Adhyaya 46
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 4662 Verses

Adhyaya 46

Brahmā’s Instruction on Brahmacarya, Vānaprastha, and the Aliṅga Path (Ethics of Non-attachment)

Upa-parva: Mokṣa–Dharma Upadeśa (Renunciant Discipline Discourse)

This chapter is a prescriptive discourse attributed to Brahmā, presenting a graduated discipline across life-stages and culminating in a liberation-oriented ideal. It first defines the exemplary brahmacārin: study according to capacity, strict continence, sensory restraint, truthfulness, purity, service to the guru, regulated food with permission, daily fire offerings, simple staff and ochre-toned garments, and constant svādhyāya. It then outlines vānaprastha conduct: withdrawal to the forest, bark/skin clothing, morning ablutions, avoidance of village life, hospitality to guests, subsistence on roots, fruits, leaves, and grains, and controlled speech and appetite. The final movement describes the mokṣa-seeker’s mendicant discipline: offering fearlessness to beings, acting without possessiveness, accepting unsolicited and minimal sustenance, avoiding accumulation, maintaining equanimity in gain/loss, and practicing non-harm, truth, straightforwardness, non-anger, and non-slander. The chapter emphasizes inward withdrawal (tortoise-like retraction of senses), freedom from dualities and egoism, and the ‘aliṅga’ (non-marked, non-display) mode of practice—moving in the world without ostentation. It concludes with an analytic enumeration of constituents (senses, elements, mind, intellect, self, unmanifest) to be discerned and relinquished, resulting in release from bonds and attainment of the highest state.

Chapter Arc: ब्रह्मा महर्षियों से कहते हैं—पूर्वोक्त मार्ग के अनुसार ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी का धर्म सुनो; मोक्ष की ओर जाने वाला पथ आचरण की सूक्ष्मताओं में छिपा है। → व्रत-जीवन की कठोरता क्रमशः तीव्र होती जाती है: गुरु-आज्ञा से भोजन, अन्न की निन्दा न करना, भिक्षा-आधारित निर्वाह, बिना याचना/संकल्प के जो मिले उसी में संतोष, स्वाद-लोलुपता का त्याग, और लोक-अपमान सहकर भी सत्धर्म की निन्दा न करना। → मोक्षविद् संन्यासी का शिखर-लक्षण उद्घोषित होता है—वह न किसी को उद्वेग देता है, न किसी से स्वयं उद्विग्न होता है; सर्वभूतों का विश्वासी बनकर, रस-आस्वाद से परे, केवल प्राणधारण हेतु यथामात्र भोजन करता है। → आचार-सम्पन्न मुनि की परिभाषा स्थिर होती है: लोक-तिरस्कार सहकर भी शान्ति, शुचिता, इन्द्रियनिग्रह, और विवेक-चिन्तन (इन्द्रिय-विषय, पंचमहाभूत, मन-बुद्धि-अहंकार, प्रकृति-पुरुष) द्वारा बन्धनों से विमुक्ति; फलस्वरूप स्वर्ग/उर्ध्वगति का आश्वासन।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। ःडिज षट्चत्वारिशो5 ध्याय: ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन ब्रह्मोवाच एवमेतेन मार्गेण पूर्वोक्तेन यथाविधि । अधीतवान्‌ यथाशक्ति तथैव ब्रह्म॒चर्यवान्‌,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षिगण! इस प्रकार इस पूर्वोक्त मार्गके अनुसार गृहस्थको यथावत्‌ आचरण करना चाहिये एवं यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान्‌ बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनि-व्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे

梵天说道:“正当如此——循此前所述之道,依正当之法——当如法而住。既已量力而学,又守梵行(brahmacarya)之誓者,当安住于自身之本分:使己成学者,摄伏诸根,奉行牟尼之戒律,勤行令师长欢喜且有益之事,言说真实,常依于法(dharma)与清净。”

Verse 2

स्वधर्मनिरतो विद्वान्‌ सर्वेन्द्रिययतो मुनि: । गुरो: प्रियहिते युक्त: सत्यधर्मपर: शुचि:,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षिगण! इस प्रकार इस पूर्वोक्त मार्गके अनुसार गृहस्थको यथावत्‌ आचरण करना चाहिये एवं यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान्‌ बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनि-व्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे

风神(Vāyu)说道:“当令其安住于自分之职分,而成真实之学者。又当如持戒之牟尼,摄伏一切诸根。应勤于令师长欢喜且有益之事,言说真实,常依正法,并自守清净。”

Verse 3

गुरुणा समनुज्ञातो भुज्जीतान्नमकुत्सयन्‌ । हविष्यभैक्ष्यभुक्‌ चापि स्थानासनविहारवान्‌,गुरुकी आज्ञा लेकर भोजन करे। भोजनके समय अन्नकी निन्दा न करे। भिक्षाके अन्नको हविष्य मानकर ग्रहण करे। एक स्थानपर रहे। एक आसनसे बैठे और नियत समयमें भ्रमण करे

风神(Vāyu)说道:“得师长许可,然后受食,且不可讥毁其食。纵以乞食为生,亦当将所乞之食视同哈维斯(havis)——祭祀之供献而受之。应安住一处,守一坐席,外出行步亦唯在所定之时。”

Verse 4

द्विकालमन्निं जुद्दान: शुचिर्भूत्वा समाहित: । धारयीत सदा दण्डं बैल्वं पालाशमेव वा,पवित्र और एकाग्रचित्त होकर दोनों समय अग्निमें हवन करे। सदा बेल या पलाशका दण्ड लिये रहे

风神伐由(Vāyu-deva)说道:“当人使自身清净,克制其身心,并摄心专一时,应于每日两时向圣火中奉献供物;又当常持以毕尔瓦(bilva)木所制之杖,或以帕拉沙(palāśa)木所制之杖。如此,清净、定持与如法之祭祀得以维系,作为达摩之根基。”

Verse 5

क्षौीमं कार्पासिकं चापि मृगाजिनमथापि वा । सर्व काषायरक्तं वा वासो वापि द्विजस्य ह,रेशमी अथवा सूती वस्त्र या मृगचर्म धारण करे। अथवा ब्राह्मणके लिये सारा वस्त्र गेरुए रंगका होना चाहिये

风神伐由说道:“对于再生者(尤指婆罗门),衣服可以是麻布、棉布,甚至鹿皮;或其衣皆可尽染赭红。经文由此规定苦行与持戒之人的可许衣制——崇尚简朴、节制与对清净及达摩的昭然誓守,而非奢华。”

Verse 6

मेखला च भवेन्मौज्जी जटी नित्योदकस्तथा । यज्ञोपवीती स्वाध्यायी अलुब्धो नियतव्रत:,ब्रह्मचारी मूँजकी मेखला पहने, जटा धारण करे, प्रतिदिन स्नान करे, यज्ञोपवीत पहने, वेदके स्वाध्यायमें लगा रहे तथा लोभहीन होकर नियमपूर्वक व्रतका पालन करे

伐由宣示持戒梵行者(brahmacārin)之标志:“当系以茅草(muñja)所成之腰带,常留结发(jaṭā),日日沐浴,佩戴圣线(yajñopavīta),专勤于吠陀自习(svādhyāya);又当离贪,依戒守誓,以恒常节制而行。”

Verse 7

पूताभिश्न तथैवाद्धिः सदा दैवततर्पणम्‌ । भावेन नियत: कुर्वन्‌ ब्रह्मचारी प्रशस्यते,जो ब्रह्मचारी सदा नियमपरायण होकर श्रद्धाके साथ शुद्ध जलसे नित्य देवताओंका तर्पण करता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है

伐由说道:“凡为梵行者而誓戒坚固者,常以净水向诸天行奠水供养(tarpana),并以真信与正意而行,则处处受人称赞。此等有纪律的虔敬,被奉为楷模之行。”

Verse 8

एवं युक्तो जयेल्लोकान्‌ वानप्रस्थो जितेन्द्रिय: । न संसरति जातीषु परमं स्थानमाश्रित:,इसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले उत्तम गुणोंसे युक्त जितेन्द्रिय वानप्रस्थी पुरुष भी उत्तम लोकोंपर विजय पाता है। वह उत्तम स्थानको पाकर फिर इस संसारमें जन्म धारण नहीं करता

“同样地,具足前述胜妙德行、已制伏诸根的林居者(vānaprastha),亦能得胜于诸善妙世界;既依止于至上之境,便不复于此轮回中再受生。”

Verse 9

संस्कृत: सर्वसंस्कारैस्तथैव ब्रह्मचर्यवान्‌ । ग्रामान्निष्क्रम्य चारण्ये मुनि: प्रत्रजितो वसेत्‌,वानप्रस्थ मुनिको सब प्रकारके संस्कारोंके द्वारा शुद्ध होकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए घरकी ममता त्यागकर गाँवसे बाहर निकलकर वनमें निवास करना चाहिये

经由一切净化仪轨而自净,并守持梵行之誓者,作为林栖仙人(vānaprastha)的牟尼,应舍离对家宅的执著,出离村落,住于林野。

Verse 10

चर्मवल्कलसंवासी सायं प्रातरुपस्पृशेत्‌ । अरण्यगोचरो नित्य न ग्रामं प्रविशेत्‌ पुन:,वह मृगचर्म अथवा वल्कल-वस्त्र पहने। प्रातः: और सायंकालके समय स्नान करे। सदा वनमें ही रहे। गाँवमें फिर कभी प्रवेश न करे

风神(Vāyu)说道:“当披兽皮或树皮衣而居;于黎明与黄昏沐浴以行净礼;恒住森林之中,永不再入村落。”

Verse 11

अर्चयन्नतिथीन्‌ काले दद्याच्चापि प्रतिश्रयम्‌ । फलपत्रावरैर्मूले: श्यामाकेन च वर्तयन्‌,अतिथिको आश्रय दे और समयपर उनका सत्कार करे। जंगली फल, मूल, पत्ता अथवा सावाँ खाकर जीवन-निर्वाह करे

风神说:“当其时,当敬奉来访之客,并为之施与栖身之所。以野果、树叶、根茎——乃至以黍类之‘śyāmāka’——自养而生,切莫怠慢待客之道。”

Verse 12

प्रवृत्तमुदकं वायुं सर्व वानेयमाश्रयेत्‌ । प्राश्नीयादानुपूर्व्येण यथादीक्षमतन्द्रित:,बहते हुए जल, वायु आदि सब वनकी वस्तुओंका ही सेवन करे। अपने व्रतके अनुसार सदा सावधान रहकर क्रमश: उपर्युक्त वस्तुओंका आहार करे

风神说:“当唯以森林所赐为生——流动之水、清风之气,以及一切野生之物。常怀警觉,守其誓戒之律,依其受戒(dīkṣā)所定之次第而取用。”

Verse 13

समूलफल;भि क्षाभिरचेंदतिथिमागतम्‌ | यद्‌ भक्ष्यं स्थात्‌ ततो दद्याद भिक्षां नित्यमतन्द्रित:,यदि कोई अतिथि आ जाय तो फल-मूलकी भिक्षा देकर उसका सत्कार करे। कभी आलस्य न करे। जो कुछ भोजन अपने पास उपस्थित हो, उसीमेंसे अतिथिको भिक्षा दे

风神说:“若有不期之客到来,当以根茎果实之施舍而敬待之。切不可懈怠。此刻手边有何食物,便当从那同一份中,常常分与宾客其应得之分。”

Verse 14

देवतातिथि पूर्व च सदा प्राश्नीत वाग्यत: । अस्पर्धितमनाश्चैव लघ्वाशी देवताश्रय:,नित्य प्रति पहले देवता और अतिथियोंको भोजन दे, उसके बाद मौन होकर स्वयं अन्न ग्रहण करे। मनमें किसीके साथ स्पर्धा न रखे, हलका भोजन करे, देवताओंका सहारा ले

风神伐由说道:“应当恒常先以食物供奉诸天与来宾;其后,守默而自持,方可进食己餐。心中不与任何人争竞;饮食宜清淡,并以诸天为依止而生活。”

Verse 15

दान्तो मैत्र: क्षमायुक्त: केशान्‌ श्मश्रुच धारयन्‌ । जुद्दन्‌ स्वाध्यायशीलश्च सत्यधर्मपरायण:,इन्द्रियोंका संयम करे, सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे, क्षमाशील बने और दाढ़ी-मूँछ तथा सिरके बालोंको धारण किये रहे। समयपर अग्निहोत्र और वेदोंका स्वाध्याय करे तथा सत्य-धर्मका पालन करे

风神伐由说道:“当自制而和善,具忍耐之德,并留发留须。应如法护持圣火(行阿耆尼火供 agnihotra),笃志于吠陀自习,安住于真实与达摩之中。”

Verse 16

शुचिदेह: सदा दक्षो वननित्य: समाहित: । एवं युक्तो जयेत्‌ स्वर्ग वानप्रस्थो जितेन्द्रिय:,शरीरको सदा पवित्र रखे। धर्म-पालनमें कुशलता प्राप्त करे। सदा वनमें रहकर चित्तको एकाग्र किये रहे। इस प्रकार उत्तम धर्मोको पालन करनेवाला जितेन्द्रिय वानप्रस्थी स्वर्गपर विजय पाता है

风神伐由说道:“林居者当常保其身清净,于达摩之职恒勤且能,长住林野,心神摄持。如此修持而自制者——已降伏诸根的婆那普拉斯塔(vānaprastha)——便能赢得天界。”

Verse 17

गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थो5थ वा पुन: । य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रयेत्‌,ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ कोई भी क्‍यों न हो, जो मोक्ष पाना चाहता हो, उसे उत्तम वृत्तिका आश्रय लेना चाहिये

风神伐由说道:“无论为居家者、梵行学子,或林居者——凡真欲趋向解脱者,当依止最上之行仪。”

Verse 18

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत्‌ । सर्वभूतसुखो मैत्र: सर्वेन्द्रिययतो मुनि:,(वानप्रस्थकी अवधि पूरी करके) सम्पूर्ण भूतोंको अभय-दान देकर कर्म-त्यागरूप संन्यास-धर्मका पालन करे। सब प्राणियोंके सुखमें सुख माने। सबके साथ मित्रता रखे। समस्त इन्द्रियोंका संयम और मुनि-वृत्तिका पालन करे

风神伐由说道:“既已赐予一切众生无畏,当行出离之律——三尼亚萨(sannyāsa)——所作不为私欲。以众生安乐为己乐,待人皆友,摄伏诸根,并守圣贤之行。”

Verse 19

अयाचितमसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया । कृत्वा प्राह्ने चरेद्‌ भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने

风神伐由说道:“他只应接受那不经乞求、不经筹谋、偶然自至之物。既尽其日常之责,至正午当出行乞食;并应在众人已食之后与之同处而食——取那‘无烟之食’,即非为他特意烹煮之食。”

Verse 20

वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित्‌ । बिना याचना किये, बिना संकल्पके दैवात्‌ जो अन्न प्राप्त हो जाय, उस भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करे। प्रातःकालका नित्यकर्म करनेके बाद जब गृहस्थोंके यहाँ रसोई-घरसे धुआँ निकलना बंद हो जाय, घरके सब लोग खा-पी चुकें और बर्तन धो-माजकर रख दिये गये हों, उस समय मोक्षधर्मके ज्ञाता संन्यासीको भिक्षा लेनेकी इच्छा करनी चाहिये ।। १९६ || लाभेन च न हृष्येत नालाभे विमना भवेत्‌ | न चातिकभिक्षां भिक्षेत केवलं प्राणयात्रिक:,भिक्षा मिल जानेपर हर्ष और न मिलनेपर विषाद न करे। (लोभवश) बहुत अधिक भिक्षाका संग्रह न करे। जितनेसे प्राण-यात्राका निर्वाह हो उतनी ही भिक्षा लेनी चाहिये

风神伐由说道:“通达解脱之人,当在时机成熟时方求乞食——不哀求,不筹算,随命运所赐之食而知足。清晨诸行既毕,唯待居家之人灶火已息、炊烟已断,家人皆已用餐,器皿洗净收好,然后方可出行乞。得施则不喜形于色,不得施亦不自沮丧。不可因贪而聚敛过多,只取足以维系生命旅程之量。”

Verse 21

यात्रार्थी कालमाकाडूक्षेश्षरेद्‌ भैक्ष्यं समाहित: । लाभं॑ साधारण नेच्छेन्न भुज्जीताभिपूजित:,संन्यासी जीवन-निर्वाहके ही लिये भिक्षा माँगे। उचित समयतक उसके मिलनेकी बाट देखे। चित्तको एकाग्र किये रहे। साधारण वस्तुओंकी प्राप्तिकी भी इच्छा न करे। जहाँ अधिक सम्मान होता हो, वहाँ भोजन न करे

风神伐由说道:“出家行者乞食只为维系行旅与生计,当守候适当之时而受施,心神收摄,专注警觉。他连寻常之利亦不应贪求;在过度礼敬、过分尊崇之处,也不应受食。”

Verse 22

अभिपूजितलाभाद्धि विजुगुप्सेत भिक्षुक: | भुक्तान्यन्नानि तिक्तानि कषायकटुकानि च,मान-प्रतिष्ठाके लाभसे संन्यासीको घृणा करनी चाहिये। वह खाये हुए तिक्त, कसैले तथा कड़वे अन्नका स्वाद न ले

风神伐由说道:“乞士当厌弃因受特别礼敬与颂扬而得的所得。其所受用之食,当唯取他人已食之余——苦、涩、辛辣之味——使其不为滋味、安逸与名位之求所缚。其义在于:出家者须防骄慢与世间声望;它们如财富一般,亦能暗中系缚其心。”

Verse 23

नास्वादयीत भुगज्जानो रसांश्व मधुरांस्तथा । यात्रामात्रं च भुज्जीत केवलं प्राणधारणम्‌,भोजन करते समय मधुर रसका भी आस्वादन न करे। केवल जीवन-निर्वाहके उद्देश्यसे प्राण-धारणमात्रके लिये उपयोगी अन्नका आहार करे

风神伐由说道:“即便在进食之时,也不可沉溺于品尝甘甜之味。所取之食,当仅限于人生旅程所需之量——唯为维持呼吸与生命而食。”

Verse 24

असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत मोक्षवित्‌ न चान्यमन्नं लिप्सेत भिक्षमाण: कथंचन,मोक्षके तत्त्वको जाननेवाला संन्यासी दूसरे प्राणियोंकी जीविकामें बाधा पहुँचाये बिना ही यदि भिक्षा मिल जाती हो तभी उसे स्वीकार करे। भिक्षा माँगते समय दाताके द्वारा दिये जानेवाले अन्नके सिवा दूसरा अन्न लेनेकी कदापि इच्छा न करे

风神伐由说道:“知解脱之道者,当求其生计而不妨害诸有情之生存。乞食之时,无论何种情形,切莫贪求施主自愿布施之外的别样食物。”

Verse 25

न संनिकाशयेद्‌ धर्म विविक्ते चारजाश्षरेत्‌ | शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा,उसे अपने धर्मका प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। रजोगुणसे रहित होकर निर्जन स्थानमें विचरते रहना चाहिये। रातको सोनेके लिये सूने घर, जंगल, वृक्षकी जड़, नदीके किनारे अथवा पर्वतकी गुफाका आश्रय लेना चाहिये। ग्रीष्मकालमें गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं रहना चाहिये, किंतु वर्षाकालमें किसी एक ही स्थानपर रहना उचित है

风神伐由说道:“不应炫示自身之法。远离罗阇斯的躁动,当行于幽僻之处。夜间歇息,可依止空屋、林野、树根之下,或河岸之畔。”

Verse 26

प्रतिश्रयार्थ सेवेत पार्वतीं वा पुनर्गुहाम्‌ ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत्‌,उसे अपने धर्मका प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। रजोगुणसे रहित होकर निर्जन स्थानमें विचरते रहना चाहिये। रातको सोनेके लिये सूने घर, जंगल, वृक्षकी जड़, नदीके किनारे अथवा पर्वतकी गुफाका आश्रय लेना चाहिये। ग्रीष्मकालमें गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं रहना चाहिये, किंतु वर्षाकालमें किसी एक ही स्थानपर रहना उचित है

风神伐由说道:“为求栖身之所,可投宿于荒屋,或再入山中洞窟。夏时在村中只住一夜;雨季则宜安住一处。”

Verse 27

अध्वा सूर्येण निर्दिष्ट: कीटवच्च चरेन्महीम्‌ । दयार्थ चैव भूतानां समीक्ष्य पृथिवीं चरेत्‌

“当循日神所指之路,行于大地如微虫一般——谦卑而无傲慢。又为怜悯一切众生,当周行观察世间。”

Verse 28

पूताभिरद्धिर्नित्यं वै कार्य कुर्वीत मोक्षवित्‌

风神伐由说道:“通达解脱者,当恒常以清净之法行应行之事——内外洁净,行持有律——使所作之业成为自由之助缘,而非系缚之因。”

Verse 29

अहिंसा ब्रह्मचर्य च सत्यमार्जवमेव च,अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना--इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे। इन्द्रियोंको वशमें रखे

风神伐由说道:“不害(阿希摩萨)、梵行的清净自制、真实与坦直——并且无嗔、舍弃挑人过失之习、制御诸根、以及不作传话搬弄之人——此为八种誓戒。应当恒常以警觉之力守护之,使诸根常在自我主宰之下。”

Verse 30

अक्रोधश्वानसूया च दमो नित्यमपैशुनम्‌ । अष्टस्वेतेषु युक्त: स्याद्‌ व्रतेषु नियतेन्द्रिय:,अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना--इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे। इन्द्रियोंको वशमें रखे

“无嗔、无嫉毁之心,恒常自制,不作搬弄是非之人;能制御诸根者,当安住于此八戒之中。”

Verse 31

अपापमशतं वृत्तमजिद्दां नित्यमाचरेत्‌ । जोषयेत सदा भोज्यं ग्रासमागतमस्पृह:,उसे सदा पाप, शठता और कुटिलतासे रहित होकर बर्ताव करना चाहिये। नित्यप्रति जो अन्न अपने-आप प्राप्त हो जाय, उसको ग्रहण करना चाहिये, किंतु उसके लिये भी मनमें इच्छा नहीं रखनी चाहिये

风神伐由天说道:“当恒常行于无罪之道——不欺诳,不诡曲。凡有一口食物自然而至,当受而食之;然心中仍须无所贪求,即便对那一口也不生渴望。”

Verse 32

यात्रामात्रं च भुज्जीत केवल प्राणयात्रिकम्‌ | धर्मलब्धमथाश्रीयान्न काममनुवर्तयेत्‌,प्राणयात्राका निर्वाह करनेके लिये जितना अन्न आवश्यक है, उतना ही ग्रहण करे। धर्मतः प्राप्त हुए अन्नका ही आहार करे। मनमाना भोजन न करे

风神伐由天说道:“当只食维持生命所必需之量——唯足以续命养气者。应食由法(达摩)所得之食,不可随逐贪欲与放纵之口腹。”

Verse 33

ग्रासादाच्छादनादन्यन्न गृह्लीयात्‌ कथंचन । यावदाहारयेत्‌ तावत्‌ प्रतिगृह्लीत नाधिकम्‌,खानेके लिये अन्न और शरीर ढकनेके लिये वस्त्रके सिवा और किसी वस्तुका संग्रह न करे। भिक्षा भी, जितनी भोजनके लिये आवश्यक हो, उतनी ही ग्रहण करे, उससे अधिक नहीं

风神伐由天说道:“除饮食所需与蔽体之衣外,切莫受取或积藏他物。即便受施取食,也当只取足供一餐之量——不可多取。”

Verse 34

परेभ्यो न प्रतिग्राह्मूं न च देयं कदाचन । दैन्यभावाच्च भूतानां संविभज्य सदा बुध:,बुद्धिमान्‌ संन्यासीको चाहिये कि दूसरोंके लिये भिक्षा न माँगे तथा सब प्राणियोंके लिये दयाभावसे संविभागपूर्वक कभी कुछ देनेकी इच्छा भी न करे

风神(Vāyu)说道:“有智慧的出家行者不应从他人处受取馈赠,也不应以行施舍之心而有所给予。相反,出于对困厄众生的悲悯,他应恒常将自己所得如法分配、适当分享——不夹杂私欲,不求显耀,不生执著。”

Verse 35

नाददीत परस्वानि न गृह्नीयादयाचित: । न किंचिद्‌ विषयं भुक्त्वा स्पृहयेत्‌ तस्य वै पुन:,दूसरोंके अधिकारका अपहरण न करे। बिना प्रार्थनाके किसीकी कोई वस्तु स्वीकार न करे। किसी अच्छी वस्तुका उपभोग करके फिर उसके लिये लालायित न रहे

风神(Vāyu)说道:“不可夺取他人之物;除非对方自愿奉与并请你受纳,否则不可接受他人财物。并且,既已享用任何感官之境,也不可再度贪恋追求。”

Verse 36

मृदमापस्तथाजन्नानि पत्रपुष्पफलानि च | असंवृतानि गृह्नीयात्‌ प्रवृत्तानि च कार्यवान्‌,मिट्टी, जल, अन्न, पत्र, पुष्प और फल--ये वस्तुएँ यदि किसीके अधिकारमें न हों तो आवश्यकता पड़नेपर क्रियाशील संन्यासी इन्हें काममें ला सकता है

风神(Vāyu)说道:“土(泥)、水、食物,以及叶、花、果——若这些不在任何人受护持的占有之下,则为履行必要之事而行的出家行者,在需要时可以取用。此乃随需而行的许可,不违背法(dharma)。”

Verse 37

न शिल्पजीविकां जीवेद्धिरण्यं नोत कामयेत्‌ । न द्वेष्ठा नोपदेष्टा च भवेच्च निरुपस्कृत:,वह शिल्पकारी करके जीविका न चलावे, सुवर्णकी इच्छा न करे। किसीसे द्वेष न करे और उपदेशक न बने तथा संग्रहरहित रहे

风神(Vāyu)说道:“不可凭手艺或买卖为生,也不可贪求黄金。对任何人都不怀怨憎,也不应自居为说教之师。应当无所有、无囤积而住——朴素无饰、无所牵累——使其行持远离贪欲、争竞与依赖。”

Verse 38

श्रद्धापूतानि भुज्जीत निमित्तानि च वर्जयेत्‌ । सुधावृत्तिरसक्तश्न सर्वभूतैरसंविदम्‌,श्रद्धासे प्राप्त हुए पवित्र अन्नका आहार करे। मनमें कोई निमित्त न रखे। सबके साथ अमृतके समान मधुर बर्ताव करे, कहीं भी आसक्त न हो और किसी भी प्राणीके साथ परिचय न बढ़ावे

风神(Vāyu)说道:“当食由信敬(śraddhā)而得、为信敬所净的清净之食;当远离一切动机与盘算。对一切众生,当以甘露(amṛta)般的柔和甜美相待;不著于任何处所,也不与任何生命增广亲昵之系缚。”

Verse 39

आशीर्युक्तानि सर्वाणि हिंसायुक्तानि यानि च । लोकसंग्रहधर्म च नैव कुर्यान्न कारयेत्‌,जितने भी कामना और हिंसासे युक्त कर्म हैं, उन सबका एवं लौकिक कर्मोंका न स्वयं अनुष्ठान करे और न दूसरोंसे करावे

风神伐由说道:凡为求报偿之欲所驱、或染于暴害之行,既不可自作,亦不可使他人代作。又凡仅为世俗称许、维持人情而行之事,若有损于真实之法(正法),亦不当从事。此教诫人克制自利与伤害之业,并戒以差遣他人行恶以逃其咎。

Verse 40

सर्वभावानतिक्रम्य लघुमात्र: परिव्रजेत्‌ सम: सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च,सब प्रकारके पदार्थोकी आसक्तिका उल्लंघन करके थोड़ेमें संतुष्ट हो सब ओर विचरता रहे। स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंके प्रति समान भाव रखे

风神伐由说道:“超越对一切境界与诸物的执著,当如出家行者般云游,少欲知足。对一切众生——无论不动者或动者——皆当平等观之。”

Verse 41

परं नोद्वेजयेत्‌ काचिन्न च कस्यचिद॒द्विजेत्‌ । विश्वास्य: सर्वभूतानामग्रयो मोक्षविदुच्यते,किसी दूसरे प्राणीको उद्वेगमें न डाले और स्वयं भी किसीसे उद्विग्न न हो। जो सब प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है, वह सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष-धर्मका ज्ञाता कहलाता है

不应使任何众生惊惧不安,自己亦不应因任何人而惶惶。能为一切众生所信赖者,被称为最上之人,亦是解脱之法(莫克沙)之知者。

Verse 42

अनागतं च न ध्यायेन्नातीतमनुचिन्तयेत्‌ । वर्तमानमुपेक्षेत कालाकाड्क्षी समाहित:,संन्यासीको उचित है कि भविष्यके लिये विचार न करे, बीती हुई घटनाका चिन्तन न करे और वर्तमानकी भी उपेक्षा कर दे। केवल कालकी प्रतीक्षा करता हुआ चित्तवृत्तियोंका समाधान करता रहे

出家行者不当思虑未至之事,不当追念已逝之事,连当下亦宜置之度外。唯随时而待,摄心安住,使心行寂定。

Verse 43

न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेत्‌ क्वचित्‌ | न प्रत्यक्ष परोक्षं वा किंचिद्‌ दुष्ट समाचरेत्‌,नेत्रसे, मनसे और वाणीसे कहीं भी दोषदृष्टि न करे। सबके सामने या दूसरोंकी आँख बचाकर कोई बुराई न करे

风神伐由说道:“任何时候都不可用眼、用心、用言语去玷污他人——以挑剔过失或怀抱邪念。无论当众明行,还是背人暗作,都不可作任何恶事。”

Verse 44

इन्द्रियाण्युपसंहृत्य कूर्मोडड्रानीव सर्वश: । क्षीणेन्द्रियमनोबुद्धिर्निरीह: सर्वतत्त्ववित्‌,जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकर इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटा ले। इन्द्रिय, मन और बुद्धिको दुर्बल करके निश्वेष्ट हो जाय। सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करे

风神伐由说道:“当尽摄诸根,如龟从四面收敛其肢。使诸根、心与慧对外境皆寂静而柔弱,安住无躁动之求取,遂成通达一切真理原则(tattva)之智者。”

Verse 45

निर्द्धदद्ों निर्ममस्कारो निःस्वाहाकार एव च | निर्ममो निरहंकारो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌,द्वन्दोंसे प्रभावित न हो, किसीके सामने माथा न टेके। स्वाहाकार (अग्निहोत्र आदि)- का परित्याग करे। ममता और अहंकारसे रहित हो जाय, योगक्षेमकी चिन्ता न करे। मनपर विजय प्राप्त करे

风神伐由说道:“当超越诸对待之相(冷暖、得失等),不为其所动;亦不向任何人作卑屈之礼。应舍弃‘娑婆诃’之火供等仪式。无占有之心,无我慢之执,不忧得失与安保(yoga-kṣema),自能摄持——使二相不能摇撼,终得制心之胜。”

Verse 46

निराशीर्निर्गुण: शान्तो निरासक्तो निराश्रय: । आत्मसज्जी च तत्त्वज्ञो मुच्यते नात्र संशय:,जो निष्काम, निर्गुण, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मपरायण और तत्त्वका ज्ञाता होता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे षट्चत्वारिंशो5ध्याय:

风神伐由说道:“无所希求,超越诸古那(guṇa)之戏,内心寂静,不著不缚,不依外缘,坚住于自我(Ātman),而知真实者——此人必得解脱;于此无疑。”

Verse 47

अपादपाणिपृष्ठं तदशिरस्कमनूदरम्‌ । प्रहीणगुणकर्माणं केवलं विमलं स्थिरम्‌,जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण- कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़-मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती

风神伐由说道:“彼自我被了知为无足、无手、无背、无首、无腹——离诸古那之作用与业之作业;独一、清净、不动不摇。若有人如是知自我:不著不缚,超越诸感官之相,不囿于败坏之身,则其人实不死;因为此智安立于不坏、神圣之真实,而此真实平等住于一切众生之中。”

Verse 48

अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दमेव च । अनुगम्यमनासक्तममांसमपि चैव यत्‌,जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण- कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़-मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती

风神伐由说道:“彼自我无香、无味、无触;无形,亦无声。唯由内求而可证得;不著不缚,乃至无肉身之相。凡知人之自我为无手足背首腹等肢分,离诸质与诸业;清净、坚住;超越色味香触声;可知而不执;不系于骨肉之身;无忧、不坏、神圣,并于一切众生中平等安住、恒常一味者——如是知者,不与死亡相遇。”

Verse 49

निश्चिन्तमव्ययं दिव्यं कूटस्थमपि सर्वदा | सर्वभूतस्थमात्मानं ये पश्यन्ति न ते मृता:,जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण- कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़-मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती

风神伐由说道:“凡真能观见自我(我、Ātman)者,知其无忧无惧、不坏不灭、神圣清净、恒常不变,并遍住一切众生之中——此等之人不为死所胜。此教旨指向以正知得解脱:当人认得内在之我不为身躯变迁所触,且普遍内住于万有,则恐惧与必死之缚便失其力。”

Verse 50

न तत्र क्रमते बुद्धिर्नेन्द्रियाणि न देवता: । वेदा यज्ञाक्ष लोकाक्ष न तपो न व्रतानि च,उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती। जहाँ केवल ज्ञानवान्‌ महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं होता; क्योंकि वह बाह्य चिह्लसे रहित मानी गयी है। इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये

风神伐由说道:“在那至上实相之中,理智不能前行,诸根不能抵达,连诸天也不能及。彼处,吠陀与祭祀不得入,凡俗经验之诸世界亦不得入;苦行与誓戒亦不得入。因为它被认为超越一切外在标记。故当了知那无外相之法(dharma),并依其真实本相而行。”

Verse 51

यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिड्रग्रहणा स्मृता । तस्मादलिड्जधर्मज्ञो धर्मतत्त्वमुपाचरेत्‌,उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती। जहाँ केवल ज्ञानवान्‌ महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं होता; क्योंकि वह बाह्य चिह्लसे रहित मानी गयी है। इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये

风神伐由说道:“智者所达之境,被忆为‘无外相之标’。因此,了知那不系于外在标记之法(dharma)者,当修行法之真实精髓。”此教越过仪式与可见的虔敬徽记,劝人以智慧与证悟,向内追求真实。

Verse 52

गूढधर्माश्रितो विद्वान्‌ विज्ञानचरितं चरेत्‌ । अमूढो मूढरूपेण चरेद्‌ धर्ममदूषयन्‌,गुहा धर्ममें स्थित विद्वान्‌ पुरुषको उचित है कि वह विज्ञानके अनुरूप आचरण करे। मूढ़ न होकर भी मूढ़के समान बर्ताव करे, किंतु अपने किसी व्यवहारसे धर्मको कलंकित न करे

风神伐由说道:“智者依止于隐微之法(dharma),当以真实的辨知而行。虽不迷妄,亦可示现为质朴之人,甚至似愚者而行走世间;然其一切所作,决不可玷污、不可损害正法。”

Verse 53

तथैनमवमन्येरन्‌ परे सततमेव हि । यथावृत्तश्नरेच्छान्त: सतां धर्मानकुत्सयन्‌

“如此一来,旁人必将不断轻蔑于他。然而,若有人安然自守,随顺事势之自然来去而知足,不讥毁善人所奉持的正道,则其心常定,超越此等讥评。”

Verse 54

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्ष महाभूतानि पडच च,ततः स्वर्गमवाप्रोति विमुक्त: सर्वबन्धनै: | जो मनुष्य इन्द्रिय, उनके विषय, पठचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष --इन सबका विचार करके इनके तत्त्वका यथावत्‌ निश्चय कर लेता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है

风神伐由说道:凡能如实辨明诸根与其所缘境,并洞察五大之真实体性者,便能解脱一切系缚,由此得升天界。其伦理旨趣在于返观内心:解脱不在外在征服,而在于明知与离著——不再执取那束缚有身之生的诸要素。

Verse 55

मनो बुद्धिरहंकारमव्यक्तं पुरुषं तथा । एतत्‌ सर्व प्रसंख्याय यथावत्‌ तत्त्वनिश्चयात्‌

风神伐由说道:“意(manas)、慧(buddhi)、我执(ahaṃkāra)、未显之本原(avyakta),以及人我之灵(Puruṣa)——将这一切依其正当次第悉数分辨列举,便能对真实得出坚固的定断。”

Verse 56

एतावदन्तवेलायां परिसंख्याय तत्त्ववित्‌,जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है

风神伐由说道:“因此,在生命的最后时刻,通达真实者——既已细致推究并了悟这些原理——独坐幽寂之处,观想至上之我。犹如清风自在行于长空,他脱离一切执著;超越五鞘(pañca-kośa),无惧无依,得解脱而证至上我。”

Verse 57

ध्यायेदेकान्तमास्थाय मुच्यते5थ निराश्रय: । निर्मुक्त: सर्वसड्रेभ्यो वायुराकाशगो यथा,जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है

风神伐由说道:“当依止独处而修观;继而无所依凭,便得解脱。离一切执著——如风行于旷空——通达真实者于命终之际,证得解脱,抵达至上之我。”

Verse 58

क्षीणकोशो निरातड्कस्तथेदं प्राप्तुयात्‌ परम्‌,जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है

风神伐由说道:“他成为五鞘已尽、无所怖畏之人;由此得达至上。通达真实者于最后时刻——既已获得对这些原理的真知,独坐幽寂——观想至上之我。犹如清风行于长空,他从一切执著中滑脱而出;离五鞘、无惧无依,得解脱而证至上我。”

Verse 273

संचयांश्व न कुर्वीत स्नेहवासं च वर्जयेत्‌ । जबतक सूर्यका प्रकाश रहे तभीतक संन्यासीके लिये रास्ता चलना उचित है। वह कीड़ेकी तरह धीरे-धीरे समूची पृथ्वीपर विचरता रहे और यात्राके समय जीवोंपर दया करके पृथ्वीको अच्छी तरह देख-भालकर आगे पाँव रखे। किसी प्रकारका संग्रह न करे और कहीं भी आसक्तिपूर्वक निवास न करे

风神伐由说道:“出家行者不应积聚财物,也当远离因执著而定居一处。唯有日光尚在之时,云游苦行者方宜行走于道路。应如微小生灵般缓缓而行,遍游大地;旅途中以慈悲护念众生,当细察脚下之地,步步谨慎而下。不可作任何囤积,亦不可在任何地方以贪恋之心久住。”

Verse 286

उपस्पृशेदुद्धृताभिरद्धिश्व॒ पुरुष: सदा । मोक्ष-धर्मके ज्ञाता संन्यासीको उचित है कि सदा पवित्र जलसे काम ले। प्रतिदिन तुरंत निकाले हुए जलसे स्नान करे (बहुत पहलेके भरे हुए जलसे नहीं)

风神伐由天说道:“人应当恒常以新汲之水行净化之仪。尤其是通达解脱之法而住于出离的出家者,更应依止清净之水,每日以当下汲取的水沐浴,不可用久贮之水。”

Verse 533

य एवं वृत्तसम्पन्न: स मुनि: श्रेष्ठ उच्यते । जिस कामके करनेसे समाजके दूसरे लोग अनादर करें, वैसा ही काम शान्त रहकर सदा करता रहे, किंतु सत्पुरुषोंके धर्मकी निन्‍दा न करे। जो इस प्रकारके बर्तावसे सम्पन्न है, वह श्रेष्ठ मुनि कहलाता है

风神伐由说道:“具足如此严整行持者,称为诸牟尼之最胜。纵使世人轻慢他所从事之事,他亦当安然不动,恒行其正;然决不可诋毁贤善之人的法。以此等行仪圆满者,方是真正最上之牟尼。”

Verse 556

ततः स्वर्गमवाप्रोति विमुक्त: सर्वबन्धनै: | जो मनुष्य इन्द्रिय, उनके विषय, पठचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष --इन सबका विचार करके इनके तत्त्वका यथावत्‌ निश्चय कर लेता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है

于是他得至天界,解脱一切系缚。凡能观照诸根及其境、五大、心、智、我执,并审察普拉克里蒂(Prakṛti)与普鲁沙(Puruṣa)之诸原理,而对其真实本性作出如实决定者——此人便从一切执著中解脱,抵达天界之境。依伐由之教,解脱始于明辨:知何者仅为自然之构成,何者为见证之自性,则束缚之结自会松解。

Frequently Asked Questions

The chapter addresses how to pursue liberation without social disruption: it resolves the tension by prescribing minimal dependence, non-harm, truthful restraint, and a non-ostentatious (aliṅga) practice that avoids seeking status through visible piety.

Liberation is framed as a practical discipline of restraint and relinquishment: equanimity, non-attachment, and discernment of the constituents of experience culminate in freedom from bonds rather than in external accomplishment.

Yes. The chapter asserts that one who maintains these disciplines—especially non-attachment, sense-withdrawal, and relinquishment of constituents—does not cycle through births and attains the highest state, described as liberation from all bonds.