama)如此劝谏之后,人中之主的国王长长地、灼热地叹了一口气,沉默良久。此刻显出内心的骚动:克制之言已入耳,然而傲慢与战争的牵引,使决断仍悬在紧绷的沉默之中。

Verse 2

ततो मुहूर्त स ध्यात्वा धार्तराष्ट्री महामना: । कृपं शारद्वतं वाक्यमित्युवाच परंतप:,दो घड़ीतक सोच-विचार करनेके पश्चात्‌ शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके उस महामनस्वी पुत्रने शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यको इस प्रकार उत्तर दिया--

三阇耶说道:随后,那位心怀宏大的持国之子——令敌人受苦者——沉思片刻,便对舍罗陀跋之子克利波(Kṛpa)开口,以如下言辞作答。那短暂的停顿,显出危局中的权衡:劝诫与责任沉沉压在心头,直至战议之席上终于吐露言语。

Verse 3

यत्‌ किंचित्‌ सुद्गदा वाच्यं तत्‌ सर्व श्रावितों हाहम्‌ । कृतं च भवता सर्व प्राणान्‌ संत्यज्य युध्यता,“विप्रवर! एक हितैषी सुहृदको जो कुछ कहना चाहिये, वह सब आपने कह सुनाया। इतना ही नहीं, आपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हुए मेरी भलाईके लिये सब कुछ किया है

“婆罗门中的至者啊!凡是一个怀善意的挚友应当说的话,你都已尽数让我听见。不仅如此,你还为我的利益做尽一切,舍却对性命的贪恋,仍在战场上奋战。”

Verse 4

इस प्रकार श्रीमद्याभारत शल्यपर्वमें कृपाचार्यका वचनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ,गाहमानमनीकानि युध्यमानं महारथै: । पाण्डवैरतितेजोभिलोंकस्त्वामनुदृष्टवान्‌ “सब लोगोंने आपको शत्रुओंकी सेनाओंमें घुसते और अत्यन्त तेजस्वी महारथी पाण्डवोंके साथ युद्ध करते हुए बारंबार देखा है

三阇耶说道:“众人屡次亲眼见到你冲入敌军阵列之中,并在那里与光辉炽盛的般度族大车战士交锋。”此句强调:战场勇武并非自夸之辞,而是众目可证;在遵循达摩的战争里,名誉与道德声望,正由危难之中可见的行持所铸成。

Verse 5

सुहृदा यदिदं वाक्‍्यं भवता श्रावितो हाहम्‌ । न मां प्रीणाति तत्‌ सर्व मुमूर्षोरिव भेषजम्‌,“आप मेरे हितचिन्तक सुहृद्‌ हैं तो भी आपने मुझे जो बात सुनायी है, वह सब मेरे मनको उसी तरह पसंद नहीं आती, जैसे मरणासन्न रोगीको दवा अच्छी नहीं लगती है इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि दुर्योधनवाक्ये पठचमो<ध्याय:

三阇耶说道:“纵然你是怀我之善的友人,你让我听到的这一切言辞,却丝毫不能取悦我——正如将死之人,亦不觉药石可口。”

Verse 6

हेतुकारणसंयुक्त हितं वचनमुत्तमम्‌ । उच्यमानं महाबाहो न मे विप्राग्रय रोचते,“महाबाहो! विप्रवर! आपने युक्ति और कारणोंसे सुसंगत, हितकारक एवं उत्तम बात कही है तो भी वह मुझे अच्छी नहीं लग रही है

三阇耶说道:“噢,臂力无双者!噢,婆罗门中的最上者!你所说的劝告虽合乎理法,根植于因由,既有利益又极其卓越,却仍不能使我欢喜。”

Verse 7

राज्याद्‌ विनिकृतो<स्माभि: कथं सो<स्मासु विश्वसेत्‌ । अक्षयूते च नृपतिर्जितोडस्माभिमहाधन:

三阇耶说道:“正是我们亲手夺去了他的王国——他又怎能信任我们?而在掷骰之局中,那位富甲一方的国王也被我们所胜。”

Verse 8

स कथं मम वाक्यानि श्रद्दधध्याद्‌ भूय एव तु । “हमलोगोंने राजा युधिष्ठिरकके साथ छल किया है। वे महाधनी थे, हमने उन्हें जूएमें जीतकर निर्धन बना दिया। ऐसी दशामें वे हमलोगोंपर विश्वास कैसे कर सकते हैं? हमारी बातोंपर उन्हें फिर श्रद्धा कैसे हो सकती है? ।। तथा दौत्येन सम्प्राप्त: कृष्ण: पार्थहिते रत:,“ब्रह्मन्‌! पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले श्रीकृष्ण मेरे यहाँ दूत बनकर आये थे, किंतु मैंने उन हृषीकेशके साथ धोखा किया। मेरा वह कर्म अविचारपूर्ण था। भला, अब वे मेरी बात कैसे मानेंगे?

三阇耶说道:“他怎能再一次信我的话?我们欺骗了坚战王(尤提士提罗);他本富可敌国,我们却在掷骰之局中胜了他,使他沦为贫困。处在这般境地,他怎能信任我们?又怎能重新对我们的话生起信心?再者,克里希纳——常为普丽塔之子谋福祉者——曾以使者之身来到我庭;而我却对那位赫利希凯沙行了诡诈。那是我轻率无思之举。如今,他又怎会接受我的言语?”

Verse 9

प्रलब्धश्न हृषीकेशस्तच्च कर्माविचारितम्‌ । सच मे वचन ब्रह्मनू कथमेवाभिमन्यते,“ब्रह्मन्‌! पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले श्रीकृष्ण मेरे यहाँ दूत बनकर आये थे, किंतु मैंने उन हृषीकेशके साथ धोखा किया। मेरा वह कर्म अविचारपूर्ण था। भला, अब वे मेरी बात कैसे मानेंगे?

“我曾欺诳赫利希凯沙,那一举动实属轻率无思。婆罗门啊,他又怎会认可我的话?”

Verse 10

विललाप च यत्‌ कृष्णा सभामध्ये समेयुषी । न तन्मर्षयते कृष्णो न राज्यहरणं तथा,“सभामें बलात्‌ लायी हुई द्रौपदीने जो विलाप किया था तथा पाण्डवोंका जो राज्य छीन लिया गया था, वह बर्ताव श्रीकृष्ण सहन नहीं कर सकते

三阇耶说道:“德罗帕蒂(黑天女,Kṛṣṇā)被强行带入王廷大会之中时所发出的哀号,以及般度诸子王国被夺之事——这些冤屈,圣克里希纳绝不能容忍。”

Verse 11

एकप्राणावुभौ कृष्णावन्योन्यमभिसंश्रितौ । पुरा यच्छुतमेवासीदद्य पश्यामि तत्‌ प्रभो

三阇耶说道:“两位黑天(克里希那)仿佛共用一息生命之气,彼此依凭,紧密相扶而立。主上啊,我从前只曾听闻之事,如今亲眼得见。”

Verse 12

'प्रभो! श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों दो शरीर और एक प्राण हैं। वे दोनों एक-दूसरेके अश्रित हैं। पहले जो बात मैंने केवल सुन रखी थी, उसे अब प्रत्यक्ष देख रहा हूँ ।। स्वस्रीयं निहतं श्रुत्वा दुः:खं स्वपिति केशव: । कृतागसो वयं तस्य स मदर्थ कथं क्षमेत्‌

三阇耶说道:“主上啊!圣者黑天与阿周那如同两具身躯共一口气息,彼此依靠。往昔我只闻其名,如今亲眼得见。听闻其姊之子已被杀,凯沙瓦悲恸而卧。我们已成了得罪他的人——此事因我而起,他又怎能宽恕?”

Verse 13

“अपने भानजे अभिमन्युके मारे जानेका समाचार सुनकर श्रीकृष्ण सुखकी नींद नहीं सोते हैं। हम सब लोग उनके अपराधी हैं, फिर वे हमें कैसे क्षमा कर सकते हैं? ।। अभिमन्योर्विनाशेन न शर्म लभतेडर्जुन: । स कथं मद्िते यत्नं प्रकरिष्यति याचित:,“अभिमन्युके मारे जानेसे अर्जुनको भी चैन नहीं है, फिर वे प्रार्थना करनेपर भी मेरे हितके लिये कैसे यत्न करेंगे?

三阇耶说道:“听闻外甥阿毗曼纽被杀,圣者黑天再不能安睡。我们众人都成了得罪他的人;他又怎能饶恕我们?阿毗曼纽既亡,阿周那亦不得安宁。如此,即便我恳求,他又怎能为我的利益竭力,当他的心正被悲痛吞噬?”

Verse 14

मध्यम: पाण्डवस्तीक्ष्णो भीमसेनो महाबल: । प्रतिज्ञातं च तेनोग्रं भज्येतापि न संनमेत्‌,“मझले पाण्डव महाबली भीमसेनका स्वभाव बड़ा ही कठोर है। उन्होंने बड़ी भयंकर प्रतिज्ञा की है। सूखे काठकी तरह वे टूट भले ही जाय, झुक नहीं सकते

三阇耶说道:“般度五子中居中的毗摩军,性烈而力大无穷。他立下可怖的誓言:纵使如枯木般折断,也绝不屈身。”

Verse 15

उभौ तौ बद्धनिस्त्रिंशावुभी चाबद्धकड्कटौ । कृतवैरावुभौ वीरौ यमावपि यमोपमौ,“दोनों भाई नकुल और सहदेव तलवार बाँधे और कवच धारण किये हुए यमराजके समान भयंकर जान पड़ते हैं। वे दोनों वीर मुझसे वैर मानते हैं

三阇耶说道:“那两位兄弟——那俱罗与娑诃提婆——佩剑在身,甲胄紧束,威容可怖,宛如阎摩亲临。两位勇士既已结下深仇,便如一对阎摩立于战阵之中,一心求报。”

Verse 16

धृष्टद्युम्न: शिखण्डी च कृतवैरा मया सह । तौ कथं मद्िते यत्नं कुर्यातां द्विजसत्तम,द्विजश्रेष्ठ! धृष्टद्यम्म और शिखण्डीने भी मेरे साथ वैर बाँध रखा है, फिर वे दोनों मेरे हितके लिये कैसे यत्न कर सकते हैं?

三阇耶说道:“德利什塔丢姆那与尸佉ṇḍin也与我立誓结怨。如此一来,那二人又怎会为我的福祉而竭力呢?噢,最上等的婆罗门!”

Verse 17

दुःशासनेन यत्‌ कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला | परिक्लिष्टा सभामध्ये सर्वलोकस्य पश्यत:

三阇耶说道:那桩暴行——杜沙萨那使黑公主(德罗帕蒂)仅着一衣,且正值经期,却在王廷大会中央当众受辱受折磨,众目睽睽之下无人制止——乃是对达摩的严重公开践踏,暴露了朝廷道德的崩塌,以及沉默旁观者的共犯之罪。

Verse 18

न निवारयितु शक्‍्या: संग्रामात्ते परंतपा:,“इसलिये अब उन शत्रुसंतापी वीरोंको युद्धसे रोका नहीं जा सकता। जबसे द्रौपदीको क्लेश दिया गया, तबसे वह दुःखी हो मेरे विनाशका संकल्प लेकर प्रतिदिन मिट्टीकी वेदीपर सोया करती है। जबतक वैरका पूरा बदला न चुका लिया जाय, तबतकके लिये उसने यह व्रत ले रखा है

三阇耶说道:“噢,焚灼仇敌者!如今已无法再把那些英雄从战场上拦住。自从德罗帕蒂遭受羞辱与折磨,她便沉于悲苦,日日卧于土坛之上,心志坚定,誓求我等覆灭。她立下此誓,直至仇怨尽数偿还。”

Verse 19

यदा च द्रौपदी क्लिष्टा मद्विनाशाय दुःखिता । स्थण्डिले नित्यदा शेते यावद्‌ वैरस्य यातनम्‌,“इसलिये अब उन शत्रुसंतापी वीरोंको युद्धसे रोका नहीं जा सकता। जबसे द्रौपदीको क्लेश दिया गया, तबसे वह दुःखी हो मेरे विनाशका संकल्प लेकर प्रतिदिन मिट्टीकी वेदीपर सोया करती है। जबतक वैरका पूरा बदला न चुका लिया जाय, तबतकके लिये उसने यह व्रत ले रखा है

三阇耶说道:“自从德罗帕蒂受辱受苦,她便长居哀恸,决意要我覆灭。日复一日,她卧于裸地之上,忍受誓愿的艰苦,直到仇怨的折磨被尽数偿还。”

Verse 20

उग्र॑ तेपे तप: कृष्णा भर्तृणामर्थसिद्धये । निक्षिप्य मान॑ दर्प च वासुदेवसहोदरा

三阇耶说道:黑公主(德罗帕蒂),瓦苏提婆之妹,为成就诸夫之志,修行严酷苦行。她抛却骄矜与傲慢,以自律克己之行,求得他们的成功。

Verse 21

कृष्णाया: प्रेष्यवद्‌ भूत्वा शुश्रूषां कुरुते सदा । इति सर्व समुन्नद्धं न निरवाति कथठ्चन

三阇耶说道:“他如同侍从一般侍奉黑公主克里希娜(德劳帕蒂),恒常以周到之心为她效劳。故而,纵使万事俱备、诸事已然发动,他也从不在任何时候懈怠或退转。”

Verse 22

'ट्रौपदी अपने पतियोंके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये बड़ी कठोर तपस्या करती है और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी सगी बहन सुभद्रा मान और अभिमानको दूर फेंककर सदा दासीकी भाँति द्रौपदीकी सेवा करती है। इस प्रकार इन सारे कार्योंके रूपमें वैरकी आग प्रज्वलित हो उठी है, जो किसी प्रकार बुझ नहीं सकती ।। अभिमन्योर्विनाशेन स संधेय: कथं मया | कथं च राजा भुकक्‍त्वेमां पृथिवीं सागराम्बराम्‌

三阇耶说道:“德劳帕蒂为成就诸夫所愿,行极其严酷的苦行;而苏跋陀罗——瓦苏提婆之子圣克里希纳的同胞妹——抛却尊荣与傲慢,常如婢女般侍奉德劳帕蒂。由此,仇怨之火借这些作为而炽然燃起,任凭何法也无法熄灭。阿毗曼纽既已被杀,我又怎能促成和解?而国王在享用并占有这被大海环抱、以海为衣的土地之后,又怎能再得满足?”

Verse 23

उपर्युपरि राज्ञां वै ज्वलित्वा भास्करो यथा

三阇耶说道:“他凌驾诸王之上,愈升愈高,炽然辉耀——如同太阳。”

Verse 24

युधिष्ठिरं कथं पश्चादनुयास्यामि दासवत्‌ । “समस्त राजाओंके ऊपर सूर्यके समान प्रकाशित होकर अब दासकी भाँति युधिष्ठिरके पीछे-पीछे कैसे चलूँगा? ।। कथं भुक्‍्त्वा स्वयं भोगान्‌ दत्त्वा दायांश्व॒ पुष्कलान्‌

三阇耶说道:“我怎能像仆役一般跟在坚战(Yudhiṣṭhira)身后?我曾在诸王之上如日照耀——如今怎能又如奴隶般尾随坚战而行?而那曾亲享诸乐、又曾厚赐他人丰盛份额之人,又怎能承受这般颠倒?”

Verse 25

नाभ्यसूयामि ते वाक्यमुक्तं स्निग्धं हितं त्वया

三阇耶说道:“我并不责难你的言辞——你以深情所说,所求皆为真正的利益。”

Verse 26

सुनीतमनुपश्यामि सुयुद्धेन परंतप

桑阇耶说道:“我看这条道路已深思熟虑——并且应当以一场高贵的战斗来践行,噬敌如火者啊。”

Verse 27

इष्टं मे बहुभिर्यज्ञैर्दत्ता विप्रेषु दक्षिणा:

桑阇耶说道:“我已依仪轨举行了许多祭祀,并将应当奉上的祭礼酬金(dakṣiṇā)施与婆罗门。”

Verse 28

प्राप्ता: कामा: श्रुता वेदा: शत्रूणां मूर्थ्नि च स्थितम्‌ भृत्या मे सुभृतास्तात दीनश्वाभ्युदूधृतो जन:

桑阇耶说道:“一切所愿皆已成就;吠陀已按法研习;我也曾踏立在仇敌的头顶之上。我的侍从得以善养,尊者啊,百姓亦从困苦与匮乏中被扶起。”

Verse 29

नोत्सहेड्द्य द्विजश्रेष्ठ पाण्डवान्‌ वक्तुमीदृशम्‌ “तात! मैंने बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया। ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणाएँ दे दीं। सारी कामनाएँ पूर्ण कर लीं। वेदोंका श्रवण कर लिया। शत्रुओंके माथेपर पैर रखा और भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंके पालन-पोषणकी अच्छी व्यवस्था कर दी। इतना ही नहीं, मैंने दीनोंका उद्धारकार्य भी सम्पन्न कर दिया है। अतः द्विजश्रेष्ठ। अब मैं पाण्डवोंसे इस प्रकार सन्धिके लिये याचना नहीं कर सकता ।। २७-२८ ई || जितानि परराष्ट्राणि स्वराष्ट्रमनुपालितम्‌,“मैंने दूसरोंके राज्य जीते, अपने राष्ट्रका निरन्तर पालन किया, नाना प्रकारके भोग भोगे; धर्म, अर्थ और कामका सेवन किया और पितरों तथा क्षत्रियधर्म--दोनोंके ऋणसे उऋण हो गया

桑阇耶说道:“婆罗门中最尊者啊,我无法让自己以这种话去对般度诸子开口:‘亲爱的,我已举行过许多祭祀;已向婆罗门施与丰厚的祭礼酬金(dakṣiṇā);诸愿皆已满足;吠陀亦已聆习;我曾以足踏在仇敌的头顶;并且已妥善安置、供养一切依附于我的人。更有甚者,我也完成了救济困厄者的事业。因此,婆罗门中最尊者啊,如今我不能以这般方式前往般度诸子那里乞求和议。我征服过他国,长久守护本邦,享受种种乐事,奉行法(dharma)、利与欲,并已偿清对祖先与刹帝利之道两方面的债。’”

Verse 30

भुक्ताश्न विविधा भोगास्त्रिवर्ग: सेवितो मया । पितृणां गतमानृण्यं क्षत्रधर्मस्य चोभयो:,“मैंने दूसरोंके राज्य जीते, अपने राष्ट्रका निरन्तर पालन किया, नाना प्रकारके भोग भोगे; धर्म, अर्थ और कामका सेवन किया और पितरों तथा क्षत्रियधर्म--दोनोंके ऋणसे उऋण हो गया

“我享受过种种乐事;我奉行三业(trivarga)——法(dharma)、利(artha)与欲(kāma)。我已偿清对祖先之债,也偿清对刹帝利之道之债——两者皆然。”

Verse 31

न ध्रुवं सुखमस्तीति कुतो राष्ट्र कुतो यश: । इह कीर्तिविधातव्या सा च युद्धेन नान्यथा,'संसारमें कोई भी सुख सदा रहनेवाला नहीं है। फिर राष्ट्र और यश भी कैसे स्थिर रह सकते हैं? यहाँ तो कीर्तिका ही उपार्जन करना चाहिये और कीर्ति युद्धके सिवा किसी दूसरे उपायसे नहीं मिल सकती

世间之乐并非恒常;既然如此,国土与名声又怎能长久稳固?在此世当求取的唯有“吉尔蒂”(kīrti,声名功业),而此声名除战阵之外,别无他途可得。

Verse 32

गृहे यत्‌ क्षत्रियस्यापि निधन तद्‌ विगर्हितम्‌ । अधर्म: सुमहानेष यच्छय्यामरणं गृहे,'क्षत्रियकी भी यदि घरमें मृत्यु हो जाय तो उसे निन्दित माना गया है। घरमें खाटपर सोकर मरना यह क्षत्रियके लिये महान्‌ पाप है

三阇耶说道:即便对刹帝利而言,死在家中也被视为可耻。若在自家屋内——卧于床榻而终——对武士来说乃是极大的违背法(dharma);因为他被规定的道路,是在职责之地的战场上直面危险与死亡,而非在庇护的安逸中消亡。

Verse 33

अरण्ये यो विमुच्येत संग्रामे वा तनुं नर: । क्रतूनाहत्य महतो महिमानं स गच्छति,'जो बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके वनमें या संग्राममें शरीरका त्याग करता है, वही क्षत्रिय महत्त्वको प्राप्त होता है

三阇耶说道:凡人在荒林或战场上舍弃此身——仿佛已完成盛大的祭祀(yajña)——便能抵达崇高的荣光与伟业。

Verse 34

कृपणं विलपन्नार्तो जरयाभिपरिप्लुत: । ग्रियते रुदतां मध्ये ज्ञातीनां न स पूरुष:,“जिसका शरीर बुढ़ापेसे जर्जर हो गया हो, जो रोगसे पीड़ित हो, परिवारके लोग जिसके आस-पास बैठकर रो रहे हों और उन रोते हुए स्वजनोंके बीचमें जो करुण विलाप करते-करते अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह पुरुष कहलानेयोग्य नहीं है

三阇耶说道:那被老迈摧残、为病痛所迫,卑怯哀号;在亲族围坐哭泣之中,自己也无助地啼泣着断气的人——此人不配称为“男子”。

Verse 35

त्यक्त्वा तु विविधान्‌ भोगान्‌ प्राप्तानां परमां गतिम्‌ । अपीदानीं सुयुद्धेन गच्छेयं यत्सलोकताम्‌,“अतः जिन्होंने नाना प्रकारके भोगोंका परित्याग करके उत्तम गति प्राप्त कर ली है, इस समय युद्धके द्वारा मैं उन्हींके लोकोंमें जाऊँगा

三阇耶说道:“舍弃种种享乐之后,那些人已达至最高境界。如今,愿我凭一场高贵的战斗,得以往生于他们的世界。”

Verse 36

शूराणामरर्यवृत्तानां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम्‌ । धीमतां सत्यसंधानां सर्वेषां क्रतुयाजिनाम्‌

三阇耶说道:“他们皆为品行高贵的英雄,临阵不退——智者也,坚守真实与誓言,人人皆为奉行神圣祭仪之人。”

Verse 37

मुदा नून॑ प्रपश्यन्ति युद्धे ह्ाप्सरसां गणा:

三阇耶说道:“无疑,众天女(阿普萨拉)正欢然注视着这场战斗。”

Verse 38

पश्यन्ति नूनं पितर: पूजितान्‌ सुरसंसदि । अप्सरोभि: परिवृतान्‌ मोदमानांस्त्रिविष्टपे

三阇耶说道:“无疑,祖灵如今正看见他们——在天众之会中受尊崇——为阿普萨拉环绕,在三十天(Triviṣṭapa,天界)欢喜庆悦。”

Verse 39

“निश्चय ही युद्धमें प्राण देनेवालोंकी ओर अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नतासे निहारा करती हैं। पितृगण उन्हें अवश्य ही देवताओं-की सभामें सम्मानित होते देखते हैं। वे स्वर्गमें अप्सराओंसे घिरकर आनन्दित होते देखे जाते हैं ।। पन्थानममरैर्यान्तं शूरैश्वैवानिवर्तिभि: । अपि तत्संगतं मार्ग वयमध्यारुहेमहि,“देवता तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीर जिस मार्गसे जाते हैं, क्या उसी मार्गपर अब हमलोग भी वृद्ध पितामह, बुद्धिमान्‌ आचार्य द्रोण, जयद्रथ, कर्ण तथा दुःशासनके साथ आरूढ़ होंगे?

三阇耶说道:“无疑,天女们以极大的欢悦凝望那些在战场上舍命之人。祖灵必定看见他们在天众之会中受尊崇。在天界,他们被见到为阿普萨拉环绕而欢喜。沿着诸不死者所行之路——亦即那些临阵不退的坚毅英雄所行之路——我们如今也要踏上同一条道路吗,与年迈的祖父、睿智的师长德罗纳、阇耶陀罗他、迦尔那以及杜赫沙萨那一道?”

Verse 40

पितामहेन वृद्धेन तथा55चार्येण धीमता । जयद्रथेन कर्णेन तथा दुःशासनेन च,“देवता तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीर जिस मार्गसे जाते हैं, क्या उसी मार्गपर अब हमलोग भी वृद्ध पितामह, बुद्धिमान्‌ आचार्य द्रोण, जयद्रथ, कर्ण तथा दुःशासनके साथ आरूढ़ होंगे?

三阇耶说道:“与年迈的祖父毗湿摩、睿智的师长德罗纳、阇耶陀罗他、迦尔那以及杜赫沙萨那同在——我们如今也要踏上那条道路吗?那正是诸神的英雄、临阵不退者离去之路。”

Verse 41

घटमाना मदर्थेडस्मिन्‌ हता: शूरा जनाधिपा: । शेरते लोहिताक्ताड़्ा: संग्रामे शरविक्षता:,“कितने ही वीर नरेश मेरी विजयके लिये यथाशक्ति चेष्टा करते हुए बाणोंसे क्षत-विक्षत हो मारे जाकर रक्तरंजित शरीरसे संग्रामभूमिमें सो रहे हैं

三阇耶说道:“在这场战斗中,为了我而竭尽全力奋战的许多英勇国王已被杀戮。他们的身躯被箭矢撕裂、血染通红,如今横陈在战场之上。”

Verse 42

उत्तमास्त्रविद: शूरा यथोक्तक्रतुयाजिन: । त्यक्त्वा प्राणान्‌ यथान्यायमिन्द्रसझस्वधिष्िता:,“उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता और शास्त्रोक्त विधिसे यज्ञ करनेवाले अन्य शूरवीर यथोचित रीतिसे युद्धमें प्राणोंका परित्याग करके इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित हो रहे हैं

“另有诸多勇士,精通上乘兵器,又依吠陀仪轨行祭祀;他们在战阵中依正法舍身,今已安住于因陀罗天界。”

Verse 43

तैः स्वयं रचितो मार्गों दुर्गमो हि पुनर्भवेत्‌ सम्पतद्धिमहावेगैर्यास्यद्धिरिह सद्गतिम्‌,“उन वीरोंने स्वयं ही जिस मार्गका निर्माण किया है, वह पुनः बड़े वेगसे सदगतिको जानेवाले बहुसंख्यक वीरोंद्वारा दुर्गण हो जाय (अर्थात्‌ इतने अधिक वीर उस मार्गसे यात्रा करें कि भीड़के मारे उसपर चलना कठिन हो जाय)

“那些英雄亲手开辟的道路,或将再度变得难以通行——拥挤而艰涩——因为无数战士以惊人的疾势奔赴其上,循此而往‘善趣’,即以英勇之死赢得的崇高归宿。”

Verse 44

ये मदर्थे हता: शूरास्तेषां कृतमनुस्मरन्‌ । ऋणं तत्‌ प्रतियुञ्जानो न राज्ये मम आदथधे,“जो शूरवीर मेरे लिये मारे गये हैं, उनके उस उपकारका निरन्तर स्मरण करता हुआ उस ऋणको उतारनेकी चेष्टामें संलग्न होकर मैं राज्यमें मन नहीं लगा सकता

三阇耶说道:“我一再追念那些为我而死的英雄所施之恩,并竭力欲偿还此债,因此我无法将心安置于治国之事。”

Verse 45

घातयित्वा वयस्यांश्न भ्रातूनथ पितामहान्‌ । जीवितं यदि रक्षेयं लोको मां गर्हयेद्‌ ध्रुवम्‌,“मित्रों, भाइयों और पितामहोंको मरवाकर यदि मैं अपने प्राणोंकी रक्षा करूँ तो सारा संसार निश्चय ही मेरी निनदा करेगा

三阇耶说道:“若我令友人、兄弟与祖辈战死,而自己却苟全性命,则天下必定会谴责我。”

Verse 46

कीदृशं च भवेद्‌ राज्यं मम हीनस्य बन्धुभि: । सखिभिश्न विशेषेण प्रणिपत्य च पाण्डवम्‌,“बन्धु-बान्धवों और मित्रोंसे हीन हो युधिष्ठिरके पैरोंमें पड़नेपर मुझे जो राज्य मिलेगा, वह कैसा होगा?

三阇耶说道:“若我失却亲族与同伴,尤其还得俯首叩拜、伏倒在般度之子脚下方能得国,那样的王权,于我又算什么?”

Verse 47

सो5हमेतादृशं कृत्वा जगतो5स्य परा भवम्‌ । सुयुद्धेन ततः स्वर्ग प्राप्स्यामि न तदन्‍्यथा,“इसलिये मैं जगत्‌का ऐसा विनाश करके अब उत्तम युद्धके द्वारा ही स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा। मेरी सद्गतिके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है!

三阇耶说道:“既已使此世陷入这般毁灭,如今我唯有凭一场高贵而决绝的战斗才能得登天界——除此之外,再无通向我终极善果之路。”

Verse 48

एवं दुर्योधनेनोक्तं सर्वे सम्पूज्य तद्बच: । साधु साध्विति राजान क्षत्रिया: सम्बभाषिरे,इस प्रकार राजा दुर्योधनकी कही हुई यह बात सुनकर सब क्षत्रियोंने “बहुत अच्छा, बहुत अच्छा” कहकर उसका आदर किया और उसे भी धन्यवाद दिया

三阇耶说道:“杜尤陀那如此言毕,众会集的武士皆敬重其言;诸刹帝利面向国王齐声答道:‘善哉,善哉!’以示赞同,并致以应有的礼敬。”

Verse 49

पराजयमशोचन्त: कृतचित्ताश्न विक्रमे | सर्वे सुनिश्चिता योद्धुमुदग्रमनसो5भवन्‌,सबने अपनी पराजयका शोक छोड़कर मन-ही-मन पराक्रम करनेका निश्चय किया। युद्ध करनेके विषयमें सबका पक्‍का विचार हो गया और सबके हृदयमें उत्साह भर गया

三阇耶说道:“他们抛却败北之悲,定心再起勇武;众人皆决意再战,胸中热血腾涌。”

Verse 50

ततो वाहान्‌ समाश्रचस्य सर्वे युद्धाभिनन्दिन: । ऊने द्वियोजने गत्वा प्रत्यतिष्ठन्त कौरवा:,तत्पश्चात्‌ सब योद्धाओंने अपने-अपने वाहनोंको विश्राम दे युद्धका अभिनन्दन किया और आठ कोससे कुछ कम दूरीपर जाकर डेरा डाला

三阇耶说道:“随后,诸位嗜战的武士让坐骑与战车稍作歇息;又前行不足二由旬之地,俱卢军便在彼处停驻扎营。”

Verse 51

आकाशे विद्रुमे पुण्ये प्रस्थे हिमवत: शुभे | अरुणां सरस्वती प्राप्य पपु: सस्नुश्चन ते जलम्‌,आकाशके नीचे हिमालयके शिखरकी सुन्दर, पवित्र एवं वृक्षरहित चौरस भूमिपर अरुणसलिला सरस्वतीके निकट जाकर उन सबने स्नान और जलपान किया

三阇耶说道:在喜马伐特那秀丽高处,有一处吉祥而神圣、无树的高原,名为“阿迦舍-毗陀卢摩”。他们抵达了水色微赤、奔流如绛的萨拉斯瓦蒂河;就在那儿,他们饮其水、浴其流——在战争阴影下的艰辛行程中,求得清凉与仪式的净洁。

Verse 52

तव पुत्रकृतोत्साहा: पर्यवर्तन्त ते ततः । पर्यवस्थाप्य चात्मानमन्योन्येन पुनस्तदा । सर्वे राजन्‌ न्यवर्तन्त क्षत्रिया: कालचोदिता:,राजन! वे कालप्रेरित समस्त क्षत्रिय आपके पुत्रद्वारा उत्साह देनेपर एक-दूसरेके द्वारा मनको स्थिर करके पुन: रणभूमिकी ओर लौटे

三阇耶说道:其后,那些战士——因陛下之子鼓舞而振作——便转身回返。彼此相劝相励,再度安定其心;诸位刹帝利啊,哦大王,皆为“迦罗”(时间/命运)所驱,复又回到战场。

Verse 176

तथा विवसनां दीनां स्मरन्त्यद्यापि पाण्डवा: | 'ट्रौपदी एक वस्त्र पहने हुए थी, रजस्वला थी। उस अवस्थामें जो वह भरी सभामें लायी गयी और दुःशासनने सब लोगोंके सामने जो उसे महान्‌ क्लेश पहुँचाया, उसका जो वस्त्र उतारा गया और उसे जो दयनीय दशाको पहुँचा दिया गया, उन सब बातोंको पाण्डव आज भी याद रखते हैं

三阇耶说道:直到今日,般度五子仍记得德罗帕蒂在王族大会中被拖入殿堂、被凌辱至凄惨境地、几近赤身的那一幕——那在朝会中施加的暴行,成为他们对正义与荣誉感的长久创伤,也成了不断点燃其决意的道德缘由。

Verse 223

पाण्डवानां प्रसादेन भोक्ष्ये राज्यमहं कथम्‌ | “अभिमन्युके विनाशसे जिनके हृदयमें गहरी चोट पहुँची है, उस अर्जुनके साथ मेरी सन्धि कैसे हो सकती है? जब मैं समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका एकच्छत्र राजाकी हैसियतसे उपभोग कर चुका हूँ, तब इस समय पाण्डवोंकी कृपाका पात्र बनकर कैसे राज्य भोगूँगा?

三阇耶说道:“我怎能凭般度族的恩惠来享受王国?”此言道出武士的傲骨与道义上的抗拒:宁不愿靠敌人的施舍而活——尤其在曾以独尊之姿享有四海环绕之大地之后;因此,和解于他更像屈辱,而非和平。

Verse 243

कृपणं वर्तयिष्यामि कृपणै: सह जीविकाम्‌ । “स्वयं बहुत-से भोग भोगकर और प्रचुर धन दान करके अब दीन पुरुषोंके साथ दीनतापूर्ण जीविकाका आश्रय ले किस प्रकार निर्वाह कर सकूँगा?

三阇耶说道:“我怎能与困苦之人同困苦,以卑微凄惨的生计度日?我自己曾久享诸般乐事,又曾以丰厚财物广行布施。如今却要与贫者同贫,寄身于穷乏之生——我又怎能支撑下去?”

Verse 253

न तु सन्धिमहं मन्ये प्राप्तकालं कथडठ्चन । “आपने स्नेहवश हितकी ही बात कही है। आपकी इस बातमें मैं दोष नहीं निकालता और न इसकी निन्दा ही करता हूँ। मेरा कथन तो इतना ही है कि अब किसी प्रकार सन्धिका अवसर नहीं रह गया है। मेरी ऐसी ही मान्यता है

三阇耶说道:“然而我不认为此刻还能缔结盟约——无论用何种方式——因为决断之时已然到来。你出于情爱说了有益之言;我不在你的话中挑剔过失,也不加以责难。我只说这一点:和解的机会已经过去了。”

Verse 266

नायं क्लीबयितुं काल: संयोद्धु काल एव नः । 'शत्रुओंको तपानेवाले वीर! अब मैं अच्छी तरह युद्ध करनेमें ही उत्तम नीतिका पालन समझ रहा हूँ। हमारा यह समय कायरता दिखानेका नहीं, उत्साहपूर्वक युद्ध करनेका ही है

三阇耶说道:“此刻不是示弱怯懦之时;这正是我们出战之时。在这样的关头,最高的方略便是以坚定的决心投入战斗,而非在敌前动摇。”

Verse 363

शस्त्रावभूथपूतानां ध्रुवं वासस्त्रिविष्टपे “जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते, अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाते और यज्ञोंद्वारा यजन करनेवाले हैं तथा जिन्होंने शस्त्रकी धारामें अवभूथस्नान किया है, उन समस्त बुद्धिमान्‌ पुरुषोंका निश्चय ही स्वर्गमें निवास होता है

三阇耶说道:那些以兵刃之“阿婆婆利他”(avabhṛtha,终浴之礼)而得净化的智者——品行高洁,临阵从不退却,使誓愿成真,并以祭祀奉敬诸神——必定得居天界。

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns legitimate authority under duress: whether command should follow sheer necessity and remaining power, or be grounded in merit, counsel, and publicly affirmed responsibility toward the coalition.

The chapter models leadership as a socially constructed duty: counsel (from a credible agent), collective endorsement, and the leader’s declared willingness to bear risk for allies together constitute the ethical basis of command.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-function is structural—marking a command succession and re-legitimation of authority as the narrative advances toward the war’s terminal phase.