
Sukta 9.6
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Soma Pavamāna.
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यह पवमान सोम-सूक्त सोम के आनन्दमय, प्रबल प्रवाह का स्तवन करता है, जब वह ऊनी छननों से होकर बहते हुए शुद्ध किया जाता है, देवताओं के लिए उपयुक्त बनता है और हवि-रूप में अर्पण योग्य होता है। इसमें सोम को शक्तिशाली ‘वृषभ’ और तीव्र अश्व के समान चित्रित किया गया है—यज्ञीय साधनों द्वारा परिशोधित होकर वह प्रेरित वाणी को जन्म देता है और विशेषतः इन्द्र को प्रिय मादक उल्लास तथा उन्माद-रस प्रदान करता है।
Mantra 1
मन्द्रया सोम धारया वृषा पवस्व देवयुः । अव्यो वारेष्वस्मयुः ॥
हे सोम, आनंददायी धारा में प्रवाहित हो; बल का वृषभ बनकर पवित्र हो; देवों का अभिलाषी होकर स्वयं को शुद्ध कर। ऊन के छन्नों में, हमारी ओर आकांक्षी होकर, हमारे ग्रहण के लिए रूप धारण कर।
Mantra 2
अभि त्यं मद्यं मदमिन्दविन्द्र इति क्षर । अभि वाजिनो अर्वतः ॥
हे इन्दु (सोम-बिन्दु), उस मद्य-आनन्द के उन्माद की ओर—‘इन्द्र के लिए’—तू प्रवाहित हो। और बल-समृद्धि के वाजिन अश्वों की ओर भी, हमारी विजय के शीघ्र वाहकों की ओर भी, तू धारा बनकर बह।
Mantra 3
अभि त्यं पूर्व्यं मदं सुवानो अर्ष पवित्र आ । अभि वाजमुत श्रवः ॥
हे सोम! निचोड़े जाते हुए, उस प्राचीन मद (आनन्द-रस) की ओर प्रवाहित हो; पवित्र करने वाले पवित्र (पवित्रम्) में दौड़कर प्रवेश कर। बल-सम्पदा (वाज) की ओर और श्रवस्—सत्य की व्यापक श्रुति-रूप यश—की ओर भी प्रवाहित हो।
Mantra 4
अनु द्रप्सास इन्दव आपो न प्रवतासरन् । पुनाना इन्द्रमाशत ॥
एक-दूसरे के पीछे-पीछे, सोम-बूँदें ढाल पर बहते जल की भाँति प्रवाहित होती हैं। अपने-आप को पवित्र करते हुए वे इन्द्र तक पहुँचती हैं, ताकि विजयी शक्ति हमारे भीतर जाग उठे।
Mantra 5
यमत्यमिव वाजिनं मृजन्ति योषणो दश । वने क्रीळन्तमत्यविम् ॥
दस कन्याएँ उसे वैसे ही माँजती हैं जैसे बल का वेगवान अश्व; उस अतिवी (अत्यविन्) को, जो वन में क्रीड़ा करता हुआ अतिक्रमणकारी धावक है। इस प्रकार यज्ञ-शक्तियाँ सोम को परिष्कृत करती हैं, जब तक उसकी दीप्तिमान गति प्रकट न हो जाए।
Mantra 6
तं गोभिर्वृषणं रसं मदाय देववीतये । सुतं भराय सं सृज ॥
उस वृषभ-तुल्य रस को—गोभिः (किरणों/गौओं) के साथ—मद (आनन्द) के लिए और देवों की प्रसन्न स्वीकृति (देववीतये) के लिए एकत्र करो। उसे अर्पण को वहन करने हेतु एक ही धारा में संयुक्त कर दो।
Mantra 7
देवो देवाय धारयेन्द्राय पवते सुतः । पयो यदस्य पीपयत् ॥
देव सोम—सुता हुआ—इन्द्र देव के लिए धारा बनकर पवते (बहता/शुद्ध होता) है; जब उसका पयः (दुग्ध-सा पोषण) उफनकर उसे तृप्त और पुष्ट करता है।
Mantra 8
आत्मा यज्ञस्य रंह्या सुष्वाणः पवते सुतः । प्रत्नं नि पाति काव्यम् ॥
यज्ञ का आत्मा—वेगवान—सोम, भली-भाँति सुता हुआ, पवते (शुद्ध होकर बहता) है। वह भीतर प्राचीन काव्य (काव्यम्)—ऋषियों की प्रेरित, सनातन वाणी—की रक्षा करता और उसे स्थिर करता है।
Mantra 9
एवा पुनान इन्द्रयुर्मदं मदिष्ठ वीतये । गुहा चिद्दधिषे गिरः ॥
इस प्रकार स्वयँ को पवित्र करता हुआ, इन्द्र-यु (इन्द्र की अभिलाषा वाला) तू देव-रसास्वादन के लिए परम तीव्र मद (आनन्द-उन्माद) धारण करता है। गुहा में भी तू प्रेरित वाणियाँ (गिरः) स्थापित करता है।
It praises Soma as he is purified (pavamāna) while flowing through woolen filters, becoming fit to be offered to the gods and to strengthen Indra.
The images show Soma’s power and speed: as a ‘bull’ he is forceful and fertilizing, and as a ‘swift steed’ he is polished by the rite until his energy becomes bright and effective.
Alongside the ritual meaning, it suggests an inner meaning: purified Soma awakens inspiration from hidden depths of the person, so truthful speech and insight emerge.
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