Adhyaya 4
Vana ParvaAdhyaya 422 Verses

Adhyaya 4

Divākara-prasāda and the Establishment of Akṣaya-anna (Sūrya’s Favor and Inexhaustible Provision)

Upa-parva: Kāmyaka-vana-gamana (Transition to Kāmyaka Forest) — Sūrya-prasāda and Akṣaya-anna motif

Vaiśaṃpāyana reports that Divākara, pleased, reveals himself in radiant form and grants Yudhiṣṭhira assurances: the king will obtain desired aims, and for a specified period an unfailing provision of prepared foods will be available in the household—described through categories such as fruits/roots, meat, vegetables, and cooked preparations—along with varied wealth. After granting the boon, the deity withdraws. Yudhiṣṭhira, having emerged from the water, performs gestures of reverence toward Dhaumya and embraces his brothers, then reunites with Draupadī. The household implements the boon as a disciplined practice of hospitality: food is prepared and grows sufficient to feed Brahmins; guests and accompanying persons are served first, Yudhiṣṭhira eats the remainder (vighasa), and Draupadī eats after him. The chapter closes with ritual regularity—purohita-led rites on calendrical occasions—and the Pandavas’ departure, accompanied by assemblies of Brahmins, toward the Kāmyaka forest.

Chapter Arc: काम्यकवन-प्रवेश के पश्चात् हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र के अंतःकरण में उठती चिंता—राज्य, कुल और धर्म के बीच फँसा राजा विदुर को बुलाकर ‘पथ्य’ (हितकर) वचन सुनना चाहता है। → विदुर धृतराष्ट्र को सूक्ष्म धर्म का स्मरण कराते हुए स्पष्ट कहते हैं कि पाण्डव भी तुम्हारे ही पुत्र हैं; दुर्योधन की अहितकारी वृत्ति को रोककर अजातशत्रु युधिष्ठिर के साथ मेल कराओ, अन्यथा कुल-क्षय निश्चित है। धृतराष्ट्र सुनते तो हैं, पर पुत्र-स्नेह और भय उनकी बुद्धि को बाँध देता है। → धृतराष्ट्र विदुर की नीति को ‘पाण्डव-पक्षपात’ मानकर कटु वचन कहते हैं—‘तुम मेरी जिह्वा हो, सब कुछ कह देते हो; जैसे असती स्त्री सान्त्वना पाकर भी पति को छोड़ देती है, वैसे तुम भी जहाँ चाहो जाओ।’ यह क्षण राजसभा में धर्म-वाणी का अपमान और अंध-स्नेह की विजय बन जाता है। → विदुर बिना प्रतिवाद किए, धृतराष्ट्र के वचनों को अंतिम मानकर अंतःपुर से निकल पड़ते हैं; उनका निर्णय स्पष्ट है—जहाँ धर्म-पीड़ित पाण्डव हैं, वहीं वे जाएंगे। → विदुर तेजी से उस दिशा में प्रस्थान करते हैं ‘जहाँ पार्थ थे’—अब प्रश्न यह है कि पाण्डव-वनवास में विदुर का आगमन क्या नया संबल देगा, और हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र का पतन किस ओर बढ़ेगा?

Shlokas

Verse 1

ऑडज आरर | आओ अप $. बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, इन्द्र और प्रजापति--ये तैंतीस देवता हैं। २. सभापर्वके ११ वें अध्याय श्लोक ४६, ४७ में सात पितरोंके नाम इस प्रकार बताये हैं--वैराज, अग्निष्वात्त, सोमपा, गार्हपत्य, एकश्‌ंग, चतुर्वेद और कला। - जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर--ये सात प्रधान द्वीप माने गये हैं। इनके सिवा, कई उपद्दीप हैं। उनको लेकर यहाँ १३ द्वीप बताये गये हैं। चतुथों5 ध्याय: विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना वैशम्पायन उवाच वन॑ प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानो 5म्बिकेय: । धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धि सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब पाण्डव वनमें चले गये, तब प्रज्ञाचक्षु अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र मन-ही-मन संतप्त हो उठे। उन्होंने अगाधबुद्धि धर्मात्मा विदुरको बुलाकर स्वयं सुखद आसनपर बैठे हुए उनसे इस प्रकार कहा

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, ketika para Pāṇḍava memasuki hutan, Raja Dhṛtarāṣṭra—putra Ambikā, meski buta namun ‘melihat’ dengan kebijaksanaan—terbakar batinnya oleh duka. Duduk di singgasana dengan tenang, ia memanggil Vidura yang saleh dan berakal tak terduga, lalu berkata demikian.”

Verse 2

धृतराष्ट्र रवाच प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम्‌ । समक्ष त्वं सम्मत: कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि,धृतराष्ट्र बोले--विदुर! तुम्हारी बुद्धि शुक्राचार्यके समान शुद्ध है। तुम सूक्ष्म-से-सूक्ष्म श्रेष्ठ धर्मको जानते हो। तुम्हारी सबके प्रति समान दृष्टि है और कौरव तथा पाण्डव सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं। अतः मेरे तथा इन पाण्डवोंके लिये जो हितकर कार्य हो, वह मुझे बताओ

Dhṛtarāṣṭra berkata: “Wahai Vidura, kebijaksanaanmu semurni milik Bhārgava. Engkau memahami dharma dalam bentuknya yang tertinggi dan paling halus. Engkau memandang semua dengan adil, dan engkau dihormati di antara para Kaurava. Karena itu, katakan kepadaku apa yang sungguh bermanfaat—bagi mereka dan juga bagiku.”

Verse 3

इस प्रकार श्रीमह़्ा भारत वनपवकि अन्तर्गत अरण्यपर्वमें काम्यकवनप्रवेशविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,एवंगते विदुर यदद्य कार्य पौराश्न मे कथमस्मान्‌ भजेरन्‌ । ते चाप्यस्मान्‌ नोद्धरेयु: समूलां- स्तत्त्वं ब्रूया: साधुकार्याणि वेत्सि विदुर! ऐसी दशामें अब हमारा जो कर्तव्य हो वह बताओ। ये पुरवासी कैसे हमलोगोंसे प्रेम करेंगे। तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे वे पाण्डव हमलोगोंको जड़-मूलसहित उखाड़ न फेंके। तुम अच्छे कार्योको जानते हो। अतः हमें ठीक-ठीक कर्तव्यका निर्देश करो

Ia berkata: “Vidura, setelah perkara sampai pada keadaan seperti ini, apa yang harus dilakukan sekarang? Bagaimana rakyat kota dapat menaruh niat baik kepada kami? Dan katakan dengan sebenar-benarnya suatu jalan agar mereka (para Pāṇḍava) tidak mencabut kami sampai ke akar-akarnya. Engkau mengetahui tindakan yang benar dan bijaksana—maka tunjukkan dengan jelas kewajiban kami.”

Verse 4

विदुर उवाच त्रिवर्गो5यं धर्ममूलो नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति । धर्मे राजन्‌ वर्तमान: स्वशकक्‍्त्या पुत्रान्‌ सर्वान्‌ पाहि पाण्डो:सुतांश्ष,विदुरजीने कहा--नरेन्द्र! धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंकी प्राप्तिका मूल कारण धर्म ही है। धर्मात्मा पुरुष इस राज्यकी जड़ भी धर्मको ही बतलाते हैं, अतः महाराज! आप धर्मके मार्गपर स्थिर रहकर यथाशक्ति अपने तथा पाण्डुके सब पुत्रोंका पालन कीजिये इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थो 5ध्याय: ।। ४ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें विदुरवाक्यप्रत्याख्यान-विषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ

Vidura berkata: “Wahai raja, tiga tujuan hidup—dharma, artha, dan kāma—berakar pada dharma. Orang bijak pun menyatakan bahwa kerajaan ini berdiri di atas dharma. Karena itu, wahai penguasa, teguhlah dalam dharma dan, sesuai kemampuanmu, lindungilah serta peliharalah semua putra—baik putramu sendiri maupun putra-putra Pāṇḍu.”

Verse 5

स वै धर्मो विप्रलब्ध: सभायां पापात्मभि: सौबलेयप्रधानै: । आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत्‌ सत्यसंधं सुतस्ते,शकुनि आदि पापात्माओंने द्यूतसभामें उस धर्मके साथ विश्वासघात किया; क्योंकि आपके पुत्रने सत्य-प्रतिज्ञ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको बुलाकर उन्हें कपटपूर्वक पराजित किया है

Dharma itu sendiri telah dikhianati di balairung kerajaan oleh orang-orang berdosa yang dipimpin Śakuni, putra Subala. Putramu memanggil Yudhiṣṭhira, putra Kuntī, ke permainan dadu dan membuatnya kalah dengan tipu daya—dia yang teguh pada kebenaran dan setia pada janji.

Verse 6

एतस्‍स्य ते दुष्प्रणीतस्य राजन्‌ शेषस्याहं परिपश्याम्युपायम्‌ । यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापा- न्मुक्तो लोके प्रतितिछेत साधु,कुरुराज! दुरात्माओंद्वारा पाण्डवोंके प्रति किये हुए इस दुर्व्यवहारकी शान्तिका उपाय मैं जानता हूँ, जिससे आपका पुत्र दुर्योधन पापसे मुक्त हो लोकमें भलीभाँति प्रतिष्ठा प्राप्त करे

Vidura berkata: “Wahai Raja, aku melihat jalan pemulihan bagi sisa dari langkahmu yang tersesat ini—agar putramu, wahai Kaurava, terbebas dari dosa dan tegak di dunia dengan nama baik.”

Verse 7

तद्‌ वै सर्व पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्‌ तद्‌ राजन्नभिसूष्टं त्वया55सीत्‌ । एष धर्म: परमो यत्‌ स्वकेन राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत्‌,आपने पाण्डवोंको जो राज्य दिया था, वह सब उन्हें मिल जाना चाहिये। राजाके लिये यह सबसे बड़ा धर्म है कि वह अपने धनसे संतुष्ट रहे। दूसरेके धनपर लोभभरी दृष्टि न डाले

Karena itu, wahai Raja, biarlah semua putra Pāṇḍu memperoleh bagian yang dahulu telah engkau janjikan dan tetapkan bagi mereka. Inilah dharma tertinggi bagi seorang penguasa: puas dengan miliknya sendiri dan tidak memandang dengan tamak harta orang lain.

Verse 8

यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्न न स्याद्‌ धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम्‌ । एतत्‌ कार्य तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टि: शकुनेश्चावमान:,ऐसा कर लेनेपर आपके यशका नाश नहीं होगा, भाइयोंमें फ़ूट नहीं होगी और आपको धर्मकी भी प्राप्ति होगी। आपके लिये सबसे प्रमुख कार्य यह है कि पाण्डवोंको संतुष्ट करें और शकुनिका तिरस्कार करें

Jika raja bertindak demikian, kemasyhurannya tidak akan pudar, tidak akan timbul perpecahan di antara sanak, dan tindakannya tetap selaras dengan dharma. Maka kewajiban yang paling utama baginya ialah memuaskan para Pāṇḍava dan menolak pengaruh memecah-belah Śakuni.

Verse 9

एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्या- देतद्‌ राजंस्त्वरमाण: कुरुष्व | तथैतदेवं न करोषि राजन्‌ ध्रुवं कुरूणां भविता विनाश:,राजन! ऐसा करनेपर भी यदि आपके पुत्रोंका भाग्य शेष होगा तो उनका राज्य उनके पास रह जायगा; अतः आप शीघ्र ही यह काम कर डालिये। महाराज! यदि आप ऐसा न करेंगे तो कौरवकुलका निश्चय ही नाश हो जायगा

Wahai Raja, bila engkau melakukannya dan masih tersisa sedikit keberuntungan bagi putra-putramu, maka kedaulatan mereka akan tetap bertahan; karena itu, laksanakanlah langkah ini dengan segera. Namun jika engkau tidak bertindak demikian, wahai Raja, kehancuran wangsa Kuru pasti akan terjadi.

Verse 10

न हि क्रुद्धों भीमसेनो<र्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके । येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो भधनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम्‌,क्रोधमें भरे हुए भीमसेन अथवा अर्जुन अपने शत्रुओंकी सेनामें किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे। अस्त्रविद्यामें निपुण सव्यसाची अर्जुन जिनके योद्धा हैं, सम्पूर्ण लोकोंका सारभूत गाण्डीव जिनका धनुष है तथा अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले भीमसेन जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले हैं, उन पाण्डवोंके लिये संसारमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो प्राप्त न हो सके। आपके पुत्र दुर्योधनके जन्म लेते ही मुझे उस समय जो हितकी बात जान पड़ी, वह मैंने पहले ही बता दी थी

Vidura berkata: “Bila Bhimasena atau Arjuna menyala oleh amarah, ia takkan menyisakan seorang pun hidup dalam barisan tempur musuh. Bagi mereka yang pahlawannya adalah Arjuna si Savyasaci—mahir sempurna dalam ilmu senjata; yang busurnya adalah Gandiva, laksana ‘inti’ dari segala dunia; dan di pihaknya bertempur Bhimasena yang cemerlang oleh kekuatan lengannya—apa di dunia ini yang mungkin tak tercapai bagi para Pandawa? Dan sejak saat putramu Duryodhana lahir, nasihat yang kupandang membawa kebaikan telah lebih dahulu kusampaikan kepadamu.”

Verse 11

येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके कि नु न प्राप्यमस्ति । उक्त पूर्व जातमात्रे सुते ते मया यत्‌ ते हितमासीत्‌ तदानीम्‌,क्रोधमें भरे हुए भीमसेन अथवा अर्जुन अपने शत्रुओंकी सेनामें किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे। अस्त्रविद्यामें निपुण सव्यसाची अर्जुन जिनके योद्धा हैं, सम्पूर्ण लोकोंका सारभूत गाण्डीव जिनका धनुष है तथा अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले भीमसेन जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले हैं, उन पाण्डवोंके लिये संसारमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो प्राप्त न हो सके। आपके पुत्र दुर्योधनके जन्म लेते ही मुझे उस समय जो हितकी बात जान पड़ी, वह मैंने पहले ही बता दी थी

Vidura berkata: “Bagi mereka yang pahlawannya adalah Bhima—perkasa lengan dan tak terkalahkan di medan perang—apa di dunia ini yang mungkin tak tercapai? Pada saat putramu baru lahir, apa yang kupahami sebagai kebaikan bagimu telah lebih dahulu kusampaikan.”

Verse 12

पुत्र त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं॑ न च तत्‌ त्वं चकर्थ । इदं च राजन्‌ हितमुक्तं न चेत्‌ त्व- मेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात्‌,मैंने साफ कह दिया था कि आपका यह पुत्र समस्त कुलका अहित करनेवाला है, अतः इसको त्याग दीजिये; परंतु आपने मेरी उत्तम और सात्त्विक सलाहके अनुसार कार्य नहीं किया। राजन्‌! इस समय भी मैंने जो यह आपके हितकी बात बतायी है यदि उसे आप नहीं करेंगे तो आपको बहुत पश्चात्ताप करना पड़ेगा

Vidura berkata: “Aku telah berkata terus terang: ‘Putramu ini akan membawa kebinasaan bagi seluruh wangsa; karena itu, demi kebaikan yang lebih besar bagi keluarga, tinggalkanlah dia.’ Namun engkau tidak bertindak menurut nasihatku. Dan sekarang pun, wahai Raja, bila engkau tidak melakukan apa yang kembali kukatakan demi kesejahteraanmu, kelak engkau akan dilalap penyesalan.”

Verse 13

यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते सम्प्रीयमाण: पाण्डवैरेकराज्यम्‌ । तापो न ते भविता प्रीतियोगा- न्न चेन्निगृह्लीष्व सुतं सुखाय,यदि आपका पुत्र दुर्योधन प्रसन्नतापूर्वक पाण्डवोंके साथ एक राज्य बनानेकी बात मान ले तो आपको पश्चात्ताप नहीं होगा, प्रसन्नता ही प्राप्त होगी। यदि दुर्योधन आपकी बात न माने तो समस्त कुलको सुख पहुँचानेके लिये आप अपने उस पुत्रपर नियन्त्रण कीजिये

Vidura berkata: “Jika putramu Duryodhana, dengan niat baik, bersedia berbagi satu kerajaan dengan para Pandawa, engkau takkan punya alasan untuk menyesal; dari perdamaian itu engkau hanya akan menuai sukacita. Namun bila ia menolak nasihat ini, maka demi tenteram dan sejahtera seluruh wangsa Kuru, engkau harus mengekang putramu itu.”

Verse 14

दुर्योधन त्वहितं वै निगृहा पाण्डो: पुत्र कुरुष्वाधिपत्ये । अजातशश्न्रुहि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन्‌,इस प्रकार अहितकारक दुर्योधनको काबूमें करके आप पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको राज्यपर अभिषिक्त कर दीजिये; क्योंकि वे अजातशत्रु हैं। उनका किसीसे राग या द्वेष नहीं है। राजन! वे ही इस पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करेंगे

Vidura berkata: “Wahai Duryodhana, kendalikan jalan yang mencelakakan ini dan tegakkan putra Pandu, Yudhisthira, dalam kedaulatan. Dengarkan tentang Ajatasatru: bebas dari nafsu dan kebencian, wahai Raja, ia akan memerintah bumi ini menurut dharma.”

Verse 15

ततो राजन्‌ पार्थिवा: सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठ न्तु सद्य: । दुर्योधन: शकुनि: सूतपुत्र: प्रीत्या राजन्‌ पाण्डुपुत्रान्‌ भजन्तु,महाराज! यदि ऐसा हुआ तो भूमण्डलके समस्त राजा वैश्योंकी भाँति उपहार ले हम कौरवोंकी सेवामें शीघ्र उपस्थित होंगे। राजराजेश्वर! दुर्योधन, शकुनि तथा सूतपुत्र कर्ण प्रेमपूर्वक पाण्डवोंको अपनावें

Kemudian, wahai Raja, biarlah semua penguasa di bumi segera datang menghadap kita, membawa persembahan laksana para saudagar. Dan, wahai Raja, hendaklah Duryodhana, Śakuni, serta Karṇa putra sūta, dengan ketulusan hati, berpihak dan bersatu dengan putra-putra Pāṇḍu.

Verse 16

दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च । युधिष्टिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य,दुःशासन भरी सभामें भीमसेन तथा द्रौपदीसे क्षमा माँगे और आप युधिष्ठिरको भलीभाँति सान्त्वना दे सम्मानपूर्वक इस राज्यपर बिठा दीजिये

Biarlah Duḥśāsana, di tengah balairung kerajaan, memohon ampun kepada Bhīmasena dan kepada putri Drupada, Draupadī. Dan engkau hendaknya menenteramkan Yudhiṣṭhira sepenuhnya, lalu dengan penghormatan menegakkannya kembali pada takhta kerajaan.

Verse 17

त्वया पृष्टः किमहमन्यद्‌ वदेय- मेतत्‌ कृत्वा कृतकृत्योडसि राजन्‌,कुरुराज! आपने हितकी बात पूछी है तो मैं इसके सिवा और क्या बताऊँ। यह सब कर लेनेपर आप कृतकृत्य हो जायँगे

Karena engkau telah bertanya kepadaku, apa lagi yang dapat kukatakan selain ini? Wahai Raja, wahai penguasa Kuru—bila engkau melakukannya, engkau akan menjadi kṛtakṛtya: tugasmu tuntas dan tujuanmu tercapai.

Verse 18

धघतयाट्र उवाच एतद्‌ वाक्‍्यं विदुर यत्‌ ते सभाया- मिह प्रोक्तं पाण्डवान्‌ प्राप्य मां च । हित॑ तेषामहितं मामकाना- मेतत्‌ सर्व मम नावैति चेत:,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! तुमने यहाँ सभामें पाण्डवोंके तथा मेरे विषयमें जो बात कही है वह पाण्डवोंके लिये तो हितकर है, पर मेरे पुत्रोंक लिये अहितकारक है, अत: यह सब मेरा मन स्वीकार नहीं करता है

Dhṛtarāṣṭra berkata: “Vidura, kata-kata yang kau ucapkan di balairung ini tentang para Pāṇḍava dan tentang diriku—itu menguntungkan mereka, namun merugikan putra-putraku. Karena itu batinku tidak menerima semuanya.”

Verse 19

इदं त्विदानीं गत एव निद्षितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ | तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्र पाण्डवार्थे त्यजेयम्‌,इस समय तुम जो कुछ कह रहे हो इससे यह भलीभाँति निश्चय होता है कि तुम पाण्डवोंके हितके लिये ही यहाँ आये थे। तुम्हारे आजके ही व्यवहारसे मैं समझ गया कि तुम मेरे हितैषी नहीं हो। मैं पाण्डवोंके लिये अपने पुत्रोंको कैसे त्याग दूँ

Dari apa yang baru saja kau ucapkan, kini jelas bahwa engkau datang kemari semata-mata demi kepentingan para Pāṇḍava. Dari sikapmu hari ini aku mengerti bahwa engkau bukanlah orang yang menghendaki kebaikanku. Wahai anakku, bagaimana mungkin aku menanggalkan putra-putraku sendiri demi perkara para Pāṇḍava?

Verse 20

असंशयं तेडपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्‌ प्रसूत: । स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को नु ब्रूयात्‌ समतामन्ववेक्ष्य,इसमें संदेह नहीं कि पाण्डव भी मेरे पुत्र हैं, पर दुर्योधन साक्षात्‌ मेरे शरीरसे उत्पन्न हुआ है। समताकी ओर दृष्टि रखते हुए भी कौन किसको ऐसी बातें कहेगा कि तुम दूसरेके हितके लिये अपने शरीरका त्याग कर दो

Tak diragukan lagi bahwa para Pāṇḍava pun adalah putra-putraku sendiri; namun Duryodhana lahir langsung dari tubuhku. Bahkan bila orang berusaha memandang dengan adil, siapa yang akan berkata kepada siapa, ‘Tinggalkan tubuhmu sendiri demi manfaat orang lain’?

Verse 21

स मां जिह्दां विदुर सर्व ब्रवीषि मानं च तेडहमधिकं धारयामि । यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति,विदुर! मैं तुम्हारा अधिक सम्मान करता हूँ; किंतु तुम मुझे सब कुटिलतापूर्ण सलाह दे रहे हो। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, चले जाओ या रहो। तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। कुलटा स्त्रीको कितनी ही सान्त्वना दी जाय, वह स्वामीको त्याग ही देती है

Wahai Vidura, engkau berbicara kepadaku dengan lidah yang tajam, mengucapkan semuanya terus terang; namun aku tetap menaruh hormat yang lebih besar kepadamu. Meski begitu, nasihatmu terasa berliku dan menyayat. Sekarang lakukan sesukamu—pergi atau tinggal; aku tidak memerlukanmu. Sebab perempuan yang tak setia, betapapun ditenteramkan dan dibujuk berulang kali, tetap juga meninggalkan suaminya.

Verse 22

वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोडन्वपद्य- दन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन्‌ | नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाण: सम्प्राद्रवद्‌ यत्र पार्था बभूवु:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र सहसा उठकर महलके भीतर चले गये। तब विदुरने यह कहकर कि अब इस कुलका नाश अवश्यम्भावी है, जहाँ पाण्डव थे वहाँ चले गये

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja Janamejaya, setelah mengatakan hanya sejauh itu, Dhṛtarāṣṭra tiba-tiba bangkit dan menarik diri ke ruang-ruang dalam istana. Lalu Vidura, dengan keyakinan bahwa ‘tak ada lagi penawar bagi ini—kehancuran wangsa ini kini tak terelakkan,’ bergegas menuju tempat para putra Pṛthā (Pāṇḍava) berada.”

Frequently Asked Questions

The implied challenge is how a displaced royal household can meet obligations of hospitality and ritual without stable resources; the chapter resolves this by pairing divine assistance with disciplined distribution and precedence to guests.

Dharma is enacted through procedure: prioritize feeding dependents and guests, regulate consumption hierarchically, and preserve ritual order—so that authority is expressed as service and restraint rather than mere status.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-significance is narrative-functional—establishing ethical legitimacy and logistical capacity for continued exile while reinforcing the epic’s valuation of hospitality and ritual continuity.