Mahabharata Adhyaya 117
Drona ParvaAdhyaya 11787 Versesपाण्डव पक्ष की ओर झुकाव—त्रिगर्तों की गजसेना का संहार, कौरव पंक्तियों में भगदड़ और प्रतिरोध का क्षय।

Adhyaya 117

Bhūriśravas–Sātyaki Saṃvāda and Duel; Arjuna’s Intervention (भूरिश्रवाः–सात्यकि संवादः, युद्धम्, अर्जुन-हस्तक्षेपः)

Upa-parva: Sātyaki–Bhūriśravas Saṃgrāma (Episode: Duel and Intervention)

Saṃjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that Bhūriśravas, seeing the battle-ardent Sātyaki approaching, rushes forward in anger and issues a prolonged challenge, forecasting Sātyaki’s defeat and the demoralization of the Pāṇḍava side. Sātyaki replies with controlled derision, dismissing empty boasting and inviting action. The duel escalates through multiple combat registers: intense arrow-exchanges likened to mutual storm-clouds, progressive damage to mounts and weapons, and a transition to dismounted sword-and-shield combat. The fighters circle in tactical patterns, grapple, and strike with trained holds, producing a loud clash compared to rock and thunderbolt. As Sātyaki’s weapons diminish and fatigue sets in, Bhūriśravas gains dominance and drags him, prompting Kṛṣṇa to call Arjuna’s attention to Sātyaki’s peril and to urge protection of Arjuna’s associate. Arjuna acknowledges competing focus on Jayadratha yet acts on Kṛṣṇa’s instruction: with an arrow, he severs Bhūriśravas’ arm holding the sword. The chapter thus crystallizes a battlefield dharma problem: intervention in a duel under conditions of exhaustion and asymmetry, framed by strategic necessity and alliance-duty.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है—राजन्, एकाग्रचित्त होकर सुनो: जिस घड़ी कौरव-सेना का भयंकर निनाद उठा, उसी क्षण शैनेय सात्यकि बिजली की तरह कृतवर्मा पर टूट पड़ा, मानो पाण्डवों की डूबती आशा का दीपक स्वयं रण में उतर आया हो। → दुर्योधन के आदेश से त्रिगर्त और अन्य दल ‘मदर्थे त्यक्तजीविता’ होकर सात्यकि को घेरते हैं। सात्यकि के वज्र-स्पर्शी बाण हाथियों की गजसेना को उथला देते हैं—कोई चक्कर काटता है, कोई लड़खड़ाता है, कोई धराशायी होता है; कौरव योद्धा विमुख होकर इधर-उधर भागते दिखते हैं। पर इसी कोलाहल में जलसंध जैसे महाबली आगे बढ़ते हैं और सात्यकि को रोकने का संकल्प लेते हैं। → जलसंध क्रोध में भरकर शिनि-पौत्र सात्यकि की विशाल छाती पर भारी, भार-सह बाणों से गहरा आघात करता है; फिर भी ‘नाकम्पत महाबाहुः’—सात्यकि विचलित नहीं होता। उसी अडिग क्षण में सात्यकि प्रत्याघात कर जलसंध का वध कर देता है, और रणभूमि पर यह अद्भुत-सा दृश्य बन जाता है कि घायल होकर भी धर्म-रथ का सारथि-योद्धा डगमगाता नहीं। → जलसंध के गिरते ही त्रिगर्तों की गजसेना का संहार पूर्ण होता है; हाथी दल टूटकर भागता है और कौरव पंक्तियाँ बिखरती हैं। कृतवर्मा भी सात्यकि के वेग से दबता है—कौरव पक्ष की ‘आशा’ क्षीण और पाण्डव पक्ष की ‘प्राणवायु’ प्रबल होती है। → पर रण का शोर थमता नहीं—कृतवर्मा और शेष कौरव-वीर पुनः संगठित होने को हैं; सात्यकि आगे किस घेराबंदी में फँसेगा, यह अगले प्रसंग की धार पर छोड़ दिया जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। अप ऋाल पञ्चदशाधिकशततमो< ध्याय: सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय

सञ्जय उवाच—शृणुष्वैकमना राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि। द्राव्यमाणे बले तस्मिन् हार्दिक्येन महात्मना॥ लज्जयावनते पाण्डुसैन्ये तव च हृष्टके। अथागाधे बलाम्भोधौ गाधमिच्छत्सु पाण्डुषु॥ द्वीप इवाभवत् शौर्यात् सात्यकिः शरणप्रदः। तस्य विक्रममाख्यास्ये शृणु राजन् यथातथम्॥

Verse 2

लज्जयावनते चापि प्रहृष्टेश्नापि तावकै: । डीपो य आसीत्‌ पाण्डूनामगाथे गाधमिच्छताम्‌

लज्जयावनते चापि पाण्डुसैन्ये तदा नृप। प्रहृष्टेषु च तावक्येष्वगाधे बलसागरे॥ गाधमिच्छत्सु पाण्डुषु द्वीप इवाभवत् शरणम्। सात्यकिः शौर्यसम्पन्नः पाण्डवानां हिते स्थितः॥

Verse 3

श्रुत्वा स निनदं भीम॑ तावकानां महाहवे । शैनेयस्त्वरितो राजन्‌ कृतवर्माणम भ्ययात्‌,राजन्‌! उस महासमरमें आपके सैनिकोंका भयंकर सिंहनाद सुनकर सात्यकिने तुरंत ही कृतवर्मापर आक्रमण किया

श्रुत्वा स निनदं भीमं तावकानां महाहवे। शैनेयस्त्वरितो राजन् कृतवर्माणमभ्ययात्॥

Verse 4

उवाच सारथिं तत्र क्रोधामर्षसमन्वित: । हार्दिक्याभिमुखं सूत कुरु मे रथमुत्तमम्‌,उन्होंने क्रोध और अमर्षमें भरकर वहाँ सारथिसे कहा--“सूत! तुम मेरे उत्तम रथको कृतवर्माके सामने ले चलो

उवाच सारथिं तत्र क्रोधामर्षसमन्वितः । हार्दिक्याभिमुखं सूत कुरु मे रथमुत्तमम् ॥

Verse 5

कुरुते कदनं पश्य पाण्डुसैन्ये हामर्षित: । एनं जित्वा पुनः सूत यास्यामि विजयं प्रति,“देखो, वह अमर्षयुक्त होकर पाण्डव-सेनामें संहार मचा रहा है। सारथे! इसे जीतकर मैं पुनः अर्जुनके पास चलूँगा”

कुरुते कदनं पश्य पाण्डुसैन्ये हामर्षितः । एनं जित्वा पुनः सूत यास्यामि विजयं प्रति ॥

Verse 6

एवमुक्ते तु वचने सूतस्तस्य महामते । निमेषान्तरमात्रेण कृतवर्माणम भ्ययात्‌,महामते! सात्यकिके ऐसा कहनेपर सारथि पलक गिरते-गिरते रथ लेकर कृतवमकि पास जा पहुँचा

एवमुक्ते तु वचने सूतस्तस्य महामते । निमेषान्तरमात्रेण कृतवर्माणमभ्ययात् ॥

Verse 7

कृतवर्मा तु हार्दिक्य: शैनेयं निशितै: शरै: । अवाकिरत्‌ सुसंक्रुद्धस्ततो5क़्रुद्धयबत्‌ स सात्यकि:

कृतवर्मा तु हार्दिक्यः शैनेयं निशितैः शरैः । अवाकिरत् सुसंक्रुद्धस्ततोऽक्रुद्ध्यत् स सात्यकिः ॥

Verse 8

अथाशु निशितं भल्लं शैनेय: कृतवर्मण: । प्रेषयामास समरे शरांश्व चतुरो5परान्‌,उन्होंने तुरंत ही कृतवर्मापर समरभूमिमें एक तीखे भल्लका प्रहार किया। फिर चार बाण और मारे

अथाशु निशितं भल्लं शैनेयः कृतवर्मणः । प्रेषयामास समरे शरांश्च चतुरोऽपरान् ॥

Verse 9

ते तस्य जध्निरे वाहान्‌ भल्लेनास्याच्छिनद्‌ धनु: । पृष्ठरक्ष॑ं तथा सूतमविध्यन्निशितै: शरै:

ते तस्य जघ्निरे वाहान् भल्लेनास्याच्छिनद् धनुः । पृष्ठरक्षं तथा सूतमविध्यन्निशितैः शरैः ॥

Verse 10

ततस्तं विरथं कृत्वा सात्यकि: सत्यविक्रम: । सेनामस्यार्दयामास शरै: संनतपर्वभि:,तदनन्तर सत्यपराक्रमी सात्यकिने कृतवर्माको रथहीन करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसकी सेनाको पीड़ित करना आरम्भ किया

ततस्तं विरथं कृत्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः । सेनामस्यार्दयामास शरैः संनतपर्वभिः ॥

Verse 11

अभज्यताथ पृतना शैनेयशरपीडिता । ततः प्रायात्‌ स त्वरित: सात्यकि: सत्यविक्रम:,सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो कृतवर्माकी सेना भाग खड़ी हुई। तत्पश्चात्‌ सत्यपराक्रमी सात्यकि तुरंत आगे बढ़ गये

अभज्यताथ पृतना शैनेयशरपीडिता । ततः प्रायात् स त्वरितः सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥

Verse 12

शृणु राजन्‌ यदकरोत्‌ तव सैन्येषु वीर्यवान्‌ । अतीत्य स महाराज द्रोणानीकमहार्णवम्‌,महाराज! पराक्रमी सात्यकिने द्रोणाचार्यके सैन्य-समुद्रको लाँधकर आपकी सेनाओंमें जो पराक्रम किया, उसका वर्णन सुनिये

शृणु राजन् यदकरोत् तव सैन्येषु वीर्यवान् । अतीत्य स महाराज द्रोणानीकमहार्णवम् ॥

Verse 13

पराजित्य तु संहृष्ट: कृतवर्माणमाहवे । यन्तारमब्रवीच्छूर: शनैर्याहीत्यसम्भ्रमम्‌,उस महासमरमें कृतवर्माको पराजित करके हर्षमें भरे हुए शूरवीर सात्यकि बिना किसी घबराहटके सारथिसे बोले--'सूत! धीरे-धीरे चलो'

पराजित्य तु संहृष्टः कृतवर्माणमाहवे । यन्तारमब्रवीच्छूरः शनैर्याहीत्यसम्भ्रमम् ॥

Verse 14

दृष्टवा तु तव तत्‌ सैन्यं रथाश्वद्धिपसंकुलम्‌ । पदातिजनसम्पूर्णमब्रवीत्‌ सारथिं पुन:,रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई आपकी सेनाको देखकर सात्यकिने पुनः सारथिसे कहा--

दृष्ट्वा तु तव तत् सैन्यं रथाश्वद्विपसंकुलम् । पदातिजनसम्पूर्णम् अब्रवीत् सारथिं पुनः ॥

Verse 15

यदेतन्मेघसंकाशं द्रोणानीकस्य सव्यतः । सुमहत्‌ कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम्‌

यदेतन्मेघसंकाशं द्रोणानीकस्य सव्यतः । सुमहत् कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम् ॥

Verse 16

एते हि बहव: सूत दुर्निवाराश्च संयुगे । दुर्योधनसमादिष्टा मदर्थे त्यक्तजीविता:

एते हि बहवः सूत दुर्निवाराश्च संयुगे । दुर्योधनसमादिष्टा मदर्थे त्यक्तजीविताः ॥

Verse 17

(न चाजित्वा रणे होतान्‌ शक: प्राप्तुं जयद्रथ: । नापि पार्थों मया सूत शक्‍्य: प्राप्तुं कथंचन ।।

न चाजित्वा रणे होतान् शक्यः प्राप्तुं जयद्रथः । नापि पार्थो मया सूत शक्यः प्राप्तुं कथंचन ॥ एते तिष्ठन्ति सहिताः सर्वविद्यासु निष्णाताः । राजपुत्रा महेष्वासाः सर्वे विक्रान्तयोधिनः । त्रिगर्तानां रथोदाराः सुवर्णविकृतध्वजाः ॥

Verse 18

मामेवाभिमुखावीरा योत्स्यमाना व्यवस्थिता: । अत्र मां प्रापय क्षिप्रमश्वांश्रोदय सारथे

मामेवाभिमुखा वीरा योत्स्यमाना व्यवस्थिताः । अत्र मां प्रापय क्षिप्रमश्वान् चोदय सारथे ॥

Verse 19

ततः प्रायाच्छनै: सूत: सात्वतस्य मते स्थित:

ततः प्रायाच्छनैः सूतः सात्वतस्य मते स्थितः।

Verse 20

तमूहु: सारथेरवश्या वल्गमाना हयोत्तमा:

तमूहुः सारथेरवश्या वल्गमाना हयोत्तमाः।

Verse 21

आपततन्तं रणे तं तु शड्खवर्णहयोत्तमै:

आपततन्तं रणे तं तु शङ्खवर्णहयोत्तमैः। त्रिगर्ता बहवः शूराः सर्वतोऽस्य समावृताः॥

Verse 22

परिवद्रुस्तत: शूरा गजानीकेन सर्वतः । किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णानू सायकॉल्लघुवेधिन:

परिवद्रुस्ततः शूरा गजानीकेन सर्वतः। किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णान् सायकान् लघुवेधिनः॥

Verse 23

सात्वतो निशितैर्बाणैर्गजानीकमयोधयत्‌ | पर्वतानिव वर्षेण तपान्ते जलदो महान्‌,सात्यकिने भी पैने बाणोंद्वारा गजसेनाके साथ युद्ध प्रारम्भ किया, मानो वर्षाकालमें महान्‌ मेघ पर्वतोंपर जलकी धारा बरसा रहा हो

सात्वतो निशितैर्बाणैर्गजानीकमयोधयत्। पर्वतानिव वर्षेण तपान्ते जलदो महान्॥

Verse 24

वज्राशनिसमस्पर्शर्वध्यमाना: शरैर्गजा: । प्राद्रवन्‌ रणमुत्सूज्य शिनिवीरसमीरितै:

Sañjaya said: Struck by arrows whose touch was like a thunderbolt, the elephants—being grievously wounded—broke into flight, abandoning the battlefield, driven into panic by the assault of Śinivīra’s warrior.

Verse 25

शिनिवंशके वीर सात्यकिद्वारा चलाये हुए वज् और बिजलीके समान स्पर्शवाले उन बाणोंकी मार खाकर उस सेनाके हाथी युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ।।

Sañjaya said: Struck by the arrows loosed by the hero Sātyaki of the Śini line—arrows whose touch was like thunderbolt and lightning—the elephants of that host abandoned the battlefield and fled. Their tusks were shattered; streams of blood ran from their limbs; their temples and frontal globes were split; ears, mouths, and trunks were torn and mangled. Their drivers were slain and their banners and pennants fell. Vital spots were pierced, bells were broken, great standards were cut down; riders were killed and the howdahs slipped and dropped. In that condition, O King, the elephants ran off and sought refuge in different directions—showing how, in war, even the mightiest bodies collapse when violence overwhelms restraint and order.

Verse 26

सम्भिन्नमर्मघण्टाश्न विनिकृत्तमहाध्वजा: । हतारोहा दिशो राजन्‌ भेजिरे भ्रष्टकम्बला:

Sanjaya said: O King, those elephants, their vital spots torn open and their bell-armor shattered, with their great standards hewn down, fled in different directions. Their riders had been slain, and their saddle-cloths had slipped away—so, broken and routed, they sought safety by scattering across the field. The scene underscores the pitiless momentum of battle, where even the mightiest mounts become helpless once protection, leadership, and order collapse.

Verse 27

रुवन्तो विविधान्‌ नादान्‌ जलदोपमनिः:स्वना: । नाराचैर्वत्सदन्तैश्व भल्‍लैरञण्जलिकैस्तथा

Sañjaya said: “Crying out in many different ways, their sounds resembling the rumbling of thunderclouds, they were pierced by Sātyaki’s arrows—nārāca, vatsadanta, bhalla, and añjalika—and thus, wounded and terrified, they raised varied lamentations as they fled.”

Verse 28

क्षुप्रैरर्धचन्द्रैश्न सात्वतेन विदारिता: । क्षरन्तोडसृक्‌ तथा मूत्रं पुरीषं च प्रदुद्रुवु:

Sañjaya said: Torn open by the Sātvata warrior (Sātyaki) with razor-headed and half-moon arrows, they fled in panic—bleeding, and in terror even voiding urine and excrement. The verse underscores the brutal immediacy of battle and the collapse of bodily and mental control under fear.

Verse 29

बभ्रमुश्न स्खलुश्नान्ये पेतुर्मम्लुस्तथापरे । एवं तत्‌ कुञ्जरानीकं युयुधानेन पीडितम्‌

बभ्रमुश्च स्खलुश्चान्ये पेतुर्मम्लुस्तथापरे । एवं तत् कुञ्जरानीकं युयुधानेन पीडितम् ॥

Verse 30

तस्मिन्‌ हते गजानीके जलसंधो महाबल:

तस्मिन् हते गजानीके जलसंधो महाबलः ।

Verse 31

रुक्मवर्मधर: शूरस्तपनीयाड्रद: शुचि:

रुक्मवर्मधरः शूरस्तपनीयाङ्गदः शुचिः । उरसा धारयन् निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम् ॥

Verse 32

कुण्डली मुकुटी खड्गी रक्तचन्दनरूषित: । शिरसा धारयन्‌ दीप्तां तपनीयमयीं स्रजम्‌

कुण्डली मुकुटी खड्गी रक्तचन्दनरूषितः । शिरसा धारयन् दीप्तां तपनीयमयीं स्रजम् ॥

Verse 33

चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन्‌ गजमूर्थनि

चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन् गजमूर्धनि ।

Verse 34

अशोभत महाराज सविद्युदिव तोयद: । महाराज! हाथीकी पीठपर बैठकर अपने सोनेके बने हुए धनुषको हिलाता हुआ जलसंध बिजलीसहित मेघके समान शोभा पा रहा था ।। ३३ $ || तमापतन्तं सहसा मागधस्य गजोत्तमम्‌

अशोभत महाराज सविद्युदिव तोयदः । तमापतन्तं सहसा मागधस्य गजोत्तमम् ॥

Verse 35

नागं निवारितं दृष्टवा शैनेयस्य शरोत्तमै:

नागं निवारितं दृष्ट्वा शैनेयस्य शरोत्तमैः ।

Verse 36

ततः क्रुद्धो महाराज मार्गणैर्भारसाधनै:

ततः क्रुद्धो महाराज मार्गणैर्भारसाधनैः ।

Verse 37

ततो5परेण भल्‍्लेन पीतेन निशितेन च

ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च ।

Verse 38

सात्यकिं छिन्नथन्वानं प्रहसन्निव भारत

सात्यकिं छिन्नधन्वानं प्रहसन्निव भारत ।

Verse 39

अविध्यन्मागधो वीर: पज्चभिरनर्निशितै: शरै: | भारत! धनुष काटनेके पश्चात्‌ सात्यकिको उस मागध वीरने हँसते हुए ही पाँच तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। ३८ $ ।। स विद्धो बहुभिर्बाणैर्जलसंधेन वीर्यवान्‌

सञ्जय उवाच—मागधो वीरः पञ्चभिरतिनिशितैः शरैरविध्यत्। भारत! धनुः छित्त्वा सात्यकेः स मागधवीरः स्मयमान एव पञ्चभिः तीक्ष्णैः शरैः तं विव्याध। ततः स वीर्यवान् जलसन्धो बहुभिर्बाणैर्विद्धोऽपि समरं न जहौ।

Verse 40

अचिन्तयन्‌ वै स शरान्नात्यर्थ सम्भ्रमाद्‌ बली

सञ्जय उवाच—स बली नात्यर्थसम्भ्रमाद् अचिन्तयन् शरान् मुमोच; समरे स्थिरचित्तः सन्निव।

Verse 41

धनुरन्यत्‌ समादाय तिष्ठ तिछेत्युवाच ह । बलवान सात्यकिने उसके बाणोंको कुछ भी न गिनते हुए अधिक संभ्रममें न पड़कर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और कहा--'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह” ।।

सञ्जय उवाच—धनुरन्यत् समादाय बली शैनेयः, तस्य बाणान् तृणवत् अमन्यत; न चात्यर्थं सम्भ्रमं जगाम। ततः स उवाच—“तिष्ठ तिष्ठ” इति। एतावदुक्त्वा शैनेयो जलसन्धं महोरसि विव्याध।

Verse 42

क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन मुष्टिदेशे महद्‌ धनु:

सञ्जय उवाच—क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स महद्धनुर्मुष्टिदेशे विव्याध।

Verse 43

जलसंधस्तु तत्‌ त्यक्त्वा सशरं वै शरासनम्‌

सञ्जय उवाच—जलसन्धस्तु तत् त्यक्त्वा सशरं वै शरासनं चिक्षेप।

Verse 44

तोमरं व्यसृजत्‌ तूर्ण सात्यकिं प्रति मारिष । माननीय नरेश! जलसंधने बाणसहित उस धनुषको त्यागकर सात्यकिपर तुरंत ही तोमरका प्रहार किया ।। ४३ $ ।। स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महारणे

सञ्जय उवाच—मारिष, स तूर्णं सात्यकिं प्रति तोमरं व्यसृजत्। स तु महारणे माधवस्य सव्यं भुजं निर्भिद्य व्यतिष्ठत्॥

Verse 45

निर्भिन्ने तु भुजे सव्ये सात्यकि: सत्यविक्रम:

निर्भिन्ने तु भुजे सव्ये सात्यकिः सत्यविक्रमः। न चचाल महारणे धैर्येण परिपालितः॥

Verse 46

प्रगृह्मा तु ततः खड्गं जलसंधो महाबल:,तब महाबली जलसंधने सौ चन्द्राकार चमकीले चिह्लोंसे युक्त वृषभ-चर्मकी बनी हुई विशाल ढाल और तलवार हाथमें ले ली तथा उस तलवारको घुमाकर सात्यकिपर छोड़ दिया

ततः खड्गं प्रगृह्यैव जलसन्धो महाबलः। वृषचर्ममयीं ढालं चन्द्रचिह्नाङ्कितां महतीं गृहीत्वा, खड्गमाविध्य सात्यकिं प्रति चिक्षेप॥

Verse 47

आर्षभं चर्म च महच्छतचन्द्रकसंकुलम्‌ । आविध्य च तत: खड्गं सात्वतायोत्ससर्ज ह

आर्षभं चर्म महच्च शतचन्द्रकसंकुलम्। ततः खड्गमाविध्य सात्वतायोत्ससर्ज ह॥

Verse 48

शैनेयस्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्‍न्यपतन्महीम्‌ । अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गत:,वह खड्ग सात्यकिके धनुषको काटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। धरतीपर पहुँचकर वह अलातचक्रके समान प्रकाशित हो रहा था

शैनेयस्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्यपतन्महीम्। अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गतः॥

Verse 49

अथान्यद्‌ धनुरादाय सर्वकायावदारणम्‌ | शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम्‌

अथान्यद्धनुरादाय सर्वकायावदारणम् । शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥

Verse 50

ततः साभरणोौ बाहू क्षुराभ्यां माधवोत्तम:

ततः साभरणौ बाहू क्षुराभ्यां माधवोत्तमः ।

Verse 51

तौ बाहू परिघप्रख्यौ पेततुर्गजसत्तमात्‌

तौ बाहू परिघप्रख्यौ पेततुर्गजसत्तमात् ।

Verse 52

वसुंधराधराद्‌ भ्रष्टी पज्चशीर्षाविवोरगौ । उसकी वे परिघके समान मोटी भुजाएँ उस गजराजकी पीठसे नीचे गिर पड़ीं, मानो पर्वतसे पाँच-पाँच मस्तकोंवाले दो नाग पृथ्वीपर गिरे हों ।।

वसुंधराधराद् भ्रष्टे पञ्चशीर्षाविवोरगौ । ततः सुदंष्ट्रं सुमहच्चारुकुण्डलमण्डितम् ॥

Verse 53

तत्पातितशिरोबाहुकबन्धं॑ भीमदर्शनम्‌

तत्पातितशिरोबाहुकबन्धं भीमदर्शनम् ।

Verse 54

द्विरदं जलसंधस्य रुधिरेणा भ्यषिज्चत । मस्तक और भुजाओंके गिर जानेसे अत्यन्त भयंकर दिखायी देनेवाले जलसंधके उस धड़ने अपने खूनसे उस हाथीको नहला दिया ।। ५३ $ ।। जलसंध॑ निहत्याजौ त्वरमाणस्तु सात्वत:

सञ्जय उवाच—जलसन्धस्य रुधिरेण द्विरदः परिषिक्तः। शिरोभुजयोः पतितयोः स तस्य धडः, घोरदर्शनः, स्वशोणितेनैव तम् हस्तिनं स्नापयामास। जलसन्धं निहत्याजौ सात्वतः त्वरमाणः पुनरग्रे जगाम, युद्धकर्मणि प्रवृत्तः॥

Verse 55

रुधिरेणावसिक्ताज़ो जलसंधस्य कुड्जर:

सञ्जय उवाच—जलसन्धस्य कुञ्जरः रुधिरेणावसिक्ताङ्गः, सर्वाङ्गे शोणितलेपेन तमसा इवावृतः प्रत्यक्षतां जगाम॥

Verse 56

शरार्दित: सात्वतेन मर्दमान: स्ववाहिनीम्‌

सञ्जय उवाच—सात्वतेन शरैरार्दितः स मर्द्यमानोऽपि स्ववाहिनीं मध्ये समन्तात् प्रचक्रमे, धैर्यं न जहौ॥

Verse 57

हाहाकारो महानासीत्‌ तव सैन्यस्य मारिष

सञ्जय उवाच—हाहाकारो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष॥

Verse 58

विमुखाश्नवा भ्यधावन्‍न्त तव योधा: समन्तत:

सञ्जय उवाच—विमुखा भयसंविग्नास्तव योधाः समन्ततः प्राद्रवन्॥

Verse 59

एतस्मिन्नन्तरे राजन्‌ द्रोण: शस्त्रभूतां वर:

एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्रोणः शस्त्रभूतानां वरः समभ्यवर्तत।

Verse 60

तमुदीर्ण तथा दृष्टवा शैनेयं नरपुड्रवा:

तमुदीर्णं तथा दृष्ट्वा शैनेयं नरपुङ्गवः समालक्षयत।

Verse 61

द्रोणेनैव सह क्रुद्धा: सात्यकिं समुपाद्रवन्‌ । शिनिपौत्र सात्यकिको बढ़ते देख नरश्रेष्ठ कौरव महारथी द्रोणाचार्यके साथ ही कुपित हो उनपर टूट पड़े ।।

द्रोणेनैव सह क्रुद्धाः सात्यकिं समुपाद्रवन्। ततः प्रववृते युद्धं कुरूणां सात्वतस्य च। द्रोणस्य च रणे राजन् घोरं देवासुरोपमम्॥

Verse 115

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे जलसंधवधो नाम पजञ्चदशाधिकशततमो< ध्याय:

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे जलसंधवधो नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः।

Verse 186

त्रिगर्ती: सह योत्स्यामि भारद्वाजस्य पश्यत: । “ये समस्त वीर मेरी ही ओर मुँह करके युद्ध करनेके लिये खड़े हैं। सारथे! घोड़ोंको हॉको और मुझे शीघ्र ही इनके पास पहुँचा दो। मैं द्रोणाचार्यके देखते-देखते त्रिगर्तोंके साथ युद्ध करूँगा”

त्रिगर्तैः सह योत्स्यामि भारद्वाजस्य पश्यतः। सर्वे मेऽभिमुखा योधाः समरे योधितुं स्थिताः। सारथे हयान् प्रचोदय शीघ्रं मां तेषु नय। द्रोणस्य पश्यतः त्रिगर्तैः सह युध्ये॥

Verse 196

रथेनादित्यवर्णेन भास्वरेण पताकिना । तदनन्तर सात्यकिकी सम्मतिके अनुसार सारथि सूर्यके समान तेजस्वी तथा पताकाओंसे विभूषित रथके द्वारा धीरे-धीरे आगे बढ़ा

सञ्जय उवाच—ततः सम्मतिमनुसृत्य सात्यकिः शनैः शनैरग्रेऽभ्यवर्तत। आदित्यवर्णेन भास्वरेण पताकिना रथेन स तेजसा दीप्तिमानिव सूर्यः समरे प्रावर्तत॥

Verse 206

वायुवेगसमा: संख्ये कुन्देन्दुरजतप्रभा: । उस रथके उत्तम घोड़े कुन्द

सञ्जय उवाच—सङ्ख्ये तस्य रथस्योत्तमा अश्वाः कुन्देन्दुरजतप्रभाः। सारथ्यधीनाः पवनवेगसमाः प्लवमानाः समरे रथभारं वहन्ति स्म॥

Verse 303

यत्त: सम्प्रापयन्नागं रजताश्वरथं प्रति । उस गजसेनाके नष्ट होनेपर महाबली जलसंध युद्धके लिये उद्यत हो श्वेत घोड़ोंवाले सात्यकिके रथके समीप अपना हाथी ले आया

सञ्जय उवाच—गजसेनायां विनष्टायां महाबलः जलसन्धः समराय कृतोत्साहः। रजताश्वरथं सात्यकेः प्रति स्वगजं यत्तः सम्प्रापयामास॥

Verse 326

उरसा धारयन्‌ निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम्‌ | शूरवीर एवं पवित्र जलसंधने अपने शरीरमें सोनेका कवच धारण कर रखा था। उसकी दोनों भुजाओंमें सोनेके ही बाजूबंद शोभा पा रहे थे। दोनों कानोंमें कुण्डल और मस्तकपर किरीट चमक रहे थे। उसके हाथमें तलवार थी और सम्पूर्ण शरीरमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था। उसने अपने सिरपर सोनेकी बनी हुई चमकीली माला और वक्ष:स्थलपर प्रकाशमान पदक एवं कण्ठहार धारण कर रखे थे

सञ्जय उवाच—उरसा धारयन् निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम्। स जलसन्धः शूरवीरः पवित्रे जलसङ्गमे स्थितः सुवर्णकवचधारी। सुवर्णबाहुभूषणैः शोभितभुजः, कुण्डलकिरीटदीप्तः, खड्गहस्तः, रक्तचन्दनलिप्ताङ्गः। शिरसि सुवर्णमालां, वक्षसि च पदकं हारं च प्रकाशमानं दधार॥

Verse 343

सात्यकिर्वारियामास वेलेव मकरालयम्‌ | सहसा अपनी ओर आते हुए मगधराजके उस गजराजको सात्यकिने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको रोक देती है

सञ्जय उवाच—सात्यकिर्वारयामास वेलेव मकरालयम्। सहसा स्वाभिमुखं धावन्तं मगधराजस्य गजराजं स त्वरितं न्यवारयत्, यथा तटभूमिः समुद्रम्॥

Verse 353

अक्कुद्धबत रणे राजन्‌ जलसंधो महाबल: । राजन! सात्यकिके उत्तम बाणोंसे उस हाथीको अवरुद्ध हुआ देख महाबली जलसंध रणक्षेत्रमें कुपित हो उठा

सञ्जय उवाच—राजन्, रणे महाबलो जलसन्धः कुपितोऽभवत्। सात्यक्युत्तमैर्बाणैः स हस्ती यदवरुद्धो निरुद्धश्च दृष्ट्वा, स रणभूमौ क्रोधमाविवेश॥

Verse 373

अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम्‌ | तत्पश्चात्‌ दूसरे तीखे, पैने और पानीदार भल्लसे उसने बाण फेंकते हुए वृष्णिवीर सात्यकिके धनुषको काट डाला

सञ्जय उवाच—अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम्। ततः पुनर्द्वितीयेन तीक्ष्णेन क्षुरप्रेण भल्लेन, शरान् विसृजन्नेव, वृष्णिश्रेष्ठस्य सात्यकेर्धनुश्चिच्छेद॥

Verse 393

नाकम्पत महाबाहुस्तदद्भुतमिवाभवत्‌ | जलसंधके बहुत-से बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत होनेपर भी पराक्रमी महाबाहु सात्यकि कम्पित नहीं हुए। यह अद्भुत-सी बात थी

सञ्जय उवाच—नाकम्पत महाबाहुस्तदद्भुतमिवाभवत्। जलसन्धस्य बहुभिः शरैः क्षतविक्षतोऽपि पराक्रमी सात्यकिः स्थिर एवाभवत्॥

Verse 416

विव्याध षष्ट्या सुभृशं शराणां प्रहसन्निव । ऐसा कहकर सात्यकिने हँसते हुए ही साठ बाणोंद्वारा जलसंधकी चौड़ी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी

सञ्जय उवाच—इत्युक्त्वा सात्यकिः प्रहसन्निव षष्ट्या शराणां सुभृशं विव्याध जलसन्धं, वक्षसि तस्य तीव्रान् बाणान् निपात्य॥

Verse 426

जलसंधस्य चिच्छेद विव्याध च त्रिभि: शरै: | फिर अत्यन्त तीखे क्षुरप्रसे जलसंधके विशाल धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया और तीन बाण मारकर उसे घायल भी कर दिया

सञ्जय उवाच—जलसन्धस्य धनुश्चिच्छेद हस्तग्रहणदेशे, ततस्तं त्रिभिः शरैर्विव्याध च, व्रणान् समजनयत्॥

Verse 446

अभ्यगाद्‌ धरणीं घोर: श्वसन्निव महोरग: । फुफकारते हुए महान्‌ सर्पके समान वह भयंकर तोमर उस महासमरमें सात्यकिकी बायीं भुजाको विदीर्ण करता हुआ धरतीमें समा गया

सञ्जय उवाच—घोरः स तोमरः महोरग इव श्वसन् फूत्कारं कुर्वन् तस्मिन् महासमरे सात्यकेर्बाहुं वामं विदार्य धरणीं प्रविवेश।

Verse 453

त्रिंशद्धिर्विशिखैस्तीक्षैजलसंधमताडयत्‌ । अपनी बायीं भुजाके घायल होनेपर सत्यपराक्रमी सात्यकिने तीस तीखे बाणोंद्वारा जलसंधको आहत कर दिया

सञ्जय उवाच—वामबाहौ व्रणं प्राप्तेऽपि सत्यपराक्रमः सात्यकिः त्रिंशद्भिर्विशिखैस्तीक्ष्णैर्जलसन्धं समताडयत्।

Verse 496

विस्फार्य विव्यधे क्रुद्धो जलसंधं शरेण ह | तब सात्यकिने साखूके तनेके समान विशाल

सञ्जय उवाच—क्रुद्धः स विस्फार्य धनुः शरेणैकेन जलसन्धं विव्याध।

Verse 503

सात्यकिर्जलसंधस्य चिच्छेद प्रहसन्निव | फिर मधुवंशशिरोमणि सात्यकिने हँसते हुए-से दो छुरोंका प्रहार करके जलसंधकी आभूषणभूषित दोनों भुजाओंको काट दिया

सञ्जय उवाच—सात्यकिर्जलसन्धस्य प्रहसन्निव क्षुराभ्यां बाहू चिच्छेद भूषणभूषितौ।

Verse 523

क्षुरेणास्य तृतीयेन शिरश्रिच्छेद सात्यकि: । तदनन्तर सात्यकिने तीसरे छुरेसे उसके सुन्दर दाँतोंवाले मनोहर कुण्डलमण्डित विशाल मस्तकको काट गिराया

सञ्जय उवाच—तृतीयेन क्षुरेण सात्यकिः शिरश्चिच्छेद कुण्डलमण्डितं सुन्दरदशनं महत्।

Verse 543

विमान पातयामास गजस्कन्धाद्‌ विशाम्पते । प्रजानाथ! युद्धस्थलमें जलसंधको मारकर फुर्ती करनेवाले सात्यकिने हाथीकी पीठसे उसके हौदेको भी गिरा दिया

सञ्जय उवाच—विशाम्पते, प्रजानाथ! युद्धस्थले जलसन्धकं हत्वा सात्यकिः शीघ्रपराक्रमः गजस्कन्धाद् विमानं (हौदं) अपि पातयामास।

Verse 553

विलम्बमानमवहत्‌ संश्लिष्टं परमासनम्‌ | खूनसे भीगे शरीरवाला जलसंधका वह हाथी अपनी पीठसे सटकर लटकते हुए उस हौदेको ढो रहा था

सञ्जय उवाच—रुधिरार्द्रतनुः स गजः परमासनसन्निभं तद् विमानं पृष्ठे संश्लिष्टं लम्बमानं विलम्बमानम् अवहत्।

Verse 563

घोरमार्तस्वरं कृत्वा विदुद्राव महागज: । सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो वह महान्‌ गजराज घोर चीत्कार करके अपनी ही सेनाको कुचलता हुआ भाग निकला

सञ्जय उवाच—स महागजः सात्यकिबाणपीडितः घोरमार्तस्वरं कृत्वा विदुद्राव, स्वसैन्यं च मर्दयन् पलायितवान्।

Verse 573

जलसंध॑ हतं दृष्टवा वृष्णीनामृषभेण तु । आर्य! वृष्णिप्रवर सात्यकिके द्वारा जलसंधको मारा गया देख आपकी सेनामें महान्‌ हाहाकार मच गया

सञ्जय उवाच—आर्य, वृष्णीनामृषभेण वृष्णिप्रवरेण सात्यकिना जलसन्धे हते दृष्ट्वा तव सेनायां महान् हाहाकारोऽभवत्।

Verse 583

पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये । आपके योद्धा शत्रुओंपर विजय पानेका उत्साह खो बैठे। अब वे भाग निकलनेमें ही उत्साह दिखाने लगे और युद्धसे मुँह मोड़कर चारों ओर भाग गये

सञ्जय उवाच—तव योद्धारो द्विषज्जये निरुत्साहा अभवन्; पलायने कृतोत्साहा युद्धात् पराङ्मुखाः सर्वतो विदुद्रुवुः।

Verse 593

अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्युयुधानं महारथम्‌ । राजन! इसी समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य अपने वेगशाली घोड़ोंद्वारा महारथी युयुधानका सामना करनेके लिये आ पहुँचे

सञ्जय उवाच—राजन्, तदैव शस्त्रधारिणां श्रेष्ठो द्रोणाचार्यः शीघ्रगामिभिरश्वैर्महारथं युयुधानं प्रत्यभ्यपतत्, तेन सह समरं कर्तुमुपचक्रमे।

Verse 1194

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका कौरव-सेनामें प्रवेश तथा कृतवर्गाका पराक्रमविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ

सञ्जय उवाच—इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वान्तर्गते सात्यकेः कौरवसेनाप्रवेशः कृतवर्मणश्च पराक्रमवर्णनं नाम चतुर्दशोत्तरशततमोऽध्यायः समाप्तः।

Verse 2936

शरैरग्न्यर्कसंकाशै: प्रदुद्राव समन्तत: । उनमेंसे कुछ हाथी चक्कर काटने लगे

अग्न्यर्कसंकाशैः शरैस्तेन समन्ततः प्रदुद्रुवे गजसेना। केचिद्गजाश्चक्रं चक्रुः, केचिद्व्यथिताः स्खलन्ति स्म, केचिद्भूमौ निपेतुः, केचिद्दुःखपीडिताः परमं शिथिलाः अभवन्; एवं युयुधानस्याग्निसूर्यसमतेजसा बाणैः पीडिता सा गजसेना सर्वतोऽपससार।

Verse 3636

अविध्यत शिने: पौत्रं जलसंधो महोरसि । महाराज! क्रोधमें भरे हुए जलसंधने भार सहन करनेमें समर्थ बाणोंद्वारा शिनिपौत्र सात्यकिकी विशाल छातीपर गहरा आघात किया

सञ्जय उवाच—राजन्, क्रोधसमाविष्टो जलसन्धः शिनेः पौत्रं सात्यकिं महोरसि गुरुभिर्बाणैः समविध्यत्।

Frequently Asked Questions

Whether a third-party intervention against a combatant who has gained advantage in a duel is justified when the opponent is exhausted and an ally’s survival is at stake, even if strict duel-propriety appears compromised.

The chapter illustrates that dharma in crisis is often adjudicated through competing duties—fairness, protection, and strategic obligation—showing how ethical reasoning in itihāsa is contextual rather than purely rule-absolute.

No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the meta-significance is conveyed narratively by staging consequences and later evaluative debate around the intervention and its conformity to wartime norms.

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