
Sukta 9.46
Soma Pavamāna
यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम का स्तवन करता है—जब वह शोधन की क्रिया में वेग से आगे बढ़ता है, देवताओं के आस्वाद हेतु दौड़ता है और प्रवाहित होते हुए तेजस्वी शक्ति प्राप्त करता है। इसमें पेषण और परिशोधन का सजीव चित्र है—मन्थन-दण्ड से उज्ज्वल सोम को पकड़ना, उसे ‘गौओं’ (किरणों/दुग्ध) के साथ मिलाना, और विशेषतः इन्द्र के लिए उसकी उन्मादक सामर्थ्य को सिद्ध करना। इसका प्रयोजन यज्ञीय भी है और प्रतीकात्मक भी: यज्ञ को बल देना तथा शुद्ध, उन्नत चेतना का प्राकट्य करना।
Mantra 1
असृग्रन्देववीतयेऽत्यासः कृत्व्या इव । क्षरन्तः पर्वतावृधः ॥
देवों के आस्वादन हेतु ये तीव्रगामी प्रवाहित हुए—कर्म में प्रवृत्त शक्तियों की भाँति, अपने कार्य में रत। क्षरते हुए वे पर्वत-वर्धक हैं—स्थिर ऊँचाइयों को बढ़ाते हैं।
Mantra 2
परिष्कृतास इन्दवो योषेव पित्र्यावती । वायुं सोमा असृक्षत ॥
परिष्कृत उज्ज्वल इन्दु—पितृ-बल से सम्पन्न कन्या-सी—वायु (प्राण-गति) की ओर स्वयं को प्रवाहित कर देते हैं।
Mantra 3
एते सोमास इन्दवः प्रयस्वन्तश्चमू सुताः । इन्द्रं वर्धन्ति कर्मभिः ॥
ये सोम-इन्दु, यज्ञ-द्रव्य से समृद्ध, चमू (पात्र) में सुते हुए, कर्मों (यज्ञ-क्रिया और अन्तः-साधना) से इन्द्र को वर्धित करते हैं।
Mantra 4
आ धावता सुहस्त्यः शुक्रा गृभ्णीत मन्थिना । गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ॥
इधर दौड़ो, सुहस्त्य (कुशल-हस्त) जनो; मन्थिन (मथनी-दण्ड) से शुक्ल (दीप्त) सोम को ग्रहण करो; गोभिः (किरणों/गव्यों) से मत्सर (मादक आनन्द) को मिलाकर पुष्ट करो।
Mantra 5
स पवस्व धनंजय प्रयन्ता राधसो महः । अस्मभ्यं सोम गातुवित् ॥
हे धनंजय! तू पवित्र होकर प्रवाहित हो; महान् राधस् (कल्याण-समृद्धि) को आगे बढ़ाने वाला बन। हे सोम, गातुवित् (मार्ग-ज्ञाता), हमारे लिए (कल्याण का) पथ खोज दे।
Mantra 6
एतं मृजन्ति मर्ज्यं पवमानं दश क्षिपः । इन्द्राय मत्सरं मदम् ॥
इस मर्ज्य (शोधन-योग्य) सोम को—स्वयं पवमान को—दस क्षिप्र (वेगवान) हाथ मँजते हैं; इन्द्र के लिए यह मत्सर (उन्माद-हर्ष) और मद (मदिरा-सा परमानन्द) है।
It describes Soma in the act of purification—rushing forth, being churned and strained, and becoming a bright, powerful drink offered to the gods, especially to Indra.
These are ritual images from Soma preparation: priests handle and churn the juice and mix it with milk (and poetically, with ‘rays’ of light) to strengthen its invigorating potency.
He symbolizes inner purification: raw energies and emotions are refined through discipline into a clear, luminous joy that supports strength, clarity, and inspired power.
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