
केन उपनिषद् (सामवेद से संबद्ध, मुख्य उपनिषदों में) मन, वाणी और इंद्रियों की प्रेरणा के मूल कारण पर प्रश्न उठाती है—“किसके द्वारा मन चलता है?” इसका उत्तर यह है कि ब्रह्म कोई दृश्य/विषय नहीं, बल्कि वही चेतन आधार है जिसके कारण सुनना, देखना, सोचना और बोलना संभव होता है—“कान का भी कान, मन का भी मन।” इसलिए ब्रह्म को वस्तु की तरह पकड़ने वाली ‘जानने’ की धारणा यहाँ अस्वीकार होती है; सच्चा ज्ञान अहंकार-रहित, अविषयी (non-objectifying) बोध है। यक्ष-उपाख्यान में देवता विजय के गर्व में ब्रह्म को भूल जाते हैं। अग्नि और वायु अपनी शक्ति सिद्ध नहीं कर पाते; इंद्र आगे बढ़ता है और उमा हैमवती से सीखता है कि विजय ब्रह्म की ही थी। यह कथा कर्तृत्व-अहंकार का खंडन और ब्रह्म की सर्वाधारता का प्रतीकात्मक शिक्षण है। उपनिषद् तप, दम और शुद्ध कर्म को सहायक साधन मानते हुए ब्रह्म-ज्ञान से अमृतत्व/मोक्ष की बात करती है।
Start Reading- Inquiry into the true agent behind cognition and action (“By whom is the mind impelled?”)
- Brahman as the enabling ground: “ear of the ear
” “mind of the mind
” “speech of speech”
- Brahman is not an object of perception or conceptualization; it is the condition of all knowing
- Paradox of knowledge: those who claim to know Brahman as an object do not know; true knowing is non-objectifying recognition
- Distinction between empirical knowledge (viṣaya-jñāna) and immediate realization (aparokṣa/anubhava)
- Allegory of the Yakṣa: humbling of Agni and Vāyu; Indra’s approach; Umā’s instruction—victory belongs to Brahman
not ego
- Critique of pride and doership (ahaṅkāra); affirmation of instrumentality of powers and faculties
- Soteriology: knowledge of Brahman leads to amṛtatva (immortality/liberation)
- Preparatory disciplines: tapas
dama
and purifying karma as supports for realization
- Pedagogical method: apophatic teaching
indirect indication (lakṣaṇā)
and narrative instruction
This Upanishad is organized into 4 khandas.
इस चतुर्थ खण्ड में उपनिषद् बताता है कि देवताओं की विजय का वास्तविक कारण वे स्वयं नहीं, बल्कि ब्रह्म ही है। उमा हैमवती इन्द्र से कहती हैं—“वह ब्रह्म था”; तब देवताओं को समझ आता है कि उनकी महिमा और सामर्थ्य ब्रह्म के कारण ही है। अग्नि, वायु और विशेषतः इन्द्र को श्रेष्ठ इसलिए कहा गया कि वे उस रहस्यमय सत्ता के सबसे निकट पहुँचे और इन्द्र ने सबसे पहले “यह ब्रह्म है” ऐसा निश्चय किया। ब्रह्म का ज्ञान परिभाषा से नहीं, संकेत (आदेश) से कराया जाता है। अधिदैवत स्तर पर वह बिजली की चमक या पलक झपकने की तरह क्षणिक, परन्तु प्रकाशक अनुभव के रूप में सूचित है—जिसे इन्द्रियाँ पकड़ नहीं पातीं। अध्यात्म स्तर पर मन “उसकी ओर जाता हुआ” प्रतीत होता है; उसी के बल से मन बार-बार स्मरण करता है और संकल्प करता है। इस प्रकार जानने की शक्ति, स्मृति और इच्छा—सबका आधार स्वप्रकाश ब्रह्म है; साधक को उपकरणों (देवता/इन्द्रिय/मन) से परे कारण-चैतन्य को पहचानना है।
तृतीय खण्ड में उपनिषद् एक दृष्टान्त के द्वारा बताती है कि विजय और महिमा का वास्तविक आधार ब्रह्म है, न कि अहंकार। देवताओं ने जीत प्राप्त की, पर गर्व में सोचने लगे—“यह विजय हमारी ही है, यह महिमा हमारी ही है।” तभी ब्रह्म एक रहस्यमय ‘यक्ष’ के रूप में प्रकट होकर उनके अभिमान को तोड़ने का अवसर बनता है। देव यक्ष को पहचान नहीं पाते और अग्नि को भेजते हैं। यक्ष पूछता है—“तू कौन है, तुझमें क्या सामर्थ्य है?” अग्नि कहता है कि वह पृथ्वी पर सब कुछ जला सकता है। यक्ष एक तिनका रखकर उसे जलाने को कहता है; अग्नि पूरा बल लगाकर भी उसे नहीं जला पाता और लज्जित होकर लौट आता है। फिर वायु जाता है और कहता है कि वह सब कुछ उड़ा सकता है। वही तिनका उसके सामने रखा जाता है; वायु उसे हिला भी नहीं पाता और असफल होकर लौट आता है। इससे स्पष्ट होता है कि देवताओं की शक्तियाँ भी किसी उच्च आधार पर टिकी हैं। अंत में इन्द्र स्वयं जाता है, पर यक्ष अदृश्य हो जाता है। उसी स्थान पर उमा हैमवती प्रकट होकर बताती हैं कि वह यक्ष ब्रह्म ही था। उपनिषद् सिखाती है कि कर्तापन का अहं सत्य को ढँक देता है; विनय और ज्ञान के द्वारा ही ब्रह्म की पहचान होती है।
द्वितीय खण्ड में आचार्य शिष्य की ‘मैं जानता हूँ’ वाली आत्म-निश्चयता को तोड़ते हैं। जो कहता है कि उसने ब्रह्म को पूरी तरह जान लिया, उसने वास्तव में केवल अल्प अंश ही पकड़ा है; अपने भीतर और देवताओं में जो अनुभव होता है, वह पूर्ण ब्रह्म नहीं, केवल संकेत है। इसलिए अभी भी गहन मीमांसा और विवेक आवश्यक है। उपनिषद् बताता है कि ब्रह्म-ज्ञान न तो ‘मैं पूरी तरह जानता हूँ’ कहने में है, न ‘मैं नहीं जानता’ कहने में। जो इस मध्य सत्य को समझता है—कि ब्रह्म वस्तु की तरह पकड़ा नहीं जाता, फिर भी सर्वथा अज्ञेय नहीं—वही जानता है। “यस्यमतं तस्य मतम्” के अनुसार, जो ब्रह्म को अनिर्वचनीय मानकर विनम्र रहता है, वही सत्य के निकट है; और जो उसे परिभाषित वस्तु बना देता है, वह चूक जाता है। ज्ञानी के लिए ब्रह्म इन्द्रिय-मन से ‘अविज्ञात’ है, अज्ञानी के लिए गलत ढंग से ‘विज्ञात’। ब्रह्म का बोध “प्रतिबोध-विदित” है—हर अनुभव में साक्षी-चेतना के रूप में। इससे आत्मबल मिलता है और विद्या से अमृतत्व—मृत्यु-भय का अतिक्रमण। अंत में संदेश है: इसी जीवन में जानना सार्थकता है, अन्यथा बड़ी हानि। धीर पुरुष सभी भूतों में एक आत्मा को पहचानकर देहांत के बाद अमृतत्व को प्राप्त होते हैं।
प्रथम खण्ड में शिष्य पूछता है कि मन, प्राण, वाणी, नेत्र और कर्ण किसकी प्रेरणा से काम करते हैं। गुरु बताते हैं कि ब्रह्म ही ‘कान का भी कान’, ‘मन का भी मन’, ‘वाणी की भी वाणी’ और ‘प्राण का भी प्राण’ है—सबका प्रकाशक, पर स्वयं इन्द्रियों का विषय नहीं। जो धीर पुरुष इसे जान लेते हैं, वे देह‑अभिमान से मुक्त होकर अमृतत्व को प्राप्त होते हैं। उपनिषद् कहता है कि वहाँ न आँख पहुँचती है, न वाणी, न मन; उसे वस्तु की तरह जानना संभव नहीं। वह ज्ञात और अज्ञात दोनों से परे है—ऐसा परंपरा से सुना गया है। जो वाणी से कहा नहीं जा सकता पर जिससे वाणी बोलती है, जिसे मन सोच नहीं सकता पर जिससे मन चलता है, जिसे आँख देख नहीं सकती पर जिससे आँख देखती है, जिसे कान सुन नहीं सकता पर जिससे कान सुनता है—वही ब्रह्म है। इसलिए जिसे लोग बाह्य उपास्य‑वस्तु मानते हैं वह ब्रह्म नहीं; ब्रह्म साक्षी‑चैतन्य है।
34 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
केन इषितम् पतति प्रेषितम् मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केन इषिताम् वाचम् इमाम् वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥
Verse 2
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यत् वाचः ह वाचम् स उ प्राणस्य प्राणः । चक्षुषः चक्षुः अतिमुच्य धीराः प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृताः भवन्ति ॥२॥
Verse 3
न तत्र चक्षुः गच्छति न वाक् गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथा एतत् अनुशिष्यात् अन्यत् एव तत् विदितात् अथो अविदितात् अधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नः तत् व्याचचक्षिरे ॥३॥
Verse 4
यद्वाचा अनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥४॥
Know as Brahman that silent Reality which no words can capture, yet by whose power all speech arises; it is not the limited object the mind turns into something to be worshipped.
Brahman as the revealer (prakāśaka) beyond speech; apophatic (neti-neti) approachVerse 5
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५॥
Know as Brahman that which the mind cannot conceive, yet by whose light the mind itself is known and able to think; it is not the mental image people take as God.
Ātman/Brahman as witness-consciousness (sākṣin) beyond mind (manas)Verse 6
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूँषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥६॥
Know as Brahman that which no eye can behold, yet by whose presence all seeing becomes possible; it is not the visible form the mind turns into an idol of the ultimate.
Brahman as the light of lights (jyotiṣām jyotiḥ) enabling perception; transcendence of sense-object knowledgeVerse 7
यत् श्रोत्रेण न श्रणोति येन श्रोत्रम् इदम् श्रुतम् । तत् एव बृह्म त्वं विद्धि न इदम् यत् इदम् उपासते ॥७॥
Verse 8
यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तत् एव बृह्म त्वं विद्धि न इदम् यत् इदम् उपासते ॥८॥
Verse 1
यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥१॥
यदि तुम सोचते हो, ‘मैं इसे भली-भाँति जानता हूँ,’ तो निश्चय ही तुम ब्रह्म के स्वरूप का थोड़ा-सा ही जानते हो—जो उसका अंश तुममें है और जो देवों में है। इसलिए जो तुम्हें ‘ज्ञात’ प्रतीत होता है, वह भी मेरे मत में अभी विचारणीय है।
Limits of conceptual knowledge; necessity of continued inquiry (vicāra) into Brahman beyond objectifying ‘forms’Verse 2
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥
मैं यह नहीं मानता कि ‘मैं इसे भली-भाँति जानता हूँ’; और न यह कि ‘मैं नहीं जानता’। हम में जो उस (ब्रह्म) को जानता है, वही उसे जानता है; और वह यह भी जानता है कि वह सामान्य रीति से जानने योग्य वस्तु नहीं है॥२॥
Brahman as beyond objectifying knowledge (aparokṣa-jñāna; limits of pramāṇa)Verse 3
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥३॥
जिसके लिए वह (ब्रह्म) विचार का विषय नहीं बनता, उसी के लिए वह यथार्थ रूप से जाना जाता है; और जो उसे ‘मैं जानता हूँ’ ऐसा मानता है, वह उसे नहीं जानता। जो उसे वस्तु की तरह जानने लगते हैं, उनके लिए वह अज्ञात रहता है; और जो उसे वस्तु की तरह नहीं जानते, उनके लिए वह ज्ञात होता है॥३॥
Aparokṣa realization vs. parokṣa/conceptual knowledge; inobjectifiability of BrahmanVerse 4
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥
प्रत्येक बोध-अवस्था में जो जाना जाता है, वही यथार्थ ज्ञान है; क्योंकि उसी से निश्चय ही अमृतत्व प्राप्त होता है। आत्मा के द्वारा बल (वीर्य) प्राप्त होता है; और विद्या के द्वारा अमृतत्व प्राप्त होता है॥४॥
Pratibodha (immediate recognition), jñāna leading to amṛtatva (mokṣa)Verse 5
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदीहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥५॥
यदि यहाँ (इसी जीवन में) उस ब्रह्म को जान लिया, तो सत्य है—लक्ष्य सिद्ध हो गया। यदि यहाँ न जाना, तो महान् हानि है। प्रत्येक प्राणी में उसी का विवेक करके, धीर पुरुष इस लोक से प्रस्थान कर अमृतत्व को प्राप्त होते हैं।
Moksha through Brahma-vidya; recognition of Brahman/Atman in all beingsVerse 1
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयः अस्माकमेवायं महिमा इति ॥१॥
ब्रह्म ने ही देवताओं के लिए विजय प्राप्त की। ब्रह्म की उस विजय में देवता अभिमान से उन्नत हो गए। उन्होंने सोचा—‘यह विजय केवल हमारी है; यह महिमा केवल हमारी है।’
Brahman as the true source of power; critique of ego (ahaṅkāra) and divine prideVerse 2
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥२॥
उस (ब्रह्म) ने उनके मनोभाव को जान लिया और वह उनके सामने प्रकट हुआ। पर वे उसे पहचान न सके—‘यह कौन-सा यक्ष है?’
Avidyā regarding Brahman; Brahman’s transcendence of conceptual recognition; revelation through manifestationVerse 3
तेऽग्निमब्रुवन्—जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति। तथेति॥३॥
उन्होंने अग्नि से कहा—“हे जातवेद! यह जानो कि यह यक्ष क्या है।” अग्नि ने कहा—“तथास्तु।”॥३॥
Brahman (as the mysterious Yakṣa) and the limitation of deva-knowledgeVerse 4
तदभ्यद्रवत्। तमभ्यवदत्—कोऽसीति। अग्निर्वा अहमस्मीति अब्रवीत्। जातवेदाः वा अहमस्मीति॥४॥
वह उसकी ओर दौड़ा। उस यक्ष ने उससे कहा—“तुम कौन हो?” उसने उत्तर दिया—“मैं ही अग्नि हूँ; मैं ही जातवेद हूँ।”॥४॥
Avidyā/ahaṅkāra (self-assertion of limited power) contrasted with Brahman’s transcendenceVerse 5
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति। अपि सर्वमिदं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति॥५॥
उसने कहा—“तुममें क्या सामर्थ्य है?” उसने उत्तर दिया—“पृथ्वी पर जो कुछ है, इस सबको मैं जला सकता हूँ।”॥५॥
Brahman as the source/measure of all śakti; limitation of deva-śakti; dependence of karma-indriya powers on the AbsoluteVerse 6
तस्मै तृणं निदधाव् एतद् दह इति । तद् उपप्रेयाय सर्वजवेन तन् न शशाक दग्धुम् । स तद् एव निववृते, नैतद् अशकद् विज्ञातुं यद् एतद् यक्षम् इति ॥६॥
उस (अग्नि) के सामने उसने तिनका रखकर कहा—“इसे जला दो।” वह समस्त वेग से उसकी ओर दौड़ा, पर उसे जला न सका। वह उसी प्रयत्न से लौट आया; यह यक्ष क्या है—यह जान न पाया॥६॥
Brahman as the transcendent ground beyond the powers of the devas; limitation of sense-power and ego (ahaṅkāra)Verse 7
अथ वायुम् अब्रुवन्—वायो एतद् विजानीहि किम् एतद् यक्षम् इति । तथा इति ॥७॥
फिर उन्होंने वायु से कहा—“हे वायु, इसे जानो—यह यक्ष क्या है?” उसने उत्तर दिया—“तथास्तु।”॥७॥
Dependence of prāṇa (vital force) on Brahman; epistemic inquiry (jijñāsā)Verse 8
तद् अभ्यद्रवत् । तम् अभ्यवदत्—कः असि इति । वायुर् वा अहम् अस्मि इत्य् अब्रवीत् । मातरिश्वा वा अहम् अस्मि इति ॥८॥
वह उसकी ओर दौड़ा। उसने उससे कहा—“तुम कौन हो?” उसने कहा—“मैं वायु ही हूँ; मैं मातरिश्वा ही हूँ।”॥८॥
Ahaṅkāra (self-assertion) of cosmic functions; Brahman as the interrogator beyond names and rolesVerse 9
तस्मिन् त्वयि किं वीर्यम् इति। अपि इदं सर्वम् आददीयम्, यदिदं पृथिव्याम् इति॥९॥
उन्होंने उससे कहा—“तुममें कौन-सा सामर्थ्य है?” “तो फिर पृथ्वी पर जो कुछ भी है, यह सब उठा लो।”॥९॥
Brahman as the hidden source of all power; limitation of deva-egoVerse 10
तस्मै तृणं निदधौ—एतदादत्स्व इति। तत् उपप्रेयाय सर्वजवेन; तन्न शशाक आदातुम्। स तदेव निववृते—नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षम् इति॥१०॥
उसके सामने उसने तिनका रख दिया—“इसे उठा लो।” वह पूर्ण वेग से दौड़ा; पर उसे उठा न सका। वह वैसे ही लौट आया—वह यह भी न जान सका कि यह यक्ष क्या है।॥१०॥
Dependence of all śakti on Brahman; collapse of egoic agency (kartṛtva)Verse 11
अथ इन्द्रम् अब्रुवन्—मघवन्, एतद्विजानीहि किमेतद् यक्षम् इति। तथा इति। तदभ्यद्रवत्। तस्मात् तिरोदधे॥११॥
तब उन्होंने इन्द्र से कहा—“हे मघवन्, जानो कि यह यक्ष क्या है।” उसने कहा—“ऐसा ही हो।” और वह उसकी ओर दौड़ा; पर वह उससे ओझल हो गया।॥११॥
Brahman’s elusiveness to objectifying pursuit; necessity of grace/teaching (upadeśa)Verse 12
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्। तां ह उवाच—किमेतद्यक्षमिति॥१२॥
वह (इन्द्र) उसी आकाश-प्रदेश में अत्यन्त तेजस्विनी स्त्री—उमा हैमवती—के पास पहुँचा। उसने उससे कहा—“यह यक्ष कौन है?”॥१२॥
Brahman as the unknown ground of divine power; revelation through divine instruction (upadeśa)Verse 1
सा ब्रह्मेति ह उवाच। ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति। ततो ह एव विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥१॥
उसने कहा—“यह ब्रह्म है।” “निश्चय ही ब्रह्म की विजय से तुम महान हुए हो,” (उसने कहा)। तब इन्द्र ने निश्चय कर जाना—“यह ब्रह्म है।”॥१॥
Brahman as the source of all agency and victory; true knowledge (brahmavidyā) as illuminationVerse 2
तस्माद्वा एते देवा अतितरामिव अन्यान्देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रः। ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुः। ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥२॥
इस कारण ये देव—अग्नि, वायु और इन्द्र—मानो अन्य देवों से अधिक श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे उस (ब्रह्म) के सबसे निकट पहुँचे। और इन्द्र ने ही सबसे पहले जाना—“यह ब्रह्म है।”॥२॥
Proximity to Brahman through inquiry; hierarchy of deities as symbolic of faculties approaching the Absolute; primacy of knowledge over powerVerse 3
तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श । स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥३॥
इसलिए इन्द्र मानो अन्य देवताओं से अधिक श्रेष्ठ ठहरा; क्योंकि उसी ने उस ब्रह्म को सबसे निकट से स्पर्श किया। वही सबसे पहले उसे ‘ब्रह्म’ रूप में जान सका॥३॥
Brahma-jñāna (recognition of Brahman) and adhikāra (fitness/priority through proximity)Verse 4
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो विद्युतदिति न्यमीमिषदिति । अधिदैवतम् ॥४॥
उस ब्रह्म का यह संकेत है—‘जैसे बिजली की चमक—क्षणभर का प्रकाश’; ‘वह पलक झपकते ही प्रकट होकर लुप्त हो गया’। यह अधिदैवत (देव-स्तर) के संदर्भ में है॥४॥
Ādeśa (indirect indication of Brahman); Brahman’s elusiveness and immediacy beyond graspVerse 5
अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः ॥५॥
अब अध्यात्म के संदर्भ में—जिससे मन मानो विषयों की ओर जाता है, और जिससे वह इसे बार-बार स्मरण करता है—वही संकल्प (अंतःप्रेरित इच्छा) है॥५॥
Adhyātma-upadeśa; saṅkalpa (intentionality) as a pointer to the inner instrument; Brahman indicated through the witness of mental movementVerse 6
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि ह एनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥६॥
वह ही ‘तद्वन’ नाम से प्रसिद्ध है। ‘तद्वन’ रूप में ही उसका उपासन-ध्यान करना चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है, उसकी ओर निश्चय ही समस्त प्राणी आकृष्ट होकर अभिलाषा करते हैं।
Brahman as the supreme object of love/aspiration; upāsanā leading to recognition of BrahmanVerse 7
उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीम् वाव त उपनिषदमब्रूम इति ॥७॥
‘भगवन्, उपनिषद् बताइए’—ऐसा कहे जाने पर (आचार्य ने) कहा: ‘ब्रह्मी उपनिषद् ही हमने तुम्हें बतला दी है।’
Upaniṣad as brahma-vidyā (esoteric liberating instruction)Verse 8
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥८॥
उस (ब्रह्मी उपनिषद्-ज्ञान) की प्रतिष्ठा तप, दम (इन्द्रिय-निग्रह) और कर्म हैं; वेद उसके समस्त अंग हैं; सत्य उसका आश्रय-स्थान है।
Sādhana for brahma-vidyā: tapas–dama–karma; satya as the sustaining groundVerse 9
यो वा एतामेवम् वेद, अपहत्य पाप्मानम्, अनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति, प्रतितिष्ठति ॥९॥
जो इस प्रकार उस ब्रह्म-विद्या को जानता है, वह पाप का परित्याग करके अनन्त स्वर्गलोक में, परम श्रेष्ठ लोक में दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हो जाता है—वह प्रतिष्ठित हो जाता है॥९॥
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