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Sukta 8.40
Nabhāka (as indicated by the refrain/epithet nabhāka-vat in the hymn; traditional attribution)
Indrāgnī (dual deity: Indra and Agni conjoint)
Jagatī (probable; requires full metrical count verification against pada lengths)
यह सूक्त इन्द्र–अग्नि को विजय और संरक्षण की संयुक्त शक्ति के रूप में आवाहन करता है और ‘रयि’ (समृद्धि/धन-वैभव) की याचना करता है, जो ‘दृढ़-स्थापित’ संघर्षों में धैर्य और जय दिलाती है। बार-बार प्रार्थना की जाती है कि विरोधी उसी रण-भूमि में तितर-बितर हो जाएँ, जबकि भीतर की अग्नि (अग्नि) वन में बहती वायु की भाँति बाधाओं को चीरती हुई आगे बढ़े। अंत में वर्तमान स्तुति को पूर्वज ऋषियों से जोड़ते हुए ‘त्रि-आधारित’ शान्ति और समृद्धियों पर प्रभुत्व की कामना की जाती है।
Mantra 1
इन्द्राग्नी युवं सु नः सहन्ता दासथो रयिम् । येन दृळ्हा समत्स्वा वीळु चित्साहिषीमह्यग्निर्वनेव वात इन्नभन्तामन्यके समे ॥
हे इन्द्रा-अग्नी, तुम दोनों ही विजयी-समर्थ हो; हमें रयि—समृद्धि—प्रदान करो, जिससे दृढ़-स्थापित समरों में हम भेद्य-न-होने वाले पर भी जय पाएँ। और भीतर का अग्नि, वन में बहती वायु की भाँति, उसी संग्राम-क्षेत्र में अन्य (विरोधी) को दूर हाँक दे।
Mantra 2
नहि वां वव्रयामहेऽथेन्द्रमिद्यजामहे शविष्ठं नृणां नरम् । स नः कदा चिदर्वता गमदा वाजसातये गमदा मेधसातये नभन्तामन्यके समे ॥
हम तुम्हें रोकना नहीं चाहते; बल्कि हम इन्द्र को ही यजते हैं—नरों में नर, सर्वाधिक शक्तिशाली। वह कभी तो अपने अश्व सहित हमारे पास आए—वाज-साति (बल-समृद्धि की प्राप्ति) के लिए, और मेधा-साति (प्रकाशमयी बुद्धि की प्राप्ति) के लिए; उसी समर-क्षेत्र में अन्य (विरोधी) दूर हाँके जाएँ।
Mantra 3
ता हि मध्यं भराणामिन्द्राग्नी अधिक्षितः । ता उ कवित्वना कवी पृच्छ्यमाना सखीयते सं धीतमश्नुतं नरा नभन्तामन्यके समे ॥
वे दोनों—इन्द्र और अग्नि—आवेगों और भारों के मध्य में अधिष्ठित हैं। वे दोनों कवी, कवित्व-शक्ति से, पूछे जाने पर सख्य-भाव से जुड़कर संयुक्त धीत (समेकित विचार) को प्राप्त हों। हे नरों (वीरों), उसी समर-क्षेत्र में अन्य (विरोधी) तितर-बितर हों।
Mantra 4
अभ्यर्च नभाकवदिन्द्राग्नी यजसा गिरा । ययोर्विश्वमिदं जगदियं द्यौः पृथिवी मह्युपस्थे बिभृतो वसु नभन्तामन्यके समे ॥
नभाक के समान, यजसा (यज्ञमय) वाणी से इन्द्र-अग्नि की अभ्यर्चना करो। क्योंकि इन्हीं दोनों में यह समस्त जगत् धारण है—यह द्यौ (स्वर्ग) और यह महती पृथिवी—जिनके उपस्थ (अंक) में वे वसु (धन/तेज) को धारण करते हैं। उसी समर-क्षेत्र में अन्य तितर-बितर हों।
Mantra 5
प्र ब्रह्माणि नभाकवदिन्द्राग्निभ्यामिरज्यत । या सप्तबुध्नमर्णवं जिह्मबारमपोर्णुत इन्द्र ईशान ओजसा नभन्तामन्यके समे ॥
नभाक के समान, इन्द्र-अग्नि के लिए ब्रह्माणि (स्तुति-मंत्र) प्रेषित करो। जिन्होंने सप्त-बुध्न अर्णव (सात-आधार वाला महासागर) को, जिह्म-बार (टेढ़ी-बार/अवरोध) वाले आवरण को, उघाड़ दिया—वह इन्द्र, ओज से ईशान (अधिपति)—उसी समर-क्षेत्र में अन्य तितर-बितर हों।
Mantra 6
अपि वृश्च पुराणवद्व्रततेरिव गुष्पितमोजो दासस्य दम्भय । वयं तदस्य सम्भृतं वस्विन्द्रेण वि भजेमहि नभन्तामन्यके समे ॥
हे इन्द्र! जैसे प्राचीन काल में, वैसे ही उस गाँठ-बँधे बल को काट डाल; जैसे व्रत-भंग करने वाले की बाँध (प्रतिज्ञा-बंधन) काटी जाती है, वैसे ही। दास के ओज को चूर कर। तब हम इन्द्र के साथ इस संचित वसु (धन/सम्पदा) का विभाजन करें; और अन्य लोग उसी समर-क्षेत्र में तितर-बितर हों।
Mantra 7
यदिन्द्राग्नी जना इमे विह्वयन्ते तना गिरा । अस्माकेभिर्नृभिर्वयं सासह्याम पृतन्यतो वनुयाम वनुष्यतो नभन्तामन्यके समे ॥
यदि, हे इन्द्र-अग्नि, ये जन अपने ही स्वर से, अपनी ही गिरा से तुम्हें पुकारते हैं—तो हम अपने नर-वीरों के साथ सहन करें और विजयी हों; जो युद्ध करते हैं उनके विरुद्ध भी, और जो जीतने को उद्यत हैं उनके विरुद्ध भी, हम जीतें; और अन्य लोग उसी समर-क्षेत्र में तितर-बितर हों।
Mantra 8
या नु श्वेताववो दिव उच्चरात उप द्युभिः । इन्द्राग्न्योरनु व्रतमुहाना यन्ति सिन्धवो यान्त्सीं बन्धादमुञ्चतां नभन्तामन्यके समे ॥
वे दो श्वेत-दीप्तिमान, जो दिव से ऊपर उठते हैं और अपने प्रकाशों के साथ समीप आते हैं—इन्द्र-अग्नि के व्रत के अनुसार नदियाँ चलती हैं, (जल) वहन करती हुई। वे उन्हें बन्धन से मुक्त करें; और अन्य लोग उसी समर-क्षेत्र में तितर-बितर हों।
Mantra 9
पूर्वीष्ट इन्द्रोपमातयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः सूनो हिन्वस्य हरिवः । वस्वो वीरस्यापृचो या नु साधन्त नो धियो नभन्तामन्यके समे ॥
हे इन्द्र! तेरी प्राचीन सहायताएँ बहुत हैं; और बहुत-सी तेरी स्तुतियाँ भी हैं, हे बल के पुत्र, हे हरिवः (हरित अश्वों के धारक)। वीर के धन की ये संलग्नताएँ, जो अब हमारी धियों (प्रेरित बुद्धियों) को सिद्ध करती हैं—उसी क्षेत्र में अन्य सब विखर जाएँ।
Mantra 10
तं शिशीता सुवृक्तिभिस्त्वेषं सत्वानमृग्मियम् । उतो नु चिद्य ओजसा शुष्णस्याण्डानि भेदति जेषत्स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे ॥
उसे सुगढ़ वचनों से तीक्ष्ण करो—उस उग्र, बलवान, ऋचाओं के योग्य को। क्योंकि वह, जो अपने ओज से शुष्ण के अण्डों को तोड़ता है, अभी भी स्वर्वती (दीप्तिमान स्वर्ग-धारिणी) आपः—जल-धाराओं—को जीत लेगा; उसी क्षेत्र में अन्य सब विखर जाएँ।
Mantra 11
तं शिशीता स्वध्वरं सत्यं सत्वानमृत्वियम् । उतो नु चिद्य ओहत आण्डा शुष्णस्य भेदत्यजैः स्वर्वतीरपो नभन्तामन्यके समे ॥
उसे तीक्ष्ण करो—उस स्वध्वर (सुसंस्कृत यज्ञ-पथ) वाले, सत्य, ऋत्विय (ऋतु-समय में कार्य करने वाले) बल को। क्योंकि वह, जो अपने सामर्थ्य से शुष्ण के अण्डों को तोड़ता है—तब स्वर्वती आपः, सूर्य-प्रकाश धारण करने वाली जल-धाराएँ, उमड़कर प्रकट होती हैं और अन्य, उच्च स्तर में दीप्त होती हैं।
Mantra 12
एवेन्द्राग्निभ्यां पितृवन्नवीयो मन्धातृवदङ्गिरस्वदवाचि । त्रिधातुना शर्मणा पातमस्मान्वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥
इस प्रकार इन्द्र–अग्नि के लिए एक नवीन वाणी उच्चरित होती है—जैसे पितृगण ने कहा, जैसे मन्धाता ने, जैसे अङ्गिरस ऋषियों ने। त्रिधातु-युक्त शरण/शर्म से हमारी रक्षा करो; हम रयी (समृद्धि) के स्वामी बनें।
Indrāgnī means Indra and Agni praised as a single allied power. Indra brings conquering force and breakthrough, while Agni is the igniting, purifying fire that carries offerings—together they grant protection, success, and abundance.
It asks for rayi (wealth/inner plenitude), the strength to endure and win in contests, and the scattering of hostile forces in the same field of struggle.
It is a request for stable, well-established protection and well-being on three levels—often understood as firm security in body, life-force, and mind (or in earth, midspace, and heaven), so prosperity can endure.
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