Adhyaya 132
Adi ParvaAdhyaya 13282 Verses

Adhyaya 132

Ādi-parva Adhyāya 132 — Duryodhana’s Instructions to Purocana at Vāraṇāvata (Lākṣāgṛha Planning)

Upa-parva: Jatugṛha-dāha (Lākṣāgṛha) Episode

Vaiśaṃpāyana reports that after the king’s arrangements concerning the Pāṇḍavas, Duryodhana experiences pronounced satisfaction and draws Purocana aside for confidential counsel. Declaring Purocana his most trusted collaborator, Duryodhana issues a detailed operational directive: proceed immediately to Vāraṇāvata by swift conveyance; construct a four-halled, enclosed residence under the guise of an armory and lavish lodging; procure and embed highly combustible materials (fibers, resins, oils, ghee, lac) into the walls and structure; arrange furnishings and hospitality so the Pāṇḍavas and Kuntī remain unsuspecting and at ease during the festival period. Once they are fully unafraid and asleep, Purocana is to ignite the house from the doorway, ensuring that observers conclude the Pāṇḍavas perished in their own dwelling, thereby shaping public testimony and kin reports. Purocana assents and departs, then executes the plan exactly as instructed, aligning with Duryodhana’s intent and method.

Chapter Arc: भीष्म द्रोणाचार्य को विश्राम देकर राजकुमारों को शिष्यत्व में सौंपते हैं और गुरु के लिए धन-धान्य से परिपूर्ण गृह तथा विविध वसुओं की व्यवस्था करते हैं—कुरुवंश की शिक्षा अब एक ही धनुर्धर-आचार्य के हाथों में जाती है। → द्रोण अर्जुन को नित्य उद्युक्त देख कर एकांत में बुलाते हैं और उसके भीतर ‘सर्वश्रेष्ठ’ बनने की आकांक्षा को धार देते हैं; उसी समय वन में एकलव्य, बिना औपचारिक स्वीकृति के, द्रोण की प्रतिमा बनाकर कठोर नियम से धनुर्विद्या साधता है और अद्भुत लाघव दिखाता है। → एकलव्य की सिद्धि देखकर द्रोण उससे गुरुदक्षिणा मांगते हैं—“दाहिने हाथ का अंगूठा दे दो”; शिष्य-भाव में एकलव्य बिना हिचक अंगूठा अर्पित कर देता है, और उसकी अद्वितीय क्षमता का शिखर उसी क्षण काट दिया जाता है। → एकलव्य की गुरु-भक्ति अमिट रहती है, पर उसका धनुर्विद्या-वैभव सीमित हो जाता है; द्रोण का वचन/उद्देश्य सुरक्षित रहता है कि अर्जुन से बढ़कर कोई धनुर्धर न हो, और राजकुमारों की शिक्षा-व्यवस्था उसी अनुशासन में स्थिर हो जाती है। → एकलव्य के त्याग की छाया आगे चलकर हस्तिनापुर की राजनीति और युद्ध-न्याय पर प्रश्न बनकर लौटने वाली है—श्रेष्ठता किसकी: प्रतिभा की, या व्यवस्था की?

Shlokas

Verse 1

- जौके आकारकी बनी हुई काठकी मोटी गुल्लीको “बीटा” कहते हैं। एकत्रिशदाधिकशततमो< ध्याय: द्रोणाचार्यद्वारा राजकुमारोंकी शिक्षा, एकलव्यकी गुरुभक्ति तथा आचार्यद्वारा शिष्योंकी परीक्षा वैशम्पायन उवाच ततः सम्पूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वर: । विशश्राम महातेजा: पूजित: कुरुवेश्मनि,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी द्रोणाचार्यने भीष्मजीके द्वारा पूजित हो कौरवोंके घरमें विश्राम किया। वहाँ उनका बड़ा सम्मान किया गया

Vaiśampāyana berkata: Kemudian Droṇa, yang utama antara manusia, setelah dihormati sepenuhnya oleh Bhīṣma, beristirahat di kediaman kaum Kuru. Di sana sang guru yang bercahaya itu disambut dengan penghormatan yang sewajarnya.

Verse 2

विश्रान्तेडथ गुरौ तस्मिन्‌ पौत्रानादाय कौरवान्‌ | शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च,गुरु द्रोणाचार्य जब विश्राम कर चुके, तब सामर्थ्यशाली भीष्मजीने अपने कुरुवंशी पौत्रोंकी लेकर उन्हें शिष्यरूपमें समर्पित किया। साथ ही अत्यन्त प्रसन्न होकर भरद्वाजनन्दन द्रोणको नाना प्रकारके धन-रत्न और सुन्दर सामग्रियोंसे सुसज्जित तथा धन- धान्यसे सम्पन्न भवन प्रदान किया

Vaiśampāyana berkata: Setelah guru itu berehat, Bhīṣma membawa cucu-cucu keturunan Kuru lalu menyerahkan mereka secara rasmi kepadanya sebagai murid; dan baginda juga menghadiahkan pelbagai jenis kekayaan.

Verse 3

गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम्‌ । भारद्वाजाय सुप्रीत: प्रत्यपादयत प्रभु:,गुरु द्रोणाचार्य जब विश्राम कर चुके, तब सामर्थ्यशाली भीष्मजीने अपने कुरुवंशी पौत्रोंकी लेकर उन्हें शिष्यरूपमें समर्पित किया। साथ ही अत्यन्त प्रसन्न होकर भरद्वाजनन्दन द्रोणको नाना प्रकारके धन-रत्न और सुन्दर सामग्रियोंसे सुसज्जित तथा धन- धान्यसे सम्पन्न भवन प्रदान किया

Vaiśampāyana berkata: Penguasa yang perkasa itu, amat berkenan, telah menghadiahkan kepada Bhāradvāja sebuah rumah yang serba lengkap, dihias indah, serta dipenuhi harta dan bijirin.

Verse 4

स ताज्थशिष्यान्‌ महेष्वास: प्रतिजग्राह कौरवान्‌ | पाण्डवान्‌ धार्तराष्ट्रांश् द्रोणो मुदितमानस:,महाधनुर्धर आचार्य द्रोणने प्रसन्नचित्त होकर उन धुृतराष्ट्र-पुत्रों तथा पाण्डवोंको शिष्यरूपमें ग्रहण किया

Vaiśampāyana berkata: Droṇa, pemanah agung, dengan hati yang gembira, menerima para putera itu sebagai murid—baik para Kaurava (anak-anak Dhṛtarāṣṭra) mahupun para Pāṇḍava—lalu memikul tanggungjawab melatih dan mendisiplinkan mereka.

Verse 5

प्रतिगृह्य च तान्‌ सर्वान्‌ द्रोणो वचनमत्रवीत्‌ | रहस्येक: प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा,उन सबको ग्रहण कर लेनेपर एक दिन एकान्तमें जब द्रोणाचार्य पूर्ण विश्वासयुक्त मनसे अकेले बैठे थे, तब उन्होंने अपने पास बैठे हुए सब शिष्योंसे यह बात कही

Setelah menerima mereka semua sebagai murid, Droṇa pun berkata-kata. Kemudian, pada suatu saat yang tertutup—sendirian, dengan keyakinan yang teguh, setelah upacara penerimaan dan penetapan mereka sebagai pelajar selesai—beliau memanggil para murid yang duduk dekatnya dan menyampaikan suatu pesan rahsia.

Verse 6

द्रोण उदाच कार्य मे काड्क्षितं किंचिद्धृदि सम्परिवर्तते | कृतास्त्रैस्तत्‌ प्रदेयं मे तदेतद्‌ वदतानघा:,द्रोण बोले--निष्पाप राजकुमारो! मेरे मनमें एक कार्य करनेकी इच्छा है। अस्त्रशिक्षा प्राप्त कर लेनेके पश्चात्‌ तुमलोगोंको मेरी वह इच्छा पूर्ण करनी होगी। इस विषयमें तुम्हारे क्या विचार हैं, बतलाओ

Droṇa berkata: “Wahai para putera yang tidak bercela, ada suatu tugas yang kuinginkan, berputar-putar dalam hatiku. Setelah kamu benar-benar menguasai senjata, kamu mesti menunaikan permintaanku itu. Katakanlah, apakah fikiran kamu?”

Verse 7

वैशम्पायन उवाच 8 त्वा कौरवेयास्ते तृष्णीमासन्‌ विशाम्पते । अजनसत ततः सर्व प्रतिजज्ञे परंतप,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा जनमेजय! आचार्यकी वह बात सुनकर सब कौरव चुप रह गये; परंतु अर्जुनने वह सब कार्य पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली

Vaiśampāyana berkata: “Wahai tuan bagi sekalian rakyat! Ketika itu para putera Kaurava terdiam di hadapan tuanku. Sesudahnya Arjuna, pembakar musuh, berikrar akan menyempurnakan seluruh tugas itu.”

Verse 8

ततोरर्जुनं तदा मूर्थ्नि समाप्राय पुन: पुन: । प्रीतिपूर्व परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा,तब आचार्यने बारंबार अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर वे हर्षके आवेशमें रो पड़े

Kemudian, berulang kali sang guru mendekat ke kepala Arjuna, menghiduinya sebagai tanda kasih. Baginda memeluknya dengan penuh cinta, lalu menangis—ditenggelami gelora sukacita.

Verse 9

ततो द्रोण: पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च । ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान्‌,तब पराक्रमी द्रोणाचार्य पाण्डवों (तथा अन्य शिष्यों)-को नाना प्रकारके दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा देने लगे

Kemudian Droṇa yang perkasa mula mengajar putera-putera Pāṇḍu (bersama para murid lain) pelbagai jenis senjata dan ilmu peluru—baik yang bersifat dewa mahupun manusia.

Verse 10

राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ । अभिजममुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम्‌,भरतश्रेष्ठ] उस समय दूसरे-दूसरे राजकुमार भी अस्त्रविद्याकी शिक्षा लेनेके लिये द्विजश्रेष्ठ द्रोणके पास आने लगे

Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang termulia dalam keturunan Bharata! Ketika itu putera-putera raja yang lain juga berhimpun lalu pergi kepada Droṇa, yang terunggul antara para Brahmana, untuk memohon ajaran ilmu persenjataan.”

Verse 11

वृष्णयश्चान्धकाश्रैव नानादेश्याश्न पार्थिवा: | सूतपुत्रश्न राधेयो गुरु द्रोणमियात्‌ तदा,वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रिय, नाना देशोंके राजकुमार तथा राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण--ये सभी आचार्य द्रोणके पास (अस्त्र-शिक्षा लेनेके लिये) आये

Vaiśampāyana berkata: Kaum Vṛṣṇi dan Andhaka, bersama para putera raja dari pelbagai negeri, serta Rādheya—Karna, anak seorang kusir—pada ketika itu mendatangi guru Droṇa untuk menerima ajaran ilmu persenjataan.

Verse 12

स्पर्थमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रो5त्यमर्षण: । दुर्योधनं समाश्रित्य सोडवमन्यत पाण्डवान्‌,सूतपुत्र कर्ण सदा अर्जुनसे लाग-डाँट रखता और अत्यन्त अमर्षमें भरकर दुर्योधनका सहारा ले पाण्डवोंका अपमान किया करता था

Vaiśampāyana berkata: Terbakar oleh persaingan terhadap Pārtha (Arjuna), Karṇa—anak kusir, cepat marah dan tidak tahan dipermalukan—berlindung pada sokongan Duryodhana; dan dengan sandaran itu, dia berulang kali menghina para Pāṇḍava.

Verse 13

अभ्ययात्‌ स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्षया । शिक्षाभुजबलोेथ्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डव: । अस्त्रविद्यानुरागाच्च विशिष्टो5भवदर्जुन:,पाण्डुनन्दन अर्जुन (सदा अभ्यासमें लगे रहनेसे) धनुर्वेदकी जिज्ञासा, शिक्षा, बाहुबल और उद्योगकी दृष्टिसे उन सभी शिष्योंमें श्रेष्ठ एवं आचार्य द्रोणकी समानता करनेयोग्य हो गये। उनका अस्त्र-विद्यामें बड़ा अनुराग था, इसलिये वे तुल्य अस्त्रोंके प्रयोग, फुर्ती और सफाईमें भी सबसे बढ़-चढ़कर निकले

Vaiśampāyana berkata: Kemudian Arjuna, putera Pāṇḍu, mendekati Droṇa dengan tekad untuk menguasai ilmu memanah. Dengan latihan berdisiplin, kekuatan lengan, dan usaha yang tidak mengenal lelah, dia menjadi yang terunggul antara semua murid—layak dibandingkan dengan gurunya sendiri. Dan kerana kecintaannya yang mendalam pada ilmu persenjataan, dia mengatasi yang lain dalam penggunaan senjata yang cekap dan pantas.

Verse 14

तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्ठवेषु च । सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिको<र्जुन:,पाण्डुनन्दन अर्जुन (सदा अभ्यासमें लगे रहनेसे) धनुर्वेदकी जिज्ञासा, शिक्षा, बाहुबल और उद्योगकी दृष्टिसे उन सभी शिष्योंमें श्रेष्ठ एवं आचार्य द्रोणकी समानता करनेयोग्य हो गये। उनका अस्त्र-विद्यामें बड़ा अनुराग था, इसलिये वे तुल्य अस्त्रोंके प्रयोग, फुर्ती और सफाईमें भी सबसे बढ़-चढ़कर निकले

Vaiśampāyana berkata: Dalam penggunaan senjata—tatkala latihan adalah setara—baik pada kepantasan mahupun kehalusan gerak, Arjuna, putera Pāṇḍu, terbukti mengatasi semua murid. Dengan latihan yang berterusan dan hasrat yang tajam untuk menguasai ilmu persenjataan, dia bangkit melebihi rakan-rakannya, hingga layak menandingi gurunya sendiri.

Verse 15

ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेष्वमन्यत । एवं सर्वकुमाराणामिष्वस्त्रं प्रत्यपादयत्‌,आचार्य द्रोण उपदेश ग्रहण करनेमें अर्जुनको अनुपम प्रतिभाशाली मानते थे। इस प्रकार आचार्य सब कुमारोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा देते रहे

Vaiśampāyana berkata: Dalam hal menerima ajaran, Droṇa menganggap Arjuna memiliki kecemerlangan yang tiada bandingan, laksana Indra. Demikianlah sang guru Droṇa terus mengajarkan ilmu memanah dan persenjataan kepada semua putera raja.

Verse 16

कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात्‌ । पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात्‌,वे अन्य सब शिष्योंको तो पानी लानेके लिये कमण्डलु देते, जिससे उन्हें लौटनेमें कुछ विलम्ब हो जाय; परंतु अपने पुत्र अश्वत्थामाको बड़े मुँहका घड़ा देते, जिससे उसके लौटनेमें विलम्ब न हो (अत: अभ्वत्थामा सबसे पहले पानी भरकर उनके पास लौट आता था)। जबतक दूसरे शिष्य लौट नहीं आते, तबतक वे अपने पुत्र अश्वत्थामाको अस्त्र- संचालनकी कोई उत्तम विधि बतलाते थे। अर्जुनने उनके इस कार्यको जान लिया

Vaiśampāyana berkata: Kepada semua murid yang lain, dia memberikan kamandalu (bekas air kecil) agar mereka lambat kembali; tetapi kepada anaknya sendiri, Aśvatthāmā, dia memberikan kumbha (tempayan besar) supaya tidak ada kelewatan. Maka Aśvatthāmā pulang terlebih dahulu membawa air, dan sementara menunggu murid-murid lain tiba, sang guru secara diam-diam mengajarkan kepada anaknya kaedah latihan senjata yang lebih unggul. Arjuna mengetahui perbuatan itu.

Verse 17

यावत्‌ ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम्‌ द्रोण आचष्ट पुत्राय तत्‌ कर्म जिष्णुरौहत,वे अन्य सब शिष्योंको तो पानी लानेके लिये कमण्डलु देते, जिससे उन्हें लौटनेमें कुछ विलम्ब हो जाय; परंतु अपने पुत्र अश्वत्थामाको बड़े मुँहका घड़ा देते, जिससे उसके लौटनेमें विलम्ब न हो (अत: अभ्वत्थामा सबसे पहले पानी भरकर उनके पास लौट आता था)। जबतक दूसरे शिष्य लौट नहीं आते, तबतक वे अपने पुत्र अश्वत्थामाको अस्त्र- संचालनकी कोई उत्तम विधि बतलाते थे। अर्जुनने उनके इस कार्यको जान लिया

Vaiśampāyana berkata: Selama para murid lain belum kembali, Droṇa akan mengajarkan kepada puteranya sendiri, Aśvatthāmā, teknik-teknik latihan senjata yang lebih tinggi dan lebih halus. Arjuna (Jiṣṇu) menyedari tingkah laku ini—bahawa sang guru, dengan mengatur agar yang lain terlewat, menyimpan pengajaran istimewa untuk Aśvatthāmā. Peristiwa ini menonjolkan ketegangan etika antara kewajipan seorang guru untuk berlaku adil dan tarikan pilih kasih keluarga, lalu menjadi pemacu tekad Arjuna untuk unggul walau aksesnya tidak seimbang.

Verse 18

ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम्‌ । सममाचार्यपुत्रेण गुरुम भ्येति फाल्गुन:,अतः वे वारुणास्त्रसे तुरंत ही अपना कमण्डलु भरकर आचार्यपुत्रके साथ ही गुरुके समीप आ जाते थे, इसलिये आचार्यपुत्रसे किसी भी गुणकी वृद्धिमें वे अलग या पीछे न रहे। यही कारण था कि मेधावी अर्जुन अश्व॒त्थामासे किसी बातमें कम न रहे। वे अस्त्रवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ थे। अर्जुन अपने गुरुदेवकी सेवा-पूजाके लिये भी उत्तम यत्न करते थे। अस्त्रोंके अभ्यासमें भी उनकी अच्छी लगन थी। इसीलिये वे ट्रोणाचार्यके बड़े प्रिय हो गये

Kemudian Phālguna (Arjuna), dengan menggunakan senjata Varuṇa, segera memenuhi kendi airnya lalu pergi terus menghadap gurunya, seiring langkah dengan putera sang ācārya. Maka dia tidak ketinggalan daripada putera guru itu dalam apa jua pencapaian atau pertambahan kemahiran. Inilah sebabnya Arjuna yang cerdas tidak sedikit pun lebih rendah daripada Aśvatthāmā: dia menjadi yang terunggul antara para ahli senjata, dan melalui khidmat yang tekun serta penghormatan kepada gurunya, disertai latihan yang berterusan, dia menjadi amat dikasihi oleh Droṇa.

Verse 19

आचार्य पुत्रात्‌ तस्मात्‌ तु विशेषोपचयेडपृथक्‌ । न व्यहीयत मेधावी पार्थो5प्यस्त्रविदां वर:,अतः वे वारुणास्त्रसे तुरंत ही अपना कमण्डलु भरकर आचार्यपुत्रके साथ ही गुरुके समीप आ जाते थे, इसलिये आचार्यपुत्रसे किसी भी गुणकी वृद्धिमें वे अलग या पीछे न रहे। यही कारण था कि मेधावी अर्जुन अश्व॒त्थामासे किसी बातमें कम न रहे। वे अस्त्रवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ थे। अर्जुन अपने गुरुदेवकी सेवा-पूजाके लिये भी उत्तम यत्न करते थे। अस्त्रोंके अभ्यासमें भी उनकी अच्छी लगन थी। इसीलिये वे ट्रोणाचार्यके बड़े प्रिय हो गये

Vaiśampāyana berkata: Oleh itu, dalam hal kemajuan istimewa dan penghalusan kemahiran, Pārtha (Arjuna)—walaupun paling cerdas dan yang terbaik antara para ahli senjata—tidak terpisah daripada, dan tidak pula ketinggalan di belakang, putera sang guru. Dengan ketekunan yang berterusan serta khidmat yang setia kepada gurunya, Arjuna menyaingi Aśvatthāman dalam segala hal dan menjadi amat dikasihi oleh Droṇa.

Verse 20

अर्जुन: परमं यत्नमातिष्ठद्‌ गुरुपूजने । अस्त्रे च परम॑ योगं प्रियो द्रोणस्प चाभवत्‌,अतः वे वारुणास्त्रसे तुरंत ही अपना कमण्डलु भरकर आचार्यपुत्रके साथ ही गुरुके समीप आ जाते थे, इसलिये आचार्यपुत्रसे किसी भी गुणकी वृद्धिमें वे अलग या पीछे न रहे। यही कारण था कि मेधावी अर्जुन अश्व॒त्थामासे किसी बातमें कम न रहे। वे अस्त्रवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ थे। अर्जुन अपने गुरुदेवकी सेवा-पूजाके लिये भी उत्तम यत्न करते थे। अस्त्रोंके अभ्यासमें भी उनकी अच्छी लगन थी। इसीलिये वे ट्रोणाचार्यके बड़े प्रिय हो गये

Vaiśampāyana berkata: Arjuna menumpukan usaha yang paling besar untuk memuliakan dan berkhidmat kepada gurunya. Dia juga menekuni disiplin tertinggi dalam latihan senjata; maka dia menjadi amat dikasihi oleh Droṇa. Kisah ini menegaskan bahawa kecemerlangan dalam pembelajaran harus bersatu dengan kerendahan hati dan khidmat yang setia kepada guru, dan bahawa tingkah laku yang berdisiplin demikian secara tabii meraih kepercayaan serta perkenan seorang guru.

Verse 21

त॑ं दृष्टवा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम्‌ । आहूय वचन द्रोणो रह: सूदमभाषत,अर्जुनको धनुष-बाणके अभ्यासमें निरन्तर लगा हुआ देख द्रोणाचार्यने रसोइयेको एकान्तमें बुलाकर कहा--“तुम अर्जुनको कभी अँधेरेमें भोजन न परोसना और मेरी यह बात भी अर्जुनसे कभी न कहना”

Vaiśampāyana berkata: Melihat Phālguna (Arjuna) sentiasa tekun berlatih busur dan anak panah, Droṇa memanggil tukang masak secara sulit lalu berpesan: “Jangan sekali-kali hidangkan makanan kepada Arjuna dalam gelap, dan jangan sekali-kali beritahu Arjuna bahawa ini perintahku.” Peristiwa ini menampakkan bagaimana Droṇa dengan sengaja membentuk disiplin Arjuna—menggunakan keadaan yang terkawal untuk menajamkan kewaspadaan dan penguasaan—namun pada masa yang sama membangkitkan ketegangan etika tentang kerahsiaan dan keberpihakan dalam bimbingan seorang guru.

Verse 22

अन्धकारेअर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन । न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया,अर्जुनको धनुष-बाणके अभ्यासमें निरन्तर लगा हुआ देख द्रोणाचार्यने रसोइयेको एकान्तमें बुलाकर कहा--“तुम अर्जुनको कभी अँधेरेमें भोजन न परोसना और मेरी यह बात भी अर्जुनसे कभी न कहना”

Vaiśampāyana berkata: “Jangan sekali-kali engkau menghidangkan makanan kepada Arjuna dalam kegelapan. Dan jangan pula engkau mendedahkan perintahku ini kepada Arjuna.” Dalam konteksnya, Droṇācārya—setelah melihat Arjuna tekun berlatih busur dan anak panah tanpa henti—memanggil tukang masak secara sulit lalu memerintahkan suatu disiplin yang menguji serta menajamkan kewaspadaan dan penguasaan diri Arjuna, sambil menyembunyikan kaedahnya agar latihan itu tetap berkesan dan berteraskan kecemerlangan, bukan kesombongan.

Verse 23

ततः कदाचिद्‌ भुज्जाने प्रववौ वायुरज्ुने । तेन तत्र प्रदीप: स दीप्यमानो विलोपित:,तदनन्तर एक दिन जब अर्जुन भोजन कर रहे थे, बड़े जोरसे हवा चलने लगी; उससे वहाँका जलता हुआ दीपक बुझ गया

Vaiśampāyana berkata: Pada suatu ketika, ketika Arjuna sedang makan, angin kencang tiba-tiba bertiup. Kerananya, pelita yang sedang menyala di situ pun terpadam—suatu kejadian yang menyiapkan pentas bagi peristiwa seterusnya.

Verse 24

भुड्ुक्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते । हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात्‌,उस समय भी कुन्तीनन्दन अर्जुन भोजन करते ही रहे। उन तेजस्वी अर्जुनका हाथ अभ्यासवश अँधेरेमें भी मुखसे अन्यत्र नहीं जाता था

Namun Arjuna, putera Kuntī, terus makan tanpa berhenti. Bagi wira yang bercahaya itu, tangannya—terlatih oleh amalan yang berterusan—tidak tersasar ke tempat lain; bahkan dalam gelap, ia bergerak tepat ke mulutnya, seolah-olah dipandu oleh disiplin yang telah sebati.

Verse 25

तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डव: । योग्यां चक्रे महाबाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दन:,उसे अभ्यासका ही चमत्कार मानकर महाबाहु पाण्डुनन्दन अर्जुन रातमें भी धनुर्विद्याका अभ्यास करने लगे

Menganggap hal itu semata-mata hasil latihan, putera Pāṇḍu yang berlengan perkasa—Arjuna, sang Pāṇḍava—mula berlatih memanah bahkan pada waktu malam, bertekad menjadikan dirinya benar-benar mahir. Rangkap ini menegaskan bahawa usaha berdisiplin dan pembinaan diri ialah asas etika bagi kecemerlangan, bukan nasib atau bakat semata-mata.

Verse 26

तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोण: शुश्राव भारत । उपेत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत्‌,भारत! उनके धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार द्रोणने सोते समय सुना। तब वे उठकर उनके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर बोले

Vaiśaṃpāyana berkata: Wahai Bhārata, Droṇa mendengar dentingan nyaring tali busur itu, bahkan ketika beliau sedang tidur. Lantas beliau bangun segera, mendekati Arjuna, memeluknya dengan penuh kasih, lalu berkata demikian—tanda perkenan dan pengiktirafan mesra terhadap kesiapsiagaan kepahlawanan sang murid.

Verse 27

द्रोण उदाच प्रयतिष्ये तथा कर्तु यथा नान्यो धरनुर्धर: । त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,द्रोणने कहा--अर्जुन! मैं ऐसा करनेका प्रयत्न करूँगा, जिससे इस संसारमें दूसरा कोई धनुर्धर तुम्हारे समान न हो। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ

Droṇa berkata: “Aku akan berusaha melatihmu sedemikian rupa sehingga di dunia ini tiada pemanah lain yang setara denganmu. Inilah kebenaran yang kukatakan kepadamu.”

Verse 28

वैशम्पायन उवाच ततो द्रोणो<र्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च । रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर द्रोणाचार्य अर्जुनको पुनः घोड़ों, हाथियों, रथों तथा भूमिपर रहकर युद्ध करनेकी शिक्षा देने लगे

Vaiśampāyana berkata: Selepas itu Droṇa sekali lagi melatih Arjuna dalam segala disiplin peperangan—bertarung dari atas kuda, dari atas gajah, dari atas rata, dan juga bertempur berjalan kaki di bumi.

Verse 29

गदायुद्धे$सिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु । द्रोण: संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान्‌,उन्होंने कौरवोंको गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियोंके प्रयोगकी कला एवं एक ही साथ अनेक शशण्त्रोंके प्रयोग अथवा अकेले ही अनेक शत्रुओंसे युद्ध करनेकी शिक्षा दी

Vaiśampāyana berkata: Droṇa melatih para Kaurava dalam pertarungan gada, kemahiran pedang, serta penggunaan lembing, tombak dan senjata śakti; dan dia juga mengajar seni pertempuran jarak dekat yang bercampur—menggunakan pelbagai senjata secara berturutan dengan pantas, dan menghadapi ramai musuh walaupun bertempur seorang diri.

Verse 30

तस्य तत्‌ कौशल श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षव: । राजानो राजपुत्राश्न समाजग्मु: सहस्रश:,द्रोणाचार्यका वह अस्त्रकौशल सुनकर सहस्रों राजा और राजकुमार धरनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये वहाँ एकत्रित हो गये

Vaiśampāyana berkata: Mendengar kemahiran senjata Droṇa yang luar biasa, raja-raja dan putera-putera raja—yang ingin menguasai ilmu memanah—berhimpun di sana beribu-ribu untuk menerima ajaran.

Verse 31

ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुष: सुतः । एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह,महाराज! तदनन्तर निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र एकलव्य द्रोणके पास आया

Kemudian Ekalavya, putera Hiraṇyadhanus, raja kaum Niṣāda, datang menghadap Droṇa.

Verse 32

नसतं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्‌ | शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया,परंतु उसे निषादपुत्र समझकर धर्मज्ञ आचार्यने धनुर्विद्याविषयक शिष्य नहीं बनाया। कौरवोंकी ओर दृष्टि रखकर ही उन्होंने ऐसा किया

Vaiśampāyana berkata: Dengan berfikir, “Dia anak Niṣāda,” guru yang berpegang pada dharma itu tidak menerimanya sebagai murid yang layak dalam ilmu memanah. Dengan pandangan tertumpu semata-mata pada kepentingan para Kaurava, demikianlah beliau bertindak.

Verse 33

स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृहा[ परंतप: । अरण्यमनुसम्प्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम्‌,शत्रुओंको संताप देनेवाले एकलव्यने द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वनमें लौटकर उनकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी तथा उसीमें आचार्यकी परमोच्च भावना रखकर उसने थधर्नुर्विद्याका अभ्यास प्रारम्भ किया। वह बड़े नियमके साथ रहता था

Vaiśampāyana berkata: Namun Ekalavya, penggentar musuh, menundukkan kepala di kaki Droṇa. Lalu kembali ke rimba, dia membentuk arca Droṇa daripada tanah liat dan, dengan menempatkan guru itu pada penghormatan tertinggi di dalam hati, dia memulakan latihan memanah dengan disiplin—hidup di bawah pantang dan aturan yang ketat. Peristiwa ini menonjolkan bhakti dan latihan diri, sambil mengisyaratkan ketegangan etika antara keikhlasan berguru dan penyingkiran sosial.

Verse 34

तस्मिन्नाचार्यवृत्ति च परमामास्थितस्तदा । इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं॑ नियममास्थित:,शत्रुओंको संताप देनेवाले एकलव्यने द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वनमें लौटकर उनकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी तथा उसीमें आचार्यकी परमोच्च भावना रखकर उसने थधर्नुर्विद्याका अभ्यास प्रारम्भ किया। वह बड़े नियमके साथ रहता था

Ketika itu, setelah mengambil sikap dan adab tertinggi seorang murid terhadap gurunya, dia menumpukan diri pada disiplin ilmu memanah dan senjata lontar. Dengan berpegang pada nazar yang ketat serta pengendalian diri, Ekalavya—demi memuliakan Droṇa—menundukkan kepala di kaki guru, kembali ke rimba, membentuk imej ācārya daripada tanah liat, lalu memulakan latihan busur dengan kehadiran guru dianggap paling utama dalam fikirannya.

Verse 35

परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च । विमोक्षादानसंधाने लघुत्वं परमाप सः,आचार्यमें उत्तम श्रद्धा रखकर उत्तम और भारी अभ्यासके बलसे उसने बाणोंके छोड़ने, लौटाने और संधान करनेमें बड़ी अच्छी फुर्ती प्राप्त कर ली

Vaiśampāyana berkata: Dengan iman yang tertinggi dan disokong oleh latihan berdisiplin yang unggul, dia mencapai kepantasan luar biasa dalam seni melepaskan anak panah, menariknya kembali, dan membidik tepat ke sasaran—menunjukkan bahawa penghormatan tulus kepada guru serta latihan yang keras memurnikan kemahiran hingga menjadi penguasaan.

Verse 36

अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाता: कदाचित्‌ कुरुपाण्डवा: | रथैरविनिर्ययु: सर्वे मृगयामरिमर्दन,शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! तदनन्तर एक दिन समस्त कौरव और पाण्डव आचार्य द्रोणकी अनुमतिसे रथोंपर बैठकर (हिंसक पशुओंका) शिकार खेलनेके लिये निकले

Vaiśampāyana berkata: Pada suatu ketika, dengan izin Droṇa, semua kaum Kuru dan para Pāṇḍava berangkat bersama-sama menaiki kereta untuk berburu.

Verse 37

तत्रोपकरणं गृहा नरः कश्चिद्‌ यद्च्छया । राजन्ननुजगामैक: श्वानमादाय पाण्डवान्‌,इस कार्यके लिये आवश्यक सामग्री लेकर कोई मनुष्य स्वेच्छानुसार अकेला ही उन पाण्डवोंके पीछे-पीछे चला। उसने साथमें एक कुत्ता भी ले रखा था

Wahai Raja, pada ketika itu seorang lelaki, setelah mengumpulkan peralatan yang diperlukan dari rumahnya, secara kebetulan telah mengekori para Pāṇḍava—berjalan seorang diri di belakang mereka sambil membawa seekor anjing bersama.

Verse 38

तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया । ध्वा चरन्‌ स वने मूढो नैषादिं प्रति जग्मिवान्‌,वे सब अपना-अपना काम पूरा करनेकी इच्छासे वनमें इधर-उधर विचर रहे थे। उनका वह मूढ़ कुत्ता वनमें घूमता-घामता निषादपुत्र एकलव्यके पास जा पहुँचा

Vaiśampāyana berkata: Ketika mereka merayau di hutan itu, masing-masing berniat menyelesaikan tugasnya sendiri, anjing mereka yang bodoh, berkeliaran di rimba, telah menuju kepada pemuda Niṣāda, Ekalavya.

Verse 39

स कृष्णं मलदिग्धाड़ंं कृष्णाजिनजटाधरम्‌ | नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके,एकलव्यके शरीरका रंग काला था। उसके अंगोंमें मैल जम गया था और उसने काला मृगचर्म एवं जटा धारण कर रखी थी। निषादपुत्रको इस रूपमें देखकर वह कुत्ता भौं-भौं करके भूकता हुआ उसके पास खड़ा हो गया

Vaiśampāyana berkata: Melihat pemuda Niṣāda itu—berkulit gelap, anggota tubuhnya diselaputi kotoran, memakai kulit kijang hitam dan berambut gimbal—anjing itu menyalak kuat lalu berdiri dekat dengannya.

Verse 40

तदा तस्याथ भषत: शुनः सप्त शरान्‌ मुखे । लाघवं दर्शयन्नस्त्रे मुमोच युगपद्‌ यथा,यह देख भीलने अपने अस्त्रलाघवका परिचय देते हुए उस भूकनेवाले कुत्तेके मुखमें मानो एक ही साथ सात बाण मारे

Vaiśampāyana berkata: Ketika anjing itu sedang menyalak, dia melepaskan tujuh batang anak panah ke dalam mulutnya, memperlihatkan kelincahan dan penguasaan senjatanya, seolah-olah dilepaskan serentak.

Verse 41

सतु श्वा शरपूर्णास्य: पाण्डवानाजगाम ह । त॑ दृष्टवा पाण्डवा वीरा: परं विस्मयमागता:,उसका मुँह बाणोंसे भर गया और वह उसी अवस्थामें पाण्डवोंके पास आया। उसे देखकर पाण्डव वीर बड़े विस्मयमें पड़े

Anjing itu, dengan mulutnya penuh anak panah, datang kepada para Pāṇḍava dalam keadaan demikian. Melihatnya, para wira Pāṇḍava amat terperanjat dan hairan.

Verse 42

पक ५ एज 72 ञट 8 3002: 0 / न्ड 9७८ फ़्णू हा # प्रफ्प्र 205 58७ «६६ ३७/::2७ २ //%0८ 3026-5० के के. “जी लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्टवा तत्‌ परमं तदा । प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्वासन्‌ प्रशशंसुश्च सर्वश:,वह हाथकी फुर्ती और शब्दके अनुसार लक्ष्य बेधनेकी उत्तम शक्ति देखकर उस समय सब राजकुमार उस कुत्तेकी ओर दृष्टि डालकर लज्जित हो गये और सब प्रकारसे बाण मारनेवालेकी प्रशंसा करने लगे

Vaiśampāyana berkata: Ketika itu, setelah melihat kelincahan tangan yang tiada bandingan serta kemahiran luar biasa memanah sasaran hanya berpandukan bunyi, para putera memandang kepadanya; mereka berasa malu lalu terdiam. Dari segenap arah, mereka memuji sang pemanah itu.

Verse 43

त॑ ततो<न्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम्‌ | ददृशु: पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान्‌,राजन! तत्पश्चात्‌ पाण्डवोंने उस वनवासी वीरकी वनमें खोज करते हुए उसे निरन्तर बाण चलाते हुए देखा

Kemudian, ketika mereka terus mencari di dalam rimba akan lelaki penghuni hutan itu, para Pāṇḍava—wahai Raja—melihatnya di sana, tidak henti-henti melepaskan anak panah.

Verse 44

न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम्‌ | अथीैनं परिपप्रच्छु: को भवान्‌ कस्य वेत्युत,उस समय उसका रूप बदल गया था। पाण्डव उसे पहचान न सके; अतः पूछने लगे --“तुम कौन हो, किसके पुत्र हो?”

Vaiśampāyana berkata: Pada waktu itu mereka tidak mengenalinya, kerana rupanya telah berubah. Maka mereka menyoalnya dengan teliti: “Siapakah engkau, dan anak siapakah engkau?”

Verse 45

एकलव्य उवाच निषादाधिपतेवीरा हिरण्यधनुष: सुतम्‌ । द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम्‌,एकलव्यने कहा--वीरो! आपलोग मुझे निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र तथा द्रोणाचार्यका शिष्य जानें। मैंने धनुर्वेदमें विशेष परिश्रम किया है

Ekalavya berkata: “Wahai para wira, ketahuilah aku ini putera Hiraṇyadhanuṣ, ketua kaum Niṣāda, dan juga murid Droṇa. Aku telah bersungguh-sungguh berjerih payah dalam ilmu memanah.”

Verse 46

वैशम्पायन उवाच ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवा: | यथावृत्तं वने सर्व द्रोणायाचख्युरद्भुतम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! वे पाण्डवलोग उस निषादका यथार्थ परिचय पाकर लौट आये और वनमें जो अद्भुत घटना घटी थी, वह सब उन्होंने द्रोणाचार्यसे कह सुनायी

Vaiśampāyana berkata: Setelah benar-benar mengetahui siapakah orang Niṣāda itu, para Pāṇḍava pun kembali. Lalu mereka menceritakan kepada Droṇa dengan lengkap peristiwa menakjubkan yang berlaku di dalam rimba—sebagaimana adanya, tanpa disembunyikan atau diputarbelitkan.

Verse 47

कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन्‌ । रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत्‌,जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन बार-बार एकलव्यका स्मरण करते हुए एकान्तमें द्रोणसे मिलकर प्रेमपूर्वक यों बोले

Vaiśampāyana berkata: Wahai Raja Janamejaya, Arjuna putera Kuntī, berkali-kali mengingati Ekalavya, mendekati Droṇa secara bersendirian; lalu dengan kasih hormat, berkata demikian.

Verse 48

अजुन उवाच तदाहं परिरभ्यैक: प्रीतिपूर्वमिदं वच: । भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्धिशिष्टो भविष्यति,अर्जुनने कहा--आचार्य! उस दिन तो आपने मुझ अकेलेको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यह बात कही थी कि मेरा कोई भी शिष्य तुमसे बढ़कर नहीं होगा

Arjuna berkata: “Wahai Ācārya! Pada hari itu engkau memeluk aku seorang diri, lalu dengan sukacita dari hati berkata: ‘Tiada seorang pun muridku akan mengatasi engkau.’”

Verse 49

अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान्‌ । अन्यो<5स्ति भवत: शिष्यो निषादाधिपते: सुत:,फिर आपका यह अन्य शिष्य निषादराजका पुत्र अस्त्र-विद्यामें मुझसे बढ़कर कुशल और सम्पूर्ण लोकसे भी अधिक पराक्रमी कैसे हुआ?

Arjuna berkata: “Kalau begitu, mengapa ada seorang lagi muridmu—anak ketua Niṣāda—yang lebih unggul daripadaku dalam ilmu senjata, bahkan memiliki keperkasaan seakan-akan mengatasi seluruh dunia? Bagaimana hal ini terjadi?”

Verse 50

वैशम्पायन उवाच मुहूर्तमिव त॑ द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्वयम्‌ सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! आचार्य द्रोण उस निषादपुत्रके विषयमें दो घड़ीतक मानो कुछ सोचते-विचारते रहे; फिर कुछ निश्चय करके वे सव्यसाची अर्जुनको साथ ले उसके पास गये

Vaiśampāyana berkata: Wahai Raja Janamejaya, Droṇa seolah-olah berfikir sejenak; kemudian membuat keputusan yang tegas. Dengan membawa Arjuna yang masyhur sebagai Savyasācin, beliau pergi menuju pemuda Naiṣāda itu.

Verse 51

ददर्श मलदिग्धाड़ं जटिलं चीरवाससम्‌ । एकलव्यं धनुष्याणिमस्यन्तमनिशं शरान्‌,वहाँ पहुँचकर उन्होंने एकलव्यको देखा, जो हाथमें धनुष ले निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहा था। उसके शरीरपर मैल जम गया था। उसने सिरपर जटा धारण कर रखी थी और वस्त्रके स्थानपर चिथड़े लपेट रखे थे

Setibanya di sana, mereka melihat Ekalavya: tubuhnya diselaputi kotoran, rambutnya berjuntai jata, dan kain compang-camping melilit tubuhnya menggantikan pakaian. Di tangannya ada busur, dan tanpa henti ia melepaskan anak panah.

Verse 52

एकलव्यस्तु तं दृष्टवा द्रोणमायान्तमन्तिकात्‌ | अभिगम्योपसंगृहा जगाम शिरसा महीम्‌,इधर एकलव्यने आचार्य द्रोणको समीप आते देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और उनके दोनों चरण पकड़कर पृथ्वीपर माथा टेक दिया

Vaiśampāyana berkata: Melihat Droṇa menghampiri dari dekat, Ekalavya melangkah ke hadapan untuk menyambutnya, memegang kedua kaki gurunya dengan penuh hormat, lalu menundukkan kepala hingga menyentuh bumi—tanda kerendahan hati seorang murid dan beratnya ikatan guru–murid yang tidak lama lagi akan diuji oleh persoalan dharma dan keadilan.

Verse 53

पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत्‌ स निषादज: । निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राउ्जलिरग्रत:,फिर उस निषादकुमारने अपनेको शिष्यरूपसे उनके चरणोंमें समर्पित करके गुरु द्रोणकी विधिपूर्वक पूजा की और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया

Vaiśampāyana berkata: Kemudian putera Niṣāda itu memuliakan Droṇa menurut adat dan upacara yang wajar. Setelah menyerahkan dirinya sebagai murid, dia berdiri di hadapan gurunya dengan tangan dirapatkan—gambaran kerendahan hati dan pencarian ilmu yang berdisiplin, di mana kesetiaan kepada pembelajaran dinyatakan melalui adab hormat kepada guru.

Verse 54

ततो द्रोणो<5ब्रवीद्‌ राजन्नेकलव्यमिदं वच: । यदि शिष्योडसि मे वीर वेतनं दीयतां मम

Kemudian Droṇa berkata kepada Ekalavya, “Wahai raja, dengarlah kata-kataku: jika engkau benar-benar muridku, wahai wira, maka berikan kepadaku guru-dakṣiṇā, upah guruku.” Dalam kisah ini, tuntutan itu dibingkaikan sebagai hak yang sah bagi seorang guru, namun ia juga menguji batas keadilan dan kuasa—bagaimana kewibawaan boleh memaksa pengorbanan, dan bagaimana kesetiaan diminta membuktikan dirinya melalui persembahan yang mahal.

Verse 55

एकलव्य उवाच कि प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरु:

Ekalavya berkata, “Wahai yang mulia, apakah yang harus aku persembahkan? Perintahkanlah aku, wahai guru.” Pada saat ini, Ekalavya meletakkan dirinya di bawah kuasa guru, menyatakan kesediaan untuk memberikan apa sahaja yang diminta sebagai tuntutan dharma seorang murid.

Verse 56

वैशम्पायन उवाच तमब्रवीत्‌ त्वयादुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब द्रोणाचार्यने उससे कहा--“तुम मुझे दाहिने हाथका आँगूठा दे दो”

Vaiśampāyana berkata: Lalu Droṇa berkata kepadanya, “Engkau mesti memberikan kepadaku ibu jari tangan kananmu sebagai guru-dakṣiṇā.” Dalam ketegangan etika kisah ini, tuntutan itu menjadi ‘bayaran guru’ yang keras, menguji ketaatan dan menyingkap bagaimana kuasa boleh digunakan untuk menyekat bakat seorang yang berada di luar lingkungan.

Verse 57

एकलव्यस्तु तच्छुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम्‌ | प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्‌ सत्ये च नियत: सदा,द्रोणाचार्यका यह दारुण वचन सुनकर सदा सत्यपर अटल रहनेवाले एकलव्यने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए पहलेकी ही भाँति प्रसन्नमुख और उदारचित्त रहकर बिना कुछ सोच-विचार किये अपना दाहिना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्यको दे दिया

Vaiśampāyana berkata: Mendengar tuntutan Droṇa yang keras, Ekalavya—yang sentiasa teguh pada kebenaran—memelihara ikrarnya sendiri. Tanpa ragu, dengan wajah tenang dan jiwa yang lapang, dia memotong ibu jari kanannya lalu mempersembahkannya kepada Droṇa, memilih setia pada janji yang diikrarkan mengatasi kerugian diri.

Verse 58

तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानस: । छित्त्वाविचार्य तं प्रादाद्‌ द्रोणायाड्गुछ्ठमात्मन:,द्रोणाचार्यका यह दारुण वचन सुनकर सदा सत्यपर अटल रहनेवाले एकलव्यने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए पहलेकी ही भाँति प्रसन्नमुख और उदारचित्त रहकर बिना कुछ सोच-विचार किये अपना दाहिना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्यको दे दिया

Vaiśampāyana berkata: Demikian juga, dengan wajah yang tetap ceria dan hati yang tetap lapang tanpa gundah, Ekalavya—tanpa berhenti untuk menimbang—memotong ibu jarinya sendiri lalu menyerahkannya kepada Droṇa. Dengan itu dia menegakkan ikrarnya, meletakkan kesetiaan pada janji dan penghormatan kepada guru mengatasi kehilangan diri.

Verse 59

228 8 2022 (आय 6 (स सत्यसंध॑ नैषादिं दृष्टवा प्रीतो5ब्रवीदिदम्‌ । एवं कर्तव्यमिति वा एकलव्यमभाषत ।।) ततः शरं तु नैषादिरज्भुलीभिव्यकर्षत । न तथा च स शीघ्रो5भूद्‌ यथा पूर्व नराधिप,द्रोणाचार्य निषादनन्दन एकलव्यको सत्यप्रतिज्ञ देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने संकेतसे उसे यह बता दिया कि तर्जनी और मध्यमाके संयोगसे बाण पकड़कर किस प्रकार धनुषकी डोरी खींचनी चाहिये। तबसे वह निषादकुमार अपनी अँगुलियोंद्वारा ही बाणोंका संधान करने लगा। राजन्‌! उस अवस्थामें वह उतनी शीघ्रतासे बाण नहीं चला पाता था, जैसे पहले चलाया करता था

Vaiśampāyana berkata: Melihat pemuda Niṣāda yang teguh pada ikrarnya, Droṇa—berasa senang—berkata kepada Ekalavya, seolah-olah memberi isyarat, “Beginilah sepatutnya dilakukan.” Sejak itu anak Niṣāda itu menarik tali dan memasang anak panah dengan jari-jarinya sahaja. Namun, wahai raja, dia tidak lagi sepantas dahulu dalam melepaskan panah.

Verse 60

ततोअ्र्जुन: प्रीतमना बभूव विगतज्वर: । द्रोणश्न॒ सत्यवागासीन्नान्योडभिभवितार्जुनम्‌,इस घटनासे अर्जुनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उनकी भारी चिन्ता दूर हो गयी। द्रोणाचार्यका भी वह कथन सत्य हो गया कि अर्जुनको दूसरा कोई पराजित नहीं कर सकता

Kemudian Arjuna menjadi gembira, lenyaplah keresahan yang membakar hatinya. Dan terbuktilah kata-kata Droṇa yang dahulu: tiada seorang pun dapat mengatasi Arjuna.

Verse 61

द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यौ बभूवतु: । दुर्योधनश्न भीमश्न सदा संरब्धमानसौ,उस समय द्रोणके दो शिष्य गदायुद्धमें सुयोग्य निकले--दुर्योधन और भीमसेन। ये दोनों सदा एक-दूसरेके प्रति मनमें क्रोध (स्पर्द्धा)-से भरे रहते थे

Vaiśampāyana berkata: Pada waktu itu, Droṇa mempunyai dua murid yang terbukti paling layak dalam pertarungan gada—Duryodhana dan Bhīmasena. Hati mereka sentiasa menyala, masing-masing memendam marah dan persaingan terhadap yang lain, permusuhan yang kelak menyuburkan pertikaian besar.

Verse 62

अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिको5भवत्‌ | तथाति पुरुषानन्यान्‌ त्सारुकौ यमजावुभौ,अश्वत्थामा धर्नुर्वेदके रहस्योंकी जानकारीमें सबसे बढ़-चढ़कर हुआ। नकुल और सहदेव दोनों भाई तलवारकी मूठ पकड़कर युद्ध करनेमें अत्यन्त कुशल हुए। वे इस कलामें अन्य सब पुरुषोंसे बढ़-चढ़कर थे

Vaiśampāyana berkata: Aśvatthāmā menjadi yang paling unggul antara semuanya dalam ajaran rahsia (teknik-teknik khusus) ilmu memanah. Demikian juga, dua saudara kembar Nakula dan Sahadeva—mahir dalam pertarungan jarak dekat dengan menggenggam hulu pedang—mengatasi lelaki-lelaki lain dalam seni tempur itu. Petikan ini menegaskan bahawa setiap pahlawan menonjol dalam disiplin yang tersendiri; dan keperkasaan yang dilatih dengan benar menjadi sifat penentu dalam kewajipan yang berkembang dalam kehidupan seorang kṣatriya.

Verse 63

युधिष्ठिरो रथश्रेष्ठ: सर्वत्र तु धनंजय: । प्रथित: सागरान्तायां रथयूथपयूथप:,युधिष्ठिर रथपर बैठकर युद्ध करनेमें श्रेष्ठ थे। परंतु अर्जुन सब प्रकारकी युद्ध-कलाओंमें सबसे बढ़कर थे। वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीमें रथयूथपतियोंके भी यूथपतिके रूपमें प्रसिद्ध थे

Yudhiṣṭhira ialah yang terbaik dalam pertempuran di atas kereta perang; namun Dhanañjaya (Arjuna) tersohor dalam segala macam seni peperangan. Namanya masyhur di seluruh bumi hingga ke tepi lautan, sebagai pemimpin kepada para pemimpin pasukan kereta perang.

Verse 64

बुद्धियोगबलोत्साहै: सर्वास्त्रिषु च निष्ठित: । अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टो5भवदर्जुन:,बुद्धि, मनकी एकाग्रता, बल और उत्साहके कारण वे सम्पूर्ण अस्त्र-विद्याओंमें प्रवीण हुए। अस्त्रोंके अभ्यास तथा गुरुके प्रति अनुरागमें भी अर्जुनका स्थान सबसे ऊँचा था

Dengan kebijaksanaan, tumpuan jiwa, kekuatan dan semangat, Arjuna menjadi mahir dalam segala ilmu persenjataan. Dalam latihan senjata serta dalam kasih dan bakti kepada gurunya, Arjuna juga tampil paling unggul.

Verse 65

तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान्‌ । एक: सर्वकुमाराणां बभूवातिरथो<र्जुन:,यद्यपि सबको समानरूपसे अस्त्र-विद्याका उपदेश प्राप्त होता था तो भी पराक्रमी अर्जुन अपनी विशिष्ट प्रतिभाके कारण अकेले ही समस्त कुमारोंमें अतिरथी हुए

Vaiśampāyana berkata: Walaupun ajaran ilmu persenjataan diberikan sama rata kepada semua putera, Arjuna yang gagah—kerana keunggulannya yang luar biasa—seorang diri menjadi atiratha dalam kalangan semua pangeran. Petikan ini menegaskan bahawa peluang yang sama tidak semestinya menghasilkan hasil yang sama; disiplin, bakat terasah dan kekuatan batin mengangkat seseorang kepada penguasaan yang istimewa.

Verse 66

प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनंजयम्‌ । धार्तराष्ट्रा दुरात्मानो नामृष्यन्त परस्परम्‌,धृतराष्ट्रके पुत्र बड़े दुरात्मा थे। वे भीमसेनको बलमें अधिक और अर्जुनको अस्त्रविद्यामें प्रवीण देखकर परस्पर सहन नहीं कर पाते थे

Vaiśampāyana berkata: Anak-anak Dhṛtarāṣṭra berhati jahat. Melihat Bhīmasena mengatasi yang lain dalam kekuatan hayat, dan Dhanañjaya (Arjuna) mahir dalam ilmu persenjataan, mereka tidak dapat menahannya; iri hati dan persaingan menyala dalam diri mereka terhadap para Pāṇḍava.

Verse 67

तांस्तु सर्वान्‌ समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान्‌ । द्रोण: प्रहरणज्ञाने जिज्ञासु: पुरुषर्षभ:,जब सम्पूर्ण धनुर्विद्या तथा अस्त्र-संचालनकी कलामें वे सभी कुमार सुशिक्षित हो गये, तब नरश्रेष्ठ द्रोणने उन सबको एकत्र करके उनके अस्त्रज्ञानकी परीक्षा लेनेका विचार किया

Vaiśampāyana berkata: Setelah semua putera raja itu terlatih sepenuhnya dalam segala cabang ilmu dan dalam sains persenjataan, Droṇa—yang terbaik antara manusia—menghimpunkan mereka, berhasrat menguji dan memastikan kecekapan sebenar mereka dalam pengetahuan serta pengendalian senjata.

Verse 68

कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभि: कृतम्‌ । अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत्‌,उन्होंने कारीगरोंसे एक नकली गीध बनवाकर वृक्षके अग्रभागपर रखवा दिया। राजकुमारोंकों इसका पता नहीं था। आचार्यने उसी गीधको बींधनेयोग्य लक्ष्य बताया

Vaiśampāyana berkata: Dengan menyuruh para tukang membuat seekor burung hering tiruan dan meletakkannya di puncak sebatang pokok, sang guru—tanpa pengetahuan para putera—menunjukkan burung itu sebagai sasaran yang harus ditembusi anak panah.

Verse 69

द्रोण उदाच शीघ्र भवन्त: सर्वेडपि धनूंष्यादाय सर्वश: । भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठ ध्वं संधितेषव:,द्रोण बोले--तुम सब लोग इस गीधको बींधनेके लिये शीघ्र ही धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाकर खड़े हो जाओ

Vaiśampāyana berkata: Droṇa berseru, “Cepat—kamu semua—angkatlah busur masing-masing. Berdirilah bersedia dengan anak panah sudah dipasang pada tali, membidik burung ini.”

Verse 70

मद्वाक्यसमकालं तु शिरो<स्य विनिपात्यताम्‌ | एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रका:,फिर मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही इसका सिर काट गिराओ। पुत्रो! मैं एक-एकको बारी-बारीसे इस कार्यमें नियुक्त करूँगा; तुमलोग मेरे बताये अनुसार कार्य करो

Vaiśaṃpāyana berkata: “Pada saat perintahku diberikan, biarlah kepalanya dipancung hingga jatuh. Aku akan menugaskan kamu seorang demi seorang untuk tugas ini; wahai anak-anakku, lakukan tepat seperti yang aku arahkan.”

Verse 71

वैशम्पायन उवाच ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाज्धिरसां वर: । संधत्स्व बाणं दुर्धर्ष मद्वाक्यान्ते विमुडच तम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर अंगिरागोत्रवाले ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ आचार्य द्रोणने सबसे पहले युधिष्ठिस्से कहा--*दुर्धर्ष वीर! तुम धनुषपर बाण चढ़ाओ और मेरी आज्ञा मिलते ही उसे छोड़ दो”

Vaiśampāyana berkata: Kemudian Droṇa—yang terunggul dalam keturunan Aṅgiras—menyapa Yudhiṣṭhira terlebih dahulu: “Wahai wira yang sukar ditundukkan, pasangkan anak panah pada busurmu; dan apabila perintahku selesai, lepaskanlah.”

Verse 72

ततो युधिष्ठिर: पूर्व धनुर्ग.ह्य परंतप: । तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदित:,तब शत्रुओंको संताप देनेवाले युधिष्ठिर गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो सबसे पहले धनुष लेकर गीधको बींधनेके लिये लक्ष्य बनाकर खड़े हो गये

Maka Yudhiṣṭhira, pembakar musuh, terlebih dahulu mengambil busur lalu berdiri teguh, membidik tepat ke arah burung hering, didorong oleh titah gurunya.

Verse 73

ततो विततथन्‍्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम्‌ । स मुहूर्तादुवाचेदं वचन भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ] तब धनुष तानकर खड़े हुए कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे दो घड़ी बाद आचार्य द्रोणने इस प्रकार कहा--

Kemudian Droṇa, melihat putera Kuru itu berdiri dengan busur yang telah direntang tegang, setelah seketika barulah berkata demikian: “Wahai banteng di antara kaum Bharata.”

Verse 74

पश्यैन॑ त॑ ट्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज । पश्यामीत्येवमाचार्य प्रत्युवाच युधिष्ठिर:,“राजकुमार! वृक्षकी शिखापर बैठे हुए इस गीधको देखो।” तब युधिष्ठिरने आचार्यको उत्तर दिया--“भगवन्‌! मैं देख रहा हूँ

Vaiśampāyana berkata: “Wahai putera raja, lihatlah burung hering yang bertenggek di puncak pokok itu.” Disapa demikian oleh guru, Yudhiṣṭhira menjawab: “Wahai guru yang mulia, hamba melihatnya.”

Verse 75

स मुहूर्तादिव पुनद्रोंणस्तं प्रत्यभाषत । मानो दो घड़ी और बिताकर द्रोणाचार्य फिर उनसे बोले || ७४ $ ।। द्रोण उदाच अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातृन्‌ वापि प्रपश्यसि,द्रोणगने कहा--क्या तुम इस वृक्षको, मुझको अथवा अपने भाइयोंको भी देखते हो?

Selepas seketika lagi, Droṇa berkata kepadanya sekali lagi: “Adakah engkau melihat pokok ini, atau aku, atau juga saudara-saudaramu?”

Verse 76

तमुवाच स कौन्तेय: पश्याम्येनं वनस्पतिम्‌ । भवन्तं च तथा भ्रातृन्‌ भासं चेति पुनः पुनः,यह सुनकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उनसे इस प्रकार बोले--'हाँ, मैं इस वृक्षको, आपको, अपने भाइयोंको तथा गीधको भी बारंबार देख रहा हूँ”

Yudhiṣṭhira, putera Kuntī, menjawab: “Ya—aku berulang kali melihat pokok ini; aku juga melihat tuan guru; demikian juga saudara-saudaraku, dan burung hering itu, lagi dan lagi.”

Verse 77

तमुवाचापसर्पेति द्रोणो5प्रीतमना इव । नैतच्छक्यं त्वया वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन्‌,उनका उत्तर सुनकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन अप्रसन्न-से हो गये और उन्हें झिड़कते हुए बोले, “हट जाओ यहाँसे, तुम इस लक्ष्यको नहीं बींध सकते”

Vaiśampāyana berkata: Droṇa, seolah-olah tidak senang di dalam hati, menegurnya lalu berkata, “Berundur! Engkau tidak mampu menembusi sasaran ini.” Pada saat itu, penilaian sang guru bukanlah dorongan, melainkan penolakan yang tajam—menyingkap ketegangan antara bakat, harapan, dan etika pengajaran dalam gelanggang latihan ketenteraan yang penuh persaingan.

Verse 78

ततो दुर्योधनादींसस्‍्तान्‌ धार्तराष्ट्रानू महायशा: । तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासु: पर्यपृच्छत,तदनन्तर महायशस्वी आचार्यने उसी क्रमसे दुर्योधन आदि धूृतराष्ट्रपुत्रोंको भी उनकी परीक्षा लेनेके लिये बुलाया और उन सबसे उपर्युक्त बातें पूछीं

Kemudian guru yang termasyhur itu memanggil Duryodhana dan putera-putera Dhṛtarāṣṭra yang lain menurut tertib yang sama. Dengan hasrat menguji mereka, beliau menyoal mereka dengan cara yang serupa. Peristiwa ini menegaskan bahawa pengajaran dan penilaian hendaklah dilaksanakan dengan adil tanpa pilih kasih, meskipun perangai para murid dan pilihan mereka kelak dalam hal dharma akan berbeza.

Verse 79

अन्‍्यांश्व शिष्यान्‌ भीमादीन्‌ राज्ञश्वैवान्यदेशजान्‌ | तथा च सर्वे तत्‌ सर्व पश्याम इति कुत्सिता:,उन्होंने भीम आदि अन्य शिष्यों तथा दूसरे देशके राजाओंसे भी, जो वहाँ शिक्षा पा रहे थे, वैसा ही प्रश्न किया। प्रश्नके उत्तरमें सभीने (युधिष्ठिरकी भाँति ही) कहा--“हम सब कुछ देख रहे हैं।! यह सुनकर आचार्यने उन सबको झिड़ककर हटा दिया

Vaiśampāyana berkata: Kemudian beliau mengemukakan soalan yang sama kepada murid-murid lain—Bhīma dan yang selebihnya—serta kepada raja-raja dari negeri lain yang turut belajar di situ. Apabila semuanya menjawab, “Kami melihat segala-galanya,” guru itu menilai jawapan mereka tercela, lalu menegur dan menyuruh mereka berundur. Episod ini menegaskan bahawa sekadar mendakwa melihat atau mampu belum memadai; disiplin menuntut ketajaman pertimbangan, kerendahan hati, dan jawapan yang selaras dengan ujian yang dimaksudkan oleh guru.

Verse 131

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणशिष्यपरीक्षायामेकत्रिंशदाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑ीके अन्तर्गत सम्भवपर्वनें आचार्य द्रोणके द्वारा शिष्योंकी परीक्षासे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Vaiśampāyana berkata: Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, di dalam Ādi Parva—khususnya Sambhava Parva—berakhirlah bab yang ke-131, yang mengisahkan pemeriksaan terhadap murid-murid Droṇa. Rumusan penutup ini menandai tamatnya bahagian tersebut dan membingkai peristiwa itu sebagai ujian awal terhadap watak dan keupayaan, di mana kemahiran dinilai bersama disiplin dan niat yang kelak membentuk pertentangan moral dan peperangan dalam epik ini.

Verse 543

एकलव्यस्तु तच्छुत्वा प्रीयमाणो<ब्रवीदिदम्‌ । राजन! तब द्रोणाचार्यने एकलव्यसे यह बात कही--“वीर! यदि तुम मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरुदक्षिणा दो'। यह सुनकर एकलव्य बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला

Vaiśampāyana berkata: Mendengar kata-kata itu, Ekalavya—penuh kegembiraan—berkata seperti berikut sambil menyapa raja. Saat ini membingkai penerimaan Ekalavya yang bersungguh-sungguh terhadap ikatan guru–murid dan kesediaannya mempersembahkan guru-dakṣiṇā, menonjolkan bakti serta beratnya tuntutan etika untuk taat kepada guru yang dipilihnya.

Verse 556

न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्म॒वित्तम | एकलव्यने कहा--भगवन्‌! मैं आपको क्‍या दूँ? स्वयं गुरुदेव ही मुझे इसके लिये आज्ञा दें। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य! मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो गुरुके लिये अदेय हो

Ekalavya berkata: “Bagi guruku, tiada sesuatu pun yang tidak dapat aku persembahkan. Wahai yang terbaik antara para pengenal Brahman, tiada apa yang aku miliki yang akan aku tahan daripada guru.”

Frequently Asked Questions

The chapter presents the dilemma of political expediency versus kin-protection: a ruler’s claimant employs secrecy, engineered hospitality, and lethal deception to remove rivals while attempting to preserve public legitimacy.

It underscores that intention-guided counsel (mantra) can be used for either protection or harm; ethical evaluation in the epic hinges on motive, means, and foreseeable social consequences, not merely on strategic success.

No explicit phalaśruti appears in this unit; its significance is contextual—serving as a causal hinge that explains later developments by documenting the plan’s formation, execution, and the management of public narrative.