
Kṛṣṇa at Duryodhana’s House: Refusal of Hospitality and Departure to Vidura (कृष्णस्य धार्तराष्ट्रनिवेशनगमनम्)
Upa-parva: Kṛṣṇa-dūta (Embassy of Kṛṣṇa) Episode
Vaiśaṃpāyana narrates Kṛṣṇa’s formal approach to Duryodhana’s residence after taking leave of Pṛthā (Kuntī). Kṛṣṇa passes successive guarded thresholds, ascends a splendid palace, and encounters Duryodhana seated amid Kuru elites and allied kings, including Duḥśāsana, Karṇa, and Śakuni. Duryodhana rises with ministers to honor Kṛṣṇa; Kṛṣṇa is seated on an ornate couch and offered madhuparka and other provisions. Duryodhana invites him to dine, but Kṛṣṇa declines, stating that envoys accept enjoyment and honors only after accomplishing their purpose; he will accept proper honor when his diplomatic task is complete. When questioned, Kṛṣṇa clarifies that he does not refuse from desire, anger, hatred, gain, or greed; rather, hospitality is appropriate only within goodwill or genuine distress, and he identifies Duryodhana’s ungrounded hostility toward the virtuous Pāṇḍavas as ethically incoherent. Kṛṣṇa asserts solidarity with dharma-aligned Pāṇḍavas and critiques envy and uncontrolled passions as causes of instability. Declaring the offered food unfit (as associated with hostile intent), he exits the palace and proceeds to Vidura’s home, where elders (Droṇa, Kṛpa, Bhīṣma, Bāhlika) and Kurus again offer residences and gifts; Kṛṣṇa courteously declines, and Vidura provides sincere hospitality, after which Kṛṣṇa partakes and honors learned brāhmaṇas with gifts.
Chapter Arc: श्रीकृष्ण पाण्डव-शिविर में कुन्ती के समीप आते हैं; सूर्य-सम तेजस्वी गोविन्द को देखकर कुन्ती वर्षों के शोक को रोक नहीं पाती और पुत्र-स्मरण में विलाप करती है। → कुन्ती कृष्ण को कण्ठ से लगाकर अपने बिछुड़े दिनों, सभा-अपमान और युद्ध के अनिवार्य होते जाने की पीड़ा उँडेलती है—वह बताती है कि पुत्रों को सामने न देखना ही उसके लिए असह्य है, और समय आने पर जीवन तक त्यागने का विधान है तो फिर धर्मयुद्ध से पीछे हटना कैसे उचित होगा। → कुन्ती कृष्ण के सामने अपना अंतिम भरोसा रखती है—‘तुम ही नाथ हो, तुम ही आश्रय’; वह कृष्ण को कुरु-पाण्डव और समस्त लोक-व्यवस्था की गति मानकर निवेदन करती है कि जो-जो पाण्डवों के लिए पथ्य और धर्मसम्मत हो, वही निर्णय कृष्ण करें। → कुन्ती कृष्ण के विवेक और नीति पर पूर्ण समर्पण करती है; कृष्ण के आश्वासन से उसका विलाप संयत होता है और वह युद्ध-पूर्व नीति-प्रयासों को कृष्ण के हाथों सौंप देती है। → कृष्ण अब कुन्ती के शोक और धर्म-आग्रह को हृदय में रखकर आगे की कूटनीति/दूतकार्य की दिशा तय करने को अग्रसर होते हैं।
Verse 1
अफ--रू- >> नवतितमो< ध्याय: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल- समाचार पूछकर 53 ६8 :खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना वैशम्पायन उवाच अथोपगम्य विदुरमपराह्ने जनार्दन: । पितृष्वसारं स पृथामभ्यगच्छदरिंदम:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! शत्रुदमन श्रीकृष्ण विदुरजीसे मिलनेके पश्चात् तीसरे पहरमें अपनी बुआ कुन्तीदेवीके पास गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଅପରାହ୍ଣେ ବିଦୁରଙ୍କୁ ଭେଟି ସାରି, ଶତ୍ରୁଦମନ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ନିଜ ପିତୃସ୍ୱସା ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ)ଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ।
Verse 2
सा दृष्टवा कृष्णमायान्तं प्रसन्नादित्यवर्चसम् । कण्ठे गृहीत्वा प्राक्रोशत् स्मरन््ती तनयान् पृथा,निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी श्रीकृष्णको आते देख कुन्तीदेवी उनके गले लग गयीं और अपने पुत्रोंको याद करके फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगीं
ନିର୍ମଳ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସଦୃଶ ତେଜସ୍ୱୀ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଆସୁଥିବା ଦେଖି ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ) ତାଙ୍କ କଣ୍ଠକୁ ଧରି ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ ଏବଂ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କରି ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ କ୍ରନ୍ଦନ କଲେ।
Verse 3
तेषां सत्त्ववतां मध्ये गोविन्द सहचारिणम् । चिरस्य दृष्टवा वार्ष्णेयं बाष्पमाहारयत् पृथा,अपने उन शक्तिशाली पुत्रोंके बीचमें रहकर उनके साथ विचरनेवाले वृष्णिकुलनन्दन गोविन्दको दीर्घकालके पश्चात् देखकर कुन्तीदेवी आँसुओंकी वर्षा करने लगीं
ସେହି ସତ୍ତ୍ୱବାନ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତାଙ୍କ ସହଚର ଵୃଷ୍ଣିକୁଳନନ୍ଦନ ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କୁ ଦୀର୍ଘକାଳ ପରେ ଦେଖି ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ) ଅଶ୍ରୁ ପ୍ରବାହ କଲେ।
Verse 4
साब्रवीत् कृष्णमासीनं कृतातिथ्यं युधां पतिम् । बाष्पगद्गदपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता,उन्होंने योद्धाओंके स्वामी श्रीकृष्णका अतिथि-सत्कार किया। जब वे आतिथ्य ग्रहण करके आसनपर विराजमान हुए, तब सूखे मुँह और अश्रुगदगद कण्ठसे कुन्तीदेवी इस प्रकार बोलीं--
ଅତିଥି-ସତ୍କାର କରି, ଯୁଦ୍ଧମାନଙ୍କ ନାୟକ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଆସନରେ ଉପବିଷ୍ଟ ହେଲେ; ତେବେ ମୁଖ ଶୁଷ୍କ ହେଉଥିବା ଓ ଅଶ୍ରୁରେ ଗଦ୍ଗଦ କଣ୍ଠରେ ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ) ତାଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 5
ये ते बाल्यात् प्रभृत्येव गुरुशुश्रूषणे रता: । परस्परस्य सुहृद: सम्मता: समचेतस: । निकृत्या भ्रेशिता राज्याज्जना्हा निर्जनं गता:,“वत्स! मेरे पुत्र पाण्डव, जो बाल्यकालसे ही गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषामें तत्पर रहते, परस्पर स्नेह रखते, सर्वत्र सम्मान पाते और मनमें सबके प्रति समानभाव रखते थे, शत्रुओंकी शठताके शिकार होकर राज्यसे हाथ धो बैठे और जनसमुदायमें रहनेयोग्य होकर भी निर्जन वनमें चले गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ବତ୍ସ! ତୋର ସେ ପାଣ୍ଡବ ପୁତ୍ରମାନେ, ଯେମାନେ ବାଳ୍ୟକାଳରୁ ଗୁରୁଜନଙ୍କ ସେବା-ଶୁଶ୍ରୂଷାରେ ରତ, ପରସ୍ପର ସ୍ନେହୀ ସୁହୃଦ, ସମସ୍ତଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ଏବଂ ସବୁଙ୍କ ପ୍ରତି ସମଚିତ୍ତ ଥିଲେ—ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ କପଟତାରେ ରାଜ୍ୟରୁ ଚ୍ୟୁତ ହୋଇ, ଲୋକମଧ୍ୟରେ ରହିବାଯୋଗ୍ୟ ହେଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ନିର୍ଜନ ଅରଣ୍ୟକୁ ଗଲେ।
Verse 6
विनीतक्रो धहर्षश्न ब्रह्माण्या: सत्यवादिन: । त्यक्त्वा प्रियसुखे पार्था रूवतीमपहाय माम्,'मेरे बेटे हर्ष और क्रोधको जीत चुके थे। वे ब्राह्मणोंका हित-साधन करनेवाले तथा सत्यवादी थे; तथापि (शत्रुओंके अन्यायसे विवश हो) प्रियजन एवं सुखभोगसे मुँह मोड़ मुझे रोती-बिलखती छोड़कर वे वनकी ओर चल दिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପାର୍ଥମାନେ ହର୍ଷ ଓ କ୍ରୋଧକୁ ଜୟ କରିଥିଲେ। ସେମାନେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ହିତସାଧକ ଏବଂ ସତ୍ୟବାଦୀ ଥିଲେ; ତଥାପି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଅନ୍ୟାୟରେ ବିବଶ ହୋଇ, ପ୍ରିୟଜନ ଓ ସୁଖଭୋଗ ତ୍ୟାଗ କରି, ମୋତେ କାନ୍ଦୁଥିବା ଅବସ୍ଥାରେ ଛାଡ଼ି, ସେମାନେ ଅରଣ୍ୟ ପଥେ ଚାଲିଗଲେ।
Verse 7
अहार्षुश्न वनं॑ यान्त: समूलं हृदयं मम | अतदर्हा महात्मान: कथ॑ं केशव पाण्डवा:,“केशव! वन जाते समय महात्मा पाण्डव मेरे हृदयको जड़-मूलसहित खींचकर अपने साथ ले गये। वे वनवासके योग्य कदापि नहीं थे। फिर उन्हें यह कष्ट कैसे प्राप्त हुआ?
ହେ କେଶବ! ଅରଣ୍ୟକୁ ଯାଉଥିବା ସେ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନେ ମୋ ହୃଦୟକୁ ମୂଳସହିତ ଉପାଡ଼ି ନେଇଗଲେ ବୋଲି ମନେ ହେଲା। ସେମାନେ କେବେ ମଧ୍ୟ ବନବାସର ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ; ତେବେ ସେମାନଙ୍କୁ ଏପରି ଦୁଃଖ କିପରି ମିଳିଲା?
Verse 8
ऊषुर्महावने तात सिंहव्याप्रगजाकुले । बाला विहीना: पित्रा ते मया सततलालिता:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାତ! ସିଂହ, ବ୍ୟାଘ୍ର ଓ ଗଜରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ସେ ମହାବନରେ ସେମାନେ ବସବାସ କଲେ। ପିତୃବିହୀନ ସେ ଶିଶୁମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ସଦା ସ୍ନେହରେ ଲାଳନ-ପାଳନ କରିଛି।
Verse 9
अपश्यन्तश्न॒ पितरौ कथमूषुर्महावने । “तात! वे बचपनमें ही पिताके प्यारसे वंचित हो गये थे। मैंने ही सदा उनका लालन- पालन किया। मेरे पुत्र सिंह, व्याप्र और हाथियोंसे भरे हुए उस विशाल वनमें कैसे रहे होंगे? माता-पिताको न देखते हुए उन्होंने उस महान् वनमें किस प्रकार निवास किया होगा? ।। शड्खदुन्दुभिनिर्धोषिमदज्जै्वेणुनिस्चनै:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାତା-ପିତାଙ୍କୁ ନ ଦେଖି ସେମାନେ ସେ ମହାବନରେ କିପରି ରହିଲେ? ‘ତାତ! ବାଳ୍ୟକାଳରୁ ସେମାନେ ପିତୃସ୍ନେହରୁ ବଞ୍ଚିତ; ମୁଁ ହିଁ ସଦା ସେମାନଙ୍କୁ ଲାଳନ-ପାଳନ କରିଛି। ସିଂହ, ବ୍ୟାଘ୍ର ଓ ଗଜରେ ଭରିଥିବା ସେ ବିଶାଳ ଅରଣ୍ୟରେ ମୋ ପୁତ୍ରମାନେ କିପରି ରହିଥିବେ? ମାତା-ପିତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ନ ପାଇ ସେମାନେ ସେ ମହାବନରେ କିପରି ନିବାସ କଲେ?’—ଏହିପରି କହି; ତାପରେ ଶଙ୍ଖ ଓ ଦୁନ୍ଦୁଭିର ନିର୍ଘୋଷ, ତୂର୍ୟର ଘୋଷ ଏବଂ ବେଣୁର ଶିଟି-ନାଦରେ ଅରଣ୍ୟ ପ୍ରତିନାଦିତ ହେଲା।
Verse 10
ये सम वारणशब्देन हयानां ह्ेषितेन च
ସେହି କୋଳାହଳ ମଧ୍ୟରେ ହାତୀଙ୍କ ତୂର୍ୟନାଦ ଓ ଘୋଡ଼ାଙ୍କ ହ୍ରେଷାଧ୍ୱନି—ସେନାସମାବେଶ ଓ ଯୁଦ୍ଧସନ୍ନାହର ସୂଚକ—ଶୁଣି ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ, ବଢ଼ୁଥିବା ସଂଘର୍ଷବେଗକୁ ଅନୁସରି ସେମାନେ ଆଗେଇଲେ।
Verse 11
रथनेमिनिनादैश्व व्यबोध्यन्त तदा गृहे । शड्खभेरीनिनादेन वेणुवीणानुनादिना
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ: ସେତେବେଳେ ଘରେ ରଥଚକ୍ରର ଗମ୍ଭୀର ନିନାଦରେ ଲୋକେ ଜାଗିଉଠିଲେ; ଶଙ୍ଖ-ଭେରୀର ଘୋଷ ଓ ବେଣୁ-ବୀଣାର ଅନୁନାଦ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ସଚେତନ କଲା।
Verse 12
पुण्याहघोषमिश्रेण पूज्यमाना द्विजातिभि: । वस्त्रै रत्नैरलंकारै: पूजयन्तो द्विजन्मन:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ: ପୁଣ୍ୟାହ ଘୋଷ ମିଶିତ ମଙ୍ଗଳଧ୍ୱନି ମଧ୍ୟରେ ସେମାନେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ ହେଉଥିଲେ; ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣଜନମାନେ ବସ୍ତ୍ର, ରତ୍ନ ଓ ଅଳଙ୍କାର ଦେଇ ସମ୍ମାନ-ପୂଜା କରୁଥିଲେ।
Verse 13
गीर्भिमिड्रलयुक्ताभित्रद्वयिणानां महात्मनाम् | अर्चितिरचनाहैं श्व स्तुवद्धिरभिनन्दिता:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ: ସେହି ମହାତ୍ମାମାନେ ମଙ୍ଗଳଯୁକ୍ତ, ସୁରଚିତ ସ୍ତୁତିବାକ୍ୟରେ ଅର୍ଚିତ ହେଲେ; ଏବଂ ସ୍ତୁତିକାରମାନେ ଶ୍ରଦ୍ଧା ଓ ଅନୁମୋଦନ ସହିତ ସେମାନଙ୍କୁ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ।
Verse 14
प्रासादाग्रेष्वबो ध्यन्त राइकवाजिनशायिन: । क़रूरं च निनदं श्रुत्वा श्वापदानां महावने
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ: ପ୍ରାସାଦର ଉପର ତଳରେ ଶୋଇଥିବା ଲୋକେ, ମହାବନରେ ଶ୍ୱାପଦମାନଙ୍କର କ୍ରୂର ଓ ଅଶୁଭ ନିନାଦ ଶୁଣି ଜାଗିଉଠିଲେ।
Verse 15
न स्मोपयान्ति निद्रां ते न तदर्हा जनार्दन । “जब वे अपनी राजधानीमें ऊँची अट्टालिकाओंके भीतर रंकुमृगके चर्मसे बने हुए बिछौनोंसे युक्त सुकोमल शय्याओंपर शयन करते थे, उन दिनों हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने तथा रथके पहियोंके घर्घरानेसे उनकी निद्रा टूटती थी। शंख और भेरीकी तुमुल ध्वनि तथा वेणु और वीणाके मधुर स्वरसे उन्हें जगाया जाता था। साथ ही ब्राह्मणलोग पुण्याहवाचनके पवित्र घोषसे उनका समादर करते थे। वे महात्मा ब्राह्मणोंके मंगलमय आशीर्वाद सुनकर उठते थे। पूजित और पूजनीय पुरुष भी उनके गुण गा-गाकर अभिनन्दन किया करते थे एवं उठकर वे रत्नों, वस्त्रों एवं अलंकारोंके द्वारा ब्राह्मणोंकी पूजा करते थे। जनार्दन! वे ही पाण्डव उस विशाल वनमें हिंसक जन्तुओंके क्रूरतापूर्ण शब्द सुनकर अच्छी तरह नींद भी नहीं ले पाते रहे होंगे, यद्यपि इस दुरवस्थाके योग्य वे कभी नहीं थे || १०--१४ ह ।। भेरीमृदड़निनदैः शड्खवैणवनिस्वनै:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ସେମାନଙ୍କୁ ନିଦ୍ରା ଆସୁନାହିଁ; ଏପରି ଅବସ୍ଥା ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। ଯେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ପୂର୍ବେ ନିଜ ରାଜଧାନୀର ଉଚ୍ଚ ପ୍ରାସାଦମାନଙ୍କ ଭିତରେ ମୃଗଚର୍ମର ପଥାରଣ ସହିତ କୋମଳ ଶୟ୍ୟାରେ ଶୟନ କରୁଥିଲେ, ଯାହାଙ୍କ ନିଦ୍ରା ହାତୀର ଗର୍ଜନ, ଘୋଡ଼ାର ହିନ୍ହିନାହଟ ଓ ରଥଚକ୍ରର ଘର୍ଘର ଶବ୍ଦରେ ଭଙ୍ଗ ହୁଏଥିଲା; ଯାହାଙ୍କୁ ଶଙ୍ଖ-ଭେରୀର ତୁମୁଳ ଧ୍ୱନି ଓ ବେଣୁ-ବୀଣାର ମଧୁର ସ୍ୱର ଜଗାଉଥିଲା; ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ପୁଣ୍ୟାହବାଚନର ପବିତ୍ର ଘୋଷରେ ସମ୍ମାନ କରୁଥିଲେ ଏବଂ ମହାତ୍ମ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ଆଶୀର୍ବାଦ ଶୁଣି ସେମାନେ ଉଠୁଥିଲେ— ସେଇ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଏବେ ବିଶାଳ ବନରେ ହିଂସ୍ର ପଶୁମାନଙ୍କ କଠୋର ଡାକ ଶୁଣି ବ୍ୟାକୁଳ ହୋଇ ଭଲରେ ନିଦ୍ରା ମଧ୍ୟ ପାଇପାରୁନାହାନ୍ତି। ଏହି ଦୁର୍ଦ୍ଦଶା ସେମାନଙ୍କ ପୂର୍ବ ଗରିମା ସହିତ ସ୍ପଷ୍ଟ ବିରୋଧୀ।
Verse 16
सत्रीणां गीतनिनादैश्व मधुरैर्मधुसूदन । वन्दिमागधसूतैश्न स्तुवद्धिबोधिता: कथम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମଧୁସୂଦନ! ସେମାନେ କିପରି ଜାଗୁଥିଲେ— ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧୁର ଗୀତନିନାଦରେ ଏବଂ ବନ୍ଦୀ, ମାଗଧ ଓ ସୂତମାନଙ୍କ ସ୍ତୁତିଗାନରେ?
Verse 17
महावनेष्वबोध्यन्त श्वापदानां रुतेन च | “मधुसूदन! जो भेरी एवं मृदंगके नादसे, शंख एवं वेणुकी ध्वनिसे तथा स्त्रियोंके गीतोंके मधुर शब्द तथा सूत, मागध एवं वन्दीजनोंद्वारा की हुई स्तुति सुनकर जागते थे, वे ही बड़े-बड़े जंगलोंमें हिंसक जन्तुओंके कठोर शब्द सुनकर किस प्रकार नींद तोड़ते रहे होंगे? ।। ह्वीमान् सत्यधृतिर्दान्तो भूतानामनुकम्पिता,“श्रीकृष्ण! जो लज्जाशील, सत्यको धारण करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा सब प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं; जो काम (राग) एवं द्वेषको वशमें करके सत्पुरुषोंके मार्गकका अनुसरण करते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप एवं उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन राजर्षियोंके सदाचारपालनरूप धारण करनेमें कठिन धर्मकी धुरीको धारण करते हैं; जिनमें शील और सदाचारकी सम्पत्ति भरी हुई है, जो धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण इस भूमण्डलके ही नहीं, तीनों लोकोंके भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है, जो धर्मशास्त्रज्ञान और सदाचार सभी दृष्टियोंसे समस्त कौरवोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; जिनकी अंगकान्ति शुद्ध जाम्बूनद सुवर्णके समान गौर है, जो देखनेमें सभीको प्रिय लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାବନମାନଙ୍କରେ ସେମାନେ ଶ୍ୱାପଦମାନଙ୍କ ଡାକରେ ହିଁ ଜାଗୁଛନ୍ତି। ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଯେମାନେ ଭେରୀ ଓ ମୃଦଙ୍ଗର ନାଦ, ଶଙ୍ଖ ଓ ବେଣୁର ଧ୍ୱନି, ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧୁର ଗୀତ, ଏବଂ ସୂତ-ମାଗଧ-ବନ୍ଦୀମାନଙ୍କ ସ୍ତୁତି ଶୁଣି ଉଠୁଥିଲେ— ସେମାନେ ଏବେ ବିଶାଳ କାନନରେ କ୍ରୂର ପଶୁମାନଙ୍କ କଠୋର ଡାକ ଶୁଣି କିପରି ନିଦ୍ରା ଭଙ୍ଗ କରୁଛନ୍ତି? ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଏବେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କେମିତି ଅଛନ୍ତି— ଯିଏ ଲଜ୍ଜାଶୀଳ, ସତ୍ୟରେ ଦୃଢ଼, ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜିତ ଓ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀପ୍ରତି କରୁଣାମୟ; କାମ ଓ ଦ୍ୱେଷକୁ ବଶ କରି ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପଥ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି; ଅମ୍ବରୀଷ, ମାନ୍ଧାତା, ଯୟାତି, ନହୁଷ, ଭରତ, ଦିଲୀପ ଓ ଉଶୀନରପୁତ୍ର ଶିବି ଆଦି ପ୍ରାଚୀନ ରାଜର୍ଷିମାନଙ୍କ ସଦାଚାରରୂପ ଦୁର୍ବହ ଧର୍ମଧୁରକୁ ଧାରଣ କରନ୍ତି; ଶୀଳ ଓ ସଦାଚାରରେ ସମୃଦ୍ଧ; ଧର୍ମଜ୍ଞ, ସତ୍ୟପ୍ରତିଜ୍ଞ ଓ ସର୍ବଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ— ପୃଥିବୀ ନୁହେଁ, ତ୍ରିଲୋକର ମଧ୍ୟ ରାଜା ହେବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ; ଯାହାଙ୍କ ମନ ସଦା ଧର୍ମରେ ନିବଦ୍ଧ; କୌରବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ ଓ ସଦାଚାରରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ଯାହାଙ୍କ ଅଙ୍ଗକାନ୍ତି ଶୁଦ୍ଧ ଜାମ୍ବୂନଦ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ସମାନ ଗୌର ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ— ସେଇ ମହାବାହୁ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏହି ସମୟରେ କେମିତି ଅଛନ୍ତି?
Verse 18
कामद्वेषौ वशे कृत्वा सतां वत्मनिवर्तते | अम्बरीषस्य मान्धातुर्ययातेर्नहुषस्य च,“श्रीकृष्ण! जो लज्जाशील, सत्यको धारण करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा सब प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं; जो काम (राग) एवं द्वेषको वशमें करके सत्पुरुषोंके मार्गकका अनुसरण करते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप एवं उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन राजर्षियोंके सदाचारपालनरूप धारण करनेमें कठिन धर्मकी धुरीको धारण करते हैं; जिनमें शील और सदाचारकी सम्पत्ति भरी हुई है, जो धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण इस भूमण्डलके ही नहीं, तीनों लोकोंके भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है, जो धर्मशास्त्रज्ञान और सदाचार सभी दृष्टियोंसे समस्त कौरवोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; जिनकी अंगकान्ति शुद्ध जाम्बूनद सुवर्णके समान गौर है, जो देखनेमें सभीको प्रिय लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं?
କାମ ଓ ଦ୍ୱେଷକୁ ବଶ କରି ସେ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପଥ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି— ଅମ୍ବରୀଷ, ମାନ୍ଧାତା, ଯୟାତି ଓ ନହୁଷଙ୍କ ପରି।
Verse 19
भरतस्य दिलीपस्य शिबेरौशीनरस्य च । राजर्षीणां पुराणानां धुरं धत्ते दुरुद्वञग्यामू,“श्रीकृष्ण! जो लज्जाशील, सत्यको धारण करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा सब प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं; जो काम (राग) एवं द्वेषको वशमें करके सत्पुरुषोंके मार्गकका अनुसरण करते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप एवं उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन राजर्षियोंके सदाचारपालनरूप धारण करनेमें कठिन धर्मकी धुरीको धारण करते हैं; जिनमें शील और सदाचारकी सम्पत्ति भरी हुई है, जो धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण इस भूमण्डलके ही नहीं, तीनों लोकोंके भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है, जो धर्मशास्त्रज्ञान और सदाचार सभी दृष्टियोंसे समस्त कौरवोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; जिनकी अंगकान्ति शुद्ध जाम्बूनद सुवर्णके समान गौर है, जो देखनेमें सभीको प्रिय लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं?
ଭରତ, ଦିଲୀପ ଓ ଉଶୀନରପୁତ୍ର ଶିବି ଆଦି ପ୍ରାଚୀନ ରାଜର୍ଷିମାନଙ୍କ ଦୁର୍ବହ ଧର୍ମଧୁରକୁ ସେ ଧାରଣ କରନ୍ତି।
Verse 20
शीलवृत्तोपसम्पन्नो धर्मज्ञ: सत्यसंगर: । राजा सर्वगुणोपेतस्त्रैलेक्यस्यापि यो भवेत्,“श्रीकृष्ण! जो लज्जाशील, सत्यको धारण करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा सब प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं; जो काम (राग) एवं द्वेषको वशमें करके सत्पुरुषोंके मार्गकका अनुसरण करते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप एवं उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन राजर्षियोंके सदाचारपालनरूप धारण करनेमें कठिन धर्मकी धुरीको धारण करते हैं; जिनमें शील और सदाचारकी सम्पत्ति भरी हुई है, जो धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण इस भूमण्डलके ही नहीं, तीनों लोकोंके भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है, जो धर्मशास्त्रज्ञान और सदाचार सभी दृष्टियोंसे समस्त कौरवोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; जिनकी अंगकान्ति शुद्ध जाम्बूनद सुवर्णके समान गौर है, जो देखनेमें सभीको प्रिय लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେ ଶୀଳ ଓ ସଦାଚାରରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଧର୍ମଜ୍ଞ ଏବଂ ସତ୍ୟରେ ଅଟଳ—ସମସ୍ତ ଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ ଏମିତି ରାଜା କେବଳ ଏହି ପୃଥିବୀର ନୁହେଁ, ତ୍ରିଲୋକର ମଧ୍ୟ ଶାସନ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 21
अजातशश्न्रुर्थर्मात्मा शुद्धजाम्बूनदप्रभ: । श्रेष्ठ: कुरुषु सर्वेषु धर्मत: श्रुतवृत्तत: | प्रियदर्शो दीर्घभुज: कथं कृष्ण युधिषछ्िर:,“श्रीकृष्ण! जो लज्जाशील, सत्यको धारण करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा सब प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं; जो काम (राग) एवं द्वेषको वशमें करके सत्पुरुषोंके मार्गकका अनुसरण करते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप एवं उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन राजर्षियोंके सदाचारपालनरूप धारण करनेमें कठिन धर्मकी धुरीको धारण करते हैं; जिनमें शील और सदाचारकी सम्पत्ति भरी हुई है, जो धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण इस भूमण्डलके ही नहीं, तीनों लोकोंके भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है, जो धर्मशास्त्रज्ञान और सदाचार सभी दृष्टियोंसे समस्त कौरवोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; जिनकी अंगकान्ति शुद्ध जाम्बूनद सुवर्णके समान गौर है, जो देखनेमें सभीको प्रिय लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଅଜାତଶତ୍ରୁ, ଧର୍ମାତ୍ମା, ଶୁଦ୍ଧ ଜାମ୍ବୂନଦ ସୁବର୍ଣ୍ଣସମ ପ୍ରଭାବାନ, ଧର୍ମ, ଶ୍ରୁତି-ଜ୍ଞାନ ଓ ସଦାଚାରରେ ସମସ୍ତ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଦର୍ଶନେ ପ୍ରିୟ ଏବଂ ଦୀର୍ଘବାହୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏବେ କେମିତି ଅଛନ୍ତି?
Verse 22
यः स नागायुतप्राणो वातरंहा महाबल: । सामर्ष: पाण्डवो नित्यं प्रियो भ्रातु: प्रियंकर:,“मधुसूदन! जो पाण्डुनन्दन महाबली भीम दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली है, जिसका वेग वायुके समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाईको सदा ही प्रिय है और भाइयोंका प्रिय करनेमें ही लगा रहता है, जिसने भाई-बन्धुओंसहित कीचकका विनाश किया है, जिस शूरवीरके हाथसे क्रोधवश नामक राक्षसोंका, हिडिम्बासुर तथा बकका भी संहार हुआ है, जो पराक्रममें इन्द्र, बलमें वायुदेव तथा क्रोधमें महेश्वरके समान है, जो प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सर्वश्रेष्ठ एवं भयंकर है, शत्रुओंको संताप देनेवाला जो पाण्डुपुत्र भीम अपने भीतर क्रोध, बल और अमर्षको रखते हुए भी मनको काबूमें रखकर सदा भाईकी आज्ञाके अधीन रहता है, जो स्वभावत:ः अमर्षशील है, जिसमें तेजकी राशि संचित है, जो महात्मा, सर्वश्रेष्ठ, अमिततेजस्वी तथा देखनेमें भी भयंकर है, वृष्णिनन्दन जनार्दन! उस मेरे द्वितीय पुत्र भीमसेनका समाचार बताओ। इस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाला मेरा मँझला पुत्र पाण्डुकुमार भीमसेन कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଇ ପାଣ୍ଡବ ଭୀମ, ଯାହାର ପ୍ରାଣବଳ ଦଶହଜାର ହାତୀ ସମାନ ବୋଲି କୁହାଯାଏ, ଯାହାର ବେଗ ବାୟୁ ସଦୃଶ, ଯିଏ ମହାବଳୀ; ଯିଏ ସ୍ୱଭାବତଃ ଅମର୍ଷଶୀଳ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସଦା ଭ୍ରାତାଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଏବଂ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ କରିବାରେ ନିତ୍ୟ ଲଗ୍ନ—ତାଙ୍କ ସମ୍ବାଦ କହ। ପରିଘ ସମ ଦୃଢ଼ ଭୁଜାବଳୀ ମୋର ଦ୍ୱିତୀୟ ପୁତ୍ର ଭୀମସେନ ଏବେ କେମିତି ଅଛନ୍ତି?
Verse 23
कीचकस्य तु सज्ञातेर्यों हनता मधुसूदन । शूर: क्रोधवशानां च हिडिम्बस्य बकस्य च,“मधुसूदन! जो पाण्डुनन्दन महाबली भीम दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली है, जिसका वेग वायुके समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाईको सदा ही प्रिय है और भाइयोंका प्रिय करनेमें ही लगा रहता है, जिसने भाई-बन्धुओंसहित कीचकका विनाश किया है, जिस शूरवीरके हाथसे क्रोधवश नामक राक्षसोंका, हिडिम्बासुर तथा बकका भी संहार हुआ है, जो पराक्रममें इन्द्र, बलमें वायुदेव तथा क्रोधमें महेश्वरके समान है, जो प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सर्वश्रेष्ठ एवं भयंकर है, शत्रुओंको संताप देनेवाला जो पाण्डुपुत्र भीम अपने भीतर क्रोध, बल और अमर्षको रखते हुए भी मनको काबूमें रखकर सदा भाईकी आज्ञाके अधीन रहता है, जो स्वभावत:ः अमर्षशील है, जिसमें तेजकी राशि संचित है, जो महात्मा, सर्वश्रेष्ठ, अमिततेजस्वी तथा देखनेमें भी भयंकर है, वृष्णिनन्दन जनार्दन! उस मेरे द्वितीय पुत्र भीमसेनका समाचार बताओ। इस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाला मेरा मँझला पुत्र पाण्डुकुमार भीमसेन कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଯିଏ ପରିଚୟ ପ୍ରକାଶ ପାଇଲାପରେ କୀଚକଙ୍କୁ ବଧ କଲେ, ଏବଂ ‘କ୍ରୋଧବଶ’ ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କୁ, ହିଡିମ୍ବ ଓ ବକଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସଂହାର କଲେ—ସେଇ ଶୂର ଭୀମଙ୍କ ସମ୍ବାଦ କହ। ମୋର ସେଇ ଦ୍ୱିତୀୟ ପୁତ୍ର ଏବେ କେମିତି ଅଛନ୍ତି?
Verse 24
पराक्रमे शक्रसमो मातरिश्व॒समो बले । महेश्वरसम: क्रोधे भीम: प्रहरतां वर:,“मधुसूदन! जो पाण्डुनन्दन महाबली भीम दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली है, जिसका वेग वायुके समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाईको सदा ही प्रिय है और भाइयोंका प्रिय करनेमें ही लगा रहता है, जिसने भाई-बन्धुओंसहित कीचकका विनाश किया है, जिस शूरवीरके हाथसे क्रोधवश नामक राक्षसोंका, हिडिम्बासुर तथा बकका भी संहार हुआ है, जो पराक्रममें इन्द्र, बलमें वायुदेव तथा क्रोधमें महेश्वरके समान है, जो प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सर्वश्रेष्ठ एवं भयंकर है, शत्रुओंको संताप देनेवाला जो पाण्डुपुत्र भीम अपने भीतर क्रोध, बल और अमर्षको रखते हुए भी मनको काबूमें रखकर सदा भाईकी आज्ञाके अधीन रहता है, जो स्वभावत:ः अमर्षशील है, जिसमें तेजकी राशि संचित है, जो महात्मा, सर्वश्रेष्ठ, अमिततेजस्वी तथा देखनेमें भी भयंकर है, वृष्णिनन्दन जनार्दन! उस मेरे द्वितीय पुत्र भीमसेनका समाचार बताओ। इस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाला मेरा मँझला पुत्र पाण्डुकुमार भीमसेन कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପରାକ୍ରମରେ ସେ ଶକ୍ର ସମ, ବଳରେ ମାତରିଶ୍ୱ (ବାୟୁ) ସମ, ଏବଂ କ୍ରୋଧରେ ମହେଶ୍ୱର ସମ। ପ୍ରହାର କରୁଥିବା ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭୀମ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 25
क्रोधं बलममर्ष च यो निधाय परंतप: । जितात्मा पाण्डवोअमर्षी भ्रातुस्तिष्ठति शासने,“मधुसूदन! जो पाण्डुनन्दन महाबली भीम दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली है, जिसका वेग वायुके समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाईको सदा ही प्रिय है और भाइयोंका प्रिय करनेमें ही लगा रहता है, जिसने भाई-बन्धुओंसहित कीचकका विनाश किया है, जिस शूरवीरके हाथसे क्रोधवश नामक राक्षसोंका, हिडिम्बासुर तथा बकका भी संहार हुआ है, जो पराक्रममें इन्द्र, बलमें वायुदेव तथा क्रोधमें महेश्वरके समान है, जो प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सर्वश्रेष्ठ एवं भयंकर है, शत्रुओंको संताप देनेवाला जो पाण्डुपुत्र भीम अपने भीतर क्रोध, बल और अमर्षको रखते हुए भी मनको काबूमें रखकर सदा भाईकी आज्ञाके अधीन रहता है, जो स्वभावत:ः अमर्षशील है, जिसमें तेजकी राशि संचित है, जो महात्मा, सर्वश्रेष्ठ, अमिततेजस्वी तथा देखनेमें भी भयंकर है, वृष्णिनन्दन जनार्दन! उस मेरे द्वितीय पुत्र भीमसेनका समाचार बताओ। इस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाला मेरा मँझला पुत्र पाण्डुकुमार भीमसेन कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ସନ୍ତାପ ଦେଇଥିବା ସେହି ପାଣ୍ଡବ ସ୍ୱଭାବତଃ ଅସହିଷ୍ଣୁ ଓ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ନିଜ ମନରେ କ୍ରୋଧ, ବଳ ଓ ଅମର୍ଷକୁ ଦମନ କରି ରଖେ। ଆତ୍ମସଂଯମୀ ହୋଇ ସେ ଭାଇଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଅବସ୍ଥିତ ରହେ।
Verse 26
तेजोराशिं महात्मानं वरिष्ठममितौजसम् | भीम॑ प्रदर्शनेनापि भीमसेनं जनार्दन,“मधुसूदन! जो पाण्डुनन्दन महाबली भीम दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली है, जिसका वेग वायुके समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाईको सदा ही प्रिय है और भाइयोंका प्रिय करनेमें ही लगा रहता है, जिसने भाई-बन्धुओंसहित कीचकका विनाश किया है, जिस शूरवीरके हाथसे क्रोधवश नामक राक्षसोंका, हिडिम्बासुर तथा बकका भी संहार हुआ है, जो पराक्रममें इन्द्र, बलमें वायुदेव तथा क्रोधमें महेश्वरके समान है, जो प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सर्वश्रेष्ठ एवं भयंकर है, शत्रुओंको संताप देनेवाला जो पाण्डुपुत्र भीम अपने भीतर क्रोध, बल और अमर्षको रखते हुए भी मनको काबूमें रखकर सदा भाईकी आज्ञाके अधीन रहता है, जो स्वभावत:ः अमर्षशील है, जिसमें तेजकी राशि संचित है, जो महात्मा, सर्वश्रेष्ठ, अमिततेजस्वी तथा देखनेमें भी भयंकर है, वृष्णिनन्दन जनार्दन! उस मेरे द्वितीय पुत्र भीमसेनका समाचार बताओ। इस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाला मेरा मँझला पुत्र पाण्डुकुमार भीमसेन कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଭୀମସେନ ତେଜର ଏକ ମହାରାଶି—ମହାତ୍ମା, ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଅମିତ ଶକ୍ତିସମ୍ପନ୍ନ; ତାଙ୍କର ଦର୍ଶନମାତ୍ରେ ଭୟ ଜାଗେ। ସେହି ଭୀମଙ୍କ ସମ୍ବାଦ ମୋତେ କହ।
Verse 27
त॑ ममाचक्ष्व वा्ष्णेय कथमद्य वृकोदर: । आस्ते परिघबाहु: स मध्यम: पाण्डवो बली,“मधुसूदन! जो पाण्डुनन्दन महाबली भीम दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली है, जिसका वेग वायुके समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाईको सदा ही प्रिय है और भाइयोंका प्रिय करनेमें ही लगा रहता है, जिसने भाई-बन्धुओंसहित कीचकका विनाश किया है, जिस शूरवीरके हाथसे क्रोधवश नामक राक्षसोंका, हिडिम्बासुर तथा बकका भी संहार हुआ है, जो पराक्रममें इन्द्र, बलमें वायुदेव तथा क्रोधमें महेश्वरके समान है, जो प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें सर्वश्रेष्ठ एवं भयंकर है, शत्रुओंको संताप देनेवाला जो पाण्डुपुत्र भीम अपने भीतर क्रोध, बल और अमर्षको रखते हुए भी मनको काबूमें रखकर सदा भाईकी आज्ञाके अधीन रहता है, जो स्वभावत:ः अमर्षशील है, जिसमें तेजकी राशि संचित है, जो महात्मा, सर्वश्रेष्ठ, अमिततेजस्वी तथा देखनेमें भी भयंकर है, वृष्णिनन्दन जनार्दन! उस मेरे द्वितीय पुत्र भीमसेनका समाचार बताओ। इस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाला मेरा मँझला पुत्र पाण्डुकुमार भीमसेन कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ମୋତେ କହ—ଆଜି ବୃକୋଦର କେମିତି ଅଛି? ପରିଘ ସଦୃଶ ଦୃଢ଼ ଭୁଜାଯୁକ୍ତ ସେହି ବଳବାନ ପାଣ୍ଡବ, ମଧ୍ୟ ଭ୍ରାତା—ଏବେ କେମିତି ଅଛି?
Verse 28
अर्जुनेनार्जुनो यः स कृष्ण बाहुसहस्रिणा । द्विबाहुः स्पर्धते नित्यमतीतेनापि केशव,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯେ ଅର୍ଜୁନ ଦୁଇ ଭୁଜା ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଚୀନ ସହସ୍ରବାହୁ କାର୍ତ୍ତବୀର୍ୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ କୀର୍ତ୍ତି ଓ ପରାକ୍ରମରେ ସଦା ସ୍ପର୍ଧା କରେ—ତୁମର ସେହି ଭ୍ରାତା ଓ ସଖା ଅର୍ଜୁନ ଏବେ କେମିତି ଅଛି?
Verse 29
क्षिपत्येकेन वेगेन पजच बाणशतानि य: । इष्वस्त्रे सदृशो राज्ञ: कार्तवीर्यस्य पाण्डव:,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେ ଏକେ ବେଗରେ ପାଞ୍ଚଶେ ବାଣ ଛାଡ଼ିପାରେ, ଏବଂ ଇଷ୍ୱସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ରାଜା କାର୍ତ୍ତବୀର୍ୟଙ୍କ ସଦୃଶ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ—ସେହି ପାଣ୍ଡବ, ତୁମର ଭ୍ରାତା ଓ ସଖା ଅର୍ଜୁନ ଏବେ କେମିତି ଅଛି?
Verse 30
तेजसा5<दित्यसदृशो महर्षिसदृशो दमे । क्षमया पृथिवीतुल्यो महेन्द्रसमविक्रम:,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ତେଜରେ ସୂର୍ଯ୍ୟସଦୃଶ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ସଂଯମରେ ମହର୍ଷିସମ; କ୍ଷମାରେ ପୃଥିବୀତୁଲ୍ୟ; ଏବଂ ପରାକ୍ରମରେ ମହେନ୍ଦ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସମାନ।
Verse 31
आधिराज्यं महद् दीप्तं प्रथितं मधुसूदन । आहतं येन वीर्येण कुरूणां सर्वराजसु,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମଧୁସୂଦନ! କୁରୁମାନଙ୍କର ଏହି ବିଶାଳ, ଦୀପ୍ତିମାନ ଓ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ସାମ୍ରାଜ୍ୟ—ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବୀର୍ଯ୍ୟରେ ଜିତାଯାଇ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ହୋଇଛି।
Verse 32
यस्य बाहुबलं सर्वे पाण्डवा: पर्युपासते । स सर्वरथिनां श्रेष्ठ; पाण्डव: सत्यविक्रम:,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯାହାଙ୍କ ବାହୁବଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ରକ୍ଷା ଆଶା କରନ୍ତି—ସେ ସତ୍ୟବିକ୍ରମୀ ପାଣ୍ଡବ ସମସ୍ତ ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 33
य॑ं गत्वाभिमुख: संख्ये न जीवन कश्रिदाव्रजेत् यो जेता सर्वभूतानामजेयो जिष्णुरच्युत,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଅଚ୍ୟୁତ! ଯାହାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖକୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଯାଇ କେହି ଜୀବନ୍ତ ଫେରେନାହିଁ; ଯିଏ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କ ଜୟକର୍ତ୍ତା, ଅଜେୟ ଓ ସଦା ବିଜୟୀ—ସେ ଅର୍ଜୁନ ଏବେ କେମିତି ଅଛନ୍ତି?
Verse 34
यो<5पाश्रय: पाण्डवानां देवानामिव वासव: । स ते भ्राता सखा चैव कथमद्य धनंजय:,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଦେବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯେପରି ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ଆଶ୍ରୟ, ସେପରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ଯିଏ—ସେଇ ତୁମ ଭ୍ରାତା ଓ ସଖା ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଆଜି କେମିତି ଅଛି?
Verse 35
दयावान् सर्वभूतेषु हीनिषेवो महास्त्रवित् । मृदुश्च सुकुमारश्न धार्मिकश्च प्रियश्ष मे,“मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु, लज्जाशील, महान् अस्त्रवेत्ता, कोमल, सुकुमार, धार्मिक तथा मुझे विशेष प्रिय है; जो महाधनुर्धर शूरवीर सहदेव रणभूमिमें शोभा पानेवाला, सभी भाइयोंका सेवक, धर्म और अर्थके विवेचनमें कुशल तथा युवावस्थासे युक्त है; कल्याणकारी आचारवाले जिस महात्मा सहदेवके आचार-व्यवहारकी सभी भाई प्रशंसा करते हैं, जो बड़े भाईके प्रति अनुरक्त, युद्धोंका नेता और मेरी सेवामें तत्पर रहनेवाला है; उस माद्रीकुमार वीर सहदेवका समाचार मुझे बताऔ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପ୍ରତି ଦୟାଳୁ, ଲଜ୍ଜାଶୀଳ ଓ ବିନୟୀ, ମହା ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍; ସ୍ୱଭାବରେ ମୃଦୁ ଓ ସୁକୁମାର, ଆଚରଣରେ ଧର୍ମନିଷ୍ଠ, ଏବଂ ମୋତେ ବିଶେଷ ପ୍ରିୟ। ହେ ମଧୁସୂଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ସେହି ବୀର ସହଦେବଙ୍କ ସମ୍ବାଦ ମୋତେ କୁହ—ଯିଏ ମହାଧନୁର୍ଧର ହୋଇ ରଣଭୂମିରେ ଶୋଭା ପାଏ, ସମସ୍ତ ଭାଇଙ୍କ ସେବକ, ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ବିବେଚନାରେ କୁଶଳ, ଏବଂ ଯୌବନତେଜରେ ଯୁକ୍ତ। ଯାହାଙ୍କ କଲ୍ୟାଣକର ଆଚାରକୁ ସମସ୍ତ ଭାଇ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି; ଯିଏ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭାଇ ପ୍ରତି ଅନୁରକ୍ତ, ଯୁଦ୍ଧର ନେତା, ଏବଂ ମୋ ସେବାରେ ସଦା ତତ୍ପର—ସେହି ସହଦେବ ବିଷୟରେ ମୋତେ କହ।
Verse 36
सहदेवो महेष्वास: शूर: समितिशो भन: । भ्रातृणां कृष्ण शुश्रूषुर्धर्मार्थकुशलो युवा,“मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु, लज्जाशील, महान् अस्त्रवेत्ता, कोमल, सुकुमार, धार्मिक तथा मुझे विशेष प्रिय है; जो महाधनुर्धर शूरवीर सहदेव रणभूमिमें शोभा पानेवाला, सभी भाइयोंका सेवक, धर्म और अर्थके विवेचनमें कुशल तथा युवावस्थासे युक्त है; कल्याणकारी आचारवाले जिस महात्मा सहदेवके आचार-व्यवहारकी सभी भाई प्रशंसा करते हैं, जो बड़े भाईके प्रति अनुरक्त, युद्धोंका नेता और मेरी सेवामें तत्पर रहनेवाला है; उस माद्रीकुमार वीर सहदेवका समाचार मुझे बताऔ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସହଦେବ ମହାଧନୁର୍ଧର, ଶୂର, ଏବଂ ସେନାସଂଘର୍ଷରେ ଶୋଭା ପାଉଥିବା ବୀର। ହେ କୃଷ୍ଣ! ସେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସେବାରେ ନିବେଦିତ; ଯୁବ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ବିବେଚନାରେ କୁଶଳ।
Verse 37
सदैव सहदेवस्य भ्रातरो मधुसूदन । वृत्तं कल्याणवृत्तस्य पूजयन्ति महात्मन:,“मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु, लज्जाशील, महान् अस्त्रवेत्ता, कोमल, सुकुमार, धार्मिक तथा मुझे विशेष प्रिय है; जो महाधनुर्धर शूरवीर सहदेव रणभूमिमें शोभा पानेवाला, सभी भाइयोंका सेवक, धर्म और अर्थके विवेचनमें कुशल तथा युवावस्थासे युक्त है; कल्याणकारी आचारवाले जिस महात्मा सहदेवके आचार-व्यवहारकी सभी भाई प्रशंसा करते हैं, जो बड़े भाईके प्रति अनुरक्त, युद्धोंका नेता और मेरी सेवामें तत्पर रहनेवाला है; उस माद्रीकुमार वीर सहदेवका समाचार मुझे बताऔ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମଧୁସୂଦନ! କଲ୍ୟାଣକର ଜୀବନବୃତ୍ତି ଥିବା ସେହି ମହାତ୍ମା ସହଦେବଙ୍କ ଆଚାର-ବ୍ୟବହାରକୁ ତାଙ୍କ ଭାଇମାନେ ସଦା ସମ୍ମାନ କରି ପୂଜନ୍ତି।
Verse 38
ज्येष्ठोपचायिनं वीरं सहदेवं युधां पतिम् | शुश्रूषुं मम वार्ष्णेय माद्रीपुत्र प्रचक्ष्य मे,“मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु, लज्जाशील, महान् अस्त्रवेत्ता, कोमल, सुकुमार, धार्मिक तथा मुझे विशेष प्रिय है; जो महाधनुर्धर शूरवीर सहदेव रणभूमिमें शोभा पानेवाला, सभी भाइयोंका सेवक, धर्म और अर्थके विवेचनमें कुशल तथा युवावस्थासे युक्त है; कल्याणकारी आचारवाले जिस महात्मा सहदेवके आचार-व्यवहारकी सभी भाई प्रशंसा करते हैं, जो बड़े भाईके प्रति अनुरक्त, युद्धोंका नेता और मेरी सेवामें तत्पर रहनेवाला है; उस माद्रीकुमार वीर सहदेवका समाचार मुझे बताऔ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ଜ୍ୟେଷ୍ଠମାନଙ୍କୁ ସତ୍କାର କରୁଥିବା, ଯୁଦ୍ଧର ଅଧିପତି ସେହି ବୀର ସହଦେବ—ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର—ଯିଏ ମୋ ସେବାରେ ତତ୍ପର, ତାଙ୍କ ବିଷୟରେ ମୋତେ କୁହ।
Verse 39
सुकुमारो युवा शूरो दर्शनीयश्व पाण्डव: । भ्रातृणां चैव सर्वेषां प्रिय: प्राणो बहिश्चरः,“श्रीकृष्ण! जो सुकुमार, युवक, शौर्यसम्पन्न तथा दर्शनीय है, जो सभी भाइयोंके बाहर विचरनेवाला प्रिय प्राणस्वरूप है, जिसमें युद्धकी विचित्र कला शोभा पाती है, वह महान् धनुर्धर, महाबली एवं मुझसे पला हुआ मेरा पुत्र पाण्डुनन्द्न नकुल सकुशल तो है न?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ସେହି ପାଣ୍ଡବ ସୁକୁମାର, ଯୁବକ, ଶୂର ଓ ଦର୍ଶନୀୟ; ସମସ୍ତ ଭାଇଙ୍କର ପ୍ରିୟ, ଯେନ ପ୍ରାଣସ୍ୱରୂପ, ଏବଂ ସଦା ବାହାରେ ବିଚରଣ କରେ—ସେ କୁଶଳରେ ଅଛି ତୋ?
Verse 40
चित्रयोधी च नकुलो महेष्वासो महाबल: । कच्चित् सकुशली कृष्ण वत्सो मम सुखैधित:,“श्रीकृष्ण! जो सुकुमार, युवक, शौर्यसम्पन्न तथा दर्शनीय है, जो सभी भाइयोंके बाहर विचरनेवाला प्रिय प्राणस्वरूप है, जिसमें युद्धकी विचित्र कला शोभा पाती है, वह महान् धनुर्धर, महाबली एवं मुझसे पला हुआ मेरा पुत्र पाण्डुनन्द्न नकुल सकुशल तो है न?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯୁଦ୍ଧର ବିଚିତ୍ର କଳାରେ ପାରଙ୍ଗତ, ମହାଧନୁର୍ଧର ଓ ମହାବଳୀ ମୋର ପ୍ରିୟ ବତ୍ସ ନକୁଳ କୁଶଳରେ ଅଛି କି? ମୋର ପାଳନରେ ସେ ସୁଖେ ବଢ଼ି ଫୁଲିଛି କି?
Verse 41
सुखोचितमदु:खार्ह सुकुमारं महारथम् । अपि जातु महाबाहो पश्येयं नकुलं पुनः,“महाबाहो! क्या मैं सुख-भोगके योग्य, दुःख भोगनेके अयोग्य एवं सुकुमार महारथी नकुलको फिर कभी देख सकूँगी?
ହେ ମହାବାହୋ! ଯେ ସୁଖଭୋଗକୁ ଯୋଗ୍ୟ, ଦୁଃଖଭୋଗକୁ ଅଯୋଗ୍ୟ, ସୁକୁମାର ଏବଂ ମହାରଥୀ—ସେଇ ନକୁଳକୁ ମୁଁ ପୁଣି କେବେ ଦେଖିପାରିବି କି?
Verse 42
पक्ष्मसम्पातजे काले नकुलेन विनाकृता । न लभामि धृतिं वीर साद्य जीवामि पश्य माम्,“वीर! आँखोंकी पलकें गिरनेमें जितना समय लगता है, उतनी देर भी नकुलसे अलग रहनेपर मैं धैर्य खो बैठती थी; परंतु अब इतने दिनोंसे उसे न देखकर भी जी रही हूँ। देखो, मैं कितनी निर्मम हूँ
ହେ ବୀର! ପଲକ ପଡ଼ିବା ଯେତେ ସମୟ, ସେତେ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ମଧ୍ୟ ନକୁଳ ବିନା ରହିଲେ ମୋର ଧୈର୍ୟ ରହୁନଥିଲା; ଆଜି ତ ଏତେ ଦିନ ତାକୁ ନଦେଖି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ବଞ୍ଚିଛି—ଦେଖ, ମୁଁ କେତେ ନିର୍ଦୟ ହୋଇଗଲି!
Verse 43
सर्व: पुत्रै: प्रियतरा द्रौपदी मे जनार्दन । कुलीना रूपसम्पन्ना सर्वे: समुदिता गुणै:ः,'जनार्दन! ट्रुपदकुमारी कृष्णा मुझे अपने सभी पुत्रोंसे अधिक प्रिय है। वह कुलीन, अनुपम सुन्दरी तथा समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न है
ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଦ୍ରୌପଦୀ ମୋ ପାଇଁ ମୋର ସମସ୍ତ ପୁଅମାନଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ପ୍ରିୟ। ସେ କୁଳୀନା, ରୂପସମ୍ପନ୍ନା ଏବଂ ସମସ୍ତ ସଦ୍ଗୁଣରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ।
Verse 44
पुत्रलोकात् पतिलोकं वृण्वाना सत्यवादिनी । प्रियान् पुत्रान् परित्यज्य पाण्डवाननुरुध्यते,'पुत्रलोकसे पतिलोकको श्रेष्ठ समझकर उसका वरण करनेवाली सत्यवादिनी द्रौपदी अपने प्यारे पुत्रोंको भी त्यागकर पाण्डवोंका अनुसरण करती है
ସତ୍ୟବାଦିନୀ ଦ୍ରୌପଦୀ ପୁତ୍ରଲୋକଠାରୁ ପତିଲୋକକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାବି ତାହାକୁ ବରଣ କରେ; ଏବଂ ପ୍ରିୟ ପୁଅମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରେ।
Verse 45
महाभिजनसम्पन्ना सर्वकामै: सुपूजिता । ईश्वरी सर्वकल्याणी द्रौपदी कथमच्युत,“अच्युत! मैंने सब प्रकारकी वस्तुएँ देकर जिसका समादर किया है, वह परम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई सर्वकल्याणी महारानी द्रौपदी इन दिनों कैसी दशामें है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଅଚ୍ୟୁତ! ପରମ ଉତ୍ତମ କୁଳରେ ଜନ୍ମିତା, ମହାଭିଜନ-ସମ୍ପନ୍ନା, ସମସ୍ତ କାମ୍ୟ ଅର୍ପଣରେ ସୁପୂଜିତା, ରାଜମହିଷୀ ଓ ସର୍ବକଲ୍ୟାଣୀ ଦ୍ରୌପଦୀ—ଏବେ କେମିତି ଅବସ୍ଥାରେ ଅଛି?
Verse 46
पतिभि: पड्चभि: शूरैरग्निकल्पै: प्रहारिभि: । उपपन्ना महेष्वासैद्रौपदी दुःखभागिनी,“हाय! जो महाथनुर्थधर, शूरवीर, युद्धकुशल तथा अग्नितुल्य तेजस्वी पाँच पतियोंसे युक्त है, वह द्रपदकुमारी कृष्णा भी दुःखभागिनी हो गयी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହାୟ! ମହାଧନୁର୍ଧର, ଶୂର, ଯୁଦ୍ଧକୁଶଳ ଓ ଅଗ୍ନିସମ ତେଜସ୍ବୀ ପାଞ୍ଚ ପତିଙ୍କ ସହିତ ଯୁକ୍ତ ଦ୍ରୁପଦକୁମାରୀ କୃଷ୍ଣା ଦ୍ରୌପଦୀ ମଧ୍ୟ ଦୁଃଖର ଭାଗିନୀ ହେଲା।
Verse 47
चतुर्दशमिदं वर्ष यन्नापश्यमरिंदम । पुत्रादिभि: परिद्यूनां द्रौपदी सत्यवादिनीम्,“शत्रुदमन! यह चौदहवाँ वर्ष बीत रहा है। इतने दिनोंसे मैंने पुत्रोंके बिछोहसे संतप्त हुई सत्यवादिनी द्रौपदीको नहीं देखा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ! ଏହା ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷ; ଏତେ ଦିନ ଧରି ପୁତ୍ରାଦିଙ୍କ ବିୟୋଗରେ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଥିବା ସତ୍ୟବାଦିନୀ ଦ୍ରୌପଦୀକୁ ମୁଁ ଦେଖିନାହିଁ।
Verse 48
न नून॑ कर्मभि: पुण्यैरश्ुते पुरुष: सुखम् । द्रौपदी चेत् तथावृत्ता नाश्नुते सुखमव्ययम्,“यदि वैसे सदाचार और सत्कर्मोंसे युक्त ट्रुपदकुमारी अक्षय सुख नहीं पा रही है, तब तो निश्चय ही यह कहना पड़ेगा कि मनुष्य पुण्यकर्मोंसे सुख नहीं पाता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନିଶ୍ଚୟ ମନୁଷ୍ୟ ପୁଣ୍ୟକର୍ମରେ ସୁଖ ପାଉନାହିଁ; କାରଣ ଯଦି ଏପରି ସଦାଚାରିଣୀ ଦ୍ରୌପଦୀ ମଧ୍ୟ ଅକ୍ଷୟ ସୁଖ ପାଉନାହିଁ, ତେବେ ପୁଣ୍ୟରୁ ସୁଖ ମିଳେ ବୋଲି କିପରି କହିବା?
Verse 49
न प्रियो मम कृष्णाया बीभत्सुर्न युधिष्ठिर: । भीमसेनो यमौ वापि यदपश्यं सभागताम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୋ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)କୁ ସଭାକୁ ଟାଣି ଆଣାଯାଇଥିବା ଦେଖିବା ସମୟରେ, ନ ବୀଭତ୍ସୁ (ଅର୍ଜୁନ), ନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ନ ଭୀମସେନ, ନ ଯମଜ—କେହି ମୋତେ ପ୍ରିୟ ରହିଲେ ନାହିଁ।
Verse 50
स्त्रीधर्मिणीं द्रौपदीं यच्छवशुराणां समीपगाम्,“क्रोध और लोभके वशीभूत हुए दुष्ट दुर्योधनने रजस्वलावस्थामें एकवस्त्रधारिणी द्रौपदीको सभामें बुलवाया और उसे श्वशुरजनोंके समीप खड़ी कर दिया। उस समय सभी कौरवोंने उसे देखा था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କ୍ରୋଧ ଓ ଲୋଭର ବଶୀଭୂତ ଦୁଷ୍ଟ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ରଜସ୍ୱଳା ଏକବସ୍ତ୍ରଧାରିଣୀ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ସଭାକୁ ଡାକି ଆଣି, ଶ୍ୱଶୁରଜନଙ୍କ ସମୀପରେ ଦାଁଡ଼ାଇ ଦେଲା। ସେ ସମୟରେ ସମସ୍ତ କୌରବ ତାଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ।
Verse 51
आनायितामनार्येण क्रोधलोभानुवर्तिना । सर्वे प्रैक्षनत्त कुरव एकवस्त्रां सभागताम्,“क्रोध और लोभके वशीभूत हुए दुष्ट दुर्योधनने रजस्वलावस्थामें एकवस्त्रधारिणी द्रौपदीको सभामें बुलवाया और उसे श्वशुरजनोंके समीप खड़ी कर दिया। उस समय सभी कौरवोंने उसे देखा था
ଅନାର୍ୟ, କ୍ରୋଧ-ଲୋଭର ଅନୁଗାମୀ ଲୋକ ତାଙ୍କୁ ଡାକି ଆଣିଲା; ସଭାକୁ ଆସିଥିବା ଏକବସ୍ତ୍ରଧାରିଣୀକୁ ସମସ୍ତ କୌରବ ଦେଖିଲେ।
Verse 52
तत्रैव धृतराष्ट्रश्न महाराजश्न बाह्विक:ः । कृपश्न सोमदत्तश्न निर्विण्णा: कुरवस्तथा
ସେଠାରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ମହାରାଜ ବାହ୍ଲୀକ, କୃପ ଓ ସୋମଦତ୍ତ—ଏବଂ କୌରବମାନେ ମଧ୍ୟ—ନିର୍ବେଦ ଓ ଖେଦରେ ପଡ଼ିଲେ।
Verse 53
“वहीं राजा धृतराष्ट्र, महाराज बाह्लीक, कृपाचार्य, सोमदत्त तथा अन्यान्य कौरव खेदमें भरे हुए बैठे थे ।। तस्यां संसदि सर्वेषां क्षत्तारं पूजयाम्यहम् । वृत्तेन हि भवत्यायों न धनेन न विद्यया,“मैं तो उस कौरवसभामें सबसे अधिक आदर विदुरजीको देती हूँ, (जिन्होंने द्रौपदीके प्रति किये जानेवाले अन्यायका प्रकटरूपमें विरोध किया था।) मनुष्य अपने सदाचारसे ही श्रेष्ठ होता है, धन और विद्यासे नहीं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ମହାରାଜ ବାହ୍ଲୀକ, କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ, ସୋମଦତ୍ତ ଓ ଅନ୍ୟ କୌରବମାନେ ଖେଦଭାରେ ବସିଥିଲେ। ସେହି ସଭାରେ ମୁଁ ସମସ୍ତଙ୍କ ଉପରେ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁରଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରେ; କାରଣ ମନୁଷ୍ୟ ଆର୍ଯ୍ୟ ହୁଏ ସଦ୍ବୃତ୍ତରେ—ଧନରେ ନୁହେଁ, କେବଳ ବିଦ୍ୟାରେ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 54
तस्य कृष्ण महाबुद्धेर्गम्भीरस्य महात्मन: । क्षत्तु: शीलमलंकारो लोकानू् विष्टभ्य तिष्ठति,“श्रीकृष्ण! परम बुद्धिमान् गम्भीरस्वभाव महात्मा विदुरका शील ही आभूषण है, जो सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त (विख्यात) करके स्थित है!
ହେ କୃଷ୍ଣ! ମହାବୁଦ୍ଧି ଓ ଗମ୍ଭୀର ସ୍ୱଭାବବାନ ସେହି ମହାତ୍ମା କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁରଙ୍କର ଶୀଳ ହିଁ ତାଙ୍କର ଅଳଙ୍କାର; ତାହା ସମସ୍ତ ଲୋକକୁ ବ୍ୟାପି ଦୃଢ଼ ଭାବେ ଅବସ୍ଥିତ।
Verse 55
वैशम्पायन उवाच सा शोकार्ता च हृष्टा च दृष्टवा गोविन्दमागतम् | नानाविधानि दु:खानि सर्वाण्येवान्वकीर्तयत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! श्रीकृष्णको आया हुआ देख कुन्तीदेवी शोकातुर तथा आनन्दित हो अपने ऊपर आये हुए नाना प्रकारके सम्पूर्ण दुःखोंका पुनः वर्णन करने लगीं--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କୁ ଆସୁଥିବା ଦେଖି କୁନ୍ତୀଦେବୀ ଶୋକାକୁଳ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଆନନ୍ଦରେ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲିତ ହୋଇ, ନିଜ ଉପରେ ପଡ଼ିଥିବା ନାନାପ୍ରକାର ସମସ୍ତ ଦୁଃଖକୁ ପୁନର୍ବାର ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 56
पूर्वराचरितं यत् तत् कुराजभिररिंदम । अक्षद्यूतं मृगवध: कच्चिदेषां सुखावहम्,शत्रुदमन श्रीकृष्ण! पहलेके दुष्ट राजाओंने जो जूआ और शिकारकी परिपाटी चला दी है, वह क्या इन सबके लिये सुखावह सिद्ध हुई है? (अपितु कदापि नहीं।)
ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ପୂର୍ବକାଳର ଦୁଷ୍ଟ ରାଜାମାନେ ଯେ ପାଶାଖେଳ ଓ ଶିକାରରେ ମୃଗବଧର ପରମ୍ପରା ଚାଲୁ କରିଥିଲେ—ସେ କି ଏମାନଙ୍କ ପାଇଁ କେବେ ସୁଖଦାୟକ ହୋଇଛି? (କଦାପି ନୁହେଁ।)
Verse 57
तन्मां दहति यत् कृष्णा सभायां कुरुसंनिधौ । धार्तराष्ट्रै: परिक्लिष्टा यथा न कुशलं तथा,'सभामें कौरवोंके समीप धृतराष्ट्रके पुत्रोंने द्रोपदीको जो ऐसा कष्ट पहुँचाया है, जिससे किसीका मंगल नहीं हो सकता, वह अपमान मेरे हृदयको दग्ध करता रहता है
ସଭାରେ କୁରୁମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)ଙ୍କୁ ଯେପରି ଭୟଙ୍କର କଷ୍ଟ ଦେଇଥିଲେ—ଯାହାରୁ କାହାରି ମଙ୍ଗଳ ହୋଇପାରେ ନାହିଁ—ସେଇ ଅପମାନ ମୋ ହୃଦୟକୁ ନିରନ୍ତର ଦହାଉଛି।
Verse 58
निर्वासनं च नगरात् प्रव्रज्या च परंतप । नानाविधानां दुःखानामभिज्ञास्मि जनार्दन,“परंतप जनार्दन! पाण्डवोंका नगरसे निकाला जाना तथा उनका वनमें रहनेके लिये बाध्य होना आदि नाना प्रकारके दुःखोंका मैं अनुभव कर चुकी हूँ
ହେ ପରନ୍ତପ ଜନାର୍ଦନ! ନଗରରୁ ନିର୍ବାସନ ଓ ବନବାସ-ଭ୍ରମଣକୁ ବାଧ୍ୟ ହେବା—ଏପରି ନାନାପ୍ରକାର ଦୁଃଖକୁ ମୁଁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଭାବେ ଅନୁଭବ କରିଛି।
Verse 59
अज्ञातचर्या बालानामवरोधश्व माधव । न मे क्लेशतमं तत् स्यात् पुत्र: सह परंतप,'परंतप माधव! मेरे बालकोंको अज्ञातभावसे रहना पड़ा है और अब राज्य न मिलनेसे उनकी जीविकाका भी अवरोध हो गया है। पुत्रोंके साथ मुझे इतना महान् क्लेश नहीं प्राप्त होना चाहिये
ହେ ପରନ୍ତପ ମାଧବ! ମୋ ଛୋଟ ପୁଅମାନେ ଅଜ୍ଞାତଭାବେ ରହିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହେଲେ; ଏବେ ରାଜ୍ୟ ନ ମିଳିବାରୁ ତାଙ୍କର ଜୀବିକା ମଧ୍ୟ ଅବରୋଧିତ ହୋଇଛି। ପୁଅମାନଙ୍କ ସହିତ ମୋ ପାଇଁ ଏପରି ଅତ୍ୟଧିକ କ୍ଲେଶ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 60
दुर्योधनेन निकृता वर्षमद्य चतुर्दशम् । दुःखादपि सुखं न: स्याद् यदि पुण्यफलक्षय:,“दुर्योधनने मेरे पुत्रोंकी कपटटद्यूतके द्वारा राज्यसे वंचित कर दिया। उन्हें इस दुरवस्थामें रहते आज चौदहवाँ वर्ष बीत रहा है। यदि सुख भोगनेका अर्थ है पुण्यके फलका क्षय होना, तब तो पापके फलस्वरूप दुःख भोग लेनेके कारण अब हमें भी दुःखके बाद सुख मिलना ही चाहिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କପଟ ଦ୍ୟୂତରେ ଆମକୁ ଠକି ରାଜ୍ୟରୁ ବଞ୍ଚିତ କରିଛି। ଏହି ଦୁରବସ୍ଥାରେ ଆଜି ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟ ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହେଲା। ଯଦି ସୁଖଭୋଗ ମାନେ ପୁଣ୍ୟଫଳର କ୍ଷୟ ହୁଏ, ତେବେ ପାପଫଳରୂପ ଦୁଃଖ ଭୋଗି ସାରିଥିବାରୁ ଦୁଃଖ ପରେ ଆମେ ମଧ୍ୟ ସୁଖ ପାଇବା ଉଚିତ।
Verse 61
न मे विशेषो जात्वासीदू धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवै: । तेन सत्येन कृष्ण त्वां हतामित्र श्रिया वृतम् । अस्माद् विमुक्तं संग्रामात् पश्येयं पाण्डवै: सह
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କିମ୍ବା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମୋର କେବେ ବି ପକ୍ଷପାତ ଥିଲା ନାହିଁ। ସେହି ସତ୍ୟବଳରେ, ହେ କୃଷ୍ଣ, ହେ ଶତ୍ରୁହନ୍ତା, ମୁଁ ତୁମକୁ ଶ୍ରୀ-ସମୃଦ୍ଧିରେ ଘେରା ଦେଖିବି; ଏବଂ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଏହି ସଙ୍ଗ୍ରାମରୁ ମୁକ୍ତ ହେବି।
Verse 62
नैव शक््या: पराजेतुं सर्व होषां तथाविधम् । “श्रीकृष्ण! मेरे मनमें पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंके प्रति कभी भेदभाव नहीं था। इस सत्यके प्रभावसे निश्चय ही मैं देखूँगी कि तुम भावी संग्राममें शत्रुओंको मारकर पाण्डवोंसहित संकटसे मुक्त हो गये तथा राज्यलक्ष्मीने तुमलोगोंका ही वरण किया है। पाण्डवोंमें ऐसे सभी गुण मौजूद हैं, जिनके ही कारण शत्रु इन्हें परास्त नहीं कर सकते ।। ६१ ह || पितरं त्वेव गहैयं नात्मानं न सुयोधनम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଏପରି; ସେମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିବା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ। ତେଣୁ କେବଳ ପିତାଙ୍କୁ ଧର—ନ ନିଜକୁ, ନ ସୁୟୋଧନକୁ।
Verse 63
येनाहं कुन्तिभोजाय धन वृत्तैरिवार्पिता । “मैं जो कष्ट भोग रही हूँ, इसके लिये न अपनेको दोष देती हूँ, न दुर्योधनको; अपितु पिताकी ही निन्दा करती हूँ, जिन्होंने मुझे राजा कुन्तिभोजके हाथमें उसी प्रकार दे दिया, जैसे विख्यात दानी पुरुष याचकको साधारण धन देते हैं ।। ६२ ई ।। बालां मामार्यकस्तुभ्यं क्रीडन्तीं कन्दुहस्तिकाम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୋତେ କୁନ୍ତିଭୋଜ ରାଜାଙ୍କ ହାତରେ ଏମିତି ସମର୍ପିତ କରାଗଲା, ଯେପରି ଦାନରେ ଧନ ଦିଆଯାଏ। ଏହି ଦୁଃଖ ପାଇଁ ନ ମୁଁ ନିଜକୁ ଦୋଷ ଦେଉଛି, ନ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ; ମୁଁ ନିନ୍ଦା କରୁଛି ମୋ ପିତାଙ୍କୁ—ଯିଏ ମୋତେ କୁନ୍ତିଭୋଜଙ୍କୁ ସେହିପରି ଦେଇଦେଲେ, ଯେପରି ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦାତା ଯାଚକକୁ ସାଧାରଣ ଧନ ଦିଏ। ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଛୋଟ ଝିଅ; ହାତରେ ଖେଳନା ହାତୀ ଧରି ଖେଳୁଥିଲି…
Verse 64
अदात् तु कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने । “मैं अभी बालिका थी, हाथमें गेंद लेकर खेलती फिरती थी; उसी अवस्थामें तुम्हारे पितामहने मित्रधर्मका पालन करते हुए अपने सखा महात्मा कुन्तिभोजके हाथमें मुझे दे दिया ।। ६३ है ।। साहं पित्रा च निकृता श्वशुरैश्व परंतप । अत्यन्तदुःखिता कृष्ण कि जीवितफलं मम,'परंतप श्रीकृष्ण! इस प्रकार मेरे पिता तथा श्वशुरोंने भी मेरे साथ वंचनापूर्ण बर्ताव किया है। इससे मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। मेरे जीवित रहनेसे क्या लाभ?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମିତ୍ରଧର୍ମ ପାଳନ କରି ମୋ ପିତା ମୋତେ ତାଙ୍କ ମହାତ୍ମା ମିତ୍ର କୁନ୍ତିଭୋଜଙ୍କୁ ଦେଇଦେଲେ; ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଛୋଟ ଝିଅ, ହାତରେ ଖେଳନା ହାତୀ ଧରି ଖେଳୁଥିଲି। ହେ ପରନ୍ତପ, ଏଭଳି ପିତା ଦ୍ୱାରା ଓ ଶ୍ୱଶୁରଗୃହ ଦ୍ୱାରା ମୁଁ ବଞ୍ଚିତ ହେଲି। ହେ କୃଷ୍ଣ, ମୁଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖିତ—ମୋର ବଞ୍ଚି ରହିବାର ଫଳ କ’ଣ?
Verse 65
यन्मां वागब्रवीन्नक्तं सूतके सव्यसाचिन: । पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्चास्य दिवं स्पृशेत्,“अर्जुनके जन्मकालमें जब मैं सूतिकागृहमें थी, उस रात्रिमें आकाशवाणीने मुझसे यह कहा था--*भद्रे! तेरा यह पुत्र सारी पृथ्वीको जीत लेगा। इसका यश स्वर्गलोक-तक फैल जायगा। यह महान् संग्राममें कौरवोंका संहार करके राज्यपर अधिकार कर लेगा, फिर अपने भाइयोंके साथ तीन अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करेगा”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସବ୍ୟସାଚୀଙ୍କ ଜନ୍ମକାଳରେ, ସୂତିକାଗୃହରେ ସେଇ ରାତିରେ ଆକାଶବାଣୀ ମୋତେ କହିଥିଲା— ‘ଭଦ୍ରେ! ତୋର ଏହି ପୁତ୍ର ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କରିବ; ତାହାର ଯଶ ସ୍ୱର୍ଗ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚିବ।’
Verse 66
हत्वा कुरून् महाजन्ये राज्यं प्राप्प धनंजय: । भ्रातृभि: सह कौन्तेयस्त्रीन् मेधानाहरिष्यति,“अर्जुनके जन्मकालमें जब मैं सूतिकागृहमें थी, उस रात्रिमें आकाशवाणीने मुझसे यह कहा था--*भद्रे! तेरा यह पुत्र सारी पृथ्वीको जीत लेगा। इसका यश स्वर्गलोक-तक फैल जायगा। यह महान् संग्राममें कौरवोंका संहार करके राज्यपर अधिकार कर लेगा, फिर अपने भाइयोंके साथ तीन अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करेगा”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାଯୁଦ୍ଧରେ କୌରବମାନଙ୍କୁ ବଧ କରି ଧନଞ୍ଜୟ ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବ। ପରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ସେ, ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ, ତିନିଟି ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ କରିବ।
Verse 67
नाहं तामभ्यसूयामि नमो धर्माय वेधसे । कृष्णाय महते नित्यं धर्मो धारयति प्रजा:,“मैं इस आकाशवाणीको दोष नहीं देती, अपितु महाविष्णुस्वरूप धर्मको ही नमस्कार करती हूँ। वही इस जगतका स्रष्टा है। धर्म ही सदा समस्त प्रजाको धारण करता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମୁଁ ସେଇ ଆକାଶବାଣୀକୁ ଦୋଷ ଦେଉନାହିଁ। ସୃଷ୍ଟିକର୍ତ୍ତା ବିଧାତା-ସ୍ୱରୂପ ଧର୍ମକୁ ଏବଂ ମହାନ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ନିତ୍ୟ ପ୍ରଣାମ କରେ। ଧର୍ମ ହିଁ ସଦା ପ୍ରଜାକୁ ଧାରଣ କରେ।
Verse 68
धर्मश्नेदस्ति वा््णेय यथा वागभ्यभाषत । त्वं चापि तत् तथा कृष्ण सर्व सम्पादयिष्यसि,वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! यदि धर्म है तो तुम भी वह सब काम पूरा कर लोगे, जिसे उस समय आकाशवाणीने बताया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ବୃଷ୍ଣିନନ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଯଦି ଧର୍ମ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଅଛି, ତେବେ ସେଇ ଆକାଶବାଣୀ ଯେପରି କହିଥିଲା, ସେପରି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ସେ ସବୁ କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରିବ।
Verse 69
न मां माधव वैधव्यं नार्थनाशो न वैरता | तथा शोकाय दहति यथा पुत्रर्विनाभव:,“माधव! वैधव्य, धनका नाश तथा कुटुम्बीजनोंके साथ बढ़ा हुआ वैरभाव इनसे मुझे उतना शोक नहीं होता, जितना कि पुत्रोंका विरह मुझे शोकदग्ध कर रहा है
ହେ ମାଧବ! ବୈଧବ୍ୟ, ଧନନାଶ, ଏବଂ ନିଜ ଆତ୍ମୀୟମାନଙ୍କ ସହ ବଢ଼ିଥିବା ବୈରଭାବ—ଏସବୁ ମୋତେ ସେତେ ଶୋକରେ ଦହେନାହିଁ; ଯେତେ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ବିନା ଥିବା ଅବସ୍ଥା ମୋତେ ଦହୁଛି।
Verse 70
याहं गाण्डीवधन्वानं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । धनंजयं न पश्यामि का शान्तिह॑ंदयस्य मे,“समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ गाण्डीवधारी अर्जुनको जबतक मैं नहीं देख रही हूँ, तबतक मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी?
ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୁଁ ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ, ସମସ୍ତ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଦେଖୁନାହିଁ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୋ ହୃଦୟକୁ କିପରି ଶାନ୍ତି ମିଳିବ?
Verse 71
इतश्नतुर्दशं वर्ष यन्नापश्यं॑ युधिष्ठिरम् । धनंजयं च गोविन्द यमौ तं॑ च वृकोदरम्,“गोविन्द! चौदहवाँ वर्ष है, जबसे कि मैं युधिष्ठिर भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल- सहदेवको नहीं देख पा रही हूँ
ହେ ଗୋବିନ୍ଦ! ଏହା ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷ—ଯେଉଁଦିନଠାରୁ ମୁଁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ, ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ, ଯମଜ ଭାଇ (ନକୁଳ-ସହଦେବ)ଙ୍କୁ ଏବଂ ସେଇ ବୃକୋଦର (ଭୀମ)ଙ୍କୁ ଦେଖିନାହିଁ।
Verse 72
जीवनाशं प्रणष्टानां श्राद्ध कुर्वन्ति मानवा: । अर्थतस्ते मम मृतास्तेषां चाहं जनार्दन,“जनार्दन! जो लोग प्राणोंका नाश होनेसे अदृश्य होते हैं, उनके लिये मनुष्य श्राद्ध करते हैं। यदि मृत्युका अर्थ अदृश्य हो जाना ही है तो मेरे लिये पाण्डव मर गये हैं और मैं भी उनके लिये मर चुकी हूँ
ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ଯାହାଙ୍କ ପ୍ରାଣନାଶ ହୋଇ ସେମାନେ ଅଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଯାନ୍ତି, ଲୋକେ ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଶ୍ରାଦ୍ଧ କରନ୍ତି। ଯଦି ‘ମୃତ୍ୟୁ’ର ଅର୍ଥ କେବଳ ଅଦୃଶ୍ୟ ହେବା ହୁଏ, ତେବେ ମୋ ପାଇଁ ପାଣ୍ଡବମାନେ ମୃତ—ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ମୃତପ୍ରାୟ।
Verse 73
ब्रूया माधव राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । भूयांस्ते हीयते धर्मो मा पुत्रक वृथा कृथा:,“माधव! तुम धर्मात्मा राजा युधिष्ठिस्से कहना--“बेटा! तुम्हारे धर्मकी बड़ी हानि हो रही है। तुम उसे व्यर्थ नष्ट न करो”
ହେ ମାଧବ! ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କୁହ—“ପୁତ୍ର! ତୋର ଧର୍ମ ବହୁତ କ୍ଷୟ ହେଉଛି; ଏହାକୁ ବ୍ୟର୍ଥରେ ନଷ୍ଟ କରନି।”
Verse 74
पराश्रया वासुदेव या जीवति धिगस्तु ताम् । वृत्ते: कार्पण्यलब्धाया अप्रतिष्ठेव ज्यायसी,*वासुदेव! जो स्त्री दूसरोंके आश्रित होकर जीवन-निर्वाह करती है, उसे धिक्कार है। दीनतासे प्राप्त हुई जीविकाकी अपेक्षा तो मर जाना ही उत्तम है
ହେ ବାସୁଦେବ! ଯେ ସ୍ତ୍ରୀ ଅନ୍ୟର ଆଶ୍ରୟରେ ଜୀବନ ଧାରଣ କରେ, ତାକୁ ଧିକ୍। ଦୀନତାରୁ ମିଳିଥିବା, ପ୍ରତିଷ୍ଠାହୀନ ଜୀବିକାଠାରୁ ମୃତ୍ୟୁ ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 75
अथो धनंजयं ब्रूया नित्योद्युक्ते वृकोदरम् । यदर्थ क्षत्रिया सूते तस्य कालोडयमागत:,“श्रीकृष्ण! तुम अर्जुन तथा युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले भीमसेनसे कहना कि क्षत्राणी जिस प्रयोजनके लिये पुत्र उत्पन्न करती है, उसे पूरा करनेका यह समय आ गया है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଓ ସଦା କାର୍ଯ୍ୟପ୍ରସ୍ତୁତ ବୃକୋଦର ଭୀମଙ୍କୁ କହ: କ୍ଷତ୍ରିୟା ଯେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦିଏ, ସେହି ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସାଧନର ସମୟ ଏବେ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି।
Verse 76
अम्मिंक्षेदागते काले मिथ्या चातिक्रमिष्यति । लोकसम्भाविता: सन्त: सुनृशंसं करिष्यथ,“यदि ऐसा समय आनेपर भी तुम युद्ध नहीं करोगे तो यह व्यर्थ बीत जायगा। तुमलोग इस जगत्के सम्मानित पुरुष हो। यदि तुम कोई अत्यन्त घृणित कर्म कर डालोगे तो उस नृशंस कर्मसे युक्त होनेके कारण मैं तुम्हें सदाके लिये त्याग दूँगी। पुत्रो! तुम्हें तो समय आनेपर अपने प्राणोंको भी त्याग देनेके लिये उद्यत रहना चाहिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସମୟ ଆସିଲା ପରେ ମଧ୍ୟ ଯଦି ତୁମେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବ ନାହିଁ, ତେବେ ସେ ସମୟ ବ୍ୟର୍ଥ ଚାଲିଯିବ। ତୁମେ ଲୋକେ ସମ୍ମାନ କରୁଥିବା ପୁରୁଷ; ଯଦି ତୁମେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ନୃଶଂସ ଓ ଲଜ୍ଜାଜନକ କାମ କର, ତେବେ ସେହି କ୍ରୂରତାରେ କଳୁଷିତ ହୋଇ ମୁଁ ତୁମକୁ ସଦାକାଳ ପାଇଁ ତ୍ୟାଗ କରିଦେବି। ହେ ପୁତ୍ରମାନେ, ସମୟ ଆସିଲେ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରହିବା ଉଚିତ।
Verse 77
नृशंसेन च वो युक्तांस्त्यजेयं शाश्वती: समा: । काले हि समनुप्राप्ते त्यक्तव्यमपि जीवनम्,“यदि ऐसा समय आनेपर भी तुम युद्ध नहीं करोगे तो यह व्यर्थ बीत जायगा। तुमलोग इस जगत्के सम्मानित पुरुष हो। यदि तुम कोई अत्यन्त घृणित कर्म कर डालोगे तो उस नृशंस कर्मसे युक्त होनेके कारण मैं तुम्हें सदाके लिये त्याग दूँगी। पुत्रो! तुम्हें तो समय आनेपर अपने प्राणोंको भी त्याग देनेके लिये उद्यत रहना चाहिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯଦି ତୁମେ ନୃଶଂସତାରେ ଯୁକ୍ତ ହେବ, ତେବେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଶାଶ୍ୱତ କାଳ ପାଇଁ ତ୍ୟାଗ କରିଦେବି; କାରଣ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସମୟ ଆସିଲେ ଜୀବନକୁ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ପଡ଼େ।
Verse 78
माद्रीपुत्रौ च वक्तव्यौ क्षत्रधर्मरतौ सदा । विक्रमेणार्जितान् भोगान् वृणीतं जीवितादपि,“गोविन्द! तुम सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले माद्रीनन्दन नकुल-सहदेवसे भी कहना --पुत्रो! तुम प्राणोंकी बाजी लगाकर भी पराक्रमसे प्राप्त किये हुए भोगोंको ही ग्रहण करना
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏବଂ ସଦା କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ରତ ମାଦ୍ରୀଙ୍କ ଦୁଇ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କହ: ହେ ପୁତ୍ରମାନେ, ପରାକ୍ରମରେ ଅର୍ଜିତ ଭୋଗ ଓ ଅଧିକାରକୁ—ପ୍ରାଣ ଦେଇ ମଧ୍ୟ—ବାଛି ଧାରଣ କର।
Verse 79
विक्रमाधिगता हार्था: क्षत्रधर्मेण जीवत: । मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम,“पुरुषोत्तम! क्षत्रियधर्मसे जीवननिर्वाह करनेवाले मनुष्यके मनको पराक्रमसे प्राप्त हुआ धन ही सदा संतुष्ट रखता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ, କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା ମନୁଷ୍ୟର ମନକୁ ପରାକ୍ରମରେ ଲାଭିତ ଧନ ହିଁ ସଦା ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ଓ ସ୍ଥିର କରେ।
Verse 80
गत्वा ब्रूहि महाबाहो सर्वशस्त्रभूृतां वरम् । अर्जुन पाण्डवं वीर द्रौपद्या: पदवीं चर,“महाबाहो! तुम पाण्डवोंके पास जाकर सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुनन्दन वीर अर्जुनसे कहना कि तुम द्रौपदीके बताये हुए मार्गपर चलो
ହେ ମହାବାହୋ! ତୁମେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ, ସମସ୍ତ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ବୀର ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କହ—ଦ୍ରୌପଦୀ ଯେ ପଥ ଦେଖାଇଛନ୍ତି, ସେହି ପଥରେ ଅଗ୍ରସର ହେଉନ୍ତୁ।
Verse 81
विदितौ हि तवात्यन्तं क्रुद्धों तौ तु यथान्तकौ । भीमार्जुनी नयेतां हि देवानपि परां गतिम्,“श्रीकृष्ण! तुम तो जानते ही हो; यदि भीमसेन और अर्जुन अत्यन्त कुपित हो जाये तो वे यमराजके समान होकर देवताओंको भी मृत्युके मुखमें पहुँचा सकते हैं
ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ତୁମେ ସେମାନଙ୍କୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଜାଣ। ଯଦି ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ସେମାନେ ଯମ ସମାନ ହୋଇଯାଆନ୍ତି; ଦେବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପରମ ଗତିକୁ ନେଇଯାଇପାରନ୍ତି।
Verse 82
तयोश्वैतदवज्ञानं यत् सा कृष्णा सभां गता | दुःशासनश्व कर्णश्व॒ परुषाण्यभ्यभाषताम्,'ट्रौपदीको जो सभामें उपस्थित होना पड़ा तथा दुःशासन और कर्णने जो उसके प्रति कठोर बातें कहीं, यह सब भीमसेन और अर्जुनका ही अपमान है। दुर्योधनने प्रधान-प्रधान कौरवोंके सामने मनस्वी भीमसेनका अपमान किया है। इसका जो फल मिलेगा, उसे वह देखेगा
ଏହା ମଧ୍ୟ ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କର ଅପମାନ—କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)କୁ ସଭାକୁ ଯିବାକୁ ବାଧ୍ୟ କରାଗଲା, ଏବଂ ଦୁଃଶାସନ ଓ କର୍ଣ୍ଣ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି କଠୋର, ଆଘାତକାରୀ କଥା କହିଲେ।
Verse 83
दुर्योधनो भीमसेनमभ्यगच्छन्मनस्विनम् । पश्यतां कुरुमुख्यानां तस्य द्रक्ष्यति यत् फलम्,'ट्रौपदीको जो सभामें उपस्थित होना पड़ा तथा दुःशासन और कर्णने जो उसके प्रति कठोर बातें कहीं, यह सब भीमसेन और अर्जुनका ही अपमान है। दुर्योधनने प्रधान-प्रधान कौरवोंके सामने मनस्वी भीमसेनका अपमान किया है। इसका जो फल मिलेगा, उसे वह देखेगा
କୁରୁମୁଖ୍ୟମାନେ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମନସ୍ୱୀ ଭୀମସେନଙ୍କ ଦିଗକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲା; ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଏହି କର୍ମର ଫଳ ଦେଖିବ।
Verse 84
न हि वैरं समासाद्य प्रशाम्यति वृकोदर: | सुचिरादपि भीमस्य न हि वैरं प्रशाम्यति । यावदन्तं न नयति शात्रवाउछत्रुकर्शन:,'भीमसेन वैर हो जानेपर कभी शान्त नहीं होता। भीमसेनका वैर तबतक दीर्घकालके बाद भी समाप्त नहीं होता है, जबतक वह शत्रुपक्षका संहार नहीं कर डालता
ବୃକୋଦର ଭୀମସେନ ଏକଥର ବୈର ଧରିଲେ କେବେ ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ। ଦୀର୍ଘକାଳ ପରେ ମଧ୍ୟ, ଶତ୍ରୁକର୍ଷଣ ଭୀମ ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଶତ୍ରୁପକ୍ଷକୁ ସମୂଳେ ନାଶ ନକରେ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତାହାର ବୈର ଶମେ ନାହିଁ।
Verse 85
न दु:खं राज्यहरणं न च द्यूते पराजय: । प्रत्राजनं तु पुत्राणां न मे तद् दुःखकारणम्,'राज्य छिन गया, यह कोई दुःखका कारण नहीं है। जूएमें हार जाना भी दुःखका कारण नहीं है। मेरे पुत्रोंको वनमें भेज दिया गया, इससे भी मुझे दुःख नहीं हुआ है; परंतु मेरी श्रेष्ठ सुन्दरी वधूको एक वस्त्र धारण किये जो सभामें जाना पड़ा और दुष्टोंकी कठोर बातें सुननी पड़ीं, इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात और क्या हो सकती है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ରାଜ୍ୟ ହରଣ ମୋର ଦୁଃଖର କାରଣ ନୁହେଁ, ନ ଦ୍ୟୂତରେ ପରାଜୟ। ପୁଅମାନଙ୍କୁ ବନବାସକୁ ପଠାଇବା ମଧ୍ୟ ମୋ ପାଇଁ ଶୋକର କାରଣ ନୁହେଁ। କିନ୍ତୁ ମୋର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ସୁନ୍ଦରୀ ପୁତ୍ରବଧୂ ଏକମାତ୍ର ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି ରାଜସଭାକୁ ଯିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହେଲା ଏବଂ ଦୁଷ୍ଟମାନଙ୍କର କଠୋର କଥା ଶୁଣିଲା—ଏହାଠାରୁ ବଡ଼ ଦୁଃଖ ଆଉ କ’ଣ ହୋଇପାରେ?
Verse 86
यत् तु सा बृहती श्यामा एकवस्त्रा सभां गता | अशृणोत् परुषा वाच: कि नु दुःखतरं ततः:,'राज्य छिन गया, यह कोई दुःखका कारण नहीं है। जूएमें हार जाना भी दुःखका कारण नहीं है। मेरे पुत्रोंको वनमें भेज दिया गया, इससे भी मुझे दुःख नहीं हुआ है; परंतु मेरी श्रेष्ठ सुन्दरी वधूको एक वस्त्र धारण किये जो सभामें जाना पड़ा और दुष्टोंकी कठोर बातें सुननी पड़ीं, इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात और क्या हो सकती है?
କିନ୍ତୁ ସେଇ ଗରିମାମୟୀ ଶ୍ୟାମା ଏକମାତ୍ର ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି ସଭାକୁ ଗଲା ଏବଂ ସେଠାରେ କଠୋର, କ୍ରୂର କଥା ଶୁଣିଲା—ତାହାଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁଃଖଦ କ’ଣ?
Verse 87
स्त्रीधर्मिणी वरारोहा क्षत्रधर्मरता सदा । नाभ्यगच्छत् तदा नाथं कृष्णा नाथवती सती,“सदा क्षत्रियधर्ममें अनुराग रखनेवाली मेरी सर्वांगसुन्दरी बहू कृष्णा उस समय रजस्वला थी। वह सनाथ होती हुई भी वहाँ किसीको अपना नाथ (रक्षक) न पा सकी
ସ୍ତ୍ରୀଧର୍ମରେ ଅଟୁଟ, ଉତ୍ତମରୂପା ଏବଂ ସଦା କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ରତ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ସେ ସମୟରେ ସନାଥ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ କାହାକୁ ନିଜ ନାଥ—ରକ୍ଷକ—ଭାବେ ପାଇଲା ନାହିଁ।
Verse 88
यस्या मम सपुत्रायास्त्वं नाथो मधुसूदन । रामश्न बलिनां श्रेष्ठ: प्रद्युम्नश्ष महारथ:,“पुरुषोत्तम! मधुसूदन! पुत्रोंसहित जिस कुन्तीके बलवानोंमें श्रेष्ठ बलराम, महारथी प्रद्युम्न तथा तुम रक्षक हो; युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले विजयी अर्जुन और दुर्धर्ष भीमसेन-सरीखे जिसके पुत्र जीवित हैं, वही मैं ऐसे-ऐसे दुःख सह रही हूँ!
ହେ ମଧୁସୂଦନ! ପୁଅମାନଙ୍କ ସହିତ ମୋ—କୁନ୍ତୀର—ତୁମେ ନାଥ, ରକ୍ଷକ। ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବଳରାମ ଓ ମହାରଥୀ ପ୍ରଦ୍ୟୁମ୍ନ ମଧ୍ୟ ଆମର ଆଶ୍ରୟ।
Verse 89
इस प्रकार श्रीमह्या भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णका धृतराष्ट्रगहमें प्रवेशपूर्वक विदुरके यूहमें पदार्पणविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ,साहमेवंविध॑ दुःखं सहेडद्य पुरुषोत्तम । भीमे जीवति दुर्धर्षे विजये चापलायिनि “पुरुषोत्तम! मधुसूदन! पुत्रोंसहित जिस कुन्तीके बलवानोंमें श्रेष्ठ बलराम, महारथी प्रद्युम्न तथा तुम रक्षक हो; युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले विजयी अर्जुन और दुर्धर्ष भीमसेन-सरीखे जिसके पुत्र जीवित हैं, वही मैं ऐसे-ऐसे दुःख सह रही हूँ!
ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ, ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଏପରି ଦୁଃଖ ସହୁଛି—ଦୁର୍ଧର୍ଷ ଭୀମ ଜୀବିତ ଥିବାବେଳେ, ଯୁଦ୍ଧରେ ପିଠ ନ ଦେଖାଉଥିବା, ନ ପଳାଉଥିବା ବିଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ମଧ୍ୟ ଜୀବିତ ଓ ବିଜୟୀ ଥିବାବେଳେ।
Verse 90
वैशम्पायन उवाच तत आश्वासयामास पुत्राधिभिरभिप्लुताम् । पितृष्वसारं शोचन्तीं शौरि: पार्थसख: पृथाम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर अर्जुनके मित्र भगवान् श्रीकृष्णने पुत्रोंकी चिन्ताओंमें डूबकर शोक करती हुई अपनी बुआ कुन्तीको इस प्रकार आश्वासन दिया इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कृष्णकुन्तीसंवादे नवतितमो<ध्याय:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ପାର୍ଥଙ୍କ ସଖା ଶୌରି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ, ପୁଅମାନଙ୍କ ଚିନ୍ତାରେ ଆବୃତ ହୋଇ ଶୋକ କରୁଥିବା ନିଜ ପିତୃସ୍ୱସା ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ)ଙ୍କୁ ଏଭଳି ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଲେ।
Verse 91
वासुदेव उवाच का तु सीमन्तिनी त्वादृक् लोकेष्वस्ति पितृष्वस: । शूरस्य राज्ञो दुहिता आजमीढकुलं गता,भगवान् वासुदेव बोले--बुआ! संसारमें तुम-जैसी सौभाग्यशालिनी नारी दूसरी कौन है? तुम राजा शूरसेनकी पुत्री हो और महाराज अजमीढके कुलमें ब्याहकर आयी हो
ବାସୁଦେବ କହିଲେ—ପିତୃସ୍ୱସେ! ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମ ପରି ସୌଭାଗ୍ୟବତୀ ନାରୀ ଆଉ କିଏ? ତୁମେ ରାଜା ଶୂରଙ୍କ କନ୍ୟା; ବିବାହରେ ଆଜମୀଢ କୁଳକୁ ଆସିଛ।
Verse 92
महाकुलीना भवती ह्ृदाद् हृदमिवागता । ईश्वरी सर्वकल्याणी भर्त्रा परमपूजिता,तुम एक उच्च कुलकी कन्या हो और दूसरे उच्च कुलमें ब्याही गयी हो; मानो कमलिनी एक सरोवरसे दूसरे सरोवरमें आयी हो। एक दिन तुम सर्वकल्याणी महारानी थीं; तुम्हारे पतिदेवने सदा तुम्हारा विशेष सम्मान किया है
ତୁମେ ମହାକୁଳଜାତା ଏବଂ ମହାକୁଳକୁ ଆସିଛ—ଯେପରି ଗୋଟିଏ ସରୋବରରୁ ଅନ୍ୟ ସରୋବରକୁ କମଳଲତା ଯାଏ। ତୁମେ ସର୍ବକଲ୍ୟାଣମୟୀ ମହାରାଣୀ; ତୁମ ଭର୍ତ୍ତା ତୁମକୁ ପରମ ସମ୍ମାନରେ ପୂଜିଥିଲେ।
Verse 93
वीरसूर्वीरपत्नी त्वं सर्व: समुदिता गुणै: । सुखदु:खे महाप्राज्ञे त्वादशी सोढुमरहति,तुम वीरपत्नी, वीरजननी तथा समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हो। महाप्राज्ञे! तुम्हारी-जैसी विवेकशील स्त्रीको सुख और दुःख चुपचाप सहने चाहिये
ତୁମେ ବୀରଙ୍କ ପତ୍ନୀ, ବୀରମାନଙ୍କ ଜନନୀ, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଗୁଣରେ ସମୃଦ୍ଧ। ହେ ମହାପ୍ରାଜ୍ଞେ! ତୁମ ପରି ବିବେକଶୀଳ ନାରୀ ସୁଖ-ଦୁଃଖ ଉଭୟକୁ ଧୈର୍ୟରେ ସହିବା ଉଚିତ।
Verse 94
निद्रातन्द्रे क्रोधहर्षो क्षुत्पिपासे हिमातपौ । एतानि पार्था निर्जित्य नित्यं वीरसुखे रता:,तुम्हारे सभी पुत्र निद्रा, तन्द्रा (आलस्य), क्रोध, हर्ष, भूख-प्यास तथा सर्दी-गरमी इन सबको जीतकर सदा वीरोचित सुखका उपभोग करते हैं
ତୁମ ପୁଅମାନେ ନିଦ୍ରା-ତନ୍ଦ୍ରା, କ୍ରୋଧ-ହର୍ଷ, ଭୁଖ-ପିଆସ, ଏବଂ ଶୀତ-ତାପ—ଏ ସବୁକୁ ଜୟ କରି ସଦା ବୀରୋଚିତ ସୁଖରେ ରତ ରହନ୍ତି।
Verse 95
त्यक्तग्राम्यसुखा: पार्था नित्यं वीरसुखप्रिया: । नतु स्वल्पेन तुष्येयुर्महोत्साहा महाबला:,तुम्हारे पुत्रोंने ग्राम्यसुखको त्याग दिया है, वीरोचित सुख ही उन्हें सदा प्रिय है। वे महान् उत्साही और महाबली हैं; अतः थोड़े-से ऐश्वर्यसे संतुष्ट नहीं हो सकते
ପାର୍ଥମାନେ ଗ୍ରାମ୍ୟ ସୁଖ ତ୍ୟାଗ କରିଛନ୍ତି; ବୀରୋଚିତ ସୁଖ ହିଁ ସେମାନଙ୍କର ନିତ୍ୟ ପ୍ରିୟ। ସେମାନେ ମହୋତ୍ସାହୀ ଓ ମହାବଳୀ; ତେଣୁ ଅଳ୍ପ ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେବେ ନାହିଁ।
Verse 96
पाण्डवा: समबोध्यन्त बाल्यात् प्रभृति केशव । “केशव! बाल्यावस्थासे ही पाण्डव शंख और दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनिसे, मृदंगोंके मधुर नादसे तथा बाँसुरीकी सुरीली तानसे जगाये जाते थे,अन्तं धीरा निषेवन्ते मध्यं ग्राम्यसुखप्रिया: । उत्तमांश्व॒ परिक्लेशान् भोगांश्वातीव मानुषान् धीर पुरुष भोगोंकी अन्तिम स्थितिका सेवन करते हैं। ग्राम्य विषयभोगोंमें आसक्त पुरुष भोगोंकी मध्य स्थितिका ही सेवन करते हैं। वे धीर पुरुष कर्तव्यपालनके रूपमें प्राप्त बड़े-से-बड़े क्लेशोंको सहर्ष सहन करके अन्तमें मनुष्यातीत भोगोंमें रमण करते हैं। महापुरुषोंका कहना है कि अन्तिम (सुख-दुःखसे अतीत) स्थितिकी प्राप्ति ही वास्तविक सुख है तथा सुख-दुःखके बीचकी स्थिति ही दुःख है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କେଶବ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ବାଲ୍ୟକାଳରୁ ହିଁ ଜାଗ୍ରତ ଓ ସଚେତନ କରାଯାଇଆସୁଛନ୍ତି।
Verse 97
अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्द:खमन्तरमेतयो:,धीर पुरुष भोगोंकी अन्तिम स्थितिका सेवन करते हैं। ग्राम्य विषयभोगोंमें आसक्त पुरुष भोगोंकी मध्य स्थितिका ही सेवन करते हैं। वे धीर पुरुष कर्तव्यपालनके रूपमें प्राप्त बड़े-से-बड़े क्लेशोंको सहर्ष सहन करके अन्तमें मनुष्यातीत भोगोंमें रमण करते हैं। महापुरुषोंका कहना है कि अन्तिम (सुख-दुःखसे अतीत) स्थितिकी प्राप्ति ही वास्तविक सुख है तथा सुख-दुःखके बीचकी स्थिति ही दुःख है
ଧୀରମାନେ ଅନ୍ତିମ ଅବସ୍ଥାରେ ହିଁ ରମଣ କରନ୍ତି, ମଧ୍ୟ ଅବସ୍ଥାରେ ନୁହେଁ। ସେମାନେ କହନ୍ତି—ଅନ୍ତପ୍ରାପ୍ତି ହିଁ ସୁଖ, ଏବଂ ଏହି ଦୁଇଟିର ମଧ୍ୟବର୍ତ୍ତୀ ଅନ୍ତରାଳ ହିଁ ଦୁଃଖ।
Verse 98
अभिवादयन्ति भवतीं पाण्डवा: सह कृष्णया । आत्मानं च कुशलिन निवेद्याहुरनामयम्,बुआ! द्रौपदीसहित पाण्डवोंने तुम्हें प्रणाम कहलाया है और अपनेको सकुशल बताकर अपनी स्वस्थता भी सूचित की है
କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ସହିତ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଆପଣଙ୍କୁ ଅଭିବାଦନ କରୁଛନ୍ତି; ନିଜେମାନେ କୁଶଳରେ ଅଛନ୍ତି ବୋଲି ଜଣାଇ, ନିରାମୟ ଅଛନ୍ତି ବୋଲି କହୁଛନ୍ତି।
Verse 99
अरोगान् सर्वसिद्धार्थान क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पाण्डवान् | ईश्वरान् सर्वलोकस्य हतामित्रान् श्रिया वृतान्,तुम शीघ्र ही देखोगी; पाण्डव नीरोग अवस्थामें तुम्हारे सामने उपस्थित हैं, उनके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो गये हैं और वे अपने शत्रुओंका संहार करके साम्राज्य-लक्ष्मीसे संयुक्त हो सम्पूर्ण जगत्के शासकपदपर प्रतिष्ठित हैं
ତୁମେ ଶୀଘ୍ର ହିଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବ—ସେମାନେ ନିରୋଗ, ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ; ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ହତ କରି, ଶ୍ରୀରେ ଆବୃତ ହୋଇ, ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧିପତି ହୋଇଛନ୍ତି।
Verse 100
एवमाश्वासिता कुन्ती प्रत्युवाच जनार्दनम् | पुत्रादेभिरभिध्वस्ता निगृह्माबुद्धिजं तम:,इस प्रकार आश्वासन पाकर पुत्रों आदिसे दूर पड़ी हुई कुन्तीदेवीने अज्ञानजनित मोहका निरोध करके भगवान् जनार्दनसे कहा
ଏପରି ଆଶ୍ୱାସନ ପାଇ, ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଆଦିଠାରୁ ବିୟୋଗିନୀ କୁନ୍ତୀ ଅଜ୍ଞାନଜନିତ ମୋହର ତମସ୍କୁ ନିଗ୍ରହ କରି ଭଗବାନ୍ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟୁତ୍ତର ଦେଲେ।
Verse 101
कुन्त्युवाच यद् यत् तेषां महाबाहो पथ्यं स्थान्मधुसूदन । यथा यथा त्वं मन्येथा: कुर्या: कृष्ण तथा तथा,कुन्ती बोली--महाबाहु मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो पाण्डवोंके लिये हितकर हो तथा जैसे-जैसे कार्य करना तुम्हें उचित जान पड़े, वैसे-वैसे करो
କୁନ୍ତୀ କହିଲେ—ହେ ମହାବାହୁ ମଧୁସୂଦନ କୃଷ୍ଣ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯାହା ଯାହା ହିତକର, ଏବଂ ଯେପରି ଯେପରି ତୁମେ ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ଭାବ, ସେପରି ସେପରି କର।
Verse 102
अविलोपेन धर्मस्य अनिकृत्या परंतप । प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण सत्यस्याभिजनस्यथ च,परंतप श्रीकृष्ण! धर्मका लोप न करते हुए, छल और कपटसे दूर रहकर समयोचित कार्य करना चाहिये। मैं तुम्हारी सत्यपरायणता और कुल-मर्यादाका भी प्रभाव जानती हूँ
ହେ ପରନ୍ତପ କୃଷ୍ଣ! ଧର୍ମର ଲୋପ ନ ହେବା ପରି, ଛଳ-କପଟରୁ ଦୂରେ ରହି, ସମୟୋଚିତ ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ। ତୁମ ସତ୍ୟନିଷ୍ଠା ଓ କୁଳମର୍ଯ୍ୟାଦାର ପ୍ରଭାବ ମୁଁ ଜାଣେ।
Verse 103
व्यवस्थायां च मित्रेषु बुद्धिविक्रमयोस्तथा । त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्य त्वं तपो महत्,प्रत्येक कार्यकी व्यवस्थामें, मित्रोंके संग्रहमें तथा बुद्धि और पराक्रममें भी जो तुम्हारा अद्भुत प्रभाव है, उससे मैं परिचित हूँ। हमारे कुलमें तुम्हीं धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो, तुम्हीं महान् तप हो, तुम्हीं रक्षक और तुम्हीं परब्रह्म परमात्मा हो। सब कुछ तुममें ही प्रतिष्ठित है। तुम जो कुछ कहते हो, वह सब तुम्हारे संनिधानमें सत्य होकर ही रहेगा
କାର୍ଯ୍ୟବ୍ୟବସ୍ଥା, ମିତ୍ରସଂଗ୍ରହ, ଏବଂ ବୁଦ୍ଧି ଓ ପରାକ୍ରମ—ଏସବୁରେ ତୁମ ଅଦ୍ଭୁତ ପ୍ରଭାବକୁ ମୁଁ ଜାଣେ। ଆମ କୁଳରେ ତୁମେଇ ଧର୍ମ; ତୁମେଇ ସତ୍ୟ; ତୁମେଇ ମହାନ ତପ।
Verse 104
त्वंत्राता त्वं महद् ब्रह्म त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम् । यथैवात्थ तथैवैतत् त्वयि सत्यं भविष्यति,प्रत्येक कार्यकी व्यवस्थामें, मित्रोंके संग्रहमें तथा बुद्धि और पराक्रममें भी जो तुम्हारा अद्भुत प्रभाव है, उससे मैं परिचित हूँ। हमारे कुलमें तुम्हीं धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो, तुम्हीं महान् तप हो, तुम्हीं रक्षक और तुम्हीं परब्रह्म परमात्मा हो। सब कुछ तुममें ही प्रतिष्ठित है। तुम जो कुछ कहते हो, वह सब तुम्हारे संनिधानमें सत्य होकर ही रहेगा
ତୁମେ ତ୍ରାତା; ତୁମେ ମହଦ୍ ବ୍ରହ୍ମ; ସମସ୍ତ କିଛି ତୁମଠାରେ ହିଁ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ତୁମେ ଯେପରି କହିଛ, ସେପରି ହିଁ ହେବ—ତୁମ ସନ୍ନିଧାନରେ ତାହା ସତ୍ୟ ହେବ।
Verse 105
(कुरूणां पाण्डवानां च लोकानां चापराजित । सर्वस्यैतस्य वाष्णेय गतिस्त्वमसि माधव ।। प्रभावो बुद्धिवीर्य च तादृशं॑ तव केशव ।) किसीसे पराजित न होनेवाले वृष्णिनन्दन माधव! कौरवोंके, पाण्डवोंके तथा इस सम्पूर्ण जगतके तुम्हीं आश्रय हो। केशव! तुम्हारा प्रभाव तथा तुम्हारा बुद्धिबल भी तुम्हारे अनुरूप ही है। वैशम्पायन उवाच तामामन्त्रय च गोविन्द: कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । प्रातिष्ठत महाबाहुर्दुर्योधनगृहान् प्रति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर महाबाहु गोविन्द कुन्तीदेवीकी परिक्रमा करके उनसे आज्ञा ले दुर्योधनके घरकी ओर चल दिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଅପରାଜିତ ବୃଷ୍ଣିନନ୍ଦନ ମାଧବ! କୌରବ, ପାଣ୍ଡବ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କର ତୁମେ ହିଁ ଆଶ୍ରୟ ଓ ପରମ ଗତି। ହେ କେଶବ! ତୁମ ପ୍ରଭାବ ଓ ବିବେକଯୁକ୍ତ ବୁଦ୍ଧିବଳ ତୁମକୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ।” ଏହିପରି କହି ଗୋବିନ୍ଦ କୁନ୍ତୀଙ୍କୁ ବିଦାୟ ନେଲେ; ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣ କରି ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଗୃହ ପ୍ରତି ଚାଲିଗଲେ।
Verse 496
न मे दुःखतरं किंचिद् भूतपूर्व ततो5धिकम् । 'युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव भी मुझे द्रौपदीसे अधिक प्रिय नहीं हैं। उसी द्रौपदीको मैंने भरी सभामें लायी गयी देखा, उससे बढ़कर महान् दुःख मुझे पहले कभी नहीं हुआ था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ତାହାଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁଃଖଦ ଘଟଣା ମୋ ପାଖରେ ପୂର୍ବେ କେବେ ହୋଇନାହିଁ—ତାହାଠାରୁ ବଡ଼ ଶୋକ ମୁଁ ପୂର୍ବେ କେବେ ଜାଣିନାହିଁ। ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ, ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ମୋ ପାଖରେ ଦ୍ରୌପଦୀଠାରୁ ଅଧିକ ପ୍ରିୟ ନୁହନ୍ତି। ଏବଂ ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ସେଇ ଦ୍ରୌପଦୀକୁ ଭରି ସଭାରେ ଟାଣି ଆଣାଯାଉଥିବା ଦେଖିଲି, ସେତେବେଳେ ମୋତେ ପୂର୍ବେ କେବେ ନ ହୋଇଥିବା ମହାଦୁଃଖ ହେଲା।”
Whether an envoy should accept hospitality and honors from a host whose political stance is ethically compromised; the chapter frames acceptance as contingent on mission integrity and the sincerity of goodwill.
Ethical action is not governed by appetite, anger, or advantage; hostility toward the virtuous is self-destabilizing, and political legitimacy requires inner restraint and consistency with dharma rather than ceremonial display.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is juridical and ethical—recording the envoy’s standards and the court’s dispositions as part of the epic’s evidentiary build-up to later consequences.