Rig Veda Sukta 45
Mandala 9Sukta 456 Mantras

Sukta 45

Sukta 9.45

Rishi

Ascription varies; verify RV 9.45.1 in Anukramaṇī.

Devata

Soma Pavamāna (with Indra as primary Soma-drinker)

Chandas

To be verified for RV 9.45.1.

यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम (इन्दु) से प्रार्थना करता है कि वह छननी/पवित्रक से होकर स्वयं को शुद्ध करे और नशा देने वाला, अंतर्दृष्टि जगाने वाला आनन्द बनकर प्रवाहित हो, जो देवताओं को आह्वान करता है। मंत्रों में सोम के छननी के पार आगे बढ़ते वेग, विशेषतः इन्द्र द्वारा उसके पान, और उपासकों के स्तोत्र-गान से दृष्टि के विस्तार तथा वीर्य-पराक्रम के उदय पर बल दिया गया है।

Mantras

Mantra 1

स पवस्व मदाय कं नृचक्षा देववीतये । इन्दविन्द्राय पीतये ॥

हे इन्दु, जाग्रत् आनन्द (मद) के लिए पवित्र हो; हे नर-चक्षस्, देवों के हर्षित आगमन के लिए—इन्द्र के पान हेतु प्रवाहित हो, ताकि प्रकाश-बल के स्वामी इन्द्र हमारे भीतर समर्थ हों।

Mantra 2

स नो अर्षाभि दूत्यं त्वमिन्द्राय तोशसे । देवान्त्सखिभ्य आ वरम् ॥

हे सोम! हमारे लिए दूत-कर्म में प्रवाहित हो; तू इन्द्र को तुष्ट करता है। हे सखा! देवों को मित्रभाव से हमारे निकट ला, और हमारे साथ देव-संगति में वरणीय वर को उतार दे।

Mantra 3

उत त्वामरुणं वयं गोभिरञ्ज्मो मदाय कम् । वि नो राये दुरो वृधि ॥

और हे अरुण-दीप्तिमान! हम तुझे गो-किरणों से मद के लिए अभिषिक्त करते हैं। हमारे लिए रयि के द्वार खोल दे; समृद्धि के मार्गों को विस्तृत कर, जिनसे प्रचुरता प्रवेश करती है।

Mantra 4

अत्यू पवित्रमक्रमीद्वाजी धुरं न यामनि । इन्दुर्देवेषु पत्यते ॥

वह पवित्र को अतिक्रमित कर गया; जैसे बलवान वाजी मार्ग में जुए को धारण करता है। इन्दु देवों में प्रभुत्व प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है—शुद्ध आनन्द का तेजस्वी शक्तियों में स्वामित्व स्थापित करता है।

Mantra 5

समी सखायो अस्वरन्वने क्रीळन्तमत्यविम् । इन्दुं नावा अनूषत ॥

साथ-साथ सखाओं ने स्वर उठाया; वन के अन्तर में क्रीड़ा करने वाले इन्दु का अभिनन्दन किया—उसका, जो भेड़-सदृश तमस् के परे खेलता है। नावों की भाँति वे उसे आगे-आगे ले चले।

Mantra 6

तया पवस्व धारया यया पीतो विचक्षसे । इन्दो स्तोत्रे सुवीर्यम् ॥

उसी धारा से पवित्र होकर बह, जिससे पीया गया तू व्यापक-द्रष्टा बनता है। हे इन्दो, स्तोत्र में सुवीर्य—वीर-बल की परिपूर्णता—प्रदान कर।

Frequently Asked Questions

The hymn praises Soma as Pavamāna (the self-purifying Soma/Indu) as he flows through the filter; Indra is highlighted as the chief one who drinks Soma.

Pavamāna means “purifying” or “being purified,” referring to Soma as he is strained through the pavitra in the Soma ritual to become fit for offering and divine drinking.

It asks Soma to bring ecstatic inspiration and, when drunk, wide-seeing clarity, and to grant su-vīrya—strong heroic power—into the worshippers’ hymn and life.

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