
Dambhodbhava, Nara-Nārāyaṇa, and the Counsel to Abandon Hubris (Udyoga-parva 94)
Upa-parva: Udyoga-parva — Kuru-sabhā counsel episode (Jāmadagnya-Rāma’s exemplum on Nara-Nārāyaṇa)
Vaiśaṃpāyana describes the Kuru assembly becoming silent and visibly affected after Kṛṣṇa’s words. In that silence, Jāmadagnya addresses the court with an exemplum (ekopamā). He narrates how the proud emperor Dambhodbhava, intoxicated by conquest, repeatedly asks brāhmaṇas whether anyone equals him in battle. The brāhmaṇas, angered by his arrogance, point him toward the ascetic pair Nara and Nārāyaṇa, said to be performing severe tapas at Gandhamādana. Dambhodbhava marches with a large force and challenges them; they refuse violence in the āśrama, urging him to seek other opponents. Persisting, he is met by Nara, who uses mere reeds (iṣīkā) to neutralize the king’s weapons and overwhelm his army through an extraordinary, non-lethal demonstration that induces submission. Nara then instructs the king in humility, self-control, and righteous rule, sending him away to protect his subjects and honor brāhmaṇas. Jāmadagnya draws the political inference: Nara-Nārāyaṇa are Arjuna and Kṛṣṇa; therefore, the listener should relinquish pride and pacify relations with the Pāṇḍavas, avoiding fixation on conflict.
Chapter Arc: राजसभा में समस्त नरेश मौन हैं; तभी यदुकुल-तिलक श्रीकृष्ण, दुन्दुभि-गम्भीर वाणी और सुन्दर दन्तावलि से दीप्त, धृतराष्ट्र की ओर दृष्टि करके बोल उठते हैं। → कृष्ण धृतराष्ट्र से शान्ति-याचना का हेतु स्पष्ट करते हैं—कुरुओं और पाण्डवों में ‘शम’ हो, वीरों का अप्रणाश हो। वे संकेत देते हैं कि यदि अहंकार और अमर्ष बढ़ा तो एकत्रित राजाओं का रोष प्रजा-विनाश का कारण बन सकता है। → कृष्ण धृतराष्ट्र को निर्णायक धर्मोपदेश देते हैं: पाण्डवों और अपने पुत्रों—दोनों को साथ रखकर राज्य को स्थिर करो; युद्ध में किसी पक्ष की ‘जीत’ भी यदि पुत्र-वध या पाण्डव-वध के मूल्य पर हो तो बताओ, वह सुख किसका होगा? वे धृतराष्ट्र से ‘मातृ-पितृवत्’ होकर सबकी रक्षा करने और कुमार्गगामी पुत्रों को सन्मार्ग में स्थापित करने की मांग करते हैं। → सभा के धर्मज्ञ जनों के सामने कृष्ण पाण्डवों का संदेश भी रखते हैं—गुरुजनों के प्रति शिष्य/पुत्रवत् आचरण हम निभाते हैं; अब पिता-तुल्य धृतराष्ट्र का कर्तव्य है कि धर्म के सुवर्त्म पर सबको स्थिर करे और असामयिक, अयुक्त हिंसा को रोके। → धृतराष्ट्र क्या अपने पुत्रों को रोककर शान्ति-मार्ग अपनाएंगे, या सभा का मौन दुर्योधन के हठ में बदलकर युद्ध को अवश्यंभावी बना देगा?
Verse 1
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब सभामें सब राजा मौन होकर बैठ गये, तब सुन्दर दन््तावलिसे सुशोभित तथा दुन्दुभिके समान गम्भीर स्वरवाले यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णने बोलना आरम्भ किया। जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बादल गर्जता है, उसी प्रकार उन्होंने गम्भीर गर्जनाके साथ सारी सभाको सुनाते हुए धृतराष्ट्रकी ओर देखकर इस प्रकार कहा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସଭାରେ ସମସ୍ତ ରାଜା ମୌନ ହୋଇ ବସିଥିବାବେଳେ, ଯଦୁକୁଳତିଳକ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ—ସୁନ୍ଦର ଦନ୍ତପଙ୍କ୍ତିରେ ଶୋଭିତ ଏବଂ ଦୁନ୍ଦୁଭି ସମ ଗମ୍ଭୀର ସ୍ୱରବାନ—ବକ୍ତବ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କଲେ। ଗ୍ରୀଷ୍ମାନ୍ତରେ ମେଘ ଯେପରି ଗର୍ଜେ, ସେପରି ଗମ୍ଭୀର ନାଦରେ ସମଗ୍ର ସଭାକୁ ଶୁଣାଇ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଦିଗକୁ ଦୃଷ୍ଟି କରି ଏଭଳି କହିଲେ।
Verse 2
जीमूत इव घर्मान्ति सर्वा संश्रावयन् सभाम् | धृतराष्ट्रमभिप्रेक्ष्य समभाषत माधव:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब सभामें सब राजा मौन होकर बैठ गये, तब सुन्दर दन््तावलिसे सुशोभित तथा दुन्दुभिके समान गम्भीर स्वरवाले यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णने बोलना आरम्भ किया। जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बादल गर्जता है, उसी प्रकार उन्होंने गम्भीर गर्जनाके साथ सारी सभाको सुनाते हुए धृतराष्ट्रकी ओर देखकर इस प्रकार कहा
ଗ୍ରୀଷ୍ମାନ୍ତରେ ମେଘ ଯେପରି ଗର୍ଜେ, ସେପରି ମାଧବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ସମଗ୍ର ସଭାକୁ ଶୁଣାଇ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଦେଖି କଥା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 3
श्रीभगवानुवाच कुरूणां पाण्डवानां च शम: स्यादिति भारत । अप्रणाशेन वीराणामेतद् याचितुमागत:,श्रीभगवान् बोले--भरतनन्दन! मैं आपसे यह प्रार्थना करनेके लिये यहाँ आया हूँ कि क्षत्रियवीरोंका संहार हुए बिना ही कौरवों और पाण्डवोंमें शान्तिस्थापन हो जाय
ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! କୁରୁ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପିତ ହେଉ; ଏହି ବୀରମାନଙ୍କର ବିନାଶ ନ ହୋଇ ଏହା ସିଦ୍ଧ ହେଉ—ଏହି ଯାଚନା କରିବାକୁ ମୁଁ ଆସିଛି।
Verse 4
कब | | | - का ष्रै | ; / 7000 ०५९ राजन् नान्यत् प्रवक्तव्यं तव नैःश्रेयसं वच: । विदितं होव ते सर्व वेदितव्यमरिंदम,शत्रुदमन नरेश! मुझे इसके सिवा दूसरी कोई कल्याणकारक बात आपसे नहीं कहनी है; क्योंकि जाननेयोग्य जितनी बातें हैं, वे सब आपको विदित ही हैं
ଶତ୍ରୁଦମନ ରାଜନ! ଆପଣଙ୍କ କଲ୍ୟାଣ ପାଇଁ ଏହାଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କିଛି କହିବା ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ; କାରଣ ଯାହା ଜାଣିବା ଯୋଗ୍ୟ, ସେ ସବୁ ଆପଣଙ୍କୁ ଜଣା ଅଛି।
Verse 5
इदं हाद्य कुल श्रेष्ठ सर्वराजसु पार्थिव । श्रुतवृत्तोपसम्पन्नं सर्वे: समुदितं गुणै:,भूपाल! इस समय समस्त राजाओंमें यह कुरुवंश ही सर्वश्रेष्ठ है। इसमें शास्त्र एवं सदाचारका पूर्णतः आदर एवं पालन किया जाता है। यह कौरवकुल समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न है
ହେ ପାର୍ଥିବ! ଏହି ସମୟରେ ସମସ୍ତ ରାଜବଂଶମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କୁରୁବଂଶ ହିଁ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ। ଏହା ଶାସ୍ତ୍ରଶ୍ରବଣ ଓ ସଦାଚାରରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଗୁଣରେ ସମୃଦ୍ଧ।
Verse 6
कृपानुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं च भारत । तथा<अथ्जवं क्षमा सत्यं कुरुष्वेतद् विशिष्यते,भारत! कुरुवंशियोंमें कृपाः5, अनुकम्पाः, करुणा5, अनृशंसतार्ं, सरलता, क्षमा और सत्य--ये सद्गुण अन्य राजवंशोंकी अपेक्षा अधिक पाये जाते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଭାରତ! କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି ସଦ୍ଗୁଣଗୁଡ଼ିକ ବିଶେଷ ଭାବେ ମିଳେ—କୃପା, ଅନୁକମ୍ପା, କରୁଣା, ଅନୃଶଂସତା (ନିର୍ଦୟତାର ଅଭାବ), ସରଳତା, କ୍ଷମା ଓ ସତ୍ୟ; ଅନ୍ୟ ରାଜବଂଶଠାରୁ ଅଧିକ।
Verse 7
तस्मिन्नेवंविधे राजन् कुले महति तिष्ठति । त्वन्निमित्तं विशेषेण नेह युक्तमसाम्प्रतम्,राजन! ऐसे उत्तम गुणसम्पन्न एवं अत्यन्त प्रतिष्ठित कुलके होते हुए भी यदि इसमें आपके कारण कोई अनुचित कार्य हो, तो यह ठीक नहीं है
ହେ ରାଜନ! ଏପରି ସଦ୍ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ, ମହାନ ଓ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ କୁଳ ଥିବାବେଳେ—ବିଶେଷକରି ଆପଣଙ୍କ କାରଣରୁ—ଏଠାରେ କୌଣସି ଅସମୟ କିମ୍ବା ଅନୁଚିତ କାର୍ଯ୍ୟ ଘଟିବା ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 8
त्वं हि धारयिता श्रेष्ठ: कुरूणां कुरुसत्तम | मिथ्या प्रचरतां तात बाहोष्वाभ्यन्तरेषु च,तात कुरुश्रेष्ठ! यदि कौरवगण बाहर और भीतर (प्रकट और गुप्तरूपसे) मिथ्या आचरण (असदव्यवहार) करने लगें, तो आप ही उन्हें रोककर सन्मार्गमें स्थापित करनेवाले हैं
ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! କୁରୁବଂଶକୁ ଧାରଣ କରୁଥିବା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଧାର ଆପଣ ହିଁ। ପ୍ରିୟ ତାତ! କୌରବମାନେ ବାହାରେ ଓ ଭିତରେ—ପ୍ରକଟ ଓ ଗୁପ୍ତରେ—ମିଥ୍ୟାଚରଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ, ସେମାନଙ୍କୁ ରୋକି ସନ୍ମାର୍ଗରେ ପୁନଃ ସ୍ଥାପନ କରିବା ଆପଣଙ୍କ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ।
Verse 9
ते पुत्रास्तव कौरव्य दुर्योधनपुरोगमा: । धर्मार्थी पृष्ठत: कृत्वा प्रचरन्ति नृशंसवत्,कुरुनन्दन! दुर्योधनादि आपके पुत्र धर्म और अर्थको पीछे करके क्रूर मनुष्योंके समान आचरण करते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ କୁରୁବଂଶଜ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ଆପଣଙ୍କ ପୁଅମାନେ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ପଛକୁ ଛାଡ଼ି, ନିର୍ଦୟ ଲୋକମାନଙ୍କ ପରି ଆଚରଣ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 10
अशिष्टा गतमर्यादा लोभेन हृतचेतस: । स्वेषु बन्धुषु मुख्येषु तद् वेत्थ पुरुषर्षभ,पुरुषरत्न! ये अपने ही श्रेष्ठ बन्धुओंके साथ अशिष्टतापूर्ण बर्ताव करते हैं। लोभने इनके हृदय-को ऐसा वशीभूत कर लिया है कि इन्होंने धर्मकी मर्यादा तोड़ दी है। इस बातको आप अच्छी तरह जानते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେମାନେ ଅଶିଷ୍ଟ ହୋଇପଡ଼ିଛନ୍ତି, ଧର୍ମମର୍ଯ୍ୟାଦା ଲଂଘନ କରିଛନ୍ତି; ଲୋଭ ସେମାନଙ୍କ ବିବେକକୁ ହରିନେଇଛି। ନିଜ ମୁଖ୍ୟ ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ଅନୁଚିତ ବ୍ୟବହାର କରୁଛନ୍ତି—ଏହା ଆପଣ ଭଲଭାବେ ଜାଣନ୍ତି, ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 11
सेयमापन्महाघोरा कुरुष्वेव समुत्थिता । उपेक्ष्यमाणा कौरव्य पृथिवीं घातयिष्यति,कुरुश्रेष्ठ! इस समय यह अत्यन्त भयंकर आपत्ति कौरवोंमें ही प्रकट हुई है। यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह समस्त भूमण्डलका विध्वंस कर डालेगी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୌରବ୍ୟ, କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ମହାଭୟଙ୍କର ବିପଦ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ହିଁ ଉଦ୍ଭବିଛି। ଯଦି ଏହାକୁ ଅବହେଳା କରାଯାଏ, ତେବେ ଏହା ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିଦେବ।
Verse 12
शक्या चेयं शमयितु त्वं चेदिच्छसि भारत । न दुष्करो ह्ात्र शमो मतो मे भरतर्षभ,भारत! यदि आप चाहते हों तो इस भयानक विपत्तिका अब भी निवारण किया जा सकता है। भरतश्रेष्ठ! इन दोनों पक्षोंमें शान्ति स्थापित होना मैं कठिन कार्य नहीं मानता हूँ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଯଦି ତୁମେ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଇଚ୍ଛା କର, ତେବେ ଏହି ସଙ୍କଟକୁ ଏବେ ମଧ୍ୟ ଶାନ୍ତ କରାଯାଇପାରିବ। ହେ ଭରତବୃଷଭ! ମୋ ମତରେ ଏଠାରେ ସନ୍ଧି-ସମ୍ମିଳନ କଠିନ କାମ ନୁହେଁ।
Verse 13
त्वय्यधीन: शमो राजन् मयि चैव विशाम्पते । पुत्रान् स्थापय कौरव्य स्थापयिष्याम्यहं परान्,प्रजापालक कौरवनरेश! इस समय इन दोनों पक्षोंमें संधि कराना आपके और मेरे अधीन है। आप अपने पुत्रोंको मर्यादामें रखिये और मैं पाण्डवोंको नियमन्त्रणमें रखूँगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ପ୍ରଜାପତେ! ଶାନ୍ତି ତୁମ ଅଧୀନରେ ମଧ୍ୟ ଅଛି, ମୋ ଅଧୀନରେ ମଧ୍ୟ। ହେ କୌରବ୍ୟ! ତୁମେ ତୁମ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ମର୍ଯ୍ୟାଦାରେ ରଖ; ମୁଁ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ—ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ—ସଂଯମରେ ରଖିବି।
Verse 14
आज्ञा तव हि राजेन्द्र कार्या पुत्रै: सहान्वयै: । हित॑ं बलवदप्येषां तिष्ठतां तव शासने,राजेन्द्र! आपके पुत्रोंको चाहिये कि वे अपने अनुयायियोंके साथ आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करें। आपके शासनमें रहनेसे ही इनका महान् हित हो सकता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ତୁମ ପୁତ୍ରମାନେ ନିଜ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହିତ ତୁମ ଆଜ୍ଞା ନିଶ୍ଚୟ ପାଳନ କରିବା ଉଚିତ। ସେମାନେ ନିଜକୁ ବଳବାନ ଭାବୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେମାନଙ୍କର ସତ୍ୟ ହିତ ତୁମ ଶାସନ-ଶୃଙ୍ଖଳାରେ ରହିବାରେ ହିଁ ଅଛି।
Verse 15
तव चैव हित॑ं राजन् पाण्डवानामथो हितम् । शमे प्रयतमानस्य तव शासनकाड्क्षिण:,राजन्! यदि आप अपने पुत्रोंपर शासन करना चाहें और संधिके लिये प्रयत्न करें तो इसीमें आपका भी हित है और इसीसे पाण्डवोंका भी भला हो सकता है इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये पञ्चनवतितमो<ध्याय:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଯଦି ତୁମେ ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ପ୍ରୟତ୍ନଶୀଳ ହେଉ ଏବଂ ନିଜ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଶାସନ-ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ ରଖିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କର, ତେବେ ସେହି ପଥ ତୁମ ହିତ; ଏବଂ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତ ମଧ୍ୟ ସେହି।
Verse 16
स्वयं निष्फलमालक्ष्य संविधत्स्व विशाम्पते । सहायभूता भरतास्तवैव स्युर्जनेश्वर,प्रजानाथ! पाण्डवोंके साथ वैर और विवादका कोई अच्छा परिणाम नहीं हो सकता; यह विचारकर आप स्वयं ही संधिके लिये प्रयत्न करें। जनेश्वर! ऐसा करनेसे भरतवंशी पाण्डव आपके ही सहायक होंगे
ହେ ପ୍ରଜାନାଥ, ଜନେଶ୍ୱର! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ବୈର ଓ ବିବାଦର କୌଣସି ଶୁଭ ପରିଣାମ ନାହିଁ—ଏହା ନିଜେ ବିଚାର କରି ଆପଣ ନିଜେ ହିଁ ସନ୍ଧି ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରନ୍ତୁ। ଏପରି କଲେ ଭରତବଂଶୀ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଆପଣଙ୍କର ହିଁ ସହାୟ ହେବେ।
Verse 17
धर्मार्थयोस्तिष्ठ राजन् पाण्डवैरभिरक्षित: । न हि शक््यास्तथाभूता यत्नादपि नराधिप,राजन्! आप पाण्डवोंसे सुरक्षित होकर धर्म और अर्थका अनुष्ठान कीजिये। नरेन्द्र! आपको पाण्डवोंके समान संरक्षक प्रयत्न करनेपर भी नहीं मिल सकते
ହେ ରାଜନ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ଥାଇ ଆପଣ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥରେ ଦୃଢ଼ ରୁହନ୍ତୁ। ହେ ନରାଧିପ! ଯେତେ ଚେଷ୍ଟା କଲେ ମଧ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପରି ରକ୍ଷକ ମିଳିବେ ନାହିଁ।
Verse 18
नहिवत्वां पाण्डवैर्जेतुं रक्ष्यमाणं महात्मभि: । इन्द्रोडपि देवैः सहित: प्रसहेत कुतो नृप:,महात्मा पाण्डवोंसे सुरक्षित होनेपर आपको देवताओंसहित इन्द्र भी नहीं जीत सकते, फिर दूसरे किसी राजाकी तो बात ही क्या है?
ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନେ ଯେତେବେଳେ ଆପଣଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି, ଦେବମାନଙ୍କ ସହିତ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କୁ ଜିତି ପାରିବେ ନାହିଁ; ତେବେ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ମର୍ତ୍ୟ ରାଜାର କଥା କ’ଣ?
Verse 19
यत्र भीष्मश्न द्रोणश्न॒ कृप: कर्णो विविंशति: । अश्रत्थामा विकर्णश्न॒ सोमदत्तो5थ बाह्विक:,भरतश्रेष्ठ! जिस पक्षमें भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, विविंशति, अअश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, कलिंगराज, काम्बोजनरेश सुदक्षिण तथा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, महातेजस्वी सात्यकि तथा महारथी युयुत्सु हों; उस पक्षके योद्धाओंसे कौन विपरीत बुद्धिवाला राजा युद्ध कर सकता है?
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେ ପକ୍ଷରେ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପ, କର୍ଣ୍ଣ, ବିବିଂଶତି, ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, ବିକର୍ଣ୍ଣ, ସୋମଦତ୍ତ ଓ ବାହ୍ଲିକ ପରି ମହାବୀର ଅଛନ୍ତି—ସେ ପକ୍ଷର ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ କେଉଁ ବିପରୀତ ବୁଦ୍ଧିର ରାଜା ଯୁଦ୍ଧ କରିବ?
Verse 20
सैन्धवश्न कलिड्जश्च काम्बोजश्न सुदक्षिण: । युधिष्ठिरो भीमसेन: सव्यसाची यमौ तथा,भरतश्रेष्ठ! जिस पक्षमें भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, विविंशति, अअश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, कलिंगराज, काम्बोजनरेश सुदक्षिण तथा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, महातेजस्वी सात्यकि तथा महारथी युयुत्सु हों; उस पक्षके योद्धाओंसे कौन विपरीत बुद्धिवाला राजा युद्ध कर सकता है?
ଏବଂ ଯେ ପକ୍ଷରେ ସିନ୍ଧୁରାଜ ଜୟଦ୍ରଥ, କଲିଙ୍ଗରାଜ, କାମ୍ବୋଜାଧିପ ସୁଦକ୍ଷିଣ, ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମସେନ, ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ଓ ଯମଜ ନକୁଳ-ସହଦେବ ଅଛନ୍ତି—ଏପରି ମହାବଳୀ ଏକ ପକ୍ଷରେ ଥିଲେ କେଉଁ ଅବିବେକୀ ରାଜା ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ସାହସ କରିବ?
Verse 21
सात्यकिश्व महातेजा युयुत्सुश्न महारथ: । को नु तान् विपरीतात्मा युद्धयेत भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! जिस पक्षमें भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, विविंशति, अअश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, कलिंगराज, काम्बोजनरेश सुदक्षिण तथा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, महातेजस्वी सात्यकि तथा महारथी युयुत्सु हों; उस पक्षके योद्धाओंसे कौन विपरीत बुद्धिवाला राजा युद्ध कर सकता है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାତେଜସ୍ବୀ ସାତ୍ୟକି ଓ ମହାରଥୀ ଯୁଯୁତ୍ସୁ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏମିତି ବୀରମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ ବିପରୀତ ବୁଦ୍ଧିର କିଏ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ?
Verse 22
लोकस्येश्वरतां भूय: शन्रुभि क्षाप्यधृष्यताम् । प्राप्स्यसि त्वममित्रध्न सहित: कुरुपाण्डवै:,शत्रुसूदन नरेश! कौरव और पाण्डवोंके साथ रहनेपर आप पुनः सम्पूर्ण जगतके सम्राट् होकर शत्रुओंके लिये अजेय हो जायँगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଶତ୍ରୁସୂଦନ ନରେଶ! କୁରୁ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ରହିଲେ ତୁମେ ପୁନର୍ବାର ସମଗ୍ର ଜଗତର ଅଧିପତ୍ୟ ପାଇବ ଏବଂ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅଜେୟ ହେବ।
Verse 23
तस्य ते पृथिवीपालास्त्वत्समा: पृथिवीपते । श्रेयांसश्षैव राजान: संधास्यन्ते परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले भूपाल! उस दशामें जो राजा आपके समान या आपसे बड़े हैं, वे भी आपके साथ संधि कर लेंगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପୃଥିବୀପତି, ପରନ୍ତପ! ସେତେବେଳେ ତୁମ ସମାନ ରାଜାମାନେ ଓ ତୁମଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ସହ ସନ୍ଧି କରିବେ।
Verse 24
सत्वंपुत्रैश्न पौत्रैश्न पितृभिभ््रातृभिस्तथा । सुहृद्धिः सर्वतो गुप्त: सुखं शक्ष्यसि जीवितुम्,इस प्रकार आप अपने पुत्र, पौत्र, पिता, भाई और सुह॒दोंद्वारा सर्वथा सुरक्षित रहकर सुखसे जीवन बिता सकेंगे
ଏପରି ପୁତ୍ର-ପୌତ୍ର, ପିତା, ଭ୍ରାତା ଓ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ସୁରକ୍ଷିତ ହୋଇ ତୁମେ ସୁଖରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରିପାରିବ।
Verse 25
एतानेव पुरोधाय सत्कृत्य च यथा पुरा | अखिलां भोक्ष्यसे सर्वा पृथिवीं पृथिवीपते,पृथ्वीपते! यदि आप पहलेकी भाँति इन पाण्डवोंका ही सत्कार करके इन्हें आगे रखें तो इस सारी पृथ्वीका उपभोग करेंगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପୃଥିବୀପତି! ପୂର୍ବବତ୍ ଏହି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କଲେ, ତୁମେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଭୋଗ କରିବ।
Verse 26
एतैहिं सहित: सर्व: पाण्डवै: स्वैश्ष भारत । अन्यान् विजेष्यसे शत्रूनेष स्वार्थस्तवाखिल:,भारत! इन समस्त पाण्डवों तथा अपने पुत्रोंक साथ रहकर आप दूसरे शत्रुओंपर भी विजय प्राप्त कर सकेंगे। इस प्रकार आपके सम्पूर्ण स्वार्थकी सिद्धि होगी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଏହି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଓ ନିଜ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ରହିଲେ, ତୁମେ ଅନ୍ୟ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କରିପାରିବ; ଏହିପରି ତୁମ ସମଗ୍ର ସ୍ୱାର୍ଥ ସିଦ୍ଧ ହେବ।
Verse 27
तैरेवोपार्जितां भूमिं भोक्ष्यसे च परंतप । यदि सम्पत्स्यसे पुत्रै: सहामात्यैर्नराधिप,शत्रुसंतापी नरेश! यदि आप मन्त्रियोंसहित अपने समस्त पुत्रों (पाण्डवों और कौरवों)- से मिलकर रहेंगे तो उन्हींके द्वारा जीती हुई इस पृथ्वीका राज्य भोगेंगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପରନ୍ତପ ନରାଧିପ! ଯଦି ତୁମେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ନିଜ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ଏକତାରେ ବସିବ, ତେବେ ସେମାନେ ଯେ ଭୂମି ଅର୍ଜନ କରିଛନ୍ତି, ସେହି ପୃଥିବୀର ରାଜ୍ୟ ତୁମେ ଭୋଗିବ।
Verse 28
संयुगे वै महाराज दृश्यते सुमहान् क्षय: । क्षये चोभयतो राजन् कं धर्ममनुपश्यसि,महाराज! युद्ध छिड़नेपर तो महान् संहार ही दिखायी देता है। राजन! इस प्रकार दोनों पक्षका विनाश करानेमें आप कौन-सा धर्म देखते हैं?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ଯୁଦ୍ଧରେ ମହାସଂହାର ଛଡ଼ା ଆଉ କିଛି ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ। ରାଜନ! ଯେତେବେଳେ ଉଭୟ ପକ୍ଷରେ କ୍ଷୟ ହୁଏ, ଉଭୟଙ୍କ ବିନାଶ କରାଇବାରେ ତୁମେ କେଉଁ ଧର୍ମ ଦେଖୁଛ?
Verse 29
पाण्डवैर्निहतै: संख्ये पुत्रैर्वापि महाबलै: यद् विन्देथा: सुखं राजंस्तद् ब्रूहि भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! यदि पाण्डव युद्धमें मारे गये अथवा आपके महाबली पुत्र ही नष्ट हो गये तो उस दशामें आपको कौन-सा सुख मिलेगा? यह बताइये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯଦି ଯୁଦ୍ଧରେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିହତ ହୁଅନ୍ତି, କିମ୍ବା ତୁମ ମହାବଳୀ ପୁତ୍ରମାନେ ନଶିଯାଆନ୍ତି—ତେବେ, ରାଜନ, ସେ ଅବସ୍ଥାରେ ତୁମେ କେଉଁ ସୁଖ ପାଇବ? କୁହ।
Verse 30
शूराश्च हि कृतास्त्राश्न सर्वे युद्धाभिकाड्क्षिण: । पाण्डवास्तावकाश्रैव तान् रक्ष महतो भयात्,पाण्डव तथा आपके पुत्र सभी शूरवीर, अस्त्रविद्याके पारंगत तथा युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले हैं। आप इन सबकी महान् भयसे रक्षा कीजिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପାଣ୍ଡବମାନେ ଓ ତୁମ ପୁତ୍ରମାନେ—ସମସ୍ତେ ଶୂର, ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ, ଯୁଦ୍ଧକାମୀ। ତେଣୁ ଏହି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଏକ ମହାଭୟ/ମହାବିପଦରୁ ରକ୍ଷା କର।
Verse 31
न पश्येम कुरून् सर्वान् पाण्डवांश्वैव संयुगे । क्षीणानुभयत: शूरान् रथिनो रथिभिहंतान्,युद्धके परिणामपर विचार करनेसे हमें समस्त कौरव और पाण्डव नष्टप्राय दिखायी देते हैं। दोनों ही पक्षोंके शूरवीर रथी रथियोंसे ही मारे जाकर नष्ट हो जायँगे
ଏହି ଯୁଦ୍ଧର ପରିଣାମ ଭାବିଲେ, କୁରୁମାନେ କିମ୍ବା ପାଣ୍ଡବମାନେ—କେହି ମଧ୍ୟ ଅଖଣ୍ଡ ରହିବେ ବୋଲି ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ। ଉଭୟ ପକ୍ଷର ବୀର ରଥୀମାନେ ରଥୀମାନଙ୍କ ହାତରେ ହତ ହୋଇ କ୍ଷୟ ପାଇ ନଶିବେ; ଶେଷରେ ରଣଭୂମି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷଶୂନ୍ୟ ହେବ।
Verse 32
समवेता: पृथिव्यां हि राजानो राजसत्तम । अमर्षवशमापतन्ना नाशयेयुरिमा: प्रजा:,नृपश्रेष्ठी भूमण्डलके समस्त राजा यहाँ एकत्र हो अमर्षमें भरकर इन प्रजाओंका नाश करेंगे
ହେ ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପୃଥିବୀର ସମସ୍ତ ରାଜା ଏଠାରେ ସମବେତ ହୋଇଛନ୍ତି। ସେମାନେ ଯଦି ଅମର୍ଷ-କ୍ରୋଧର ବଶ ହୋଇପଡ଼ନ୍ତି, ତେବେ ଏହି ପ୍ରଜାମାନଙ୍କୁ ନଶାଇ ଦେଇପାରନ୍ତି।
Verse 33
त्राहि राजन्निमं लोक॑ न नश्येयुरिमा: प्रजा: । त्वयि प्रकृतिमापन्ने शेष: स्थात् कुरुनन्दन,कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले नरेश! आप इस जगत्की रक्षा कीजिये; जिससे इन समस्त प्रजाओंका नाश न हो। आपके प्रकृतिस्थ होनेपर ये सब लोग बच जायूँगे
ହେ ରାଜନ! ଏହି ଲୋକକୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ, ଯେପରି ଏହି ପ୍ରଜାମାନେ ନଶିନଯାଆନ୍ତୁ। ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ଆପଣ ଯଦି ନିଜ ସ୍ୱାଭାବିକ ସ୍ଥିରତାରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ଶେଷ ସବୁ ଟିକି ରହିବ।
Verse 34
शुक्ला वदान्या ह्वीमन्त आर्या: पुण्याभिजातय: । अन्योन्यसचिवा राजंस्तान् पाहि महतो भयात्,राजन! ये सब नरेश शुद्ध, उदार, लज्जाशील, श्रेष्ठ, पवित्र कुलोंमें उत्पन्न और एक- दूसरेके सहायक हैं। आप इन सबकी महान् भयसे रक्षा कीजिये
ହେ ରାଜନ! ଏହି ରାଜାମାନେ ଶୁଚି ଆଚରଣଶୀଳ, ଉଦାର, ଲଜ୍ଜାଶୀଳ, ଆର୍ୟ, ପୁଣ୍ୟକୁଳଜାତ; ଏବଂ ପରସ୍ପର ସହାୟକ। ଏହି ମହାଭୟରୁ ସେମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ।
Verse 35
शिवेनेमे भूमिपाला: समागम्य परस्परम् | सह भुक्त्वा च पीत्वा च प्रतियान्तु यथागृहम्,आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे ये भूपाल परस्पर मिलकर तथा एक साथ खा- पीकर कुशलपूर्वक अपने-अपने घरको वापस लौटें
ଆପଣ ଏମିତି ପ୍ରୟାସ କରନ୍ତୁ, ଯେ ଏହି ଭୂପାଳମାନେ ପରସ୍ପର ଶିବ-ମଙ୍ଗଳଭାବରେ ମିଳନ କରନ୍ତୁ; ଏକାସାଥି ଭୋଜନ-ପାନ କରି, କୁଶଳରେ ନିଜ ନିଜ ଗୃହକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କରନ୍ତୁ।
Verse 36
सुवासस: स्रग्विणश्व॒ सत्कृता भरतर्षभ | अमर्ष च निराकृत्य वैराणि च परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतकुलभूषण! ये राजालोग उत्तम वस्त्र और सुन्दर हार पहनकर अमर्ष और वैरको मनसे निकालकर यहाँसे सत्कारपूर्वक विदा हों
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଶତ୍ରୁସନ୍ତାପକ! ଏହି ରାଜାମାନେ ଉତ୍ତମ ବସ୍ତ୍ର ଓ ମାଳା ପିନ୍ଧି, ମନରୁ ଅମର୍ଷ ଓ ବୈର ତ୍ୟାଗ କରି, ସତ୍କାରପୂର୍ବକ ଏଠାରୁ ବିଦାୟ ନିଅନ୍ତୁ।
Verse 37
हार्द यत् पाण्डवेष्वासीत् प्राप्तेडस्मिन्नायुष: क्षये । तदेव ते भवत्वद्य संधत्स्व भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ अब आपकी आयु भी क्षीण हो चली है; इस बुढ़ापेमें आपका पाण्डवोंके ऊपर वैसा ही स्नेह बना रहे, जैसा पहले था; अत: संधि कर लीजिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମ ଆୟୁର ଶେଷ ସମୀପ; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ପୂର୍ବରୁ ଯେ ହୃଦୟସ୍ନେହ ଥିଲା, ସେଇ ଆଜି ମଧ୍ୟ ରହୁ। ତେଣୁ ସନ୍ଧି କର।
Verse 38
बाला विहीना: पित्रा ते त्वयैव परिवर्धिता: । तान् पालय यथान्यायं पुत्रांश्ष भरतर्षभ,भरतर्षभ! पाण्डव बाल्यावस्थामें ही पितासे बिछुड़ गये थे। आपने ही उन्हें पाल- पोसकर बड़ा किया; अत: उनका और अपने पुत्रोंका न्यायपूर्वक पालन कीजिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେମାନେ ବାଲ୍ୟରେ ପିତୃହୀନ ହୋଇଥିଲେ, ତୁମେ ଏକାଇ ସେମାନଙ୍କୁ ପାଳି ପୋଷି ବଡ଼ କରିଛ। ତେଣୁ ନ୍ୟାୟାନୁସାରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଓ ନିଜ ପୁଅମାନଙ୍କୁ ପାଳନ-ରକ୍ଷା କର।
Verse 39
भवतैव हि रक्ष्यास्ते व्यसनेषु विशेषत: । मा ते धर्मस्तथैवार्थों नश्येत भरतर्षभ,भरतभूषण! आपको ही पाण्डवोंकी सदा रक्षा करनी चाहिये। विशेषतः संकटके अवसरपर तो आपके लिये उनकी रक्षा अत्यन्त आवश्यक है ही। कहीं ऐसा न हो कि पाण्डवोंसे वैर बाँधनेके कारण आपके धर्म और अर्थ दोनों नष्ट हो जायँ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ବିଶେଷକରି ବିପଦବେଳେ ସେମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିବା ତୁମର ଦାୟିତ୍ୱ। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧିବାରୁ ତୁମ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ—ଦୁହେଁ ନଶିଯାଉ ନାହିଁ।
Verse 40
आहुस्त्वां पाण्डवा राजन्नभिवाद्य प्रसाद्य च | भवत: शासनाद् दुःखमनुभूतं सहानुगै:,राजन! पाण्डवोंने आपको प्रणाम करके प्रसन्न करते हुए यह संदेश कहलाया है --'तात! आपकी आज्ञासे अनुचरोंसहित हमने भारी दुःख सहन किया है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ତୁମକୁ ପ୍ରଣାମ କରି ଓ ପ୍ରସନ୍ନ କରି ଏହି ସନ୍ଦେଶ ପଠାଇଛନ୍ତି—“ତାତ! ତୁମ ଆଜ୍ଞାରେ ଆମେ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହିତ ମହାଦୁଃଖ ଭୋଗ କରିଛୁ।”
Verse 41
द्वादशेमानि वर्षाणि बने निर्व्युषितानि नः । त्रयोदशं तथाज्ञातैः सजने परिवत्सरम्,“बारह वर्षोतक हमने निर्जन वनमें निवास किया है और तेरहवाँ वर्ष जनसमुदायसे भरे हुए नगरमें अज्ञात रहकर बिताया है
ଆମେ ବାରୋଟି ବର୍ଷ ନିର୍ଜନ ବନରେ ବାସ କରିଛୁ; ଏବଂ ତେରୋଟିଏ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ଭରିଥିବା ନଗରରେ ଅଜ୍ଞାତ ରହି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବର୍ଷ କାଟିଛୁ।
Verse 42
स्थाता न: समये तस्मिन् पितेति कृतनिश्चया: । नाहास्म समयं तात तच्च नो ब्राह्मणा विदु:,“तात! आप हमारे ज्येष्ठ पिता हैं, अत: हमारे विषयमें की हुई अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहेंगे (अर्थात् वनवाससे लौटनेपर हमारा राज्य हमें प्रसन्नतापूर्वक लौटा देंगे)--ऐसा निश्चय करके ही हमने वनवास और अज्ञातवासकी शर्तको कभी नहीं तोड़ा है, इस बातको हमारे साथ रहे हुए ब्राह्मणलोग जानते हैं
ହେ ତାତ! ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟରେ ଆମ ପିତା ନିଜ ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ଅଟୁଟ ରହିବେ—‘ସେ ପିତା ପରି ଆଚରଣ କରିବେ’—ଏହି ନିଶ୍ଚୟ କରି ଆମେ କେବେ ମଧ୍ୟ ଶର୍ତ୍ତ ଭଙ୍ଗ କରିନାହିଁ; ଆମ ସହ ଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଏହା ସତ୍ୟ ବୋଲି ଜାଣନ୍ତି।
Verse 43
तस्मिन् नः समये तिष्ठ स्थितानां भरतर्षभ । नित्यं संक्लेशिता राजन् स्वराज्यांशं लभेमहि,“भरतवंशशिरोमणे! हम उस प्रतिज्ञापर दृढ़तापूर्वक स्थित रहे हैं; अत: आप भी हमारे साथ की हुई अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहें। राजन! हमने सदा क्लेश उठाया है; अब हमें हमारा राज्यभाग प्राप्त होना चाहिये
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆମେ ନିଜ ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ଦୃଢ଼ ରହିଛୁ; ତେଣୁ ଏହି ସମୟରେ ଆପଣ ମଧ୍ୟ ଆମ ସହ କରିଥିବା ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ଅଟୁଟ ରୁହନ୍ତୁ। ହେ ରାଜନ! ଆମେ ସଦା କ୍ଲେଶ ସହିଛୁ; ଏବେ ଆମକୁ ଆମର ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ରାଜ୍ୟାଂଶ ମିଳିବା ଉଚିତ।
Verse 44
त्वं धर्ममर्थ संजानन् सम्यड्नस्त्रातुमहसि । गुरुत्वं भवति प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्ष्महे
ଆପଣ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ—ଉଭୟକୁ ଭଲଭାବେ ଜାଣନ୍ତି; ତେଣୁ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଭାବେ ଆମକୁ ରକ୍ଷା କରିବା ଆପଣଙ୍କର ଉଚିତ। ଆପଣଙ୍କ ଗୁରୁତ୍ୱ ଦେଖି ଆମେ ଅନେକ କ୍ଲେଶ ସହୁଛୁ।
Verse 45
स भवान् मातृपितृवदस्मासु प्रतिपद्यताम् । “आप धर्म और अर्थके ज्ञाता हैं; अतः हमलोगोंकी रक्षा कीजिये। आपमें गुरुत्व देखकर-- आप गुरुजन हैं, यह विचार करके (आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये) हम बहुत-से क्लेश चुपचाप सहते जा रहे हैं; अब आप भी हमारे ऊपर माता-पिताकी भाँति स्नेहपूर्ण बर्ताव कीजिये || ४४ हू ।। गुरोर्गरीयसी वृत्तिया च शिष्यस्य भारत
ଏହେତୁ ଆପଣ ଆମ ପ୍ରତି ମାତା-ପିତା ପରି ସ୍ନେହପୂର୍ଣ୍ଣ ଆଚରଣ କରନ୍ତୁ।
Verse 46
पित्रा स्थापयितव्या हि वयमुत्पथमास्थिता:
ଆମେ ନିଶ୍ଚୟ କୁପଥରେ ପଡ଼ିଛୁ; ତେଣୁ ପିତାଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ—ଆମକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରି, ସଂଶୋଧନ କରି, ଧର୍ମପଥରେ ପୁନଃ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିବା।
Verse 47
आहुश्नेमां परिषदं पुत्रास्ते भरतर्षभ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେମାନେ ଏହି ସଭାକୁ ତୁମ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କର ପରିଷଦ ବୋଲି କହିଲେ।”
Verse 48
यत्र धर्मो हधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଯେଉଁଠାରେ ଅଧର୍ମ ଧର୍ମକୁ ଦବାଇ ଦିଏ, ଏବଂ ଯେଉଁଠାରେ ଅନୃତ ସତ୍ୟକୁ ହଟାଇ ଦିଏ।”
Verse 49
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासद: । “जहाँ सभासदोंके देखते-देखते अधर्मके द्वारा धर्मका और मिथ्याके द्वारा सत्यका गला घोंटा जाता हो, वहाँ वे सभासद् नष्ट हुए माने जाते हैं ।। ४८ हू ।। विद्धो धर्मो हाधर्मेण सभां यत्र प्रपद्यते,“जिस सभामें अधर्मसे विद्ध हुआ धर्म प्रवेश करता है और सभासद्गण उस अधर्मरूपी काँटेको काटकर निकाल नहीं देते हैं, वहाँ उस काँटेसे सभासद् ही विद्ध होते हैं (अर्थात् उन्हें ही अधर्मसे लिप्त होना पड़ता है)। जैसे नदी अपने तटपर उगे हुए वृक्षोंको गिराकर नष्ट कर देती है, उसी प्रकार वह अधर्मविद्ध धर्म ही उन सभासदोंका नाश कर डालता है”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଯେ ସଭାରେ ସଭାସଦମାନେ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ଅଧର୍ମ ଧର୍ମକୁ ଓ ମିଥ୍ୟା ସତ୍ୟକୁ ଗଳା ଘୋଟି ଦିଏ, ସେଠାରେ ସେଇ ସଭାସଦମାନେ ହତ ବୋଲି ଗଣାଯାନ୍ତି—ମୌନ ସହଭାଗିତାରେ ନୈତିକ ଭାବେ ନଷ୍ଟ।”
Verse 50
न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासद: । धर्म एतानारुजति यथा नद्यनुकूलजान्,“जिस सभामें अधर्मसे विद्ध हुआ धर्म प्रवेश करता है और सभासद्गण उस अधर्मरूपी काँटेको काटकर निकाल नहीं देते हैं, वहाँ उस काँटेसे सभासद् ही विद्ध होते हैं (अर्थात् उन्हें ही अधर्मसे लिप्त होना पड़ता है)। जैसे नदी अपने तटपर उगे हुए वृक्षोंको गिराकर नष्ट कर देती है, उसी प्रकार वह अधर्मविद्ध धर्म ही उन सभासदोंका नाश कर डालता है”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେ ସଭାରେ ସଭାସଦମାନେ ସଭାକୁ ବିଦ୍ଧ କରିଥିବା ସେଇ ଶଲ୍ୟ—ଅଧର୍ମରୂପ କାଁଟା—କାଟି ବାହାର କରନ୍ତି ନାହିଁ। ତେବେ ଧର୍ମ ନିଜେ ସେମାନଙ୍କୁ ବିଦ୍ଧ କରେ—ଯେପରି ନଦୀର ସ୍ରୋତ ତଟରେ ଉଗିଥିବା ଗଛମାନଙ୍କୁ ଉପାଡ଼ି ନଷ୍ଟ କରେ। ଏହିପରି, ଅଧର୍ମ ଅପସାରିତ ନ ହେଲେ, ଅଧର୍ମରେ ଆହତ ହୋଇ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କରୁଥିବା ଧର୍ମ ହିଁ ତାହାକୁ ସହିଥିବାମାନଙ୍କର ବିନାଶର କାରଣ ହୁଏ।”
Verse 51
ये धर्ममनुपश्यन्तस्तूष्णी ध्यायन्त आसते । ते सत्यमाहुर्धम्य च न्याय्यं च भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! जो पाण्डव सदा धर्मकी ओर ही दृष्टि रखते हैं और उसीका विचार करके चुपचाप बैठे हैं, वे जो आपसे राज्य लौटा देनेका अनुरोध करते हैं, वह सत्य, धर्मसम्मत और न्यायसंगत है
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ସଦା ଧର୍ମକୁ ଦୃଷ୍ଟିରେ ରଖି, ସେହି ଧର୍ମକୁ ଚିନ୍ତା କରି ନିରବ ହୋଇ ବସିଥାନ୍ତି। ସେମାନେ ଆପଣଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ଦେବାକୁ ଯେ ଅନୁରୋଧ କରୁଛନ୍ତି, ତାହା ସତ୍ୟ, ଧର୍ମସମ୍ମତ ଓ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ।
Verse 52
शक््यं किमन्यद् वक्तुं ते दानादन्यज्जनेश्वर । ब्रुवन्तु ते महीपाला: सभायां ये समासते,जनेश्वर! आपसे पाण्डवोंका राज्य लौटा देनेके सिवा दूसरी कौन-सी बात यहाँ कही जा सकती है। इस सभामें जो भूमिपाल बैठे हैं, वे धर्म और अर्थका विचार करके स्वयं बतावें, मैं ठीक कहता हूँ या नहीं। पुरुषरत्न आप इन क्षत्रियोंकों मौतके फंदेसे छुड़ाइये
ହେ ଜନେଶ୍ୱର! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ଦେବା ପରାମର୍ଶ ଛଡ଼ା ଏଠାରେ ଆଉ କଣ କୁହାଯାଇପାରେ? ଏହି ସଭାରେ ବସିଥିବା ଭୂପାଳମାନେ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ବିଚାର କରି ନିଜେ କହୁନ୍ତୁ—ମୁଁ ଠିକ୍ କୁହୁଛି କି ନୁହେଁ। ହେ ପୁରୁଷରତ୍ନ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ଦେଇ ଏହି କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ମୃତ୍ୟୁପାଶରୁ ମୁକ୍ତ କରନ୍ତୁ।
Verse 53
धर्मार्थों सम्प्रधारयैव यदि सत्यं ब्रवीम्पहम् प्रमु्चेमान् मृत्युपाशात् क्षत्रियान् पुरुषर्षभ,जनेश्वर! आपसे पाण्डवोंका राज्य लौटा देनेके सिवा दूसरी कौन-सी बात यहाँ कही जा सकती है। इस सभामें जो भूमिपाल बैठे हैं, वे धर्म और अर्थका विचार करके स्वयं बतावें, मैं ठीक कहता हूँ या नहीं। पुरुषरत्न आप इन क्षत्रियोंकों मौतके फंदेसे छुड़ाइये
ମୁଁ ଯଦି ସତ୍ୟ କୁହୁଛି, ତେବେ ଏଠାରେ ବସିଥିବା ରାଜାମାନେ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ବିଚାର କରି ନିଜେ ଘୋଷଣା କରୁନ୍ତୁ। ହେ ଜନେଶ୍ୱର, ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ସଭାରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ଦେବା ଛଡ଼ା ଆଉ କଣ କୁହାଯାଇପାରେ? ଏହା କଲେ ଆପଣ ଏହି କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ମୃତ୍ୟୁପାଶରୁ ମୁକ୍ତ କରିବେ। ହେ ପୁରୁଷରତ୍ନ! ଏହି ବୀରମାନଙ୍କୁ ବିନାଶର ଫାନ୍ଦରୁ ଛୁଟାନ୍ତୁ।
Verse 54
प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा मन्युवशमन्वगा: । पित्र्यं तेभ्य: प्रदायांशं पाण्डवेभ्यो यथोचितम्
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଶାନ୍ତ ହୁଅନ୍ତୁ; କ୍ରୋଧର ବଶରେ ପଡ଼ନ୍ତୁ ନାହିଁ। ସେମାନଙ୍କୁ ସେମାନଙ୍କର ପୈତୃକ ଅଂଶ ଦେଇ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଭାଗ ପ୍ରଦାନ କରନ୍ତୁ।
Verse 55
ततः सपुत्र: सिद्धार्थो भुडुक्ष्व भोगान् परंतप । भरतश्रेष्ठ! शान्त हो जाइये, क्रोधके वशीभूत न होइये। परंतप! पाण्डवोंको यथोचित पैतृक राज्यभाग देकर अपने पुत्रोंक साथ सफलमनोरथ हो मनोवांछित भोग भोगिये ।। ५४ -॥] अजातशन्रुं जानीषे स्थितं धर्मे सतां सदा,नरेश्वरर आप जानते हैं कि अजातशत्रु युधिष्ठिर सदा सत्पुरुषोंके धर्मपर स्थित हैं। उनका पुत्रोंसहित आपके प्रति जो बर्ताव है, उससे भी आप अपरिचित नहीं हैं। आपलोगोंने उन्हें लाक्षागृहूकी आगमें जलवाया तथा राज्य और देशसे निकाल दिया; तो भी वे पुनः आपकी ही शरणमें आये हैं
ତାପରେ, ହେ ପରନ୍ତପ! ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ କୃତାର୍ଥ ହୋଇ ଇଚ୍ଛିତ ଭୋଗ ଉପଭୋଗ କରନ୍ତୁ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଶାନ୍ତ ହୁଅନ୍ତୁ; କ୍ରୋଧର ବଶରେ ପଡ଼ନ୍ତୁ ନାହିଁ। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ପୈତୃକ ରାଜ୍ୟଭାଗ ଦେଇ, ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ମନୋରଥ ସିଦ୍ଧ କରି ମନୋବାଞ୍ଛିତ ସୁଖ ଭୋଗ କରନ୍ତୁ। ଆପଣ ଜାଣନ୍ତି—ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସଦା ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଧର୍ମରେ ଅବସ୍ଥିତ। ସେ ଓ ତାଙ୍କ ଭାଇମାନେ ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଯେପରି ବ୍ୟବହାର କରିଛନ୍ତି, ତାହା ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କୁ ଅଜଣା ନୁହେଁ। ଆପଣ ସେମାନଙ୍କୁ ଲାକ୍ଷାଗୃହର ଅଗ୍ନିରେ ଦହାଇବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରିଥିଲେ ଏବଂ ରାଜ୍ୟ-ଦେଶରୁ ବାହାର କରିଦେଇଥିଲେ; ତଥାପି ସେମାନେ ପୁଣି ଆପଣଙ୍କ ଶରଣକୁ ଫେରିଆସିଛନ୍ତି।
Verse 56
सपुत्रे त्वयि वृत्तिं च वर्तते यां नराधिप । दाहितश्च निरस्तश्न त्वामेवोपाश्रित: पुन:,नरेश्वरर आप जानते हैं कि अजातशत्रु युधिष्ठिर सदा सत्पुरुषोंके धर्मपर स्थित हैं। उनका पुत्रोंसहित आपके प्रति जो बर्ताव है, उससे भी आप अपरिचित नहीं हैं। आपलोगोंने उन्हें लाक्षागृहूकी आगमें जलवाया तथा राज्य और देशसे निकाल दिया; तो भी वे पुनः आपकी ही शरणमें आये हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନରାଧିପ! ପୁତ୍ରସହିତ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯେପରି ସଦା ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଆଚରଣ କରିଆସିଛନ୍ତି, ତାହା ଆପଣଙ୍କୁ ଅଜଣା ନୁହେଁ। ଲାକ୍ଷାଗୃହରେ ଦହାଇବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରି ଏବଂ ରାଜ୍ୟ-ଦେଶରୁ ନିର୍ବାସିତ କରିଦେଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ପୁନଃ କେବଳ ଆପଣଙ୍କୁ ହିଁ ଶରଣ ନେଇ ଫେରିଆସିଲେ।
Verse 57
इन्द्रप्रस्थं त्ववैवासौ सपुत्रेण विवासित: । स तत्र विवसन् सर्वान् वशमानीय पार्थिवान्
କିନ୍ତୁ ସେ ପୁତ୍ରସହିତ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥରୁ ନିର୍ବାସିତ ହେଲେ। ସେଠାରେ ନିର୍ବାସରେ ରହି ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ନିଜ ବଶରେ ଆଣିଲେ।
Verse 58
त्वन्मुखानकरोद् राजन् न च त्वामत्यवर्तत | पुत्रोंसहित आपने ही युधिष्ठिरको यहाँसे निकालकर इन्द्रप्रसथ्थका निवासी बनाया। वहाँ रहकर उन्होंने समस्त राजाओंको अपने वशमें किया और उन्हें आपका मुखापेक्षी बना दिया। राजन! तो भी युधिष्ठिरने कभी आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं किया || ५७ ह || तस्यैवं वर्तमानस्य सौबलेन जिहीर्षता
ହେ ରାଜନ! ସେ ଆପଣଙ୍କ ଅନୁମତିରେ ହିଁ ସବୁ କରୁଥିଲେ ଏବଂ କେବେ ଆପଣଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରିନଥିଲେ। ସେ ଏଭଳି ଚାଲିଥିବାବେଳେ, ସୌବଲପୁତ୍ର (ଶକୁନି) ହରଣ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ…
Verse 59
राष्ट्राणि धनधान्यं च प्रयुक्त: परमोपधि: । ऐसे साधु बर्ताववाले युधिष्ठिरके राज्य तथा धन-धान्यका अपहरण कर लेनेकी इच्छासे सुबलपुत्र शकुनिने जूएके बहाने अपना महान् कपटजाल फैलाया ।। स तामवस्थां सम्प्राप्य कृष्णां प्रेक्षय सभागताम्
ରାଜ୍ୟ ଓ ଧନ-ଧାନ୍ୟ ହରଣ କରିବାକୁ ପରମ କପଟ ପ୍ରୟୋଗ କରି, ସୌବଲପୁତ୍ର ଶକୁନି ଜୁଆର ନିମିତ୍ତରେ ଛଳର ବିଶାଳ ଜାଲ ପସାରିଲା। ସେହି ଅବସ୍ଥାକୁ ପହଞ୍ଚାଇ, ସଭାକୁ ଆସିଥିବା କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)କୁ ସେ ଦେଖିଲା।
Verse 60
क्षत्रधर्मादमेयात्मा नाकम्पत युधिष्ठिर: । उस दयनीय अवस्थामें पहुँचकर अपनी महारानी कृष्णाको सभामें (तिरस्कारपूर्वक) लायी गयी देखकर भी महामना युधिष्ठिर अपने क्षत्रियधर्मसे विचलित नहीं हुए ।। अहं तु तव तेषां च श्रेय इच्छामि भारत,भारत! मैं तो आपका और पाण्डवोंका भी कल्याण ही चाहता हूँ। राजन! आप समस्त प्रजाको धर्म, अर्थ और सुखसे वंचित न कीजिये। इस समय आप अनर्थको ही अर्थ और अर्थको ही अपने लिये अनर्थ मान रहे हैं
କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ଅଚଳ ମହାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିର କମ୍ପିଲେ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କର ଓ ସେମାନଙ୍କର—ଦୁହିଁଙ୍କର—ମଙ୍ଗଳ ଇଚ୍ଛା କରେ; ପ୍ରଜାକୁ ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ ଓ ସୁଖରୁ ବଞ୍ଚିତ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ—ଏହି ସମୟରେ ଆପଣ ଅନର୍ଥକୁ ହିଁ ଅର୍ଥ ଭାବୁଛନ୍ତି ଏବଂ ସତ୍ୟ ଶ୍ରେୟକୁ ନିଜ ପାଇଁ ଅନର୍ଥ ମାନୁଛନ୍ତି।
Verse 61
धर्मादर्थात् सुखाच्चैव मा राजन् नीनश: प्रजा: । अनर्थमर्थ मन्वानो<प्यर्थ चानर्थमात्मन:,भारत! मैं तो आपका और पाण्डवोंका भी कल्याण ही चाहता हूँ। राजन! आप समस्त प्रजाको धर्म, अर्थ और सुखसे वंचित न कीजिये। इस समय आप अनर्थको ही अर्थ और अर्थको ही अपने लिये अनर्थ मान रहे हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ପ୍ରଜାମାନଙ୍କୁ ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ ଓ ସୁଖରୁ ବଞ୍ଚିତ କରନି। ଏବେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଯାହା ସତ୍ୟ ଅନର୍ଥ, ତାହାକୁ ଅର୍ଥ ଭାବୁଛ; ଏବଂ ଯାହା ସତ୍ୟ ଅର୍ଥ, ତାହାକୁ ନିଜ ପାଇଁ ଅନର୍ଥ ମନେ କରୁଛ। ମୁଁ ତୁମର ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର କଲ୍ୟାଣ ମାତ୍ର ଚାହୁଁଛି।
Verse 62
लोभे5तिप्रसृतान् पुत्रान् निगृह्लीष्व विशाम्पते । स्थिता: शुश्रूषितुं पार्था: स्थिता योद्धुमरिंदमा: । यत् ते पथ्यतमं राजंस्तस्मिंस्तिष्ठ परंतप,प्रजानाथ! आपके पुत्र लोभमें अत्यन्त आसक्त हो गये हैं, उन्हें काबूमें लाइये। राजन! शत्रुओंका दमन करनेवाले कुन्तीके पुत्र आपकी सेवाके लिये भी तैयार हैं और युद्धके लिये भी प्रस्तुत हैं। परंतप! जो आपके लिये विशेष हितकर जान पड़े, उसी मार्गका अवलम्बन कीजिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାନାଥ! ଲୋଭରେ ଅତ୍ୟଧିକ ଆସକ୍ତ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିବା ତୁମ ପୁଅମାନଙ୍କୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କର। ରାଜନ୍! ଶତ୍ରୁଦମନକାରୀ ପାର୍ଥମାନେ ତୁମ ସେବା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ, ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ପରନ୍ତପ! ଯାହା ତୁମ ପାଇଁ ସର୍ବାଧିକ ହିତକର, ସେଇ ପଥରେ ଦୃଢ଼ ରୁହ।
Verse 63
वैशम्पायन उवाच तद् वाक्यं पार्थिवा: सर्वे हृदयैः समपूजयन् । नतत्र कश्रनिद् वक्तुं हि वाचं प्राक्रामदग्रत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके उस कथनका समस्त राजाओंने हृदयसे आदर किया। वहाँ उसके उत्तरमें कोई भी कुछ कहनेके लिये अग्रसर न हो सका
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ସମସ୍ତ ରାଜା ହୃଦୟପୂର୍ବକ ସେଇ ବାକ୍ୟକୁ ସମ୍ମାନ କଲେ; କିନ୍ତୁ ତାହାର ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ କେହି ଆଗକୁ ବଢ଼ିଲେ ନାହିଁ।
Verse 456
वर्तामहे त्वयि च तां त्वं च वर्तस्व नस्तथा | “भारत! गुरुजनोंके प्रति शिष्य एवं पुत्रोंका जो बर्ताव होना चाहिये, हम आपके प्रति उसीका पालन करते हैं। आप भी हमलोगोंपर गुरुजनोचित स्नेह रखते हुए तदनुरूप बर्ताव कीजिये
ହେ ଭାରତ! ଗୁରୁଜନଙ୍କ ପ୍ରତି ଶିଷ୍ୟ ଓ ପୁତ୍ରଙ୍କ ଯେପରି ବ୍ୟବହାର ହେବା ଉଚିତ, ଆମେ ତୁମ ପ୍ରତି ସେହିପରି ଆଚରଣ କରୁଛୁ। ତୁମେ ମଧ୍ୟ ଗୁରୁଜନୋଚିତ ସ୍ନେହ ରଖି ଆମ ପ୍ରତି ସେହି ଅନୁରୂପ ବ୍ୟବହାର କର।
Verse 466
संस्थापय पथिष्वस्मांस्तिष्ठ धर्मे सुवर्त्मनि । “हम पुत्रगण यदि कुमार्गपर जा रहे हों तो पिताके नाते आपका कर्तव्य है कि हमें सन्मार्गमें स्थापित करें। इसलिये आप स्वयं धर्मके सुन्दर मार्गपर स्थित होइये और हमें भी धर्मके मार्गपर ही लाइये'
ଆମକୁ ସଠିକ୍ ପଥରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ସ୍ଥାପନ କର। ତୁମେ ନିଜେ ଧର୍ମର ସୁନ୍ଦର, ସୁପଥରେ ଅଟୁଟ ରୁହି, ଆମକୁ ମଧ୍ୟ ସେଇ ଧର୍ମପଥକୁ ନେଇଆ।
Verse 473
धर्मज्ञेषु सभासत्सु नेह युक्तमसाम्प्रतम् । भरतश्रेष्ठ! आपके पुत्र पाण्डवोंने इस सभाके लिये भी यह संदेश दिया है--“आप समस्त सभासदगण धर्मके ज्ञाता हैं। आपके रहते हुए यहाँ कोई अयोग्य कार्य हो, यह उचित नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଧର୍ମଜ୍ଞ ସଭାସଦମାନେ ଯେଉଁ ସଭାରେ ଅଛନ୍ତି, ସେଠାରେ କୌଣସି ଅନୁଚିତ କାର୍ଯ୍ୟ ହେବା ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ନୁହେଁ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମ ପୁତ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହି ସଭା ପାଇଁ ଏହି ସନ୍ଦେଶ ପଠାଇଛନ୍ତି—‘ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ଧର୍ମଜ୍ଞ। ଆପଣମାନେ ଥିବାବେଳେ ଏଠାରେ କୌଣସି ଅଯୋଗ୍ୟ କର୍ମ ଘଟିବାକୁ ଦେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।’”
The dilemma is whether a ruler should pursue prestige through provocation and contest, or accept restraint and humility when confronted with a higher, non-coercive form of power that exposes the ethical and strategic costs of pride.
Power is not only martial; it is also moral and ascetic. The chapter instructs that kings should abandon arrogance, avoid contempt for others, cultivate self-control, and prioritize protection of subjects—treating reconciliation as a rational dharmic policy.
There is no formal phalaśruti formula; the meta-commentary is functional and political: the narrative explicitly identifies Nara-Nārāyaṇa with Arjuna-Kṛṣṇa and uses that identification as a directive to pacify relations and avoid an escalation mindset.