
Draupadī’s Identification of the Pāṇḍavas and the Onset of the Chariot Engagement (द्रौपदी-पाण्डव-परिचयः)
Upa-parva: Jayadratha–Draupadī Saṃvāda (within Āraṇyaka/Vana narrative cycle)
Vaiśaṃpāyana reports a sudden, intensified sound in the forest as hostile kṣatriyas react upon seeing Bhīma and Arjuna. Jayadratha, observing the standards atop the chariots, addresses Draupadī (Yājñasenī), who is positioned on a chariot with Bhānumatī, and asks her to identify the five great chariots approaching, presuming them to be her husbands. Draupadī replies in a calibrated, confrontational register: she rebukes Jayadratha’s imprudence, states she feels neither distress nor fear while seeing Dharmarāja with his brothers, and then enumerates the Pāṇḍavas with distinguishing traits and ethical profiles. She highlights Yudhiṣṭhira’s dharma-centered conduct and protective generosity, Bhīma’s formidable strength and relentless completion of enmity, Arjuna’s disciplined virtues and steadfastness, and the twin brothers Nakula and Sahadeva as loyal, skilled, and principled. The speech culminates as a warning that Jayadratha’s force will be shattered like a treasure-laden vessel in turbulent waters. The chapter closes with the five Pārthas initiating a coordinated arrow-barrage that darkens the chariot formation, indicating a controlled but decisive strategic engagement.
Chapter Arc: पाण्डवों के वनगमन के बाद, सुयोधन (दुर्योधन) को मुक्त कराकर हस्तिनापुर लौटाया जाता है—पर लौटते ही सभा-हृदय में एक नई आग धधकती है: भीष्म की कटु निन्दा और पाण्डवों की प्रशंसा। → दुर्योधन के अपमान (गन्धर्व-प्रसंग में पकड़े जाने और पाण्डवों द्वारा छुड़ाए जाने) की चर्चा दरबार में फैलती है। भीष्म, द्रोण, कृप और अन्य वृद्ध-वीर नीति की दृष्टि से पाण्डवों की महत्ता बताते हैं; यह बात कर्ण को असह्य लगती है। कर्ण दुर्योधन के सामने भीष्म पर आरोप रखता है कि वे सदा कौरवों को तुच्छ और पाण्डवों को श्रेष्ठ कहते हैं। → कर्ण का विस्फोट: वह दुर्योधन से कहता है कि भीष्म के वचन और तुम्हारे समक्ष की गई उनकी निन्दा/तुलना वह सह नहीं सकता—और दुर्योधन को उकसाता है कि अपमान का उत्तर पराक्रम से दिया जाए। साथ ही वह दुर्योधन को उसके ‘मोक्ष’ (पाण्डवों द्वारा छुड़ाए जाने) की लज्जाजनक स्मृति दिखाकर, आत्मसम्मान की चोट पर वार करता है। → दुर्योधन कर्ण की वाणी से आश्वस्त होता है; कर्ण उसे अपना अटूट समर्थन देता है—‘धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ’ कहकर मित्र-निष्ठा को दृढ़ करता है और कौरव-पक्ष की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का संकल्प जगाता है। → कर्ण का ‘दिग्विजय/प्रताप-प्रदर्शन’ और कौरव-नीति का अगला कदम—क्या यह संकल्प केवल वाणी रहेगा या शीघ्र ही किसी अभियान/उपद्रव में परिणत होगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १६ श्लोक मिलाकर कुल ५३ ६ “लोक हैं) ८५+# ५० (7) पल अभ> त्रिपज्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान जनमेजय उवाच वसमानेषु पार्थेषु वने तस्मिन् महात्मसु । धार्तराष्ट्रा महेष्वासा: किमकुर्वत सत्तमा:,जनमेजय बोले--मुने! जब महात्मा पाण्डव उस वनमें निवास करते थे, उन दिनों महान् धनुर्धर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र-पुत्रोंने क्या किया? इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपववके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयविषयक दो यौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २५३ ॥/ ऑरड.2 23. () हि ० मु चतुष्पञ्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार वैशम्पायन उवाच ततः कर्णो महेष्वासो बलेन महता वृतः । द्रुपदस्य पुरं रम्यं रुरोध भरतर्षभ
Janamejaya berkata: “Wahai resi, ketika putra-putra Pṛthā yang berhati luhur tinggal di hutan itu, apakah yang dilakukan para Dhṛtarāṣṭra—para kesatria utama dan pemanah agung—pada masa itu?” Waiśampāyana berkata: “Kemudian Karna, pemanah besar, dikelilingi kekuatan yang besar, wahai banteng keturunan Bharata, mengepung kota Drupada yang elok.”
Verse 2
कर्णो वैकर्तनश्वैव शकुनिश्च महाबल: । भीष्मद्रोणकृपाश्चैव तन्मे शंसितुमरहसि,सूर्यपुत्र कर्ण, महाबली शकुनि, भीष्म, द्रोण तथा कृपाचार्य--इन सबने कौन-सा कार्य किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें
Janamejaya berkata: “Katakan kepadaku—perbuatan apa yang dilakukan oleh Karṇa putra Surya (Vaikartana), oleh Śakuni yang mahaperkasa, serta oleh Bhīṣma, Droṇa, dan Kṛpa?”
Verse 3
वैशम्पायन उवाच एवं गतेषु पार्थेषु विसृष्टे च सुयोधने । आगते हास्तिनपुरं मोक्षिते पाण्डुनन्दनै:
Vaiśampāyana berkata: “Demikianlah, ketika putra-putra Pṛthā telah berangkat, dan Suyodhana pun telah dilepas, lalu setelah dibebaskan oleh putra-putra Pāṇḍu, ia kembali tiba di Hāstinapura.”
Verse 4
उक्त तात यथा पूर्व गच्छतस्ते तपोवनम्
Vaiśampāyana berkata: “Anakku, sebagaimana telah kukatakan sebelumnya, lanjutkanlah perjalananmu menuju tapovana, hutan pertapaan.”
Verse 5
ततः प्राप्तं त्वया वीर ग्रहणं शत्रुभिर्बलात्
Kemudian, wahai pahlawan, engkau pun ditangkap oleh musuh-musuhmu dengan kekuatan semata.
Verse 6
प्रत्यक्ष तव गान्धारे ससैन्यस्य विशाम्पते
Wahai raja manusia, wahai Gāndhāra, semuanya ini telah tampak nyata di hadapanmu—bersama bala tentara.
Verse 7
क्रोशतस्तव राजेन्द्र ससैन्यस्थ नूपात्मज
Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja agung! Ketika engkau meratap, sang pangeran pun berdiri di tengah bala tentara, hadir di sana.”
Verse 8
कर्णस्य च महाबाहो सूतपुत्रस्य दुर्मते:,महाबाहो! उस समय खोटी बुद्धिवाले सूतपुत्र कर्णका पराक्रम भी तुमसे छिपा नहीं था। नृपश्रेष्ठ! धर्मवत्सल! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि धनुर्वेद, शौर्य और धर्माचरणमें कर्ण पाण्डवोंकी अपेक्षा चौथाई योग्यता भी नहीं रखता है
Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang berlengan perkasa! Bahkan saat itu pun, kegagahan Karṇa—putra sūta yang berpikiran sesat—tidak tersembunyi darimu. Wahai raja terbaik, pecinta dharma! Inilah keyakinanku: dalam ilmu memanah, dalam keberanian, dan dalam laku dharma, Karṇa tidak memiliki bahkan seperempat nilai dibanding para Pāṇḍava.”
Verse 9
न चापि पादभाक् कर्ण: पाण्डवानां नृपोत्तम | धनुर्वेदे च शौर्ये च धर्मे वा धर्मवत्सल,महाबाहो! उस समय खोटी बुद्धिवाले सूतपुत्र कर्णका पराक्रम भी तुमसे छिपा नहीं था। नृपश्रेष्ठ! धर्मवत्सल! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि धनुर्वेद, शौर्य और धर्माचरणमें कर्ण पाण्डवोंकी अपेक्षा चौथाई योग्यता भी नहीं रखता है
Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja terbaik, pecinta dharma! Karṇa tidak layak bahkan seperempat dibanding para Pāṇḍava—baik dalam ilmu memanah, dalam keberanian, maupun dalam laku dharma. Wahai yang berlengan perkasa! Bahkan saat itu pun, kegagahan putra sūta yang sesat itu tidak tersembunyi darimu.”
Verse 10
तस्माद हूं क्षमं मन्ये पाण्डवैस्तैर्महात्मभि: । संधिं संधिविदां श्रेष्ठ कुलस्यास्य विवृद्धये,“अतः संधिवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश! मैं तो इस कुलके अभ्युदयके लिये उन महात्मा पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ
Karena itu, wahai raja yang terbaik di antara para perunding! Demi kemakmuran dan penguatan wangsa ini, aku menilai tepat untuk mengadakan perjanjian damai dengan para Pāṇḍava yang berhati luhur itu.
Verse 11
एवमुक्तश्न भीष्मेण धार्तराष्ट्रो जनेश्वर: । प्रहस्य सहसा राजन् विप्रतस्थे ससौबल:,राजन! भीष्मके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन हँस पड़ा और शकुनिके साथ सहसा वहाँसे अन्यत्र चला गया
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja! Setelah Bhīṣma berkata demikian, putra Dhṛtarāṣṭra—penguasa di antara manusia—tertawa, lalu seketika pergi dari tempat itu bersama Śakuni.”
Verse 12
तं तु प्रस्थितमाज्ञाय कर्णदुःशासनादय: । अनुजममुर्महेष्वासा धार्तराष्ट्र महाबलम्,महाबली दुर्योधनको अन्यत्र गया जान कर्ण और दुःशासन आदि महान धनुर्धरोंने उसका अनुसरण किया
Mendengar bahwa ia telah berangkat, Karna, Duhsasana, dan para pemanah agung lainnya mengikuti Dhartarashtra yang perkasa itu (Duryodhana).
Verse 13
तांस्तु सम्प्रस्थितान् दृष्टवा भीष्म: कुरुपितामह: । लज्जया व्रीडितो राजन् जगाम स्वं निवेशनम्,राजन्! उन सबको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुरुकुलपितामह भीष्म लज्जित होकर अपने आवास-स्थानको चले गये
Wahai Raja, melihat mereka semua berangkat dari tempat itu, Bhishma—kakek agung wangsa Kuru—diliputi rasa malu dan kembali ke kediamannya.
Verse 14
गते भीष्मे महाराज धार॑राष्ट्रो जनेश्वर: । पुनरागम्य तं देशममन्त्रयत मन्कत्रिभि:,महाराज! भीष्मके चले जानेपर राजा दुर्योधन फिर उसी स्थानपर लौट आया और अपने मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा करने लगा--
Wahai Maharaja, setelah Bhishma pergi, putra Dhritarashtra, Duryodhana, kembali lagi ke tempat itu dan mulai berunding secara rahasia dengan para menterinya.
Verse 15
किमस्माकं भवेच्छेय: कि कार्यमवशिष्यते । कथं च सुकृतं तत् स्यान्मन्त्रयामोड्द्य यद्धितम्,“मित्रो! क्या करनेसे हमलोगोंकी भलाई होगी? हमारे लिये कौन-सा कार्य शेष रह गया है? कैसे करनेसे हमारा कार्य शुभ परिणामजनक होगा? क्या करनेमें हमारा हित है? आज इसी विषयपर हमलोगोंको विचार करना है'
“Apa yang sungguh membawa kesejahteraan bagi kita? Tugas apa yang masih tersisa? Bagaimana usaha itu harus dijalankan agar terlaksana dengan baik dan berbuah mujur? Apa yang benar-benar menguntungkan kita? Marilah hari ini kita bermusyawarah tentang hal yang bermanfaat.”
Verse 16
कर्ण उवाच दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव । भीष्मो<स्मान् निन्दति सदा पाण्डवांश्व प्रशंसति,कर्ण बोला--कुरुकुलरत्न दुर्योधन! मैं तुमसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसपर ध्यान दो। भीष्म सदा हमारी निन्दा और पाण्डवोंकी प्रशंसा करते रहते हैं
Karna berkata: “Duryodhana, wahai Kaurava, perhatikanlah apa yang akan kukatakan. Bhishma senantiasa mencela kita dan memuji para Pandawa.”
Verse 17
त्वद् द्वेषाच्च महाबाहो ममापि द्वेष्टमर्हति । विगर्हते च मां नित्यं॑ त्वत्समीपे नरेश्वर,महाबाहो! वे तुम्हारे प्रति द्वेष होनेसे मुझसे भी द्वेष रखते हैं। नरेश्वर! तुम्हारे सामने वे सदा मेरी निन्दा ही किया करते हैं
Wahai yang berlengan perkasa! Karena kebencian mereka kepadamu, mereka pun menganggap pantas membenci diriku. Wahai raja manusia! Di hadapanmu sendiri mereka terus-menerus mencelaku.
Verse 18
सो<हं भीष्मवचस्तद् वै न मृष्यामीह भारत | त्वत्समक्ष॑ यदुक्तं च भीष्मेणामित्रकर्षण
Karena itu, wahai Bhārata, aku tak sanggup menahan di sini kata-kata Bhīṣma—terutama yang ia ucapkan di hadapanmu sendiri, wahai penakluk musuh.
Verse 19
पाण्डवानां यशो राजंस्तव निनन््दां च भारत । अनुजानीहि मां राजन् सभृत्यबलवाहनम्
Wahai Raja, wahai Bhārata, aku tak sanggup menahan kemasyhuran para Pāṇḍava dan cela yang menimpa dirimu. Maka, wahai Raja, izinkan aku berangkat bersama para pengiring, pasukan, dan kendaraan-kendaraanku.
Verse 20
भारत! तुम्हारे सामने भीष्मने जो कुछ कहा है, उसे मैं सहन नहीं कर सकता। शत्रुदमन! भरतकुलनन्दन! उन्होंने जो पाण्डवोंका यश गाया और तुम्हारी निन््दा की है, यह मेरे लिये असह्य है। अतः तुम मुझे सेवक, सेना तथा सवारियोंके साथ दिग्विजय करनेकी आज्ञा दो ॥। जेष्यामि पृथिवीं राजन् सशैलवनकाननाम् | जिता च पाण्डवैभभूमिश्षतुर्भिबलेशालिभि:
Wahai Bhārata! Apa pun yang diucapkan Bhīṣma di hadapanmu, tak sanggup kutahan. Wahai penakluk musuh, kebanggaan wangsa Bharata! Bahwa ia menyanyikan kemasyhuran para Pāṇḍava dan mencelamu—itu tak tertanggungkan bagiku. Maka perintahkan aku, bersama para pengiring, bala tentara, dan pasukan berkendaraan, untuk berangkat menaklukkan segala penjuru. Wahai Raja! Akan kutundukkan bumi ini beserta gunung, rimba, dan belukar; dan akan kurebut kembali tanah yang telah direbut para Pāṇḍava—musuh-musuh yang kuat dan makmur itu.
Verse 21
तामहं ते विजेष्यामि एक एव न संशय: । सम्पश्यतु सुदुर्बुद्धिर्भीष्म: कुरुकुलाधम:
Akan kutaklukkan itu untukmu—seorang diri; tanpa keraguan. Biarlah Bhīṣma yang tumpul budi itu, noda wangsa Kuru, menyaksikan dan mengetahui.
Verse 22
राजन! मैं पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको जीत लूँगा। जिस भूमिपर चार बलशाली पाण्डवोंने मिलकर विजय पायी है उसे मैं तुम्हारे लिये अकेला ही जीत लूँगा, इसमें संशय नहीं है। खोटी बुद्धिवाला कुरु-कुलाधम भीष्म मेरे इस पराक्रमको अपनी आँखों देखे ।। अनिन्न्दध्य॑ निन्दते यो हि अप्रशंस्यं प्रशंसति । स पश्यतु बल॑ मेडद्य आत्मानं तु विगर्हतु,जो अनिन्दनीयकी निन्दा और अप्रशंसनीयकी प्रशंसा करता है, वह भीष्म आज मेरा बल देख ले और अपने-आपको धिक्कारे
Karna berkata, “Wahai Raja! Akan kutaklukkan seluruh bumi—beserta gunung-gunungnya, rimba, dan belantara liarnya. Tanah yang dahulu direbut bersama oleh empat Pandawa yang perkasa, akan kurebut seorang diri demi engkau; tiada keraguan akan hal itu. Biarlah Bhisma—yang karena budi yang sesat telah mencoreng nama wangsa Kuru—menyaksikan keperkasaanku dengan matanya sendiri. Sebab siapa yang mencela yang tak patut dicela dan memuji yang tak layak dipuji—biarlah ia hari ini melihat kekuatanku, lalu menghukum dirinya sendiri.”
Verse 23
अनुजानीहि मां राजन् ध्रुवो हि विजयस्तव । प्रतिजानामि ते सत्यं राजन्नायुधभालभे,राजन! मुझे आज्ञा दो। तुम्हारी विजय निश्चित है। यह मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक सत्य कहता हूँ और शस्त्र छूकर शपथ करता हूँ
Karna berkata, “Wahai Raja, izinkan aku; kemenanganmu sungguh pasti. Wahai Raja, ini kuikrarkan sebagai kebenaran, dan aku bersumpah atas senjataku.”
Verse 24
तच्छुत्वा तु वचो राजन् कर्णस्य भरतर्षभ । प्रीत्या परमया युक्त: कर्णमाह नराधिप:,भरतश्रेष्ठ राजन! कर्णकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधनने बड़ी प्रसन्नताके साथ उससे कहा--
Wahai raja, wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata—mendengar kata-kata Karna, Raja Duryodhana, dipenuhi sukacita dan kasih yang tertinggi, lalu menjawab Karna demikian.
Verse 25
धन्यो<स्म्यनुगृहीतो5स्मि यस्य मे त्वं महाबल: । हितेषु वर्तसे नित्यं सफलं जन्म चाद्य मे,“वीर! मैं धन्य हूँ, तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ; क्योंकि तुम-जैसे महाबली सुहृद् सदा मेरे हितसाधनमें लगे रहते हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया
Duryodhana berkata, “Wahai pahlawan! Aku berbahagia; aku telah dianugerahi—sebab engkau, yang mahaperkasa, senantiasa mengusahakan yang bermanfaat bagiku. Hari ini kelahiranku pun sungguh menjadi bermakna.”
Verse 26
यदा च मन्यसे वीर सर्वशत्रुनिबर्हणम् । तदा निर्गच्छ भद्रं ते हुनुशाधि च मामिति,“वीरवर! जब तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे द्वारा सब शत्रुओंका संहार हो सकता है तब तुम दिग्विजयके लिये यात्रा करो। तुम्हारा कल्याण हो। मुझे आवश्यक व्यवस्थाके लिये आज्ञा दो
Duryodhana berkata, “Wahai pahlawan terbaik! Bila engkau yakin dapat menghancurkan semua musuh, berangkatlah untuk penaklukan ke segala penjuru. Semoga kebaikan menyertaimu. Dan perintahkan aku juga, agar aku menyiapkan segala keperluan.”
Verse 27
एवमुक्तस्तदा कर्णो धार्तराष्ट्रेण धीमता । सर्वमाज्ञापयामास प्रायात्रिकमरिंदम,जनमेजय! बुद्धिमान् दुर्योधनके इस प्रकार कहनेपर कर्णने यात्रासम्बन्धी सारी आवश्यक तैयारीके लिये आज्ञा दे दी
Saat itu, setelah Dhārtarāṣṭra yang bijaksana (Duryodhana) berkata demikian, Karṇa—penakluk musuh—memerintahkan seluruh persiapan yang diperlukan untuk perjalanan yang akan segera dilakukan.
Verse 28
प्रययौ च महेष्वासो नक्षत्रे शुभदैवते । शुभे तिथौ मुहूर्ते च पूज्यमानो द्विजातिभि:,तदनन्तर महान धनुर्धर कर्णने मांगलिक शुभ पदार्थोंसे जलके द्वारा स्नान करके द्विजातियोंकी आशीर्वादमय वाणीसे सम्मानित एवं प्रशंसित हो शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्तमें यात्रा की। उस समय वह अपने रथकी घर्घराहटसे चराचर भूतोंसहित समस्त त्रिलोकीको प्रतिध्वनित कर रहा था
Sesudah itu, sang pemanah agung Karṇa berangkat pada rasi bintang yang mujur di bawah naungan dewa pembawa berkah, pada tithi yang baik dan saat yang tepat, dihormati serta diberkati oleh para dwija.
Verse 29
मड़लैश्व शुभै: स्नातो वाम्भिश्नापि प्रपूजित: । नादयन् रथघोषेण त्रैलोक्यं सचराचरम्,तदनन्तर महान धनुर्धर कर्णने मांगलिक शुभ पदार्थोंसे जलके द्वारा स्नान करके द्विजातियोंकी आशीर्वादमय वाणीसे सम्मानित एवं प्रशंसित हो शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्तमें यात्रा की। उस समय वह अपने रथकी घर्घराहटसे चराचर भूतोंसहित समस्त त्रिलोकीको प्रतिध्वनित कर रहा था
Kemudian ia mandi dengan bahan-bahan yang suci dan membawa keberuntungan, dimuliakan dengan upacara penyiraman air, lalu berangkat; gemuruh keretanya menggema hingga membuat seluruh triloka—yang bergerak dan tak bergerak—bergetar oleh gaungnya.
Verse 33
भीष्मो<ब्रवीन्महाराज धार्तराष्ट्रमिदं वच: । वैशम्पायनजीने कहा--महाराज! पाण्डवोंद्वारा गन्धर्वोंसे छुटकारा मिल जानेपर जब दुर्योधन विदा होकर हस्तिनापुर पहुँच गया और पाण्डव जाकर पूर्ववत् वनमें ही रहने लगे तब भीष्मजीने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे यह बात कही--
Saat itu Bhīṣma berkata kepada Dhārtarāṣṭra (Duryodhana) dengan kata-kata ini.
Verse 46
गमनं मे न रुचितं तव तत्र कृतं च ते । “तात! तुम्हारे तपोवन जाते समय जैसा कि मैंने पहले ही कह दिया था, वही आज भी कह रहा हूँ। मुझे तुम्हारा वहाँ जाना अच्छा नहीं लगा और वहाँ जाकर तुमने जो कुछ किया, वह भी पसंद नहीं आया
Aku tidak menyetujui engkau pergi ke sana; dan apa yang engkau lakukan setelah sampai di sana pun tidak kusetujui.
Verse 66
सूतपुत्रो5पयाद् भीतो गन्धर्वाणां तदा रणात् | 'गान्धारीनन्दन! सेनासहित तुम्हारे सामने ही सूतपुत्र कर्ण गन्धर्वोंसे भयभीत हो युद्धभूमिसे भाग निकला
Waiśampāyana berkata—saat itu Karṇa, putra kusir, diliputi ketakutan terhadap para Gandharwa; ia mundur dari pertempuran dan melarikan diri dari medan laga—semuanya terjadi tepat di hadapan putra Dhṛtarāṣṭra beserta bala tentaranya.
Verse 252
इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनका नगरमें प्रवेशविषयक दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ke-252 dalam Ghoṣa-yātrā Parva, bagian dari Vana Parva dalam Mahābhārata, yang mengisahkan masuknya Duryodhana ke kota.
Verse 253
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये त्रिपज्चाशदधिकद्धिशततमो< ध्याय:
Demikian berakhir bab ke-253 Mahābhārata dalam Vana Parva, pada bagian Ghoṣa-yātrā, mengenai Karṇa-digvijaya—penaklukan Karṇa ke segala penjuru.
Verse 536
मोक्षितश्चासि धर्मज्जै: पाण्डवैर्न च लज्जसे । “वीर! शत्रुओंने तुम्हें वहाँ बलपूर्वक बंदी बना लिया और धर्मज्ञ पाण्डवोंने तुम्हें उस संकटसे छुड़ाया है। क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती?
Waiśampāyana berkata—engkau telah diselamatkan oleh para Pāṇḍava yang mengetahui dharma, namun engkau tidak merasa malu. Musuh telah menangkapmu dengan paksa dan menawanmu; dari bahaya itu Pāṇḍavalah yang membebaskanmu—masihkah tidak timbul rasa malu dalam dirimu?
Verse 736
दृष्टस्ते विक्रमश्वैव पाण्डवानां महात्मनाम् | राजेन्द्र! राजकुमार! जब सेनासहित तुम चीखते-चिल्लाते रहे उस समय महात्मा पाण्डवोंने जो पराक्रम कर दिखाया था वह भी तुमने प्रत्यक्ष देखा है
Waiśampāyana berkata—engkau telah menyaksikan sendiri kegagahan para Pāṇḍava yang berhati luhur. Wahai raja di antara para raja, wahai pangeran—ketika engkau bersama pasukanmu berteriak-teriak karena gentar, engkau melihat dengan matamu sendiri kepahlawanan yang ditunjukkan para Pāṇḍava.
Whether to respond to provocation with immediate violence or with truthful, deterrent speech first—balancing personal safety, honor, and the duty to prevent avoidable escalation.
Power is ethically legitimate when aligned with dharma: truthful identification, measured warning, and disciplined action are presented as superior to reckless aggression and miscalculated pride.
No explicit phalaśruti appears in the cited passage; the meta-function is narrative—demonstrating how ethical speech and reputational knowledge operate as instruments of conflict management within the epic’s moral causality.