Rig Veda Sukta 55
Mandala 8Sukta 555 Mantras

Sukta 55

Sukta 8.55

Rishi

Kāṇva / Kāṇvāyana (RV 8.55 is in the Kāṇva collection; specific r̥ṣi uncertain from excerpt)

Devata

Indra

Chandas

Not securely determinable from excerpt alone

इन्द्र को समर्पित यह संक्षिप्त काण्व स्तुति-गीत उनकी वीर्य-शक्ति के प्रत्यक्ष उभार का उत्सव मनाता है, जो उपासक की ओर अग्रसर होकर प्रयत्नशील याचक को राधस् (दान-समृद्धि) प्रदान करती है। ‘सैकड़ों’ और ‘चार सैकड़ों’ जैसी प्रभावशाली गणनाओं के द्वारा इन्द्र के वरदान को अतिप्रचुर पूर्णता—भौतिक, युद्धात्मक और प्राणदायी—के रूप में चित्रित किया गया है। अंत में इन्द्र के द्वारा सप्तविध व्यवस्था की स्थापना और तमसिक अवरोधक शक्तियों को मार्गों से परे हाँक देने का बिंब आता है, जिससे यश, दृष्टि और सिद्धि का पथ प्रशस्त होता है।

Mantras

Mantra 1

भूरीदिन्द्रस्य वीर्यं व्यख्यमभ्यायति । राधस्ते दस्यवे वृक ॥

इन्द्र का वीर्य सचमुच बहुल है—वह हमारे निकट आता हुआ स्पष्ट प्रकट होता है। हे वृक (बलवान), दस्यु/सेवक साधक के लिए तेरा धन-दान प्रवाहित हो—प्रयत्नशील के लिए पूर्णता का अर्पण।

Mantra 2

शतं श्वेतास उक्षणो दिवि तारो न रोचन्ते । मह्ना दिवं न तस्तभुः ॥

स्वर्ग में सौ उज्ज्वल उक्षण (बैल) तारों की भाँति चमकते हैं; महिमा से वे स्वर्ग को ही थामे रहते हैं—प्रकाश-शक्तियों के आधार पर द्यौः स्थिर रहती है।

Mantra 3

शतं वेणूञ्छतं शुनः शतं चर्माणि म्लातानि । शतं मे बल्बजस्तुका अरुषीणां चतुःशतम् ॥

शत वेणु, शत शुनः (वेगवान प्रेरणाएँ), शत चर्म—तैयार किए हुए आवरण; मेरे लिए शत बल्बज-तुक (बुने हुए उपलभ्य), और अरुषी (रुद्रवर्ण) शक्तियों के चार सौ—यही परिपूर्णताओं की गणना है, जब बल आह्वान का उत्तर देता है।

Mantra 4

सुदेवाः स्थ काण्वायना वयोवयो विचरन्तः । अश्वासो न चङ्क्रमत ॥

हे काण्वायन जनो, तुम में सुदेवता हो; प्राण-प्राण के प्रत्येक लोक में विचरते हुए—अश्वों की भाँति आगे बढ़ो, और पथ में दृढ़ता से कदम रखो।

Mantra 5

आदित्साप्तस्य चर्किरन्नानूनस्य महि श्रवः । श्यावीरतिध्वसन्पथश्चक्षुषा चन संनशे ॥

तब निश्चय ही, सप्तस्वरूप की स्तुति करते हुए, अनून (अक्षय) का महत् श्रवस् (यश) बढ़ता है। श्यावी (अंधकारमय) शक्तियाँ पथों के पार धकेल दी जाती हैं; दृष्टि से भी वे संयोग को नहीं पहुँचतीं—इस प्रकार तमस् मार्ग से बहिष्कृत होता है।

Frequently Asked Questions

It praises Indra’s heroic strength as something that actively comes to help the worshipper, asks for abundant gifts, and affirms that Indra drives away dark obstacles so the path becomes clear.

In Vedic praise, such numbers often signal overflowing plenty rather than exact counting. Here they intensify the sense that Indra’s giving is vast, well-stocked, and reliable.

It commonly points to a complete, well-ordered structure of reality (often linked with ṛta). In the hymn’s context, it means Indra establishes fullness and order, and therefore pushes obstructive darkness beyond the way.

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