
राजसूयविचारः — Deliberation on the Rajasuya and the Summoning of Kṛṣṇa
Upa-parva: Rājasūyārambha (Initiation of the Rajasuya Deliberations)
Vaiśaṃpāyana recounts Yudhiṣṭhira’s reflective response after hearing about the greatness of sacrificial kings and the exemplary radiance of Hariścandra. Yudhiṣṭhira honors the assembly, repeatedly weighs the Rajasuya, and frames the project in terms of dharma and universal welfare rather than mere desire. He convenes ministers and brothers; they affirm his eligibility for imperial rites, describe the Rajasuya’s royal attributes (including the ideal of samrāṭ-hood), and urge commitment. Yudhiṣṭhira nevertheless re-evaluates capacity, timing, and expenditure, insisting that a yajña should not become self-harm through mismanaged means. Seeking certainty, he turns to Kṛṣṇa as the highest authority for counsel, dispatches an envoy to Dvārakā, and receives Kṛṣṇa at Indraprastha with familial honor. After Kṛṣṇa’s rest and reception, Yudhiṣṭhira states the purpose: he requests an unvarnished judgment, noting that some advisors conceal faults out of affection or speak pleasingly for advantage, whereas Kṛṣṇa should speak beyond kāma and krodha with accurate assessment of what is most fitting.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न पर देवर्षि नारद दिव्य सभाओं का वृत्तांत छेड़ते हैं—ब्रह्मपुर की नित्यता और लोक-लोकांतर की राजसभा-परंपरा का संकेत देकर। → नारद एक-एक कर वरुण, कुबेर और इन्द्र की सभाओं का वर्णन करते हैं—कहाँ नाग-दैत्य-सरिताएँ, कहाँ यक्ष-राक्षस-गन्धर्व-अप्सराएँ, और कहाँ देव-ऋषि-गन्धर्वों की दिव्य उपस्थिति। इन सभाओं की समृद्धि और अनुशासन सुनकर युधिष्ठिर के मन में ‘राजसूय’ की आकांक्षा और उसकी योग्यता का प्रश्न तीव्र होता जाता है। → नारद युधिष्ठिर को राजसूय करने वाले अन्य नरेशों की इन्द्र सहित आनंद-सभा का स्मरण कराते हैं और पाण्डु द्वारा हरिश्चन्द्र की श्री-सम्पदा देखकर विस्मित होने का प्रसंग जोड़ते हैं—मानो कह रहे हों कि राजसूय की कीर्ति मनुष्य-लोक से ऊपर तक गूँजती है। → नारद उपदेश देते हैं—धन से द्विजों को तृप्त करो, यश बढ़ाओ, और जो पूछा था उसका विस्तार से उत्तर दे दिया; फिर दाशार्ह-नगरी (द्वारका) की ओर प्रस्थान करते हैं। → नारद के जाते ही युधिष्ठिर भाइयों सहित ‘राजसूय—क्रतुश्रेष्ठ’ पर गहन विचार में डूब जाते हैं—अब यह संकल्प किस मार्ग से सिद्ध होगा?
Verse 1
अपड-#-#रू- - 'एतत् सत्य ब्रह्मपुरम” इस श्रुतिसे भी उसकी नित्यता ही सूचित होती है। ३. आयुर्वेद, धर्नुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र--ये चार उपवेद माने गये हैं। २. अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रा, नाद, बिन्दु और शक्ति--ये प्रणवके सात प्रकार हैं अथवा संस्कृत, प्राकृत, पैशाची, अपभ्रंश, ललित, मागध और गद्य--ये वाणीके सात प्रकार जानने चाहिये। द्वादशो<ड् ध्याय: राजा हरिश्रन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश युधिछ्िर उवाच प्रायशो राजलोकस्ते कथितो वदतां वर । वैवस्वतसभायां तु यथा वदसि मे प्रभो,युधिष्ठिर बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! जैसा आपने मुझसे वर्णन किया है, उसके अनुसार सूर्यपुत्र यमकी सभामें ही अधिकांश राजालोगोंकी स्थिति बतायी गयी है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବକ୍ତାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପ୍ରଭୁ! ଆପଣ ଯେପରି ମୋତେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଛନ୍ତି, ସେହିପରି ଅଧିକାଂଶ ରାଜାଙ୍କର ଅବସ୍ଥା ଓ ଗତି ପ୍ରଧାନତଃ ବୈବସ୍ୱତ (ଯମ)ଙ୍କ ସଭାରେ ହିଁ କଥିତ ହୋଇଛି; ହେ ନାଥ, ଆପଣ ମୋତେ ଏଭଳି ହିଁ ବୁଝାଉଛନ୍ତି।
Verse 2
वरुणस्य सभायां तु नागास्ते कथिता विभो । देत्येन्द्राश्रनापि भूयिष्ठा: सरित: सागरास्तथा,प्रभो! वरुणकी सभामें तो अधिकांश नाग, दैत्येन्द्र, सरिताएँ और समुद्र ही बताये गये हैं
ବିଭୋ! ବରୁଣଙ୍କ ସଭାରେ ପ୍ରଧାନତଃ ଅନେକ ନାଗ ଥିବା କଥା କହାଯାଇଛି; ସେହିପରି ଦାନବେନ୍ଦ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ, ଏବଂ ପ୍ରଚୁର ନଦୀ ଓ ସମୁଦ୍ର ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ କଥିତ, ପ୍ରଭୋ।
Verse 3
तथा धनपतेर्यक्षा गुह्॒का राक्षसास्तथा । गन्धर्वाप्सरसश्वैव भगवांश्व॒ वृषध्वज:,इसी प्रकार धनाध्यक्ष कुबेरकी सभामें यक्ष, गुह्मक, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा तथा भगवान् शंकरकी उपस्थितिका वर्णन हुआ है
ସେହିପରି ଧନପତି (କୁବେର)ଙ୍କ ସଭାରେ ଯକ୍ଷ, ଗୁହ୍ୟକ ଓ ରାକ୍ଷସ; ଏବଂ ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅପ୍ସରାମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ; ସହିତେ ଭଗବାନ୍ ବୃଷଧ୍ୱଜ (ଶିବ) ସ୍ୱୟଂ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।
Verse 4
पितामहसभायां तु कथितास्ते महर्षय: । सर्वे देवनिकायाश्ष सर्वशास्त्राणि चैव ह,ब्रह्माजीकी सभामें आपने महर्षियों, सम्पूर्ण देवगणों तथा समस्त शास्त्रोंकी स्थिति बतायी है
ପିତାମହ (ବ୍ରହ୍ମା)ଙ୍କ ସଭାରେ ଆପଣ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଛନ୍ତି; ତଥା ସମସ୍ତ ଦେବଗଣ ଓ ସମସ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ର ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଅବସ୍ଥିତ ବୋଲି କହିଛନ୍ତି।
Verse 5
शक्रस्य तु सभायां तु देवा: संकीर्तिता मुने । उद्देशतश्न गन्धर्वा विविधाक्ष महर्षय:,परंतु मुने! इन्द्रकी सभामें आपने अधिकांश देवताओंकी ही उपस्थितिका वर्णन किया है और थोड़े-से विभिन्न गधर्वों एवं महर्षियोंकी भी स्थिति बतायी है
ମୁନେ! ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ସଭାରେ ଆପଣ ପ୍ରଧାନତଃ ଦେବମାନଙ୍କୁ ହିଁ ସଂକୀର୍ତ୍ତନ କରିଛନ୍ତି; ଏବଂ ସଂକ୍ଷେପରେ କିଛି ବିଭିନ୍ନ ରୂପଧାରୀ ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ କିଛି ମହର୍ଷିଙ୍କ ଉଲ୍ଲେଖ ମଧ୍ୟ କରିଛନ୍ତି।
Verse 6
एक एव तु राजर्षिहिरिश्वन्द्रो महामुने । कथितस्ते सभायां वै देवेन्द्रस्य महात्मन:,महामुने! महात्मा देवराज इन्द्रकी सभामें आपने राजर्षियोंमेंसे एकमात्र हरिश्वन्द्रका ही नाम लिया है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ମହାମୁନି! ମହାତ୍ମା ଦେବେନ୍ଦ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ସଭାର ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବାବେଳେ ଆପଣ ରାଜର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେବଳ ଜଣେ—ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର—ଙ୍କ ନାମ ନେଲେ। ରାଜର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତାଙ୍କର ନାମ ମାତ୍ର କାହିଁକି ଉଲ୍ଲେଖ ହେଲା?
Verse 7
कि कर्म तेनाचरितं तपो वा नियतव्रत । येनासौ सह शक्रेण स्पर्द्धते सुमहायशा:,नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! उन्होंने कौन-सा कर्म अथवा कौन-सी तपस्या की है, जिससे वे महान् यशस्वी होकर देवराज इन्द्रसे स्पर्धा कर रहे हैं
ହେ ନିୟତବ୍ରତ ମହାମୁନି! ସେ କେଉଁ କର୍ମ କଲେ କିମ୍ବା କେଉଁ ତପସ୍ୟା କଲେ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ସେ ମହାୟଶସ୍ବୀ ହୋଇ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସହିତ ମଧ୍ୟ ସ୍ପର୍ଧା କରୁଛନ୍ତି?
Verse 8
पितृलोकगतकश्चैव त्वया विप्र पिता मम । दृष्ट: पाण्डुर्महा भाग: कथं वापि समागत:ः,विप्रवर! आपने पितृलोकमें जाकर मेरे पिता महाभाग पाण्डुको भी देखा था, किस प्रकार वे आपसे मिले थे? भगवन्! उन्होंने आपसे क्या कहा? यह मुझे बताइये। सुव्रत! आपसे यह सब कुछ सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है
ହେ ବିପ୍ରବର! ଆପଣ ପିତୃଲୋକକୁ ଯାଇଥିଲେ; ସେଠାରେ ମୋର ମହାଭାଗ ପିତା ପାଣ୍ଡୁଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଥିଲେ। ସେ କିପରି ଆପଣଙ୍କ ସହିତ ମିଶିଲେ? ଏବଂ ସେ ଆପଣଙ୍କୁ କ’ଣ କହିଲେ? ଦୟାକରି ମୋତେ କହନ୍ତୁ। ଭଗବନ୍! ଆପଣଙ୍କ ମୁଖରୁ ଏ ସବୁ ଶୁଣିବାକୁ ମୋ ମନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍କଣ୍ଠିତ।
Verse 9
किमुक्तवांश्व॒ भगवंस्तन्ममाचक्ष्व सुव्रत । त्वत्त: श्रोतुं सर्वमिदं परं कौतूहलं हि मे,विप्रवर! आपने पितृलोकमें जाकर मेरे पिता महाभाग पाण्डुको भी देखा था, किस प्रकार वे आपसे मिले थे? भगवन्! उन्होंने आपसे क्या कहा? यह मुझे बताइये। सुव्रत! आपसे यह सब कुछ सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है
ହେ ଭଗବନ୍, ସୁବ୍ରତ! ସେ ଯାହା କହିଥିଲେ, ତାହା ମୋତେ କହନ୍ତୁ। ଆପଣଙ୍କଠାରୁ ଏ ସବୁ ଶୁଣିବାକୁ ମୋର ଅତ୍ୟନ୍ତ କୌତୂହଳ ଜାଗିଛି। ଆପଣ ପିତୃଲୋକକୁ ଯାଇଥିବାବେଳେ ମୋର ମହାଭାଗ ପିତା ପାଣ୍ଡୁ କିପରି ଆପଣଙ୍କ ସହିତ ମିଶିଲେ? ଏବଂ ସେ ଆପଣଙ୍କୁ କ’ଣ କହିଲେ? ଦୟାକରି ବର୍ଣ୍ଣନା କରନ୍ତୁ।
Verse 10
नारद उवाच यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र हरिश्नन्द्रं प्रति प्रभो । तत् ते5हं सम्प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य धीमत:,नारदजीने कहा--शक्तिशाली राजेन्द्र! तुमने जो राजर्षि हरिश्वन्द्रके विषयमें मुझसे पूछा है, उसके उत्तरमें मैं उन बुद्धिमान् नरेशका माहात्म्य बता रहा हूँ, सुनो
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପରାକ୍ରମୀ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ରାଜର୍ଷି ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ବିଷୟରେ ତୁମେ ଯାହା ପଚାରିଛ, ତାହାର ଉତ୍ତର ମୁଁ ତୁମକୁ କହୁଛି। ଏବେ ସେ ଧୀମାନ୍ ନରେଶଙ୍କ ମାହାତ୍ମ୍ୟ ମୁଁ ତୁମକୁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି—ଶୁଣ।
Verse 11
(इक्ष्वाकूणां कुले जातस्त्रिशड्कुर्नाम पार्थिव: । अयोध्याधिपतिर्वीरो विश्वामित्रेण संस्थित: ।। तस्य सत्यवती नाम पत्नी केकयवंशजा । तस्यां गर्भ: समभवद् धर्मेण कुरुनन्दन ।। सा च काले महाभागा जन्ममासं प्रविश्य वै । कुमारं जनयामास हरिश्नन्द्रमकल्मषम् ।। स वै राजा हरिश्रन्द्रस्त्रशेडकव इति स्मृतः ।) इक्ष्वाकुकुलमें त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वीर त्रिशंकु अयोध्याके स्वामी थे और वहाँ विश्वामित्र मुनिके साथ रहा करते थे। उनकी पत्नीका नाम सत्यवती था, वह केकय-कुलमें उत्पन्न हुई थी। कुरुनन्दन! रानी सत्यवतीके धर्मानुकूल गर्भ रहा। फिर समयानुसार जन्ममास प्राप्त होनेपर महाभागा रानीने एक निष्पाप पुत्रको जन्म दिया, उसका नाम हुआ हरिश्वन्द्र। वे त्रिशंकुकुमार ही लोकविख्यात राजा हरिश्न्द्र कहे गये हैं। स राजा बलवानासीतू सम्राट् सर्वमहीक्षिताम् । तस्य सर्वे महीपाला: शासनावनता: स्थिता:,राजा हरिश्वन्द्र बड़े बलवान् और समस्त भूपालोंके सम्राट् थे। भूमण्डलके सभी नरेश उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सिर झुकाये खड़े रहते थे
ନାରଦ କହିଲେ—ଇକ୍ଷ୍ୱାକୁ ବଂଶରେ ତ୍ରିଶଙ୍କୁ ନାମକ ଜଣେ ରାଜା ଜନ୍ମ ନେଲେ। ସେ ଅଯୋଧ୍ୟାର ବୀର ଅଧିପତି ଥିଲେ ଏବଂ ଋଷି ବିଶ୍ୱାମିତ୍ରଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟରେ ବସବାସ କରୁଥିଲେ। ତାଙ୍କର ପତ୍ନୀ ସତ୍ୟବତୀ, କେକୟ ବଂଶଜା। ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ, ଧର୍ମାନୁସାରେ ସେ ଗର୍ଭଧାରଣ କଲେ। ସମୟ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ପ୍ରସବମାସ ଆସିଲାବେଳେ ସେ ମହାଭାଗ୍ୟବତୀ ରାଣୀ ନିଷ୍କଳଙ୍କ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ—ତାହାର ନାମ ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର। ତ୍ରିଶଙ୍କୁଙ୍କ ପୁତ୍ର ହେବାରୁ ସେ ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ‘ତ୍ରୈଶଙ୍କବ’ ଭାବେ ସ୍ମରଣୀୟ। ସେ ମହାବଳୀ ଥିଲେ, ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀର ରାଜମାନଙ୍କ ଉପରେ ସମ୍ରାଟ; ସମସ୍ତ ଭୂପାଳ ତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ମସ୍ତକ ନମାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ।
Verse 12
तेनैकं रथमास्थाय जैत्रं हेमविभूषितम् । शस्त्रप्रतापेन जिता द्वीपा: सप्त जनेश्वर,जनेश्वर! उन्होंने एकमात्र स्वर्णविभूषित जैत्र नामक रथपर चढ़कर अपने श्त्रोंके प्रतापसे सातों द्वीपोंपर विजय प्राप्त कर ली थी इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यान पर्वणि पाण्डुसंदेशक थने द्वादशोड्ध्याय:
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଜନେଶ୍ୱର, ସେ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣବିଭୂଷିତ ‘ଜୈତ୍ର’ ନାମକ ଏକମାତ୍ର ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି, ନିଜ ଶସ୍ତ୍ର-ପ୍ରତାପରେ ସପ୍ତଦ୍ୱୀପ ଜୟ କଲେ।
Verse 13
स निर्जित्य महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् | आज हार महाराज राजसूयं महाक्रतुम्,महाराज! पर्वतों और वनोंसहित इस सारी पृथ्वीको जीतकर राजा हरिश्वन्द्रने राजसूय नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ, ପର୍ବତ, ବନ ଓ ଅରଣ୍ୟପ୍ରଦେଶ ସହିତ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କରି, ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ‘ରାଜସୂୟ’ ନାମକ ମହାକ୍ରତୁ ଯଜ୍ଞ ଅନୁଷ୍ଠାନ କଲେ।
Verse 14
तस्य सर्वे महीपाला धनान्याजहुराज्ञया | द्विजानां परिवेष्टारस्तस्मिन् यज्ञे च ते5भवन्,राजाकी आज्ञासे समस्त भूपालोंने धन लाकर भेंट किये और उस यज्ञमें ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका कार्य किया
ନାରଦ କହିଲେ—ତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ସମସ୍ତ ଭୂପାଳ ଧନ-ସମ୍ପଦ ଭେଟ ଭାବେ ଆଣିଲେ; ଏବଂ ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ସେମାନେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ଭୋଜନ ପରିବେଷଣ କରୁଥିବା ପରିଚାରକ ମଧ୍ୟ ହେଲେ।
Verse 15
प्रादाच्च द्रविणं प्रीत्या याचकानां नरेश्वर: । यथोक्तवन्तस्ते तस्मिंस्तत: पठचगुणाधिकम्,महाराज हरिश्रन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस यज्ञमें याचकोंको, जितना उन्होंने माँगा, उससे पाँचगुना अधिक धन दान किया
ନାରଦ କହିଲେ—ନରେଶ୍ୱର ଆନନ୍ଦରେ ଯାଚକମାନଙ୍କୁ ଧନ ଦାନ କଲେ; ଏବଂ ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ସେମାନେ ଯେତେ ମାଗିଥିଲେ, ତାହାଠାରୁ ପାଞ୍ଚଗୁଣ ଅଧିକ ଦେଲେ।
Verse 16
अतर्पयच्च विविधैर्वसुभिन्राह्मणांस्तदा । प्रसर्पकाले सम्प्राप्ते नानादिग्भ्य:ः समागतान्,जब अग्निदेवके विसर्जजका अवसर आया, उस समय उन्होंने विभिन्न दिशाओंसे आये हुए ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके धन एवं रत्न देकर तृप्त किया
ତାପରେ ବିସର୍ଜନର ସମୟ ଆସିଲାବେଳେ, ସେ ନାନା ଦିଗରୁ ଆସିଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଧନ-ରତ୍ନ ଦେଇ ତୃପ୍ତ କଲେ।
Verse 17
भक्ष्यभोज्यैश्न विविधैर्यथाकामपुरस्कृतै: । रत्नौघतर्पितिस्तुष)ेदधिजैश्व समुदाह्मतम् । तेजस्वी च यशस्वी च नृपेभ्यो5भ्यधिको5भवत्,नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, मनोवांछित वस्तुओंका पुरस्कार तथा रत्नराशिका दान देकर तृप्त एवं संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंने राजा हरिश्वन्द्रको आशीर्वाद दिये। इसीलिये वे अन्य राजाओंकी अपेक्षा अधिक तेजस्वी और यशस्वी हुए हैं
ନାନା ପ୍ରକାର ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ, ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ପୁରସ୍କାର-ଦାନ, ଏବଂ ରତ୍ନରାଶି ସହ ଦଧି-କ୍ଷୀରାଦି ଅର୍ପଣ କରି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ତୃପ୍ତ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ କରାଗଲା। ସେହି ପ୍ରସନ୍ନ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଆଶୀର୍ବାଦରେ ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କଠାରୁ ଅଧିକ ତେଜସ୍ୱୀ ଓ ଯଶସ୍ୱୀ ହେଲେ।
Verse 18
एतस्मात् कारणाद राजन हरिश्नन्द्रो विराजते । तेभ्यो राजसहस्रेभ्यस्तद् विद्धि भरतर्षभ,राजन! भरतश्रेष्ठ। यही कारण है कि उन सहस्रों राजाओंकी अपेक्षा महाराज हरिश्रन्द्र अधिक सम्मानपूर्वक इन्द्रसभामें विराजमान होते हैं--इस बातको तुम अच्छी तरह जान लो
ହେ ରାଜନ, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି କାରଣରୁ ହିଁ ସେହି ସହସ୍ର ରାଜାମାନଙ୍କଠାରୁ ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ବିଶେଷ ମର୍ଯ୍ୟାଦାରେ ଦୀପ୍ତିମାନ—ଏହା ତୁମେ ଭଲଭାବେ ଜାଣ।
Verse 19
समाप्य च हरिश्वन्द्री महायज्ञं प्रतापवान् | अभिषिक्तश्न शुशुभे साम्राज्येन नराधिप,नरेश्वर! प्रतापी हरिश्वन्द्र उस महायज्ञको समाप्त करके जब सम्राट्के पदपर अभिषिक्त हुए, उस समय उनकी बड़ी शोभा हुई
ହେ ନରେଶ୍ୱର! ପ୍ରତାପୀ ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ସେହି ମହାଯଜ୍ଞ ସମାପ୍ତ କରି ସାମ୍ରାଜ୍ୟପଦରେ ଅଭିଷିକ୍ତ ହେଲେ, ସେତେବେଳେ ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭାୟମାନ ହେଲେ।
Verse 20
ये चान्ये च महीपाला राजसूयं महाक्रतुम् । यजसन्ते ते सहेन्द्रेण मोदन्ते भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! दूसरे भी जो भूपाल राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वे देवराज इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଅନ୍ୟ ଯେ ଭୂପାଳମାନେ ମଧ୍ୟ ରାଜସୂୟ ନାମକ ମହାକ୍ରତୁକୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସହ ରହି ଆନନ୍ଦ ଭୋଗ କରନ୍ତି।
Verse 21
ये चापि निधन प्राप्ता: संग्रामेष्वपलायिन: । ते तत् सदनमासाद्य मोदन्ते भरतर्षभ,भरतर्षभ! जो लोग संग्राममें पीठ न दिखाकर वहीं मृत्युका वरण कर लेते हैं, वे भी देवराज इन्द्रकी उस सभामें जाकर वहाँ आनन्दका उपभोग करते हैं
ଆଉ ଯେମାନେ ଯୁଦ୍ଧରେ ପିଠ ନ ଦେଇ—ପଳାଇ ନ ଯାଇ—ସେଠିଏ ମୃତ୍ୟୁକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ଦିବ୍ୟ ସଭାଗୃହକୁ ପହଞ୍ଚି ସେଠାରେ ଆନନ୍ଦ କରନ୍ତି, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 22
तपसा ये च तीव्रेण त्यजन्तीह कलेवरम् । ते तत् स्थानं समासाद्य श्रीमन्तो भान्ति नित्यश:,तथा जो लोग कठोर तपस्याके द्वारा यहाँ अपने शरीरका त्याग करते हैं, वे भी उस इन्द्रसभामें जाकर तेजस्वीरूप धारण करके सदा प्रकाशित होते रहते हैं
ଆଉ ଯେମାନେ ତୀବ୍ର ତପସ୍ୟାଦ୍ୱାରା ଏଠାରେ ଦେହ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ସ୍ଥାନକୁ ପହଞ୍ଚି ଶ୍ରୀମନ୍ତ ହୋଇ ନିତ୍ୟ ପ୍ରକାଶିତ ରହନ୍ତି।
Verse 23
पिता च त्वा55ह कौन्तेय पाण्डु: कौरवनन्दन । हरिश्वन्द्रे श्रियं दृष्टया नृपती जातविस्मय:,कौरवनन्दन कुन्तीकुमार! तुम्हारे पिता पाण्डुने राजा हरिश्वन्द्रकी सम्पत्ति देखकर अत्यन्त चकित हो तुमसे कहनेके लिये संदेश दिया है
ହେ କୌନ୍ତେୟ, କୌରବନନ୍ଦନ! ତୁମ ପିତା ରାଜା ପାଣ୍ଡୁ, ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଶ୍ରୀସମ୍ପତ୍ତି ଦେଖି ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ମିତ ହୋଇ ତୁମକୁ କହିବା ପାଇଁ ସନ୍ଦେଶ ପଠାଇଛନ୍ତି।
Verse 24
विज्ञाय मानुषं लोकमायान्तं मां नराधिप । प्रोवाच प्रणतो भूत्वा वदेथास्त्वं युधिषछ्तिरम्,नरेश्वर! मुझे मनुष्यलोकमें आता जान उन्होंने प्रणाम करके मुझसे कहा--*देवर्षे ! आप युधिष्ठिरसे यह कहियेगा--
ହେ ନରାଧିପ! ମୁଁ ମାନବଲୋକକୁ ଆସୁଛି ବୋଲି ଜାଣି ସେ ପ୍ରଣାମ କରି ମୋତେ କହିଲେ—“ଦେବର୍ଷେ! ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଏହା କହିଦିଅ।”
Verse 25
समर्थोडसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते स्थिता वशे । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहरस्वेति भारत,“भारत! तुम्हारे भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं, तुम सारी पृथ्वीको जीतनेमें समर्थ हो; अतः राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान करो
ହେ ଭାରତ! ତୁମେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଜୟ କରିବାରେ ସମର୍ଥ; ତୁମ ଭାଇମାନେ ତୁମ ଆଜ୍ଞାଧୀନ। ତେଣୁ କ୍ରତୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜସୂୟ ଯଜ୍ଞ ଅନୁଷ୍ଠାନ କର।
Verse 26
त्वयीष्टवति पुत्रे5हं हरिश्वन्द्रवदाशु वै । मोदिष्ये बहुला: शश्व॒त् समा: शक्रस्य संसदि,“तुम-जैसे पुत्रके द्वारा वह यज्ञ सम्पन्न होनेपर मैं भी शीघ्र ही राजा हरिश्वन्द्रकी भाँति बहुत वर्षोंतक इन्द्रभवनमें आनन्द भोगूँगा”
ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ପରି ପୁତ୍ର ଦ୍ୱାରା ସେଇ ଯଜ୍ଞ ଯଥାବିଧି ସମ୍ପନ୍ନ ହେଲେ, ମୁଁ ମଧ୍ୟ ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପରି ଶୀଘ୍ର ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସଭାରେ ବହୁ ବର୍ଷ ଧରି ନିତ୍ୟ ଆନନ୍ଦ ଭୋଗିବି।
Verse 27
एवं भवतु वक्ष्येडहं तव पुत्र नराधिपम् । भूलोकं यदि गच्छेयमिति पाण्डुमथाब्रुवम्,तब मैंने पाण्डुसे कहा--'एवमस्तु, यदि मैं भूलोकमें जाऊँगा तो आपके पुत्र राजा युधिष्ठिरसे कह दूँगा”
ନାରଦ କହିଲେ—“ଏବମସ୍ତୁ। ମୁଁ ଯଦି ଭୂଲୋକକୁ ଯାଏ, ତେବେ ତୁମ ପୁତ୍ର—ରାଜାଙ୍କୁ—ମୁଁ କହିଦେବି।” ଏହିପରି କହି ମୁଁ ପାଣ୍ଡୁଙ୍କୁ ସମ୍ମତି ଦେଲି ଏବଂ ସତ୍ୟ-ଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସନ୍ଦେଶ ପହଞ୍ଚାଇବାର ଦାୟିତ୍ୱ ନେଲି।
Verse 28
तस्य त्वं पुरुषव्याप्र संकल्पं कुरु पाण्डव | गन्तासि त्वं महेन्द्रस्य पूर्व: सह सलोकताम्,पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! तुम अपने पिताके संकल्पको पूरा करो। ऐसा करनेपर तुम पूर्वजोंके साथ देवराज इन्द्रके लोकमें जाओगे
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର, ହେ ପାଣ୍ଡବ! ତୁମ ପିତାଙ୍କ ସେଇ ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ପୂରଣ କର। ଏମିତି କଲେ, ହେ ପୁରୁଷସିଂହ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ, ତୁମେ ସବୁଠାରୁ ପ୍ରଥମେ ମହେନ୍ଦ୍ରଲୋକକୁ ଯାଇ ପିତୃମାନଙ୍କ ପରି ସେଇ ଲୋକପ୍ରାପ୍ତି ଲାଭ କରିବ।
Verse 29
बहुविध्नश्व नृपते क्रतुरेष स्मृतो महान् छिद्राण्यस्य तु वाउ्छन्ति यज्ञघ्ना ब्रह्म॒राक्षसा:,राजन! इस महान् यज्ञमें बहुत-से विध्न आनेकी सम्भावना रहती है; क्योंकि यज्ञनाशक ब्रह्मराक्षस इसका छिठद्र ढूँढ़ते रहते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଏହି ଯଜ୍ଞ ମହାନ୍ କ୍ରତୁ ବୋଲି ସ୍ମୃତ, କିନ୍ତୁ ଏଥିରେ ବହୁ ବିଘ୍ନ ଆସିବାର ସମ୍ଭାବନା ରହେ; କାରଣ ଯଜ୍ଞଘ୍ନ ବ୍ରହ୍ମରାକ୍ଷସମାନେ ଏହାର ଛିଦ୍ର ଖୋଜି ଚାଲନ୍ତି—ଅବସର ମିଳିଲେ ନଷ୍ଟ କରିବାକୁ।
Verse 30
युद्ध च क्षत्रशमनं पृथिवीक्षयकारणम् | किंचिदेव निमित्तं च भवत्यत्र क्षयावहम्,तथा इसका अनुष्ठान होनेपर कोई एक ऐसा निमित्त भी बन जाता है, जिससे पृथ्वीपर विनाशकारी युद्ध उपस्थित हो जाता है, जो क्षत्रियोंके संहार और भूमण्डलके विनाशका कारण होता है
ନାରଦ କହିଲେ—ଯୁଦ୍ଧ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ସଂହାର କରେ ଏବଂ ପୃଥିବୀର କ୍ଷୟର କାରଣ ହୁଏ। ଏପରି ପରିସ୍ଥିତିରେ ଅତି ସାନ ଏକ ନିମିତ୍ତ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୋଇ ବିନାଶକାରୀ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ; ଏବଂ ସେଠାରୁ ପୃଥିବୀରେ ଭୟଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧ ପ୍ରକଟ ହୁଏ—କ୍ଷତ୍ରିୟବଧ ଓ ବ୍ୟାପକ ଧ୍ୱଂସର କାରଣ ହୋଇ।
Verse 31
एतत् संचिन्त्य राजेन्द्र यत् क्षेमं तत् समाचर । अप्रमत्तोत्थितो नित्य चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे,राजेन्द्र! यह सब सोच-विचारकर तुम्हें जो हितकर जान पड़े, वह करो। चारों वर्णोंकी रक्षाके लिये सदा सावधान और उद्यत रहो
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଏ ସବୁ ଭଲଭାବେ ଚିନ୍ତା କରି ଯାହାକୁ ତୁମେ କ୍ଷେମକର ଓ ହିତକର ବୋଲି ବୁଝ, ସେହି କାମ କର। ଚାତୁର୍ବର୍ଣ୍ୟର ରକ୍ଷାରେ ସଦା ଅପ୍ରମତ୍ତ, ସଚେତନ ଓ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରୁହ।
Verse 32
भव एधस्व मोदस्व धनैस्तर्पय च द्विजान् | एतत् ते विस्तरेणोक्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । आपूच्छे त्वां गमिष्यामि दाशार्हनगरीं प्रति,संसारमें तुम्हारा अभ्युदय हो, तुम आनन्दित रहो और धनसे ब्राह्मणोंको तृप्त करो। तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक बता दिया। अब मैं यहाँसे द्वारका जाऊँगा, इसके लिये तुमसे अनुमति चाहता हूँ
ସଂସାରରେ ତୁମର ଅଭ୍ୟୁଦୟ ହେଉ; ତୁମେ ସମୃଦ୍ଧ ହେଉ, ଆନନ୍ଦିତ ରୁହ, ଏବଂ ଧନଦ୍ୱାରା ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ (ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ) ତୃପ୍ତ କର। ତୁମେ ଯାହା ପଚାରିଥିଲ, ସେ ସବୁ ମୁଁ ବିସ୍ତାରରେ କହିଦେଲି। ଏବେ ମୁଁ ତୁମଠାରୁ ଅନୁମତି ନେଇ, ଦାଶାର୍ହମାନଙ୍କ ନଗରୀ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବି।
Verse 33
वैशम्पायन उवाच एवमाख्याय पार्थेभ्यो नारदो जनमेजय । जगाम तैरवृतो राजनृूषिभियें: समागत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीकुमारोंस ऐसा कहकर नारदजी जिन ऋषियोंके साथ आये थे, उन्हींसे घिरे हुए पुनः: चले गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଏପରି ପୃଥାପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ କହି ନାରଦ, ଯେ ଋଷିମାନଙ୍କ ସହ ଆସିଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇ ପୁନର୍ବାର ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 34
गते तु नारदे पार्थो भ्रातृभि: सह कौरव: । राजसू[यं क्रतुश्रेष्ठ चिन्तयामास पार्थिव:,नारदजीके चले जानेपर कुरुश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञके विषयमें विचार करने लगे
ନାରଦ ଚଳିଯାଇବା ପରେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ କୌରବ—କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର—ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ରାଜସୂୟ ନାମକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କ୍ରତୁ ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Whether pursuing imperial-sacrificial sovereignty can be dharmic when it risks provoking rivalry or misallocating resources; Yudhiṣṭhira tests the project against public welfare, capability, and non-harm through careful assessment.
Righteous intention is insufficient without calibrated means: leaders should consult widely, evaluate deśa-kāla and expenditure, and prioritize counsel that is truthful rather than merely agreeable.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-level emphasis is procedural—how ethical decision-making is secured through impartial counsel (Kṛṣṇa) and feasibility review before undertaking major public rites.