Adhyaya 35
Varaha PuranaAdhyaya 3517 Shlokas

Adhyaya 35: The Account of Soma’s Decline and Restoration, and the Paurṇamāsī Observance

Soma-kṣaya-janma kathā tathā paurṇamāsī-vrata

Mythic-Etiology and Ritual-Manual

वराह–पृथ्वी संवाद के इस अध्याय में चन्द्रमा के घटने‑बढ़ने का कारण और पौर्णमासी‑व्रत का विधान बताया गया है। अत्रि के वंश में सोम का जन्म, दक्ष की कन्याओं से विवाह और रोहिणी के प्रति विशेष आसक्ति से उत्पन्न विवाद का वर्णन है। दक्ष के शाप से सोम का क्षय होता है, जिससे वनस्पति और औषधियाँ दुर्बल पड़ती हैं और देव, मनुष्य तथा पशु कष्ट पाते हैं। सब शरण के लिए विष्णु के पास जाते हैं; विष्णु वरुणालय (समुद्र) के मंथन का उपदेश देते हैं, जिससे सोम का पुनः प्राकट्य होता है। सोम को देहधारियों के भीतर क్షेत्रज्ञ/जीव‑तत्त्व, जीवन का आधार, कहा गया है। फिर ब्रह्मा सोम को पौर्णमासी तिथि प्रदान करते हैं; जौ‑आहार सहित उपवास करने से ज्ञान, तेज, आरोग्य और समृद्धि मिलती है तथा पृथ्वी की वनस्पति‑संतुलन व्यवस्था स्थिर रहती है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

Dakṣa’s curse (śāpa) and Soma’s kṣaya (waning) as cosmic-ecological causalityOṣadhi (medicinal plants) decline and restoration as terrestrial balanceSoma as kṣetrajña/jīva (inner knower/life-principle) in embodied beingsSamudra-manthana (ocean churning) as regenerative cosmologyPaurṇamāsī tithi and upavāsa (fast) as ritualized social-ecological discipline

Shlokas in Adhyaya 35

Verse 1

महातपा उवाच । ब्रह्मणो मानसः पुत्रः अत्रिर्नाम महातपाः । तस्य पुत्रोऽभवत्सोमो दक्षजामातृतां गतः ॥ ३५.१ ॥

महातपा बोले—अत्रि नामक महातपस्वी ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। उनके पुत्र सोम हुए, जो दक्ष के जामाता बने।

Verse 2

सप्तविंशति याः कन्या दाक्षायण्यः प्रकीर्तिताः । सोमपत्‍न्योऽतिमन्तव्यास्तासां श्रेष्ठा तु रोहिणी ॥ ३५.२ ॥

दक्ष की जिन सत्ताईस कन्याओं का वर्णन प्रसिद्ध है, वे सोम (चन्द्र) की पत्नियाँ मानी जाती हैं; उनमें रोहिणी श्रेष्ठ मानी गई है।

Verse 3

तामेव रमते सोमो नेतराः इति शुश्रुमः । इतराः प्रोचुरागत्य दक्षस्यासमतां शशेः ॥ ३५.३ ॥

हमने सुना है कि सोम केवल उसी (रोहिणी) में रमते हैं, अन्य में नहीं। तब अन्य पत्नियाँ आकर चन्द्रमा के पक्षपात को दक्ष से कहने लगीं।

Verse 4

दक्षोऽप्यसकृदागत्य तमुवाच स नाकरॊत् । समतां सोऽपि तं दक्षः शशापान्तरहितो भव ॥ ३५.४ ॥

दक्ष भी बार-बार आकर उससे बोले, पर उसने आज्ञा न मानी। तब दक्ष ने उसे शाप दिया— “तू अंतर्हित हो जा, दृष्टि से ओझल हो जा।”

Verse 5

एवं शप्तस्तु दक्षेण सोमो देहं त्यजेदथ । उवाच सोमो दक्षं तु भवानेवं भविष्यति । अनेकजो विहायेमं ब्रह्मदेहं सनातनम् ॥ ३५.५ ॥

दक्ष के शाप से शप्त होकर सोम ने तब अपना देह त्याग दिया। सोम ने दक्ष से कहा— “तुम्हारे लिए भी ऐसा ही होगा; अनेक जन्म लेकर तुम भी इस सनातन, ब्रह्मा-प्रदत्त देह को छोड़ दोगे।”

Verse 6

एवमुक्त्वा क्षयं सोम आगमद् दक्षशापतः । देवा मनुष्याः पशवो नष्टे सोमे सवीरुधः ॥ ३५.६ ॥

ऐसा कहकर सोम, दक्ष के शाप से क्षय को प्राप्त हुआ। सोम के क्षीण होने पर देव, मनुष्य, पशु तथा वनस्पतियाँ—सब विनाश की ओर जाने लगे।

Verse 7

क्षीणाभवंस्तदा सर्वा ओषध्यश्च विशेषतः । क्षयं गच्छद्भिरत्यर्थमोषधीभिः सुरर्षभाः ॥ ३५.७ ॥

तब समस्त ओषधियाँ क्षीण हो गईं, विशेषकर औषधि-वनस्पतियाँ। हे देवश्रेष्ठो, जब ओषधियाँ अत्यधिक क्षय को प्राप्त होने लगीं, तब वे भी अत्यंत दुर्बल हो गए।

Verse 8

मूलेषु वीरुधां सोमः स्थित इत्यूचुरातुराः । तेषां चिन्ताऽभवत् तीव्रा विष्णुं च शरणं ययुः ॥ ३५.८ ॥

व्याकुल होकर उन्होंने कहा— “सोम वनस्पतियों की जड़ों में स्थित है।” उनकी चिंता तीव्र हो उठी और वे शरण के लिए विष्णु के पास गए।

Verse 9

भगवानाह तान् सर्वान् ब्रूत किं क्रियते मया । ते चोचुर्देव दक्षेण शप्तः सोमो विनाशितः ॥ ३५.९ ॥

भगवान् ने उन सब से कहा—“बताओ, मुझे क्या करना चाहिए?” वे बोले—“हे देव, दक्ष के शाप से सोम नष्ट हो गया है।”

Verse 10

तानुवाच तदा देवो मथ्यतां कलशोदधिः । ओषध्यः सर्वतो देवाः प्रक्षिप्याशु सुसंयतैः ॥ ३५.१० ॥

तब देव ने कहा—“कलश-समुद्र का मंथन किया जाए। हे देवो, सब दिशाओं से औषधियाँ शीघ्र, संयमपूर्वक डालो।”

Verse 11

एवमुक्त्वा ततो देवान् दध्यौ रुद्रं हरिः स्वयम् । ब्रह्माणं च तथा दध्यौ वासुकिं नेत्रकारणात् ॥ ३५.११ ॥

ऐसा कहकर हरि ने स्वयं देवताओं का ध्यान किया—रुद्र का, तथा ब्रह्मा का; और नेत्र-कारण से वासुकि का भी स्मरण किया।

Verse 12

ते सर्वे तत्र सहिताः ममन्थुर्वरुणालयम् । तस्मिंस्तु मथिते जातः पुनः सोमो महीपते ॥ ३५.१२ ॥

वे सब वहाँ एकत्र होकर वरुण के आलय—समुद्र—का मंथन करने लगे। उस मंथन से, हे महीपते, सोम फिर उत्पन्न हुआ।

Verse 13

योऽसौ क्षेत्रज्ञसंज्ञो वै देहेऽस्मिन् पुरुषः परः । स एव सोमो मन्तव्यो देहिनां जीवसंज्ञितः । परेच्छया स मूर्तिं तु पृथक् सौम्यां प्रपेदिवान् ॥ ३५.१३ ॥

इस देह में जो ‘क्षेत्रज्ञ’ नाम से प्रसिद्ध परम पुरुष है, वही देहधारियों में ‘जीव’ कहलाने वाला सोम समझना चाहिए। परेच्छा से उसने पृथक् सौम्य मूर्ति धारण की है।

Verse 14

तमॆव देवमनुजाः षोडशेमाश्च देवताः । उपजीवन्ति वृक्षाश्च तथैवोषधयः प्रभुम् ॥ ३५.१४ ॥

मनुष्य, देवताओं के सोलह वर्ग, तथा वृक्ष और औषधियाँ—सब उसी प्रभु पर, पालनकर्ता स्वामी के रूप में, आश्रित होकर जीवित रहते हैं।

Verse 15

रुद्रस्तमेव सकलं दधार शिरसा तदा । तदात्मिका भवन्त्यापो विश्वमूर्तिरसौ स्मृतः ॥ ३५.१५ ॥

तब रुद्र ने उस समस्त तत्त्व को अपने शिर पर धारण किया। जल भी उसी स्वरूप के हो जाते हैं; वह ‘विश्वमूर्ति’ के नाम से स्मरण किए जाते हैं।

Verse 16

तस्य ब्रह्मा ददौ प्रीतः पौर्णमासीं तिथिं प्रभुः । तस्यामुपोषयेद् राजंस्तमर्थं प्रतिपादयेत् ॥ ३५.१६ ॥

प्रसन्न होकर प्रभु ब्रह्मा ने उसे पौर्णमासी की तिथि प्रदान की। उस दिन, हे राजन्, उपवास करे और जिस उद्देश्य से व्रत हो उसे पूर्ण करे।

Verse 17

यवान्नहारश्च भवेत् तस्य ज्ञानं प्रयच्छति । कान्तिं पुष्टिं च राजेन्द्र धनं धान्यं च केवलम् ॥ ३५.१७ ॥

यदि कोई जौ को आहार बनाकर रहे, तो वह उसे ज्ञान प्रदान करता है; और हे राजेन्द्र, विशेषतः कान्ति, पुष्टि, धन तथा धान्य भी देता है।

Frequently Asked Questions

The chapter presents cosmic order as interdependent with terrestrial well-being: Soma’s imbalance (favoritism and the resulting curse) produces ecological degradation (oṣadhi decline), and restoration requires disciplined, collective remediation (guided action and ritual observance). Philosophically, it also reframes Soma as the kṣetrajña/jīva principle sustaining embodied life, linking cosmology with embodied ethics.

The text specifies the paurṇamāsī tithi (full-moon lunar day) as Soma’s allotted observance time. It recommends upoṣa (fasting/observance) on that tithi, with yavānna (barley-based food) noted as the dietary regimen connected to the practice.

Environmental balance is depicted through the condition of vegetation and medicinal herbs (oṣadhayaḥ): when Soma wanes due to the curse, plants weaken and multiple life-forms are affected. The restoration of Soma through ocean-churning functions as a narrative model of ecological recovery, implying that maintaining cosmic regularity supports Earth’s botanical vitality.

The narrative references Atri (as Brahmā’s mānasa putra), Soma (Atri’s son), Dakṣa (as father-in-law and curser), Rohiṇī (identified as the foremost among Soma’s wives), and major deities involved in restoration—Viṣṇu, Rudra, Brahmā, and Vāsuki—alongside the collective categories of devas, humans, animals, trees, and oṣadhis.