
Arjuna meets the Lokapālas, is tested by Indra, and is led to Amarāvatī for astra-śikṣā (Indraloka-gamana)
Upa-parva: Arjunābhigamana / Indraloka-gamana (Arjuna’s ascent and celestial instruction episode)
Arjuna reports his successful vision of Mahādeva to a radiant brāhmaṇa-like figure, who affirms the uniqueness of the encounter and forecasts that, together with the Lokapālas, Arjuna will meet Indra and receive weapons. Auspicious atmospheric signs arise—fragrant garlands, divine music, hymns, and the arrival of celestial retinues. Indra appears with Śacī; Kubera, Yama, and Varuṇa are seen in their respective stations, and the Lokapālas reassure Arjuna and offer astras for the fulfillment of a divine-purpose mandate. Arjuna receives the weapons with ritual propriety and is dismissed. Indra then addresses Arjuna, acknowledging prior knowledge of him and outlining further tapas and the role of Mātali in conveying him to heaven. Arjuna requests Indra as instructor; Indra tests Arjuna’s intention by suggesting harsh action, and Arjuna clarifies ethical constraints on using divine weapons. Indra approves and directs Arjuna to learn multiple classes of astras. Mātali brings Indra’s chariot; during ascent he notes Arjuna’s steadiness on the moving divine chariot, then shows celestial abodes and Nandana forests. Amarāvatī is described as free from fatigue, impurity, grief, and moral affliction, marked by perennial blossoms, pure winds, jeweled ground, and joyful inhabitants. Arjuna pays respects to divine assemblies, is welcomed by Indra, and remains in heaven to train in astras and learn Gandharva arts under Citraseṇa, maintaining disciplined focus amid abundant pleasures.
Chapter Arc: सूर्योदय के बाद धौम्य और आर्ष्टिषेण नित्यकर्म पूर्ण कर पाण्डवों के पास आते हैं; वनवास की कठोरता के बीच ऋषि-आगमन एक दिव्य संवाद का द्वार खोलता है। → पाण्डव विनयपूर्वक चरण-वन्दना कर ब्राह्मणों का सत्कार करते हैं; युधिष्ठिर के भीतर जगत-व्यवस्था, देव-स्थान और काल-गति को जानने की तीव्र जिज्ञासा उभरती है। → धौम्य मेरु-पर्वत और उसके शिखरों पर स्थित ब्रह्मा-विष्णु आदि के ध्रुव, अक्षय स्थानों का वर्णन करते हैं तथा सूर्य की निरन्तर गति—अहोरात्र, कला, काष्ठा और प्राणियों की आयु-कर्म के विभाजन—को जगत-नियामक सत्य के रूप में स्थापित करते हैं। → युधिष्ठिर को यह बोध मिलता है कि सृष्टि-चक्र, देवर्षियों का प्रजापति में लय-उदय, और सूर्य की अविराम परिक्रमा—सब एक अटल नियम के अधीन हैं; मन स्थिर होकर धर्म-मार्ग में धैर्य पाता है। → मेरु-दर्शन और नारायण-स्थान जैसे दिव्य-स्थानों का संकेत आगे के अध्यायों में और व्यापक ब्रह्माण्ड-वर्णन/तीर्थ-प्रसंग की ओर ले जाता है।
Verse 1
वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुदमन नरेश! तदनन्तर सूर्योदय होनेपर आ्टिषिणसहित धौम्यजी नित्यकर्म पूरा करके पाण्डवोंके पास आये
Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja, penakluk musuh! Setelah itu, ketika matahari telah terbit, Dhaumya—bersama para resi—menyelesaikan kewajiban harian sucinya, lalu datang kepada para Pāṇḍava.”
Verse 2
ते5भिवाद्यार्टिषिणस्य पादौ धौम्यस्य चैव ह । ततः प्राउजलय: सर्वे ब्राह्म॒णांस्तानपूजयन्,तब समस्त पाण्डवोंने आर्श्षिण तथा धौम्यके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर सब ब्राह्मणोंका पूजन किया
Mereka memberi hormat dengan bersujud pada kaki resi Ārṣiṇa dan juga Dhaumya; kemudian semuanya berdiri dengan tangan terkatup dan memuliakan para brāhmaṇa itu sebagaimana mestinya.
Verse 3
/ #::73:.8 #::3-.7 (0) हि २ 7 त्रेषष्ट्याधिकशततमोब<् ध्याय: धौम्यका युधिषिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन वैशम्पायन उवाच ततः सूर्योदये धौम्य: कृत्वा5डहछ्लिकमरिंदम । आर्टिषेणेन सहित: पाण्डवानभ्यवर्तत,ततो युधिष्टिरं धौम्यो गृहीत्वा दक्षिणे करे । प्राचीं दिशमभिप्रेक्ष्य महर्षिरिदमब्रवीत् तदनन्तर महर्षि धौम्यने युधिष्ठिरका दाहिना हाथ पकड़कर पूर्व दिशाकी ओर देखते हुए कहा--
Waiśampāyana berkata: Pada saat matahari terbit, resi Dhaumya—setelah menuntaskan tata laku pagi (āhnika)—mendatangi para Pāṇḍava bersama Ārtiṣeṇa. Lalu Dhaumya menggenggam tangan kanan Yudhiṣṭhira dan, memandang ke arah timur, sang maharsi mengucapkan kata-kata ini.
Verse 4
असोौ सागरपर्यन्तां भूमिमावृत्य तिष्ठति । शैलराजो महाराज मन्दरो5ति विराजते,“महाराज! वह पर्वतराज मन्दराचल प्रकाशित हो रहा है, जो समुद्रतककी भूमिको घेरकर खड़ा है
Wahai Maharaja! Di sana Mandara, raja segala gunung, tampak bersinar—seakan-akan berdiri mengitari bumi hingga ke tepi samudra.
Verse 5
इन्द्रवैश्रवणावेतां दिशं पाण्डव रक्षत: | पर्वतैश्न वनान्तैश्न काननैश्वैव शोभिताम्
Sang Pāṇḍava berjaga atas penjuru yang dipimpin Indra dan Vaiśravaṇa (Kubera)—sebuah arah yang elok oleh gunung-gunung, tepian rimba, dan belantara lebat.
Verse 6
'पाण्डुनन्दन! पर्वतों, वनान्त प्रदेशों और काननोंसे सुशोभित इस पूर्व दिशाकी रक्षा इन्द्र और कुबेर करते हैं ।। एतदाहुर्महेन्द्रस्य राज्ञो वैश्रवणस्य च । ऋषय: सर्वधर्मज्ञा: सझ तात मनीषिण:,“तात! सब धर्मोके ज्ञाता मनीषी महर्षि इस दिशाको देवराज इन्द्र तथा कुबेरका निवासस्थान कहते हैं। इधरसे ही उदित होनेवाले सूर्यदेवकी समस्त प्रजा, धर्मज्ञ ऋषि, सिद्ध महात्मा तथा साध्य देवता उपासना करते हैं
Wahai putra Pāṇḍu! Penjuru timur yang elok oleh gunung, tepian rimba, dan belantara lebat ini dijaga oleh Indra dan Kubera. Demikianlah ujar para resi yang mengetahui segala dharma, para bijak: “Anakku, arah ini disebut sebagai kediaman Mahendra (Indra) dan Raja Vaiśravaṇa (Kubera).”
Verse 7
अतश्रोद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठन्ति वै प्रजा: । ऋषयश्नापि धर्मज्ञा: सिद्धा: साध्याश्व देवता:,“तात! सब धर्मोके ज्ञाता मनीषी महर्षि इस दिशाको देवराज इन्द्र तथा कुबेरका निवासस्थान कहते हैं। इधरसे ही उदित होनेवाले सूर्यदेवकी समस्त प्रजा, धर्मज्ञ ऋषि, सिद्ध महात्मा तथा साध्य देवता उपासना करते हैं
Karena itu, semua makhluk memuja Āditya (Surya) saat ia terbit; para resi yang mengetahui dharma, para Siddha yang sempurna, dan para dewa Sādhya pun hadir dengan hormat.
Verse 8
यमस्तु राजा धर्मज्ञ: सर्वप्राणभृतां प्रभु: । प्रेतसत्त्वगतिं होनां दक्षिणामाश्रितो दिशम्,“समस्त प्राणियोंके ऊपर प्रभुत्व रखनेवाले धर्मज्ञ राजा यम इस दक्षिण दिशाका आश्रय लेकर रहते हैं। इसमें मरे हुए प्राणी ही जा सकते हैं
Yama, raja yang mengetahui dharma dan berdaulat atas semua makhluk hidup, bersemayam di penjuru selatan. Arah itu dipandang sebagai jalan para arwah—suatu lintasan yang rendah—yang hanya dapat ditempuh oleh mereka yang telah wafat.
Verse 9
एतत् संयमनं पुण्यमतीवाद्धुतदर्शनम् । प्रेतराजस्य भवनमृद्धया परमया युतम्,'प्रेतताजका यह निवासस्थान अत्यन्त समृद्धिशाली परम पवित्र तथा देखनेमें अद्भुत है। राजन! इसका नाम संयमन (या संयमनीपुरी) है
Kota suci bernama Saṁyamana ini sungguh menakjubkan untuk dipandang. Inilah kediaman Penguasa para arwah (Yama), dipenuhi kemakmuran dan kemilau yang tertinggi.
Verse 10
“राजन! जहाँ जाकर भगवान् सूर्य सत्यसे प्रतिष्ठित होते हैं, उस पर्वतराजको मनीषी पुरुष अस्ताचल कहते हैं। गिरिराज अस्ताचल और महान् जलराशिसे भरे हुए समुद्रमें रहकर राजा वरुण समस्त प्राणियोंकी रक्षा करते हैं
Wahai Raja, gunung agung tempat Sang Surya, setelah pergi, bersemayam dalam ranah Kebenaran—oleh para bijak disebut ‘Astācala’, Gunung Peraduan (tempat terbenam). Berdiam di gunung itu dan juga di samudra yang penuh timbunan air yang luas, Raja Varuṇa menjaga segenap makhluk hidup.
Verse 11
एतं पर्वतराजानं समुद्र च महोदधिम् | आवसन् वरुणो राजा भूतानि परिरक्षति,“राजन! जहाँ जाकर भगवान् सूर्य सत्यसे प्रतिष्ठित होते हैं, उस पर्वतराजको मनीषी पुरुष अस्ताचल कहते हैं। गिरिराज अस्ताचल और महान् जलराशिसे भरे हुए समुद्रमें रहकर राजा वरुण समस्त प्राणियोंकी रक्षा करते हैं
Dengan berdiam di gunung agung itu dan di samudra raya (mahōdadhi), Raja Varuṇa menjaga dan melindungi semua makhluk.
Verse 12
उदीचीं दीपयन्नेष दिशं तिष्ठति वीर्यवान् | महामेरुर्महा भाग शिवो ब्रह्मविदां गति:,“महाभाग!” यह अत्यन्त प्रकाशमान महामेरु पर्वत दिखायी देता है, जो उत्तर दिशाको उद्धासित करता हुआ खड़ा है। इस कल्याणकारी पर्वतपर ब्रह्मवेत्ताओंकी ही पहुँच हो सकती है
Wahai yang mulia, Mahāmeru yang perkasa ini berdiri menerangi arah utara. Gunung yang membawa keberkahan—bersifat Śiva—ini adalah tujuan yang hanya dapat dicapai oleh para brahmavid (para pengenal Brahman).
Verse 13
यस्मिन ब्रह्मसदश्चैव भूतात्मा चावतिष्ठते । प्रजापति: सृजन् सर्व यत् किज्चिज्जड्र्मागमम्,“इसीपर ब्रह्माजीकी सभा है, जहाँ समस्त प्राणियोंके आत्मा ब्रह्मा स्थावर-जंगम समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करते हुए नित्य निवास करते हैं
Di alam itu berdiri balairung sidang Brahmā sendiri; di sanalah Prajāpati Brahmā—Ātman batin semua makhluk—senantiasa bersemayam, sambil menciptakan segala yang ada, baik yang bergerak maupun yang tak bergerak.
Verse 14
यानाहुर्ब्रह्मण: पुत्रान् मानसात् दक्षसप्तमान् । तेषामपि महामेरु: शिवं स्थानमनामयम्,“जिन्हें ब्रह्माजीका मानसपुत्र बताया जाता है और जिनमें दक्षप्रजापतिका स्थान सातवाँ है। उन समस्त प्रजापतियोंका भी यह महामेरु पर्वत ही रोग-शोकसे रहित सुखद स्थान है
Mereka yang disebut putra-putra manas (lahir dari pikiran) Brahmā—dengan Dakṣa sebagai yang ketujuh—bagi para Prajāpati itu pun Mahāmeru inilah tempat tinggal yang suci, sejahtera, bebas dari duka dan penyakit.
Verse 15
अन्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनरेवोदयन्ति च । सप्त देवर्षयस्तात वसिष्ठप्रमुखा: सदा,“तात! वसिष्ठ आदि सात देवर्षि इन्हीं प्रजापतिमें लीन होते और पुनः इन्हींसे प्रकट होते हैं
Wahai anakku, tujuh resi ilahi—dengan Vasiṣṭha sebagai yang terdepan—di sinilah mereka melebur (ke dalam Prajāpati itu) sebagai tempat bersemayam, dan dari sinilah pula mereka terbit kembali.
Verse 16
देशं विरजसं पश्य मेरो: शिखरमुत्तमम् । यत्रात्मतृप्तैर ध्यास्ते देवे: सह पितामह:,'युधिष्ठिर! मेरुका वह उत्तम शिखर देखो, जो रजोगुण रहित प्रदेश है, वहाँ अपने- आपमें तृप्त रहनेवाले देवताओंके साथ पितामह ब्रह्मा निवास करते हैं
Wahai Yudhiṣṭhira, pandanglah puncak Meru yang paling luhur itu—wilayah yang bersih, bebas dari rajas; di sanalah Brahmā Sang Pitāmaha bersemayam bersama para dewa yang puas dalam diri mereka sendiri.
Verse 17
यमाहु: सर्वभूतानां प्रकृते: प्रकृति धरुवम् । अनादिनिधन देवं प्रभुं नारायणं परम्,“जो समस्त प्राणियोंकी पञ्चभूतमयी प्रकृतिके अक्षय उपादान हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष अनादि अनन्त दिव्य-स्वरूप परम प्रभु नारायण कहते हैं, उनका उत्तम स्थान उस ब्रह्मलोकसे भी ऊपर प्रकाशित हो रहा है। देवता भी उन सर्वतेजोमय शुभस्वरूप भगवान्का सहज ही दर्शन नहीं कर पाते। राजन! परमात्मा विष्णुका वह स्थान सूर्य और अग्निसे भी अधिक तेजस्वी है और अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है। देवताओं और दानवोंके लिये उसका दर्शन अत्यन्त कठिन है
Dia yang oleh para bijak disebut sebagai landasan abadi bagi kodrat semua makhluk—bahkan sebagai “kodrat dari kodrat”—itulah Nārāyaṇa, Tuhan Tertinggi, dewa yang tanpa awal dan tanpa akhir. Kediaman-Nya yang utama dinyatakan melampaui bahkan Brahmaloka; ia tersingkap oleh cahaya-Nya sendiri, mengungguli surya dan api. Bahkan para dewa pun tidak mudah memandang wujud-Nya yang serba-bercahaya dan penuh kemuliaan; bagi para deva maupun dānava, darśana akan Dia amatlah sukar.
Verse 18
ब्रहद्मण: सदनात् तस्य परं स्थान प्रकाशते । देवा अपि न पश्यन्ति सर्वतेजोमयं शुभम्,“जो समस्त प्राणियोंकी पञ्चभूतमयी प्रकृतिके अक्षय उपादान हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष अनादि अनन्त दिव्य-स्वरूप परम प्रभु नारायण कहते हैं, उनका उत्तम स्थान उस ब्रह्मलोकसे भी ऊपर प्रकाशित हो रहा है। देवता भी उन सर्वतेजोमय शुभस्वरूप भगवान्का सहज ही दर्शन नहीं कर पाते। राजन! परमात्मा विष्णुका वह स्थान सूर्य और अग्निसे भी अधिक तेजस्वी है और अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है। देवताओं और दानवोंके लिये उसका दर्शन अत्यन्त कठिन है
Waiśampāyana berkata: “Melampaui Brahmaloka yang luas itu, tampak bersinar kediaman-Nya yang lebih tinggi. Bahkan para dewa pun tidak dapat memandang wujud-Nya yang suci, yang seluruhnya tersusun dari cahaya. Ia bercahaya oleh sinar-Nya sendiri, melampaui gemilang matahari dan api; dan penglihatan atas-Nya amat sukar, baik bagi dewa maupun asura.”
Verse 19
अत्यर्कानलदीप्तं तत् स्थान विष्णोर्महात्मन: । स्वयैव प्रभया राजन दुष्प्रेक्ष्यं देवदानवैः,“जो समस्त प्राणियोंकी पञ्चभूतमयी प्रकृतिके अक्षय उपादान हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष अनादि अनन्त दिव्य-स्वरूप परम प्रभु नारायण कहते हैं, उनका उत्तम स्थान उस ब्रह्मलोकसे भी ऊपर प्रकाशित हो रहा है। देवता भी उन सर्वतेजोमय शुभस्वरूप भगवान्का सहज ही दर्शन नहीं कर पाते। राजन! परमात्मा विष्णुका वह स्थान सूर्य और अग्निसे भी अधिक तेजस्वी है और अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है। देवताओं और दानवोंके लिये उसका दर्शन अत्यन्त कठिन है
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, kediaman tertinggi milik Viṣṇu yang berhati agung itu menyala dengan cahaya yang melampaui matahari dan api. Ia bersinar oleh kemilau-Nya sendiri, dan bagi dewa maupun asura, amat sukar untuk dipandang.”
Verse 20
प्राच्यां नारायणस्थानं मेरावतिविराजते । यत्र भूतेश्वरस्तात सर्वप्रकृतिरात्मभू:
Waiśampāyana berkata: “Di arah timur tampak bersinar tempat suci Nārāyaṇa, gemilang bersama Merāvatī. Di sana, wahai yang terkasih, bersemayam Penguasa segala makhluk—Yang Lahir-dari-Diri (Svayambhū), landasan asal seluruh Prakṛti.”
Verse 21
भासयन् सर्वभूतानि सुश्रियाभिविराजते । नात्र ब्रह्मर्षयस्तात कुत एव महर्षय:
Waiśampāyana berkata: “Menerangi semua makhluk, ia tampak bersemayam dalam kemuliaan yang agung. Wahai yang terkasih, di sana bahkan para brahmarṣi pun tiada—apalagi para mahārṣi.”
Verse 22
प्राप्रुवन्ति गतिं होतां यतीनां भावितात्मनाम् | नतं ज्योतींषि सर्वाणि प्राप्प भासन्ति पाण्डव
Waiśampāyana berkata: “Mereka mencapai jalan yang telah ditetapkan—keadaan yang diraih para yati yang mengekang diri dan telah dimurnikan batinnya. Wahai Pāṇḍava, setelah sampai di sana, segala cahaya pun bersinar dalam ketundukan.”
Verse 23
“तात! पूर्व दिशामें मेरूपर ही भगवान् नारायणका स्थान सुशोभित हो रहा है, जहाँ सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा सबके उपादान कारण स्वयंभू भगवान् विष्णु अपने उत्कृष्ट तेजसे सम्पूर्ण भूतोंको प्रकाशित करते हुए विराजमान होते हैं। वहाँ यत्नशील ज्ञानी महात्माओंकी ही पहुँच हो सकती है। उस नारायणधाममें ब्रह्मर्षियोंकी भी गति नहीं है। फिर महर्षि तो वहाँ जा ही कैसे सकते हैं। पाण्डुनन्दन! सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ भगवान्के निकट जाकर अपना तेज खो बैठते हैं--उनमें पूर्ववत् प्रकाश नहीं रह जाता ॥| २०-- २२ |। स्वयं प्रभुरचिन्त्यात्मा तत्र ह्यतिविराजते । यतयस्तत्र गच्छन्ति भक्त्या नारायणं हरिम्,'साक्षात् अचिन्त्यस्वरूप भगवान् विष्णु ही वहाँ विराजित होते हैं। यत्नशील महात्मा भक्तिके प्रभावसे वहाँ भगवान् नारायणको प्राप्त होते हैं
Vaiśampāyana berkata: “Wahai anakku! Di arah timur, di puncak Gunung Meru, bersinar mulia kediaman Bhagavān Nārāyaṇa—di sana Viṣṇu, Tuhan yang Swayambhū, penguasa segala makhluk dan sebab material bagi semuanya, bertakhta sambil menerangi seluruh ciptaan dengan sinar-Nya yang tertinggi. Hanya para mahātmā yang berdisiplin, tekun, dan berpengetahuan sejati yang dapat mencapai tempat itu. Di alam Nārāyaṇa itu bahkan para Brahmarṣi pun tak memiliki jalan masuk—apalagi resi-resi lainnya. Wahai putra Pāṇḍu, segala sesuatu yang bercahaya, ketika mendekat kepada Sang Bhagavān, kehilangan kilau cahayanya sendiri; sinar yang dahulu tak lagi tersisa. Di sana Sang Tuhan sendiri, yang hakikat-Nya tak terpikirkan, berkilau dengan kemegahan yang melampaui segalanya. Dengan bhakti-lah para pertapa yang mengendalikan diri mencapai Nārāyaṇa, Hari.”
Verse 24
परेण तपसा युक्ता भाविता: कर्मभि: शुभै: । योगसिद्धा महात्मानस्तमोमोहविवर्जिता:,“भारत! जो उत्तम तपस्यासे युक्त हैं और पुण्यकर्मोके अनुष्ठानसे पवित्र हो गये हैं, वे अज्ञान और मोहसे रहित योगसिद्ध महात्मा उस नारायण-धाममें जाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं। अपितु स्वयंभू एवं सनातन परमात्मा देवदेव विष्णुमें लीन हो जाते हैं
Vaiśampāyana berkata: Mereka yang berpegang pada tapa yang luhur, disucikan oleh pelaksanaan perbuatan-perbuatan bajik, telah sempurna dalam yoga, serta bebas dari kegelapan kebodohan dan delusi—para mahātmā itu mencapai keadaan tertinggi.
Verse 25
तत्र गत्वा पुनर्नेमं लोकमायान्ति भारत । स्वयम्भुवं महात्मानं देवदेवं सनातनम्,“भारत! जो उत्तम तपस्यासे युक्त हैं और पुण्यकर्मोके अनुष्ठानसे पवित्र हो गये हैं, वे अज्ञान और मोहसे रहित योगसिद्ध महात्मा उस नारायण-धाममें जाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं। अपितु स्वयंभू एवं सनातन परमात्मा देवदेव विष्णुमें लीन हो जाते हैं
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, setelah mencapai tempat itu mereka tidak kembali lagi ke dunia ini. Para mahātmā itu melebur ke dalam Tuhan Yang Swayambhū, Yang Kekal, Sang Dewa di atas para dewa.”
Verse 26
स्थानमेतन्महाभाग ध्रुवमक्षयमव्ययम् | ईश्वरस्य सदा होतत् प्रणमात्र युधिष्ठिर,“महाभाग युधिष्ठिर! यह परमेश्वरका नित्य, अविनाशी और अविकारी स्थान है। तुम यहींसे इसको प्रणाम करो
Vaiśampāyana berkata: “Wahai yang mulia, inilah kediaman Tuhan yang tetap, tak binasa, dan tak berubah. Wahai Yudhiṣṭhira, persembahkanlah hormatmu kepada-Nya dari tempat ini.”
Verse 27
एन॑ त्वहरहर्मेरुं सूर्याचन्द्रमसौ ध्रुवम् प्रदक्षिणमुपावृत्य कुरुत: कुरुनन्दन,“कुरुनन्दन! सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन इस निश्चल मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। पापशून्य महाराज! सम्पूर्ण नक्षत्र भी गिरिराज मेरुकी सर्वतोभावेन परिक्रमा करते हैं
Vaiśampāyana berkata: “Wahai keturunan Kuru, matahari dan bulan setiap hari mengitari Gunung Meru yang teguh ini dalam pradakṣiṇa.”
Verse 28
ज्योतींषि चाप्यशेषेण सर्वाण्यनघ सर्वतः । परियान्ति महाराज गिरिराजं प्रदक्षिणम्,“कुरुनन्दन! सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन इस निश्चल मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। पापशून्य महाराज! सम्पूर्ण नक्षत्र भी गिरिराज मेरुकी सर्वतोभावेन परिक्रमा करते हैं
Wahai putra Kuru! Matahari dan Bulan setiap hari melakukan pradakṣiṇa mengelilingi Gunung Meru yang tak tergoyahkan ini. Wahai raja yang tanpa noda dosa! Seluruh gugus bintang pun, dari segala penjuru, mengitari raja gunung Meru.
Verse 29
एतं ज्योतींषि सर्वाणि प्रकर्षीन् भगवानपि । कुरुते वितमस्कर्मा आदित्यो5भिप्रदक्षिणम्,“अन्धकारका निवारण करना ही जिनका मुख्य कर्म है, वे भगवान् सूर्य भी सम्पूर्ण ज्योतियोंको अपनी ओर खींचते हुए इस मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते हैं
Bahkan Sang Surya yang mulia—yang tugas utamanya melenyapkan kegelapan—menarik semua cahaya itu ke arah dirinya dan melakukan pradakṣiṇa dengan hormat mengelilingi Gunung Meru.
Verse 30
य॑ं प्राप्प सविता राजन् सत्येन प्रतितिष्ठति । अस्तं पर्वतराजानमेतमाहुर्मनीषिण:,अस्तं प्राप्प तत: संध्यामतिक्रम्प दिवाकर: । उदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसु: “तदनन्तर अस्ताचलको पहुँचकर संध्याकालकी सीमाको लाँघकर ये भगवान् सूर्य उत्तर दिशाका आश्रय लेते हैं। पाण्डुनन्दन! मेरु पर्वतका अनुसरण करके उत्तर दिशाकी सीमातक पहुँचकर ये समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् सूर्य पुनः पूर्वाभिमुख होकर चलते हैं
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, gunung yang setelah dicapainya Savitṛ berdiri teguh oleh kekuatan kebenaran—para bijak menyebut raja gunung itu ‘Asta’. Setelah mencapai Asta dan melampaui batas senja, Sang Divākara, Sang Vibhāvasu yang bercahaya, beralih menuju penjuru utara.”
Verse 31
स मेरुमनुवृत्त: सन् पुनर्गच्छति पाण्डव । प्रामुख: सविता देव: सर्वभूतहिते रत:,“तदनन्तर अस्ताचलको पहुँचकर संध्याकालकी सीमाको लाँघकर ये भगवान् सूर्य उत्तर दिशाका आश्रय लेते हैं। पाण्डुनन्दन! मेरु पर्वतका अनुसरण करके उत्तर दिशाकी सीमातक पहुँचकर ये समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् सूर्य पुनः पूर्वाभिमुख होकर चलते हैं
Wahai Pāṇḍava, setelah mengikuti lintasan Meru, Dewa Savitṛ—yang terdepan di antara para dewa dan senantiasa mengupayakan kesejahteraan semua makhluk—berbalik lagi dan melanjutkan perjalanannya.
Verse 32
स मासान् विभजन् काले बहुथधा पर्वसंधिषु । तथैव भगवान् सोमो नक्षत्र: सह गच्छति,“उसी प्रकार भगवान् चन्द्रमा भी नक्षत्रोंके साथ मेरु पर्वतकी परिक्रमा करते हैं और पर्वसंधिके समय विभिन्न मासोंका विभाग करते रहते हैं
Demikian pula Bhagavān Soma (Bulan) bergerak bersama rasi-rasi bintang; pada pertemuan musim, menurut tatanan waktu, ia menandai pembagian bulan-bulan dalam beragam cara.
Verse 33
एवमेतं त्वतिक्रम्प महामेरुमतन्द्रित: । भावयन् सर्वभूतानि पुनर्गच्छति मन्दरम्,“इस तरह आलस्यरहित हो इस महामेरुका उल्लंघन करके समस्त प्राणियोंका पोषण करते हुए वे पुनः मन्दराचलको चले जाते हैं। उसी प्रकार अन्धकारनाशक भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए इस बाधारहित मार्गपर सदा चक्कर लगाते रहते हैं
Demikianlah, tanpa kelengahan, ia menyeberangi Mahāmeru yang agung; sambil memelihara segala makhluk, ia kembali lagi ke Mandara. Begitu pula Āditya, Sang Surya pemusnah kegelapan, dengan sinarnya menyejahterakan seluruh jagat dan senantiasa beredar di jalan yang tak terhalang ini.
Verse 34
तथा तमिस्रहा देवो मयूखैर्भावयञ्जगत् । मार्गमेतदसम्बाधमादित्य: परिवर्तते,“इस तरह आलस्यरहित हो इस महामेरुका उल्लंघन करके समस्त प्राणियोंका पोषण करते हुए वे पुनः मन्दराचलको चले जाते हैं। उसी प्रकार अन्धकारनाशक भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए इस बाधारहित मार्गपर सदा चक्कर लगाते रहते हैं
Demikian pula Āditya, dewa yang melenyapkan kegelapan, memelihara jagat dengan sinarnya dan terus beredar di jalan yang tak terhalang ini.
Verse 35
सिसृक्षुः शिशिराण्येव दक्षिणां भजते दिशम् | ततः सर्वाणि भूतानि कालो< भ्यच्छति शैशिर:,'शीतकी सृष्टि करनेकी इच्छासे ही सूर्यदेव दक्षिण दिशाका आश्रय लेते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंपर शीतकालका प्रभाव पड़ने लगता है। दक्षिणायनसे निवृत्त होनेपर वे भगवान् सूर्य स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंका तेज अपने तेजसे हर लेते हैं, यही कारण है कि मनुष्योंको पसीना, थकावट, आलस्य और ग्लानिका अनुभव होता है तथा प्राणी सदा निद्राका ही बार-बार सेवन करते हैं। इस प्रकार इस अन्तरिक्ष मार्गको आवृत करके समस्त प्रजाकी पुष्टि करते हुए भगवान् सूर्य पुन: वर्षाकी सृष्टि करते हैं
Ketika Sang Surya berkehendak menumbuhkan musim dingin, ia menempuh arah selatan. Maka masa śaiśira menyelimuti semua makhluk, dan sentuhan dingin terasa di seluruh ciptaan.
Verse 36
स्थावराणां च भूतानां जजड़मानां च तेजसा । तेजांसि समुपादत्ते निवृत्त: स विभावसु:,'शीतकी सृष्टि करनेकी इच्छासे ही सूर्यदेव दक्षिण दिशाका आश्रय लेते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंपर शीतकालका प्रभाव पड़ने लगता है। दक्षिणायनसे निवृत्त होनेपर वे भगवान् सूर्य स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंका तेज अपने तेजसे हर लेते हैं, यही कारण है कि मनुष्योंको पसीना, थकावट, आलस्य और ग्लानिका अनुभव होता है तथा प्राणी सदा निद्राका ही बार-बार सेवन करते हैं। इस प्रकार इस अन्तरिक्ष मार्गको आवृत करके समस्त प्रजाकी पुष्टि करते हुए भगवान् सूर्य पुन: वर्षाकी सृष्टि करते हैं
Ketika ia berbalik, Vibhāvasu—Sang Surya—menarik ke dalam dirinya daya cahaya (tejas) makhluk-makhluk, baik yang diam maupun yang bergerak, bahkan yang dibuat lesu oleh dingin.
Verse 37
ततः स्वेदक्लमौ तन््द्री ग्लानिश्व भजते नरान् । प्राणिभि: सतत स्वप्नो हाभीक्षणं च निषेव्यते,'शीतकी सृष्टि करनेकी इच्छासे ही सूर्यदेव दक्षिण दिशाका आश्रय लेते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंपर शीतकालका प्रभाव पड़ने लगता है। दक्षिणायनसे निवृत्त होनेपर वे भगवान् सूर्य स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंका तेज अपने तेजसे हर लेते हैं, यही कारण है कि मनुष्योंको पसीना, थकावट, आलस्य और ग्लानिका अनुभव होता है तथा प्राणी सदा निद्राका ही बार-बार सेवन करते हैं। इस प्रकार इस अन्तरिक्ष मार्गको आवृत करके समस्त प्रजाकी पुष्टि करते हुए भगवान् सूर्य पुन: वर्षाकी सृष्टि करते हैं
Sesudah itu, keringat dan letih, kantuk dan lesu menimpa manusia; dan di antara makhluk hidup, tidur terus-menerus—berulang kali—menjadi tempat berlindung.
Verse 38
एवमेतदनिर्देश्यं मार्गमावृत्य भानुमान् । पुन: सृजति वर्षाणि भगवान् भावयन् प्रजा:,'शीतकी सृष्टि करनेकी इच्छासे ही सूर्यदेव दक्षिण दिशाका आश्रय लेते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंपर शीतकालका प्रभाव पड़ने लगता है। दक्षिणायनसे निवृत्त होनेपर वे भगवान् सूर्य स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंका तेज अपने तेजसे हर लेते हैं, यही कारण है कि मनुष्योंको पसीना, थकावट, आलस्य और ग्लानिका अनुभव होता है तथा प्राणी सदा निद्राका ही बार-बार सेवन करते हैं। इस प्रकार इस अन्तरिक्ष मार्गको आवृत करके समस्त प्रजाकी पुष्टि करते हुए भगवान् सूर्य पुन: वर्षाकी सृष्टि करते हैं
Demikianlah, setelah menyelubungi lintasan langit yang tak terlukiskan itu, Sang Dewa Surya kembali menurunkan hujan, menopang dan menyuburkan segenap makhluk. Dengan gerak yang tertib serta jalan yang disamarkan, ia menata musim-musim: sejuk, panas, dan hujan datang pada waktunya, menjadi penopang kehidupan.
Verse 39
वृष्टिमारुतसंतापै: सुखै: स्थावरजड्रमान् | वर्धयन् सुमहातेजा: पुन: प्रतिनिवर्तते,“महातेजस्वी सूर्यदेव वृष्टि, वायु और तापद्दारा सुखपूर्वक चराचर जीवोंकी पुष्टि करते हुए पुनः अपने स्थानपर लौट आते हैं
Dengan sinar yang amat agung, Sang Surya—melalui hujan, angin, dan hangatnya panas—menumbuhkan serta memelihara semua makhluk, yang diam maupun bergerak, dengan cara yang membawa kebaikan; lalu ia kembali ke lintasan dan tempatnya yang telah ditetapkan. Bait ini menegaskan irama alam yang tertib dan menopang hidup, laksana kewajiban yang dijalankan tanpa menyimpang.
Verse 40
एवमेष चरन् पार्थ कालचक्रमतन्द्रित: । प्रकर्षन् सर्वभूतानि सविता परिवर्तते,“कुन्तीनन्दन! इस प्रकार ये भगवान् सूर्य सावधान हो समस्त प्राणियोंका आकर्षण और पोषण करते हुए विचरते और कालचक्रका संचालन करते हैं
Wahai putra Kuntī, demikianlah Savitṛ bergerak—senantiasa waspada—menarik semua makhluk ke lintasan yang telah ditetapkan bagi mereka dan memelihara mereka, seraya memutar roda Waktu tanpa henti.
Verse 41
संतता गतिरेतस्य नैष तिष्ठति पाण्डव | आदायैव तु भूतानां तेजो विसृजते पुन:,'युधिष्ठिर! यह सूर्यदेवकी निरन्तर चलनेवाली गति है। सूर्य कभी एक क्षणके लिये भी रुकते नहीं हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंके रसमय तेजको ग्रहण करके पुनः उसे वर्षाकालमें बरसा देते हैं। भारत! ये भगवान् सविता सम्पूर्ण भूतोंकी आयु और कर्मका विभाग करते हुए दिन-रात, कला-काष्ठा आदि समयकी निरन्तर सृष्टि करते रहते हैं!
Wahai Pāṇḍava, gerak Surya ini tak terputus; ia tidak berhenti walau sekejap. Setelah menyerap daya cahaya dan sari kehidupan dari semua makhluk, ia melepaskannya kembali pada musim yang semestinya—menjelma sebagai hujan.
Verse 42
विभजन् सर्वभूतानामायु: कर्म च भारत । अहोरात्र॑ कला: काष्ठा: सृजत्येष सदा विभु:,'युधिष्ठिर! यह सूर्यदेवकी निरन्तर चलनेवाली गति है। सूर्य कभी एक क्षणके लिये भी रुकते नहीं हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंके रसमय तेजको ग्रहण करके पुनः उसे वर्षाकालमें बरसा देते हैं। भारत! ये भगवान् सविता सम्पूर्ण भूतोंकी आयु और कर्मका विभाग करते हुए दिन-रात, कला-काष्ठा आदि समयकी निरन्तर सृष्टि करते रहते हैं!
Wahai Bhārata, Tuhan yang Mahakuasa ini—Surya—senantiasa membagi usia dan buah perbuatan bagi semua makhluk. Ia terus-menerus melahirkan tatanan waktu: siang dan malam, beserta ukuran-ukuran halus seperti kalā dan kāṣṭhā, sehingga keteraturan dunia tetap tegak.
Verse 162
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें कुबेरवाक्यविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah berakhir bab ke-162 dalam Yakṣa-yuddha Parva yang termasuk dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, yang membahas sabda-sabda Kubera.
Verse 163
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि मेरुदर्शने त्रिषष्टयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें मेरुदर्शनविषयक एक सौ तिरसठसाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, di bagian Yakṣa-yuddha Parva, bab tentang penampakan Gunung Meru—bab ke-163—berakhir.
Whether the pursuit of extraordinary power (divine weapons) can be justified without ethical risk; Arjuna resolves the dilemma by stating he will not deploy such weapons against humans without appropriate countermeasures and necessity.
Authority and capability must be paired with restraint and tested intention; knowledge with high consequences is transmitted through disciplined training, procedural approval, and explicit limits on use.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-significance is narrative and ethical—Arjuna’s eligibility is demonstrated through steadiness, humility, and commitment to responsible use, situating astra-vidyā within a dharma-governed framework.