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Sukta 8.56
Kāṇva / Kāṇvāyana (uncertain from excerpt)
Indra
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यह संक्षिप्त काण्व सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति करता है—उन्हें “भेड़िये-सदृश” बलवान रक्षक कहा गया है, जिनकी विशाल और अविनाशी उदारता भक्त साधक के लिए प्रत्यक्ष हो उठती है। इसमें प्रत्यक्ष समृद्धि (गोधन, सेवा, संसाधन) को इन्द्र की व्यापक शक्ति के चिह्न के रूप में मनाया गया है। अंत में सूक्त एक दीप्तिमान यज्ञीय मोड़ लेता है: अग्नि ज्ञानी हवि-वाहक के रूप में जाग्रत होते हैं और सूर्य की प्रभा को प्रकट कर देते हैं—इस प्रकार इन्द्र के वरदानों को यज्ञाग्नि के प्रकाशन से जोड़ा गया है।
Mantra 1
प्रति ते दस्यवे वृक राधो अदर्श्यह्रयम् । द्यौर्न प्रथिना शवः ॥
हे वृक (शक्तिशाली), दस्यु/सेवक साधक के प्रति तेरा अक्षय राधस् (दान-समृद्धि) प्रकट हुआ है—जैसे द्यौः (आकाश) अपने विस्तृत फैलाव में; वैसे ही तेरा बल-शवस् (पराक्रम) प्रकाशित है।
Mantra 2
दश मह्यं पौतक्रतः सहस्रा दस्यवे वृकः । नित्याद्रायो अमंहत ॥
मेरे लिए दस, और दस्यु/सेवक साधक के लिए सहस्र—ऐसा पौतक्रत (शुद्ध करने वाली क्रतु/इच्छाशक्ति वाला) वृक देता है; नित्य रयि (समृद्धि) के स्रोत से उसने धन-धाराओं को उफनाया है।
Mantra 3
शतं मे गर्दभानां शतमूर्णावतीनाम् । शतं दासाँ अति स्रजः ॥
मेरे लिए सौ—गर्दभों (भार-वहक) के; सौ—ऊर्णावती (ऊन-सम्पन्न) के; और सौ—दासों के, जो स्रजः (मालाओं) से भी बढ़कर हैं।
Mantra 4
तत्रो अपि प्राणीयत पूतक्रतायै व्यक्ता । अश्वानामिन्न यूथ्याम् ॥
वहाँ भी गति आगे बढ़ाई गई—पूतक्रतु (शुद्ध-संकल्प शक्ति) के लिए वह स्पष्ट रूप से प्रकट हुई; जैसे अश्वों के यूथ (दल) में सुव्यवस्थित हाँक, वैसे ही शक्तियाँ एक ही समरस संघटन में एकत्र हुईं।
Mantra 5
अचेत्यग्निश्चिकितुर्हव्यवाट् स सुमद्रथः । अग्निः शुक्रेण शोचिषा बृहत्सूरो अरोचत दिवि सूर्यो अरोचत ॥
अग्नि जाग उठा है—वह जो जानता है, हवि-वह (हव्यवाट्) अर्पण का वाहक; वह सुमद्रथ (आनन्द-रथ) के साथ आता है। अपने उज्ज्वल शोचिषा (ज्योति) से वह बृहत्-सूर्य को प्रकाशित करता है; दिवि (स्वर्ग) में सूर्य दीप्ति से प्रकट होता है।
It praises Indra as a powerful protector whose generous abundance becomes clearly visible to the devoted worshipper, and it links that blessing to the clarity brought by a well-kindled sacrificial fire.
The repeated “hundred” (śatam) is a Vedic way of expressing fullness and plenty—many supports and resources gathered in an ordered, sustaining way.
The closing verse functions like a ritual seal: Agni, the carrier of offerings, awakens and makes light manifest, showing that Indra’s gifts are stabilized and made luminous through the rite (yajña).
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