
अम्बा–राम–भीष्म संवादः (Amba–Rama–Bhishma Dialogue on Vow and Refuge)
Upa-parva: Amba–Rāma–Bhīṣma Saṃvāda (Episode on vow, refuge, and compelled arbitration)
Bhīṣma recounts a dialogue in which Paraśurāma (Rāma Jāmadagnya) is repeatedly urged by the grieving Kāśī princess Amba to neutralize Bhīṣma as the source of her suffering. Paraśurāma articulates a self-binding rule: he will not take up weapons except by the niyoga (injunction) of brahmavids, indicating a vow-based limit on violence. Amba presses a direct appeal, framing action against Bhīṣma as fulfillment of a promise and as compassionate redress. An ascetic interlocutor reinforces the duty not to abandon a śaraṇāgatā (a woman seeking refuge), urging Paraśurāma to confront Bhīṣma “as one would a roaring adversary,” and argues that Paraśurāma’s earlier declarations about opposing brahma-dviṣ (those hostile to Brahmins) and arrogant victors establish precedent for intervention. Paraśurāma recalls his prior pledge, decides to attempt resolution through conciliation first, but resolves to engage forcefully if Bhīṣma refuses his word. He then prepares to depart with Brahmin sages, spending the night in austerities and proceeding with Amba toward Kurukṣetra, settling near the Sarasvatī—positioning the coming encounter within a dharma-legal framework of vows, refuge, and reputational obligation.
Chapter Arc: अम्बा के अपमान और अधूरे प्रेम का विष अब प्रतिशोध बनकर फूटता है—वह परशुराम के आश्रम में न्याय की पुकार लेकर पहुँचती है और भीष्म को वश में करने का आग्रह करती है। → परशुराम अपनी पूर्व-प्रतिज्ञा और ब्राह्म-तेज के अधिकार से भीष्म को आदेश देते हैं कि अम्बा को स्वीकार करे; भीष्म धर्म-बंधन और अपनी प्रतिज्ञा (ब्रह्मचर्य/राजधर्म) का हवाला देकर अस्वीकार करते हैं। वाणी का संघर्ष रोष में बदलता है—‘शाल्व ने त्यागा, तुम हर लाए’ जैसे तर्कों से अम्बा का घाव और गहरा होता है। → परशुराम क्रोध में बार-बार घोषणा करते हैं कि आज भीष्म को (सहामात्य) मार डालेंगे; भीष्म भी शस्त्र उठाने को विवश होते हैं। दोनों कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान करते हैं और तपस्वी-समुदाय दर्शक बनकर रणभूमि को घेर लेता है—गुरु और शिष्य/क्षत्रिय के बीच महायुद्ध का उद्घोष। → अध्याय का अंत निर्णायक परिणाम पर नहीं, बल्कि युद्ध-स्थल पर अवतरण और युद्ध की औपचारिक तैयारी पर टिकता है—विवाद अब वचन से निकलकर शस्त्र पर आ गया है। → कुरुक्षेत्र में परशुराम-भीष्म का संग्राम आरम्भ होने को है—क्या ब्राह्म-तेज झुकेगा या भीष्म की प्रतिज्ञा?
Verse 1
ऑपन--माजल बछ। जि: अष्टस प्तत्याधिकशततमो< ध्याय: अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना भीष्म उवाच एवमुक्तस्तदा रामो जहि भीष्ममिति प्रभो । उवाच रुदतीं कन्यां चोदयन्तीं पुन: पुनः,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! अम्बाके ऐसा कहनेपर कि प्रभो! भीष्मको मार डालिये। परशुरामजीने रो-रोकर बार-बार प्रेरणा देनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा--'सुन्दरी! काशिराजकुमारी! मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार किसी वेदवेत्ता ब्राह्मणको आवश्यकता हो तो उसीके लिये शस्त्र उठाता हूँ। वैसा कारण हुए बिना इच्छानुसार हथियार नहीं उठाता। अतः इस प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए मैं तेरा दूसरा कौन-सा कार्य करूँ
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ‘ପ୍ରଭୋ! ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ବଧ କରନ୍ତୁ’—ଏଭଳି କହି କାନ୍ଦୁଥିବା ଏବଂ ପୁନଃପୁନଃ ପ୍ରେରଣା ଦେଉଥିବା ସେଇ କନ୍ୟାକୁ ପରଶୁରାମ କହିଲେ—“ସୁନ୍ଦରୀ କାଶୀରାଜକନ୍ୟେ! ମୋ ପ୍ରତିଜ୍ଞାନୁସାରେ, କୌଣସି ବେଦବିଦ୍ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଆବଶ୍ୟକ କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ଦରକାର ହେଲେ ମାତ୍ର ମୁଁ ଶସ୍ତ୍ର ଧରେ; ଏମିତି କାରଣ ନଥିଲେ ଇଚ୍ଛାମତେ ଅସ୍ତ୍ର ଉଠାଏ ନାହିଁ। ତେଣୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞାକୁ ରକ୍ଷା କରି, ମୁଁ ତୋର ଆଉ କେଉଁ କାମ କରିବି?”
Verse 2
काश्ये न काम गृह्नामि शस्त्र वै वरवर्णिनि । ऋते ब्रह्मविदां हेतो: किमनयत् करवाणि ते,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! अम्बाके ऐसा कहनेपर कि प्रभो! भीष्मको मार डालिये। परशुरामजीने रो-रोकर बार-बार प्रेरणा देनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा--'सुन्दरी! काशिराजकुमारी! मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार किसी वेदवेत्ता ब्राह्मणको आवश्यकता हो तो उसीके लिये शस्त्र उठाता हूँ। वैसा कारण हुए बिना इच्छानुसार हथियार नहीं उठाता। अतः इस प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए मैं तेरा दूसरा कौन-सा कार्य करूँ
ହେ ଶୁଭବର୍ଣ୍ଣିନୀ କାଶୀରାଜକନ୍ୟେ! ମୁଁ କେବଳ ନିଜ ଇଚ୍ଛାରେ ଶସ୍ତ୍ର ଧରେନି। ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ ବେଦଜ୍ଞମାନଙ୍କ ହିତ-ରକ୍ଷା ସହ ସମ୍ବନ୍ଧିତ କାରଣ ବିନା ମୁଁ ଅସ୍ତ୍ର ଉଠାଏନି। ତେଣୁ ମୋ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ରକ୍ଷା କରି, ମୁଁ ତୋର ଆଉ କ’ଣ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବି?
Verse 3
वाचा भीष्मश्न शाल्वश्ल मम राज्ञि वशानुगौ । भविष्यतोडनवद्याड्धि तत् करिष्यामि मा शुच:,“राजकन्ये! भीष्म और शाल्व दोनों मेरी आज्ञाके अधीन होंगे। अतः निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! मैं तेरा कार्य करूँगा। तू शोक न कर
ହେ ରାଜକନ୍ୟେ! ମୋ ବଚନରେ ଭୀଷ୍ମ ଓ ଶାଲ୍ୱ—ଦୁହେଁ—ମୋ ଅଧୀନ ହେବେ। ତେଣୁ ହେ ନିର୍ଦୋଷାଙ୍ଗିନୀ, ମୁଁ ତୋର କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧିବି; ଶୋକ କରନି।
Verse 4
नतु शस्त्र ग्रहीष्यामि कथंचिदपि भाविनि | ऋते नियोगाद् विप्राणामेष मे समय: कृत:
କିନ୍ତୁ ହେ ଭାବିନୀ! ମୁଁ କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ଶସ୍ତ୍ର ଧରିବି ନାହିଁ—ବିପ୍ରମାନଙ୍କ ନିୟୋଗ ବିନା। ଏହି ମୋର କୃତ ସମୟ।
Verse 5
'भाविनि! मैं किसी तरह ब्राह्मणोंकी आज्ञाके बिना हथियार नहीं उठाऊँगा, ऐसी मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है' ।। अम्बोवाच मम दु:खं भगवता व्यपनेयं यतस्तत: । तच्च भीष्मप्रसूतं मे तं जही श्वर मा चिरम्,अम्बा बोली--भगवन्! आप जैसे हो सके वैसे ही मेरा दुःख दूर करें। वह दुःख भीष्मने पैदा किया है; अतः प्रभो! उसीका शीघ्र वध कीजिये
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭାବିନୀ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ବିନା ମୁଁ କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ଶସ୍ତ୍ର ଧରିବି ନାହିଁ; ଏହି ମୋର ପ୍ରତିଜ୍ଞା। ଅମ୍ବା କହିଲା—ଭଗବନ୍! ଯେପରି ସମ୍ଭବ ମୋ ଦୁଃଖ ଦୂର କରନ୍ତୁ। ଏହି ଦୁଃଖ ଭୀଷ୍ମ ଦ୍ୱାରା ଉତ୍ପନ୍ନ; ତେଣୁ ପ୍ରଭୋ, ବିଳମ୍ବ ନ କରି ତାହାକୁ ବଧ କରନ୍ତୁ।
Verse 6
राम उवाच काशिकन्ये पुनर्ब्रहि भीष्मस्ते चरणावुभौ । शिरसा वन्दनाहों5पि ग्रहीष्यति गिरा मम
ରାମ କହିଲେ—ହେ କାଶୀକନ୍ୟେ, ପୁନର୍ବାର କହ: ଭୀଷ୍ମ କି ତୋର ଦୁଇ ଚରଣ ଗ୍ରହଣ କରିବ—ମୋର ଶିରୋବନ୍ଦନକୁ ମଧ୍ୟ? ଏବଂ ସେ କି ମୋ ବଚନ ମାନିବ?
Verse 7
परशुरामजी बोले--काशिराजकी पुत्री! तू पुन: सोचकर बता। यद्यपि भीष्म तेरे लिये वन्दनीय है, तथापि मेरे कहनेसे वह तेरे चरणोंको अपने सिरपर उठा लेगा ।। अम्बोवाच जहि भीष्म॑ रणे राम गर्जन्तमसुरं यथा । समाहूतो रणे राम मम चेदिच्छसि प्रियम् । प्रतिश्रुत॑ च यदपि तत् सत्यं कर्तुमहसि,अम्बा बोली--राम! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो युद्धमें आमन्त्रित हो, असुरके समान गर्जना करनेवाले भीष्मको मार डालिये और आपने जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे भी सत्य कीजिये
ରାମ କହିଲେ—କାଶୀରାଜଙ୍କ କନ୍ୟେ! ପୁନର୍ବାର ଭଲଭାବେ ଭାବି କହ। ଯଦିଓ ଭୀଷ୍ମ ତୁମ ପାଇଁ ବନ୍ଦନୀୟ, ତଥାପି ମୋ କଥାରେ ସେ ତୁମ ଚରଣ ନିଜ ଶିର ଉପରେ ଧରିବ। ଅମ୍ବା କହିଲା—ହେ ରାମ! ଯଦି ମୋ ପ୍ରିୟ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ତେବେ ରଣରେ ତାକୁ ଆହ୍ୱାନ କରି, ଅସୁର ପରି ଗର୍ଜନ କରୁଥିବା ଭୀଷ୍ମକୁ ନିହତ କର; ଏବଂ ତୁମେ କରିଥିବା ପ୍ରତିଜ୍ଞାକୁ ସତ୍ୟ କରି ପୂରଣ କର।
Verse 8
भीष्म उवाच तयो: संवदतोरेवं राजन् रामाम्बयोस्तदा । ऋषि: परमधर्मात्मा इदं वचनमत्रवीत्,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! परशुराम और अम्बामें जब इस प्रकार बातचीत हो रही थी, उसी समय परम धर्मात्मा ऋषि अकृतव्रणने यह बात कही--
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଓ ଅମ୍ବା ଏଭଳି କଥାହେଉଥିବା ସମୟରେ, ପରମ ଧର୍ମାତ୍ମା ଋଷି ଅକୃତବ୍ରଣ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।
Verse 9
शरणागतां महाबाहो कन्यां न त्यक्तुमरहसि । यदि भीष्मो रणे राम समाहूतस्त्वया मृधे,“महाबाहो! यह कन्या शरणमें आयी है; अतः आपको इसका त्याग नहीं करना चाहिये। भृगुनन्दन राम! यदि युद्धमें आपके बुलानेपर भीष्म सामने आकर अपनी पराजय स्वीकार करे अथवा आपकी बात ही मान ले तो इस कन्याका कार्य सिद्ध हो जायगा
ହେ ମହାବାହୋ! ଶରଣ ନେଇ ଆସିଥିବା ଏହି କନ୍ୟାକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ତୁମ ପାଇଁ ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ହେ ଭୃଗୁନନ୍ଦନ ରାମ! ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମ ଆହ୍ୱାନରେ ଭୀଷ୍ମ ରଣକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଆସି,
Verse 10
निर्जितो<स्मीति वा ब्रूयात् कुर्याद् वा वचनं तव । कृतमस्या भवेत् कार्य कन्याया भृगुनन्दन,“महाबाहो! यह कन्या शरणमें आयी है; अतः आपको इसका त्याग नहीं करना चाहिये। भृगुनन्दन राम! यदि युद्धमें आपके बुलानेपर भीष्म सामने आकर अपनी पराजय स्वीकार करे अथवा आपकी बात ही मान ले तो इस कन्याका कार्य सिद्ध हो जायगा
ସେ ‘ମୁଁ ପରାଜିତ’ ବୋଲି କହୁ କିମ୍ବା ତୁମ ବଚନ ମାନୁ; ହେ ଭୃଗୁନନ୍ଦନ! ତେବେ ଏହି କନ୍ୟାର କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେବ।
Verse 11
वाक्यं सत्यं च ते वीर भविष्यति कृतं विभो । इयं चापि प्रतिज्ञा ते तदा राम महामुने
ହେ ବୀର, ହେ ବିଭୋ! ତୁମ ବଚନ ନିଶ୍ଚୟ ସତ୍ୟ ହୋଇ ପୂରଣ ହେବ। ଏବଂ ହେ ମହାମୁନି ରାମ! ସେତେବେଳେ ତୁମେ କରିଥିବା ଏହି ପ୍ରତିଜ୍ଞା ମଧ୍ୟ ବିଫଳ ହେବ ନାହିଁ।
Verse 12
जित्वा वै क्षत्रियान् सर्वन् ब्राह्मणेषु प्रतिश्रुता । ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्य: शूद्रश्नेव रणे यदि
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କୁ ଜିତି ମନୁଷ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ କରାଯାଇଥିବା ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ବନ୍ଧିତ ହୁଏ। କାରଣ ରଣରେ, ପରୀକ୍ଷାର କ୍ଷଣ ଆସିଲେ—ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ହେଉ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ହେଉ, ବୈଶ୍ୟ ହେଉ କି ଶୂଦ୍ର ହେଉ—ବ୍ରତବଚନର ବନ୍ଧନ ଓ କର୍ମଫଳ ଅଟଳ ରହେ।”
Verse 13
ब्रह्मद्विड् भविता तं॑ वै हनिष्यामीति भार्गव । शरणार्थे प्रपन्नानां भीतानां शरणार्थिनाम्
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ହେ ଭାର୍ଗବ! ସେ ଯଦି ବ୍ରାହ୍ମଣଦ୍ୱେଷୀ ହୋଇଯାଏ ମଧ୍ୟ, ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ତାକୁ ବଧ କରିବି—ଏହି ମୋର ଘୋଷଣା। କାରଣ ଭୟରେ ଶରଣ ମାଗି ଆସିଥିବା, ରକ୍ଷା ପାଇଁ ପ୍ରପନ୍ନ ଲୋକଙ୍କ ପ୍ରତି ଆଶ୍ରୟଧର୍ମକୁ ଧୋକା ଦିଆଯାଇପାରେ ନାହିଁ।”
Verse 14
न शक्ष्यामि परित्यागं कर्तु जीवन् कथंचन । यश्व कृत्स्नं रणे क्षत्रं विजेष्पति समागतम्
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ମୁଁ ଜୀବିତ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ମୋ ପ୍ରତିଜ୍ଞାମାର୍ଗକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିପାରିବି ନାହିଁ। ଏବଂ ରଣରେ ସମାଗତ ଏହି ସମଗ୍ର କ୍ଷତ୍ରିୟସମୂହକୁ ଯେ ଜିତିବ—ସେହି ଫଳ ହେଉ।”
Verse 15
दीप्तात्मानमहं तं च हनिष्यामीति भार्गव । “महामुने राम! प्रभो! ऐसा होनेसे आपकी कही हुई बात सत्य सिद्ध होगी। वीरवर भार्गव! आपने समस्त क्षत्रियोंको जीतकर ब्राह्मणोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की थी कि यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शाद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करेगा तो मैं उसे निश्चय ही मार डालूँगा। साथ ही भयभीत होकर शरणमें आये हुए शरणार्थियोंका परित्याग मैं जीते-जी किसी प्रकार नहीं कर सकूँगा और जो युद्धमें एकत्र हुए सम्पूर्ण क्षत्रियोंको जीत लेगा, उस तेजस्वी पुरुषका भी मैं वध कर डालूँगा || ११--१४ ह |। स एवं विजयी राम भीष्म: कुरुकुलोदवह: । तेन युध्यस्व संग्रामे समेत्य भूगुनन्दन,'भृगुनन्दन राम! इस प्रकार कुरुकुलका भार वहन करनेवाला भीष्म समस्त क्षत्रियोंपर विजय पा चुका है; अतः आप संग्राममें उसके सामने जाकर युद्ध कीजिये”
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ହେ ଭାର୍ଗବ! ସେ ଦୀପ୍ତାତ୍ମା ପୁରୁଷକୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ବଧ କରିବି।” ଏହିପରି କୁରୁକୁଳର ଧୁରାବାହୀ ଭୀଷ୍ମ ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କୁ ଜିତିଛନ୍ତି; ତେଣୁ, ହେ ଭୃଗୁନନ୍ଦନ ରାମ, ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସି ଯୁଦ୍ଧ କର।
Verse 16
राम उवाच स्मराम्यहं पूर्वकृतां प्रतिज्ञामृषिसत्तम | तथैव च चरिष्यामि यथा साम्नैव लप्स्यते,परशुरामजी बोले--मुनिश्रेष्ठ! मुझे अपनी पहलेकी की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण है, तथापि मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि सामनीतिसे ही काम बन जाय
ରାମ କହିଲେ—“ହେ ଋଷିଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୋର ପୂର୍ବକୃତ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ମୋତେ ସ୍ମରଣ ଅଛି। ତଥାପି ମୁଁ ଏମିତି ଚରିବି, ଯେପରି ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ସାମନୀତିରେ ହିଁ ସିଦ୍ଧ ହୋଇଯାଉ।”
Verse 17
कार्यमेतन्महद् ब्रह्मम् काशिकन्यामनोगतम् । गमिष्यामि स्वयं तत्र कन्यामादाय यत्र स:,ब्रह्मन! काशिराजकी कन्याके मनमें जो यह कार्य है, वह महान् है। मैं उसकी सिद्धिके लिये इस कन्याको साथ लेकर स्वयं ही वहाँ जाऊँगा, जहाँ भीष्म है
ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! କାଶୀରାଜଙ୍କ କନ୍ୟାର ମନରେ ଉଦ୍ଭବିତ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ମହାନ। ଏହାର ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ମୁଁ ଏହି କନ୍ୟାକୁ ସହ ନେଇ ସ୍ୱୟଂ ସେଠାକୁ ଯିବି—ଯେଉଁଠି ଭୀଷ୍ମ ଅଛନ୍ତି।
Verse 18
यदि भीष्मो रणश्लाघी न करिष्यति मे वच: । हनिष्याम्येनमुद्रिक्तमिति मे निश्चिता मतिः,यदि युद्धकी स्पृहा रखनेवाला भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं उस अभिमानीको मार डालूँगा; यह मेरा निश्चित विचार है
ଯଦି ରଣଗର୍ବୀ ଭୀଷ୍ମ ମୋ କଥା ମାନିବେ ନାହିଁ, ତେବେ ସେଇ ଉଦ୍ଧତକୁ ମୁଁ ବଧ କରିବି—ଏହା ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ।
Verse 19
न हि बाणा मयोत्सृष्टा: सज्जन्तीह शरीरिणाम् । कायेषु विदितं तुभ्य॑ पुरा क्षत्रियसंगरे,मेरे चलाये हुए बाण देहधारियोंके शरीरमें अटकते नहीं हैं। (उन्हें विदीर्ण करके बाहर निकल जाते हैं।) यह बात तुम्हें पूर्वकालमें क्षत्रियोंक साथ होनेवाले युद्धके समय ज्ञात हो चुकी है
ମୋ ଛାଡ଼ା ବାଣ ଦେହଧାରୀଙ୍କ ଶରୀରରେ ଅଟକେ ନାହିଁ; ଭେଦି ଦେଇ ବାହାରିଯାଏ। ଏହି କଥା ପୂର୍ବେ କ୍ଷତ୍ରିୟ-ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ତୁମେ ଜାଣିଛ।
Verse 20
एवमुक्क्त्वा ततो राम: सह तैब्रह्म॒वादिभि: | प्रयाणाय मतिं कृत्वा समुत्तस्थौ महातपा:,ऐसा कहकर महातपस्वी परशुरामजी उन ब्रह्मवादी महर्षियोंके साथ प्रस्थान करनेका निश्चय करके उसके लिये उद्यत हो गये
ଏପରି କହି ମହାତପସ୍ବୀ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ସେଇ ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ସହ ପ୍ରୟାଣ କରିବାକୁ ମନ ନିଶ୍ଚୟ କରି ଉଠିଲେ।
Verse 21
ततस्ते तामुषित्वा तु रजनीं तत्र तापसा: । हुताग्नयो जप्तजप्या: प्रतस्थुर्मज्जिघांसया,तत्पश्चात् रातभर वहीं रहकर प्रातःकाल संध्योपासन, गायत्री-जप और अमन्निहोत्र करके वे तपस्वी मुनि मेरा वध करनेकी इच्छासे उस आश्रमसे चले
ତାପରେ ସେଇ ତପସ୍ବୀମାନେ ସେଠାରେ ରାତିଟି ରହି, ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର କରି ଓ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଜପ ସମାପ୍ତ କରି, ପ୍ରଭାତେ ମୋତେ ବଧ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ସେ ଆଶ୍ରମରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 22
अभ्यगच्छत् ततो राम: सह तैब्रह्म॒वादिभि: । कुरुक्षेत्र महाराज कन््यया सह भारत
ତାପରେ ରାମ ସେହି ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ବେଦଜ୍ଞମାନଙ୍କ ସହ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। ହେ ମହାରାଜ, ହେ ଭାରତ! ସେ କନ୍ୟା ସହ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଗଲେ।
Verse 23
महाराज भरतनन्दन! फिर उन वेदवादी मुनियोंको साथ ले परशुरामजी राजकन्या अम्बाके साथ कुरक्षेत्रमें आये ।। न्यविशन्त तत: सर्वे परिगृह्म सरस्वतीम् । तापसास्ते महात्मानो भृगुश्रेष्ठपुरस्कृता:,वहाँ भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीको आगे करके उन सभी तपस्वी महात्माओंने सरस्वती नदीके तटका आश्रय ले रात्रिमें निवास किया
ହେ ମହାରାଜ, ଭରତନନ୍ଦନ! ତେବେ ବେଦବାଦୀ ମୁନିମାନଙ୍କୁ ସହ ନେଇ ପରଶୁରାମ ରାଜକନ୍ୟା ଅମ୍ବା ସହ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଆସିଲେ। ପରେ ସେହି ମହାତ୍ମା ତପସ୍ବୀମାନେ ଭୃଗୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି, ସରସ୍ୱତୀ ନଦୀତଟକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ସେଠାରେ ରାତିରେ ନିବାସ କଲେ।
Verse 24
भीष्म उवाच ततस्तृतीये दिवसे संदिदेश व्यवस्थित: । कुरु प्रियं स मे राजन् प्राप्तोडस्मीति महाव्रतः,भीष्मजी कहते हैं--तदनन्तर तीसरे दिन (हस्तिनापुरके बाहर) एक स्थानपर ठहरकर महान् व्रतधारी परशुरामजीने मुझे संदेश दिया--“राजन्! मैं यहाँ आया हूँ। तुम मेरा प्रिय कार्य करो”
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତାପରେ ତୃତୀୟ ଦିନ ଏକ ସ୍ଥାନରେ ରୁହି ମହାବ୍ରତଧାରୀ ପରଶୁରାମ ମୋତେ ସନ୍ଦେଶ ପଠାଇଲେ—“ରାଜନ! ମୁଁ ଏଠାକୁ ଆସିଛି; ମୋ ପ୍ରିୟ କାର୍ଯ୍ୟ କର।”
Verse 25
तमागतमहं श्रुत्वा विषयान्तं महाबलम् । अभ्यगच्छं जवेनाशु प्रीत्या तेजोनिधिं प्रभुम्,तेजके भण्डार और महाबली भगवान् परशुरामको अपने राज्यकी सीमापर आया हुआ सुनकर मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ वेगपूर्वक उनके पास गया
ସେ ମହାବଳୀ, ତେଜର ନିଧି ସ୍ୱରୂପ ପ୍ରଭୁ ପରଶୁରାମ ମୋ ରାଜ୍ୟସୀମାକୁ ଆସିଛନ୍ତି ବୋଲି ଶୁଣି, ମୁଁ ଆନନ୍ଦରେ ତୁରନ୍ତ ଦ୍ରୁତଗତିରେ ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲି।
Verse 26
गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र ब्राह्मणैः परिवारित: । ऋषच्विग्भिदेवकल्पैश्व तथैव च पुरोहितैः,राजेन्द्र! उस समय एक गौको आगे करके ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ मैं देवताओंके समान तेजस्वी ऋत्विजों तथा पुरोहितोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुआ
ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଏକ ଗାଈକୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବେଷ୍ଟିତ ହୋଇ, ଦେବତାସଦୃଶ ତେଜସ୍ବୀ ଋତ୍ୱିଜ ଓ ପୁରୋହିତମାନଙ୍କ ସହ ତାଙ୍କ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲି।
Verse 27
स मामभिगतं दृष्टवा जामदग्न्य: प्रतापवान् | प्रतिजग्राह तां पूजां वचनं चेदमब्रवीत्,मुझे अपने समीप आया हुआ देख प्रतापी परशुरामजीने मेरी दी हुई पूजा स्वीकार की और इस प्रकार कहा
ମୁଁ ତାଙ୍କ ସମୀପକୁ ଆସିଥିବା ଦେଖି ପ୍ରତାପବାନ୍ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ ପରଶୁରାମ ମୋର ଦିଆ ପୂଜା ଗ୍ରହଣ କରି, ପରେ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 28
राम उवाच भीष्म कां बुद्धिमास्थाय काशिराजसुता तदा । अकामेन त्वया55नीता पुनश्चैव विसर्जिता,परशुरामजी बोले--भीष्म! तुमने किस विचारसे उन दिनों स्वयं पत्नीकी कामनासे रहित होते हुए भी काशिराजकी इस कन्याका अपहरण किया, अपने घर ले आये और पुनः इसे निकाल बाहर किया
ପରଶୁରାମ କହିଲେ—“ଭୀଷ୍ମ! କେଉଁ ବିଚାର ଓ ବୁଦ୍ଧି ଆଶ୍ରୟ କରି, ତୁମେ ସ୍ତ୍ରୀକାମନାରହିତ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେଦିନ କାଶୀରାଜଙ୍କ କନ୍ୟାକୁ ଅପହରଣ କରି ଘରକୁ ଆଣିଲେ, ଏବଂ ପୁଣି ତାକୁ ତ୍ୟାଗ କଲେ?”
Verse 29
विभ्रृंशिता त्वया हीयं धर्मादास्ते यशस्विनी । परामृष्टां त्वया हीमां को हि गन्तुमिहाहति,तुमने इस यशस्विनी राजकुमारीको धर्मसे भ्रष्ट कर दिया है। तुम्हारे द्वारा इसका स्पर्श कर लिया गया है, ऐसी दशामें इसे दूसरा कौन ग्रहण कर सकता है?
ତୁମେ ଏହି ଯଶସ୍ବିନୀ ରାଜକୁମାରୀକୁ ଧର୍ମପଥରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ କରିଦେଇଛ। ତୁମର ସ୍ପର୍ଶ ତା’ପରେ ପଡ଼ିଛି; ଏମିତି ଅବସ୍ଥାରେ ଏଠାରେ ତାକୁ ଅନ୍ୟ କିଏ ଗ୍ରହଣ କରିପାରିବ?
Verse 30
प्रत्याख्याता हि शाल्वेन त्वया5डनीतेति भारत । तस्मादिमां मन्नियोगात् प्रतिगृह्लीष्व भारत,भारत! तुम इसे हरकर लाये थे। इसी कारणसे शाल्वराजने इसके साथ विवाह करनेसे इन्कार कर दिया है; अत: अब तुम मेरी आज्ञासे इसे ग्रहण कर लो
ହେ ଭାରତ! ‘ତୁମେ ତାକୁ ଅପହରଣ କରି ଆଣିଥିଲ’—ଏହି କାରଣରୁ ଶାଲ୍ବ ତାକୁ ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ କରିଛି। ତେଣୁ ମୋର ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ ତାକୁ ଗ୍ରହଣ କର, ହେ ଭାରତ।
Verse 31
स्वथधर्म पुरुषव्याप्र राजपुत्री लभत्वियम् | न युक्तस्त्ववमानो<यं राज्ञां कर्तु त्वयानघ,पुरुषसिंह! तुम्हें ऐसा करना चाहिये, जिससे इस राजकुमारीको स्वधर्मपालनका अवसर प्राप्त हो। अनघ! तुम्हें राजाओंका इस प्रकार अपमान करना उचित नहीं है
ହେ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର! ଏମିତି କର, ଯେ ଏହି ରାଜକୁମାରୀ ନିଜ ସ୍ୱଧର୍ମ ପାଳନର ସୁଯୋଗ ପାଉ। ହେ ଅନଘ! ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଏଭଳି ଅପମାନ କରିବା ତୁମ ପାଇଁ ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ନୁହେଁ।
Verse 32
ततस्तं वै विमनसमुदीक्ष्याहमथाब्रुवम् । नाहमेनां पुनर्दद्यां ब्रह्मन् भ्रात्रे कंचन,तब मैंने परशुरामजीको उदास देखकर इस प्रकार कहा--'ब्रह्मन! अब मैं इसका विवाह अपने भाईके साथ किसी प्रकार नहीं कर सकता
ତାପରେ ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ବିମନସ୍କ ଦେଖି ମୁଁ କହିଲି—“ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଏହାକୁ ମୁଁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ପୁନର୍ବାର ମୋ ଭାଇଙ୍କ ସହ ବିବାହରେ ଦେଇପାରିବି ନାହିଁ।”
Verse 33
शाल्वस्याहमिति प्राह पुरा मामेव भार्गव । मया चैवाभ्यनुज्ञाता गतेयं नगरं प्रति,'भगुनन्दन! इसने पहले मुझसे ही आकर कहा कि मैं शाल्वकी हूँ, तब मैंने इसे जानेकी आज्ञा दे दी और यह शाल्वराजके नगरको चली गयी
“ହେ ଭାର୍ଗବ! ପୂର୍ବେ ସେ ମୋ ପାଖକୁ ଆସି ‘ମୁଁ ଶାଲ୍ୱର’ ବୋଲି କହିଥିଲା। ତେବେ ମୁଁ ତାକୁ ଯିବାକୁ ଅନୁମତି ଦେଲି, ଏବଂ ସେ ଶାଲ୍ୱରାଜଙ୍କ ନଗରକୁ ଚାଲିଗଲା।”
Verse 34
न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थलो भान्न काम्यया । क्षात्रं धर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम्,“मैं भयसे, दयासे, धनके लोभसे तथा और किसी कामनासे भी क्षत्रियधर्मका त्याग नहीं कर सकता, यह मेरा स्वीकार किया हुआ व्रत है”
“ନ ଭୟରୁ, ନ ଦୟାରୁ, ନ ଧନଲୋଭରୁ, ନ କୌଣସି କାମନାରୁ—ମୁଁ କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମ ତ୍ୟାଗ କରିବି ନାହିଁ; ଏହା ମୋର ଦୃଢ଼ ବ୍ରତ।”
Verse 35
अथ मामब्रवीद् राम: क्रोधपर्याकुलेक्षण: । न करिष्यसि चेदेतद् वाक््यं मे नरपुज्रव
ତାପରେ କ୍ରୋଧରେ ବ୍ୟାକୁଳ ନୟନ ଥିବା ରାମ ମୋତେ କହିଲେ—“ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯଦି ତୁମେ ମୋର ଏହି ଆଜ୍ଞା ପାଳନ ନ କରିବ…”
Verse 36
संरम्भादब्रवीद् राम: क्रोधपर्याकुलेक्षण:,शत्रुदमन दुर्योधन! परशुरामजीने क्रोधभरे नेत्रोंसे देखते हुए बड़े रोषावेशमें आकर यह बात कही थी, तथापि मैं प्रिय वचनोंद्वारा उन भृगुश्रेष्ठ महात्मासे बार-बार शान्त रहनेके लिये प्रार्थना करता रहा; पर वे किसी प्रकार शान्त न हो सके
କ୍ରୋଧରେ ବ୍ୟାକୁଳ ନୟନ ଥିବା ରାମ ରୋଷାବେଶରେ କହିଲେ—“ଶତ୍ରୁଦମନ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ପରଶୁରାମ କ୍ରୋଧଭରା ଦୃଷ୍ଟିରେ ଏହି କଥାଗୁଡ଼ିକ କହିଥିଲେ। ତଥାପି ମୁଁ ଭୃଗୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେହି ମହାତ୍ମାଙ୍କୁ ମୃଦୁ ଓ ପ୍ରିୟ ବଚନରେ ପୁନଃପୁନଃ ଶାନ୍ତ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଥିଲି; କିନ୍ତୁ ସେ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଶାନ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ।”
Verse 37
तमहं गीर्भिरिष्टाभि: पुन: पुनररिंदम | अयाचं भृगुशार्दूलं न चैव प्रशशाम सः,शत्रुदमन दुर्योधन! परशुरामजीने क्रोधभरे नेत्रोंसे देखते हुए बड़े रोषावेशमें आकर यह बात कही थी, तथापि मैं प्रिय वचनोंद्वारा उन भृगुश्रेष्ठ महात्मासे बार-बार शान्त रहनेके लिये प्रार्थना करता रहा; पर वे किसी प्रकार शान्त न हो सके
ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ! ମୁଁ ଭୃଗୁଶାର୍ଦୂଳ ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ପ୍ରିୟ ଓ ଶାନ୍ତିକର ବଚନରେ ଅନୁରୋଧ କଲି; କିନ୍ତୁ ସେ କିଛିମାତ୍ରେ ଶାନ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ।
Verse 38
प्रणम्य तमहं मूर्थ्ना भूयो ब्राह्मणसत्तमम् । अब्रुवं कारणं कि तद् यत् त्वं युद्ध मयेच्छसि,तब मैंने उन ब्राह्मणशिरोमणिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर पुनः प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा--“भगवन्! क्या कारण है कि आप मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं? बाल्यावस्थामें आपने ही मुझे चार प्रकारके धरनुर्वेदकी शिक्षा दी है। महाबाहु भार्गव! मैं तो आपका शिष्य हूँ"
ତାପରେ ମୁଁ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠଙ୍କୁ ମସ୍ତକ ନମାଇ ପୁନଃ ପ୍ରଣାମ କରି କହିଲି—“ଭଗବନ୍! ଆପଣ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ କାହିଁକି ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି? କାରଣ କ’ଣ?”
Verse 39
इष्वस्त्रं मम बालस्य भवतैव चतुर्विधम् । उपदिष्ट महाबाहो शिष्यो5स्मि तव भार्गव,तब मैंने उन ब्राह्मणशिरोमणिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर पुनः प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा--“भगवन्! क्या कारण है कि आप मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं? बाल्यावस्थामें आपने ही मुझे चार प्रकारके धरनुर्वेदकी शिक्षा दी है। महाबाहु भार्गव! मैं तो आपका शिष्य हूँ"
“ମହାବାହୁ ଭାର୍ଗବ! ମୋର ବାଳ୍ୟାବସ୍ଥାରେ ଆପଣେଇ ମୋତେ ଚତୁର୍ବିଧ ଇଷ୍ୱସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟା ଶିଖାଇଥିଲେ; ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ।”
Verse 40
ततो मामब्रवीद् राम: क्रोधसंरक्तलोचन: । जानीषे मां गुरुं भीष्म गृह्नलासीमां न चैव ह,तब परशुरामजीने क्रोधसे लाल आँखें करके मुझसे कहा--“महामते भीष्म! तुम मुझे अपना गुरु तो समझते हो; परंतु मेरा प्रिय करनेके लिये काशिराजकी इस कन्याको ग्रहण नहीं करते हो; किंतु कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना तुम्हें शान्ति नहीं मिल सकती
ତାପରେ କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତବର୍ଣ୍ଣ ନୟନ ଥିବା ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମୋତେ କହିଲେ—“ଭୀଷ୍ମ! ତୁମେ ମୋତେ ଗୁରୁ ଭାବେ ଜାଣ; କିନ୍ତୁ ମୋ ପ୍ରିୟାର୍ଥେ ଏହି କାଶୀରାଜକନ୍ୟାକୁ ଗ୍ରହଣ କରୁନାହଁ।”
Verse 41
सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रियार्थ महामते । नहि ते विद्यते शान्तिरन््यथा कुरुनन्दन,तब परशुरामजीने क्रोधसे लाल आँखें करके मुझसे कहा--“महामते भीष्म! तुम मुझे अपना गुरु तो समझते हो; परंतु मेरा प्रिय करनेके लिये काशिराजकी इस कन्याको ग्रहण नहीं करते हो; किंतु कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना तुम्हें शान्ति नहीं मिल सकती
“ହେ କୌରବ୍ୟ, ମହାମତେ! ମୋ ପ୍ରିୟାର୍ଥେ କାଶୀରାଜଙ୍କ ଏହି କନ୍ୟାକୁ ଗ୍ରହଣ କର; ନଚେତ୍, ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ, ତୁମ ପାଇଁ ଶାନ୍ତି ନାହିଁ।”
Verse 42
गृहाणेमां महाबाहो रक्षस्व कुलमात्मन: । त्वया विभ्रृशिता हीयं भर्तारें नाधिगच्छति
Rāma said: “O mighty-armed one, accept me and protect your own lineage. Cast off by you, this woman will not find a husband.”
Verse 43
“महाबाहो! इसे ग्रहण कर लो और इस प्रकार अपने कुलकी रक्षा करो। तुम्हारे द्वारा अपनी मर्यादासे गिर जानेके कारण इसे पतिकी प्राप्ति नहीं हो रही है” ।। तथा ब्रुवन्तं तमहं राम॑ परपुरंजयम् । नैतदेवं पुनर्भावि ब्रह्म॒र्षे कि श्रमेण ते,ऐसी बातें करते हुए शत्रुनगरविजयी परशुरामजीसे मैंने स्पष्ट कह दिया--“ब्रह्मर्ष! अब फिर ऐसी बात नहीं हो सकती। इस विषयमें आपके परिश्रमसे क्या होगा?
“O mighty-armed one, accept this and thereby safeguard the honor and continuity of your lineage. Because you have fallen from your own bounds of propriety, she is not obtaining a husband.” When Paraśurāma—conqueror of enemy strongholds—spoke in this manner, I replied to him plainly: “O brahmarṣi, this cannot happen again in that way. What purpose would your exertion serve in this matter?” The exchange frames a conflict between personal restraint and the protection of family order, and it asserts a firm ethical boundary: once a limit has been crossed, mere force or effort cannot restore what propriety has forfeited.
Verse 44
गुरुत्वं त्वयि सम्प्रेक्ष्य जामदग्न्य पुरातनम् । प्रसादये त्वां भगवंस्त्यक्तैषा तु पुरा मया,“जमदग्निनन्दन! भगवन्! आप मेरे प्राचीन गुरु हैं, यह सोचकर ही मैं आपको प्रसन्न करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ। इस अम्बाको तो मैंने पहले ही त्याग दिया था
Rāma said: “Recognizing in you the ancient authority of my teacher, O Jāmadagnya, I seek to win your favor, O venerable one. As for this Ambā, I had already renounced her long ago.”
Verse 45
को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम् | वासयेत गृहे जानन् स्त्रीणां दोषो महात्यय:,“दूसरेके प्रति अनुराग रखनेवाली नारी सर्पिणीके समान भयंकर होती है। कौन ऐसा पुरुष होगा, जो जान-बूझकर उसे कभी भी अपने घरमें स्थान देगा; क्योंकि स्त्रियोंका (परपुरुषमें अनुरागरूप) दोष महान् अनर्थका कारण होता है
“Who indeed would knowingly keep in his house a woman whose mind is set on another—dangerous like a she-serpent? For the fault found in women—attachment to another man—becomes a cause of great calamity.”
Verse 46
न भयाद् वासवस्यापि धर्म जहां महाव्रत । प्रसीद मा वा यद् वा ते कार्य तत् कुरु मा चिरम्,“महान् व्रतधारी राम! मैं इन्द्रके भी भयसे धर्मका त्याग नहीं कर सकता। आप प्रसन्न हों या न हों। आपको जो कुछ करना हो, शीघ्र कर डालिये
O great vow-holder! Even out of fear of Vāsava (Indra) I will not abandon dharma. Whether you are pleased or not, do whatever you intend to do—do it without delay.
Verse 47
अयं चापि विशुद्धात्मन् पुराणे श्रूयते विभो । मरुत्तेन महाबुद्धे गीत: श्लोको महात्मना,“विशुद्ध हृदयवाले परम बुद्धिमान् राम! पुराणमें महात्मा मरुत्तके द्वारा कहा हुआ यह श्लोक सुननेमें आता है कि यदि गुरु भी गर्वमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न समझते हुए कुपथका आश्रय ले तो उसका परित्याग कर दिया जाता है
ହେ ବିଶୁଦ୍ଧାତ୍ମନ୍, ହେ ବିଭୋ! ପୁରାଣ-ପରମ୍ପରାରେ ଏହା ମଧ୍ୟ ଶୁଣାଯାଏ—ହେ ମହାବୁଦ୍ଧି ରାମ, ମହାତ୍ମା ମରୁତ୍ତ ଗାଇଥିବା ଏକ ଶ୍ଲୋକ। ତାହାର ଅର୍ଥ ହେଲା: ଯଦି ଗୁରୁ ମଧ୍ୟ ଗର୍ବରେ ମତ୍ତ ହୋଇ କାର୍ଯ୍ୟ–ଅକାର୍ଯ୍ୟର ବିବେକ ହରାଇ କୁପଥକୁ ଧରେ, ତେବେ ତାଙ୍କୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 48
“गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते”,“विशुद्ध हृदयवाले परम बुद्धिमान् राम! पुराणमें महात्मा मरुत्तके द्वारा कहा हुआ यह श्लोक सुननेमें आता है कि यदि गुरु भी गर्वमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न समझते हुए कुपथका आश्रय ले तो उसका परित्याग कर दिया जाता है
ଗୁରୁ ମଧ୍ୟ ଯଦି ଗର୍ବରେ ମତ୍ତ ହୋଇ କାର୍ଯ୍ୟ–ଅକାର୍ଯ୍ୟ ନ ବୁଝି କୁପଥକୁ ଧରେ, ତେବେ ତାଙ୍କର ପରିତ୍ୟାଗ କରିବା ହିଁ ବିଧି।
Verse 49
स त्वं गुरुरिति प्रेमणा मया सम्मानितो भृशम् | गुरुवृत्ति न जानीषे तस्माद् योत्स्यामि वै त्वया,“आप मेरे गुरु हैं, यह समझकर मैंने प्रेमपूर्वकत आपका अधिक-से-अधिक सम्मान किया है; परंतु आप गुरुका-सा बर्ताव नहीं जानते; अतः मैं आपके साथ युद्ध करूँगा
ଆପଣ ମୋର ଗୁରୁ—ଏହି ଭାବରେ ମୁଁ ପ୍ରେମପୂର୍ବକ ଆପଣଙ୍କୁ ଅତ୍ୟଧିକ ସମ୍ମାନ କରିଛି; କିନ୍ତୁ ଆପଣ ଗୁରୁସୁଲଭ ଆଚରଣ ଜାଣନ୍ତି ନାହିଁ। ତେଣୁ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଆପଣଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି।
Verse 50
गुरुं न हन्यां समरे ब्राह्मणं च विशेषत: । विशेषतस्तपोवृद्धमेवं क्षान्तं मया तव,“एक तो आप गुरु हैं। उसमें भी विशेषतः ब्राह्मण हैं। उसपर भी विशेष बात यह है कि आप तपसयामें बढ़े-चढ़े हैं। अत: आप-जैसे पुरुषको मैं कैसे मार सकता हूँ? यही सोचकर मैंने अबतक आपके तीक्ष्ण बर्तावको चुपचाप सह लिया
ମୁଁ ସମରରେ ମୋର ଗୁରୁଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିବି ନାହିଁ—ବିଶେଷକରି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ତ ନୁହେଁ। ତା’ପରେ ଆପଣ ତପସ୍ୟାରେ ବୃଦ୍ଧି ପାଇଥିବା ମହାନ ପୁରୁଷ। ଏହିଭାବେ ଭାବି ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବ୍ୟବହାରକୁ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ନିରବରେ ସହିଛି।
Verse 51
उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्म॒णं क्षत्रबन्धुवत् । यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायिनम्,“यदि ब्राह्मण भी क्षत्रियकी भाँति धनुष-बाण उठाकर युद्धमें क्रोधपूर्वक सामने आकर युद्ध करने लगे और पीठ दिखाकर भागे नहीं तो उसे इस दशामें देखकर जो योद्धा मार डालता है, उसे ब्रह्महत्याका दोष नहीं लगता, यह धर्मशास्त्रोंका निर्णय है। तपोधन! मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रियोंके ही धर्ममें स्थित हूँ
ଯଦି ବ୍ରାହ୍ମଣ ମଧ୍ୟ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପରି ଶସ୍ତ୍ର ଉଠାଇ—ସମରରେ କ୍ରୋଧପୂର୍ବକ ସାମ୍ନାସାମ୍ନି ଯୁଦ୍ଧ କରେ ଏବଂ ପିଠ ଦେଖାଇ ପଳାଏ ନାହିଁ—ତେବେ ସେହି ଅବସ୍ଥାରେ ତାକୁ ସମରରେ ହତ୍ୟା କରୁଥିବା ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟାର ଦୋଷ ଲାଗେ ନାହିଁ। ଏହା ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ରମାନଙ୍କର ସ୍ଥିର ନିଷ୍ପତ୍ତି। ହେ ତପୋଧନ! ମୁଁ କ୍ଷତ୍ରିୟ; କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମରେ ନିଷ୍ଠିତ।
Verse 52
ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चय: । क्षत्रियाणां स्थितो धर्मे क्षत्रियोडस्मि तपोधन,“यदि ब्राह्मण भी क्षत्रियकी भाँति धनुष-बाण उठाकर युद्धमें क्रोधपूर्वक सामने आकर युद्ध करने लगे और पीठ दिखाकर भागे नहीं तो उसे इस दशामें देखकर जो योद्धा मार डालता है, उसे ब्रह्महत्याका दोष नहीं लगता, यह धर्मशास्त्रोंका निर्णय है। तपोधन! मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रियोंके ही धर्ममें स्थित हूँ
ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ରରେ ଏହି ବିଷୟରେ ନିଶ୍ଚୟ ଅଛି—ତାହାର ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟା ଦୋଷ ହୁଏ ନାହିଁ। ଯଦି କୌଣସି ବ୍ରାହ୍ମଣ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପରି ଧନୁ-ବାଣ ଧରି କ୍ରୋଧରେ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସି ଯୁଦ୍ଧ କରେ ଏବଂ ପିଠ ଦେଇ ପଳାଏ ନାହିଁ, ତେବେ ତାକୁ ସେହି ଅବସ୍ଥାରେ ଦେଖି ଯେ ଯୋଦ୍ଧା ମାରେ, ତାହାକୁ ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟାର ପାପ ଲାଗେ ନାହିଁ। ତପୋଧନ! ମୁଁ କ୍ଷତ୍ରିୟ; କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମରେ ଅବସ୍ଥିତ।
Verse 53
यो यथा वर्तते यस्मिंस्तस्मिन्नेव प्रवर्तयन् । नाधर्म समवाप्रोति न चाश्रेयश्ष विन्दति,“जो जैसा बर्ताव करता है, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करनेवाला पुरुष न तो अधर्मको प्राप्त होता है और न अमंगलका ही भागी होता है
ଯେ ଯେପରି ଆଚରଣ କରେ, ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ସେହିପରି ଆଚରଣ କରୁଥିବା ପୁରୁଷ ନ ଅଧର୍ମକୁ ପାଏ, ନ ଅମଙ୍ଗଳର ଭାଗୀ ହୁଏ।
Verse 54
अर्थ वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् । अर्थसंशयमापतन्न: श्रेयान्नि:संशयो नर:,“अर्थ (लौकिक कृत्य) और धर्मके विवेचनमें कुशल तथा देश-कालके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष यदि अर्थके विषयमें संशय उत्पन्न होनेपर उसे छोड़कर संशयशून्य हृदयसे केवल धर्मका ही अनुष्ठान करे तो वह श्रेष्ठ माना गया है
ଅର୍ଥ କିମ୍ବା ଧର୍ମ—ଉଭୟ ବିଷୟରେ ସମର୍ଥ ଓ ଦେଶ-କାଳ ଜାଣୁଥିବା ପୁରୁଷ, ଯଦି ଅର୍ଥ ବିଷୟରେ ସନ୍ଦେହ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ ସେହି ସନ୍ଦେହାସ୍ପଦ ପଥକୁ ତ୍ୟାଗ କରି, ନିଃସନ୍ଦେହ ଚିତ୍ତରେ କେବଳ ଧର୍ମକୁ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରେ—ସେଇ ପୁରୁଷ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମନାଯାଏ।
Verse 55
यस्मात् संशयिते<प्यर्थेड्य थान्यायं प्रवर्तसे । तस्माद् योत्स्यामि सहितस्त्वया राम महाहवे,“राम! “अम्बा ग्रहण करनेयोग्य है या नहीं” यह संशयग्रस्त विषय है तो भी आप इसे ग्रहण करनेके लिये मुझसे न्यायोचित बर्ताव नहीं कर रहे हैं; इसलिये महान् समरांगणमें आपके साथ युद्ध करूँगा
ହେ ରାମ! “ଅମ୍ବା ଗ୍ରହଣଯୋଗ୍ୟ କି ନୁହେଁ”—ଏହା ସନ୍ଦେହାସ୍ପଦ ବିଷୟ; ତଥାପି ଆପଣ ମୋ ପ୍ରତି ନ୍ୟାୟୋଚିତ ଆଚରଣ କରୁନାହାନ୍ତି। ଏହିହେତୁ, ହେ ରାମ, ମହାସମରରେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସହ ସମ୍ମୁଖ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି।
Verse 56
पश्य मे बाहुवीर्य च विक्रमं चातिमानुषम् । एवं गते5पि तु मया यच्छक्यं भूगुनन्दन,“आप उस समय मेरे बाहुबल और अलौकिक पराक्रमको देखियेगा। भृगुनन्दन! ऐसी स्थितिमें भी मैं जो कुछ कर सकता हूँ, उसे अवश्य करूँगा। विप्रवर! मैं कुरुक्षेत्रमें चलकर आपके साथ युद्ध करूँगा। महातेजस्वी राम! आप द्वब्द्ययुद्धके लिये इच्छानुसार तैयारी कर लीजिये
ମୋର ବାହୁବଳ ଓ ଅତିମାନୁଷ ପରାକ୍ରମକୁ ଦେଖ। ଭୃଗୁନନ୍ଦନ! ଏପରି ଅବସ୍ଥାରେ ମଧ୍ୟ ମୋ ପକ୍ଷରୁ ଯାହା ସମ୍ଭବ, ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ କରିବି।
Verse 57
तत् करिष्ये कुरुक्षेत्रे योत्स्ये विप्र त्वया सह । डन्ड्े राम यथेष्टं मे सज्जीभव महाद्युते,“आप उस समय मेरे बाहुबल और अलौकिक पराक्रमको देखियेगा। भृगुनन्दन! ऐसी स्थितिमें भी मैं जो कुछ कर सकता हूँ, उसे अवश्य करूँगा। विप्रवर! मैं कुरुक्षेत्रमें चलकर आपके साथ युद्ध करूँगा। महातेजस्वी राम! आप द्वब्द्ययुद्धके लिये इच्छानुसार तैयारी कर लीजिये
“So be it—I shall do this. On the field of Kurukṣetra I will fight with you, O brāhmaṇa. O Rāma of great splendor, take up your staff and prepare yourself as you wish for the duel. At that time you will witness the strength of my arms and my extraordinary valor; even in such a situation, whatever lies within my power, I will certainly do.”
Verse 58
तत्र त्वं निहतो राम मया शरशतार्दित: । प्राप्स्यसे निर्जिताँललोकान् शस्त्रपूतो महारणे,“राम! उस महान् युद्धमें मेरे सैकड़ों बाणोंसे पीड़ित एवं शस्त्रपूत हो मारे जानेपर आप पुण्यकर्मोद्वारा जीते हुए दिव्य लोकोंको प्राप्त करेंगे
“There, O Rāma, when you are slain by me in that great battle—pierced and tormented by hundreds of arrows, and purified by the ordeal of weapons—you will attain the heavenly worlds won by your righteous deeds.”
Verse 59
स गच्छ विनिवर्तस्व कुरुक्षेत्र रणप्रिय । तत्रैष्यामि महाबाहो युद्धाय त्वां तपोधन,'युद्धप्रिय महाबाहु तपोधन! अब आप लौटिये और कुरक्षेत्रमें ही चलिये। मैं युद्धके लिये वहीं आपके पास आऊँगा
Rāma said: “Go now—return and proceed to Kurukṣetra, O lover of battle. There, O mighty-armed one, O treasure of austerity, I shall come to you for the fight.” The statement frames war as a chosen, rule-bound encounter at the proper field, emphasizing resolve and the ethics of meeting an opponent openly rather than through delay or evasion.
Verse 60
अपि यत्र त्वया राम कृतं शौचं पुरा पितु: । तत्राहमपि हत्वा त्वां शौचं कर्तास्मि भार्गव
Rāma said: “In that very place where you once performed the purificatory rite for your father, O Rāma, there too I—after slaying you—shall perform the same rite, O Bhārgava.”
Verse 61
'भुगुनन्दन परशुराम! जहाँ पूर्वकालमें अपने पिताको अंजलि-दान देकर आपने आत्मशुद्धिका अनुभव किया था, वहीं मैं भी आपको मारकर आत्मशुद्धि करूँगा ।। तत्र राम समागच्छ त्वरितं युद्धदुर्मद । व्यपनेष्यामि ते दर्प पौराणं ब्राह्मणब्रुव,“ब्राह्मण कहलानेवाले रणदुर्मद राम! आप तुरंत कुरुक्षेत्रमें पधारिये। मैं वहीं आकर आपके पुरातन दर्पका दलन करूँगा'
“O descendant of Bhṛgu, Paraśurāma! In the very place where, long ago, you felt inner purification after offering a libation with joined palms to your father, there I too will attain purification—by slaying you. Come there at once, O Rāma, intoxicated with battle. I shall crush your ancient arrogance, you who merely claim the name of a brāhmaṇa.”
Verse 62
यच्चापि कत्थसे राम बहुश: परिषत्सु वै । निर्जिता: क्षत्रिया लोके मयैकेनेति तच्छूणु,“राम! आप जो बहुत बार भरी सभाओंमें अपनी प्रशंसाके लिये यह कहा करते हैं कि मैंने अकेले ही संसारके समस्त क्षत्रियोंको जीत लिया था तो उसका उत्तर सुन लीजिये
ହେ ରାମ! ତୁମେ ଯେ ବହୁବାର ଭରା ସଭାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗର୍ବ କରି କହ—‘ମୁଁ ଏକା ହୋଇ ସମଗ୍ର ଲୋକର ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କୁ ଜିତିଛି’—ସେ କଥାର ଉତ୍ତର ଏବେ ଶୁଣ।
Verse 63
न तदा जातवान् भीष्म: क्षत्रियो वापि मद्विध: । पश्चाज्जातानि तेजांसि तृणेषु ज्वलितं त्वया,“उन दिनों भीष्म अथवा मेरे-जैसा दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं उत्पन्न हुआ था। तेजस्वी क्षत्रिय तो पीछे उत्पन्न हुए हैं। आप तो घास-फूसमें ही प्रज्वलित हुए हैं (तिनकोंके समान दुर्बल क्षत्रियोंपर ही अपना तेज प्रकट किया है)
ସେ ସମୟରେ ନ ଭୀଷ୍ମ ଜନ୍ମିଥିଲେ, ନ ମୋ ପରି କୌଣସି କ୍ଷତ୍ରିୟ। ସତ୍ୟ ତେଜସ୍ବୀ ବୀରମାନେ ପରେ ଜନ୍ମିଲେ; ତୁମର ଜ୍ୱାଳା ତ ତୃଣମଧ୍ୟରେ ମାତ୍ର ଦେଖାଗଲା।
Verse 64
यस्ते युद्धमयं दर्प कामं॑ च व्यपनाशयेत् । सो<हं जातो महाबाहो भीष्म: परपुरंजय: । व्यपनेष्यामि ते दर्प युद्धे राम न संशय:,“महाबाहो! जो आपकी युद्धविषयक कामना तथा अभिमानको नष्ट कर सके, वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला यह भीष्म तो अब उत्पन्न हुआ है। राम! मैं युद्धमें आपका सारा घमंड चूर-चूर कर दूँगा, इसमें संशय नहीं है”
ହେ ମହାବାହୋ! ତୁମର ଯୁଦ୍ଧଜନିତ ଦର୍ପ ଓ ଯୁଦ୍ଧକାମନାକୁ ଯେ ନାଶ କରିପାରିବ—ସେ ମୁଁ, ଶତ୍ରୁନଗରଜୟୀ ଭୀଷ୍ମ, ଏବେ ଜନ୍ମିଛି। ରାମ! ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମର ଗର୍ବକୁ ମୁଁ ଚୂର୍ଣ୍ଣ କରିଦେବି; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 65
भीष्म उवाच ततो मामब्रवीद् राम: प्रहसन्निव भारत । दिष्ट्या भीष्म मया सार्थ योद्धुमिच्छसि संगरे,भीष्मजी कहते हैं--भरतनन्दन! तब परशुरामजीने मुझसे हँसते हुए-से कहा --“भीष्म! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम रफक्षेत्रमें मेरे साथ युद्ध करना चाहते हो
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭାରତବଂଶଜ! ତାପରେ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମନେ ହସୁଥିବା ପରି ମୋତେ କହିଲେ—‘ଭୀଷ୍ମ! ସଂଗ୍ରାମରେ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ତୁମେ ଇଚ୍ଛା କରୁଛ—ଏହା ଭାଗ୍ୟର କଥା।’
Verse 66
अयं गच्छामि कौरव्य कुरुक्षेत्र त्वया सह । भाषितं ते करिष्यामि तत्रागच्छ परंतप,“कुरुनन्दन! यह देखो, मैं तुम्हारे साथ युद्धके लिये कुरक्षेत्रमें चलता हूँ। परंतप! वहीं आओ। मैं तुम्हारा कथन पूरा करूँगा। वहाँ तुम्हारी माता गंगा तुम्हें मेरे हाथसे मरकर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त्और कौओं, कंकों तथा गीधोंका भोजन बना हुआ देखेगी
ହେ କୌରବ୍ୟ! ଦେଖ, ମୁଁ ତୁମ ସହ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଯାଉଛି। ହେ ପରନ୍ତପ! ସେଠାକୁ ଆସ; ସେଠାରେ ମୁଁ ତୁମ ପ୍ରତି କହିଥିବା କଥା ପୂରଣ କରିବି।
Verse 67
तत्र त्वां निहतं माता मया शरशताचितम् | जाह्नवी पश्यतां भीष्म गृध्रकड़कबलाशनम्,“कुरुनन्दन! यह देखो, मैं तुम्हारे साथ युद्धके लिये कुरक्षेत्रमें चलता हूँ। परंतप! वहीं आओ। मैं तुम्हारा कथन पूरा करूँगा। वहाँ तुम्हारी माता गंगा तुम्हें मेरे हाथसे मरकर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त्और कौओं, कंकों तथा गीधोंका भोजन बना हुआ देखेगी
ସେଠାରେ ତୋର ମାତା ଜାହ୍ନବୀ (ଗଙ୍ଗା) ଦେଖିବେ—ହେ ଭୀଷ୍ମ—ମୋ ହାତରେ ତୁ ନିହତ, ଶତଶରେ ବିଦ୍ଧ ଦେହ, ଗୃଧ୍ର ଓ କଙ୍କମାନଙ୍କର ଆହାର ହୋଇ ପଡ଼ିଥିବାକୁ।
Verse 68
कृपणं त्वामभिप्रेक्ष्य सिद्धचारणसेविता । मया विनिहतं देवी रोदतामद्य पार्थिव,“राजन! तुम दीन हो। आज तुम्हें मेरे हाथसे मारा गया देख सिद्ध-चारणसेविता गंगादेवी रुदन करें
ହେ ରାଜନ, ତୁ ଦୟନୀୟ। ଆଜି ମୋ ହାତରେ ତୁ ନିହତ ହେବାକୁ ଦେଖି, ସିଦ୍ଧ-ଚାରଣମାନେ ସେବା କରୁଥିବା ଦେବୀ ଗଙ୍ଗା କାନ୍ଦିବେ।
Verse 69
अतदर्हा महाभागा भगीरथसुतानघा । या त्वामजीजनन्मन्दं युद्धकामुकमातुरम्,“यद्यपि वे महाभागा भगीरथपुत्री पापहीना गंगा यह दुःख देखनेके योग्य नहीं हैं, तथापि जिन्होंने तुम-जैसे युद्धकामी, आतुर एवं मूर्ख पुत्रको जन्म दिया है, उन्हें यह कष्ट भोगना ही पड़ेगा
ମହାଭାଗା, ପାପହୀନା, ଭଗୀରଥସୁତା ଗଙ୍ଗା ଏହି ଦୁଃଖ ଦେଖିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ; କିନ୍ତୁ ତୋ ପରି ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି, ଯୁଦ୍ଧକାମୁକ ଓ ଆତୁର ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଇଥିବାରୁ, ତାଙ୍କୁ ଏହି ବେଦନା ଭୋଗିବାକୁ ହେବ।
Verse 70
एहि गच्छ मया भीष्म युद्धकामुक दुर्मद । गृहाण सर्व कौरव्य रथादि भरतर्षभ,'युद्धकी इच्छा रखनेवाले मदोन्मत्त भीष्म! आओ, मेरे साथ चलो। भरतश्रेष्ठ कुरुनन्दन! रथ आदि सारी सामग्री साथ ले लो”
ଯୁଦ୍ଧକାମୁକ ଓ ଦୁର୍ମଦ ଭୀଷ୍ମ! ଆ, ମୋ ସହ ଚାଲ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ କୌରବ, ରଥ ଆଦି ସମସ୍ତ ସାମଗ୍ରୀ ନେଇ ଆସ।
Verse 71
इति ब्रुवाणं तमहं राम परपुरंजयम् | प्रणम्य शिरसा राममेवमस्त्वित्यथाब्रुवम्,शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले परशुरामजीको इस प्रकार कहते देख मैंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और “एवमस्तु” कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की
ଶତ୍ରୁନଗରଜୟୀ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଏପରି କହୁଥିବାକୁ ଦେଖି, ମୁଁ ଶିର ନମାଇ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କଲି ଏବଂ “ଏବମସ୍ତୁ” କହି ତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କଲି।
Verse 72
एवमुक्क्त्वा ययौ राम: कुरुक्षेत्रं युयुत्सया । प्रविश्य नगरं चाहं सत्यवत्यै न्न्यवेदयम्,ऐसा कहकर परशुरामजी युद्धकी इच्छासे कुरुक्षेत्रमें गये और मैंने नगरमें प्रवेश करके सत्यवतीसे यह सारा समाचार निवेदन किया
ଏପରି କହି ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛାରେ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଗଲେ। ତାପରେ ମୁଁ ନଗରକୁ ପ୍ରବେଶ କରି ସତ୍ୟବତୀଙ୍କୁ ଏ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ନିବେଦନ କଲି।
Verse 73
ततः कृतस्वस्त्ययनो मात्रा च प्रतिनन्दित: । द्विजातीन् वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते,यत्तुं सूतेन शिष्टेन बहुशो दृष्टकर्मणा । महातेजस्वी नरेश! उस समय स्वस्तिवाचन कराकर माता सत्यवतीने मेरा अभिनन्दन किया और मैं ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन करा उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद ले सुन्दर रजतमय रथपर आरूढ़ हुआ। उस रथमें श्वेत रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसमें सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री सुन्दर ढंगसे रखी गयी थी। उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी। रथके ऊपर व्याप्रचर्मका आवरण लगाया गया था। वह रथ बड़े-बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणोंसे सम्पन्न था। युद्धमें जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अभश्वशास्त्रके पण्डित सारथिद्वारा उस रथका संचालन और नियन्त्रण होता था
ତାପରେ ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନାଦି ମଙ୍ଗଳକ୍ରିୟା ସମ୍ପନ୍ନ ହେଲାପରେ ମାତା ମୋତେ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଇ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ। ପଛରେ ମୁଁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ‘ପୁଣ୍ୟାହ’ ଓ ‘ସ୍ୱସ୍ତି’ ଉଚ୍ଚାରଣ କରାଇ କଲ୍ୟାଣକାରୀ ଆଶୀର୍ବାଦ ଗ୍ରହଣ କଲି। ହେ ମହାଦ୍ୟୁତେ! ତା’ପରେ ଅନେକଥର କାର୍ଯ୍ୟରେ ପରୀକ୍ଷିତ, ଶିଷ୍ଟ ଓ ସୁଶିକ୍ଷିତ ସାରଥିଙ୍କ ସହିତ ମୁଁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲି।
Verse 74
रथमास्थाय रुचिरं राजतं पाण्ड्रैर्हयै: । सूपस्करं स्वधिष्ठानं वैयाघ्रपरिवारणम्
ତାପରେ ମୁଁ ପାଣ୍ଡୁରବର୍ଣ୍ଣ ଘୋଡ଼ା ଯୁକ୍ତ, ରୁଚିର ରଜତମୟ ରଥରେ ଆରୋହଣ କଲି—ଯାହା ଉତ୍ତମ ଉପକରଣରେ ସୁସଜ୍ଜିତ, ଦୃଢ଼ ଅଧିଷ୍ଠାନବାନ୍ ଏବଂ ବ୍ୟାଘ୍ରଚର୍ମ ଆବରଣରେ ସର୍ବତ୍ର ସୁରକ୍ଷିତ ଥିଲା।
Verse 75
उपपन्नं महाशस्त्रै: सर्वोपकरणान्वितम् | तत्कुलीनेन वीरेण हयशास्त्रविदा रणे
ସେ ରଥ ମହାଶସ୍ତ୍ରରେ ଯୁକ୍ତ ଓ ସମସ୍ତ ଯୁଦ୍ଧୋପକରଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିଲା; ଏବଂ ରଣରେ ସେହି କୁଳର ଏକ ବୀର—ହୟଶାସ୍ତ୍ରବିଦ୍—ତାହାକୁ ସଞ୍ଚାଳନ କରୁଥିଲା।
Verse 76
दंशित: पाण्डुरेणाहं कवचेन वपुष्मता
ମୁଁ ସଜ୍ଜ—ମୋ ବଳିଷ୍ଠ ଦେହକୁ ଆବୃତ କରୁଥିବା ପାଣ୍ଡୁରବର୍ଣ୍ଣ କବଚ ପିନ୍ଧି।
Verse 77
पाण्डुरं कार्मुकं गृह प्रायां भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! मैंने अपने शरीरपर श्वेतवर्णका कवच धारण करके श्वेत धनुष हाथमें लेकर यात्रा की ।। पाण्डुरेणातपत्रेण प्रियमाणेन मूर्थनि,नरेश्वर! उस समय मेरे मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था और मेरे दोनों ओर सफेद रंगके चँवर डुलाये जाते थे। मेरे वस्त्र, मेरी पगड़ी और मेरे समस्त आभूषण श्वेतवर्णके ही थे
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ଶ୍ୱେତବର୍ଣ୍ଣ କବଚ ପିନ୍ଧି, ହାତରେ ପାଣ୍ଡୁର (ଧବଳ) ଧନୁ ଧରି ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲି। ହେ ନରେଶ୍ୱର! ସେତେବେଳେ ମୋ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମନୋହର ଶ୍ୱେତ ଛତ୍ର ଧରାଯାଇଥିଲା, ଏବଂ ଦୁଇ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ଶ୍ୱେତ ଚାମର ଡୋଲାଯାଉଥିଲା। ମୋର ବସ୍ତ୍ର, ପାଗଡ଼ି ଓ ସମସ୍ତ ଆଭୂଷଣ ମଧ୍ୟ ଶ୍ୱେତବର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା।
Verse 78
पाण्ड्रैश्वापि व्यजनैर्वीज्यमानो नराधिप । शुक्लवासा: सितोष्णीष: सर्वशुक्लविभूषण:,नरेश्वर! उस समय मेरे मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था और मेरे दोनों ओर सफेद रंगके चँवर डुलाये जाते थे। मेरे वस्त्र, मेरी पगड़ी और मेरे समस्त आभूषण श्वेतवर्णके ही थे
ହେ ନରାଧିପ! ଦୁଇ ପାର୍ଶ୍ୱରୁ ଶ୍ୱେତ ଚାମର ଦ୍ୱାରା ମୋତେ ପଖା ଦିଆଯାଉଥିଲା। ମୁଁ ଶ୍ୱେତ ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧିଥିଲି, ଶ୍ୱେତ ପାଗଡ଼ି ବାନ୍ଧିଥିଲି, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶ୍ୱେତ ଆଭୂଷଣରେ ଭୂଷିତ ଥିଲି। ଏଭଳି ରାଜବୈଭବରେ ଦୀପ୍ତ, ଅଧିକାର ଓ ସମ୍ମାନର ଚିହ୍ନରେ ଚିହ୍ନିତ ହୋଇ ମୁଁ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲି।
Verse 79
स्तूयमानो जयाशीर्भिनिष्क्रम्य गजसाह्वयात् । कुरुक्षेत्र रणक्षेत्रमुपायां भरतर्षभ,विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ मेरी स्तुति की जा रही थी। भरतभूषण! उस अवस्थामें मैं हस्तिनापुरसे निकलकर कुरुक्षेत्रके समरांगणमें गया
ହେ ଭରତର୍ଷଭ! ବିଜୟସୂଚକ ଆଶୀର୍ବାଦ ସହିତ ମୋର ସ୍ତୁତି ହେଉଥିଲା। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ଗଜସାହ୍ୱୟ (ହସ୍ତିନାପୁର) ଠାରୁ ବାହାରି କୁରୁକ୍ଷେତ୍ର ନାମକ ରଣକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲି—ଏଭଳି ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧଭୂମିକୁ ଗଲି।
Verse 80
ते हयाश्नोदितास्तेन सूतेन परमाहवे । अवहन् मां भूशं राजन् मनोमारुतरंहस:,राजन! मेरे घोड़े मन और वायुके समान वेगशाली थे। सारथिके हाँकनेपर उन्होंने बात- की-बातमें मुझे उस महान् युद्धके स्थानपर पहुँचा दिया
ରାଜନ! ମୋର ସେ ଘୋଡ଼ାମାନେ ମନ ଓ ପବନ ପରି ବେଗଶାଳୀ ଥିଲେ। ସେଇ ମହାଯୁଦ୍ଧରେ ସାରଥି ହାଙ୍କିବା ସହିତ ସେମାନେ ମୋତେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୀଘ୍ର ବହନ କରି, କ୍ଷଣମାତ୍ରେ ସେ ମହାଯୁଦ୍ଧସ୍ଥଳକୁ ପହଞ୍ଚାଇଦେଲେ।
Verse 81
गत्वाहं तत् कुरुक्षेत्र स च राम: प्रतापवान् । युद्धाय सहसा राजन् पराक्रान्ती परस्परम्,राजन! मैं तथा प्रतापी परशुरामजी दोनों कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर युद्धके लिये सहसा एक- दूसरेको पराक्रम दिखानेके लिये उद्यत हो गये
ରାଜନ! ମୁଁ ସେ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ପହଞ୍ଚିଲି, ଏବଂ ପ୍ରତାପଶାଳୀ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ। ତେବେ ଆମେ ଦୁହେଁ ସହସା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲୁ—ପରସ୍ପରଙ୍କ ବିରୁଦ୍ଧରେ ନିଜ ନିଜ ପରାକ୍ରମ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିବାକୁ ଆତୁର।
Verse 82
ततः संदर्शने5तिष्ठ॑ं रामस्थातितपस्विन: । प्रगृह्ा शड्खप्रवरं तत: प्राधममुत्तमम्,तदनन्तर मैं अत्यन्त तपस्वी परशुरामजीकी दृष्टिके सामने खड़ा हुआ और अपने श्रेष्ठ शंखको हाथमें लेकर उसे जोर-जोरसे बजाने लगा
ତାପରେ ମୁଁ ପରମ ତପସ୍ବୀ ପରଶୁରାମଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଦାଁଡ଼ିଲି। ମୋର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶଙ୍ଖଟିକୁ ହାତରେ ଧରି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବେଗରେ ତାହା ବଜାଇଲି—କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ଯୁଦ୍ଧପାଇଁ ମୋର ଅଟୁଟ ସଙ୍କଳ୍ପ ପ୍ରକାଶ କରି।
Verse 83
ततत्तत्र द्विजा राज॑स्तापसाश्ष वनौकस: । अपश्यन्त रण दिव्यं देवा: सेन्द्रगणास्तदा,राजन्! उस समय वहाँ बहुत-से ब्राह्मण, वनवासी तपस्वी तथा इन्द्रसहित देवगण उस दिव्य युद्धको देखने लगे
ରାଜନ୍! ସେତେବେଳେ ସେଠାରେ ଅନେକ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବନବାସୀ ତପସ୍ବୀ ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରସହିତ ଦେବଗଣ ସେଇ ଦିବ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଦେଖିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 84
ततो दिव्यानि माल्यानि प्रादुरासंस्ततस्ततः । वादित्राणि च दिव्यानि मेघवृन्दानि चैव ह,तदनन्तर वहाँ इधर-उधरसे दिव्य मालाएँ प्रकट होने लगीं और दिव्य वाद्य बज उठे। साथ ही सब ओर मेघोंकी घटाएँ छा गयीं
ତାପରେ ନାନା ଦିଗରୁ ଦିବ୍ୟ ମାଳାମାନେ ପ୍ରକଟ ହେବାକୁ ଲାଗିଲେ, ଏବଂ ଦିବ୍ୟ ବାଦ୍ୟଧ୍ୱନି ଉଠିଲା। ସହିତେ ସବୁ ଦିଗରେ ମେଘପୁଞ୍ଜ ଆକାଶକୁ ଢାକିଦେଲା।
Verse 85
ततस्ते तापसा: सर्वे भार्गवस्थानुयायिन: । प्रेक्षका: समपद्यन्त परिवार्य रणाजिरम्,तदनन्तर परशुरामजीके साथ आये हुए वे सब तपस्वी उस संग्रामभूमिको सब ओरसे घेरकर दर्शक बन गये
ତାପରେ ଭାର୍ଗବ ପରଶୁରାମଙ୍କ ଅନୁୟାୟୀ ସେ ସମସ୍ତ ତପସ୍ବୀ ଯୁଦ୍ଧଭୂମିକୁ ସବୁଦିଗରୁ ଘେରି ପ୍ରେକ୍ଷକ ହୋଇ ବସିଲେ।
Verse 86
ततो मामब्रवीद् देवी सर्वभूतहितैषिणी । माता स्वरूपिणी राजन् किमिदं ते चिकीर्षितम्,राजन! उस समय समस्त प्राणियोंका हित चाहनेवाली मेरी माता गंगादेवी स्वरूपत: प्रकट होकर बोलीं--'बेटा! यह तू क्या करना चाहता है?
ରାଜନ୍! ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ହିତ ଚାହୁଁଥିବା ମୋର ମାତା ଗଙ୍ଗାଦେବୀ ନିଜ ସ୍ୱରୂପରେ ପ୍ରକଟ ହୋଇ ମୋତେ କହିଲେ—“ବତ୍ସ! ତୁ ଏହା କ’ଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛୁ?”
Verse 87
गत्वाहं जामदग्न्यं तु प्रयाचिष्ये कुरूद्वह । भीष्मेण सह मा योत्सी: शिष्येणेति पुन: पुन:,“कुरुश्रेष्ठ! मैं स्वयं जाकर जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे बारंबार याचना करूँगी कि आप अपने शिष्य भीष्मके साथ युद्ध न कीजिये
କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ନିଜେ ଯାଇ ଜମଦଗ୍ନିନନ୍ଦନ ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ପ୍ରାର୍ଥନା କରିବି—‘ଆପଣଙ୍କ ନିଜ ଶିଷ୍ୟ ଭୀଷ୍ମ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ ନାହିଁ।’
Verse 88
मा मैवं पुत्र निर्बन्ध॑ कुरु विप्रेण पार्थिव । जामदग्न्येन समरे योद्धुमित्येव भर्त्सयत्
ପୁତ୍ର! ହେ ରାଜନ, ଏଭଳି ହଠ କରନି; ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ସେ ଜମଦଗ୍ନ୍ୟ—‘ସମରରେ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କର’ ବୋଲି ଉପହାସ କରି ଉତ୍ତେଜିତ କରନି।
Verse 89
“बेटा! तू ऐसा आग्रह न कर। राजन! विप्रवर जमदग्निनन्दन परशुरामके साथ समरभूमिमें युद्ध करनेका हठ अच्छा नहीं है।' ऐसा कहकर वे डाँट बताने लगीं ।। किन्न वै क्षत्रियहणो हरतुल्यपराक्रम: । विदित: पुत्र रामस्ते यतस्तं योद्धुमिच्छसि,अन्तमें वे फिर बोलीं--“बेटा! क्षत्रियहन्ता परशुराम महादेवजीके समान पराक्रमी हैं। क्या तू उन्हें नहीं जानता, जो उनके साथ युद्ध करना चाहता है?”
“ପୁତ୍ର! ଏଭଳି ଜିଦ୍ କରନି। ହେ ରାଜନ, ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜମଦଗ୍ନିନନ୍ଦନ ପରଶୁରାମଙ୍କ ସହ ରଣଭୂମିରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ହଠ ଧରିବା ଶ୍ରେୟସ୍କର ନୁହେଁ।” ଏହା କହି ସେ କଠୋର ଭାବେ ତାକୁ ତିରସ୍କାର କଲେ। ପୁଣି କହିଲେ—“ପୁତ୍ର! କ୍ଷତ୍ରିୟହନ୍ତା ରାମ (ପରଶୁରାମ) ହର (ଶିବ) ସମ ପରାକ୍ରମୀ—ତୁ ତାଙ୍କୁ ଜାଣୁନାହିଁ କି, ଯେ ତାଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛୁ?”
Verse 90
ततो>5हमन्रुवं देवीमभिवाद्य कृताञ्जलि: । सर्व तद् भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वयंवरे,तब मैंने हाथ जोड़कर गंगादेवीको प्रणाम किया और स्वयंवरमें जैसी घटना घटित हुई थी, वह सब वृत्तान्त उनसे आद्योपान्त कह सुनाया
ତାପରେ ମୁଁ କୃତାଞ୍ଜଳି ହୋଇ ଦେବୀ ଗଙ୍ଗାଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରି, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସ୍ୱୟଂବରରେ ଯେପରି ଘଟିଥିଲା ସେ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ତାଙ୍କୁ କହିଲି।
Verse 91
यथा च रामो राजेन्द्र मया पूर्व प्रचोदित: । काशिराजसुतायाश्च यथा कर्म पुरातनम्,राजेन्द्र! मैंने परशुरामजीसे पहले जो-जो बातें कही थीं तथा काशिराजकी कन्याकी जो पुरानी करतूतें थीं, उन सबको बता दिया
ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ପୂର୍ବେ ମୁଁ ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କୁ କିପରି ପ୍ରେରିତ କରିଥିଲି, ଏବଂ କାଶୀରାଜଙ୍କ କନ୍ୟାର ପୁରାତନ କର୍ମ ଯେପରି ଥିଲା—ସେ ସବୁ ମୁଁ କହିଦେଲି।
Verse 92
ततः सा राममभ्येत्य जननी मे महानदी । मदर्थ तमृषिं वीक्ष्य क्षमयामास भार्गवम्
ତାପରେ ମୋର ଜନନୀ ମହାନଦୀ ରାମଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ। ମୋର କାରଣରୁ ସେଠାରେ ଥିବା ଭାର୍ଗବ ଋଷିଙ୍କୁ ଦେଖି ସେ ବିନୟପୂର୍ବକ କ୍ଷମା ପ୍ରାର୍ଥନା କଲେ।
Verse 93
तत्पश्चात् मेरी जन्मदायिनी माता गंगाने भूगुनन्दन परशुरामजीके पास जाकर मेरे लिये उनसे क्षमा माँगी ।। भीष्मेण सह मा योत्सी: शिष्येणेति वचो<ब्रवीत् । स च तामाह याचन्तीं भीष्ममेव निवर्तय । न च मे कुरुते काममित्यहं तमुपागमम्,साथ ही यह भी कहा कि भीष्म आपका शिष्य है; अत: उसके साथ आप युद्ध न कीजिये। तब याचना करनेवाली मेरी मातासे परशुरामजीने कहा--“तुम पहले भीष्मको ही युद्धसे निवृत्त करो। वह मेरे इच्छानुसार कार्य नहीं कर रहा है; इसीलिये मैंने उसपर चढ़ाई की है'
ତାପରେ ମୋର ଜନ୍ମଦାୟିନୀ ମାତା ଗଙ୍ଗା ଭୃଗୁନନ୍ଦନ ପରଶୁରାମଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ମୋ ପାଇଁ କ୍ଷମା ମାଗିଲେ। ସେ କହିଲେ—“ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ; ସେ ଆପଣଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ।” କିନ୍ତୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଥିବା ମାତାଙ୍କୁ ପରଶୁରାମ କହିଲେ—“ପ୍ରଥମେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧରୁ ନିବୃତ୍ତ କର। ସେ ମୋ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ କାମ କରୁନାହିଁ; ତେଣୁ ମୁଁ ତାଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଅଗ୍ରସର ହୋଇଛି।”
Verse 94
वैशम्पायन उवाच ततो गज्जा सुतस्नेहाद भीष्म॑ पुनरुपागमत् | नचास्याश्चाकरोद् वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षण:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तब गंगादेवी पुत्रस्नेहवश पुनः भीष्मके पास आयीं। उस समय भीष्मके नेत्रोंमें क्रोध व्याप्त हो रहा था; अतः उन्होंने भी माताका कहना नहीं माना
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ପୁତ୍ରସ୍ନେହରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଗଙ୍ଗାଦେବୀ ପୁଣି ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ। କିନ୍ତୁ କ୍ରୋଧରେ ବ୍ୟାକୁଳ ଦୃଷ୍ଟି ଥିବା ଭୀଷ୍ମ ତାଙ୍କ କଥା ମାନିଲେ ନାହିଁ।
Verse 95
अथादृश्यत धर्मात्मा भुगुश्रेष्ठी महातपा: । आह्वयामास च तदा युद्धाय द्विजसत्तम:,इतनेमें ही भूगुकुलतिलक ब्राह्णशिरोमणि महातपस्वी धर्मात्मा परशुरामजी दिखायी दिये। उन्होंने सामने आकर युद्धके लिये भीष्मको ललकारा
ତେବେ ଧର୍ମାତ୍ମା, ମହାତପସ୍ବୀ, ଭୃଗୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମ ପରଶୁରାମ ପ୍ରକଟ ହେଲେ ଏବଂ ସେହିକ୍ଷଣେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ କଲେ।
Verse 177
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अम्बा-परशुराम- संवादविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନରେ ଅମ୍ବା–ପରଶୁରାମ ସଂବାଦବିଷୟକ ଏକଶ ସତହତ୍ତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 178
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परशुरामभीष्मयो: कुरुक्षेत्रावतरणे अष्टसप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ ପରଶୁରାମ ଓ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରାବତରଣ ବର୍ଣ୍ଣନାକରୁଥିବା ଏକଶେ ଅଠତ୍ତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଏହି ଉପସଂହାର ଏହି ପ୍ରସଙ୍ଗକୁ ଧର୍ମଗମ୍ଭୀର ସଂଘର୍ଷର ରୂପେ ସ୍ଥାପିତ କରେ—ପୂଜ୍ୟ ଗୁରୁ-ଯୋଦ୍ଧା ପରଶୁରାମ ଓ ଧର୍ମପ୍ରତିଜ୍ଞ ରକ୍ଷକ ଭୀଷ୍ମ ପବିତ୍ର କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରରେ ସମ୍ମୁଖୀନ ହୁଅନ୍ତି; ଯାହା ପରେ ମହାଯୁଦ୍ଧର ରଙ୍ଗଭୂମି ହେବ।
Verse 356
हनिष्यामि सहामात्यं॑ त्वामद्येति पुन: पुन: । तब यह सुनकर परशुरामजीके नेत्रोंमें क्रोधका भाव व्याप्त हो गया और वे मुझसे इस प्रकार बोले--“नरश्रेष्ठ! तुम यदि मेरी यह बात नहीं मानोगे तो आज मैं मन्त्रियोंसहित तुम्हें मार डालूगा।” इस बातको उन्होंने बार-बार दुहराया
ଏହା ଶୁଣି ପରଶୁରାମଙ୍କ ନୟନରେ କ୍ରୋଧ ଛାଇଗଲା। ସେ ମୋତେ ପୁନଃପୁନଃ କହିଲେ—“ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମେ ଯଦି ମୋ କଥା ନମାନ, ତେବେ ଆଜି ମୁଁ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ତୁମକୁ ବଧ କରିଦେବି।” ଏହି କଥା ସେ ବାରମ୍ବାର ଦୋହରାଇଲେ।
Verse 756
यत्तुं सूतेन शिष्टेन बहुशो दृष्टकर्मणा । महातेजस्वी नरेश! उस समय स्वस्तिवाचन कराकर माता सत्यवतीने मेरा अभिनन्दन किया और मैं ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन करा उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद ले सुन्दर रजतमय रथपर आरूढ़ हुआ। उस रथमें श्वेत रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसमें सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री सुन्दर ढंगसे रखी गयी थी। उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी। रथके ऊपर व्याप्रचर्मका आवरण लगाया गया था। वह रथ बड़े-बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणोंसे सम्पन्न था। युद्धमें जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अभश्वशास्त्रके पण्डित सारथिद्वारा उस रथका संचालन और नियन्त्रण होता था
ମହାତେଜସ୍ୱୀ ନରେଶ! ସେ ସମୟରେ ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇ ମାତା ସତ୍ୟବତୀ ମୋତେ ଅଭିନନ୍ଦନ କରି ସମ୍ମାନିତ କଲେ। ପରେ ମୁଁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୁଣ୍ୟାହବାଚନ କରାଇ, ସେମାନଙ୍କର କଲ୍ୟାଣକାରୀ ଆଶୀର୍ବାଦ ଗ୍ରହଣ କରି, ସୁନ୍ଦର ରଜତମୟ ରଥରେ ଆରୋହଣ କଲି। ସେ ରଥରେ ଶ୍ୱେତବର୍ଣ୍ଣ ଅଶ୍ୱ ଯୋଡ଼ାଯାଇଥିଲେ ଏବଂ ଆବଶ୍ୟକ ସମସ୍ତ ସାମଗ୍ରୀ ସୁନ୍ଦର ଭାବେ ସଜାଯାଇଥିଲା। ତାହାର ଆସନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମନୋହର ଥିଲା; ଉପରେ ବ୍ୟାଘ୍ରଚର୍ମର ଆବରଣ ପତିଥିଲା। ବଡ଼ ବଡ଼ ଶସ୍ତ୍ର ଓ ସମସ୍ତ ଉପକରଣରେ ସେ ରଥ ସମ୍ପନ୍ନ ଥିଲା। ଯୁଦ୍ଧରେ ଯାହାର କାର୍ଯ୍ୟକୌଶଳ ଅନେକଥର ଦେଖାଯାଇଛି—ଏମିତି ଶିଷ୍ଟ, ସୁଶିକ୍ଷିତ, କୁଳୀନ, ବୀର ଏବଂ ଅଶ୍ୱଶାସ୍ତ୍ର-ନିପୁଣ ସାରଥି ତାହାକୁ ଚାଳନା ଓ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରୁଥିଲେ।
Paraśurāma must reconcile two binding norms: his vow not to wield weapons except under Brahmin injunction and the obligation not to abandon a supplicant seeking redress against Bhīṣma.
Speech-acts (promises, vows, and authoritative counsel) function as enforceable moral structures; conciliation is preferred, but dharma may require escalation when refuge and truth-claims are at stake.
No explicit phalaśruti appears here; the chapter’s meta-function is juridical and preparatory—documenting the ethical premises and procedural steps that authorize the forthcoming confrontation.