Atharva Veda Sukta 5
Kanda 11Anuvaka 1Sukta 525 Mantras

Sukta 5

Rishi: Atharvanic tradition (often attributed to Brahmacārin/Brahmacarya complex in AV 11.5)

Devata: Brahmacarya (personified vow-power) / implicit Brahman

Chandas: Anuṣṭubh (predominant in this section)

Recitation with translationAtharva Veda 11.5

Mantras

Mantra 1

ब्रह्मचर्यम्। ब्र॒ह्म॒चा॒रीष्णंश्च॑रति॒ रोद॑सी उ॒भे तस्मि॑न् दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति । स दा॑धार पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ स आ॑चा॒र्यं१ तप॑सा पिपर्ति

ब्रह्मचारी वो स्टूडेंट है जो अपनी पढ़ाई में पूरा लग गया होता है। वो दोनों दुनिया में चलता है, ध्यान से। उसके अंदर सब देव एक हो जाते हैं। वो धरती और आसमान को संभालता है। अपनी तपस्या से वो अपने गुरु को भी चलाता है।

Mantra 2

ब्र॒ह्म॒चा॒रिणं॑ पि॒तरो॑ देवज॒नाः पृथ॑ग् दे॒वा अ॑नु॒संय॑न्ति॒ सर्वे॑ । ग॒न्ध॒र्वा ए॑न॒मन्वा॑य॒न् त्रय॑स्त्रिंशत् त्रिश॒ताः ष॑ट्सह॒स्राः सर्वा॒न्त्स दे॒वांस्तप॑सा पिपर्ति

जब कोई ब्रह्मचारी बनता है तो सब उसके पीछे लग जाते हैं। पितर, देवता, सब आस-पास रहते हैं। गंधर्व भी उसके साथ चलते हैं। तीस-तीरथ देवता, तीन सौ और छह हज़ार, इतने सारे देव लोग उसकी तपस्या से जान लेते हैं।

Mantra 3

आ॒चा॒र्यऽ उप॒नय॑मानो ब्रह्मचा॒रिणं॑ कृणुते॒ गर्भ॑म॒न्तः । तं रात्री॑स्ति॒स्र उ॒दरे॑ बिभर्ति॒ तं जा॒तं द्रष्टु॑मभि॒संय॑न्ति दे॒वाः

गुरु जब शिष्य को अपने पास बुलाते हैं तो उस्से नयी लाइफ देते हैं। तीन रात तक वो शिष्य गुरु के पेट में रहता है जैसे बच्चा हो। जब वो नया जनम लेता है तब देव लोग आके उस्से देखते हैं।

Mantra 4

इ॒यं स॒मित् पृ॑थि॒वी द्यौर्द्वितीयो॒तान्तरि॑क्षं स॒मिधा॑ पृणाति । ब्र॒ह्म॒चा॒री स॒मिधा॒ मेख॑लया॒ श्रमे॑ण लो॒कांस्तप॑सा पिपर्ति

यह लकड़ी जला के धुआँ बनता है, वो धरती है। आसमान दूसरा है। हवा भी इस्से भरता है। ब्रह्मचारी लकड़ी पकड़े, डोरी बाँधे, मेहनत करे, ऐसे ही वो तीनों दुनिया को चलाता है।

Mantra 5

पूर्वो॑ जा॒तो ब्रह्म॑णो ब्रह्मचा॒री घ॒र्मं वसा॑न॒स्तप॒सोद॑तिष्ठत्। तस्मा॑ज्जा॒तं ब्राह्म॑णं॒ ब्रह्म॑ ज्ये॒ष्ठं दे॒वाश्च॒ सर्वे॑ अ॒मृते॑न सा॒कम्

सबसे पहले ब्रह्मचारी पैदा हुआ। गरम तपस्या करके वो उठा। उस्से ब्राह्मण पैदा हुआ, जो सबसे बड़ा ज्ञान है। सब देव लोग भी उसके साथ अमृत पा के रहने लगे।

Mantra 6

ब्र॒ह्म॒चा॒र्येऽति स॒मिधा॒ समि॑द्धः कार्ष्णं॒ वसा॑नो दीक्षि॒तो दी॒र्घश्म॑श्रुः । स स॒द्य ए॑ति॒ पूर्व॑स्मा॒दुत्त॑रं समु॒द्रं लो॒कान्त्सं॒गृभ्य॒ मुहु॑रा॒चरि॑क्रत्

यह ब्रह्मचारी अपनी प्रैक्टिस में पूरा लग गया है, जैसे आग में लकड़ी डाल के भड़का दी हो। काला कपड़ा पहना है, बाल लंबे करके रखे हैं, और व्रत में है। वो सीधा पहले समुंदर से दूसरे समुंदर की तरफ चला जाता है। सारी दुनिया को अपने साथ ले के चलता है, और बार-बार अपना काम करता रहता है।

Mantra 7

ब्र॒ह्म॒चा॒री ज॒नय॒न् ब्रह्मा॒पो लो॒कं प्र॒जाप॑तिं परमे॒ष्ठिनं॑ वि॒राज॑म्। गर्भो॑ भू॒त्वामृत॑स्य॒ योना॒विन्द्रो॑ ह भू॒त्वासु॑रांस्ततर्ह

ब्रह्मचारी ने सब कुछ पैदा किया, ब्रह्म शक्ति, पानी, दुनिया, प्रजापति, परमेष्ठिन और विराज। वो अमृत की कोख में गर्भ बन गया। फिर इंद्र बन के उसने असुरों को हरा दिया।

Mantra 8

आ॒चा॒र्यऽ स्ततक्ष॒ नभ॑सी उ॒भे इ॒मे उ॒र्वी ग॑म्भी॒रे पृ॑थि॒वीं दिवं॑ च । ते र॑क्षति॒ तप॑सा ब्रह्मचा॒री तस्मि॑न् देवाः संम॑नसो भवन्ति

गुरु ने दोनों आसमान बनाए, दोनों छोटे और गहरे। एक ज़मीन, एक आसमान। ब्रह्मचारी अपनी तपस्या से इन दोनों की रक्षा करता है। इसमें सब देव एक मन हो जाते हैं।

Mantra 9

इ॒मां भूमिं॑ पृथि॒वीं ब्र॑ह्मचा॒री भि॒क्षामा ज॑भार प्रथ॒मो दिवं॑ च । ते कृ॒त्वा स॒मिधा॒वुपा॑स्ते॒ तयो॒रार्पि॑ता॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑

ब्रह्मचारी ने पहले यह ज़मीन बड़ी ज़मीन भीख में ली। आसमान भी लिया। दोनों को अपना लकड़ी जैसा उपयोग बनाया और बैठ गया। इन दोनों पर ही सारी दुनिया टिकी है।

Mantra 10

अ॒र्वाग॒न्यः प॒रो अ॒न्यो दि॒वस्पृ॒ष्ठाद् गुहा॑ नि॒धी निहि॑तौ॒ ब्राह्म॑णस्य । तौ र॑क्षति॒ तप॑सा ब्रह्मचा॒री तत् केव॑लं कृणुते॒ ब्रह्म॑ वि॒द्वान्

एक खज़ाना इधर है, दूसरा उस पार। आसमान के पीछे छुपा के रखा है, ब्राह्मण के लिए। ब्रह्मचारी अपनी तपस्या से इन दोनों की रक्षा करता है। जो ब्रह्म जानता है, वो दोनों को अपना बना लेता है।

Mantra 11

अ॒र्वाग॒न्य इ॒तो अ॒न्यः पृ॑थि॒व्या अ॒ग्नी स॒मेतो॒ नभ॑सी अन्त॒रमे। तयोः॑ श्रयन्ते र॒श्मयोऽधि॑ दृ॒ढास्ताना ति॑ष्ठति॒ तप॑सा ब्रह्मचा॒री

दो आग हैं, एक इस तरफ, एक उस तरफ। दोनों धरती से आके आसमान के बीच मिल गई हैं। उन दोनों पर धागे तने हैं जो पक्के हैं। ब्रह्मचारी उनपर अपनी तपस्या से खड़ा रहता है।

Mantra 12

अ॒भि॒क्रन्द॑न् स्त॒नय॑न्नरु॒णः शि॑ति॒ङ्गो बृ॒हच्छेपोऽनु॒ भूमौ॑ जभार । ब्र॒ह्म॒चा॒री सि॑ञ्चति॒ सानौ॒ रेतः॑ पृथि॒व्यां तेन॑ जीवन्ति प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः

जब वो गरजता है, बादल गूँजने लगते हैं। लाल रंग का वो चमकता हुआ, बड़ा सा, ज़मीन पर आके बैठ गया। ब्रह्मचारी बीज ऊपर बिखेरता है। इससे धरती जाग उठी है और चारों दिशा में ज़िन्दगी फैल गई।

Mantra 13

अ॒ग्नौ सूर्ये॑ च॒न्द्रम॑सि मात॒रिश्व॑न् ब्रह्मचा॒र्य॑१प्सु स॒मिध॒मा द॑धाति । तासा॑म॒र्चींषि॒ पृथ॑ग॒भ्रे च॑रन्ति॒ तासा॒माज्यं॒ पुरु॑षो व॒र्षमापः॑

अग्नि में, सूरज में, चाँद में, ब्रह्मचारी पानी में आग लगाता है। उनकी आग के अलग-अलग शोले बादलों में चलते हैं। उसमें घी इंसान है और बारिश पानी है।

Mantra 14

आ॒चा॒र्योऽ मृ॒त्युर्वरु॑णः॒ सोम॒ ओष॑धयः॒ पयः॑ । जी॒भूता॑ आस॒न्त्सत्वा॑न॒स्तैरि॒दं स्व॑१राभृ॑तम्

गुरु पहले मृत्यु था, वरुण था। वो सोम था, पौधे थे, दूध था। सब प्राणियों की जीभाँ बन गए। उनसे ही स्वर्ग मिला।

Mantra 15

अ॒मा घृ॒तं कृ॑णुते॒ केव॑लमाचा॒र्यो भू॒त्वा वरु॑णो॒ यद्य॒दैच्छत् प्र॒जाप॑तौ । तद् ब्र॑ह्मचा॒री प्राय॑च्छत् स्वन् मि॒त्रो अध्या॒त्मनः॑

घर में वो सिर्फ घी बनाता है। गुरु जब वरुण बनता है, जो चाहता है वो पा लेता है। ब्रह्मचारी उसे दे देता है। यह स्वर्ग अंदर से मिलता है।

Mantra 16

आ॒चा॒र्योऽ ब्रह्मचा॒री ब्र॑ह्मच॒री प्र॒जाप॑तिः । प्र॒जाप॑ति॒र्वि रा॑जति वि॒राडिन्द्रो॑ऽभवद् व॒शी

गुरु वोही है जो ब्रह्मचारी है, और ब्रह्मचारी वोही है जो प्रजापति है। प्रजापति चमक के सामने आता है। फिर वो विराज बना, इंद्र बना, सब पर काबू पाने वाला।

Mantra 17

ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण॒ तप॑सा॒ राजा॑ रा॒ष्ट्रं वि र॑क्षति । आ॒चा॒र्योऽ ब्रह्म॒चर्ये॑ण ब्रह्मचा॒रिण॑मिच्छते

राजा अपने देश को ब्रह्मचर्य और तप से बचाता है। गुरु भी ब्रह्मचर्य से ही शिष्य को ढूंढ़ता है जो व्रत में लगा हो।

Mantra 18

ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण क॒न्या॒३ युवा॑नं विन्दते॒ पति॑म्। अ॒न॒ड्वान् ब्र॑ह्म॒चर्ये॒णाश्वो॑ घा॒सं जि॑गीर्षति

कन्या ब्रह्मचर्य से जवान पति पाती है। बैल और घोड़ा भी ब्रह्मचर्य से अपने लिए घास खाना चाहते हैं।

Mantra 19

ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण॒ तप॑सा दे॒वा मृ॒त्युमपा॑घ्नत । इन्द्रो॑ ह ब्र॒ह्मचर्ये॑ण दे॒वेभ्यः॒ स्व॑१राभ॑रत्

देवताओं ने ब्रह्मचर्य और तप से मृत्यु को मारा और दूर भगाया। इंद्र ने भी ब्रह्मचर्य से स्वर्ग की रोशनी पाई और देवताओं को दी।

Mantra 20

ओष॑धयो भूतभ॒व्यम॑होरा॒त्रे वन॒स्पतिः॑ । सं॒व॒त्स॒रः स॒हर्तुभि॒स्ते जा॒ता ब्र॑ह्मचा॒रिणः॑

जड़ी-बूटियाँ, जो हुआ और जो होने वाला है, दिन और रात, पेड़-पौधों का स्वामी, साल और ऋतुएँ, यह सब ब्रह्मचारी से पैदा हुए हैं।

Mantra 21

पार्थि॑वा दि॒व्याः प॒शव॑ आर॒ण्या ग्रा॒म्याश्च॒ ये। अ॒प॒क्षाः प॒क्षिण॑श्च॒ ये ते जा॒ता ब्र॑ह्मचा॒रिणः॑

धरती के जानवर, आसमान के जानवर, जंगल वाले और गाँव वाले सब आते हैं। जो उड़ने वाले पक्षी हैं और जो न उड़ सकें, वो भी। इतने सारे जानवर पैदा हुए एक ब्रह्मचारी से जो व्रत में रहता है।

Mantra 22

पृथ॒क् सर्वे॑ प्राजाप॒त्याः प्रा॒णाना॒त्मसु॑ बिभ्रति । तान्त्सर्वा॒न् ब्रह्म॑ रक्षति ब्रह्मचा॒रिण्याभृ॑तम्

प्रजापति की शक्तियाँ सब अलग-अलग हैं। वो अपने अंदर साँस ले कर रखती हैं। ब्रह्मन इन सब की हिफ़ाज़त करता है। यह ब्रह्मन ब्रह्मचारी ले कर आता है।

Mantra 23

दे॒वाना॑मे॒तत् प॑रिषू॒तमन॑भ्यारूढं चरति॒ रोच॑मानम्। तस्मा॑ज्जा॒तं ब्राह्म॑णं॒ ब्रह्म॑ ज्ये॒ष्ठं दे॒वाश्च॒ सर्वे॑ अ॒मते॑न सा॒कम्

देवताओं का यह शुद्ध रूप है, जो किसी पर नहीं चढ़ता। यह चमकता हुआ चलता है। इससे ब्रह्मन पैदा होता है, जो सबसे बड़ा है। और सब देवता अमरत्व के साथ इसमें हैं।

Mantra 24

ब्र॒ह्म॒चा॒री ब्रह्म॒ भ्राज॑द् बिभर्ति॒ तस्मि॑न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ स॒मोताः॑ । प्रा॒णा॒पा॒नौ ज॒नय॒न्नाद् व्या॒नं वाचं॒ मनो॒ हृद॑यं॒ ब्रह्म॑ मे॒धाम्

ब्रह्मचारी चमकता हुआ ब्रह्मन अपने साथ ले कर चलता है। उसमें सब देवता बस गए हैं। वो साँस की दोनों दिशाओं को पैदा करता है, फिर व्यान भी। बोली, मन, दिल, ब्रह्मन और बुद्धि सब उसमें से आते हैं।

Mantra 25

चक्षुः॒ श्रोत्रं॒ यशो॑ अ॒स्मासु॑ धे॒ह्यन्नं॒ रेतो॒ लोहि॑तमु॒दर॑म्।२५॥ तानि॒ कल्प॑द् ब्रह्मचा॒री स॑लि॒लस्य॑ पृ॒ष्ठे तपो॑ऽतिष्ठत् त॒प्यमा॑नः समु॒द्रे। स स्ना॒तो ब॒भ्रुः पि॑ङ्ग॒लः पृ॑थि॒व्यां ब॒हु रो॑चते

हमें आँख और कान दे, और खूब नाम रोशन कर। खाना, वीर्य, खून और पेट सब दे। ब्रह्मचारी ने यह सब ठीक से बनाया। वो पानी के ऊपर खड़ा होके तपस्या करता रहा, समुंदर में तपता रहा। नहाने के बाद वो धरती पर चमकने लगा, ब्राउन और पीला रंग ले कर।

Frequently Asked Questions

It praises Brahmacarya (disciplined sacred studentship) as a real power that produces tapas, radiance, and intelligence, while stabilizing the teacher–student institution and even strengthening protection of the realm.

It presents brahmacarya as an inner integration: regulated vitality supports speech, mind, and heart, culminating in medhā (inspired understanding) and brahmavarcasa (spiritual luster).

It is best used as a vow-affirming recitation before study or teaching—paired with ethical restraint, truthful speech, and calm breathing—so the recitation reinforces discipline, clarity, and steadiness rather than serving as a material-ritual spell.

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