Adhyaya 44
Shalya ParvaAdhyaya 4456 Verses

Adhyaya 44

कार्त्तिकेयाभिषेकः — Consecration of Kārttikeya and the Enumeration of His Retinue

Upa-parva: Kārttikeya-Abhiṣeka (Skanda’s Consecration Episode)

Vaiśaṃpāyana describes the preparation of consecration requisites according to śāstra and Bṛhaspati’s offering of ghee into the kindled fire. Skanda/Kārttikeya is seated upon a divine throne adorned with gems, while the abhiṣecanīya substances are brought forth with auspicious implements and mantra-led procedure. A vast convocation is then catalogued: major devas (Indra, Viṣṇu, Sūrya, Candra, and others), classes of celestial beings (Rudras, Vasus, Ādityas, Aśvins, Viśvedevas, Maruts, Sādhyas, Pitṛs), and numerous ṛṣi lineages and cosmic personifications (rivers, Vedas, oceans, tīrthas, directions, mountains, time-divisions). The chapter culminates in the collective abhiṣeka of the Kumāra as senāpati, followed by systematic bestowals of attendants (pārṣadas/anucaras) from multiple divine donors (e.g., Yama, Sūrya, Soma, Hutāśana, Indra, Viṣṇu, Aśvins, Dhātā, Tvaṣṭṛ, Mitra, Varuṇa, Vāyu, Himavat, Meru, Vindhya, Samudra, Pārvatī, Vāsuki). Extensive onomastic lists describe these beings’ names, forms, weapons, and diverse physiognomies, stressing the scale of Skanda’s consecrated command and the ritual-public confirmation of his martial function.

Chapter Arc: जनमेजय, सरस्वती के प्रभाव का श्रवण कर, द्विजसत्तम से पूछते हैं—किस देश-काल में, किन देवताओं ने, किस विधि से कुमार कार्तिकेय (स्कन्द) का अभिषेक किया और उन्होंने दैत्यों का संहार कैसे किया। → अग्नि-पुत्र तेजोमय गर्भ रूप से प्रकट होकर लोकों को आच्छादित-सा करता है; कृत्तिकाएँ उस ज्वलनाकार तेज को देखती हैं। देवगण पहले से ही महात्माओं के निकायों में आज्ञाएँ देकर अभिषेक की तैयारी करते हैं; ब्रह्मा के नेतृत्व में देवता कुमार को लेकर हिमालय की ओर, पुण्यसलिला सरस्वती के तट पर, समवेत होने लगते हैं। नारद, बृहस्पति आदि देवर्षि-सिद्ध और विविध लोकों के श्रेष्ठ जन भी वहाँ एकत्र होते हैं—समारोह का वैभव बढ़ता है, पर साथ ही यह प्रश्न तीव्र होता है कि यह बालक-सा कुमार देवसेना का नेतृत्व कैसे संभालेगा। → कुमार, बालक होते हुए भी महान् योगबल से सम्पन्न, त्रिशूल-पिनाकधारी देवेश्वर शिव की ओर बढ़ते हैं; उपस्थित देवताओं के विविध अभिप्रायों को लक्ष्य कर वे युगपत् योग का आश्रय लेकर अनेक तनुओं का सृजन करते हैं—एक ही सत्ता का बहुरूप, जिससे सबकी अपेक्षाएँ एक साथ पूर्ण होने लगती हैं। → देवसमुदाय का संदेह शान्त होता है—कुमार की दिव्यता, सामर्थ्य और नेतृत्व-योग्यता प्रत्यक्ष हो जाती है; अभिषेक-यात्रा और अनुष्ठान की व्यवस्था दृढ़ आधार पाती है, सरस्वती-तट का पवित्र मंच देवकार्य के लिए सिद्ध हो जाता है। → अभिषेक की विधि और उसके पश्चात् स्कन्द द्वारा दैत्यों के महान् संहार का विस्तृत वर्णन अगले प्रसंग की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्रात बा अं: 2 चतुश्नत्वारिशो< ध्याय: कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी जनमेजय उवाच सरस्वत्या: प्रभावो<यमुक्तस्ते द्विजसत्तम । कुमारस्याभिषेकं तु ब्रह्मन्‌ व्याख्यातुमहसि,जनमेजयने कहा--द्विजश्रेष्ठ! आपने सरस्वतीका यह प्रभाव बताया है। ब्रह्म! अब कुमार कार्तिकेयके अभिषेकका वर्णन कीजिये

阇那美阇耶说:“噢,诸婆罗门中最尊者!你已向我讲述了萨拉斯瓦蒂的奇妙威德与荣光。如今,婆罗门啊,请为我阐明童子神库玛罗(迦尔蒂凯耶)的灌顶加冕(abhiṣeka)——此礼如何筹备,又如何施行。”

Verse 2

यस्मिन्‌ देशे च काले च यथा च वदतां वर । यैश्ञाभिषिक्तो भगवान्‌ विधिना येन च प्रभु:,वक्ताओंमें श्रेष्ठ किस देश और कालमें किन लोगोंने किस विधिसे किस प्रकार शक्तिशाली भगवान्‌ स्कन्दका अभिषेक किया?

阇那弥阇耶说道:“噢,善言之最者!在何地、何时——又以何种方式——威力无边的主神斯坎达受了灌顶加冕?是哪些人以何等规定的仪轨为主神行涂膏灌顶之礼?”

Verse 3

स्कन्दो यथा च दैत्यानामकरोत्‌ कदनं महत्‌ | तथा मे सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे,स्कन्दने जिस प्रकार दैत्योंका महान्‌ संहार किया हो, वह सब उसी तरह मुझे बताइये; क्योंकि मेरे मनमें इसे सुननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है

阇那弥阇耶说道:“斯坎达如何对代底耶众施行大屠戮,你就照那般将一切详尽告知于我;因为我心中充满强烈的好奇,渴望聆听。”

Verse 4

वैशम्पायन उवाच कुरुवंशस्य सदृशं कौतूहलमिदं तव । हर्षमुत्पादयत्येव वचो मे जनमेजय,वैशम्पायनजी बोले--जनमेजय! तुम्हारा यह कौतूहल कुरुवंशके योग्य ही है। तुम्हारा वचन मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष उत्पन्न कर रहा है

毗舍波耶那说道:“噢,阇那弥阇耶,你这份求知之心确实配得上俱卢一族。你的言语实在令我心中生起极大的欢喜。”

Verse 5

हन्त ते कथयिष्यामि शृण्वानस्य नराधिप । अभिषेकं कुमारस्य प्रभावं च महात्मन:,नरेश्वर! तुम ध्यान देकर सुन रहे हो, इसलिये मैं तुमसे प्रसन्नतापूर्वक महात्मा कुमार कार्तिकेयके अभिषेक और प्रभावका वर्णन करता हूँ

毗舍波耶那说道:“善哉——既然你专心聆听,噢,大王——我将怀着善意,为你叙述神圣少主库玛罗(迦尔蒂凯耶)的灌顶(涂膏加冕)之礼,以及那位大心者非凡的威力与光辉。”

Verse 6

तेजो माहेश्वरं स्कन्नमग्नौ प्रपतितं पुरा । तत्‌ सर्वभक्षो भगवान्‌ नाशकद्‌ दग्धुमक्षयम्‌,पूर्वकालकी बात है, भगवान्‌ शिवका तेजोमय वीर्य अग्निमें गिर पड़ा। भगवान्‌ अग्नि सर्वभक्षी हैं तो भी उस अक्षय वीर्यको वे भस्म न कर सके

毗舍波耶那说道:“久远以前,那由湿婆而生的炽盛神力逸出,坠入阿耆尼之中。纵然吉祥的阿耆尼素以‘吞噬万物者’著称,却也无法将那不灭之能焚尽。”

Verse 7

तेनासीदतितेजस्वी दीप्तिमान्‌ हव्यवाहन: । न चैव धारयामास गर्भ तेजोमयं तदा

因此,火神——哈维亚瓦哈那(Havyavāhana)——变得极其炽盛辉耀,光焰腾腾。然而在那时,他也无法在自身之内承受那完全由火之能量凝成的胎藏。

Verse 8

स गड्भजामभिसंगम्य नियोगाद्‌ ब्रह्मण: प्रभु: । गर्भमाहितवान्‌ दिव्यं भास्करोपमतेजसम्‌

毗舍波耶那说:奉梵天之命,那位大能之主走近伽德婆阇(Gaḍbhajā),在她体内安置了一个神圣的胎藏,其光辉如日。

Verse 9

उस वीर्यके कारण अग्निदेव दीप्तिमान, तेजस्वी तथा शक्तिसम्पन्न होकर भी कष्टका अनुभव करने लगे। वे उस समय उस तेजोमय गर्भकों जब धारण न कर सके, तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन भगवान्‌ अग्निदेवने सूर्यके समान तेजस्वी उस दिव्य गर्भको गंगाजीमें डाल दिया ।। अथ गड्जपि तं गर्भभमसहन्ती विधारणे । उत्ससर्ज गिरौ रम्ये हिमवत्यमरार्चिते,तदनन्तर गंगाने भी उस गर्भको धारण करनेमें असमर्थ होकर उसे देवपूजित सुरम्य हिमालय पर्वतके शिखरपर सरकण्डोंमें छोड़ दिया

毗舍波耶那说:由于那精力之因,纵然火神阿耆尼——炽燃辉耀、威力具足——也感到痛楚。那时他无法在体内留住那光焰之胎,便奉梵天之命,将如日般灿然的神圣胎藏投入恒河(Gaṅgā)。继而恒河亦不能承载,便把它遗置在诸神所敬奉的秀丽雪山希摩伐特(Himavat)之巅,放在芦苇丛中。

Verse 10

स तत्र ववृधे लोकानावृत्य ज्वलनात्मज: । ददृशुर्ज्वलनाकाररं तं गर्भमथ कृत्तिका:

在那里,火之子渐渐成长,其光辉扩散,仿佛遮覆诸界。随后,克利提迦众女(Kṛttikās)看见那胎藏,呈现火之形相,炽然燃烧。

Verse 11

शरस्तम्बे महात्मानमनलात्मजमी श्वरम्‌ । ममायमिति ता: सर्वा: पुत्रार्थिन्योडभिचुक्करुशु:

她们看见那位大魂之主——阿耆尼之子——卧于莎罗草丛之间;那些渴望得子的女子们齐声呼喊:“他是我的!”

Verse 12

अग्निका वह पुत्र अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके वहाँ बढ़ने लगा। सरकण्डोंके समूहमें अग्निके समान प्रकाशित होते हुए उस सर्वसमर्थ महात्मा अग्निपुत्रको, जो नवजात शिशुके रूपमें उपस्थित था, छहों कृत्तिकाओंने देखा। उसे देखते ही पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली वे सभी कृतिकाएँ पुकार-पुकारकर कहने लगीं “यह मेरा पुत्र है' ।। तासां विदित्वा भावं॑ तं मातृणां भगवान्‌ प्रभु: । प्रस्नुतानां पय: षड्भिरवदनैरपिबत्‌ तदा,उन माताओंके उस वात्सल्यभावको जानकर प्रभावशाली भगवान्‌ स्कन्द छ: मुख प्रकट करके उनके स्तनोंसे झरते हुए दूधको पीने लगे

毗耶娑之弟子外舍波耶那叙述道:火神阿耆尼之子以自身光焰炽盛,遍照诸界,于彼处渐渐成长。他在芦苇丛中灿然如火;那位全能的大魂阿耆尼之子——以新生婴儿之形显现——被六位克利提迦女神看见。她们一见此子,皆因渴望得子而反复呼喊:“他是我的儿子!”主神斯甘达洞悉诸母深情,遂显现六面,饮取从她们乳房流出的乳汁。

Verse 13

त॑ प्रभावं समालक्ष्य तस्य बालस्य कृत्तिका: । परं विस्मयमापचन्ना देव्यो दिव्यवपुर्धरा:,वे दिव्य रूपधारिणी छहों कृत्तिका देवियाँ उस बालकका वह प्रभाव देखकर अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठीं

外舍波耶那说道:见到那孩童非凡的威力,六位具天姿神采的克利提迦女神,皆为至极惊异所震慑。

Verse 14

यत्रोत्सृष्टः स भगवान्‌ गड़या गिरिमूर्थनि । स शैल: काउ्चन: सर्व: सम्बभौ कुरुसत्तम,कुरुश्रेष्ठ गंगाजीने पर्वतके जिस शिखरपर स्कन्दको छोड़ा था, वह सारा-का-सारा सुवर्णमय हो गया

外舍波耶那说道:“噢,俱卢族中最卓越者啊!那位吉祥之主连同其钺杵被安置于其上的山巅,竟尽皆化为黄金。”

Verse 15

वर्धता चैव गर्भेण पृथिवी तेन रज्जिता । अतकश्न सर्वे संवृत्ता गिरय: काज्चनाकरा:,उस बढ़ते हुए शिशुने वहाँकी भूमिको रंजित (प्रकाशित) कर दिया था। इसलिये वहाँके सभी पर्वत सोनेकी खान बन गये

外舍波耶那说道:当那孩童在胎中渐长之时,此地大地被灿然光辉所浸润。故而该区域群山皆如金矿一般,呈现瑞异之象。

Verse 16

कुमार: सुमहावीर्य: कार्तिकेय इति स्मृतः । गाड़ेय: पूर्वम भवन्महायोगबलान्वित:,वह महान्‌ शक्तिशाली कुमार कार्तिकेयके नामसे विख्यात हुआ। वह महान्‌ योगबलसे सम्पन्न बालक पहले गंगाजीका पुत्र था

外舍波耶那说道:“那位少年英勇无比,世人铭记其名为‘迦尔蒂凯耶’。他具足大瑜伽行持之力,昔日亦称‘恒伽耶’——恒河女神伽ṅ伽之子。”

Verse 17

शमेन तपसा चैव वीर्येण च समन्वित: । ववृधे$तीव राजेन्द्र चन्द्रवत्‌ प्रियदर्शन:,राजेन्द्र! शम, तपस्या और पराक्रमसे युक्त वह कुमार अत्यन्त वेगसे बढ़ने लगा। वह देखनेमें चन्द्रमाके समान प्रिय लगता था

毗湿摩波耶那说道:那位王子具足自制(śama)、苦行之律(tapas)与勇力,陛下,他迅速成长,兴盛非常。其容貌可亲,如月之皎洁;其品性与风仪令人心生爱敬与信赖。

Verse 18

स तस्मिन्‌ काउ्चने दिव्ये शरस्तम्बे श्रिया वृत: । स्तूयमान: सदा शेते गन्धर्वैर्मुनिभिस्तथा

在那里,他长卧于那光耀如金的神圣箭床之上,周身为荣光所环;常有乾闼婆与诸牟尼不断颂赞。此景将战士之终化为道德图景:对所择之法(dharma)坚守不移;即便在战争的废墟中,仍以敬礼回报一生的戒律与真实。

Verse 19

उस दिव्य सुवर्णमय प्रदेशमें सरकण्डोंके समूहपर स्थित हुआ वह कान्तिमान्‌ बालक निरन्तर गन्धर्वों एवं मुनियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ सो रहा था ।। तथैतमन्वनृत्यन्त देवकन्या: सहस्रश: । दिव्यवादित्रनृत्यज्ञा: स्तुवन्त्यश्षारुदर्शना:,तदनन्तर दिव्य वाद्य और नृत्यकी कला जाननेवाली सहस्रों सुन्दरी देवकन्याएँ उस कुमारकी स्तुति करती हुई उसके समीप नृत्य करने लगीं

在那金光灿然的神圣境地里,那光辉的幼王子安卧于成丛的芦苇(sarakaṇḍa)之上,恒常听闻乾闼婆与诸牟尼口中对他的赞颂。继而,成千上万的天女——精通天界乐器与舞艺——在他身旁起舞,赞美这位俊美的王子。

Verse 20

अन्वास्ते च नदी देवं गड़ा वै सरितां वरा । दधार पृथिवी चैन बिभ्रती रूपमुत्तमम्‌,सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा भी उस दिव्य बालकके पास आ बैठीं। पृथ्वीदेवीने उत्तम रूप धारण करके उसे अपने अंकमें धारण किया

毗湿摩波耶那说道:河神恒河(Gaṅgā)——诸流之最——前来坐在那神圣幼子身旁。随后,大地女神化现最胜妙的形相,将他抱起,安置于膝上。此景昭示:纵在战争叙事的严酷之中,宇宙之力亦会聚集,护持并养育那由天意所定之事。

Verse 21

जातकर्मादिकास्तत्र क्रियाश्षक्रे बृहस्पति: । वेदश्वैनं चतुर्मूर्तिरुपतस्थे कृताउ्जलि:,बृहस्पतिजीने वहाँ उस बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये और चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होनेवाला वेद हाथ जोड़कर उसकी सेवामें उपस्थित हुआ

毗湿摩波耶那说道:在那里,布里哈斯帕提(Bṛhaspati)为那孩子举行了从生礼(jātakarma)起的诸般常仪。又有《吠陀》本身——以四种形态显现——合掌恭立于前,侍奉致敬,昭示圣学与正行当以谦卑与奉事而亲近。

Verse 22

धनुर्वेदश्नतुष्पाद: शस्त्रग्राम: ससंग्रह: | तत्रैनं समुपातिष्ठत्‌ साक्षाद्‌ वाणी च केवला,चारों चरणोंसे युक्त थनुर्वेद, संग्रहसहित शस्त्र-समूह तथा केवल साक्षात्‌ वाणी--ये सभी कुमारकी सेवामें उपस्थित हुए

毗湿摩波耶那说:在那里,四分的《弓术吠陀》(Dhanurveda,射艺之学)、连同其系统汇编在内的全套兵器之库,乃至“言语”本身——清净而显现的圣言——都侍立于王子之前,仿佛前来奉事于他。

Verse 23

स ददर्श महावीर्य देवदेवमुमापतिम्‌ । शैलपुत्र्या समासीनं भूतसंघशतैर्वृतम्‌,कुमारने देखा कि सैकड़ों भूतसंघोंसे घिरे हुए महापराक्रमी देवाधिदेव उमापति गिरिराजनन्दिनी उमाके साथ पास ही बैठे हुए हैं

毗湿摩波耶那说:他看见威力无边的“诸神之主”——乌摩之夫乌摩钵底(湿婆)——紧挨着山岳所生的女神乌摩而坐,周围簇拥着数百群众生之众。

Verse 24

निकाया भूतसंघानां परमाद्भुतदर्शना: । विकृता विकृताकारा विकृताभरणध्वजा:,उनके साथ आये हुए भूतसंघोंके शरीर देखनेमें बड़े ही अद्भुत, विकृत और विकराल थे। उनके आभूषण और ध्वज भी बड़े विकट थे

毗湿摩波耶那说:那聚集的诸鬼众,景象奇诡至极——形体扭曲怪异,狰狞可怖;就连他们的饰物与旗幡,也都阴森骇人、诡谲非常。

Verse 25

व्याप्रसिंहर्क्षदना विडालमकरानना: । वृषदंशमुखाश्नान्ये गजोष्ट्रवदनास्तथा,उनमेंसे किन्हींके मुँह बाघ और सिंहके समान थे तो किन्हींके रीछ, बिल्‍ली और मगरके समान। कितनोंके मुख वनबिलावोंके तुल्य थे। कितने ही हाथी, ऊँट और उल्लूके समान मुखवाले थे। बहुत-से गीधों और गीदड़ोंके समान दिखायी देते थे। किन्हीं-किन्हींके मुख क्रौंच पक्षी, कबूतर और रंकु मृगके समान थे

毗湿摩波耶那说:其中有的獠牙如虎、如狮、如熊;有的面貌似猫,似鳄。又有的口如野猫;还有的脸如象、如驼。如此这可怖的群鬼,以种种骇人的兽形显现。

Verse 26

उलूकवदना: केचिद्‌ गृध्रगोमायुदर्शना: । क्रौज्चपारावतनिभैर्वदनै राड़कवैरपि,उनमेंसे किन्हींके मुँह बाघ और सिंहके समान थे तो किन्हींके रीछ, बिल्‍ली और मगरके समान। कितनोंके मुख वनबिलावोंके तुल्य थे। कितने ही हाथी, ऊँट और उल्लूके समान मुखवाले थे। बहुत-से गीधों और गीदड़ोंके समान दिखायी देते थे। किन्हीं-किन्हींके मुख क्रौंच पक्षी, कबूतर और रंकु मृगके समान थे

毗湿摩波耶那说:“有的面如鸮鸟;有的形似秃鹫与豺狼。又有的面貌仿佛鹤类的krauñca之鸟与鸽子;甚至还有的像rāḍaka——一种鹿。”

Verse 27

श्वाविच्छधल्यकगोधानामजैडकगवां तथा । सदृशानि वपुंष्यन्ते तत्र तत्र व्यधारयन्‌

毗湿摩波耶那说道:在那战场上,他们在此处彼处摆放着一些躯体,刻意做得像豪猪、豺、巨蜥、山羊、公羊与牛一般——此乃令人不安的诡计,昭示战争之中,人们以欺诈与操弄表象来迷惑、误导对手。

Verse 28

बहुतेरे भूत जहाँ-तहाँ हिंसक जन्तु, साही, गोह, बकरी, भेड़ और गायोंके समान शरीर धारण करते थे ।। केचिच्छैलाम्बुदप्रख्याश्लक्रोद्यतगदायुधा: । केचिदञ्जनपुज्जा भा: केचिच्छवेताचलप्रभा:

毗湿摩波耶那说道:在那些众生之中,有的形貌如幽暗群山与雨云,举起狼牙棒为兵;有的宛若一堆堆墨黑的眼药粉;有的则辉耀如白色山巅。此景昭示:战争汇聚诸般力量、诸般形相——可怖而压倒一切,其暴烈之行亦负沉重的道德之重。

Verse 29

कितने ही मेघों और पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। उन्होंने अपने हाथोंमें चक्र और गदा आदि आयुध ले रखे थे। कोई अंजनपुंजके समान काले और कोई श्वेत गिरिके समान गौर कान्तिसे सुशोभित होते थे ।। सप्त मातृगणाश्वैव समाजममुर्विशाम्पते । साध्या विश्वेष्थ मरुतो वसव: पितरस्तथा

毗湿摩波耶那说道:噫,人中之主!彼处亦聚集了七母神众,又有萨陀耶、毗湿维提婆、摩鲁特众、婆苏众,以及诸祖灵(Pitṛ)。于是天界诸军齐集,仿佛前来见证并认可这场战争的沉重进程——在此,诸王的命运,乃至法(Dharma)的秩序本身,都濒临危殆。

Verse 30

रुद्रादित्यास्तथा सिद्धा भुजगा दानवा: खगा: । ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान्‌ सपुत्र: सह विष्णुना

毗湿摩波耶那说道:彼处亦有鲁陀罗众与阿底提耶众,诸悉达,诸蛇族,达那婆,以及天鸟。自生之主梵天亦在场——并携其诸子——又有毗湿奴同临。

Verse 31

शक्रस्तथाभ्ययाद्‌ द्रष्ट कुमारवरमच्युतम्‌ । प्रजानाथ! वहाँ सात मातृकाएँ- आ गयी थीं। साध्य, विश्व, मरुदगण, वसुगण, पितर, रुद्र, आदित्य, सिद्ध, भुजंग, दानव, पक्षी, पुत्रसहित स्वयम्भू भगवान्‌ ब्रह्मा, श्रीविष्णु तथा इन्द्र अपने नियमोंसे च्युत न होनेवाले उस श्रेष्ठ कुमारको देखनेके लिये पधारे थे | २९-३० ५ | नारदप्रमुखाश्नापि देवगन्धर्वसत्तमा:,तेडपि तत्र समाजम्मुर्यामा धामाश्च सर्वश: । देवताओं और गन्धवॉमें श्रेष्ठ नारद आदि देवर्षि, बृहस्पति आदि सिद्ध, सम्पूर्ण जगत्‌्से श्रेष्ठ तथा देवताओंके भी देवता पितृगण, सम्पूर्ण यामगण और धामगण भी वहाँ आये थे

毗湿摩波耶那说道:因陀罗亦至彼处,为观那最上之少年——阿周陀。噫,众生之主!七母神已然到来;萨陀耶、毗湿维提婆、摩鲁特诸军、婆苏、祖灵(Pitṛ)、鲁陀罗、阿底提耶、悉达、蛇族、达那婆与诸鸟亦皆云集。自生之主梵天携其诸子,与圣毗湿奴并因陀罗——无一偏离其所受命之职——皆来瞻仰那卓绝的少年。那罗陀等天仙圣者,诸神与乾闼婆中之最胜者;布里哈斯帕提等诸悉达;为诸神亦所敬奉之祖灵;以及一切阎摩众与达摩众,也都从四方汇聚于此。

Verse 32

देवर्षयश्न सिद्धाश्न बृहस्पतिपुरोगमा: । पितरो जगत: श्रेष्ठा देवानामपि देवता:

毗湿摩波耶那说道:“那里有天界圣仙与成就者,由布里哈斯帕提为首;又有诸祖灵(Pitṛ),为诸世界之最尊者,连众天神也奉之为神而敬礼。”

Verse 33

स तु बालो5पि बलवान्‌ महायोगबलान्वित:

毗湿摩波耶那说道:他虽仍是孩童,却力大无比——具足由大瑜伽苦修所生的非凡威力。

Verse 34

तमाव्रजन्तमालक्ष्य शिवस्यासीन्मनोगतम्‌

见他走近,湿婆心中生起一念——对即将展开之事所形成的内在决断。

Verse 35

युगपच्छेलपुत्र्याश्च गज़ाया: पावकस्य च । क॑ नु पूर्वमयं बालो गौरवादशभ्युपैष्यति

毗湿摩波耶那说道:“此童子同时与山之女(恒河)及帕瓦迦(阿耆尼,火神)相系;出于敬重,他将先趋向谁呢?”

Verse 36

अपि मामिति सर्वेषां तेषामासीन्मनोगतम्‌ । उन्हें आते देख एक ही समय भगवान्‌ शंकर, गिरिराजनन्दिनी उमा, गंगा और अग्निदेवके मनमें यह संकल्प उठा कि देखें यह बालक पिता-माताका गौरव प्रदान करनेके लिये पहले किसके पास जाता है? क्या यह मेरे पास आयेगा? यह प्रश्न उन सबके मनमें उठा ।। तेषामेतमभिप्रायं चतुर्णामुपलक्ष्य सः

众人心中同时生起同一念头:“他会来向我致敬吗?”他察觉四者共有的心意,便明白了那未宣之问——这孩子将先趋向谁,以彰显父母之荣,并显露自身的虔敬与明辨。

Verse 37

ततो5भवच्चतुर्मूर्ति: क्षणेन भगवान्‌ प्रभु:

于是顷刻之间,主宰之神——至高的统御者——显现为四重身相,彰示超越凡常感知的神力,提醒听者:在战乱的喧嚣中,终极的主导并不系于人间谋略,而在更高的意志之中。

Verse 38

तस्य शाखो विशाखश्न नैगमेयश्व पृष्ठतः । तदनन्तर प्रभावशाली भगवान्‌ स्कन्द क्षणभरमें चार रूपोंमें प्रकट हो गये। पीछे जो उनकी मूर्तियाँ प्रकट हुईं, उनका नाम क्रमश: शाख, विशाख और नैगमेय हुआ ।। एवं स कृत्वा हात्मानं चतुर्धा भगवान्‌ प्रभु:

毗湿摩波耶那说:在他身后显现出娑迦(Śākha)、毗娑迦(Viśākha)与尼伽梅耶(Naigameya)。紧接着,威德无比的斯甘达(Skanda)于一刹那间化现四身。其后所现诸相,依次名为娑迦、毗娑迦与尼伽梅耶。于是,这位福德的主宰将自身分作四种显现。

Verse 39

यतो रुद्रस्ततः स्कन्दो जगामाद्भुतदर्शन: । विशाखस्तु ययौ येन देवी गिरिवरात्मजा

毗湿摩波耶那说:鲁陀罗(Rudra)所往之处,容相奇绝的斯甘达(Skanda)亦随之而行。毗娑迦(Viśākha)则循着那位山岳所生的女神所走的同一路径而去。

Verse 40

इस प्रकार अपने-आपको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके अद्भुत दिखायी देनेवाले प्रभावशाली भगवान्‌ स्कन्द जहाँ रुद्र थे, उधर ही गये। विशाख उस ओर चल दिये, जिस ओर गिरिराजनन्दिनी उमा देवी बैठी थीं ।। शाखो ययौ स भगवान्‌ वायुमूर्तिविं भावसुम्‌ । नैगमेयो5गमद्‌ गड़ां कुमार: पावकप्रभ:,वायुमूर्ति भगवान्‌ शाख अग्निके पास और अग्नितुल्य तेजस्वी नैगमेय गंगाजीके निकट गये

毗湿摩波耶那说:斯甘达(Skanda)以各别身相显现,奇伟而威猛,遂令随从各赴其所。娑迦(Śākha)化作风身,趋向毗婆婆苏(Vibhāvasu,即阿耆尼 Agni)。尼伽梅耶(Naigameya)这位火光般的少年,则前往恒河(Gaṅgā)。

Verse 41

सर्वे भासुरदेहास्ते चत्वार: समरूपिण: । तान्‌ समभ्ययुरव्यग्रास्तदद्भुतमिवाभवत्‌,उन चारोंके रूप एक समान थे। उन सबके शरीर तेजसे उद्धासित हो रहे थे। वे चारों कुमार उन चारोंके पास एक साथ जा पहुँचे। वह एक अद्भुत-सा कार्य हुआ

毗湿摩波耶那说:他们四者皆身光赫奕,形相无二。那四位少年心神不乱,同时趋近其前;仿佛一桩奇事在眼前发生。

Verse 42

हाहाकारो महानासीदू देवदानवरक्षसाम्‌ । तद्‌ दृष्टवा महदाश्चर्यमद्भुतं लोमहर्षणम्‌,वह महान्‌ आश्चर्यमय, अद्भुत तथा रोमांचकारी घटना देखकर देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंमें महान्‌ हाहाकार मच गया

毗湿摩波耶那说:诸天、达那婆与罗刹见到那惊人、奇异、令人毛骨悚然的变故时,众中顿起一片巨大的哗然与呼号。此景昭示:战争的暴烈与反复,足以撼动即便强大神类,也显露出当下那令人战栗的道德重负。

Verse 43

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑में बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ततो रुद्रश्न देवी च पावकश्न पितामहम्‌ । गड़या सहिता: सर्वे प्रणिपेतुर्जगत्पतिम्‌ तदनन्तर भगवान्‌ रुद्र, देवी पार्वती, अग्निदेव तथा गंगाजी--इन सबने एक साथ लोकनाथ ब्रह्माजीको प्रणाम किया

随后,鲁陀罗(湿婆)、女神(帕尔瓦蒂)、帕瓦迦(火神阿耆尼)与毗多摩诃(梵天)——并与恒河同在——一齐向世间之主恭敬顶礼。此景彰显宇宙的道德秩序:即便至高的神力,也以谦卑与虔敬承认那至上的宇宙权威。

Verse 44

प्रणिपत्य ततस्ते तु विधिवद्‌ राजपुड्रव । इदमूचुर्वचो राजन्‌ कार्तिकेयप्रियेप्सया,वहाँ वे सभी देवता और गन्धर्व पूर्ण मनोरथ हो सरस्वतीके सर्वगुणसम्पन्न पावन तटपर विराजमान हुए ।। इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने कुमाराभिषेकोपक्रमे चतुश्चत्वारिंशो ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत यदापववरमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगरें कुमारके अभिषेककी तैयारीविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

毗湿摩波耶那说:随后,那些会集者依仪轨顶礼之后,怀着取悦迦尔蒂凯耶之心,对国王说道如是之言。其时,诸天与乾闼婆众愿已遂,便在清净而具足诸德的萨拉斯瓦蒂河岸安坐;而童子库玛罗的灌顶加冕之备亦由此开启——彰显敬礼、法度与信奉之力,使神众同趋一体的神圣旨归。

Verse 45

राजन! नृपश्रेष्ठ! विधिपूर्वक प्रणाम करके वे सब कार्तिकेयका प्रिय करनेकी इच्छासे यह वचन बोले-- ।। अस्य बालस्य भगवन्नाधिपत्यं यथेप्सितम्‌ । अस्मत्प्रियार्थ देवेश सदृशं दातुमहसि,'देवेश्वरर भगवन्‌! आप हमलोगोंका प्रिय करनेके लिये इस बालकको यथायोग्य मनकी इच्छाके अनुरूप कोई आधिपत्य प्रदान कीजिये”

毗湿摩波耶那说:“大王,诸侯之最!他们依礼致敬之后,皆为取悦迦尔蒂凯耶而说道:‘吉祥的主宰啊,请赐此童子以其所愿之主权。诸神之主啊,为了我们——为使我们欢喜——愿你垂恩,授予这男孩与其相称、合乎其心愿的权柄。’”

Verse 46

ततः स भगवान्‌ धीमान्‌ सर्वलोकपितामह: । मनसा चिन्तयामास किमयं लभतामिति,तदनन्तर सर्वलोकपितामह बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ ब्रह्माने मन-ही-मन चिन्तन किया कि “यह बालक कौन-सा आधिपत्य ग्रहण करे”

于是,那位吉祥而睿智的万世祖父(梵天)在心中思量:“这童子当得何等主权与统御?”此句凸显审慎而负责任的抉择:权力并非一时冲动而授,而是为世界秩序之安宁,以远见衡量而定。

Verse 47

ऐश्वर्याणि च सर्वाणि देवगन्धर्वरक्षसाम्‌ | भूतयक्षविहड़नां पन्नगानां च सर्वश:

毗舍波耶那说道:“一切王权与辉煌——诸天、乾闼婆与罗刹所有者,以及同样属于部多、夜叉、飞禽与龙蛇者——皆已圆满具足,尽现于前。”

Verse 48

पूर्वमेवादिदेशासौ निकायेषु महात्मनाम्‌ । समर्थ च तमैश्व॒र्ये महामतिरमन्यत

毗舍波耶那说道:“早先他已在诸位大士之军团中颁下号令;而那位高怀睿智的统帅也断定,此人完全堪当王权之任。”

Verse 49

महामति ब्रह्माने जगत्‌के भिन्न-भिन्न पदार्थोंके ऊपर देवता, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, भूत, नाग और पक्षियोंका आधिपत्य पहलेसे ही निर्धारित कर रखा था। साथ ही वे कुमारको भी आधिपत्य करनेमें समर्थ मानते थे ।। ततो मुहूर्त स ध्यात्वा देवानां श्रेयसि स्थित: । सैनापत्यं ददौ तस्मै सर्वभूतेषु भारत,भरतनन्दन! तदनन्तर देवगणोंके मंगल-सम्पादनमें तत्पर हुए ब्रह्माने दो घड़ीतक चिन्तन करनेके पश्चात्‌ सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ कार्तिकेयको सम्पूर्ण देवताओंका सेनापति पद प्रदान किया

大智的梵天早已为世间种种差别之境,预定其主宰:诸天、乾闼婆、罗刹、夜叉、部多、那伽与飞禽,各有所统;并且他也认定这位童子(俱摩罗)足以执掌权柄。于是梵天为诸天之福祉而立,沉思片刻;继而,噢婆罗多,他将天军统帅之位授予此人,承认其为一切众生之最胜。

Verse 50

सर्वदेवनिकायानां ये राजान: परिश्रुता: । तानू सर्वान्‌ व्यादिदेशास्मै सर्वभूतपितामह:,जो सम्पूर्ण देवसमूहोंके राजारूपमें विख्यात थे, उन सबको सर्वभूतपितामह ब्रह्माने कुमारके अधीन रहनेका आदेश दिया

毗舍波耶那说道:“凡在诸天众中以王者著称者——万有之祖梵天——都被他正式敕令,悉数归于这位俱摩罗的权下。”

Verse 51

ततः कुमारमादाय देवा ब्रह्मपुरोगमा: । अभिषेकार्थमाजम्मु: शैलेन्द्रं सहितास्तत:

于是诸天在梵天率领下,携那位少主同行,一同前往群山之主处,意欲为他举行灌顶加冕之礼(阿毗湿迦)。

Verse 52

पुण्यां हैमव्तीं देवीं सरिच्छेष्ठां सरस्वतीम्‌ । समन्तपज्चके या वै त्रिषु लोकेषु विश्रुता

毗舍婆耶那说道:“(那里有)圣洁的萨拉斯瓦蒂女神,生于喜马拉雅,为诸河之最胜——她在三界之中皆闻名,于三曼多般遮迦(Samantapañcaka)尤为显著。”

Verse 53

तब ब्रह्मा आदि देवता अभिषेकके लिये कुमारको लेकर एक साथ गिरिराज हिमालयपर वहाँसे निकली हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला सरस्वती देवीके तटपर गये, जो समन्त-पंचकतीर्थमें प्रवाहित होकर तीनों लोकोंमें विख्यात है ।। तत्र तीरे सरस्वत्या: पुण्ये सर्वगुणान्विते । निषेदुर्देवगन्धर्वा: सर्वे सम्पूर्णमानसा:

在那里,在萨拉斯瓦蒂清净而具足诸德的圣岸边,诸天与乾闼婆众皆同坐而息,心意圆满安定。

Verse 323

तेडपि तत्र समाजम्मुर्यामा धामाश्च सर्वश: । देवताओं और गन्धवॉमें श्रेष्ठ नारद आदि देवर्षि, बृहस्पति आदि सिद्ध, सम्पूर्ण जगत्‌्से श्रेष्ठ तथा देवताओंके भी देवता पितृगण, सम्पूर्ण यामगण और धामगण भी वहाँ आये थे

毗舍婆耶那说道:在那里,阎摩众与达摩众的诸会亦以种种方式齐集。诸天与乾闼婆中最胜者——如那罗陀等天仙——与以布里哈斯帕提为首的成就者(悉地),以及被尊为崇高、甚至在诸天之上的祖灵众(Pitṛ),都来到此处。阎摩众与达摩众的一切部众也都抵达了那里。

Verse 333

अभ्याजगाम देवेशं शूलहस्तं पिनाकिनम्‌ । बालक होनेपर भी बलशाली एवं महान्‌ योगबलसे सम्पन्न कुमार त्रिशूल और पिनाक धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान्‌ शिवकी ओर चले

毗舍婆耶那说道:那王子虽仍是孩童,却雄健非常,具大瑜伽之力;他迈步前往诸神之主——手执三叉戟、佩持毗那迦神弓的湿婆。

Verse 363

युगपद्‌ योगमास्थाय ससर्ज विविधास्तनू: । तब उन सबके अभिप्रायको लक्ष्य करके कुमारने एक ही साथ योगबलका आश्रय ले अपने अनेक शरीर बना लिये

毗舍婆耶那说道:洞察众人之意,那青年当即依瑜伽之力,同时化现出种种不同的身形,分身并作。

Frequently Asked Questions

How martial authority becomes publicly legitimate: the chapter frames command as an office established through śāstric procedure, collective witness, and sanctioned delegation rather than personal assertion.

Power is depicted as relational and ordered: capability is formalized through rites, and effective leadership is supported by distributed roles, obligations, and recognized patrons within a wider cosmic and social structure.

No explicit phalaśruti formula is presented in this passage; the meta-significance is conveyed indirectly through the epic’s emphasis on śāstric procedure, auspicious materials, and collective consecration as markers of legitimacy.