Verse 3.1
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयः अस्माकमेवायं महिमा इति ॥१॥
ब्रह्म ने ही देवताओं के लिए विजय प्राप्त की। ब्रह्म की उस विजय में देवता अभिमान से उन्नत हो गए। उन्होंने सोचा—‘यह विजय केवल हमारी है; यह महिमा केवल हमारी है।’
Verse 3.2
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥२॥
उस (ब्रह्म) ने उनके मनोभाव को जान लिया और वह उनके सामने प्रकट हुआ। पर वे उसे पहचान न सके—‘यह कौन-सा यक्ष है?’
Verse 3.3
तेऽग्निमब्रुवन्—जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति। तथेति॥३॥
उन्होंने अग्नि से कहा—“हे जातवेद! यह जानो कि यह यक्ष क्या है।” अग्नि ने कहा—“तथास्तु।”
Verse 3.4
तदभ्यद्रवत्। तमभ्यवदत्—कोऽसीति। अग्निर्वा अहमस्मीति अब्रवीत्। जातवेदाः वा अहमस्मीति॥४॥
वह उसकी ओर दौड़ा। उस यक्ष ने उससे कहा—“तुम कौन हो?” उसने उत्तर दिया—“मैं ही अग्नि हूँ; मैं ही जातवेद हूँ।”
Verse 3.5
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति। अपि सर्वमिदं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति॥५॥
उसने कहा—“तुममें क्या सामर्थ्य है?” उसने उत्तर दिया—“पृथ्वी पर जो कुछ है, इस सबको मैं जला सकता हूँ।”
Verse 3.6
तस्मै तृणं निदधाव् एतद् दह इति । तद् उपप्रेयाय सर्वजवेन तन् न शशाक दग्धुम् । स तद् एव निववृते, नैतद् अशकद् विज्ञातुं यद् एतद् यक्षम् इति ॥६॥
उस (अग्नि) के सामने उसने तिनका रखकर कहा—“इसे जला दो।” वह समस्त वेग से उसकी ओर दौड़ा, पर उसे जला न सका। वह उसी प्रयत्न से लौट आया; यह यक्ष क्या है—यह जान न पाया।
Verse 3.7
अथ वायुम् अब्रुवन्—वायो एतद् विजानीहि किम् एतद् यक्षम् इति । तथा इति ॥७॥
फिर उन्होंने वायु से कहा—“हे वायु, इसे जानो—यह यक्ष क्या है?” उसने उत्तर दिया—“तथास्तु।”
Verse 3.8
तद् अभ्यद्रवत् । तम् अभ्यवदत्—कः असि इति । वायुर् वा अहम् अस्मि इत्य् अब्रवीत् । मातरिश्वा वा अहम् अस्मि इति ॥८॥
वह उसकी ओर दौड़ा। उसने उससे कहा—“तुम कौन हो?” उसने कहा—“मैं वायु ही हूँ; मैं मातरिश्वा ही हूँ।”
Verse 3.9
तस्मिन् त्वयि किं वीर्यम् इति। अपि इदं सर्वम् आददीयम्, यदिदं पृथिव्याम् इति॥९॥
उन्होंने उससे कहा—“तुममें कौन-सा सामर्थ्य है?” “तो फिर पृथ्वी पर जो कुछ भी है, यह सब उठा लो।”
Verse 3.10
तस्मै तृणं निदधौ—एतदादत्स्व इति। तत् उपप्रेयाय सर्वजवेन; तन्न शशाक आदातुम्। स तदेव निववृते—नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षम् इति॥१०॥
उसके सामने उसने तिनका रख दिया—“इसे उठा लो।” वह पूर्ण वेग से दौड़ा; पर उसे उठा न सका। वह वैसे ही लौट आया—वह यह भी न जान सका कि यह यक्ष क्या है।
Verse 3.11
अथ इन्द्रम् अब्रुवन्—मघवन्, एतद्विजानीहि किमेतद् यक्षम् इति। तथा इति। तदभ्यद्रवत्। तस्मात् तिरोदधे॥११॥
तब उन्होंने इन्द्र से कहा—“हे मघवन्, जानो कि यह यक्ष क्या है।” उसने कहा—“ऐसा ही हो।” और वह उसकी ओर दौड़ा; पर वह उससे ओझल हो गया।
Verse 3.12
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्। तां ह उवाच—किमेतद्यक्षमिति॥१२॥
वह (इन्द्र) उसी आकाश-प्रदेश में अत्यन्त तेजस्विनी स्त्री—उमा हैमवती—के पास पहुँचा। उसने उससे कहा—“यह यक्ष कौन है?”
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