Adhyaya 91
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 9142 Verses

Adhyaya 91

अश्वमेधावसानम् — Dakṣiṇā-vibhāga and Avabhṛtha (Completion of the Aśvamedha)

Upa-parva: Aśvamedha-kratu-saṃsthāpanā (Completion of the Aśvamedha and Dakṣiṇā Distribution Episode)

Vaiśaṃpāyana narrates the final procedures of the Aśvamedha. The officiating twice-born priests perform the śāstric handling of the sacrificial horse, including the prescribed cooking of portions and the ritualized sensory act wherein Yudhiṣṭhira, with his brothers, inhales the purificatory fragrance of the offering’s smoke. The remaining parts are offered into the fire by the full complement of sixteen ṛtvij. Vyāsa, present with disciples, formally completes the rite and ‘augments’ the king’s merit. Yudhiṣṭhira then gives vast gifts to the assembly and offers the earth itself to Vyāsa as dakṣiṇā. Vyāsa accepts but clarifies that the earth remains Yudhiṣṭhira’s trust; he requests a monetary ‘niṣkraya’ (redemption price) since brāhmaṇas seek wealth rather than territorial rule. Yudhiṣṭhira publicly states that in an Aśvamedha the earth is remembered as dakṣiṇā, conquered by Arjuna and delivered by him to the priests; yet he refuses to personally appropriate brahmin-dedicated property and even proposes retreat to the forest while the priests divide the land by cāturhotra measure. His brothers and Draupadī affirm his stance; a disembodied voice praises it. Vyāsa returns the earth to Yudhiṣṭhira and instructs him to give gold to the twice-born; Kṛṣṇa endorses this counsel. Yudhiṣṭhira grants an even greater, tripled dakṣiṇā, which Vyāsa distributes in four shares to the officiants. The ritual field’s gold and valuables are apportioned with royal permission; over time additional groups also collect remaining wealth. The brāhmaṇas depart satisfied. Vyāsa gives Kuntī a personal share as a gesture responding to reverence. After the avabhṛtha, Yudhiṣṭhira, purified, returns to the city amid assembled rulers, distributing further gifts and installing Duḥśalā’s young grandson in his protected domain. The chapter closes by portraying the sacrifice as an immense festival of abundance, sound, and continual giving, culminating in the king’s fulfilled re-entry into civic life.

Chapter Arc: जनमेजय यज्ञ-धर्म की प्रशंसा करते हुए पूछते हैं कि राजाओं ने यज्ञों से कीर्ति और स्वर्ग पाया है—तो क्या यज्ञफल के तुल्य कोई अन्य साधन है ही नहीं? → संवाद यज्ञ की ‘हिंसामिश्रित’ प्रकृति पर टिकता है: क्या धर्म का आधार कर्मकाण्ड है या शुद्ध साधन-शुद्ध उद्देश्य? अन्यायोपार्जित धन, राग-मोह, और संशययुक्त यजमान—इन सबके कारण यज्ञ का फल संदिग्ध ठहरता है। तपस्वी और विद्वानों में यह विवाद उभरता है कि यज्ञ में स्थावर (जड़/वनस्पति) पदार्थों से ही आहुति हो या प्राणियों की हिंसा भी ‘विधि’ के नाम पर स्वीकार्य है। → इन्द्र के यज्ञ में उपस्थित तपस्वियों के बीच तीखा मतभेद चरम पर पहुँचता है—एक पक्ष ‘स्थावरैः’ यज्ञ का आग्रह करता है, दूसरा परम्परागत हिंसामिश्रित विधान का; ऋषि तत्त्वदर्शी होकर शास्त्रसम्मत, संयमित और अहिंसक/शुद्ध साधन-प्रधान यज्ञ की ओर संकेत करते हैं, पर इन्द्र अभिमान और मोहवश उस उपदेश को स्वीकार नहीं करते। → अध्याय का निष्कर्ष कर्मकाण्ड-गौरव से आगे बढ़कर ‘धर्म की शर्तें’ स्पष्ट करता है: अन्यायोपार्जित द्रव्य से, संशय और लोभ से किया गया यज्ञ धर्मफल नहीं देता; दान, तप, संयम, और शास्त्रीय विधि से—यहाँ तक कि उच्छ (बीनाअन्न), फल, मूल, शाक, जलपात्र जैसे सरल साधनों से—धार्मिक पुरुष स्वर्गगामी होते हैं। → इन्द्र का मोह-आवरण बना रहता है—तत्त्वदर्शी ऋषियों की वाणी अस्वीकृत होने से यह संकेत मिलता है कि आगे देव-मानव-ऋषि संवाद में धर्म की सूक्ष्म परीक्षा और तीव्र होगी।

Shlokas

Verse 1

अफ्--णक+ एकनवतितमो< ध्याय: हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा जनमेजय उवाच यज्ञे सक्ता नृपतयस्तपःसक्ता महर्षय: । शान्तिव्यवस्थिता विप्रा: शमे दम इति प्रभो,जनमेजयने कहा--प्रभो! राजालोग यज्ञमें संलग्न होते हैं, महर्षि तपस्यामें तत्पर रहते हैं और ब्राह्मणलोग शान्ति (मनोनिग्रह)-में स्थित होते हैं। मनका निग्रह हो जानेपर इन्द्रियोंका संयम स्वत: सिद्ध हो जाता है

ဇနမေဇယက ပြောသည်– «အရှင်ဘုရား၊ မင်းတို့သည် ယဇ်ပူဇော်ပွဲ၌ အလေးထားကြ၏၊ မဟာရိရှီတို့သည် တပဿ (အာသီတိက) ကို အလေးထားကြ၏၊ ဗြာဟ္မဏတို့သည် ငြိမ်းချမ်းမှု၌ တည်ကြ၏—စိတ်ငြိမ်သက်ခြင်းနှင့် ကိုယ်ကိုထိန်းချုပ်သည့် သမ (ရှမ)၊ ဒမ (ဒမ) တို့အားဖြင့်»။

Verse 2

तस्माद्‌ यज्ञफलैस्तुल्यं न किंचिदिह दृश्यते । इति मे वर्तते बुद्धिस्तथा चैतदसंशयम्‌,अत: यज्ञफलकी समानता करनेवाला कोई कर्म यहाँ मुझे नहीं दिखायी देता है। यज्ञके सम्बन्धमें मेरा तो ऐसा ही विचार है और नि:संदेह यही ठीक है

ဇနမေဇယက ပြောသည်— «ထို့ကြောင့် ဤလောက၌ ယဇ္ဉ၏ အကျိုးဖလနှင့် တူညီသည့် အရာတစ်စုံတစ်ရာကို မမြင်ရ။ ဤသည်မှာ ငါ၏ အတည်ပြုထားသော ဉာဏ်မြင်ဖြစ်ပြီး—ဤအပေါ် သံသယမရှိ»။

Verse 3

यज्ञैरिष्टवा तु बहवो राजानो द्विजसत्तमा: । इह कीर्ति परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्रुयु:,यज्ञोंका अनुष्ठान करके बहुत-से राजा और श्रेष्ठ ब्राह्मण इहलोकमें उत्तम कीर्ति पाकर मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोकमें गये हैं

ဇနမေဇယက ပြောသည်— «ဗြာဟ္မဏတို့အနက် အမြတ်ဆုံးရေ၊ ယဇ္ဉများကို စည်းကမ်းတကျ ဆောင်ရွက်ခဲ့သော မင်းများနှင့် ဗြာဟ္မဏအထူးမြတ်များ များစွာသည် ဤလောက၌ အမြင့်ဆုံး ဂုဏ်သတင်းကို ရရှိပြီး၊ သေပြီးနောက် ကောင်းကင်ဘုံသို့ ရောက်ကြ၏»။

Verse 4

देवराज: सहस्राक्ष: क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: । देवराज्यं महातेजा: प्राप्तवानखिलं विभु:,सहस्र नेत्रधारी महातेजस्वी देवराज भगवान्‌ इन्द्रने बहुत-सी दक्षिणावाले बहुसंख्यक यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका समस्त साम्राज्य प्राप्त किया था

ဇနမေဇယက ပြောသည်— «တန်ခိုးကြီးမားသော နတ်မင်း အင်ဒြာ—မျက်စိတစ်ထောင်ရှိသူ—သည် ဒက္ခိဏာ (ပူဇော်လှူဒါန်းမှု) များစွာပါဝင်သော ယဇ္ဉများကို အများအပြား ဆောင်ရွက်၍ နတ်တို့၏ အာဏာပိုင်မှု အလုံးစုံကို ရရှိခဲ့သည်»။

Verse 5

यदा युधिष्छिरो राजा भीमार्जुनपुर:सर: । सदृशो देवराजेन समृद्धा विक्रमेण च,भीम और अर्जुनको आगे रखकर राजा युधिष्छिर भी समृद्धि और पराक्रमकी दृष्टिसे देवराज इन्द्रके ही तुल्य थे

ဇနမေဇယက ပြောသည်— «ထိုအခါ ဘီမနှင့် အာర్జုနတို့ကို ရှေ့တန်းထား၍ မင်း ယုဓိဋ္ဌိရသည်လည်း နတ်မင်း အင်ဒြာနှင့် တူညီလောက်အောင် စည်းစိမ်နှင့် သူရဲကောင်းသတ္တိတို့၌ ထင်ရှားခဲ့သည်»။

Verse 6

अथ कस्मात्‌ स नकुलो गर्हयामास त॑ क्रतुम्‌ । अश्वमेधं महायज्ञं राज्ञस्तस्य महात्मन:,फिर उस नेवलेने महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस अश्वमेध नामक महायज्ञकी निन्दा क्‍यों की?

ဇနမေဇယက မေးသည်— «အဘယ်ကြောင့် ထို နေဝလ (mongoose) သည် မဟာမင်းမြတ်၏ အရှွမေဓ ယဇ္ဉ—မဟာယဇ္ဉကြီး—ကို ကဲ့ရဲ့ခဲ့သနည်း»။

Verse 7

वैशम्पायन उवाच यज्ञस्य विधिमग्र्यं वै फलं चापि नराधिप । गदत: शृणु मे राजन्‌ यथावदिह भारत,वैशम्पायनजीने कहा--नरेश्वर! भरतनन्दन! मैं यज्ञकी श्रेष्ठ विधि और फलका यहाँ यथावत्‌ वर्णन करता हूँ, तुम मेरा कथन सुनो

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– «လူတို့၏အရှင်၊ ဘာရတ မင်းကြီး၊ ငါပြောမည့်စကားကို နားထောင်လော့။ ဤနေရာ၌ ယဇ္ဉ၏ အမြတ်ဆုံး အစီအစဉ်နှင့် ၎င်း၏ အကျိုးဖလကို သင့်တင့်သလို အစဉ်လိုက် ဖော်ပြမည်။ သို့မှသာ သာသနာတရားနှင့် ကိုက်ညီသော ကုသိုလ်ကံသည် မိမိနှင့်တော်သော အကျိုးကို မည်သို့ပေးသနည်းကို သင်နားလည်နိုင်မည်»။

Verse 8

पुरा शक्रस्य यजत: सर्व ऊचुर्महर्षय: । ऋतचिविक्षु कर्मव्यग्रेषु वितते यज्ञकर्मणि,राजन! प्राचीन कालकी बात है, जब इन्द्रका यज्ञ हो रहा था और सब महर्षि मन्त्रोच्चारण कर रहे थे, ऋत्विजूलोग अपने-अपने कर्मोमें लगे थे, यज्ञका काम बड़े समारोह और विस्तारके साथ चल रहा था, उत्तम गुणोंसे युक्त आहुतियोंका अग्निमें हवन किया जा रहा था, देवताओंका आवाहन हो रहा था, बड़े-बड़े महर्षि खड़े थे, ब्राह्मणलोग बड़ी प्रसन्नताके साथ वेदोक्त मन्त्रोंका उत्तम स्वरसे पाठ करते थे और शीघ्रकारी उत्तम अध्वर्युगण बिना किसी थकावटके अपने कर्तव्यका पालन कर रहे थे। इतनेहीमें पशुओंके आलम्भका समय आया। महाराज! जब पशु पकड़ लिये गये, तब महर्षियोंको उनपर बड़ी दया आयी

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– «မင်းကြီး၊ ရှေးကာလတုန်းက သက္ကရာ (အိန္ဒြာ) သည် ယဇ္ဉပြုစဉ်၊ ယဇ္ဉကိစ္စကြီးမြတ်စွာ ဆက်လက်ကျင်းပနေချိန်တွင် မဟာရသီတို့အားလုံးက ပြောဆိုကြ၏။ ရိတဝိဇ် ယဇ္ဉပုရောဟိတ်တို့သည် မိမိမိမိ တာဝန်များတွင် စိတ်အားထက်သန်စွာ လုပ်ကိုင်နေကြပြီး ယဇ္ဉလုပ်ငန်းသည် ကျယ်ပြန့်သိုက်သိုက်ဝန်းဝန်း ဆောင်ရွက်လျက်ရှိ၏။ ထိုအခါ တိရစ္ဆာန်များကို အခမ်းအနားအတွက် ချည်နှောင်ရမည့် အချိန်ရောက်လာသော် မဟာရသီတို့၏ နှလုံးသား၌ ထိုသတ္တဝါတို့အပေါ် ကရုဏာ ပေါ်ထွန်းလာ၏»။

Verse 9

हूयमाने तथा वह्लौ होत्रे गुणसमन्विते । देवेष्वाहयमानेषु स्थितेषु परमर्षिषु,राजन! प्राचीन कालकी बात है, जब इन्द्रका यज्ञ हो रहा था और सब महर्षि मन्त्रोच्चारण कर रहे थे, ऋत्विजूलोग अपने-अपने कर्मोमें लगे थे, यज्ञका काम बड़े समारोह और विस्तारके साथ चल रहा था, उत्तम गुणोंसे युक्त आहुतियोंका अग्निमें हवन किया जा रहा था, देवताओंका आवाहन हो रहा था, बड़े-बड़े महर्षि खड़े थे, ब्राह्मणलोग बड़ी प्रसन्नताके साथ वेदोक्त मन्त्रोंका उत्तम स्वरसे पाठ करते थे और शीघ्रकारी उत्तम अध्वर्युगण बिना किसी थकावटके अपने कर्तव्यका पालन कर रहे थे। इतनेहीमें पशुओंके आलम्भका समय आया। महाराज! जब पशु पकड़ लिये गये, तब महर्षियोंको उनपर बड़ी दया आयी

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– «မင်းကြီး၊ အရည်အသွေးပြည့်ဝသော အဟုတိများကို ကျွမ်းကျင်သော ဟောတೃ (Hotṛ) က မီးတောက်လောင်သော အဂ္နိထဲသို့ သင့်တင့်စွာ ပူဇော်နေစဉ်၊ ဒေဝတားတို့ကို ဖိတ်ခေါ်နေကြပြီး မဟာရသီကြီးများလည်း ရပ်တည်သက်သေခံနေသဖြင့် ယဇ္ဉသည် အလွန်သန့်ရှင်းသိမ်မွေ့စွာ ဆက်လက်ဖြစ်ပွား၏။ သို့ရာတွင် တိရစ္ဆာန်များကို ချည်နှောင်ရမည့် အချိန်ရောက်လာသော် ဉာဏ်ရှိသူတို့၏ နှလုံးသား၌ ကရုဏာက ထကြွလာ၏»။

Verse 10

सुप्रतीतैस्तथा विप्रैः स्वागमै: सुस्वरैर्न॒प । अश्रान्तैश्ञापि लघुभिरवथ्वर्युवृषभैस्तथा,राजन! प्राचीन कालकी बात है, जब इन्द्रका यज्ञ हो रहा था और सब महर्षि मन्त्रोच्चारण कर रहे थे, ऋत्विजूलोग अपने-अपने कर्मोमें लगे थे, यज्ञका काम बड़े समारोह और विस्तारके साथ चल रहा था, उत्तम गुणोंसे युक्त आहुतियोंका अग्निमें हवन किया जा रहा था, देवताओंका आवाहन हो रहा था, बड़े-बड़े महर्षि खड़े थे, ब्राह्मणलोग बड़ी प्रसन्नताके साथ वेदोक्त मन्त्रोंका उत्तम स्वरसे पाठ करते थे और शीघ्रकारी उत्तम अध्वर्युगण बिना किसी थकावटके अपने कर्तव्यका पालन कर रहे थे। इतनेहीमें पशुओंके आलम्भका समय आया। महाराज! जब पशु पकड़ लिये गये, तब महर्षियोंको उनपर बड़ी दया आयी

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– «မင်းကြီး၊ မိမိတို့၏ ဝေဒသင်ကြားမှု (သမဂ္ဂ) တွင် ကောင်းစွာတည်မြဲသော ဗြာဟ္မဏများသည် မန္တရများကို သန့်ရှင်းပြတ်သားသော အသံကောင်းများဖြင့် ရွတ်ဆိုနေကြ၏။ ထို့ပြင် လျင်မြန်သွက်လက်၍ မပင်ပန်းသော အဓွရျု (Adhvaryu) အထက်မြတ်သူတို့လည်း မိမိတို့၏ ရိုးရာတာဝန်များကို မနားမနေ ဆောင်ရွက်နေကြ၏»။

Verse 11

आलम्भसमये तस्मिन्‌ गृहीतेषु पशुष्वथ । महर्षयो महाराज बभूवु: कृपयान्विता:,राजन! प्राचीन कालकी बात है, जब इन्द्रका यज्ञ हो रहा था और सब महर्षि मन्त्रोच्चारण कर रहे थे, ऋत्विजूलोग अपने-अपने कर्मोमें लगे थे, यज्ञका काम बड़े समारोह और विस्तारके साथ चल रहा था, उत्तम गुणोंसे युक्त आहुतियोंका अग्निमें हवन किया जा रहा था, देवताओंका आवाहन हो रहा था, बड़े-बड़े महर्षि खड़े थे, ब्राह्मणलोग बड़ी प्रसन्नताके साथ वेदोक्त मन्त्रोंका उत्तम स्वरसे पाठ करते थे और शीघ्रकारी उत्तम अध्वर्युगण बिना किसी थकावटके अपने कर्तव्यका पालन कर रहे थे। इतनेहीमें पशुओंके आलम्भका समय आया। महाराज! जब पशु पकड़ लिये गये, तब महर्षियोंको उनपर बड़ी दया आयी

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– «ထိုအချိန်၌ မင်းကြီး၊ တိရစ္ဆာန်ပူဇော်ရန် (အာလမ္ဘ) အချိန်ရောက်ပြီး သတ္တဝါတို့ကို ဖမ်းဆီးထားကြသော် မဟာရသီတို့သည် ကရုဏာဖြင့် ပြည့်နှက်လာကြ၏»။

Verse 12

ततो दीनान्‌ पशून्‌ दृष्टवा ऋषयस्ते तपोधना: । ऊचुः: शक्रं: समागम्य नायं यज्ञविधि: शुभ:,उन पशुओंकी दयनीय अवस्था देखकर वे तपोधन ऋषि इन्द्रके पास जाकर बोले --“यह जो यज्ञमें पशुवधका विधान है, यह शुभकारक नहीं है

ထို့နောက် သနားဖွယ်အခြေအနေရှိသော တိရစ္ဆာန်တို့ကို မြင်သဖြင့် တပဿာဓန ရှိသည့် ရှင်ရသီတို့သည် သက္ကရ (အိန္ဒြ) ထံသို့ ချဉ်းကပ်ကာ ပြောကြသည်—«ဤယဇ္ဉလုပ်ထုံးလုပ်နည်း၊ တိရစ္ဆာန်သတ်ခြင်းပါဝင်သော စည်းကမ်းသည် မင်္ဂလာမဖြစ်» ဟု။

Verse 13

अपरिज्ञानमेतत्‌ ते महान्तं धर्ममिच्छत: । न हि यज्ञे पशुगणा विधिदृष्टा: पुरंदर,'पुरंदर! आप महान्‌ धर्मकी इच्छा करते हैं तो भी जो पशुवधके लिये उद्यत हो गये हैं, यह आपका अज्ञान ही है; क्‍योंकि यज्ञमें पशुओंके वधका विधान शास्त्रमें नहीं देखा गया है

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်—«မဟာဓမ္မကို လိုလားနေသော်လည်း တိရစ္ဆာန်သတ်ဖြတ်ရန် စိတ်ကူးတည်ကြည်သွားခြင်းသည် သင်၏ မသိမြင်မှုသာ ဖြစ်သည်။ ယဇ္ဉ၌ တိရစ္ဆာန်အုပ်စုများကို သတ်ရန် သာသနာကျမ်းအရ စည်းကမ်းကို မတွေ့ရ၊ အို ပုရန္ဒရ» ဟု။

Verse 14

धर्मोपघातकस्त्वेष समारम्भस्तव प्रभो । नायं धर्मकृतो यज्ञो न हिंसा धर्म उच्यते,'प्रभो! आपने जो यज्ञका समारम्भ किया है, यह धर्मको हानि पहुँचानेवाला है। यह यज्ञ धर्मके अनुकूल नहीं है, क्योंकि हिंसाको कहीं भी धर्म नहीं कहा गया है

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်—«အရှင်ဘုရား၊ သင်၏ ဤစတင်လုပ်ဆောင်မှုသည် ဓမ္မကို ထိခိုက်စေသည်။ ဤယဇ္ဉသည် တရားမှန်ကန်မှုနှင့် ကိုက်ညီစွာ မပြုလုပ်ထား၊ အကြမ်းဖက်ခြင်းကို ဓမ္မဟု မည်သည့်နေရာတွင်မျှ မကြေညာထားသောကြောင့်» ဟု။

Verse 15

आगमेनैव ते यज्ञं कुर्वन्तु यदि चेच्छसि

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်—«သင်လိုလားပါက သင်၏ ယဇ္ဉကို အာဂမ (လက်ခံလာသော ထုံးတမ်းနှင့် အာဏာရှိသော လုပ်ထုံးလုပ်နည်း) အတိုင်း တိတိကျကျ ဆောင်ရွက်စေပါ» ဟု။

Verse 16

यज बीजै: सहस्राक्ष त्रिवर्षपरमोषितै:

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်—«အို သဟသ္ရာက္ခ (မျက်စိတစ်ထောင်ရှင်)၊ သုံးနှစ်အထိ သိုလှောင်ထားသော မျိုးစေ့များဖြင့် ယဇ္ဉကို ဆောင်ရွက်လော့» ဟု။

Verse 17

शतक्रतुस्तु तद्‌ वाक्यमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभि:

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– ထို့နောက် သတကရတု (အိန္ဒြာ) သည် သစ္စာကိုမြင်သော ရှင်ရသေ့တို့က ဆိုသော စကားကို ကြားယူလေ၏—ဉာဏ်ပညာနှင့် ဓမ္မညွှန်ကြားမှု၏ အလေးချိန်ပါဝင်သော စကားတည်း။

Verse 18

तेषां विवाद: सुमहान्‌ शक्रयज्ञे तपस्विनाम्‌

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– ထိုတပသီတို့အကြား၌ သကရ (အိန္ဒြာ) ၏ ယဇ်ပူဇော်ပွဲတွင် အလွန်ကြီးမားသော အငြင်းပွားမှုတစ်ရပ် ပေါ်ပေါက်လာလေ၏—ပူဇော်ပွဲ၏ အဆင့်အတန်း၊ ကုသိုလ်၊ နှင့် မှန်ကန်သော အကျင့်အကြံတို့ကို မေးမြန်းရာ၌ ပညာရှိ၍ ကိုယ်ကိုထိန်းချုပ်နိုင်သူတို့ပင် အငြင်းပွားမှုသို့ ဆွဲငင်ခံရနိုင်ကြောင်းကို ထင်ရှားစေသည်။

Verse 19

ते तु खिन्ना विवादेन ऋषयस्तत्त्वदर्शिन:,भरतनन्दन! वे तत्त्वदर्शी ऋषि जब इस विवादसे बहुत खिन्न हो गये, तब उन्होंने इन्द्रके साथ सलाह लेकर इस विषयमें राजा उपरिचर वसुसे पूछा--“महामते! हमलोग धर्मविषयक संदेहमें पड़े हुए हैं। आप हमसे सच्ची बात बताइये

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– သစ္စာကိုမြင်သော ရှင်ရသေ့တို့သည် ထိုအငြင်းပွားမှုကြောင့် ပင်ပန်းနွမ်းနယ်လာကြ၏။ ထို့နောက် အိန္ဒြာနှင့် တိုင်ပင်ပြီးနောက်၊ သူတို့သည် ဥပရိချရ ဝသု မင်းထံသို့ သွားရောက်၍ ထိုကိစ္စကို မေးမြန်းကြသည်– “မဟာမတိရှင်၊ ကျွန်ုပ်တို့သည် ဓမ္မအကြောင်း သံသယထဲသို့ ကျရောက်နေပါသည်။ အမှန်တကယ် မှန်ကန်သည့်အရာကို ကျွန်ုပ်တို့အား ပြောပြပါ” ဟု။

Verse 20

तदा संधाय शक्रेण पप्रच्छुर्न॒पतिं वसुम्‌ धर्मसंशयमापन्नान्‌ सत्यं ब्रूहि महामते,भरतनन्दन! वे तत्त्वदर्शी ऋषि जब इस विवादसे बहुत खिन्न हो गये, तब उन्होंने इन्द्रके साथ सलाह लेकर इस विषयमें राजा उपरिचर वसुसे पूछा--“महामते! हमलोग धर्मविषयक संदेहमें पड़े हुए हैं। आप हमसे सच्ची बात बताइये

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– ထို့နောက် သကရ (အိန္ဒြာ) နှင့် တိုင်ပင်ပြီး ရှင်ရသေ့တို့သည် ဝသု မင်းကို မေးမြန်းကြ၏။ ဓမ္မအကြောင်း သံသယကြောင့် စိတ်မချမ်းသာသဖြင့် သူတို့က– “မဟာမတိရှင်၊ ဘာရတမျိုး၏ အလှတရားတော်၊ အမှန်တရားကို ကျွန်ုပ်တို့အား ပြောပါ” ဟု ဆိုကြ၏။

Verse 21

महाभाग कथं यज्ञेष्वागमो नृपसत्तम । यष्टव्यं पशुभिमुख्यैरथो बीजै रसैरिति,“महाभाग नृपश्रेष्ठ! यज्ञोंके विषयमें शास्त्रका मत कैसा है? मुख्य-मुख्य पशुओंद्वारा यज्ञ करना चाहिये अथवा बीजों एवं रसोंद्वारा'

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– “မဟာဘဂရှင်၊ မင်းတို့အထဲ၌ အမြတ်ဆုံးရှင်၊ ယဇ်ပူဇော်ပွဲများအကြောင်း သာသနာကျမ်း၏ အမိန့်မည်သို့နည်း။ အဓိကအားဖြင့် တိရစ္ဆာန်များဖြင့် ယဇ်ပြုရမည်လော၊ သို့မဟုတ် မျိုးစေ့များနှင့် ရည်ရောပူဇော်ပစ္စည်းများဖြင့်လော” ဟု။

Verse 22

तच्छुत्वा तु वसुस्तेषामविचार्य बलाबलम्‌ | यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति प्रोवाच पार्थिव:,यह सुनकर राजा वसुने उन दोनों पक्षोंके कथनमें कितना सार या असार है, इसका विचार न करके यों ही बोल दिया कि “जब जो वस्तु मिल जाय, उसीसे यज्ञ कर लेना चाहिये”

သူတို့၏စကားကိုကြားသော်လည်း ဘုရင် ဝသုသည် အကြောင်းပြချက်နှစ်ဖက်၏ အားနည်းအားသာ (ကောင်းကျိုးနှင့် ချို့ယွင်းချက်) ကို မစိစစ်ဘဲ အလျင်အမြန်ဆိုလိုက်သည်– «ရရှိလာသမျှ၊ ယူဆောင်လာသမျှ ပစ္စည်းဖြင့်ပင် ယဇ်ကို ပြုလုပ်သင့်သည်» ဟု။

Verse 23

एवमुक्‍क्त्वा स नृपति: प्रविवेश रसातलम्‌ । उक्त्वाथ वितथं प्रश्न॑ चेदीनामी श्वर: प्रभु:,इस प्रकार कहकर असत्य निर्णय देनेके कारण चेदिराज वसुको रसातलमें जाना पड़ा

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ဆိုသည်– ထိုသို့ပြောပြီးနောက် ထိုဘုရင်သည် ရသာတလသို့ ဝင်ရောက်ကျဆင်းသွား၏။ မေးခွန်းတစ်ရပ်ကို မမှန်ကန်သော ဆုံးဖြတ်ချက်ဖြင့် ဖြေကြားခဲ့သဖြင့် စေဒီတို့၏ အာဏာရှင် ဝသုသည် အောက်လောကသို့ ကျဆင်းစေခံရ၏။

Verse 24

तस्मान्न वाच्यं होकेन बहुज्ञेनापि संशये । प्रजापतिमपाहाय स्वयम्भुवमृते प्रभुम्‌,अतः कोई संदेह उपस्थित होनेपर स्वयम्भू भगवान्‌ प्रजापतिको छोड़कर अन्य किसी बहुज्ञ पुरुषको भी अकेले कोई निर्णय नहीं देना चाहिये

ထို့ကြောင့် သံသယပေါ်လာသောအခါ အလွန်ပညာရှိသူဖြစ်စေကာမူ လူတစ်ဦးတည်းက မဆုံးဖြတ်သင့်။ ကိုယ်တိုင်မွေးဖွားသော ပရဇာပတိ သခင် စွယံဘူ ကို ချန်လှပ်၍ အခြားသူကို သံသယကိစ္စများတွင် တစ်ဦးတည်း အဆုံးအဖြတ်အာဏာရှင်ဟု မယူဆသင့်။

Verse 25

तेन दत्तानि दानानि पापेनाशुद्धबुद्धिना । तानि सर्वाण्यनादृत्य नश्यन्ति विपुलान्यपि,उस जशुद्ध बुद्धिवाले पापी पुरुषके दिये हुए दान कितने ही अधिक क्‍यों न हों, वे सब- के-सब अनाहत होकर नष्ट हो जाते हैं

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ဆိုသည်– အလှူဒါနကို များစွာပေးလှူသော်လည်း အပြစ်ရှိ၍ ဉာဏ်မသန့်သောသူထံမှ ဖြစ်လာလျှင် ထိုအလှူများသည် ဂုဏ်သိက္ခာဖြင့် မလက်ခံခံရဘဲ နောက်ဆုံးတွင် အကျိုးမရှိဘဲ ပျက်စီးသွားသည်။

Verse 26

तस्याधर्मप्रवृत्तस्य हिंसकस्य दुरात्मन: । दानेन कीर्तिर्भवति न प्रेत्येह च दुर्मतेः,अधर्ममें प्रवृत्त हुए दुर्बद्धि दुरात्मा हिंसक मनुष्य जो दान देते हैं, उससे इहलोक या परलोकमें उनकी कीर्ति नहीं होती

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ဆိုသည်– အဓမ္မသို့ လှည့်သွားသောသူ၊ အကြမ်းဖက်၍ စိတ်မကောင်းသောသူ၊ ဉာဏ်ကွေ့ကောက်သောသူအတွက် အလှူဒါနသည် စစ်မှန်သောဂုဏ်သတင်းကို မဖြစ်စေ။ ဤလောက၌လည်း မဖြစ်၊ သေပြီးနောက်လည်း မဖြစ်။ အန္တရာယ်နှင့် အဓမ္မတွင် အမြစ်တည်သောဘဝကို အလှူဖြင့် မသန့်စင်နိုင်။

Verse 27

अन्यायोपगतं द्रव्यमभी क्ष्णं यो हपण्डित: । धर्माभिशंकी यजते न स धर्मफलं लभेत्‌,जो मूर्ख अन्यायोपार्जित धनका बारंबार संग्रह करके धर्मके विषयमें संशय रखते हुए यजन करता है, उसे धर्मका फल नहीं मिलता

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– လူတစ်ယောက်ကို ပညာရှိဟု သတ်မှတ်ကြသော်လည်း မတရားမှုဖြင့် ရရှိသော ဥစ္စာကို ထပ်ခါထပ်ခါ စုဆောင်းပြီး၊ ဓမ္မအပေါ် သံသယကို နှလုံးထဲတွင် ထားလျက် ယဇ္ဈာပြုလျှင်၊ ထိုသူသည် ဓမ္မ၏ အကျိုးကို မရနိုင်။

Verse 28

धर्मवैतंसिको यस्तु पापात्मा पुरुषाधम: । ददाति दान विप्रेभ्यो लोकविश्वासकारणम्‌,जो धर्मध्वजी, पापात्मा एवं नराधम है, वह लोकमें अपना विश्वास जमानेके लिये ब्राह्मणोंको दान देता है, धर्मके लिये नहीं

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– ဓမ္မကို အပြင်ပန်းသာ ဆောင်ယောင်ကာ၊ အတွင်းစိတ်မှာ အပြစ်ပြည့်နှက်၍ လူတို့အနက် အနိမ့်ဆုံးဖြစ်သော ထိုသူသည်၊ ဓမ္မကြောင့်မဟုတ်ဘဲ လောက၏ ယုံကြည်မှုကို ရယူရန်အတွက်သာ ဗြာဟ္မဏတို့အား ဒါနပေးသည်။

Verse 29

पापेन कर्मणा विप्रो धन प्राप्प निरडकुश: । रागमोहान्वित: सो<न्ते कलुषां गतिमश्लुते,जो ब्राह्मण पापकर्मसे धन पाकर उच्छुंखल हो राग और मोहके वशीभूत हो जाता है, वह अन्तमें कलुषित गतिको प्राप्त होता है

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– အပြစ်ကမ္မဖြင့် ဥစ္စာရသော ဗြာဟ္မဏသည် ထိန်းချုပ်မှုကင်းမဲ့လာပြီး၊ ရာဂနှင့် မောဟတို့၏ အာဏာအောက်သို့ ကျရောက်ကာ နောက်ဆုံးတွင် မသန့်ရှင်းသော ကံကြမ္မာသို့ ရောက်လေသည်။

Verse 30

अपि संचयबुद्धिहि लोभमोहवशंगत: । उद्वेजयति भूतानि पापेनाशुद्धबुद्धिना,वह लोभ और मोहके वशमें पड़कर संग्रह करनेकी बुद्धिको अपनाता है। कृपणतापूर्वक पैसे बटोरनेका विचार रखता है। फिर बुद्धिको अशुद्ध कर देनेवाले पापाचारके द्वारा प्राणियोंको उद्धेगमें डाल देता है

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– လောဘနှင့် မောဟတို့၏ အာဏာအောက်သို့ ကျရောက်သောသူသည် စုဆောင်းသိုလှောင်လိုသော စိတ်ဓာတ်ကို ခံယူလာသည်။ မသန့်ရှင်းသော ဉာဏ်ဖြင့် အပြစ်ကမ္မကို ကျင့်ကာ သတ္တဝါတို့ကို စိတ်လှုပ်ရှားပူပန်စေသည်။

Verse 31

एवं लब्ध्वा धनं मोहाद यो हि दद्याद्‌ यजेत वा । न तस्य स फल प्रेत्य भुड़क्ते पापधनागमात्‌,इस प्रकार जो मोहवश अन्यायसे धनका उपार्जन करके उसके द्वारा दान या यज्ञ करता है, वह मरनेके बाद भी उसका फल नहीं पाता; क्योंकि वह धन पापसे मिला हुआ होता है

ဝိုင်ရှမ္ပါယန မိန့်တော်မူသည်– ထို့ကြောင့် မောဟကြောင့် မတရားမှုဖြင့် ဥစ္စာကို ရယူပြီး ထိုဥစ္စာဖြင့် ဒါနပေးခြင်း သို့မဟုတ် ယဇ္ဈာပြုခြင်းကို လုပ်သော်လည်း၊ သေပြီးနောက် ထိုအကျိုးကို မခံစားရ။ အကြောင်းမှာ ထိုဥစ္စာသည် အပြစ်မှ ပေါက်ဖွားလာသောကြောင့် ဖြစ်သည်။

Verse 32

उज्छं मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधना: । दानं विभवतो दत्त्वा नरा: स्वर्यान्ति धार्मिका:,तपस्याके धनी धर्मात्मा पुरुष उज्छ (बीने हुए अन्न), फल, मूल, शाक और जलपात्रका ही अपनी शक्तिके अनुसार दान करके स्वर्गलोकमें चले जाते हैं

ဝိုင်သမ္ပာယနက ဆို၏—အို တပဓနာ (တပဿာကြွယ်ဝသူ) ရေ၊ ဓမ္မရှိသူတို့သည် မိမိစွမ်းအားအတိုင်း ဒါနပြုခြင်းဖြင့် ကောင်းကင်ဘုံသို့ ရောက်ကြ၏—ပေးအပ်သည့်အရာသည် အကျန်ကောက်ယူသော စပါး (ဥစ္ဆ), အမြစ်၊ အသီး၊ ဟင်းသီးဟင်းရွက် သို့မဟုတ် ရေခွက်တစ်လုံးသာ ဖြစ်စေကာမူ။

Verse 33

एष धर्मो महायोगो दानं भूतदया तथा । ब्रह्मचर्य तथा सत्यमनुक्रोशो धृति: क्षमा,यही धर्म है, यही महान्‌ योग है, दान, प्राणियोंपर दया, ब्रह्मचर्य, सत्य, करुणा, धृति और क्षमा--ये सनातन धर्मके सनातन मूल हैं। सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्र आदि नरेश इसीसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे

ဝိုင်သမ္ပာယနက ဆို၏—«ဤသည်ပင် ဓမ္မဖြစ်၏၊ ဤသည်ပင် မဟာယောဂဖြစ်၏—ဒါန၊ သတ္တဝါအားလုံးအပေါ် ကရုဏာ၊ ဗြဟ္မစရိယ (အလိုဆန္ဒကို ထိန်းချုပ်သည့် သန့်ရှင်းသော စည်းကမ်း), သစ္စာ၊ မေတ္တာကရုဏာ၊ တည်ကြည်ခိုင်မာမှု၊ နှင့် ခွင့်လွှတ်ခြင်း။ ဤတို့သည် ထာဝရဓမ္မ၏ ထာဝရအမြစ်များဖြစ်၏။ ရှေးကာလ၌ ဝိශ්ဝာမိတ္တရ စသည့် မင်းများသည် ဤဂုဏ်တရားတို့ဖြင့်ပင် စိဒ္ဓိကို ရရှိခဲ့ကြသည်ဟု ကြားရ၏။»

Verse 34

सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत्‌ सनातनम्‌ | श्रूयन्ते हि पुरा वृत्ता विश्वामित्रादयो नृपा:,यही धर्म है, यही महान्‌ योग है, दान, प्राणियोंपर दया, ब्रह्मचर्य, सत्य, करुणा, धृति और क्षमा--ये सनातन धर्मके सनातन मूल हैं। सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्र आदि नरेश इसीसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे

ဝိုင်သမ္ပာယနက ဆို၏—«ဤသည်ပင် ထာဝရဓမ္မ၏ ထာဝရအမြစ်ဖြစ်၏။ အမှန်တကယ် ရှေးရိုးအစဉ်အလာအရ ဝိශ්ဝာမိတ္တရ စသည့် မင်းများနှင့် အခြားသူတို့သည် ဤအခြေခံကို လိုက်နာနေထိုင်၍ စိဒ္ဓိကို ရရှိခဲ့ကြသည်ဟု ကြားရ၏။»

Verse 35

विश्वामित्रोडसितश्रैव जनकश्ष महीपति: । कक्षसेनार्टिषेणौ च सिन्धुद्वीपश्च पार्थिव:,विश्वामित्र, असित, राजा जनक, कक्षसेन, आर्टिषिण और भूपाल सिन्धुद्वीप--ये तथा अन्य बहुत-से राजा तथा तपस्वी न्यायोपार्जित धनके दान और सत्यभाषणद्धारा परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं

ဝိုင်သမ္ပာယနက ဆို၏—ဝိශ්ဝာမိတ္တရ၊ အစိတ၊ မင်းကြီး ဇနက၊ ကက္ခစေန၊ အာရ္တိရှေဏ၊ နှင့် စင်ဓုဒွီပ မင်း—ဤသူတို့နှင့် အခြား မင်းများ၊ တပသီများ အများအပြားသည် တရားသဖြင့် ရရှိသော ဥစ္စာကို ဒါနပြုခြင်းနှင့် သစ္စာစကားကို တည်ကြည်စွာ ပြောဆိုခြင်းတို့ဖြင့် အမြင့်ဆုံး စိဒ္ဓိကို ရရှိခဲ့ကြ၏။

Verse 36

एते चान्ये च बहव: सिद्धि परमिकां गता: । नृपाः सत्यैश्न दानैश्व न्यायलब्धैस्तपोधना:,विश्वामित्र, असित, राजा जनक, कक्षसेन, आर्टिषिण और भूपाल सिन्धुद्वीप--ये तथा अन्य बहुत-से राजा तथा तपस्वी न्यायोपार्जित धनके दान और सत्यभाषणद्धारा परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं

ဝိုင်သမ္ပာယနက ဆို၏—အို တပဓနာ ရေ၊ ဤသူတို့နှင့် အခြားသူများ အများအပြားသည် အမြင့်ဆုံး စိဒ္ဓိသို့ ရောက်ကြ၏—သစ္စာနှင့် တရားသဖြင့် ရရှိသော ဥစ္စာမှ ပြုသော ဒါနတို့ကြောင့်ပင်။

Verse 37

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा ये चाश्रितास्तप: । दानधमग्निना शुद्धास्ते स्वर्ग यान्ति भारत,भरतनन्दन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जो भी तपका आश्रय लेते हैं, वे दानधर्मरूपी अग्निसे तपकर सुवर्णके समान शुद्ध हो स्वर्गलोकको जाते हैं

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «ဗြာဟ္မဏ၊ က္ଷတ္တရိယ၊ ဝိုင်ရှယ၊ ရှူဒြ—သူတို့အနက် မည်သူမဆို တပဿ (အကျင့်တရားဖြင့် ကိုယ်ကိုသန့်စင်ခြင်း) ကို အားကိုးလျှင်၊ ဒါန (ပေးကမ်းခြင်း) နှင့် ဓမ္မကျင့်သုံးမှု၏ မီးဖြင့် သန့်စင်ခံရပြီးနောက်၊ အို ဘာရတ၊ ကောင်းကင်ဘုံသို့ သွားရောက်ကြသည်»။

Verse 91

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि हिंसामिश्रधर्मनिन्दायामेकनवतितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें हिंसामिश्रित धर्मकी निन्‍्दाविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

ဤသို့ဖြင့် «သီရိ မဟာဘာရတ» အတွင်း၊ အာရှွမေဓိက ပရဝ၌၊ အနုဂီတာ အပိုင်းတွင်၊ အကြမ်းဖက်မှုနှင့် ရောနှောနေသော ဓမ္မကို ရှုတ်ချခြင်းအကြောင်း ဆိုသည့် ကိုးဆယ့်တစ်မြောက် အခန်းသည် အဆုံးသတ်လေ၏။

Verse 156

विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस्ते सुमहान्‌ भवेत्‌ । “यदि आपकी इच्छा हो तो ब्राह्मणलोग शास्त्रके अनुसार ही इस यज्ञका अनुष्ठान करें। शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ करनेसे आपको महान्‌ धर्मकी प्राप्ति होगी

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «ယဇ်ပူဇာကို ရှာစတြ (śāstra) တွင် သတ်မှတ်ထားသည့် နည်းလမ်းအတိုင်း ဆောင်ရွက်လျှင်၊ သင်၌ ဓမ္မ၏ အလွန်ကြီးမားသော အစုအဝေး ပေါင်းတင်လာလိမ့်မည်»။

Verse 163

एष धर्मो महान्‌ शक्र महागुणफलोदय: । “सहस्र नेत्रधारी इन्द्र! आप तीन वर्षके पुराने बीजों (जौ, गेहूँ आदि अनाजों)-से यज्ञ करें। यही महान्‌ धर्म है और महान्‌ गुणकारक फलकी प्राप्ति करानेवाला है”

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «အို ရှက္ကရ (အိန္ဒြာ)၊ ဤသည်မှာ မဟာဓမ္မဖြစ်၍ မဟာဂုဏ်တရားတို့၏ ထွန်းကားမှုနှင့် ၎င်းတို့၏ အကျိုးဖလကို ပေါ်ထွန်းစေသည်။ မျက်စိတစ်ထောင်ရှိသော အိန္ဒြာရေ၊ သုံးနှစ်သက်တမ်းရှိသော စပါးမျိုးစေ့များ (ဥပမာ—မုယောနှင့် ဂျုံ) ဖြင့် ယဇ်ပူဇာကို ဆောင်ရွက်လော့။ ဤသည်ပင် မဟာဓမ္မဖြစ်၍ မဟာကုသိုလ်မှ ပေါက်ဖွားသော အကျိုးဖလကို ပေးနိုင်၏»။

Verse 186

जड़मै: स्थावरैर्वापि यष्टव्यमिति भारत । इन्द्रके उस यज्ञमें जुटे हुए तपस्वी लोगोंमें इस प्रश्नको लेकर महान्‌ विवाद खड़ा हो गया। भारत! एक पक्ष कहता था कि जंगम पदार्थ (पशु आदि)-के द्वारा यज्ञ करना चाहिये और दूसरा पक्ष कहता था कि स्थावर वस्तुओं (अन्न-फल आदि)-के द्वारा यजन करना उचित है

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «အို ဘာရတ၊ (တချို့က) အသက်မရှိသော မလှုပ်ရှားသည့် ပူဇော်ပစ္စည်းများဖြင့်ပင် ယဇ်ပူဇာကို ဆောင်ရွက်သင့်သည်ဟု ဆိုကြ၏။ အိန္ဒြာ၏ ထိုယဇ်ပူဇာတွင် စုဝေးလာသော တပဿရှင်များအကြား ဤမေးခွန်းကြောင့် အကြီးအကျယ် အငြင်းပွားမှု ပေါ်ပေါက်ခဲ့သည်။ တစ်ဖက်က လှုပ်ရှားသတ္တဝါများ—တိရစ္ဆာန်တို့ကဲ့သို့—ဖြင့် အခမ်းအနားကို ပြုလုပ်သင့်သည်ဟု ဆိုပြီး၊ အခြားဖက်က မလှုပ်ရှားသည့် ပူဇော်ပစ္စည်းများ—စပါးနှံနှင့် သစ်သီးတို့ကဲ့သို့—ဖြင့်သာ ပူဇော်ခြင်းသည် သင့်လျော်သည်ဟု ထိန်းသိမ်းကြ၏»။

Verse 276

उक्त न प्रतिजग्राह मानान्मोहवशं गत: । तत्त्वदर्श ऋषियोंके कहे हुए इस वचनको इन्द्रने अभिमानवश नहीं स्वीकार किया। वे मोहके वशीभूत हो गये थे

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– မောဟကြောင့် ဖုံးလွှမ်း၍ မာနကြောင့် လှုံ့ဆော်ခံရသဖြင့်၊ သစ္စာကို မြင်သော ရှင်ရသီတို့ ပြောကြားခဲ့သည့် စကားကို အိန္ဒြာသည် မလက်ခံခဲ့။ မောဟ၏ အာဏာအောက်သို့ ကျရောက်နေခဲ့၏။

Frequently Asked Questions

Whether the king may retain, control, or re-appropriate what is designated as priestly entitlement (brahmasva) when the earth is offered as dakṣiṇā—resolved by Yudhiṣṭhira’s refusal to take it back as personal property and by Vyāsa’s conversion of the gift into a monetary redemption for distribution.

Ritual gifts function to sustain social order, not to destabilize governance; hence symbolic sovereignty (earth) can remain with the ruler as trusteeship while the ethical substance of giving is fulfilled through distributable wealth allocated to the officiants and brāhmaṇa recipients.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides meta-validation through public affirmation (brothers and Draupadī), celestial acclamation (‘sādhu’), and the narrative claim of purification (dhūta-pāpmā, jita-svarga), functioning as an implied efficacy statement for dharmic giving and ritual completion.