Kṛṣṇa at Duryodhana’s House: Refusal of Hospitality and Departure to Vidura (कृष्णस्य धार्तराष्ट्रनिवेशनगमनम्)
कामद्वेषौ वशे कृत्वा सतां वत्मनिवर्तते | अम्बरीषस्य मान्धातुर्ययातेर्नहुषस्य च,“श्रीकृष्ण! जो लज्जाशील, सत्यको धारण करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा सब प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं; जो काम (राग) एवं द्वेषको वशमें करके सत्पुरुषोंके मार्गकका अनुसरण करते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप एवं उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन राजर्षियोंके सदाचारपालनरूप धारण करनेमें कठिन धर्मकी धुरीको धारण करते हैं; जिनमें शील और सदाचारकी सम्पत्ति भरी हुई है, जो धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण इस भूमण्डलके ही नहीं, तीनों लोकोंके भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है, जो धर्मशास्त्रज्ञान और सदाचार सभी दृष्टियोंसे समस्त कौरवोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; जिनकी अंगकान्ति शुद्ध जाम्बूनद सुवर्णके समान गौर है, जो देखनेमें सभीको प्रिय लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं?
vaiśampāyana uvāca | kāmadveṣau vaśe kṛtvā satāṁ vatmanivartate | ambarīṣasya māndhātur yayāter nahuṣasya ca |
କାମ ଓ ଦ୍ୱେଷକୁ ବଶ କରି ସେ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପଥ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି— ଅମ୍ବରୀଷ, ମାନ୍ଧାତା, ଯୟାତି ଓ ନହୁଷଙ୍କ ପରି।
वैशम्पायन उवाच