
Adhyāya 3: Indra’s Invitation and Yudhiṣṭhira’s Refusal to Abandon the Dog (Svargārohaṇa Test)
Upa-parva: Svargārohaṇa-saṃvāda (Indra–Yudhiṣṭhira Dialogue on Ascending to Heaven)
Vaiśaṃpāyana describes Indra’s thunderous arrival and invitation for Yudhiṣṭhira to mount the celestial chariot. Seeing his companions fallen, Yudhiṣṭhira requests that his brothers and Draupadī be allowed to accompany him and refuses to seek svarga alone. Indra replies that they have already reached the divine realm after casting off mortal bodies and assures Yudhiṣṭhira of bodily ascent. A further dispute arises over a dog that has remained devoted: Indra urges abandonment, citing heavenly exclusion and alleged loss of merit associated with dogs. Yudhiṣṭhira counters with a structured ethical argument: abandoning a devotee is a grave sin, comparable (in his framing) to major transgressions such as betrayal and harm to protected persons; moreover, he distinguishes his earlier “leaving” of the dead from abandoning the living dependent. Dharma then reveals approval, praising Yudhiṣṭhira’s compassion and recalling earlier tests (e.g., Dvaita-vana episode), declaring his unmatched status and confirming his attainment. Devas and ṛṣis accompany him; Nārada publicly attests the rarity of bodily ascent. Yudhiṣṭhira reiterates his wish to go wherever his brothers and Draupadī have gone, refusing isolated bliss.
Chapter Arc: भाइयों और द्रौपदी के पतन के बाद भी युधिष्ठिर का पग नहीं रुकता; पर स्वर्ग-मार्ग पर देवेन्द्र का साक्षात् आगमन कथा को दिव्य न्यायालय में बदल देता है। → युधिष्ठिर अपने गिरे हुए भ्राताओं को देखकर शोकाकुल होकर इन्द्र से विनती करता है कि वे भी साथ स्वर्ग जाएँ; इन्द्र उत्तर देता है कि वे देह त्यागकर पहले ही स्वर्ग पहुँच चुके हैं, पर युधिष्ठिर को इसी शरीर सहित स्वर्ग-प्रवेश का अधिकार है—एक शर्त के साथ। → इन्द्र जब श्वान को छोड़ देने का संकेत देता है, तब युधिष्ठिर धर्म-प्रतिज्ञा पर अडिग होकर कहता है कि यह श्वान उसका भक्त और शरणागत है; वह उसे त्यागकर स्वर्ग नहीं जाएगा—और वह चार महापापों के समकक्ष ‘भक्त-त्याग’ को मानता है। → युधिष्ठिर स्पष्ट करता है कि उसे अन्य लोक नहीं चाहिए; उसे वही स्थान स्वीकार है जो उसके भ्राताओं और द्रौपदी को मिला है—शुभ हो या पाप। वह देवेन्द्र से पुनः कहता है कि उनके बिना वह वहाँ ठहर नहीं सकता और वहीं जाना चाहता है जहाँ वे गए हैं। → युधिष्ठिर की अडिग करुणा और धर्म-निष्ठा के सामने देवेन्द्र का अगला निर्णय क्या होगा—स्वर्ग का द्वार श्वान सहित खुलेगा या परीक्षा और कठोर होगी?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत गहाप्रस्थानिकपर्वमें द्रौपदी आदिका पतनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥/ २ ॥ अपन क्ाा छा अर: तृतीयो<थध्याय: इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, बिक बने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना वैशम्पायन उवाच ततः सन्नादयन् शक्रो दिवं भूमिं च सर्वश: । रथेनोपययोौ पार्थमारोहेत्यब्रवीच्च तम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर आकाश और पृथ्वीको सब ओरसे प्रतिध्वनित करते हुए देवराज इन्द्र रथके साथ युधिष्ठिरके पास आ पहुँचे और उनसे बोले --'कुन्तीनन्दन! तुम इस रथपर सवार हो जाओ'
ヴァイシャンパーヤナは言った。ついでシャクラ(インドラ)は、天と地を四方に轟かせつつ、戦車をもってパールタ(ユディシュティラ)のもとに近づき、こう告げた。「クンティーの子よ、この戦車に乗れ。」
Verse 2
स्वभातृन् पतितान् दृष्टवा धर्मराजो युधिष्ठिर: । अब्रवीच्छोकसंतप्त: सहस्राक्षमिदं वच:,अपने भाइयोंको धराशायी हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर शोकसे संतप्त हो इन्द्रसे इस प्रकार बोले--
自らの兄弟たちが地に倒れているのを見て、法王ユディシュティラは悲嘆に胸を灼かれ、千眼の神(インドラ)に次のように告げた。
Verse 3
भ्रातर: पतिता मे>त्र गच्छेयुस्ते मया सह । न विना क्षातृभि: स्वर्गमिच्छे गन्तुं सुरेश्वर,'देवेश्वर! मेरे भाई मार्गमें गिरे पड़े हैं। वे भी मेरे साथ चलें, इसकी व्यवस्था कीजिये; क्योंकि मैं भाइयोंके बिना स्वर्गमें जाना नहीं चाहता इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि युधिष्ठिरस्वर्गारोहे तृतीयो5ध्याय:
ユディシュティラは言った。「ここで我が兄弟たちは道の上に倒れた。彼らもまた私と共に行けるよう取り計らってください。兄弟なくして天界に入ることを、私は望みません。」
Verse 4
सुकुमारी सुखारहा च राजपुत्री पुरंदर । सास्माभि: सह गच्छेत तद् भवाननुमन्यताम्,'पुरन्दर! राजकुमारी द्रौपदी सुकुमारी है। वह सुख पानेके योग्य है। वह भी हमलोगोंके साथ चले, इसकी अनुमति दीजिये”
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おおプランダラよ、ドラウパディーはかよわき王女、安楽と恵みにふさわしい。どうか彼女も我らと共に行くことをお許しください。」
Verse 5
शक्र उवाच भ्रातृन् द्रक्ष्यसि स्वर्गे त्वमग्रतस्त्रिदिवं गतान् । कृष्णया सहितान् सर्वान् मा शुचो भरतर्षभ,इन्द्रने कहा--भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे सभी भाई तुमसे पहले ही स्वर्गमें पहुँच गये हैं। उनके साथ द्रौपदी भी है। वहाँ चलनेपर वे सब तुम्हें मिलेंगे
シャクラ(インドラ)は言った。「バラタ族の雄牛よ、嘆くな。天界において、おまえは兄弟たちを見るであろう。彼らはすでにおまえに先んじて神々の世界へ至った。そこにて、おまえは皆を見いだす。クリシュナー(ドラウパディー)も共にいる。」
Verse 6
निक्षिप्य मानुषं देहं गतास्ते भरतर्षभ | अनेन त्वं शरीरेण स्वर्गे गन्ता न संशय:,भरतभूषण! वे मानवशरीरका परित्याग करके स्वर्गमें गये हैं; किंतु तुम इसी शरीरसे वहाँ चलोगे, इसमें संशय नहीं है
シャクラは言った。「バラタ族の雄牛よ、彼らは人の身を捨てて天界へ赴いた。だが、おまえは—バラタの家の栄光—この身のまま天界へ行く。疑いはない。」
Verse 7
युधिछिर उवाच अयं श्वा भूतभव्येश भक्तो मां नित्यमेव ह | स गच्छेत मया सार्धमानृशंस्या हि मे मति:
ユディシュティラは言った。「この犬は、過ぎし時も来たる時も、常に私に忠実であった。彼もまた私と共に行かせてください。私の決意は慈悲と不害に根ざしているのです。」
Verse 8
युधिष्ठिर बोले--भूत और वर्तमानके स्वामी देवराज! यह कुत्ता मेरा बड़ा भक्त है। इसने सदा ही मेरा साथ दिया है; अतः यह भी मेरे साथ चले--ऐसी आज्ञा दीजिये; क्योंकि मेरी बुद्धिमें निष्ठरताका अभाव है ।। शक्र उवाच अमर्त्यत्वं मत्समत्वं च राजन् श्रियं कृत्स्नां महतीं चैव सिद्धिम् । संप्राप्तोड्द्य स्वर्गसुखानि च त्वं त्यज श्वान॑ नात्र नृशंसमस्ति
シャクラ(インドラ)は言った。「王よ、汝は今日、不死を得、我と等しき位に達し、あまねき繁栄と大いなる成就を得た。すでに天界の歓楽に至ったのだ。ゆえにその犬を捨てよ。ここに残酷はない。」
Verse 9
इन्द्रने कहा--राजन! तुम्हें अमरता, मेरी समानता, पूर्ण लक्ष्मी और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई है, साथ ही तुम्हें स्वर्गीय सुख भी उपलब्ध हुए हैं; अतः इस कुत्तेको छोड़ो और मेरे साथ चलो। इसमें कोई कठोरता नहीं है ।। युधिछिर उवाच अनार्यमार्येण सहस्ननेत्र शक््यं कर्तु दुष्करमेतदार्य । मा मे श्रिया सड़मनं तयास्तु यस्या: कृते भक्तजनं त्यजेयम्,युधिष्ठिर बोले--सहसनेत्रधारी देवराज! किसी आर्यपुरुषके द्वारा निम्न श्रेणीका काम होना अत्यन्त कठिन है। मुझे ऐसी लक्ष्मीकी प्राप्ति कभी न हो जिसके लिये भक्तजनका त्याग करना पड़े
ユディシュティラは言った。「千眼の帝釈よ、気高き者が卑しき行いをなすのは、きわめて困難であり—高貴なる者にふさわしくない。忠実な伴侶を捨てねばならぬような繁栄や幸運など、我は決して得たくない。」
Verse 10
इन्द्र उवाच स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति घिष्ण्य- मिष्टापूर्त क्रोधवशा हरन्ति । ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति
インドラは言った。「天界には犬を連れ持つ者の座はない。そのようなものは怒りに駆られて、祭祀や施しによって得た功徳を損なう。ゆえに法王よ、よく思案して決せよ—犬を捨てよ。ここに残酷はない。」
Verse 11
इन्द्रने कहा--धर्मराज! कुत्ता रखनेवालोंके लिये स्वर्गलोकमें स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं; इसलिये सोच-विचारकर काम करो। छोड़ दो इस कुत्तेको। ऐसा करनेमें कोई निर्दयता नहीं है ।। युधिछिर उवाच भक्त त्यागं प्राहुरत्यन्तपापं तुल्यं लोके ब्रह्मुवध्याकृतेन । तस्मान्नाहं जातु कथंचनाद्य त्यक्ष्याम्येनं स्वसुखार्थी महेन्द्र,युधिष्ठिर बोले--महेन्द्र! भक्तका त्याग करनेसे जो पाप होता है, उसका अन्त कभी नहीं होता--ऐसा महात्मा पुरुष कहते हैं। संसारमें भक्तका त्याग ब्रह्महत्याके समान माना गया है; अतः मैं अपने सुखके लिये कभी किसी तरह भी आज इस कुत्तेका त्याग नहीं करूँगा
ユディシュティラは言った。「大帝釈よ、賢者は、帰依して庇護を求めた者を見捨てることは贖い得ぬ罪であり、この世では婆羅門殺しに等しいと説く。ゆえに大帝釈よ、我は己が幸福のために、今日この犬をいかなる形でも捨てはしない。」
Verse 12
भीतं भक्त नान्यदस्तीति चार्त॑ प्राप्तं क्षीणं रक्षणे प्राणलिप्सुम् । प्राणत्यागादप्यहं नैव मोक्तुं यतेयं वै नित्यमेतद् व्रतं मे,जो डरा हुआ हो, भक्त हो, मेरा दूसरा कोई सहारा नहीं है--ऐसा कहते हुए आर्तभावसे शरणमें आया हो, अपनी रक्षामें असमर्थ--दुर्बल हो और अपने प्राण बचाना चाहता हो, ऐसे पुरुषको प्राण जानेपर भी मैं नहीं छोड़ सकता; यह मेरा सदाका व्रत है
ユディシュティラは言った。「たとえ我が命を捨てることになろうとも、恐れと帰依をもって『我には他に頼るところがない』と嘆きつつ庇護を求めて来る者—苦しみ、衰え、自らを守れず、ただ命を保たんとする者—を、我は決して見捨てられぬ。これこそ我が常の誓い、かかる求護者を守らんと常に努めることだ。」
Verse 13
इन्द्र रवाच शुना दृष्ट क्रोधवशा हरन्ति यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च । तस्माच्छुनस्त्यागमिमं कुरुष्व शुनस्त्यागाद् प्राप्स्यसे देवलोकम्,इन्द्रने कहा--वीरवर! मनुष्य जो कुछ दान, यज्ञ, स्वाध्याय और हवन आदि पुण्यकर्म करता है, उसपर यदि कुत्तेकी दृष्टि भी पड़ जाय तो उसके फलको क्रोधवश नामक राक्षस हर ले जाते हैं; इसलिये इस कुत्तेका त्याग कर दो। कुत्तेको त्याग देनेसे ही तुम देवलोकमें पहुँच सकोगे
インドラは言った。「人が功徳によって得たもの――施しとして与えたもの、供犠として捧げたもの、聖なる学習(スヴァーディヤーヤ)で誦したもの、火中に注いだ供物――に、犬がただ視線を向けただけでも、『クローダヴァシャ』と呼ばれる魔の勢力が怒りに任せてその果報を奪い去る。ゆえに、この犬を捨てよ。犬を捨ててこそ、汝は神々の世界に至るのだ。」
Verse 14
त्यक्त्वा भ्रातृन् दयितां चापि कृष्णां प्राप्तो लोक: कर्मणा स्वेन वीर | श्वानं चैनं न त्यजसे कथं नु त्यागं कृत्स्नं चास्थितो मुहा[से5द्य,वीर! तुमने अपने भाइयों तथा प्यारी पत्नी द्रौपदीका परित्याग करके अपने किये हुए पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप देवलोकको प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्तेको क्यों नहीं त्याग देते? सब कुछ छोड़कर अब कुत्तेके मोहमें कैसे पड़ गये
インドラは言った。「勇者よ、汝は兄弟たちを、さらには愛しきクリシュナー(ドラウパディー)さえ捨て、己が功徳によって天界に至った。ならば、なぜこの犬を捨てぬのか。すべてを捨てる完全な出離を選びながら、いまや迷妄に落ちて犬に執着するとは、いかなることか。」
Verse 15
युधिछिर उवाच न विद्यते संधिरथापि विग्रहो मृतैर्मत्यैरिति लोकेषु निष्ठा । न ते मया जीवयितुं हि शक््या- स्ततस्त्यागस्तेषु कृतो न जीवताम्,युधिष्ठिरने कहा--भगवन्! संसारमें यह निश्चित बात है कि मरे हुए मनुष्योंके साथ न तो किसीका मेल होता है न विरोध ही। द्रौपदी तथा अपने भाइयोंको जीवित करना मेरे वशकी बात नहीं है; अतः मर जानेपर मैंने उनका त्याग किया है, जीवितावस्थामें नहीं
ユディシュティラは言った。「尊き御方よ、世に定まった真理として、死者とは和解も敵対も成り立たぬと言われる。ドラウパディーと兄弟たちを生き返らせる力は私にはない。ゆえに私は、彼らが死した後にのみ手放したのであって、生きているうちに捨てたのではない。」
Verse 16
भीतिप्रदानं शरणागतस्य स्त्रिया वधो ब्राह्मणस्वापहार: । मित्रद्रोहस्तानि चत्वारि शक्र भक्तत्यागश्चनैव समो मतो मे
ユディシュティラは言った。「庇護を求めて来た者を脅かすこと、女を殺すこと、バラモンの財を奪うこと、友を裏切ること——この四つは、シャクラよ、重き罪である。だが私の判断では、いずれも信愛(神へのバクティ)を捨てることに比べれば及ばぬ。」
Verse 17
शरणमें आये हुए को भय देना, स्त्रीका वध करना, ब्राह्मणका धन लूटना और मित्रोंके साथ द्रोह करना--ये चार अधर्म एक ओर और भक्तका त्याग दूसरी ओर हो तो मेरी समझमें यह अकेला ही उन चारोंके बराबर है ।। वैशग्पायन उवाच तद् धर्मराजस्य वचो निशम्य धर्मस्वरूपी भगवानुवाच । युधिष्ठिरं प्रीतियुक्तो नरेन्द्र श्ल_्ष्णै्वाक्यै: संस्तवसम्प्रयुक्तै:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरका यह कथन सुनकर कुत्तेका रूप धारण करके आये हुए धर्मस्वरूपी भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और राजा युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए मधुर वचनोंद्वारा उनसे इस प्रकार बोले--
ユディシュティラは言った。「庇護を求めて来た者を脅かすこと、女を殺すこと、バラモンの財を略奪すること、友を裏切ること——この四つの不義が一方にあるとしても、他方にあるのは信徒を見捨てることだ。私の見立てでは、その一事は四つに等しい。」 ヴァイシャンパーヤナは語った。「ジャナメージャヤ王よ、法王ユディシュティラのこの言葉を聞くや、犬の姿で来臨した“法そのもの”なる主は大いに喜ばれた。そしてユディシュティラ王を讃え、柔らかく賞讃に満ちた言葉で、次のように語りかけた……」
Verse 18
धर्मरज उवाच अभिजातोऊसि राजेन्द्र पितुर्व॒त्तेन मेधया । अनुक्रोशेन चानेन सर्वभूतेषु भारत,साक्षात् धर्मराजने कहा--राजेन्द्र! भरतनन्दन! तुम अपने सदाचार, बुद्धि तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति होनेवाली इस दयाके कारण वास्तवमें सुयोग्य पिताके उत्तम कुलमें उत्पन्न सिद्ध हो रहे हो
ダルマラージャは言った。「おお王よ、汝はまことに高貴に生まれた者—高徳なる父の家系にふさわしいことを、正しい行いと叡智、そして一切の生きとし生けるものへの慈悲によって示している。おお、バラタの末裔よ。」
Verse 19
पुरा द्वैतवने चासि मया पुत्र परीक्षित: । पानीयार्थे पराक्रान्ता यत्र ते भ्रातरो हता:
ダルマラージャは言った。「かつてドヴァイタヴァナの森で、わが子よ、私は汝を試した—汝が水を求めて決然と赴いたとき、そこは汝の兄弟たちが討たれて横たわっていた場所であった。」
Verse 20
बेटा! पूर्वकालमें द्वैतववनके भीतर रहते समय भी एक बार मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी; जब कि तुम्हारे सभी भाई पानी लानेके लिये उद्योग करते हुए मारे गये थे ।। भीमार्जुनौ परित्यज्य यत्र त्वं भ्रातरावुभौ । मात्रो: साम्यमभीप्सन् वै नकुलं जीवमिच्छसि
ダルマラージャは言った。「以前、われらがドヴァイタヴァナの森に住んでいた折、私は汝を一度試した—汝の兄弟たちが皆、水を求めて励みながら倒れたその時である。そこで汝は、ビーマとアルジュナを措き、二人の母の間に公平を望んで、ナクラを生かすことを選んだ。」
Verse 21
उस समय तुमने कुन्ती और माद्री दोनों माताओंमें समानताकी इच्छा रखकर अपने सगे भाई भीम और अर्जुनको छोड़ केवल नकुलको जीवित करना चाहा था ।। अयं श्वा भक्त इत्येवं त्यक्तो देवरथस्त्वया । तस्मात् स्वर्गे न ते तुल्य: कश्चिदस्ति नराधिप:
ダルマラージャは言った。「その時、二人の母—クンティーとマードリー—に等しく報いようとして、汝は同母の兄弟ビーマとアルジュナをも措き、ただナクラのみを生かすことを選んだ。さらに『これは忠実な犬である』と告げられても、汝はそれを捨てなかった。ゆえに、王よ、天において汝に比肩する者はない。」
Verse 22
इस समय भी “यह कुत्ता मेरा भक्त है” ऐसा सोचकर तुमने देवराज इन्द्रके भी रथका परित्याग कर दिया है; अतः स्वर्गलोकमें तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा नहीं है ।। अतस्तवाक्षया लोका: स्वशरीरेण भारत । प्राप्तोडसि भरतश्रेष्ठ दिव्यां गतिमनुत्तमाम्,भारत! भरतश्रेष्ठ! यही कारण है कि तुम्हें अपने इसी शरीरसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई है। तुम परम उत्तम दिव्य गतिको पा गये हो
ダルマラージャは言った。「今なお『この犬は我が信徒である』と思い、汝は神々の王インドラの車さえも捨てた。ゆえに天において、汝に等しい王は他にいない。かくして、バラタよ、バラタ族の最勝者よ、汝はこの身のまま不滅の世界を得、比類なき神聖の境地に到ったのだ。」
Verse 23
वैशम्पायन उवाच ततो धर्मक्ष शक्रश्न मरुतश्षाश्विनावपि । देवा देवर्षयश्चैव रथमारोप्य पाण्डवम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--यों कहकर धर्म, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, देवता तथा देवर्षियोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिक्तो रथपर बिठाकर अपने-अपने विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। वे सब-के-सब इच्छानुसार विचरनेवाले, रजोगुणशून्य पुण्यात्मा, पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्मवाले तथा सिद्ध थे
ヴァイシャンパーヤナは語った。ついでダルマとシャクラ(インドラ)は、マルット神群と二柱のアシュヴィン、さらに諸天と天界の聖仙たちとともに、パーンダヴァ(ユディシュティラ)を戦車に乗せた。かくして彼を讃え終えると、彼らはそれぞれの天の乗り物に乗って天界へと旅立った――極限まで試されても揺るがぬダルマは、ついには宇宙の秩序そのものに受け入れられ、守り支えられることを示すのである。
Verse 24
प्रययु: स्वैर्विमानैस्ते सिद्धा: कामविहारिण: । सर्वे विरजस: पुण्या: पुण्यवाग्बुद्धिकर्मिण:,वैशम्पायनजी कहते हैं--यों कहकर धर्म, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, देवता तथा देवर्षियोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिक्तो रथपर बिठाकर अपने-अपने विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। वे सब-के-सब इच्छानुसार विचरनेवाले, रजोगुणशून्य पुण्यात्मा, पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्मवाले तथा सिद्ध थे
ヴァイシャンパーヤナは語った。かくして成就した者たちは、それぞれの天の車に乗って旅立った。意のままに往来し、いずれも無垢にして—欲望の塵を超え—本性は清らかで、言葉・理解・行いのすべてに浄らかさを具えていた。この場面は、真の到達とは力ではなく、内なる澄明と倫理の洗練によって示されることを物語る。
Verse 25
स तं रथं समास्थाय राजा कुरुकुलोदवह: । ऊर्ध्वमाचक्रमे शीघ्रं तेजसा55वृत्य रोदसी,कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर उस रथमें बैठकर अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करते हुए तीव्र गतिसे ऊपरकी ओर जाने लगे
ヴァイシャンパーヤナは語った。その戦車に乗り込むと、クル族の最勝の担い手たる王ユディシュティラは、たちまち速やかに上昇し始めた。自らの功徳と王者の威光の輝きによって、地と天の両方に遍満するかのようであり、ダルマに生きた生涯の成就と、世俗の王権からそれを超える最後の旅への移行を告げていた。
Verse 26
ततो देवनिकायस्थो नारद: सर्वलोकवित् | उवाचोच्चैस्तदा वाक््यं बृहद्वादी बृहत्तपा:,उस समय सम्पूर्ण लोकोंका वृत्तान्त जाननेवाले, बोलनेमें कुशल तथा महान् तपस्वी देवर्षि नारदजीने देवमण्डलमें स्थित हो उच्च स्वरसे कहा--
そのときナーラダは—神々の群れの中にあって万界の事を知り、弁舌にすぐれ、苦行の力も大いなる天界の聖仙—声を高く上げて告げた。この場面は、これより語られることが単なる風聞ではなく、宇宙的知見と道徳的権威に裏打ちされた宣言であることを示している。
Verse 27
ये5पि राजर्षय: सर्वे ते चापि समुपस्थिता: । कीर्ति प्रच्छाद्य तेषां वै कुरुराजो5धितिष्ठति,“जितने राजर्षि स्वर्गमें आये हैं, वे सभी यहाँ उपस्थित हैं, किंतु कुरुगाज युधिष्ठिर अपने सुयशसे उन सबकी कीर्तिको आच्छादित करके विराजमान हो रहे हैं
ヴァイシャンパーヤナは語った。「天界に来た王仙たちは皆ここに集っている。だがクル王(ユディシュティラ)はひときわ高く座し、その一点の曇りもない名声が、彼らすべての誉れを覆い隠すほどである。」
Verse 28
लोकानावृत्य यशसा तेजसा वृत्तसम्पदा । स्वशरीरेण सम्प्राप्तं नान््यं शुश्रुम पाण्डवात्
ヴァイシャンパーヤナは言った。「名声と威光、そして高貴なる行いの富によって諸世界を覆い尽くしたそのパーンダヴァは、自らの身体のまま定められた終着に到達した。彼に別の結末があったとは、われらは聞いていない。」
Verse 29
“अपने यश, तेज और सदाचाररूप सम्पत्तिसे तीनों लोकोंको आवृत करके अपने भौतिक शरीरसे स्वर्गलोकमें आनेका सौभाग्य पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकके सिवा और किसी राजाको प्राप्त हुआ हो, ऐसा हमने कभी नहीं सुना है ।। तेजांसि यानि दृष्टानि भूमिछेन त्वया विभो । वेश्मानि भुवि देवानां पश्यामूनि सहस्रश:
ヴァイシャンパーヤナは言った。「般度の子ユディシュティラを除いて、名声と威光と正しき行いの富によって三界を覆い、しかもこの肉身のまま天界に至るという稀有の幸運を授かった王を、われらはかつて聞いたことがない。おお力ある者よ、今ここに、数知れぬほどの光輝を見よ。地上にあって汝が見たその光は、この道に連なる神々の天宮の住まいである。」
Verse 30
'प्रभो! युधिष्ठिर! पृथ्वीपर रहते हुए तुमने आकाशमें नक्षत्र और ताराओंके रूपमें जितने तेज देखे हैं, वे इन देवताओंके सहस्रों लोक हैं; इनकी ओर देखो” ।। नारदस्य वच: श्रुत्वा राजा वचनमब्रवीत् | देवानामन्त्रय धर्मात्मा स्वपक्षांश्चैव पार्थिवान्,नारदजीकी बात सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने देवताओं तथा अपने पक्षके राजाओंकी अनुमति लेकर कहा--
「主君ユディシュティラよ。地上に住まいし時、汝が天に見た星辰・星宿の輝き――それこそが、これら神々に属する幾千の世界である。そこへ目を向けよ。」ナ―ラダの言葉を聞くと、法に生きる王ユディシュティラは、神々と味方の諸王の同意を得てから、口を開いた――
Verse 31
शुभं वा यदि वा पापं भ्रातृणां स्थानमद्य मे । तदेव प्राप्तुमिच्छामि लोकानन्यान्न कामये
兄弟たちの行き着く先が吉であろうと罪であろうと、われは今日、その同じ境地に至りたい。彼らの世界以外は望まぬ。
Verse 32
'देवेश्वर! मेरे भाइयोंको शुभ या अशुभ जो भी स्थान प्राप्त हुआ हो उसीको मैं भी पाना चाहता हूँ। उसके सिवा दूसरे लोकोंमें जानेकी मेरी इच्छा नहीं है” ।। राज्ञस्तु वचन श्रुत्वा देवराज: पुरंदर: । आनृशंस्यसमायुक्त प्रत्युवाच युधिछ्ठिरम्,राजाकी बात सुनकर देवराज इन्द्रने युधिष्ठिससे कोमल वाणीमें कहा--
「神々の主よ。兄弟たちが得た境地が吉であれ罪であれ、われもまたその境地のみを望む。それ以外の世界へ行きたいとは思わぬ。」王の言葉を聞くと、天帝インドラ――城を滅ぼす者、神々の王――は憐れみに動かされ、ユディシュティラに柔らかな言葉で答えた。
Verse 33
स्थाने5स्मिन् वस राजेन्द्र कर्मभिर्निर्जिते शुभै: । किं त्वं मानुष्यकं स्नेहमद्यापि परिकर्षसि,“महाराज! तुम अपने शुभ कर्माद्वारा प्राप्त हुए इस स्वर्गलोकमें निवास करो। मनुष्यलोकके स्नेहपाशको क्यों अभीतक खींचे ला रहे हो?
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、王の中の最上よ。汝の吉祥なる善業によって勝ち得たこの境に住まえ。なぜ今なお、人界の愛着という絆に執し、それを身の後に引きずっているのか。」
Verse 34
सिद्धि प्राप्तोडसि परमां यथा नान्य: पुमान् क्वचित् | नैव ते भ्रातर: स्थान सम्प्राप्ता: कुरुनन्दन,कुरुनन्दन! तुम्हें वह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है जिसे दूसरा मनुष्य कभी और कहीं नहीं पा सका। तुम्हारे भाई ऐसा स्थान नहीं पा सके हैं
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、クル族の歓びよ。汝は至高の成就に到った――いかなる人も、いかなる処においても、かつて得たことのない成就である。だが汝の兄弟たちは、その同じ境地には至らなかった。」
Verse 35
अद्यापि मानुषो भाव: स्पृशते त्वां नराधिप । स्वर्गोडयं पश्य देवर्षीन् सिद्धांश्व त्रेदिवालयान्,“नरेश्वर! क्या अब भी मानवभाव तुम्हारा स्पर्श कर रहा है? राजन! यह स्वर्गलोक है। इन स्वर्गवासी देवर्षियों तथा सिद्धोंका दर्शन करो”
ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお王よ、人としての限界感が今なお汝に触れているのか。見よ、天界の光景が立ち現れる――天に住まう神仙の聖者たちと、成就者(シッダ)を拝せよ。」
Verse 36
युधिष्ठिरस्तु देवेन्द्रमेवंवादिनमी श्वरम् । पुनरेवाब्रवीद् धीमानिदं वचनमर्थवत्,ऐसी बात कहते हुए ऐश्वर्यशाली देवराजसे बुद्धिमान् युधिष्ठिरने पुनः यह अर्थयुक्त वचन कहा--
ヴァイシャンパーヤナは語った。神々の主インドラがこのように語ると、賢きユディシュティラは、なおも目的の明らかな言葉をもって再び彼に申し述べた――神威の前にあっても、ただ従うのではなく、理にかなったダルマと意味ある言葉に拠って己の歩みを定めることを示したのである。
Verse 37
तैर्विना नोत्सहे वस्तुमिह दैत्यनिबर्हण । गन्तुमिच्छामि तत्राहं यत्र ते भ्रातरो गता:,'दैत्यसूदन! अपने भाइयोंके बिना मुझे यहाँ रहनेका उत्साह नहीं होता; अतः मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कदवाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियोंमें श्रेष्ठ मेरी द्रौपदी गयी है
ユディシュティラは言った。「おお、阿修羅を討つ者よ。兄弟なくしては、ここに留まる気力が私にはない。ゆえに私は、兄弟たちの赴いたところへ行きたい。そこへはまた、背高く、肌は黒く、聡明でサットヴァの徳に満ち、乙女たちの中でも最上の我がドラウパディーも行ったのだ。」
Verse 38
यत्र सा बृहती श्यामा बुद्धिसत्त्वगुणान्विता । द्रौपदी योषितां श्रेष्ठा यत्र चैव गता मम,'दैत्यसूदन! अपने भाइयोंके बिना मुझे यहाँ रहनेका उत्साह नहीं होता; अतः मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कदवाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियोंमें श्रेष्ठ मेरी द्रौपदी गयी है
ヴァイシャンパーヤナは言った。「わたしもまた、わがドラウパディーが赴いたその同じ場所へ行きたい。背は高く、肌は黒みを帯び、智慧とサットヴィカ(清浄)の徳を備え、女たちの中で最もすぐれた者である。」
Whether Yudhiṣṭhira should accept entry to svarga by abandoning a dependent companion (the dog) and proceeding without his fallen kin, or uphold non-abandonment and loyalty even at the cost of heavenly access.
Dharma is validated as consistency: principled care for dependents and refusal to trade integrity for reward is portrayed as superior to compliance with status-based conventions.
Yes in functional form: Dharma’s praise and Nārada’s proclamation act as meta-commentary, marking Yudhiṣṭhira’s bodily ascent as exceptionally rare and framing the episode as a completed dharma-test with confirmatory outcome.