Opening the text

Maṇija-nṛpa-vaṃśa-kathanaṃ tathā Govinda-stutiḥ
Genealogical-Historiography and Devotional-Soteriology
वराह–पृथ्वी संवाद के इस अध्याय में महातपा एक राजा को त्रेतायुग से जुड़े मणिज वंश के राजाओं का क्रम बताता है और समझाता है कि जो शासक पृथ्वी का पालन करते हुए विविध यज्ञ करते हैं, वे स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं। इसके बाद वराह कहते हैं कि ऐसी ब्रह्मविद्या-सदृश कथा सुनकर राजर्षि वैराग्य धारण करता है, वृन्दावन जाकर गोविन्द (हरि/विष्णु) की एकाग्र स्तुति करता है, उन्हें सृष्टि-प्रलय और मोक्ष का परम आधार मानकर। स्तुति में संसार को भयावह सागर, माया और द्वैत को पार कराने वाला एकमात्र आश्रय भगवच्छरण बताया गया है। अंत में वह योग से देह त्यागकर नित्य गोविन्द में लीन हो जाता है, और राजधर्म के भार को स्थिर करने हेतु त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है।
Verse 1
महातपा उवाच । आदितरेतासु राजानो मणिजा ये प्रकीर्तिताः । कथयिष्यामि तान् राजन् यत्र जातोऽपि पार्थिव ॥ ३६.१ ॥
महातपा बोले—हे राजन्, आदितरेतस् के वंश में जो राजा ‘मणिजा’ नाम से प्रसिद्ध हैं, उनका वर्णन मैं करूँगा; उसी कुल में वह पार्थिव भी उत्पन्न हुआ था।
Verse 2
योऽसौ सुप्रभानामासीत्त स त्वं राजन् कृते युगे । जातोऽसि नाम्ना विख्यातः प्रजापाल इति शोभनः ॥ ३६.२ ॥
हे राजन्, कृतयुग में जो ‘सुप्रभा’ नाम से प्रसिद्ध था, वही तुम हो। अब तुम ‘प्रजापाल’ नाम से विख्यात होकर जन्मे हो, हे शोभन!
Verse 3
शेषास्त्रेतायुगॆ राजन् भविष्यन्ति महाबलाः । यो दीप्ततेजा मणिजः स शान्तेति प्रकीर्तितः ॥ ३६.३ ॥
हे राजन्, शेष जन त्रेतायुग में महाबली होकर उत्पन्न होंगे। जो दीप्त तेज वाला मणि से उत्पन्न है, वह ‘शान्ति’ नाम से प्रसिद्ध कहा गया है।
Verse 4
सुरश्मिर्भविता राजा शशकर्णो महाबलः । शुभदर्शनः पाञ्चालो भविष्यति नराधिपः ॥ ३६.४ ॥
‘सुरश्मि’ नाम का राजा होगा; ‘शशकर्ण’ महाबली होगा; और शुभदर्शन ‘पाञ्चाल’ भी मनुष्यों में अधिपति बनेगा।
Verse 5
सुशान्तिरङ्गवंशे वै सुन्दरोऽप्यङ्ग इत्युत । सुन्दश्च मुचुकुन्दोऽभूत्सुद्युम्नस्तुर एव च ॥ ३६.५ ॥
अङ्ग वंश में निश्चय ही ‘सुशान्ति’ हुआ; और ‘सुन्दर’ भी ‘अङ्ग’ कहलाया। ‘सुन्द’ और ‘मुचुकुन्द’ हुए; तथा ‘सुद्युम्न’ और ‘तुर’ भी।
Verse 6
सुमनाः सोमदत्तस्तु शुभः संवरणोऽभवत् । सुशीलो वसुदानस्तु सुखदो सुपतिर्भवत् ॥ ३६.६ ॥
‘सुमना’ और ‘सोमदत्त’ ‘शुभ’ तथा ‘संवरण’ बने। इसी प्रकार ‘सुशील’ और ‘वसुदान’ ‘सुखद’ और ‘सुपति’ बने।
Verse 7
शम्भुः सेनापतिरभूत् सुकान्तो दशरथः स्मृतः । सोमोऽभूज्जनको राजा एते त्रेतायुगॆ नृप ॥ ३६.७ ॥
शम्भु सेना का सेनापति हुआ; सुकान्त को दशरथ के रूप में स्मरण किया जाता है। सोम जनक राजा हुआ—ये त्रेता युग के नृप थे।
Verse 8
सर्वे भूमिमिमां राजन् भुक्त्वा ते वसुधाधिपाः । इष्ट्वा च विविधैर्यज्ञैर्दिवं प्राप्स्यन्त्यसंशयम् ॥ ३६.८ ॥
हे राजन्, वे सब वसुधाधिपति इस भूमि का भोग (अर्थात् शासन) करके और विविध यज्ञों से इष्टि करके, निःसंदेह स्वर्ग को प्राप्त होंगे।
Verse 9
श्रीवराह उवाच । एवं श्रुत्वा स राजर्षिर्ब्रह्मविद्याममृतं प्रभुः । आख्यानं परमं प्रीतस्तपश्चर्तुमियाद्वनम् ॥ ३६.९ ॥
श्रीवराह बोले—ऐसा सुनकर वह राजर्षि, समर्थ प्रभु, अमृत-तुल्य ब्रह्मविद्या को प्राप्त करके, परम आख्यान से प्रसन्न होकर तप करने हेतु वन को गया।
Verse 10
ऋषिरध्यात्मयोगेन विहायेदं कलेवरम् । ब्रह्मभूतोऽभवद्धात्री हरौ लयमवाप च ॥ ३६.१० ॥
ऋषि ने अध्यात्म-योग के द्वारा इस शरीर को त्याग दिया। ब्रह्म में स्थित होकर, धात्री भी हरि में लय को प्राप्त हुई।
Verse 11
वृन्दावनं च राजा असौ तपोऽर्थं गतवान् प्रभुः । तत्र गोविन्दनामानं हरिं स्तोतुमथारभत् ॥ ३६.११ ॥
वह राजा, प्रभु-स्वरूप, तप के लिए वृन्दावन गया; वहाँ उसने गोविन्द-नाम वाले हरि की स्तुति आरम्भ की।
Verse 12
राजोवाच । नमामि देवं जगतां च मूर्तिं गोपेन्द्रमिन्द्रानुजमप्रमेयम् । संसारचक्रक्रमणैकदक्षं क्षितीधरं देववरं नमामि ॥ ३६.१२ ॥
राजा बोला—मैं जगत् के मूर्तिमान् देव, गोपेन्द्र, इन्द्र के अनुज, अप्रमेय, संसार-चक्र को चलाने में अद्वितीय दक्ष, पृथ्वी-धारक, देवों में श्रेष्ठ को प्रणाम करता हूँ।
Verse 13
भवोदधौ दुःखशतोर्मिभीमे जरावर्ते कृष्णपातालमूले । तदन्तमेको दधते सुखं मे नमोऽस्तु ते गोपतिरप्रमेय ॥ ३६.१३ ॥
भव-सागर में—दुःख की सैकड़ों तरंगों से भयानक—जरा के भँवर में, कृष्ण पाताल के मूल में, उसका अंत और मेरा कल्याण आप ही स्थापित करते हैं। हे गोपति, अप्रमेय, आपको नमस्कार है।
Verse 14
व्याध्यादियुक्तः पुरुषैर्ग्रहैश्च सङ्घट्टमानं पुनरेव देव । नमोऽस्तु ते युद्धरते महात्मा जनार्दनो गोपतिरुग्रबाहुः ॥ ३६.१४ ॥
हे देव! जब रोग आदि से पीड़ित मनुष्य और शत्रु-बलों से ग्रस्त जन फिर-फिर आघात पाकर दब जाते हैं, तब युद्ध में रत महात्मा—जनार्दन, गोपति, उग्रबाहु—आपको नमस्कार है।
Verse 15
त्वमुत्तमः सर्वविदां सुरेश त्वया ततं विश्वमिदं समस्तम् । गोपेन्द्र मां पाहि महानुभाव भवाद्भीतं तिग्मरथाङ्गपाणे ॥ ३६.१५ ॥
आप समस्त विद्वानों में उत्तम हैं, हे सुरेश; आपसे यह समूचा विश्व व्याप्त है। हे गोपेन्द्र, हे महानुभाव, संसार से भयभीत मुझे—हे तीक्ष्ण चक्रधारी—रक्षा कीजिए।
Verse 16
परोऽसि देव प्रवरः सुराणां पुंसः स्वरूपोऽसि शशिप्रकाशः । हुताशवक्त्राच्युत तीव्रभाव गोपेन्द्र मां पाहि भवे पतन्तम् ॥ ३६.१६ ॥
आप परात्पर हैं, हे देव; देवों में श्रेष्ठ हैं। आप परम पुरुष का स्वरूप हैं, चन्द्रमा-सा प्रकाशमान। हे अच्युत, अग्नि-सदृश मुख वाले, तीव्र तेजस्वी, हे गोपेन्द्र—भव में गिरते हुए मेरी रक्षा कीजिए।
Verse 17
संसारचक्रक्रमणान्यनेका- न्याविर्भवन्त्यच्युत देहिनां यत् । त्वन्मायया मोहितानां सुरेश कस्ते मायां तरते द्वन्द्वधामा ॥ ३६.१७ ॥
हे अच्युत! देहधारियों के लिए संसार-चक्र में घूमने के अनेक प्रकार प्रकट होते हैं। हे सुरेश! जो तेरी माया से मोहित हैं, उस द्वन्द्व-धामिनी माया को कौन पार कर सकता है?
Verse 18
अगोत्रमस्पर्शमरूपगन्ध- मनामनिर्देशमजं वरेण्यम् । गोपेन्द्र त्वां यद्युपासन्ति धीराः- स्ते मुक्तिभाजो भवबन्धमुक्ताः ॥ ३६.१८ ॥
हे गोपेन्द्र! जो धीर-स्थिर ज्ञानी तुझे—जो गोत्ररहित, अस्पर्श, रूप-गन्ध से परे, मन और वाणी के निर्देश से अतीत, अज और वरेण्य है—उपासते हैं, वे भव-बन्धन से मुक्त होकर मुक्ति के भागी होते हैं।
Verse 19
शब्दातिगं व्योमरूपं विमूर्त्तिं विकर्म्मिणां शुभभावं वरेण्यम् । चक्राब्जपाणिं तु तथोपचारादुक्तं पुराणे सततं नमामि ॥ ३६.१९ ॥
मैं पुराण में कहे गए विधिपूर्वक उपचार के अनुसार, उस परम वरेण्य को सदा नमस्कार करता हूँ—जो शब्द से अतीत, आकाश-स्वरूप, विमूर्त, कर्मरत जनों के लिए शुभभाव-स्वरूप है, और जिसके करों में चक्र तथा पद्म हैं।
Verse 20
त्रिविक्रमं क्रान्तजगत्त्रयं च चतुर्मूर्त्तिं विश्वगतां क्षितीशम् । शम्भुं विभुं भूतपतिं सुरेशं नमाम्यहं विष्णुमनन्तमूर्त्तिम् ॥ ३६.२० ॥
मैं अनन्तमूर्ति विष्णु को नमस्कार करता हूँ—त्रिविक्रम को, जिसने तीनों जगत् को नाप लिया; चतुर्मूर्ति, सर्वव्यापी, क्षितीश को; शम्भु, विभु, भूतपति और सुरेश को।
Verse 21
त्वं देव सर्वाणि चराचराणि सृजस्यथो संहरसे त्वमेव । मां मुक्तिकामं नय देव शीघ्रं यस्मिन् गता योगिनो नापयान्ति ॥ ३६.२१ ॥
हे देव! तू ही समस्त चर-अचर की सृष्टि करता है और तू ही उनका संहार करता है। हे भगवान! मुझे, मुक्ति-कामी को, शीघ्र उस पद में ले चल जहाँ पहुँचकर योगी फिर लौटते नहीं।
Verse 22
जयस्व गोविन्द महानुभाव जयस्व विष्णो जय पद्मनाभ । जयस्व सर्वज्ञ जयाप्रमेय जयस्व विश्वेश्वर विश्वमूर्ते ॥ ३६.२२ ॥
जय हो गोविन्द, हे महानुभाव; जय हो विष्णु; पद्मनाभ की जय। सर्वज्ञ की जय, अप्रमेय की जय; हे विश्वेश्वर, विश्वमूर्ति, आपकी जय हो।
Verse 23
श्रीवराह उवाच । एवं स्तुत्वा तदा राजा निधाय स्वं कलेवरम् । परमात्मनि गोविन्दे लयमागाच्छ शाश्वते ॥ ३६.२३ ॥
श्रीवराह बोले—इस प्रकार स्तुति करके उस राजा ने अपना शरीर त्याग दिया और शाश्वत परमात्मा गोविन्द में लय को प्राप्त हुआ।
Within the Varāha–Pṛthivī dialogue, the teaching opens as a didactic historiography: Mahātapā addresses a king and recounts a succession of Maṇija/Tretāyuga rulers, using their reigns to illustrate dharmic governance, yajña-performance, and the resulting heavenly attainments.
Varāha narrates the transformative effect of hearing this ‘brahmavidyā-like’ account: the rājarṣi’s mind turns from royal enjoyment and merit to renunciation; he withdraws to Vṛndāvana and begins an intense hymn (stuti) to Govinda as the supreme cause of creation, maintenance, dissolution, and liberation.
The stuti crescendos into a soteriological vision—saṃsāra as a dangerous ocean, māyā and dualities as binding forces, and Govinda as the sole refuge. The rājarṣi stabilizes his mind in yoga, relinquishes the body, and attains laya (mergence) in the eternal Govinda, modeling the passage from dharmic kingship to mokṣa-oriented withdrawal.
Vṛndāvana (sacred grove/forest landscape associated with Govinda); broader implied terrestrial domain of kingship (bhūmi, vasudhā) as Pṛthivī’s sphere.
The text juxtaposes two ideals: (1) dharmic governance—rulers enjoy and administer the earth (bhūmi/vasudhā) and perform yajñas, gaining posthumous merit; and (2) renunciant soteriology—hearing the teaching prompts a shift toward tapas, upāsanā of Govinda, and yogic release from saṃsāra. Together these present a continuum from responsible kingship (supporting Pṛthivī’s stability) to liberation-oriented withdrawal.
The chapter uses yuga-chronology rather than ritual calendrics: it explicitly references Kṛtayuga and Tretāyuga, and describes future rulers “in Tretāyuga.” No tithi, nakṣatra, māsa, or seasonal timings are specified for yajña or vrata practice in the provided verses.
Environmental stewardship is implicit in the idiom of Pṛthivī as the governed earth: kings ‘enjoy/hold’ the land (bhūmi, vasudhā) and are accountable through yajña and dharma, suggesting that legitimate rule includes maintaining terrestrial order. The narrative’s turn to renunciation further reduces the burden of acquisitive power on the earth, presenting withdrawal and self-restraint as complementary strategies for preserving balance within Pṛthivī’s domain.
A catalogue of rulers is presented, including names such as Suprabha (identified with the addressed king in Kṛtayuga), Śānti (as a noted Maṇija), Suraśmi, Śaśakarṇa, a Pāñcāla ruler, and other royal figures: Suśānti, Sundara (and Aṅga), Sunda, Muchukunda, Sudyumna, Sumanas, Somadatta, Śubha, Saṃvaraṇa, Suśīla, Vasudāna, Sukhada, Supati, Śambhu (as senāpati), Sukānta, Daśaratha, and Janaka. The chapter frames them as exemplary Tretāyuga nṛpas connected to royal succession traditions.
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