Adhyaya 79
Vana ParvaAdhyaya 7929 Verses

Adhyaya 79

Kāmyake Arjuna-viyogaḥ — The Pandavas’ despondency in Kāmyaka during Arjuna’s absence

Upa-parva: Kāmyaka-vana-vihāra (Episode of life in Kāmyaka Forest during Arjuna’s absence)

Janamejaya inquires how the Pandavas fared in Kāmyaka Forest once Arjuna (Savyasācin/Dhanaṃjaya), regarded as their chief martial support, had departed. Vaiśaṃpāyana replies that the brothers became sorrow-oriented and unsettled, likened to beads with a displaced thread or birds with clipped wings; even the forest appears diminished without him. Despite this emotional and strategic deficit, the Pandavas continue their responsibilities: they procure forest food and hunt suitable (medhya) animals with clean arrows, then present provisions to Brahmins on a regular basis. Draupadī, remembering her absent husband, states that the flowering forest and the land itself seem empty without Arjuna; she recalls his presence through the sound of his bow and his distinctive vigor. Bhīma responds by affirming her sentiments and describing Arjuna’s formidable arms as the basis of collective confidence. Nakula and Sahadeva add recollections of Arjuna’s achievements (including acquisition of horses and earlier exploits connected with the Rājasūya context), and Sahadeva notes his distress upon seeing Arjuna’s empty seat. The chapter closes with expressed preference for leaving the forest, since Kāmyaka no longer appears agreeable without Arjuna.

Chapter Arc: नलोपाख्यान के उपसंहार की उजली छाया में युधिष्ठिर के मन में एक नया प्रकाश उतरता है—द्यूतविद्या का रहस्य जानकर वे पहली बार भीतर से दृढ़ और प्रसन्न होते हैं। → अर्जुन-वियोग से दग्ध हृदय वाले युधिष्ठिर (पूर्व श्लोक-संदर्भ) ब्राह्मणों से विविध ज्ञान पूछते रहे थे; अब नल की कथा से उन्हें यह बोध मिलता है कि विपरीत दैव और अस्थिर पुरुषार्थ के बीच भी धैर्य, नीति और विद्या मनुष्य को पुनः उठाती है। यह सीख उनके वर्तमान वनवास-जीवन पर सीधे लागू होती है। → युधिष्ठिर का ‘प्रतिगृह्याक्षहृदयं’—अक्ष-हृदय (द्यूत का मर्म) को ग्रहण करना—कथा का निर्णायक क्षण बनता है: हार की स्मृति पर विजय का पहला आंतरिक संकेत, और भविष्य के लिए विवेकपूर्ण तैयारी। → भीमसेन आदि भाइयों के साथ युधिष्ठिर हृष्टमन होते हैं; नलोपाख्यान का ‘महत्त्व’ (कीर्तन-श्रवण से आश्वासन, धैर्य, और विद्या का फल) युधिष्ठिर के शोक को नीति में रूपांतरित करता है। → अर्जुन की तपस्या और उसके लक्ष्य की ओर कथा का ध्यान मुड़ने की भूमिका बनती है—अब प्रश्न यह है कि यह नव-प्राप्त धैर्य और ज्ञान पाण्डवों को किस अगले उपाय तक ले जाएगा।

Shlokas

Verse 1

हि आय ० (0) है 2 एकोनाशीतितमो< ध्याय: राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्व मुनिका युधिषछ्तटिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताकर जाना बृहदश्च उवाच प्रशान्ते तु पुरे हृष्टे सम्प्रवृत्ते महोत्सवे । महत्या सेनया राजा दमयन्तीमुपानयत्‌,बृहदश्च मुनि कहते हैं--युधिष्ठिर! जब नगरमें शान्ति छा गयी और सब लोग प्रसन्न हो गये, सर्वत्र महान्‌ उत्सव होने लगा, उस समय राजा नल विशाल सेनाके साथ जाकर दमयन्तीको विदर्भदेशसे बुला लाये

Bṛhadaśva berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, ketika kedamaian telah menaungi kota, rakyat bersukacita, dan perayaan agung berlangsung di segala penjuru, saat itulah Raja Nala, bersama bala tentara yang besar, pergi ke negeri Vidarbha dan membawa Damayantī kembali.”

Verse 2

दमयन्तीमपि पिता सत्कृत्य परवीरहा । प्रास्थापयदमेयात्मा भीमो भीमपराक्रम:,दमयन्तीके पिता भयंकर पराक्रमी भीम अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न थे, शत्रुपक्षके वीरोंका हनन करनेमें समर्थ थे। उन्होंने अपनी पुत्री दमयन्तीको बड़े सत्कारके साथ विदा किया

Ayah Damayantī, Bhīma—berkekuatan tak terukur, berkeperkasaan dahsyat, dan penumpas para jawara musuh—memuliakannya menurut tata upacara, menganugerahkan hadiah dan pemberian, lalu melepas putrinya dengan kehormatan sepantasnya.

Verse 3

आगतायां तु वैदर्भ्या सपुत्रायां नलो नृपः । वर्तयामास मुदितो देवराडिव नन्दने,पुत्र और पुत्रीसहित दमयन्तीके आ जानेपर राजा नल सब बर्ताव-व्यवहार बड़े आनन्दसे सम्पन्न करने लगे। जैसे नन्‍्दनवनमें देवराज इन्द्र शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे जम्बूद्वीपके समस्त राजाओंमें प्रकाशमान हो रहे थे। वे महायशस्वी नरेश अपने राज्यको पुनः वापस लेकर उसका न्यायपूर्वक शासन करने लगे

Ketika putri Vidarbha, Damayantī, datang bersama putranya, Raja Nala bersukacita. Dengan hati gembira ia kembali menegakkan tata laku raja—dharma dan jamuan kehormatan—seraya bersinar di antara para raja laksana Indra di taman Nandana.

Verse 4

तथा प्रकाशतां यातो जम्बुद्वीपे स राजसु । पुन: शशास तदू्‌ राज्यं प्रत्याहृत्य महायशा:,पुत्र और पुत्रीसहित दमयन्तीके आ जानेपर राजा नल सब बर्ताव-व्यवहार बड़े आनन्दसे सम्पन्न करने लगे। जैसे नन्‍्दनवनमें देवराज इन्द्र शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे जम्बूद्वीपके समस्त राजाओंमें प्रकाशमान हो रहे थे। वे महायशस्वी नरेश अपने राज्यको पुनः वापस लेकर उसका न्यायपूर्वक शासन करने लगे

Demikianlah ia tampil menonjol di antara para raja Jambūdvīpa. Sang raja yang termasyhur itu, setelah merebut kembali kerajaannya, kembali memerintahinya.

Verse 5

ईजे च विविधैर्यज्नैरविधिवच्चाप्तदक्षिणै: । तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुह्दद्‌ यक्ष्यसेडचिरात्‌,उन्होंने पर्याप्त दक्षिणासे युक्त विविध प्रकारके यज्ञोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान्‌का यजन किया। राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी पुनः अपना राज्य पाकर सुहृदोंसहित शीघ्र ही यज्ञका अनुष्ठान करोगे

Ia melaksanakan pemujaan melalui beragam yajña, sesuai tata upacara dan disertai dakṣiṇā yang layak. Demikian pula, wahai raja utama, engkau pun—bersama para sahabat setiamu—tak lama lagi akan menyelenggarakan yajña kembali setelah merebut kerajaanmu.

Verse 6

दुःखमेतादृशं प्राप्तो नल: परपुरंजय: । देवनेन नरश्रेष्ठ सभायों भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! पुरुषोत्तम! शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज नल जूआ खेलनेके कारण अपनी पत्नीसहित इस प्रकारके महान्‌ संकटमें पड़ गये थे

Bṛhadaśva berkata: “Wahai insan terbaik, wahai banteng di antara keturunan Bharata—yang termulia di garis Bharata, yang terunggul di antara para pria—Raja Nala, penakluk kota-kota musuh, jatuh ke dalam duka yang demikian. Karena perjudian di balairung kerajaan, ia terjerumus ke dalam malapetaka besar bersama istrinya.”

Verse 7

एकाकिनैव सुमहन्नलेन पृथिवीपते । दुःखमासादितं घोरें प्राप्तश्चाभ्युदय: पुन:,पृथ्वीपते! राजा नलने अकेले ही यह भयंकर और महान्‌ दु:ख प्राप्त किया था; उन्हें पुनः अभ्युदयकी प्राप्ति हुई

Bṛhadaśva berkata: “Wahai penguasa bumi, Raja Nala, meski seorang diri, jatuh ke dalam duka yang mengerikan dan amat berat; namun kemudian ia meraih kemakmuran kembali.”

Verse 8

त्वं पुनर्भावृसहित:ः कृष्णया चैव पाण्डव । रमसे5स्मिन्‌ महारण्ये धर्ममेवानुचिन्तयन्‌,पाण्डुनन्दन! तुम तो अपने सभी भाइयों और महारानी द्रौपदीके साथ इस महान्‌ वनमें भ्रमण करते हो और निरन्तर धर्मके ही चिन्तनमें लगे रहते हो

Bṛhadaśva berkata: “Namun engkau, wahai Pāṇḍava—bersama saudara-saudaramu dan bersama Kṛṣṇā (Draupadī)—mengembara di rimba yang luas ini, tinggal di sini sambil senantiasa merenungkan dharma, wahai putra Pāṇḍu.”

Verse 9

ब्राह्मणैश्व महाभागैवेंदवेदाड़पारगै: | नित्यमन्वास्यसे राजंस्तत्र का परिदेवना,राजन! महान्‌ भाग्यशाली वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मण सदा तुम्हारे साथ रहते हैं; फिर तुम्हारे लिये इस परिस्थितिमें शोककी क्या बात है?

Bṛhadaśva berkata: “Wahai Raja, engkau senantiasa didampingi para Brahmana yang amat beruntung—para cendekia yang menguasai Weda beserta ilmu-ilmu penunjangnya. Dalam keadaan demikian, alasan apa yang ada bagimu untuk meratap, wahai Raja?”

Verse 10

कर्कोटकस्य नागस्यथ दमयन्त्या नलस्य च । ऋतुपर्णस्य राजर्षे: कीर्तन॑ं कलिनाशनम्‌,कर्कोटक नाग, दमयन्ती, नल तथा राजर्षि ऋतुपर्णकी चर्चा कलियुगके दोषका नाश करनेवाली है

Bṛhadaśva berkata: “Kisah Karkoṭaka sang ular, Damayantī dan Nala, serta resi-raja Ṛtuparṇa—bila dilantunkan dan dikenang—adalah pemusnah Kali; ia menyingkirkan noda kemerosotan moral dan menegakkan kembali keteguhan dalam dharma.”

Verse 11

इतिहासमिमं चापि कलिनाशनमच्युत । शक्यमाश्चसितु श्रुत्वा त्वद्विधेन विशाम्पते,महाराज! तुम्हारे-जैसे लोगोंको यह कलिनाशक इतिहास सुनकर आश्वासन प्राप्त हो सकता है

Bṛhadaśva berkata: “Wahai Acyuta, ini pun sebuah kisah purba yang memusnahkan kuasa Kali. Dengan mendengarnya, orang sepertimu—wahai pemimpin di antara manusia—sungguh dapat memperoleh ketenteraman dan keteguhan hati.”

Verse 12

अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा । तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमरहसि,पुरुषको प्राप्त होनेवाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं। यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होनेपर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये

Bṛhadaśva berkata: “Dengan senantiasa merenungkan bahwa hasil usaha manusia itu tidak tetap dan mudah binasa, engkau tidak patut dikuasai kecemasan—baik ketika hasil itu datang maupun ketika ia lenyap.”

Verse 13

श्रुत्वेतिहासं नृपते समाश्चवसिहि मा शुच: । व्यसने त्वं महाराज न विषीदितुमहसि,नरेश! इस इतिहासको सुनकर तुम धैर्य धारण करो, शोक न करो, महाराज! तुम्हें संकटमें पड़नेपर विषादग्रस्त नहीं होना चाहिये

Bṛhadaśva berkata: “Wahai raja, setelah mendengar kisah purba ini, teguhkanlah dirimu dan jangan bersedih. Wahai maharaja, ketika kesusahan menimpa, engkau tidak patut tenggelam dalam putus asa.”

Verse 14

विषमावस्थिते दैवे पौरुषेडफलतां गते । विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नरा:,जब दैव ([प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते

Ketika nasib berdiri dalam keadaan yang tidak bersahabat dan upaya manusia tidak berbuah, orang yang bersandar pada sattva tidak menjerumuskan dirinya ke dalam duka.

Verse 15

ये चेद॑ कथयिष्यन्ति नलस्य चरितं महत्‌ । श्रोष्यन्ति चाप्यभीक्ष्णं वै नालक्ष्मीस्तान्‌ भजिष्यति

Dan siapa pun yang akan menuturkan kisah agung Nala—serta siapa pun yang akan mendengarkannya berulang-ulang—tidak akan didatangi Alakṣmī; kemalangan tidak akan mencengkeram mereka.

Verse 16

अर्थास्तस्योपपत्स्यन्ते धन्यतां च गमिष्यति । जो राजा नलके इस महान्‌ चरित्रका वर्णन करेंगे अथवा निरन्तर सुनेंगे, उन्हें दरिद्रता नहीं प्राप्त होगी। उनके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे और वे संसारमें धन्य हो जायँगे ।। १५३ || इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्व॒दुत्तमम्‌,इस प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका सदा ही श्रवण करके मनुष्य पुत्र, पौत्र, पशु तथा मानवोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है। साथ ही वह नीरोग और प्रसन्न होता है, इसमें संशय नहीं है

Bṛhadaśva berkata: Kekayaan akan datang kepadanya, dan ia akan mencapai keberkahan. Raja mana pun yang menuturkan kisah agung Nala ini, atau yang terus-menerus mendengarkannya, tidak akan jatuh ke dalam kemiskinan. Segala tujuannya akan terpenuhi, dan ia akan dipandang beruntung di dunia. Dengan mendengar riwayat suci yang kuno dan senantiasa unggul ini, seseorang memperoleh putra dan cucu, kemakmuran ternak dan harta, serta keutamaan di antara manusia. Ia menjadi sehat dan bersukacita batin—tanpa keraguan.

Verse 17

पुत्रान्‌ पौत्रान्‌ पशूंश्चापि लभते नृषु चाग्र्यताम्‌ । आरोग्यप्रीतिमांश्नेव भविष्यति न संशय:,इस प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका सदा ही श्रवण करके मनुष्य पुत्र, पौत्र, पशु तथा मानवोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है। साथ ही वह नीरोग और प्रसन्न होता है, इसमें संशय नहीं है

Dengan terus-menerus mendengarkan riwayat suci yang kuno dan unggul ini, seseorang memperoleh putra dan cucu, kemakmuran ternak dan harta, serta keutamaan di antara manusia. Ia pun menikmati kesehatan dan kegembiraan batin—tanpa keraguan.

Verse 18

भयात्‌ त्रस्यसि यच्च त्वमाह्नयिष्यति मां पुनः । अक्षज्ञ इति तत्‌ ते5हं नाशयिष्यामि पार्थिव,राजन! तुम जो इस भयसे डर रहे हो कि कोई द्यूतविद्याका ज्ञाता मनुष्य पुनः मुझे जूएके लिये बुलायेगा (उस दशामें पुनः पराजयका कष्ट देखना पड़ेगा)। तुम्हारे उस भयको मैं दूर कर दूँगा

Wahai raja! Engkau gentar karena takut seseorang yang mahir dalam ilmu dadu akan kembali memanggilku untuk berjudi; ketakutan itu akan kuhapuskan darimu.

Verse 19

वेदाक्षह्वदयं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रम । उपपद्यस्व कौन्तेय प्रसन्नो5हं ब्रवीमि ते,सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन! मैं ह्यूतविद्याके सम्पूर्ण हृदय (रहस्य)-को जानता हूँ, तुम उसे ग्रहण कर लो। मैं प्रसन्न होकर तुम्हें बतलाता हूँ

Wahai putra Kuntī yang gagah dalam kebenaran! Aku mengetahui sepenuhnya “jantung”—rahasia terdalam—dari ilmu dadu. Terimalah itu, wahai Kaunteya; dengan hati gembira akan kukatakan kepadamu.

Verse 20

वैशम्पायन उवाच ततो ह्ृष्टमना राजा बृहदश्चमुवाच ह । भगवजन्नक्षहृदयं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने प्रसन्नचित्त हो बृहदश्वसे कहा--'भगवन्‌! मैं द्यूतविद्याके रहस्यको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ"

Vaiśampāyana berkata: Lalu Raja Yudhiṣṭhira, dengan hati bersukacita, berkata kepada Bṛhadaśva: “Wahai yang mulia, aku ingin memahami dengan sebenar-benarnya ‘jantung’—rahasia terdalam—dari ilmu dadu.”

Verse 21

ततो$क्षह्ददयं प्रादात्‌ पाण्डवाय महात्मने । दत्त्वा चाश्वशिरो5गच्छदुपस्प्रष्ठं महातपा:

Kemudian sang pertapa agung menyerahkan ‘jantung dadu’ kepada Pāṇḍava yang mulia. Setelah memberikannya, ia—yang besar tapa-bratanya—berangkat untuk melakukan pembasuhan dan penyucian menurut tata-ritus.

Verse 22

तब महातपस्वी मुनिने महात्मा पाण्डुनन्दनको द्यूतविद्याका रहस्य बताया और उन्हें अश्वविद्याका भी उपदेश देकर वे स्नान आदि करनेके लिये चले गये ।। बृहदश्ने गते पार्थमश्रौषीत्‌ सव्यसाचिनम्‌ | वर्तमान तपस्युग्रे वायुभक्षं मनीषिणम्‌,बृहदश्व मुनिके चले जानेपर दृढव्रती राजा युधिष्ठिरने इधर-उधरके तीर्थों, पर्वतों और वनोंसे आये हुए तपस्वी ब्राह्मणोंके मुखसे सव्यसाची अर्जुनका यह समाचार सुना कि “मनीषी अर्जुन वायुका आहार करके कठोर तपस्यामें लगे हैं। महाबाहु कुन्तीकुमार बड़ी दुष्कर तपस्यामें स्थित हैं। ऐसा कठोर तपस्वी आजसे पहले दूसरा कोई नहीं देखा गया है

Lalu sang resi besar itu mengajarkan kepada putra Pāṇḍu yang mulia rahasia tersembunyi dari ilmu permainan dadu, dan juga menurunkan pengetahuan tentang kuda; sesudah itu ia berangkat untuk menjalankan mandi suci serta ritus-ritus lainnya. Setelah Bṛhadaśva pergi, Raja Yudhiṣṭhira yang teguh dalam laku mendengar dari para brāhmaṇa pertapa—yang datang dari berbagai tīrtha, gunung, dan rimba—kabar tentang Savyasācin Arjuna: “Arjuna yang bijak hidup hanya dengan ‘makan angin’ dan menekuni tapa yang keras. Putra Kuntī yang berlengan perkasa berdiri dalam pertapaan yang amat sukar; belum pernah terlihat pertapa setegar itu sebelumnya.”

Verse 23

ब्राह्मणेभ्यस्तपस्वि भ्य: सम्पतद्धभधयस्ततस्तत: । तीर्थशैलवने भ्यश्व समेतेभ्यो दृढव्रत:,बृहदश्व मुनिके चले जानेपर दृढव्रती राजा युधिष्ठिरने इधर-उधरके तीर्थों, पर्वतों और वनोंसे आये हुए तपस्वी ब्राह्मणोंके मुखसे सव्यसाची अर्जुनका यह समाचार सुना कि “मनीषी अर्जुन वायुका आहार करके कठोर तपस्यामें लगे हैं। महाबाहु कुन्तीकुमार बड़ी दुष्कर तपस्यामें स्थित हैं। ऐसा कठोर तपस्वी आजसे पहले दूसरा कोई नहीं देखा गया है

Vaiśampāyana berkata: Dari para brāhmaṇa pertapa yang datang dari berbagai tīrtha, gunung, dan rimba, Raja Yudhiṣṭhira yang teguh dalam laku mendengar kabar tentang Savyasācin Arjuna: “Arjuna yang bijak menekuni tapa yang keras, hidup hanya dengan ‘makan angin’.”

Verse 24

इति पार्थों महाबाहुर्दुरापं तप आस्थित: । न तथा दुष्टपूर्वोडन्य: कश्रिदुग्रतपा इति,बृहदश्व मुनिके चले जानेपर दृढव्रती राजा युधिष्ठिरने इधर-उधरके तीर्थों, पर्वतों और वनोंसे आये हुए तपस्वी ब्राह्मणोंके मुखसे सव्यसाची अर्जुनका यह समाचार सुना कि “मनीषी अर्जुन वायुका आहार करके कठोर तपस्यामें लगे हैं। महाबाहु कुन्तीकुमार बड़ी दुष्कर तपस्यामें स्थित हैं। ऐसा कठोर तपस्वी आजसे पहले दूसरा कोई नहीं देखा गया है

Vaiśampāyana berkata: “Demikianlah Pārtha yang berlengan perkasa menempuh tapa yang amat sukar dicapai. Sungguh, belum pernah terlihat orang lain dengan daya tapa sekeras itu.”

Verse 25

यथा धनंजय: पार्थस्तपस्वी नियतव्रतः । मुनिरेकचर: श्रीमान्‌ धर्मो विग्रहवानिव

Vaiśampāyana berkata: “Sebagaimana Dhanañjaya, putra Pṛthā, hidup laksana seorang pertapa—mengekang diri dan terikat pada brata yang teguh—demikian pula ia berjalan seorang diri, bercahaya dalam laku, seakan Dharma sendiri menjelma berwujud.”

Verse 26

“कुन्तीकुमार धनंजय जिस प्रकार नियम और व्रतका पालन करते हुए तपस्यामें संलग्न हैं, वह अद्भुत है। वे मौनभावसे रहते और अकेले ही विचरते हैं। श्रीमान्‌ अर्जुन धर्मके मूर्तिमान्‌ स्वरूप जान पड़ते हैं" ।। त॑ श्रुत्वा पाण्डवो राजंस्तप्यमानं महावने । अन्वशोचत कौन्तेय: प्रियं वै भ्रातरं जयम्‌,राजन! उस महान्‌ वनमें अपने प्रिय भाई अर्जुनको तपस्या करते सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर उनके लिये बार-बार शोक करने लगे

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, ketika mendengar bahwa saudara yang dicintainya, Arjuna, tengah menjalani tapa-pertapaan di rimba besar, putra Pāṇḍu—Yudhiṣṭhira—berduka berulang-ulang. Kabar tentang disiplin yang keras, laku sunyi, dan pengembaraan seorang diri itu menampakkan Arjuna bagaikan perwujudan dharma; namun bagi Yudhiṣṭhira, ikatan kasih dan tanggung jawab menjadikan kebajikan itu sendiri sumber duka.”

Verse 27

दहामानेन तु हृदा शरणार्थी महावने । ब्राह्मणान्‌ विविधज्ञानान्‌ पर्यपृच्छद्‌ युधिष्ठिर:,अर्जुनके वियोगमें संतप्त हृदयवाले वे युधिष्ठिर निर्भय आश्रयकी इच्छा रखते हुए उस महान्‌ वनमें रहते थे और अनेक प्रकारके ज्ञानसे सम्पन्न ब्राह्मणोंस अपना मनोगत अभिप्राय पूछा करते थे

Vaiśampāyana berkata: “Dengan hati yang terbakar oleh perpisahan dari Arjuna, Yudhiṣṭhira tinggal di rimba luas itu, mencari perlindungan dan ketenteraman. Di sana ia berulang kali bertanya kepada para brāhmaṇa yang berpengetahuan beragam, mengungkapkan beban duka dan keraguan di benaknya, demi memperoleh kejelasan dharma.”

Verse 78

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें पुष्करको हराकर राजा नलके अपने नगरमें आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला अठठ्ठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-78 dari kisah Nala dalam Vana Parva Śrī Mahābhārata, yang mengisahkan kemenangan Raja Nala atas Puṣkara serta peristiwa-peristiwa yang berkaitan dengan kembalinya Nala ke kotanya sendiri.

Verse 79

(प्रतिगृह्माक्षह्ददयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । आसीद्धृष्टमना राजन्‌ भीमसेनादिभिरय्युत: ।। राजन! द्यूतविद्याका रहस्य जानकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर भीमसेन आदिके साथ मन- ही-मन बड़े प्रसन्न हुए ।। स्वभ्रातृन्‌ सहितान्‌ पश्यन्‌ कुन्तीपुत्रों युधिष्ठिर: । अपश्यन्नर्जुनं तत्र बभूवाश्रुपरिप्लुत: । संतप्यमान: कौन्तेयो भीमसेनमुवाच ह ।। उन्होंने एक साथ बैठे हुए सब भाइयोंकी ओर देखा, उस समय वहाँ अर्जुनको न देखकर उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे अत्यन्त संतप्त हो भीमसेनसे बोले ।। युधिछ्िर उवाच कदा द्रक्ष्यामि वै भीम पार्थमत्र तवानुजम्‌ । मत्कृते हि कुरुश्रेष्ठस्तप्यते दुश्चवर॑ तप: ।। युधिष्ठिरने कहा--भीमसेन! मैं तुम्हारे छोटे भाई अर्जुनको कब देखूँगा? कुरुश्रेष्ठ अर्जुन मेरे ही लिये अत्यन्त कठोर तपस्या करते हैं ।। तस्याक्षहृदयज्ञानमाख्यास्यामि कदा न्वहम्‌ | स हि श्रुत्वाक्षह्दयं समुपात्तं मया विभो ।। प्रहष्ट: पुरुषव्याप्रो भविष्यति न संशय: ।) मैं उन्हें अक्षहृदय (द्यूतविद्याके रहस्य)-का ज्ञान कब कराऊँगा। भीम! मेरे द्वारा ग्रहण किये हुए अक्षह्ृदयको सुनकर पुरुषसिंह अर्जुन बहुत प्रसन्न होंगे, इसमें संशय नहीं है। इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि बृहदश्वगमने एकोनाशीतितमो<ध्याय:

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, setelah menerima rahasia ‘Hati Dadu’ (ilmu batin permainan dadu), Yudhiṣṭhira putra Kuntī duduk bersama Bhīmasena dan saudara-saudara lainnya, dan diam-diam bersukacita. Namun ketika ia memandang para saudaranya yang duduk di sana, ia tidak melihat Arjuna. Matanya pun basah oleh air mata; terbakar oleh duka, putra Kuntī berkata kepada Bhīma: ‘Bhīma, kapankah aku akan melihat Pārtha—adikmu—kembali di sini? Demi diriku, yang terbaik di antara para Kuru itu menanggung tapa yang keras dan sukar. Dan kapankah aku akan mengajarkan kepadanya pengetahuan tentang “Hati Dadu” ini? Sebab ketika sang harimau di antara manusia itu mendengar rahasia yang telah kuperoleh, ia pasti akan bersukacita—tanpa ragu.’”

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to maintain communal duty and stability when the group’s principal protector is absent: emotional loss and reduced perceived security must be managed without abandoning obligations to dependents.

The chapter presents disciplined continuity: even amid grief and uncertainty, ethical action persists through structured service, regulated resource procurement, and truthful acknowledgement of vulnerability.

No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its significance is contextual, documenting exile ethics and the narrative function of Arjuna’s absence in shaping morale, planning, and later strategic orientation.