Adhyaya 92
Vana ParvaAdhyaya 9228 Verses

Adhyaya 92

Adharma’s Short-Lived Prosperity and the Restorative Path of Tīrtha (लोमश–युधिष्ठिर संवादः)

Upa-parva: Tīrtha-yātrā Parva (Lomāśa-guided pilgrimage discourse)

Yudhiṣṭhira addresses Lomāśa with a problem of moral perception: he does not consider himself without virtues, yet he is intensely afflicted by suffering; conversely, he observes others—described as lacking qualities and not devoted to dharma—prospering in the world. Lomāśa responds by discouraging despair and explaining a causal sequence: growth through adharma produces an initial appearance of well-being and even competitive victory, but the same adharma culminates in total ruin. To substantiate, he cites daityas and dānavas who rose by unrighteous means and later perished. In a mythic-historical contrast, devas embrace dharma and enter tīrthas, while asuras avoid them; adharma generates pride, pride generates anger, anger erodes modesty and conduct, after which kṣamā (forbearance), dharma, and lakṣmī depart. Misfortune and kali then “enter” the asuric line, leading to swift destruction. The devas, by contrast, approach sacred waters and holy abodes, abandoning sins through tapas, ritual action, gifts, and blessings, thereby attaining welfare. Lomāśa concludes with prescriptive counsel: Yudhiṣṭhira too should bathe at tīrthas with his brothers to regain prosperity; he lists exemplary kings (e.g., Nṛga, Śibi, Bhagīratha, Gaya, Pūru, Purūravas, Ikṣvāku, Mucukunda, Māndhātṛ, Marutta) who attained fame and wealth through ascetic/pilgrimage discipline. Finally, he forecasts that the Dhārtarāṣṭras, overcome by pride and delusion, will meet a fate like the daityas—implying the ethical arc of retribution without prescribing personal retaliation.

Chapter Arc: महर्षि लोमश इन्द्र और अर्जुन का संदेश लेकर युधिष्ठिर के सम्मुख आते हैं—वनवास की धूल में भी स्वर्गीय आश्वासन की चमक उतर आती है। → लोमश युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा और तप-परंपरा का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि वे ‘पुरुष को पवित्र करने वाले’ साधन जानते हैं और पाण्डवों को तीर्थ-पुण्य से जोड़ेंगे; साथ ही इन्द्र के आदेश और अर्जुन के अनुरोध से युधिष्ठिर की रक्षा करते हुए साथ चलने का वचन देते हैं। → युधिष्ठिर लोमश के दर्शन और वचनों से इतने हर्षित होते हैं कि उत्तर नहीं सूझता; फिर स्वीकार करते हैं कि धौम्य के आदेश से वे पहले ही तीर्थयात्रा का संकल्प कर चुके थे—अब यह संकल्प इन्द्र-अर्जुन-संदेश से दिव्य अनुमोदन पा जाता है। → युधिष्ठिर लोमश सहित थोड़े ब्राह्मणों के साथ काम्यक वन में तीन रात्रि ठहरते हैं और तीर्थयात्रा-मार्ग की तैयारी स्थिर होती है; कथा-धारा तीर्थयात्रापर्व में आगे बढ़ने को सज्ज हो जाती है। → तीर्थयात्रा का वास्तविक प्रस्थान और आगे के तीर्थ-क्रम का उद्घाटन अगले अध्यायों के लिए छोड़ दिया जाता है।

Shlokas

Verse 1

#८2:8 #:23:.:7 (0) मपिटम अा८् द्विनवतितमो< ध्याय: महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना लोमश उवाच धनंजयेन चाप्युक्त यत्‌ तच्छृूणु युधिष्ठिर । युधिष्टिरं भ्रातरं मे योजयेर्धर्म्यया श्रिया,लोमश मुनि कहते हैं--युधिष्ठिर! जब मैं आने लगा, तब अर्जुनने भी मुझसे जो बात कही थी, वह सुनो। वे बोले--'तपोधन! आप मेरे बड़े भैया युधिष्ठिरको धर्मानुकूल राजलक्ष्मीसे संयुक्त कीजिये। आप उत्कृष्ट धर्मों और तपस्याओंको जानते हैं। श्रीसम्पन्न राजाओंका जो सनातनधर्म है, उसका भी आपको पूर्ण ज्ञान है

Lomāśa berkata: “Yudhiṣṭhira, dengarkan pula apa yang dikatakan Dhanañjaya (Arjuna) kepadaku. Ia berkata: ‘Wahai pertapa yang kaya tapa, satukanlah kakakku Yudhiṣṭhira dengan kemuliaan kerajaan yang selaras dengan dharma.’”

Verse 2

त्वं हि धर्मान्‌ परान्‌ वेत्थ तपांसि च तपोधन । श्रीमतां चापि जानासि धर्म राज्ञां सनातनम्‌,लोमश मुनि कहते हैं--युधिष्ठिर! जब मैं आने लगा, तब अर्जुनने भी मुझसे जो बात कही थी, वह सुनो। वे बोले--'तपोधन! आप मेरे बड़े भैया युधिष्ठिरको धर्मानुकूल राजलक्ष्मीसे संयुक्त कीजिये। आप उत्कृष्ट धर्मों और तपस्याओंको जानते हैं। श्रीसम्पन्न राजाओंका जो सनातनधर्म है, उसका भी आपको पूर्ण ज्ञान है

Wahai tapodhana, engkau sungguh mengetahui dharma yang tertinggi dan laku-laku tapa. Engkau pun memahami dharma abadi yang menjadi pedoman para raja yang makmur.

Verse 3

स भवान्‌ परम॑ वेद पावन पुरुषं प्रति । तेन संयोजयेथास्त्वं तीर्थपुण्येन पाण्डवान्‌,“पुरुषको पवित्र बनानेवाला जो उत्तम साधन है, उसे आप जानते हैं। अतः आप पाण्डवोंको तीर्थयात्रा-जनित पुण्यसे सम्पन्न कीजिये

Engkau, wahai yang mulia, mengetahui dengan baik sarana tertinggi yang menyucikan manusia. Karena itu, anugerahkanlah kepada para Pāṇḍava pahala kebajikan yang lahir dari ziarah ke tīrtha.

Verse 4

यथा तीर्थानि गच्छेत गाश्न दद्यात्‌ स पार्थिव: । तथा सर्वात्मना कार्यमिति मामर्जुनो5ब्रवीत्‌,“महाराज युधिष्ठिर जिस प्रकार तीर्थो्में जायँ और वहाँ गोदान करें, वैसा सब प्रकारसे प्रयत्न कीजियेगा।” यह बात अर्जुनने मुझसे कही थी

Lomaśa berkata: “Arjuna berkata kepadaku, ‘Wahai Raja, sebagaimana seorang penguasa pergi berziarah ke tirtha-tirtha suci dan di sana mempersembahkan sedekah sapi, demikian pula engkau harus melakukannya dengan segenap jiwa—jadikan itu tekad dan upayamu sepenuhnya.’”

Verse 5

भवता चानुगुप्तोडसौ चरेत्‌ तीर्थानि सर्वश: । रक्षोभ्यो रक्षितव्यश्न दुर्गेषु विषमेषु च

“Dan bila ia berada dalam lindunganmu, biarlah ia mengembara ke semua tirtha. Ia harus dijaga dari para rākṣasa, terutama di daerah yang sukar dan berbahaya.”

Verse 6

उन्होंने यह भी कहा--“महाराज युधिष्ठिर आपसे सुरक्षित रहकर सब तीर्थोमें विचरण करें। दुर्गग स्थानों और विषम अवसरोंमें आप राक्षसोंसे उनकी रक्षा करें ।। दधीच इव देवेन्द्र यथा चाप्यड्धिरा रविम्‌ तथा रक्षस्व कौन्तेयान्‌ राक्षसेभ्यो द्विजोत्तम,'द्विजश्रेष्ठ! जैसे दधीचने देवराज इन्द्रकी और महर्षि अंगिराने सूर्यकी रक्षा की है, उसी प्रकार आप राक्षसोंसे कुन्तीकुमारोंकी रक्षा कीजिये”

Lomaśa berkata: Mereka juga berkata demikian— “Wahai Maharaja Yudhiṣṭhira, biarlah ia mengembara dengan selamat ke semua tirtha di bawah perlindunganmu. Di daerah yang sukar dan pada saat-saat genting, engkau harus menjaganya dari para rākṣasa. Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, sebagaimana Dadhīca melindungi Indra, raja para dewa, dan sebagaimana resi Aṅgirā melindungi Sang Surya, demikian pula lindungilah putra-putra Kuntī dari para rākṣasa.”

Verse 7

यातुधाना हि बहवो राक्षसा: पर्वतोपमा: । त्वयाभिगुप्तं कौन्तेयं न विवर्तेयुरन्तिकम्‌,“बहुत-से पिशाच तथा राक्षस, जो पर्वतोंके समान विशालकाय हैं, आपसे सुरक्षित राजा युधिष्ठिरके पास नहीं आ सकेंगे”

Lomaśa berkata: “Sungguh banyak yātudhāna dan rākṣasa—besar laksana gunung. Namun bila putra Kuntī (Yudhiṣṭhira) berada dalam lindunganmu, mereka takkan berani mendekat.”

Verse 8

सो5हमिन्द्रस्य वचनान्नियोगादर्जुनस्य च | रक्षमाणो भयेभ्यस्त्वां चरिष्यामि त्वया सह,राजन! इस प्रकार मैं इन्द्रके कथन और अर्जुनके अनुरोधसे सब प्रकारके भयसे तुम्हारी रक्षा करते हुए तुम्हारे साथ-साथ तीर्थोमें विचरण करूँगा

Lomaśa berkata: “Maka, atas titah Indra dan juga atas permohonan Arjuna, wahai Raja, aku akan menyertaimu, melindungimu dari segala macam bahaya, saat kita menempuh perjalanan bersama ke tempat-tempat ziarah suci.”

Verse 9

द्विस्तीर्थानि मया पूर्व दृष्टानि कुरुनन्दन । इदं तृतीयं द्रक्ष्यामि तान्येव भवता सह,कुरुनन्दन! पहले दो बार मैंने सब तीर्थोंके दर्शन कर लिये; अब तीसरी बार तुम्हारे साथ पुनः उनका दर्शन करूँगा

Lomaśa berkata: “Wahai kebanggaan wangsa Kuru, dahulu aku telah mengunjungi semua tīrtha itu dua kali. Kini untuk ketiga kalinya aku akan memandang tīrtha-tīrtha yang sama lagi—kali ini bersama engkau.”

Verse 10

इयं राजर्षिभियता पुण्यकृद्धिर्युधिष्ठिर । मन्वादिभिम्महाराज तीर्थयात्रा भयापहा,महाराज युधिष्ठिर! यह तीर्थयात्रा सब प्रकारके भयका नाश करनेवाली है। मनु आदि पुण्यात्मा राजर्षियोंने इस तीर्थयात्रारूपी धर्मका पालन किया है

Lomaśa berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, ziarah suci ini—yang menambah pahala—telah ditempuh para raja-ṛṣi. Wahai maharaja, sejak Manu dan para leluhur saleh lainnya, mereka menjalankan laku dharma berupa perjalanan ke tīrtha; perjalanan demikian melenyapkan rasa takut dan meneguhkan batin dalam kebenaran.”

Verse 11

नानजुर्नाकृतात्मा च नाविद्यो न च पापकृत्‌ स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नर:,कुरुनन्दन! जो सरल नहीं है, जिसने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, जो विद्याहीन और पापात्मा है तथा जिसकी बुद्धि कुटिलतासे भरी हुई है, ऐसा मनुष्य (श्रद्धा न होनेके कारण) तीर्थोंमें स्नान नहीं करता

Lomaśa berkata: “Wahai Kauravya, orang yang tidak lurus, yang belum menaklukkan diri batinnya, yang tanpa pengetahuan sejati, yang berbuat dosa, dan yang pikirannya bengkok—ia tidak sungguh-sungguh mandi di tīrtha. Baginya, ziarah dan pembasuhan hanyalah kosong, sebab iman dan kemurnian batin tidak ada.”

Verse 12

त्वं तु धर्ममतिर्नित्यं धर्मज्ञ: सत्यसंगर: । विमुक्त: सर्वसड्भेभ्यो भूय एव भविष्यसि

Namun engkau senantiasa bertekad pada dharma—memahami kebenaran, teguh dalam ikrar pada satya. Bebas dari segala keterikatan, engkau akan menjadi demikian lagi, bahkan lebih luhur.

Verse 13

तुम तो सदा धर्ममें मन लगाये रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे शून्य हो और आगे भी तुममें अधिकाधिक इन गुणोंका विकास होगा ।। यथा भगीरथो राजा राजानश्न गयादय: । यथा ययाति: कौन्तेय तथा त्वमपि पाण्डव

Lomaśa berkata: “Engkau senantiasa menambatkan pikiran pada dharma—mengerti yang benar, teguh pada ikrar satya, dan bebas dari segala keterikatan. Keutamaan-keutamaan ini akan tumbuh makin besar dalam dirimu. Seperti Raja Bhagiratha, seperti para raja Nala dan Gaya, dan seperti Yayati, wahai putra Kunti—demikian pula engkau, wahai Pandava, akan termasyhur.”

Verse 14

कुन्तीकुमार पाण्डुनन्दन! जैसे राजा भगीरथ हो गये हैं, जैसे गय आदि राजर्षि हो चुके हैं तथा जैसे महाराज ययाति हुए हैं, वैसे ही तुम भी विख्यात हो ।। युधिछिर उवाच न हर्षात्‌ सम्प्रपश्यामि वाक्यस्यास्योत्तरं क्वचित्‌ | स्मरेद्धि देवराजो यं को नामाभ्यधिकस्तत:

Yudhiṣṭhira berkata: “Diliputi sukacita, aku sama sekali tak menemukan jawaban yang pantas bagi kata-kata ini. Sebab orang yang diingat oleh raja para dewa—siapakah yang mungkin lebih unggul darinya?”

Verse 15

युधिष्ठिर बोले--महर्ष! आपके दर्शन और आपकी बातोंके सुननेसे मुझे इतना अधिक हर्ष हुआ है कि मुझे इन वचनोंका कोई उत्तर नहीं सूझता। देवराज इन्द्र जिसका स्मरण करते हों उससे बढ़कर इस संसारमें कौन है? ।। भवता संगमो यस्य भ्राता चैव धनंजय: । वासव: स्मरते यस्य को नामाभ्यधिकस्तत:,जिसे आपका संग प्राप्त हो, जिसके अर्जुन-जैसा भाई हो और जिसे इन्द्र याद करते हों, उससे बढ़कर सौभाग्यशाली और कौन है?

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai resi, berjumpa denganmu dan mendengar kata-katamu membuatku begitu bersukacita hingga aku tak menemukan jawaban yang pantas. Di dunia ini, siapa yang lebih agung daripada orang yang diingat oleh Indra sendiri? Sebab dia yang memperoleh pergaulanmu, yang memiliki Dhanañjaya (Arjuna) sebagai saudara, dan yang diingat oleh Vāsava (Indra)—siapa yang dapat lebih beruntung atau lebih mulia darinya?”

Verse 16

यच्च मां भगवानाह तीर्थानां दर्शन प्रति । धौम्यस्य वचनादेषा बुद्धि: पूर्व कृतेव मे

Yudhiṣṭhira berkata: “Dan apa yang disampaikan oleh Yang Mulia kepadaku tentang menziarahi tīrtha-tīrtha pun sungguh tepat. Tekad ini telah bangkit dalam diriku berkat nasihat Dhaumya, seakan-akan telah ditetapkan oleh perbuatan-perbuatanku yang lampau.”

Verse 17

भगवन्‌! आपने मुझे तीर्थोंके दर्शनके लिये जो उत्साह प्रदान किया है, वह ठीक है। मैंने पहलेसे ही धौम्यजीके आदेशसे तीर्थोमें जानेका विचार कर रखा है ।। तद्‌ यदा मन्यसे ब्रह्मन्‌ गमन तीर्थदर्शने तदैव गन्तास्मि तीर्थान्यिष मे निश्चय: पर:,अतः ब्रह्म! आप जब ठीक समझें तभी मैं तीर्थोंके दर्शनके लिये चल दूँगा; यही मेरा अन्तिम निश्चय है

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang mulia, dorongan yang engkau berikan kepadaku untuk menziarahi tīrtha-tīrtha sungguh tepat. Bahkan sebelumnya pun—atas perintah Dhaumya—aku telah menetapkan niat untuk berziarah. Karena itu, wahai Brahmana, kapan pun engkau menilainya patut bagiku untuk berangkat melihat tīrtha-tīrtha, pada saat itu juga aku akan berangkat. Inilah tekadku yang teguh dan terakhir.”

Verse 18

वैशम्पायन उवाच गमने कृतबुद्धि तु पाण्डवं लोमशो<ब्रवीत्‌ | लघुर्भव महाराज लघु: स्वैरं गमिष्यसि,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तीर्थयात्राके लिये जिन्होंने निश्चित विचार कर लिया था, उन पाण्डु-नन्दन युधिष्ठिरसे महर्षि लोमशने कहा--“महाराज! लोकसमूहसे आप हलके हो जाइये--थोड़े ही लोगोंको साथ रखिये; क्योंकि थोड़े संगी-साथी होनेपर आप इच्छानुसार सर्वत्र जा सकेंगे

Vaiśampāyana berkata: Ketika sang Pāṇḍava telah meneguhkan tekad untuk berangkat, resi Lomaśa berkata kepadanya: “Wahai raja agung, berjalanlah dengan ringan—kurangi kerumunan di sekelilingmu dan bawalah hanya beberapa pendamping; sebab bila engkau tak terbebani, engkau akan dapat bergerak bebas ke mana pun sesuai kehendakmu.”

Verse 19

युधिछिर उवाच भिक्षाभुजो निवर्तन्तां ब्राह्मणा यतयश्न ये । क्षुत्तृडध्वश्रमायासशीतार्तिमसहिष्णव:,युधिष्ठिर बोले--जो भिक्षाभोजी ब्राह्मण और संन्यासी हैं तथा जो भूख-प्यास, परिश्रम-थकावट और सर्दीकी पीड़ा सहन न कर सकें, उन्हें लौट जाना चाहिये

Yudhiṣṭhira berkata: “Biarlah para brāhmaṇa dan pertapa yang hidup dari sedekah itu kembali—mereka yang tak sanggup menahan lapar dan dahaga, beratnya perjalanan, letih dan payah, serta pedihnya dingin.”

Verse 20

ते सर्वे विनिवर्तन्तां ये च मिष्टभुजो द्विजा: । पक्‍्वान्नलेहापानानां मांसानां च विकल्पका:,जो द्विज मिष्टान्नभोजी हैं वे भी लौट जायँ। जो पक्वान्न, चटनी, पेय पदार्थ और मांस आदि खानेवाले मनुष्य हों, वे भी लौट जायूँ

Yudhiṣṭhira berkata: “Biarlah para dwija yang gemar makanan manis pun kembali. Dan biarlah mereka juga kembali—yang memilih-milih dan mencari ragam hidangan matang, lauk penyedap, minuman, serta daging.”

Verse 21

तेडपि सर्वे निवर्तन्तां ये च सूदानुयायिन: । मया यथोचिताजीव्यै: संविभक्ताश्न वृत्तिभि:,जो लोग रसोइयोंकी अपेक्षा रखनेवाले हैं तथा जिन्हें मैंने अलग-अलग बाँटकर उचित- उचित आजीविकाकी व्यवस्था कर दी है, वे सब लोग घर लौट जायेँ

Yudhiṣṭhira berkata: “Biarlah mereka juga pulang—mereka yang bergantung pada para juru masak, dan mereka yang telah kuatur bagi masing-masingnya penghidupan yang layak, dengan pembagian nafkah dan pekerjaan yang semestinya.”

Verse 22

ये चाप्यनुरता: पौरा राजभक्तिपुर:सरा: । धृतराष्ट्र महाराजमभिगच्छन्तु ते च वै,जो पुरवासी राजभक्तिवश मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं, वे अब महाराज धूृतराष्ट्रके पास चले जायँ। वे उनके लिये यथासमय समुचित आजीविका प्रदान करेंगे। यदि राजा धृतराष्ट्र उचित जीविकाकी व्यवस्था न करें तो पांचालनरेश ट्रुपद हमारा प्रिय और हित करनेके लिये अवश्य आपलोगोंको जीविका देंगे

Yudhiṣṭhira berkata: “Dan hendaklah para warga kota yang setia—yang mengikuti aku karena bakti kepada raja—kini pergi menghadap Mahārāja Dhṛtarāṣṭra. Pada waktunya ia akan memberi mereka penghidupan yang patut. Namun bila sang raja tidak mengatur nafkah yang semestinya, maka Raja Drupada dari Pāñcāla—sahabat yang kita kasihi dan menghendaki kebaikan kita—pasti akan menanggung kalian semua.”

Verse 23

स दास्यति यथाकालमुचिता यस्य या भृति: । स चेद्‌ यथोचितां वृत्तिं न दद्यान्मनुजेश्वर:,जो पुरवासी राजभक्तिवश मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं, वे अब महाराज धूृतराष्ट्रके पास चले जायँ। वे उनके लिये यथासमय समुचित आजीविका प्रदान करेंगे। यदि राजा धृतराष्ट्र उचित जीविकाकी व्यवस्था न करें तो पांचालनरेश ट्रुपद हमारा प्रिय और हित करनेके लिये अवश्य आपलोगोंको जीविका देंगे

Yudhiṣṭhira berkata: “Ia akan memberikan, pada waktunya, pemeliharaan yang layak bagi tiap orang sesuai bagiannya. Namun bila sang penguasa manusia itu tidak memberikan penghidupan yang semestinya, maka Raja Drupada dari Pāñcāla—sahabat yang kita kasihi dan menghendaki kebaikan kita—pasti akan menanggung nafkah kalian.”

Verse 24

अस्मत्प्रियहितार्थाय पाज्चाल्यो व: प्रदास्यति,जो पुरवासी राजभक्तिवश मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं, वे अब महाराज धूृतराष्ट्रके पास चले जायँ। वे उनके लिये यथासमय समुचित आजीविका प्रदान करेंगे। यदि राजा धृतराष्ट्र उचित जीविकाकी व्यवस्था न करें तो पांचालनरेश ट्रुपद हमारा प्रिय और हित करनेके लिये अवश्य आपलोगोंको जीविका देंगे

Yudhiṣṭhira berkata: “Demi kasih kepada kami dan demi kebaikan kami, raja Pāñcāla akan menanggung kalian. Para warga kota yang, karena kesetiaan kepada raja, telah mengikuti di belakangku—sekarang pergilah kepada Maharaja Dhṛtarāṣṭra. Pada waktunya ia akan menganugerahkan penghidupan yang layak. Dan bila Dhṛtarāṣṭra tidak mengatur penghidupan yang semestinya, maka Drupada, penguasa Pāñcāla, pasti akan menopang kalian demi kasih kepada kami dan demi kebaikan kalian.”

Verse 25

वैशमग्पायन उवाच ततो भूयिष्ठश: पौरा गुरुभारप्रपीडिता: । विप्राश्न॒ यतयो मुख्या जम्मुर्नागपुरं प्रति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब बहुत-से नागरिक, ब्राह्मण और यति मानसिक दु:खके भारी भारसे पीड़ित हो हस्तिनापुरको चले गये

Vaiśaṃpāyana berkata: Kemudian banyak warga kota—terhimpit oleh beban duka yang berat—bersama para brāhmaṇa dan pertapa utama, berangkat menuju Nāgapura (Hastināpura).

Verse 26

तान्‌ सर्वान्‌ धर्मराजस्य प्रेम्णा राजाम्बिकासुत: । प्रतिजग्राह विधिवद्‌ धनैश्व समतर्पयत्‌,अम्बिकानन्दन राजा धुृतराष्ट्रने धर्मराज युधिष्ठिरके स्नेहवश उन सबको विधिपूर्वक अपनाया और उन्हें धन देकर तृप्त किया

Vaiśaṃpāyana berkata: Karena kasihnya kepada Dharmarāja Yudhiṣṭhira, sang raja—putra Ambikā (Dhṛtarāṣṭra)—menerima mereka semua menurut tata yang semestinya dan memuaskan mereka dengan menganugerahkan harta.

Verse 27

ततः कुन्तीसुतो राजा लघुभिन्रह्णै: सह । लोमशेन च सुप्रीतस्त्रिरात्रं काम्यकेडवसत्‌,तदनन्तर कुन्तीनन्दन राजा युधिष्छिर थोड़े-से ब्राह्मणों और लोमशजीके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक तीन राततक काम्यक वनमें टिके रहे

Sesudah itu, sang raja—putra Kuntī (Yudhiṣṭhira)—dengan hati yang sangat tenteram, tinggal tiga malam di hutan Kāmyaka bersama beberapa brāhmaṇa dan resi Lomaśa.

Verse 92

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां द्विनवतितमो<ध्याय:

Demikian berakhir bab ke-92 dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, pada bagian Tīrtha-yātrā, khususnya dalam kisah penuturan ziarah suci oleh Lomaśa.

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira confronts an apparent contradiction: his own suffering despite dharma-oriented intent versus the visible flourishing of those who appear non-dharmic, raising the problem of how moral causality operates in lived time.

Prosperity acquired through adharma is structurally unstable because it cultivates inner corruption (pride, anger, shamelessness) that expels kṣamā, dharma, and lakṣmī; sustained dharma supported by tīrtha, tapas, and right action restores welfare and reputation.

There is no formal phalaśruti formula; the chapter instead provides pragmatic soteriological framing by presenting tīrtha-observance and dharma as a “sanātana” (enduring) path to regain śrī (prosperity) and śreyas (well-being).