Adhyaya 19
Shalya ParvaAdhyaya 1983 Versesकौरव पक्ष क्षति और भय से डगमगाता है, पर दुर्योधन के उकसावे से अस्थायी रूप से संभलकर पुनः मोर्चा लेता है; पाण्डव पक्ष आक्रमण हेतु संगठित और आक्रामक।

Adhyaya 19

Śālva’s Elephant Assault and the Counterstroke (शाल्वस्य नागारूढाभ्यवहारः)

Upa-parva: Śālva–Gaja-yuddha (Strategic Engagement with Śālva and the War Elephant)

Saṃjaya reports that Śālva, leading a mleccha contingent, returns to the field in anger and advances upon the Pāṇḍava forces mounted on an exceptional elephant likened to Airāvata and a mountain. The elephant-led charge creates immediate disruption, scattering formations and prompting Kaurava-side acclaim through conch blasts. Dhṛṣṭadyumna, commander of the Pāṇḍava–Sṛñjaya host, moves to intercept; Śālva directs the elephant toward him. Dhṛṣṭadyumna strikes the elephant with concentrated, blazing arrows, temporarily forcing it to recoil, but Śālva drives it again with goad and prod toward Dhṛṣṭadyumna’s chariot. Dhṛṣṭadyumna dismounts swiftly with mace in hand as the elephant crushes and overturns the chariot. Bhīma, Śikhaṇḍin, and Śini’s grandson converge; rathins restrain the elephant’s momentum with arrows, while Śālva showers missiles like sunrays. The Pāñcāla prince (Dhṛṣṭadyumna) pursues and delivers a decisive mace blow that breaks the elephant’s temples; the animal collapses. In the ensuing collapse of morale, a Sātvata warrior severs Śālva’s head with a sharp bhalla, and Śālva falls with the elephant, marking a complete reversal from initial shock to decisive containment and elimination.

Chapter Arc: शल्य के वध के बाद कौरव-सेना में नाव-भंग जैसी अफरातफरी फैलती है—योद्धा एक-दूसरे से बिखरी हुई बातों में अपनी हार का कारण खोजते, धृतराष्ट्र की निन्दा करते और अपने भाग्य को कोसते हैं। → पराजय-भय से ग्रस्त सैनिक ‘अनाथ’ होकर इधर-उधर भागते हैं—जैसे सिंह से आहत मृग। दोपहर के समय पलायन का स्मरण, संगठन-शक्ति का टूटना, और नेतृत्व-विहीनता कौरव पक्ष को भीतर से खोखला कर देती है; फिर भी दुर्योधन उन्हें लज्जा और क्षात्रधर्म की दुहाई देकर लौटने को उकसाता है। → दुर्योधन के कठोर वचनों और ‘युद्ध में मरकर भी फल’ की घोषणा से राजागण पुनः साहस बटोरते हैं; उधर विजय-लालसा और क्रोध से भरे पाण्डव व्यूह बाँधकर तीव्र आक्रमण के लिए निकल पड़ते हैं—दोनों सेनाएँ फिर आमने-सामने आ खड़ी होती हैं। → कौरवों का पलायन क्षणिक सिद्ध होता है: दुर्योधन के सम्मान-आह्वान पर वे लौट आते हैं, और पाण्डव भी तत्पर होकर प्रत्युद्यय करते हैं—अगला संकुल युद्ध निश्चित हो जाता है। → दोनों पक्षों के व्यूह सजते ही रणभूमि फिर गरज उठती है—अब किसका धैर्य टूटेगा और किसके हाथ निर्णायक प्रहार लगेगा?

Shlokas

Verse 1

2: छा अकाल एकोनविशो< ध्याय: पाण्डवसैनिकोंका आपसमें बातचीत करते 5 68883 प्रशंसा और धृतराष्ट्रकी निन्दा करना तथा -सेनाका पलायन, भीमद्वारा इक्कीस हजार पैदलोंका संहार और दुर्योधनका अपनी सेनाको उत्साहित करना संजय उवाच पातिते युधि दुर्थर्षे मद्रराजे महारथे । तावकास्तव पुत्राश्च प्रायशो विमुखाभवन्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! दुर्जय महारथी मद्रराज शल्यके मारे जानेपर आपके सैनिक और पुत्र प्राय: संग्रामसे विमुख हो गये

三阇耶说道:“大王啊,当摩陀罗之王沙利耶——那位难以征服的伟大车战士——在战斗中被击倒时,你的军队与你的诸子大多转身离阵,不复恋战。”一位首要勇将的陨落粉碎了士气,显明军心往往系于统帅的坚忍,以及对正法与胜势是否在己方的信念。

Verse 2

वणिजो नावि भिन्नायां यथागाधेडप्लवे<र्णवे । अपारे पतिमच्छन्तो हते शूरे महात्मना

三阇耶说道:“正如商旅之人,船在深邃无岸的大海中破碎,束手无策,只得寻求庇护者;同样,当那位英勇而大心的勇士被杀之后,诸战士失却依凭,四顾求一位统帅,能救护并稳住他们的阵脚。”

Verse 3

अनाथा नाथमिच्छन्तो मृगा: सिंहार्दिता इव

三阇耶说道:“他们如同被狮子撕咬的群鹿,孤苦无依、无所庇护,渴望一位护持者——在战场的恐怖之中,寻求一位君主为他们遮蔽并引领。”

Verse 4

मध्यद्ले प्रत्यपायाम निर्जिताजातशत्रुणा

三阇耶说道:“在阵列中央,我们被迫后退——为已占上风的阿阇多沙特鲁所压制。”

Verse 5

न संधातुमनीकानि न च राजन्‌ पराक्रमे । आसीदू्‌ बुद्धि्हते शल्ये भूयो योधस्य कस्यचित्‌

三阇耶说道:“大王啊,无论在布置军阵,还是在奋发勇力之时,都没有哪位战士的判断比奢利耶更为破碎。其统摄军旅、以清明的战意行事之能,竟比任何斗士都更黯然失色;由此可见,内心的纷乱,足以在战争之中摧毁连盛名之力也难保全。”

Verse 6

राजन्‌! अजातशत्रु युधिष्ठिस्से पराजित हो दोपहरके समय हमलोग युद्धसे भाग चले थे। शल्यके मारे जानेसे किसी भी योद्धाके मनमें सेनाओंको संगठित करने तथा पराक्रम दिखानेका उत्साह नहीं होता था ।। भीष्मे द्रोणे च निहते सूतपुत्रे च भारत । यद्‌ दुःखं तव योधानां भयं चासीद्‌ विशाम्पते

三阇耶说道:“大王啊!正午之时,当尤提士提罗——阿阇多沙特鲁,敌所不能胜者——遭到击败,我们便从战场奔逃。奢利耶既死,再无一名战士有心振作,去整顿军旅或显扬勇武。毗湿摩与德罗那既已陨落,御者之子亦被诛杀之时,婆罗多啊,你的战士们被何等悲痛与恐惧所攫住,万民之主啊?”

Verse 7

निराशाश्न जये तस्मिन्‌ हते शल्ये महारथे

三阇耶说道:当那位伟大的车战勇士沙利耶在此战中被诛之后,他们便对胜利彻底失去了希望。

Verse 8

मद्रराजे हते राजन्‌ योधास्ते प्राद्रवन्‌ू भयात्‌

三阇耶说道:大王啊,当摩陀罗之王被杀时,你的武士因恐惧而溃散奔逃。

Verse 9

अश्वानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथा: । आरुहा[ जवसम्पन्ना: पादाता: प्राद्रवंस्तथा

三阇耶说道:有人跃上战马,有人登上战象,也有人攀上战车。诸位大勇士以及疾行的步兵随即一齐向前奔涌——各自取用其应当依凭的战具。

Verse 10

राजन! मद्रराजकी मृत्यु हो जानेपर आपके वे सभी योद्धा भयके मारे भागने लगे। कुछ सैनिक घोड़ोंपर, कुछ हाथियोंपर और दूसरे महारथी रथोंपर आरूढ़ हो बड़े वेगसे भागे। पैदल सैनिक भी वहाँसे भाग खड़े हुए ।। द्विसाहस्राक्ष मातड्रा गिरिरूपा: प्रहारिण: । सम्प्राद्रवन्‌ हते शल्ये अड्कुशाड्गुष्ठनोदिता:,दो हजार प्रहारकुशल पर्वताकार मतवाले हाथी शल्यके मारे जानेपर अंकुशों और पैरके अँगूठोंसे प्रेरित हो तीव्र गतिसे पलायन करने लगे

三阇耶说道:“大王啊,当摩陀罗之主沙利耶被杀之后,你的将士尽皆因惧而逃。有人骑马遁去,有人乘象奔走,另有大车战勇士驾车疾驰;连步卒也从战场奔散。随后,两千头发情狂暴、如山般魁伟、善于猛击的战象——在象钩与驭者脚趾的压迫驱使下——也在沙利耶陨落后仓皇狂奔而去。”

Verse 11

ते रणाद्‌ भरतश्रेष्ठ तावका: प्राद्रवन्‌ दिश: । धावतकश्चाप्यपश्याम श्वसमानान्‌ शराहतान्‌,भरतश्रेष्ठ] आपके वे सैनिक रणभूमिसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागे थे। हमने देखा, वे बाणोंसे क्षत-विक्षत हो हाँफते हुए दौड़े जा रहे हैं

三阇耶说道:婆罗多族中最卓越者啊,你的军队从战场向四方溃逃。我们看见他们奔走——气喘如牛,身被箭矢穿刺撕裂。

Verse 12

तान्‌ प्रभग्नान्‌ द्रुतान्‌ दृष्टवा हतोत्साहान्‌ पराजितान्‌ | अभ्यवर्तन्त पज्चाला: पाण्डवाश्ष जयैषिण:,उन्हें हतोत्साह, पराजित एवं हताश होकर भागते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले पांचाल और पाण्डव उनका पीछा करने लगे

三阇耶说道:见他们溃散奔逃——斗志尽失,败相毕露——盘遮罗人与般度族,为求胜利,便回身追击而去。

Verse 13

बाणशब्दरवाश्नापि सिंहनादाश्न पुष्कला: । शड्खशब्दश्न शूराणां दारुण: समपद्यत,बाणोंकी सनसनाहट, शूरवीरोंका सिंहनाद और शंखध्वनि--इन सबकी मिली-जुली आवाज बड़ी भयानक जान पड़ती थी

三阇耶说道:战场上回荡着骇人的混合轰鸣——箭矢的嗖嗖破空,勇士们如狮般的长啸,以及海螺号角的嘹亮齐鸣——合成一片,令人胆寒。

Verse 14

दृष्टवा तु कौरवं सैन्यं भयत्रस्तं प्रविद्रुतम्‌ । अन्योन्यं समभाषन्त पज्चाला: पाण्डवैः सह,कौरव-सेनाको भयसे संत्रस्त होकर भागती देख पाण्डवोंसहित पांचालयोद्धा आपसमें इस प्रकार वार्तालाप करने लगे---

三阇耶说道:见俱卢军惊惶失措、因恐惧而四散奔逃,盘遮罗诸将与般度族一道,便彼此交谈起来。

Verse 15

अद्य राजा सत्यधृति्तामित्रो युधिष्ठिर: । अद्य दुर्योधनो हीनो दीप्ताया नृपतिश्रिय:

三阇耶说道:“今日,坚守真实与定志的尤提施提罗王屹立不移,成为敌人难当的劲敌。今日,杜尤陀那已失却昔日环绕其身的炽盛王者光辉。”

Verse 16

“आज सत्यपरायण राजा युधिष्छिर शत्रुहीन हो गये और आज दुर्योधन अपनी देदीप्यमान राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गया ।। अद्य श्रुत्वा हत॑ पुत्र धृतराष्ट्रो जनेश्वर: । विह्वल: पतितो भूमौ किल्बिषं प्रतिपद्यताम्‌

三阇耶说道:“今日,奉持真实的尤提施提罗王已无敌手;今日,杜尤陀那从炽盛的王者福运中坠落。今日,听闻其子被杀,持国王——人间之主——悲惶失措,颓然倒地,仿佛被驱向自身罪业的果报。”

Verse 17

“आज राजा धूृतराष्ट्र अपने पुत्रको मारा गया सुनकर व्याकुल हो पृथ्वीपर पछाड़ खाकर गिरें और दु:ख भोगें ।। अद्य जानातु कौन्तेयं समर्थ सर्वधन्विनाम्‌ । अद्यात्मानं च दुर्मेधा ग्हयिष्यति पापकृत्‌

三阇耶说道:“今日,当使昆蒂之子知晓:在一切弓手之中,谁最为强大。今日,那作恶而心智乖僻之人,必被迫直面自身真正的分量。”

Verse 18

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धाविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,अद्य क्षत्तुर्वच: सत्यं स्मरतां ब्रुवतो हितम्‌ । “आज वे समझ लें कि दुन्तीपुत्र अर्जुन सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ एवं सामर्थ्यशाली हैं। आज पापाचारी दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र अपनी भरपेट निन्दा करें और विदुरजीने जो सत्य एवं हितकर वचन कहे थे, उन्हें याद करें ।। अद्यप्रभृति पार्थ च प्रेष्पभूत इवाचरन्‌

三阇耶说道:“今日,当使他们忆起侍臣毗度罗所言那真实而有益的箴言。今日,当使他们终于明白:昆蒂之子阿周那,乃诸弓手之首,亦最为强大。今日,当使那罪孽深重、心智迷误的持国王尽饱自责之苦,并追忆毗度罗曾进献的真实、利民的忠告。自今日起,也当使他们对待帕尔塔(阿周那)如同对待自己的主上。”

Verse 19

अद्य कृष्णस्य माहात्म्यं विजानातु महीपति:,“आज राजा धृतराष्ट्र अनुभव करें कि भगवान्‌ श्रीकृष्णका कैसा माहात्म्य है और आज वे यह भी जान लें कि युद्धस्थलमें अर्जुनके गाण्डीव धनुषकी टंकार कितनी भयंकर है? उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी सारी शक्ति कैसी है तथा रणभूमिमें उनकी दोनों भुजाओंका बल कितना अद्भुत है? इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनविंशो5ध्याय:

三阇耶说道:“今日,当使大王真正识得奎师那之伟大。亦当使他明白:战场之上,阿周那的‘甘狄婆’弓弦轰鸣如雷,何其可怖——其兵器之威力何其强盛,而他双臂在征战中的力量又何其惊人。”

Verse 20

अद्यार्जुनभनुर्घोषं घोरं जानातु संयुगे । अस्त्राणां च बलं॑ सर्व बाद्दोश्चन बलमाहवे,“आज राजा धृतराष्ट्र अनुभव करें कि भगवान्‌ श्रीकृष्णका कैसा माहात्म्य है और आज वे यह भी जान लें कि युद्धस्थलमें अर्जुनके गाण्डीव धनुषकी टंकार कितनी भयंकर है? उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी सारी शक्ति कैसी है तथा रणभूमिमें उनकी दोनों भुजाओंका बल कितना अद्भुत है?

三阇耶说道:“今日,战阵之中,当使大王知晓:阿周那之弓弦轰鸣何其可怖;亦当使他明白阿周那诸般兵器的全然威力,以及他在战场上双臂的雄力。”

Verse 21

अद्य ज्ञास्यति भीमस्य बल॑ घोर महात्मन: । हते दुर्योधने युद्धे शक्रेणेवासुरे बले,'जैसे इन्द्रने असुरोंकी सेनाका संहार किया था, उसी प्रकार युद्धमें भीमसेनके हाथसे दुर्योधनके मारे जानेपर आज धृतराष्ट्रको यह ज्ञात हो जायगा कि “महामनस्वी भीमका बल कैसा भयंकर है!”

三阇耶说道:“今日,持国王将知晓大士毗摩那可怖的力量为何等惊人。当战中都利约陀那被毗摩塞那之手所杀,正如因陀罗歼灭阿修罗之军一般。”

Verse 22

यत्‌ कृतं भीमसेनेन दुःशासनवधे तदा । नान्य: कर्तास्ति लोके5स्मिनृते भीमान्महाबलात्‌,“दुःशासनके वधके समय भीमसेनने जो कुछ किया था, उसे महाबली भीमसेनके सिवा इस संसारमें दूसरा कोई नहीं कर सकता

三阇耶说道:“当时在诛杀杜沙娑那之际,毗摩塞那所行之事——此世间除那臂力雄伟、神力无双的毗摩之外,再无人能为。”

Verse 23

मद्रराजे महाराज वित्रस्ता: शरविक्षता: । महाराज! जैसे अगाध महासागरमें नाव टूट जानेपर उस नौकारहित अपार समुद्रसे पार जानेकी इच्छावाले व्यापारी व्याकुल हो उठते हैं, उसी प्रकार महात्मा युधिष्ठिरके द्वारा शूरवीर मद्रराज शल्यके मारे जानेपर आपके सैनिक बाणोंसे क्षत-विक्षत एवं भयभीत हो बड़ी घबराहटमें पड़ गये,अद्य श्रेष्ठस्य जानीतां पाण्डवस्य पराक्रमम्‌ । मद्रराजं हत॑ श्रुत्वा देवेरपि सुदुःसहम्‌ “देवताओंके लिये भी दुःसह मद्रराज शल्यके वधका वृत्तान्त सुनकर आज धूतराष्ट्र ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके पराक्रमको भी अच्छी तरह जान लें

三阇耶说道:大王啊,当摩陀罗之王被击毙之时,你的军队被箭矢穿刺撕裂,恐惧攫住其心,遂陷入极度混乱。正如商旅渴望渡过浩瀚无岸的大海,一旦舟楫破碎、身陷无舟之境,便惊惶失措;同样,你的军队听闻英勇的摩陀罗之主沙利耶为高魂的坚战(由提施提罗)所杀,亦惶恐万状,乱作一团。今日啊,持国(德里达罗湿多罗),当深知般度诸子之首坚战的威力;因为仅仅“沙利耶已死”的传闻,便是连诸天也难以承受之事。

Verse 24

अद्य ज्ञास्यति संग्रामे माद्रीपुत्रौ सुदु:ःसहौ । निहते सौबले वीरे प्रवीरेषु च सर्वश:

三阇耶说道:“今日战场之上,摩德丽的两位儿子——令敌人难以承受的凶猛战士——将真正显出其本色;因为英勇的娑乌婆罗已被诛杀,而诸方最杰出的勇士也都相继倒下。”

Verse 25

“आज संग्राममें सुबलपुत्र वीर शकुनि तथा दूसरे समस्त प्रमुख वीरोंके मारे जानेपर उन्हें शत्रुके लिये अत्यन्त दुःसह माद्रीकुमार नकुल-सहदेवकी शक्तिका भी ज्ञान हो जायगा ।। कथं जयो न तेषां स्याद्‌ येषां योद्धा धनंजय: । सात्यकिर्भीमसेनश्व धृष्टय्युम्नश्व॒ पार्षत:,“जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले धनंजय, सात्यकि, भीमसेन, ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव, महाधनुर्धर शिखण्डी तथा स्वयं राजा युधिष्ठिर-जैसे वीर हैं, उनकी विजय कैसे न हो?

三阇耶说道:“今日之战,当苏婆罗之子、勇士沙昆尼以及其余诸位首要战将尽皆被诛之时,敌人也将知晓摩德丽二子——那俱罗与娑诃提婆——那不可抗拒的威势。既有檀那阇耶(阿周那)、萨底耶吉、毗摩塞那,以及普利沙塔之子德里施塔丢摩那为其出战,他们又怎会不获胜利?”

Verse 26

द्रौपद्यास्तनया: पञ्च माद्रीपुत्रोी च पाण्डवौ । शिखण्डी च महेष्वासो राजा चैव युधिछिर:,“जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले धनंजय, सात्यकि, भीमसेन, ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेव, महाधनुर्धर शिखण्डी तथा स्वयं राजा युधिष्ठिर-जैसे वीर हैं, उनकी विजय कैसे न हो?

三阇耶说道:“他们那一方有德罗帕蒂的五子,又有摩德丽所生的两位般度子;还有大弓手尸佉ṇḍī,以及坚战王本人。如此英雄为其而战,胜利又怎会不属于他们?”

Verse 27

येषां च जगतीनाथो नाथ: कृष्णो जनार्दन: । कथं तेषां जयो न स्याद्‌ येषां धर्मो व्यपाश्रय:,“सम्पूर्ण जगतके स्वामी जनार्दन श्रीकृष्ण जिनके रक्षक हैं और जिन्हें धर्मका आश्रय प्राप्त है, उनकी विजय क्‍यों न हो?

三阇耶说道:凡以黑天·阇那尔达那——统御全世界之主——为护持者,又以达摩为依止者,胜利怎会不属于他们?当神圣的守护与正法的根基相合,败北便无其应有之地。

Verse 28

(लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभव: । येषां नाथो हृषीकेश: सर्वलोकवि भुर्हरिः ।।) “अखिल विश्वके प्रभु और सबकी इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान्‌ श्रीहरि जिनके स्वामी और संरक्षक हैं, उन्हींको लाभ प्राप्त होता है और उन्हींकी विजय होती है। भला उनकी पराजय कैसे हो सकती है?। भीष्म द्रोणं च कर्ण च मद्रराजानमेव च । तथान्यान्‌ नृपतीन्‌ वीरान्‌ शतशो5थ सहस्रशः

三阇耶说道:“利益属于他们,胜利属于他们——败北又怎会属于他们?因为他们的主与护持者是赫利希凯沙、哈利,那遍满诸世界的至尊。如此主人所在之处,成功自随而至,衰败无从扎根。”

Verse 29

को<न्य: शक्तो रणे जेतुमृते पार्थाद्‌ युधिष्ठिरात्‌ । यस्य नाथो हृषीकेश: सदा सत्ययशोनिधि:

三阇耶说道:在战场上,除般度之子帕尔塔(阿周那)与坚战(由提施提罗)之外,还有谁能取胜?因为他们的主与护持者是赫利希凯沙(黑天),恒为真实与崇高声誉之宝藏。

Verse 30

“दुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके सिवा दूसरा कौन ऐसा राजा है जो रणभूमिमें भीष्म, द्रोण, कर्ण, मद्रराज शल्य तथा अन्य सैकड़ों-हजारों नरपतियोंपर विजय प्राप्त कर सके। सदा सत्य और यशके सागर भगवान्‌ श्रीकृष्ण जिनके स्वामी एवं रक्षक हैं, उन्हींको यह सफलता प्राप्त हो सकती है” ।। इत्येवं वदमानास्ते हर्षेण महता युता: । प्रभग्नांस्तावकान्‌ योधान्‌ सृञ्जया: पृष्ठतो5न्वयु:

三阇耶说道:“除昆蒂之子坚战(由提施提罗)外,还有哪位国王能在战场上战胜毗湿摩、德罗那、迦尔那、摩陀罗王沙利耶,以及其他成百上千的勇武诸王?如此成就,唯有以世尊室利黑天——真实与名声之海——为主为护者者方能获得。”他们如此言说,满怀大喜,斯林阇耶诸军便从后追击你方溃散奔逃的战士。

Verse 31

इस तरहकी बातें करते हुए सूंजयवीर अत्यन्त हर्षमें भरकर आपके भागते हुए योद्धाओंका पीछा करने लगे ।। धनंजयो रथानीकमभ्यवर्तत वीर्यवान्‌ | माद्रीपुत्री च शकुनिं सात्यकिश्न महारथ:,इसी समय पराक्रमी अर्जुनने आपकी रथसेनापर धावा किया। साथ ही नकुल-सहदेव और महारथी सात्यकिने शकुनिपर चढ़ाई की

三阇耶说道:斯林阇耶诸军如此言说,欢喜充盈,便从后追逐你方奔逃的战士。就在此时,骁勇的檀那ंज耶(阿周那)直冲你方战车军阵;与他同进的,还有摩陀梨之二子(那俱罗与娑诃提婆)以及大车战士萨提亚基,一齐向沙昆尼发起进攻。

Verse 32

तान्‌ प्रेक्ष्य द्रवत: सर्वान्‌ भीमसेनभयार्दितान्‌ | दुर्योधनस्तदा सूतमब्रवीद्‌ विजयाय च,भीमसेनके भयसे पीड़ित हुए अपने उन समस्त योद्धाओंको भागते देख दुर्योधनने विजयकी इच्छासे अपने सारथिसे कहा--

三阇耶说道:见那些武士尽皆惊惶奔逃,皆为怖畏毗摩塞那所压迫,难敌其威;于是杜罗约陀那怀着求胜之心,转而对自己的御者说道——欲重整军心,扭转战局,纵然恐惧与溃散的阴影沉沉压在己方阵列之上。

Verse 33

मामतिक्रमते पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम्‌ । जघने सर्वसैन्यानां ममाश्चान्‌ प्रतिपादय,'सूत! मैं यहाँ हाथमें धनुष लिये खड़ा हूँ और अर्जुन मुझे लाँध जानेकी चेष्टा कर रहे हैं। अतः तुम मेरे घोड़ोंको सारी सेनाके पिछले भागमें पहुँचा दो

三阇耶说道:“我手执弓矗立于此,阿周那却欲从我身旁越过。故而,御者啊,驱我之马至全军之后阵。”

Verse 34

जघने युध्यमानं हि कौन्तेयो मां समन्ततः । नोत्सहेदभ्यतिक्रान्तुं वेलामिव महोदधि:

三阇耶说道:“昆蒂之子奋战不息,从四面八方逼压于我;我竟不能使自己越过他——正如大海不能逾越其岸。”

Verse 35

'पृष्ठभागमें रहकर युद्ध करते समय मुझे अर्जुन किसी ओरसे भी लाँघनेका साहस नहीं कर सकते। ठीक वैसे ही, जैसे महासागर अपने तटप्रान्तको नहीं लाँघ पाता है ।। पश्य सैन्यं महत्‌ सूत पाण्डवै: समभिद्रुतम्‌ । सैन्यरेणुं समुद्धूतं पश्यस्वैनं समन्‍्तत:,'सारथे! देखो, पाण्डव मेरी विशाल सेनाको खदेड़ रहे हैं और सैनिकोंके दौड़नेसे उठी हुई धूल जो सब ओर छा गयी है उसपर भी दृष्टिपात करो

三阇耶说道:“只要我居于后阵而战,阿周那便不敢从任何一面越过我——正如大海不能越出自身之岸。御者啊,你看:般度诸子正猛力驱迫这浩大军旅;又看那奔走之众所扬起的尘土,四面弥漫。”

Verse 36

वृषा यथा भग्नशुज्जा: शीर्णदन्ता यथा गजा: । वे अपनेको अनाथ समझते हुए किसी नाथ (सहायक) की इच्छा रखते थे और सिंहके सताये हुए मृगों, टूटे सींगवाले साँड़ों तथा जीर्ण-शीर्ण दाँतोंवाले हाथियोंके समान असमर्थ हो गये थे,सिंहनादांश्व बहुश: शूणु घोरान्‌ भयावहान्‌ | तस्माद्‌ याहि शनै: सूत जघनं परिपालय 'सूत! वह सुनो, बारंबार भय उत्पन्न करनेवाले घोर सिंहनाद हो रहे हैं। इसलिये तुम धीरे-धीरे चलो और सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करो

三阇耶说道:“他们变得无力——如折角之雄牛,如齿残之巨象——又如为狮所逐之鹿,自以为无主无依,渴望得一位主将为护。御者啊,听那可怖的狮吼一再响起,令人胆寒。故当缓缓驱行,守护全军之后阵。”

Verse 37

मयि स्थिते च समरे निरुद्धेषु च पाण्डुषु पुनरावर्तते तूर्ण मापकं बलमोजसा,“जब मैं समरांगणमें खड़ा होऊँगा और पाण्डवोंका बढ़ाव रुक जायगा, तब मेरी सेना पुनः शीघ्र ही लौट आयेगी और सारी शक्ति लगाकर युद्ध करेगी”

三阇耶说道:“当我在战场上稳立不动,使般度五子之军的推进受阻之时,我方大军便会迅速回转,聚拢全部气力,以更新之势再度投入战斗。”

Verse 38

तच्छुत्वा तव पुत्रस्य शूरार्यसदृशं वच: । सारथिहेंमसंछन्नान्‌ शनैरश्वानचोदयत्‌,राजन! आपके पुत्रका यह श्रेष्ठ वीरोचित वचन सुनकर सारथिने सोनेके साज-बाजसे सजे हुए घोड़ोंको धीरे-धीरे आगे बढ़ाया

三阇耶说道:“大王啊,听到你儿子那番高贵而具武士气概的话语,御者便轻轻催动披戴金饰鞍具的骏马,缓缓向前。”

Verse 39

गजाश्वरथिभिहीनास्त्यक्तात्मान: पदातय: । एकविंशतिसाहस्रा: संयुगायावतस्थिरे,उस समय वहाँ हाथीसवार, घुड़सवार तथा रथियोंसे रहित इक्कीस हजार केवल पैदल योद्धा अपने जीवनका मोह छोड़कर युद्धके लिये डट गये

三阇耶说道:“失却象骑、马军与车战之士后,唯有二万一千名步卒,已抛却对自身性命的眷恋,仍然列阵而立,决意赴战。”

Verse 40

नानादेशसमुद्धूता नानानगरवासिनः | अवस्थितास्तदा योधा: प्रार्थयन्तो महद्‌ यश:,वे अनेक देशोंमें उत्पन्न और अनेक नगरोंके निवासी वीर सैनिक महान्‌ यशकी अभिलाषा रखते हुए वहाँ युद्ध करनेके लिये खड़े हुए थे

三阇耶说道:“来自诸邦、居于诸城的勇士们,为求大名,皆在彼处列阵待战。”

Verse 41

तेषामापततां तत्र संहृष्टानां परस्परम्‌ । सम्मर्द: सुमहान्‌ जज्ञे घोररूपो भयानक:,परस्पर हर्षमें भरकर एक-दूसरेपर आक्रमण करनेवाले उभयपक्षके सैनिकोंका वह घोर एवं महान्‌ संघर्ष बड़ा भयंकर हुआ

三阇耶说道:“当那些战士彼此振奋,冲向对方之时,战阵中顿起一场巨大的挤压与混战——形貌狰狞,令人胆寒。”

Verse 42

भीमसेनस्तदा राजन धृष्टद्युम्नश्न पार्षत: । बलेन चतुरज्गजेण नानादेश्यानवारयत्‌,राजन! उस समय भीमसेन और ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न चतुरंगिणी सेना साथ लेकर उन अनेकदेशीय सैनिकोंको रोकने लगे

三阇耶说道:大王啊,当时毗摩塞那与帕尔沙塔(德鲁帕达)之子德里什塔丢姆那,倚仗具足四军(车、马、象、步)的全备兵力,挡住了来自诸国的战士。战阵逼迫之中,他们的坚守如同严整的防线——以协同之力遏止敌军推进,护持己方,而非凭鲁莽的狂怒。

Verse 43

भीममेवाभ्यवर्तन्त रणे<न्ये तु पदातय: । प्रक्षेड्यास्फोट्य संहृष्टा वीरलोक॑ यियासव:,तब रणभूमिमें अन्य पैदल योद्धा हर्ष और उत्साहमें भरकर भुजाओंपर ताल ठोंकते और सिंहनाद करते हुए वीरलोकमें जानेकी इच्छासे भीमसेनके ही सामने आ पहुँचे

三阇耶说道:在那场战斗中,其余步兵也径直朝毗摩一人逼近。众人欢呼振奋,拍击臂膀,发出震天的战吼,来到他面前,渴望奔赴英雄之界——被鲁莽的热血与战争的致命决意所驱使。

Verse 44

आसाद्य भीमसेन तु संरब्धा युद्धदुर्मदा: । धार्रराष्ट्रा विनेदुर्हि नान्यामकथयन्‌ कथाम्‌,भीमसेनके पास पहुँचकर वे रोषभरे रणदुर्मद कौरवयोद्धा केवल गर्जना करने लगे, मुँहसे दूसरी कोई बात नहीं कहते थे

三阇耶说道:逼近毗摩塞那之后,持国之子一方的战士——因愤怒而凶猛,因战场傲气而如醉——只爆发出震耳的咆哮;他们口中再无他言。此景昭示:嗔怒与武夫之骄足以遮蔽理智与克制,使言语沦为纯粹的侵凌。

Verse 45

परिवार्य रणे भीम॑ निजध्नुस्ते समन्‍्ततः । स वध्यमान: समरे पदातिगणसंवृत:

三阇耶说道:在激战之中,他们从四面八方围住毗摩并向他猛击。然而即便在交锋中遭受连番攻袭,他仍立于阵中,被一队队步兵所环绕——在战争的混乱里,处处受压,四面受敌。

Verse 46

ते तु क्ुद्धा महाराज पाण्डवस्य महारथम्‌

三阇耶说道:然而他们怒火中烧,大王啊,便将锋芒转向般度族的那位大车战士——在战场道义崩塌之际,愤怒驱使着他们的决意。

Verse 47

निग्रहीतु प्रवृत्ता हि योधांश्षञान्यानवारयन्‌ । महाराज! वे सभी सैनिक कुपित हो पाण्डव महारथी भीमसेनको पकड़नेकी चेट्टामें संलग्न हो गये और दूसरे योद्धाओंको भी आगे बढ़नेसे रोकने लगे ।। अक्रुध्यत रणे भीमस्तैस्तदा पर्यवस्थितै:

三阇耶说道:大王啊,那些战士一心要制住他,也开始阻断他人前进之路。众军怒火腾起,齐齐扑向般度五子的大车战士毗摩塞那,欲将其擒拿,并拦住其他斗士不许逼近。于是,在战阵之中,毗摩对那些围困并当面相抗之人怒焰勃发。

Verse 48

सो<वतीर्य रथात्‌ तूर्ण पदाति: समवस्थित: । जातरूपप्रतिच्छन्नां प्रगृह्ा महतीं गदाम्‌

三阇耶说道:他迅疾下车,立于地上;又握起一柄以黄金包覆的巨槌,准备迎接下一段近身搏战。

Verse 49

अवधीत्‌ तावकान्‌ योधान्‌ दण्डपाणिरिवान्तक: । उनके इस प्रकार सब ओर खड़े होनेपर उस समय रणभूमिमें भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वे तुरंत अपने रथसे उतरकर पैदल खड़े हो गये और सोनेसे जड़ी हुई विशाल गदा हाथमें लेकर दण्डधारी यमराजके समान आपके उन योद्धाओंका संहार करने लगे || ४७-४८ $ ।। विप्रहीणरथाश्चांस्तानवधीत्‌ पुरुषर्षभ:

三阇耶说道:他如执罚杖的阎摩一般,屠戮大王麾下的战士。那人中雄牛又击倒了那些失去御者、战车无主的兵士。

Verse 50

हत्वा तत्‌ पुरुषानीक॑ भीम: सत्यपराक्रम:

三阇耶说道:诛灭那密集的战阵之后,毗摩——其勇力从不虚妄——挺身而立,宛如不移之威力的化身,置身于战争沉重的道义阴影之中。

Verse 51

धृष्टद्युम्नं पुरस्कृत्य नचिरात्‌ प्रत्यदृश्यत । सत्यपराक्रमी भीमसेन उस पैदल सेनाका संहार करके थोड़ी ही देरमें धृष्टद्युम्मको आगे किये दिखायी दिये ।। पादाता निहता भूमौ शिशियरे रुधिरोक्षिता:

三阇耶说道:以德利湿陀竺摩那为前锋,毗摩塞那不久又再现身。果然不负其真实勇力,他已斩尽步卒,旋即又与德利湿陀竺摩那领前而出。步兵横尸于地,躯体散落,尽被鲜血浸染。

Verse 52

नानाशस्त्रसमायुक्ता नानाकुण्डलधारिण:

三阇耶说道:他们配备了各式各样的兵器,耳饰也千般款式—宛如为战阵而盛装的武士之群;外在的华彩与临战的肃备,与暴力所付出的内在代价形成鲜明对照。

Verse 53

पताकाध्वजसंछन्नं पदातीनां महद्‌ बलम्‌

三阇耶说道:“一支浩大的步兵军势,旌旗与大纛遮天蔽日,映入眼帘。”此句写尽战争的规模与排场——外在的荣耀标记(旗帜与徽号)掩覆其下的人潮,暗示这等军阵所负的道德重压与将至的苦难。

Verse 54

निकृत्तं विबभौ रौद्रं घोररूपं भयावहम्‌ | ध्वज और पताकाओंसे आच्छादित पैदलोंकी वह विशाल सेना छिन्न-भिन्न होकर रौद्र, घोर एवं भयानक प्रतीत होती थी ।। ५३ ई ।। युधिष्ठिरपुरोगाश्व॒ सहसैन्या महारथा:

三阇耶说道:那支军队被砍断、被撕裂,支离破碎,显得可怖至极——神色凶厉,形貌狰狞,令人望而生畏。随后,诸位大车战士在坚战(Yudhiṣṭhira)率领之下,背倚浩大军势,向前推进——这是战争道德崩塌的图景:骄矜与旌旗终究遮不住暴力所造成的败坏与毁灭。

Verse 55

ते सर्व तावकान्‌ दृष्टवा महेष्वासा: पराड्मुखान्‌

三阇耶说道:见你方诸将——素以神射著称的强弓手们——竟纷纷背转而去,此情此景显出俱卢军心的崩塌;一瞬之间,若无坚定之志,纵有技艺也会在战争的道德与心理重压下动摇。

Verse 56

तदद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम्‌

三阇耶说道:“我们目睹了你之子那令人惊叹的男儿英勇之举。”

Verse 57

नातिदूरापयातं तु कृतबुद्धि पलायने

三阇耶说道:他并未走远,因为心中早已决意逃遁——其意志系于逃生,而非坚守。

Verse 58

दुर्योधन: स्वकं सैन्यमब्रवीद्‌ भृशविक्षतम्‌ | जब दुर्योधनने देखा कि मेरी सेना भागनेका निश्चय करके अभी अधिक दूर नहीं गयी है, तब उसने उन अत्यन्त घायल हुए सैनिकोंको पुकारकर कहा-- ।। नतं देशं प्रपश्यामि पृथिव्यां पर्वतेषु च

三阇耶说道:都利约陀那对自己的军队——伤痕累累者——发话。见那些决意逃走的士卒尚未走远,他呼唤重伤的战士,宣告道:“我看不见那样的地方——无论在大地之上,还是在群山之间——值得你们转身逃遁。”

Verse 59

अल्पं च बलमेतेषां कृष्ण च भृशविक्षतौ,यदि सर्वेजत्र तिष्ठामो ध्रुवं नो विजयो भवेत्‌ | “अब तो इनके पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी है और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भी अत्यन्त घायल हो चुके हैं, ऐसी दशामें यदि हम सब लोग साहस करके डटे रहें तो हमारी विजय अवश्य होगी

三阇耶说道:“他们的兵力如今所剩无几,黑天(克里希那)与阿周那也都身负重伤。若我们众人就在此处坚守不退、以决心固守阵地,则我方胜利必定无疑。”

Verse 60

।। विप्रयातांस्तु वो भिन्नान्‌ पाण्डवा: कृतविप्रिया:

三阇耶说道:“你们之中那些转身离去、四散而逃的人,般度之子追随而上,使其再度屈服(归于不再作乱),并在战场上按其所当受者处置。”

Verse 61

अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेयान्न: समरे वध: । “तुम पाण्डवोंके अपराध तो कर ही चुके हो। यदि अलग-अलग होकर भागोगे तो पाण्डव पीछा करके तुम्हें अवश्य मार डालेंगे। ऐसी दशामें हमारे लिये संग्राममें मारा जाना ही श्रेयस्कर है || ६० इ || शृण्वन्तु क्षत्रिया: सर्वे यावन्‍्तो5त्र समागता:,“जितने क्षत्रिय यहाँ एकत्र हुए हैं, वे सब कान खोलकर सुन लें--जब शूरवीर और कायर सभीको सदा ही मौत मार डालती है, तब ऐसा कौन मूर्ख मनुष्य है, जो क्षत्रिय कहलाकर भी निश्चितरूपसे युद्ध नहीं करेगा

三阇耶说道:“若我们四散而逃,般度之子必将追击,定会杀尽我们。在此境地,对我们而言,战死沙场反倒更为上策。愿此处聚集的一切刹帝利都侧耳聆听:既然死亡同样击倒勇者与怯者,那么还有哪个愚人自称刹帝利,却仍不肯以决心赴战?”

Verse 62

यदा शूरं च भीरुं च मारयत्यन्तक: सदा | को नु मूढो न युध्येत पुरुष: क्षत्रियो ध्रुवम्‌,“जितने क्षत्रिय यहाँ एकत्र हुए हैं, वे सब कान खोलकर सुन लें--जब शूरवीर और कायर सभीको सदा ही मौत मार डालती है, तब ऐसा कौन मूर्ख मनुष्य है, जो क्षत्रिय कहलाकर भी निश्चितरूपसे युद्ध नहीं करेगा

既然死神安多迦(Antaka)恒常诛杀勇者与怯者,那么有谁会愚昧到自称刹帝利,却必然不赴战阵呢?

Verse 63

श्रेयो नो भीमसेनस्य क्रुद्धस्याभिमुखे स्थितम्‌ । सुख: सांग्रामिको मृत्यु: क्षत्रधर्मेण युध्यताम्‌,“अतः क्रोधमें भरे हुए भीमसेनके सामने डटे रहना ही हमारे लिये कल्याणकारी होगा। क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीर पुरुषोंके लिये संग्राममें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है

因此,对我们而言,最好的做法是当毗摩塞那怒火炽盛时,仍坚定地立于其前。对依刹帝利之法而战的勇士来说,战场之死本身便是吉祥的归宿。

Verse 64

मर्त्येनावश्यमर्तव्यं गृहेष्वपि कदाचन । युध्यत: क्षत्रधर्मेण मृत्युरेष सनातन:,“मरणधर्मा मनुष्यको कभी-न-कभी अवश्य मरना पड़ेगा। घरमें भी उससे छुटकारा नहीं है। अतः क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करते हुए ही जो मृत्यु होती है, यही क्षत्रियके लिये सनातन मृत्यु है

凡人既具必死之身,终有一日必死——即便在家中也无法逃脱。因此,依刹帝利之法而战时所迎来的死亡,才是刹帝利自古以来的正命之死。

Verse 65

हत्वेह सुखमाप्रोति हतः प्रेत्य महत्‌ फलम्‌ । न युद्धधर्माच्छेयान्‌ वै पन्था: स्वर्गस्थ कौरवा:

在此斩敌者,得今世之乐;若自身被斩,死后则获大果报。诸位求天界的俱卢族啊,实无有胜过战斗之法(战士之达摩)的道路。

Verse 66

तद्‌ भयं स च न: शोको भय एवाभ्यवर्तत । भारत! प्रजानाथ! भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके योद्धाओंको जो दुःख और भय प्राप्त हुआ था, वही भय और वही शोक पुनः (शल्यके मारे जानेपर) हमारे सामने उपस्थित हुआ,श्रुत्वा तद्‌ वचनं तस्य पूजयित्वा च पार्थिवा:

三阇耶说道:那同样的恐惧——以及我们的哀恸——又一次降临,化作纯粹的惊骇。噢婆罗多啊,噢万民之主!正如你的战士在毗湿摩、德罗那与车夫之子迦尔纳被诛之时,为忧伤与恐惧所攫住;如今,随着沙利耶的陨落,同样的恐惧与同样的悲痛也再度在我们面前升起。听罢他的话,诸王依礼向他致敬。

Verse 67

तानापतत एवाशु व्यूढानीका: प्रहारिण:

三阇耶说道:那些凶猛的战士,战阵既已列定,便立刻疾冲而上,迅速扑向敌军,一心只求击杀。

Verse 68

धनंजयो रथेनाजावभ्यवर्तत वीर्यवान्‌

三阇耶说道:勇力无双的檀那阇耶(阿周那)乘战车而进,挺身踏入战场——在兵刃交击之中,以勇武与决意向前推进。

Verse 69

विश्रुतं त्रिषु लोकेषु व्याक्षिपन्‌ गाण्डिवं धनु: । पराक्रमी अर्जुन अपने त्रिलोकविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए रथके द्वारा युद्धके लिये वहाँ आ पहुँचे ।। ६८ ई ।। माद्रीपुत्रो च शकुनिं सात्यकिश्न महाबल:,माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव और महाबली सात्यकिने शकुनिपर धावा किया। ये सब लोग हर्ष और उत्साहमें भरकर बड़ी सावधानीके साथ आपकी सेनापर वेगपूर्वक टूट पड़े

三阇耶说道:阿周那名闻三界,挥举甘狄婆神弓,使其著名的弓弦轰然作响;他乘战车至彼处,备战而来。随后,摩德丽之子那俱罗与娑诃提婆,偕同大力的萨底耶吉,向沙昆尼发起冲击。众人虽满怀欢欣与战意,却仍谨慎警觉,以极快之势扑向你的军阵。

Verse 70

जवेनाभ्यपतन्‌ ह्ृष्टा यत्ता वै तावकं बलम्‌,माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव और महाबली सात्यकिने शकुनिपर धावा किया। ये सब लोग हर्ष और उत्साहमें भरकर बड़ी सावधानीके साथ आपकी सेनापर वेगपूर्वक टूट पड़े

三阇耶说道:他们以迅猛之势,欢腾而不失纪律,冲击你的军队。摩德丽之子那俱罗与娑诃提婆,以及大力的萨底耶吉,向沙昆尼猛进;众人满怀喜悦与战意,却谨慎协同其攻势,以极快之速扑向你的兵众。

Verse 76

हतप्रवीरा विध्वस्ता निकृत्ताश्न शितै: शरै: । जिनके प्रमुख वीर मारे गये थे, वे कौरवसैनिक महारथी शल्यका वध हो जानेपर पैने बाणोंसे क्षत-विक्षत और विध्वस्त हो विजयकी ओरसे निराश हो गये थे

三阇耶说道:他们的首要勇士既已被杀,俱卢军便支离破碎,被锋利的箭矢所斩灭。沙利耶陨落之后,那些战士——负伤、崩溃、失却统帅——遂对胜利绝望。

Verse 186

विजानातु नृपो दु:खं यत्‌ प्राप्तं पाण्डुनन्दनै: । “आजसे वे स्वयं ही दासतुल्य होकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरकी परिचर्या करते हुए अच्छी तरह समझ लें कि “पाण्डवोंने पहले कितना कष्ट उठाया था?”

三阇耶说道:“愿国王真正明了降临在般度之子身上的苦难。”此语强调一种道义上的清算:唯有承认般度五子曾经忍受的艰辛,方能公正评判他们的作为,并以公平之心看待这场战争悲剧性的必然。

Verse 456

न चचाल ततः स्थानान्मैनाक इव पर्वत: । उन्होंने रणभूमिमें भीमसेनको चारों ओरसे घेरकर उनपर प्रहार आरम्भ कर दिया। समरांगणमें पैदल सैनिकोंसे घिरे हुए भीमसेन उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी चोट सहते हुए भी मैनाक पर्वतके समान अपने स्थानसे विचिलित नहीं हुए

三阇耶说道:他寸步未移,稳如摩那迦山。纵在战场上被步卒四面合围、刀枪连番加击,毗摩塞那仍忍受诸般兵刃之创而不退让,于血火之中显出不动如山的决意。

Verse 493

एकविंशतिसाहस्रान्‌ पदातीन्‌ समपोथयत्‌ । रथ और घोड़ोंसे रहित उन इकक्‍्कीसों हजार पैदल सैनिकोंको पुरुषप्रवर भीमने गदासे मारकर धराशायी कर दिया

三阇耶说道:毗摩,众人之雄,以铁杵击倒并碾碎二万一千名步卒——那些已失战车与战马者——使之尽皆仆地。此景彰显战阵残酷的势头:力量与决心足以压倒万众,也更凸显武士之责与战争人命代价之间的道义张力。

Verse 513

सम्भग्ना इव वातेन कर्णिकारा: सुपुष्पिता: । मारे गये पैदल सैनिक खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर सदाके लिये सो गये, मानो हवाके उखाड़े हुए सुन्दर लाल फूलोंसे भरे कनेरके वृक्ष पड़े हों

三阇耶说道:那些被击毙的步卒,浑身血染,横卧大地,仿佛永沉长眠——恰如盛放的羯尼迦罗树为狂风折断、连根拔起,艳红花朵四散飘零。此喻凸显战争可怖的代价:生命骤然被斩断,美与生机化作死寂,战场遂成见证人间暴力与无常的阴冷碑铭。

Verse 526

नानाजात्या हतास्तत्र नानादेशसमागता: । वहाँ नाना देशोंसे आये हुए, नाना जातिके, नाना शस्त्र धारण किये और नाना प्रकारके कुण्डलधारी योद्धा मारे गये थे

三阇耶说道:在那里,来自诸邦异域的各族勇士尽皆被杀。此景昭示战争广袤而不择人的代价:出身与身份各异之人,被卷入同一场冲突,终在战场上同归一尽。

Verse 546

अभ्यधावन्‌ महात्मानं पुत्र दुर्योधनं तव । तत्पश्चात्‌ सेनासहित युधिष्ठचिर आदि महारथी आपके महामनस्वी पुत्र दुर्योधनकी ओर दौड़े

三阇耶说道:随后,诸位大勇士奔袭而去,直指陛下那位心志高远之子——难敌(Duryodhana)。继而,坚战(Yudhiṣṭhira)与其他最卓越的车战豪杰(maharathi),率领各自军旅,向他推进——将战局推向决断之战;在那一刻,法(dharma)、忠义与战争残酷的要求彼此冲撞。

Verse 553

नात्यवर्तन्त ते पुत्रं वेलेव मकरालयम्‌ । आपके योद्धाओंको युद्धसे विमुख हो भागते देख वे सब महाधनुर्धर पाण्डव-महारथी आपके पुत्रको लाँधकर आगे नहीं बढ़ सके। जैसे तटभूमि समुद्रको आगे नहीं बढ़ने देती है (उसी प्रकार दुर्योधनने उन्हें अग्रसर नहीं होने दिया)

他们未能越过你的儿子,正如海滨堤岸不许那“摩伽罗之所”(大海)逾越。即便看见你的将士背离战阵而奔逃,那些善射的般度摩诃车战勇士也无法跨过你的儿子继续推进;如同岸阻海潮,难敌亦使他们不得前行。

Verse 563

यदेक॑ सहिता: पार्था न शेकुरतिवर्तितुम्‌ । उस समय हमलोगोंने आपके पुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि कुन्तीके सभी पुत्र एक साथ प्रयत्न करनेपर भी उसे लाँधकर आगे न जा सके

三阇耶说道:即便普利塔之子(般度五子)同心合力如一人,也不能越过他。就在那一刻,我们见识了你儿子惊人的神勇:纵使昆蒂诸子一齐奋力,也无法跨越他而继续推进。

Verse 586

यत्र यातान्न वा हन्यु: पाण्डवा: कि सृतेन व: । “अरे! इस तरह भागनेसे क्या लाभ है? मैं पृथ्वीमें या पर्वतोंपर ऐसा कोई स्थान नहीं देखता, जहाँ जानेपर तुम्हें पाण्डव मार न सकें

三阇耶说道:“喂!如此奔逃有何益处?你们能逃往何处,使般度诸子不能击杀你们?我看不见大地之上——甚至群山之间——有任何地方,能让你们一旦到了那里,便可免于被般度诸子所杀。”

Verse 656

अचिरेणैव तॉल्लोकान्‌ हतो युद्धे समश्चुते । “कौरवो! वीर पुरुष शत्रुको मारकर इह लोकमें सुख भोगता है और यदि मारा गया तो वह परलोकमें जाकर महान्‌ फलका भागी होता है; अतः युद्धधर्मसे बढ़कर स्वर्गकी प्राप्तिके लिये दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है। युद्धमें मारा गया वीर पुरुष थोड़ी ही देरमें उन प्रसिद्ध पुण्यलोकोंमें जाकर सुख भोगता है”

三阇耶说道:“不久之后,战场上殒落的勇士便将抵达那些闻名的功德之界。噢,俱卢族之人!英雄若能斩杀仇敌,便在此世享乐;若自身战死,则往彼世而得大果报。因此,为求天界,再无比战斗之法(dharma)更为吉祥的道路。战死之英雄顷刻之间便至那些著名的福德净土,安享其乐。”

Verse 663

पुनरेवाभ्यवर्तन्त पाण्डवानाततायिन: । दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब राजा उसका आदर करते हुए पुनः आततायी पाण्डवोंका सामना करनेके लिये लौट आये

桑阇耶说:他们又一次折返,去迎战般度五子,并将其称作“挑衅的侵略者”。听到都利约陀那的话,诸王对他表示敬从,遂再度回身,去与般度军交锋。

Verse 673

प्रत्युद्ययुस्तदा पार्था जयगृद्धा: प्रमन्‍्यव: । उनके आक्रमण करते ही अपनी सेनाका व्यूह बनाकर प्रहारकुशल, विजयाभिलाषी तथा बढ़े हुए क्रोधवाले पाण्डव शीघ्र ही उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े

桑阇耶说:其时,普利塔之子迎着来攻奋然前出,渴求胜利,义愤炽盛。他们结成战阵,出手娴熟,般度五子迅疾推进,迎击逼近的敌军。

Frequently Asked Questions

The pressure point is command duty under destabilizing shock: leaders must choose between direct confrontation, controlled retreat, and coordinated response to protect the larger formation while maintaining operational integrity.

The episode privileges composure and coordination: rapid adaptation (dismounting, regrouping, focused targeting) is presented as the practical wisdom that converts panic into a reversible tactical situation.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter’s significance is primarily narrative-functional, illustrating late-war volatility and the karmic narrowing of outcomes through concrete battlefield causality.