
Purushamedha victim lists.
Mantra 1
देव॑ सवित॒: प्र सु॑व य॒ज्ञं प्र सु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य । दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑तु॒पूः केतं॑ नः पुनातु वा॒चस्पति॒र्वाजं॑ नः स्वदतु
हे देव सविता, यज्ञ को प्रवर्तित करो; यज्ञपति को भग के लिए प्रवर्तित करो। दिव्य गन्धर्व—केतुपू (चिह्न/केतु का शोधक)—हमारे लिए उस केतु को पवित्र करे; और वाचस्पति हमारे वाज (बल/अन्न-समृद्धि) को मधुर-फलदायी करें।
Mantra 2
तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि । धियो॒ यो न॑: प्रचो॒दयात्
उस देव सविता के परम वरेण्य भर्ग (तेज) का हम ध्यान करते हैं; वह हमारी धियों (बुद्धियों) को प्रेरित करे।
Mantra 3
विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव । यद्भ॒द्रं तन्न॒ आ सु॑व
हे देव सवितर, हमारे सब दुरित (दुःख/पाप) दूर हटा दो; जो भद्र (कल्याणकारी) है, उसे हमारे पास ले आओ।
Mantra 4
वि॒भ॒क्तार॑ᳪ हवामहे॒ वसो॑श्चि॒त्रस्य॒ राध॑सः । स॒वि॒तारं॑ नृ॒चक्ष॑सम्
हम वसु (धन) और विचित्र/अद्भुत राधस् (दान-समृद्धि) के विभक्तार (वितरक) को आह्वान करते हैं—नृचक्षस् (मनुष्यों को देखने वाले) सविता को।
Mantra 5
ब्रह्म॑णे ब्राह्म॒णं क्ष॒त्राय॑ राज॒न्यं॒ म॒रुद्भ्यो॒ वैश्यं॒ तप॑से शू॒द्रं तम॑से॒ तस्क॑रं नार॒काय॑ वीर॒हणं॑ पा॒प्मने॑ क्ली॒बमा॑क्र॒याया॑ अयो॒गूं कामा॑य पुँश्च॒लूमति॑क्रुष्टाय माग॒धम्
ब्रह्मन् के लिए ब्राह्मण; क्षत्र के लिए राजन्य; मरुद्गणों के लिए वैश्य; तपस् के लिए शूद्र; तमस् के लिए चोर; नरक के लिए वीरहन् (वीर-हंता); पाप्मन् के लिए क्लीब; क्रय (खरीद) के लिए अयोगू (बाँझ गाय); काम के लिए पुँश्चली (व्यभिचारिणी स्त्री); अतिक्रुष्ट (आर्त-चीत्कार) के लिए मागध।
Mantra 6
नृ॒त्ताय॑ सू॒तं गी॒ताय॑ शैलू॒षं धर्मा॑य सभाच॒रं न॒रिष्ठा॑यै भीम॒लं न॒र्माय॑ रे॒भᳪ हसा॑य॒ कारि॑मान॒न्दाय॑ स्त्रीष॒खं प्र॒मदे॑ कुमारीपु॒त्रं मे॒धायै॑ रथका॒रं धै॑र्याय॒ तक्षा॑णम्
नृत्य के लिए सूत को; गीत के लिए शैलूष (नट) को; धर्म के लिए सभा-चर (सभा में आने-जाने वाले) को; नरीष्टा के लिए भीमल (भयानक पुरुष) को; नर्म (परिहास) के लिए रेभ (निन्दक/कटुभाषी) को; हास्य के लिए कारिमन् (हँसी कराने वाला/उपाय करने वाला) को; आनन्द के लिए स्त्री-सख (स्त्रियों का साथी) को; प्रमद (उन्मत्त काम-चेष्टा) के लिए कुमारी-पुत्र (अविवाहित कन्या का पुत्र) को; मेधा के लिए रथकार (रथ बनाने वाला) को; धैर्य के लिए तक्षण (बढ़ई/काष्ठ-शिल्पी) को।
Mantra 7
तप॑से कौला॒लं मा॒यायै॑ क॒र्मार॑ᳪ रू॒पाय॑ मणिका॒रᳪ शु॒भे व॒पᳪ श॑र॒व्या॒या इषुका॒रᳪ हे॒त्यै ध॑नुष्का॒रं कर्म॑णे ज्याका॒रं दि॒ष्टाय॑ रज्जुस॒र्जं मृ॒त्यवे॑ मृग॒युमन्त॑काय श्व॒निन॑म्
तपस् के लिए कुलाल (कुम्हार) को; माया (कौशल/कपट-विद्या) के लिए कर्मार (लोहार) को; रूप के लिए मणिकार (मणि-निर्माता/जौहरी) को; शुभ के लिए वप (नाई/क्षौरक) को; शरव्य (धनुर्विद्या/तीरंदाजी) के लिए इषुकार (बाण बनाने वाला) को; हेति (शस्त्र-विद्या) के लिए धनुष्कार (धनुष बनाने वाला) को; कर्म के लिए ज्याकार (धनुष-डोरी बनाने वाला) को; दिष्टि (लक्ष्य/निशाना) के लिए रज्जुसर्ज (रस्सी बनाने वाला) को; मृत्यु के लिए मृगयु (शिकारी) को; अन्तक के लिए श्वनिन् (कुत्तों का पालक/कुत्ता-पुरुष) को।
Mantra 8
न॒दीभ्य॑: पौञ्जि॒ष्ठमृ॒क्षीका॑भ्यो॒ नैषादं पुरुषव्या॒घ्राय॑ दु॒र्मदं॑ गन्धर्वाप्स॒रोभ्यो॒ व्रात्यं॑ प्र॒युग्भ्य॒ उन्म॑त्तᳪ सर्पदेवज॒नेभ्योऽप्र॑तिपद॒मये॑भ्यः कित॒वमी॒र्यता॑या॒ अकि॑तवं पिशा॒चेभ्यो॑ बिदलका॒रीं या॑तु॒धाने॑भ्यः कण्टकीका॒रीम्
नदियों के लिए पौञ्जिष्ठ को; ऋक्षिकाओं (भालुओं) के लिए नैषाद को; पुरुष-व्याघ्र (मनुष्य-व्याघ्र) के लिए दुर्मद (उन्मत्त) को; गन्धर्व-अप्सराओं के लिए व्रात्य को; प्रयुगों (जोड़ों/टीमों) के लिए उन्मत्त को; सर्पदेव-जन के लिए अप्रतिपदम (जिसका पाँव न टिके/अस्थिर) को; ईर्यता (भटकन/घूमना) के लिए कितव (जुआरी) और अकितव (अजुआरी) को; पिशाचों के लिए बिदलकारी को; यातुधानों के लिए कण्टकीकारी को।
Mantra 9
स॒न्धये॑ जा॒रं गे॒हायो॑पप॒तिमार्त्यै॒ परि॑वित्तं॒ निरृ॑त्यै परिविविदा॒नमरा॑द्ध्या एदिधिषुः प॒तिं निष्कृ॑त्यै पेशस्का॒रीᳪ सं॒ज्ञाना॑य स्मरका॒रीं प्र॑का॒मोद्या॑योप॒सदं॒ वर्णा॑यानु॒रुधं॒ बला॑योप॒दाम्
सन्धि (मेल) के लिए जार (पर-पुरुष); गृह के लिए उपपति (रखा हुआ पुरुष); आर्त्य (कष्ट) के लिए परिवित्त (जो अग्रज को लाँघकर विवाह करे); निरृति के लिए परिविविदान (अतिजयी); अराद्धि (असफलता) के लिए एदिधिषु (उत्सुक वर); निष्कृति (प्रायश्चित्त) के लिए पति; संज्ञान (पहचान) के लिए पेशस्कारी (व्यभिचारिणी स्त्री); स्मरण के लिए स्मरकारी (कामोद्दीपक स्त्री); प्रकाम (इच्छा) के लिए उपसद (समीप-सेवा); वर्ण (रंग/वर्ग) के लिए अनुरुध (अनुरक्त); बल के लिए उपदाम् (आश्रय/सहायिका)।
Mantra 10
उ॒त्सा॒देभ्य॑: कु॒ब्जं प्र॒मुदे॑ वाम॒नं द्वा॒र्भ्यः स्रा॒मᳪ स्वप्ना॑या॒न्धमध॑र्माय बधि॒रं प॒वित्रा॑य भि॒षजं॑ प्र॒ज्ञाना॑य नक्षत्रद॒र्शमा॑शि॒क्षायै॑ प्र॒श्निन॑मुपशि॒क्षाया॑ अभिप्र॒श्निनं॑ म॒र्यादा॑यै प्रश्नविवा॒कम्
उत्साद (पतन) के लिए कुब्ज (कूबड़वाला); प्रमुद (हर्ष) के लिए वामन (बौना); द्वारों के लिए स्राम (लँगड़ा); स्वप्न के लिए अन्ध (अंधा); अधर्म के लिए बधिर (बहरा); पवित्र (छन्नी) के लिए भिषज् (वैद्य); प्रज्ञान (विवेक) के लिए नक्षत्रदर्श (तारागण देखने वाला); आशिक्षा (शिक्षा) के लिए प्रश्निन् (प्रश्न करने वाला); उपशिक्षा (अधिक शिक्षा) के लिए अभिप्रश्निन् (प्रतिप्रश्न करने वाला); मर्यादा (सीमा) के लिए प्रश्नविवाक (प्रश्न का निर्णय करने वाला)।
Mantra 11
अर्मे॑भ्यो हस्ति॒पं ज॒वाया॑श्व॒पं पुष्ट्यै॑ गोपा॒लं वी॒र्या॒याविपा॒लं तेज॑सेऽजपा॒लमिरा॑यै की॒नाशं॑ की॒लाला॑य सुराका॒रं भ॒द्राय॑ गृह॒पᳪ श्रेय॑से वित्त॒धमाध्य॑क्ष्यायानुक्ष॒तार॑म्
सेनाओं के लिए हस्ति-पाल (हाथी-पालक); वेग के लिए अश्व-पाल (घोड़ा-पालक); पुष्टि के लिए गोपाल; वीर्य के लिए अवि-पाल (भेड़-पालक); तेज के लिए अज-पाल (बकरी-पालक); इरा (पोषक अन्न/रस) के लिए कीनाश (हलवाहा/कृषक); कीलाल (मधुर मदिरा) के लिए सुराकार (सुरा-निर्माता); भद्र (कल्याण) के लिए गृहपति; श्रेयस् (समृद्धि) के लिए वित्तध (कोषाध्यक्ष/धन-धारक); आध्यक्ष्य (अधिकार/अध्यक्षता) के लिए अनुक्षतार (उपाध्यक्ष/सहायक निरीक्षक)।
Mantra 12
भायै॑ दार्वा॒हारं॑ प्र॒भाया॑ अग्न्ये॒धं ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपा॑याभिषे॒क्तारं॒ वर्षि॑ष्ठाय॒ नाका॑य परिवे॒ष्टारं॑ देवलो॒काय॑ पेशि॒तारं॑ मनुष्यलो॒काय॑ प्रकरि॒तार॒ᳪ सर्वे॑भ्यो लो॒केभ्य॑ उपसे॒क्तार॒मव॑ ऋत्यै व॒धायो॑पमन्थि॒तारं॒ मेधा॑य वासः पल्पू॒लीं प्र॑का॒माय॑ रजयि॒त्रीम्
भय के लिए दार्वाहार (लकड़ी लाने वाला); प्रभा के लिए अग्न्येध (अग्नि प्रज्वलित करने वाला); ब्रध्न (ताम्र/अरुण) के विष्टप (आकाश-लोक) के लिए अभिषेक्तार (अभिषेककर्ता); वर्षिष्ठ नाक (परम स्वर्ग) के लिए परिवेष्टार (आवरण करने वाला); देवलोक के लिए पेशितार (रूप देने/गढ़ने वाला); मनुष्यलोक के लिए प्रकरितार (व्यवस्था करने वाला); समस्त लोकों के लिए उपसेक्तार (छिड़कने/सिंचन करने वाला); अव-ऋति (अपशकुन/विघ्न-निवारण) के लिए वधायोपमन्थितार (मथनी चलाने वाला); मेधा के लिए वासः; प्रकाम (इच्छापूर्ति) के लिए पल्पूली; रज (रञ्जन/रंग) के लिए रजयित्री (रंगने वाली)।
Mantra 13
ऋ॒तये॑ स्ते॒नहृ॑दयं वैर॑हत्याय॒ पिशु॑नं॒ विवि॑क्त्यै क्ष॒त्तार॒मौप॑द्रष्ट्र्यायानुक्ष॒त्तारं॒ बला॑यानुच॒रं भू॒म्ने प॑रिष्क॒न्दं प्रि॒याय॑ प्रियवा॒दिन॒ मरि॑ष्ट्या अश्वसा॒दᳪ स्व॒र्गा॑य लो॒काय॑ भागदु॒घं वर्षि॑ष्ठाय॒ नाका॑य परिवे॒ष्टार॑म्
ऋत के लिए स्तेनहृदय (चोर-हृदय वाला); वैरहत्य (शत्रु-वध) के लिए पिशुन (चुगलखोर/निन्दक); विविक्ति (विवेक/भेद-ज्ञान) के लिए क्षत्तार (प्रबंधक/सेवकाध्यक्ष); औपद्रष्ट्र्य (निरीक्षण) के लिए अनुक्षत्तार (उप-प्रबंधक); बल के लिए अनुचर (सेवक/अनुयायी); भूम्न (महत्ता/विस्तार) के लिए परिष्कन्द (परिभ्रमण करने वाला); प्रिय के लिए प्रियवादिन् (मधुर-वक्ता); मरिष्टि (अक्षय-रक्षा/सुरक्षा) के लिए अश्वसाद (अश्व-वशकर्ता); स्वर्गलोक के लिए भागदुघ (भाग देने/उत्पन्न करने वाला); वर्षिष्ठ नाक (परम स्वर्ग) के लिए परिवेष्टार (आवरण करने वाला)।
Mantra 14
म॒न्यवे॑ऽयस्ता॒पं क्रोधा॑य निस॒रं योगा॑य यो॒क्तार॒ᳪ शोका॑याभिस॒र्तारं॒ क्षेमा॑य विमो॒क्तार॑मुत्कूलनिकू॒लेभ्य॑स्त्रि॒ष्ठिनं॒ वपु॑षे मानस्कृ॒तᳪ शीला॑याञ्जनीका॒रीं निरृ॑त्यै कोशका॒रीं य॒माया॒सूम्
मन्यु (क्रोध) के लिए मैं लोहे से तपाने वाले को नियोजित करता हूँ; क्रोध के लिए निष्कासक को; योग/अनुशासन के लिए जोतने वाले को; शोक के लिए आक्रमण करने वाले को; क्षेम (सुरक्षा) के लिए विमोचक को; तट और प्रतितट से सम्बन्धित त्रिष्ठिन (त्रि-आधार) को; रूप के लिए मन से रचा हुआ को; शील के लिए अञ्जनीकारी (अन्धकार/काजल करने वाला) को; निरृति के लिए कोशकारी (आवरण/कोश बनाने वाला) को; यम के लिए यमासु (यम की प्रजा/सम्बद्ध जीव) को।
Mantra 15
य॒माय॑ यम॒सूमथ॑र्व॒भ्योऽव॑तोकाᳪ संवत्स॒राय॑ पर्या॒यिणीं॑ परिवत्स॒रायावि॑जातामिदावत्स॒राया॒तीत्व॑रीमिद्वत्स॒राया॑ति॒ष्कद्व॑रीं वत्स॒राय॒ विज॑र्जराᳪ संवत्स॒राय॒ पलि॑क्नीमृ॒भुभ्यो॑ऽजिनस॒न्धᳪ सा॒ध्येभ्य॑श्चर्म॒म्नम्
यम के लिए यमासु—यम की अपनी सृष्टि; अथर्वणों के लिए अवतोका (निस्सन्तान स्त्री); संवत्सर के लिए पर्यायिणी (पर्याय से चलने वाली); परिवत्सर के लिए अविजाता (अजन्मी); इदावत्सर के लिए अतीत्वरी (अतिशीघ्र); इद्वत्सर के लिए अतिष्कद्वरी (अतिलंघन करने वाली); वत्सर के लिए विजर्जरा (अत्यन्त जीर्ण); संवत्सर के लिए पलिक्नी (धूसर-केशी); ऋभुओं के लिए अजिनसन्ध (चर्म-सीवन करने वाला); साध्यों के लिए चर्मम्न (चर्म-सम्बद्ध कर्म करने वाला)।
Mantra 16
सरो॑भ्यो धैव॒रमु॑प॒स्थाव॑राभ्यो॒ दाशं॑ वैश॒न्ताभ्यो॑ बै॒न्दं न॑ड्व॒लाभ्यः शौष्क॑लं पा॒राय॑ मार्गा॒रम॑वा॒राय॑ कै॒वर्तं॑ ती॒र्थेभ्य॑ आ॒न्दं विष॑मेभ्यो मैना॒लᳪ स्वने॑भ्य॒: पर्ण॑कं॒ गुहा॑भ्य॒: किरा॑त॒ᳪ सानु॑भ्यो॒ जम्भ॑कं॒ पर्व॑तेभ्यः किम्पूरु॒षम्
सरोवरों के लिए धैवर (मछुआरा); उपस्थावर (जल-किनारे के प्रदेशों) के लिए दाश (नाविक/जलचर); वैशन्ता (नदी-प्रवाहों) के लिए बैन्द; नड्वल (नरकट-वनों) के लिए शौष्कल (सूखी मछली वाला); पार (दूर-तट) के लिए मार्गार (मार्ग-खोजी); अवार (निकट-तट) के लिए कैवर्त (नाविक); तीर्थों के लिए आन्द (घाट का पार कराने वाला); विषम स्थानों के लिए मैनााल; स्वनों (प्रतिध्वनियों) के लिए पर्णक (पत्तों से आच्छादित); गुहाओं के लिए किरात; सानुओं (पर्वत-ढालों) के लिए जम्भक; पर्वतों के लिए किम्पुरुष।
Mantra 17
बी॒भ॒त्सायै॑ पौल्क॒सं वर्णा॑य हिरण्यका॒रं तु॒लायै॑ वाणि॒जं प॑श्चादो॒षाय॑ ग्ला॒विनं॒ विश्वे॑भ्यो भू॒तेभ्य॑: सिध्म॒लं भूत्यै॑ जागर॒णमभू॑त्यै स्वप॒नमार्त्यै॑ जनवा॒दिनं॒ व्यृ॒र्द्ध्या अपग॒ल्भᳪ स॑ᳪश॒राय॑ प्र॒च्छिद॑म्
बीभत्स (घृणित) के लिए पौल्कस को नियुक्त करता हूँ; वर्ण (रंग) के लिए स्वर्णकार को; तुला के लिए वणिक् (व्यापारी) को; पश्चादोष (पश्चात्-दोष) के लिए ग्लाविन् (शिथिल/क्लान्त) को; समस्त भूतेभ्यः (सभी प्राणियों) के लिए सिध्मल (सड़ता-गलता) को; भूत्यै (समृद्धि) के लिए जागरण को; अभूत्यै (असमृद्धि) के लिए स्वप्न/निद्रा को; आर्त्यै (कष्ट) के लिए जनवादिन् (लोक-भाषी/सार्वजनिक वक्ता) को; व्यृद्ध्यै (अतिवृद्धि) के लिए अपगल्भ (उद्धत/अविवेकी) को; संश्राय (विनाश) के लिए प्रच्छिद (कठोर दण्ड देने वाला/छेदन करने वाला) को।
Mantra 18
अ॒क्ष॒रा॒जाय॑ कित॒वं कृ॒ताया॑दिनवद॒र्शं त्रेता॑यै क॒ल्पिनं॑ द्वा॒परा॑याधिक॒ल्पिन॑मास्क॒न्दाय॑ सभास्था॒णुं मृ॒त्यवे॑ गोव्य॒च्छमन्त॑काय गोघा॒तं क्षु॒धे यो गां वि॑कृ॒न्तन्तं॒ भिक्ष॑माण उप॒तिष्ठ॑ति दुष्कृ॒ताय॒ चर॑काचार्यं पा॒प्मने॑ सैल॒गम्
अक्षराजाय (पासों के राजा) के लिए कितव (जुआरी) को; कृताय के लिए दिनवदर्श (दिन-देखने वाला/दिन-रक्षक) को; त्रेतायै के लिए कल्पिन् (युक्ति करने वाला) को; द्वापराय के लिए अधिककल्पिन् (अति-युक्तिकार) को; आस्कन्दाय (आकस्मिक धावा/आक्रमण) के लिए सभास्थाणु (सभा का स्तम्भ-सा) को; मृत्युये के लिए गोव्यच्छ (गोधन-लूटने वाला) को; अन्तकाय के लिए गोघात (गाय का वध करने वाला) को; क्षुधे (भूख) के लिए—जो भिक्षा माँगता हुआ, गाय को विकृन्तन्तम् (काटने/टुकड़े करने वाले) की उपासना करता है; दुष्कृताय के लिए चरकाचार्य (भटकता उपदेशक/आचार्य) को; पाप्मने के लिए सैलग (पर्वतीय/शैल-सम्बद्ध दुष्ट) को।
Mantra 19
प्र॒ति॒श्रुत्का॑या अर्त॒नं घोषा॑य भ॒षमन्ता॑य बहुवा॒दिन॑मन॒न्ताय॒ मूक॒ᳪ शब्दा॑याडम्बराघा॒तं मह॑से वीणावा॒दं क्रोशा॑य तूणव॒ध्मम॑वरस्प॒राय॑ शङ्ख॒ध्मं वना॑य वन॒पम॒न्यतो॑रण्याय दाव॒पम्
प्रतिश्रुत्का (प्रतिध्वनि) को अर्तन (गूँजता-लुढ़कता नाद) अर्पित हो; घोष को; भषमन्ता (बकवादी) को; बहुवादिनी वाणी को; अनन्त को; मूक को; शब्द को; महाडम्बर के आघात को; उसके महत्त्व/महिमा को; वीणा-वादन को; क्रोश (आर्त-ध्वनि) को; तूण (तूर्य/तुरही) के ध्मान (फूँक) को; अवरस्पर (गहन-प्रतिध्वनित कंपन) को; शङ्ख-ध्मान को; वन को; वनप (वन-नाद) को; अन्यतोरण्य (दूरस्थ अरण्य) को; दावप (दावानल-नाद) को।
Mantra 20
न॒र्माय॑ पुँश्च॒लूᳪ हसा॑य॒ कारिं॒ याद॑से शाब॒ल्यां ग्रा॑म॒ण्यं गण॑कमभि॒क्रोश॑कं॒ तान्मह॑से वीणावा॒दं पा॑णि॒घ्नं तू॑णव॒ध्मं तान्नृ॒त्ताया॑न॒न्दाय॑ तल॒वम्
नर्मा (परिहास) के लिए पुँश्चली (वेश्या); हास्य के लिए कारी (कर्म करने वाला); यादस (जादू-टोना करने वाला) के लिए; शाबल्या (चित्री/मिश्र-वर्णा स्त्री) के लिए; ग्रामण्य (ग्राम-प्रधान) के लिए; गणक (जुआरी) के लिए; अभिक्रोशक (गाली देने वाला/निन्दक)—इनको महस् (महिमा/तेज) के लिए; वीणा-वादक, पाणिघ्न (हाथ से ताल देने वाला), तूणवध्म (तुरही/नगाड़ा फूँकने वाला)—इनको नृत्य के लिए, आनन्द के लिए, और तलव (ताल-लययुक्त ताली) के लिए।
Mantra 21
अ॒ग्नये॒ पीवा॑नं पृथि॒व्यै पी॑ठस॒र्पिणं॑ वा॒यवे॑ चाण्डा॒लम॒न्तरि॑क्षाय वᳪशन॒र्तिनं॑ दि॒वे ख॑ल॒तिᳪ सूर्या॑य हर्य॒क्षं नक्ष॑त्रेभ्यः किर्मि॒रं च॒न्द्रम॑से कि॒लास॒मह्ने॑ शु॒क्लं पि॑ङ्गा॒क्षᳪ रात्र्यै॑ कृ॒ष्णं पि॑ङ्गा॒क्षम्
अग्नि के लिए पीवान (स्थूल/पुष्ट); पृथ्वी के लिए पीठसर्पिण (पीठ के बल रेंगने वाला); वायु के लिए चाण्डाल; अन्तरिक्ष के लिए वंश-नर्तिन् (बाँस-नर्तक); द्यौ (स्वर्ग) के लिए खलति (गंजा); सूर्य के लिए हर्यक्ष (पीत/ताम्र-नेत्र); नक्षत्रों के लिए किर्मिर (चितकबरा); चन्द्रमा के लिए किलास (श्वेत-कुष्ठी); अह्न (दिन) के लिए शुक्ल पिङ्गाक्ष (श्वेत, पिङ्गल-नेत्र); रात्रि के लिए कृष्ण पिङ्गाक्ष (कृष्ण, पिङ्गल-नेत्र)।
Mantra 22
अथै॒तान॒ष्टौ विरू॑पा॒ना ल॑भ॒तेऽति॑दीर्घं॒ चाति॑ह्रस्वं॒ चाति॑स्थूलं॒ चाति॑कृशं॒ चाति॑शुक्लं॒ चाति॑कृष्णं॒ चाति॑कुल्वं॒ चाति॑लोमशं च । अशू॑द्रा॒ अब्रा॑ह्मणा॒स्ते प्रा॑जाप॒त्याः । मा॒ग॒धः पुँ॑श्च॒ली कि॑त॒वः क्ली॒बोऽशू॑द्रा॒ अब्रा॑ह्मणा॒स्ते प्रा॑जाप॒त्याः
अथ वह इन आठ विरूपों को प्राप्त करता है—अति-दीर्घ और अति-ह्रस्व, अति-स्थूल और अति-कृश, अति-शुक्ल और अति-कृष्ण, अति-कुल्व (अति-गंजा) और अति-लोमश। वे न शूद्र हैं न ब्राह्मण; वे प्राजापत्य हैं। मागध, पुँश्चली, कितव (जुआरी), क्लीब—वे न शूद्र हैं न ब्राह्मण; वे प्राजापत्य हैं।
Its core is Pravargya, especially the Gharma (heated milk) offering, presented as a consecratory act that concentrates tapas/tejas and propels the sacrifice toward success.
These are niyoga (ritual assignment) formulas: by naming and assigning diverse human types and functions to deities/abstract powers, the rite converts social plurality—including marginality—into a stable cosmic order (ṛta).
Kandikā 30.19 treats sound itself—speech, music, conch-blast, clamour, echo, and forest-roar—as sacrificially nameable offerings, extending yajña’s scope to the auditory universe.