शल्यस्य सेनापत्याभ्युपगमः | Śalya’s Acceptance of Command
पाण्डवानां प्रसादेन भोक्ष्ये राज्यमहं कथम् | “अभिमन्युके विनाशसे जिनके हृदयमें गहरी चोट पहुँची है, उस अर्जुनके साथ मेरी सन्धि कैसे हो सकती है? जब मैं समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका एकच्छत्र राजाकी हैसियतसे उपभोग कर चुका हूँ, तब इस समय पाण्डवोंकी कृपाका पात्र बनकर कैसे राज्य भोगूँगा?
pāṇḍavānāṃ prasādena bhokṣye rājyam ahaṃ katham |
三阇耶说道:“我怎能凭般度族的恩惠来享受王国?”此言道出武士的傲骨与道义上的抗拒:宁不愿靠敌人的施舍而活——尤其在曾以独尊之姿享有四海环绕之大地之后;因此,和解于他更像屈辱,而非和平。
संजय उवाच