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Sukta 7.91
Vasiṣṭha
Vāyu (with Indra–Vāyu context continuing; Manu and Uṣas/Sūrya as supporting figures)
Triṣṭubh (probable)
वसिष्ठ का यह सूक्त वायु का आह्वान करता है, जो इन्द्र–वायु के निकट सहचर रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्हें सोम-यज्ञ में आमंत्रित कर कवि रक्षा, बल और कल्याण की याचना करता है। इसमें उन प्राचीन, निष्कलंक देवों का स्मरण है जिन्होंने अवरोध के समय मनु की सहायता की—सूर्य के साथ उषा को स्थापित करके—जो ऋत की पुनर्स्थापना और मानव-पथ के लिए स्पष्ट दृष्टि का प्रतीक है। अंत में कवि (वसिष्ठगण) अपनी सुगठित स्तुति के द्वारा स्थायी ‘स्वस्ति’ (समरस कल्याण) की प्रार्थना करते हैं।
Mantra 1
कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन् । ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण ॥
क्या वे प्राचीन देव—शक्ति में बढ़े हुए और निर्दोष—हमारे नमस्कार से वश में होंगे? उन्होंने वायु के लिए और बाधित हुए मनु के लिए उषा को सूर्य के साथ वास कराया—मानव-पथ में प्रकाशमान ऋत (ऋत-व्यवस्था) को प्रतिष्ठित किया।
Mantra 2
उशन्ता दूता न दभाय गोपा मासश्च पाथः शरदश्च पूर्वीः । इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमीट्टे सुवितं च नव्यम् ॥
कामना से युक्त, दूतों के समान, चूक न हो इसलिए रक्षक बनकर, वे मासों, पथों और अनेक पूर्व शरद्-ऋतुओं में विचरते हैं। हे इन्द्र–वायु, तुम्हारी ओर आती सुगठित स्तुति तुम्हारी मृडिका (कृपा) और नवीन सुवित (सुपथ-प्रेरणा) की याचना करती है।
Mantra 3
पीवोअन्नाँ रयिवृधः सुमेधाः श्वेतः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः । ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेन्नरः स्वपत्यानि चक्रुः ॥
बलवर्धक अन्न से परिपूर्ण, रयि को बढ़ाने वाले, सुमेधा—श्वेत तेज युक्त नियुत (जुती हुई शक्तियों) से चिपकता है, अभिश्री बनकर। वे वायु के लिए एक-मन होकर दृढ़ खड़े हैं; इन नरोंने स्वपत्य (सदाधिकार/सच्चा स्वामित्व) के समस्त कर्म रचे हैं।
Mantra 4
यावत्तरस्तन्वो यावदोजो यावन्नरश्चक्षसा दीध्यानाः । शुचिं सोमं शुचिपा पातमस्मे इन्द्रवायू सदतं बर्हिरेदम् ॥
जितनी दूर देह फैल सके, जितनी दूर बल (ओज) विस्तार पा सके, और जितनी दूर नर-ऋषि दृष्टि से दीप्त होकर (स्तुति) जगा सकें—हे शुचि-पान करने वालों, यहाँ हमारे लिए शुद्ध सोम का पान करो। हे इन्द्र–वायु, इस हमारे अर्पण-आसन (बर्हि) पर आकर बैठो।
Mantra 5
नियुवाना नियुतः स्पार्हवीरा इन्द्रवायू सरथं यातमर्वाक् । इदं हि वां प्रभृतं मध्वो अग्रमध प्रीणाना वि मुमुक्तमस्मे ॥
नित्य-नवयौवन से युक्त, नियुत (जुती हुई शक्तियों) सहित, वांछित वीर-शक्ति से समृद्ध—हे इन्द्र–वायु, एक ही रथ पर संग होकर हमारी ओर आओ। क्योंकि मधु का यह प्रथम सार तुम्हारे लिए लाया गया है; फिर तृप्त होकर हमारे लिए विस्तार और विमोचन खोल दो।
Mantra 6
या वां शतं नियुतो याः सहस्रमिन्द्रवायू विश्ववाराः सचन्ते । आभिर्यातं सुविदत्राभिरर्वाक्पातं नरा प्रतिभृतस्य मध्वः ॥
तुम्हारी वे नियुत-शक्तियाँ—सैकड़ों और हज़ारों—हे इन्द्र–वायु, जो सर्व-वांछित समृद्धि से परिपूर्ण हैं, तुम्हारे साथ जुड़ती हैं। उन्हीं के साथ, सु-विदत्र (सही पाने की स्पष्ट शक्तियों) सहित, हमारी ओर उतरो। हे दोनों नर-वीर, तुम्हारे लिए अर्पित और लाया गया मधु-रस पियो।
Mantra 7
अर्वन्तो न श्रवसो भिक्षमाणा इन्द्रवायू सुष्टुतिभिर्वसिष्ठाः । वाजयन्तः स्ववसे हुवेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
यश की याचना करते उत्सुक अश्वों की भाँति, हम वसिष्ठजन, हे इन्द्र–वायु, सुगठित स्तुतियों से आपसे याचना करते हैं। अपने स्ववशत्व के लिए बल-समृद्धि को जीतने हेतु हम आपको आह्वान करते हैं; आप सदा कल्याणकारी स्वस्तियों से हमारी रक्षा करें।
Vāyu is primary, but the hymn strongly addresses the dual deity Indra–Vāyu, especially in the Soma-drinking context.
It recalls a divine act of removing obstruction and establishing luminous order—symbolically bringing clarity (Dawn) into full alignment with truth and vision (Sun) for human life.
It functions as an invitation and praise during Soma offerings, asking Indra–Vāyu/Vāyu to come, drink the purified Soma, sit on the offering seat, and grant strength and ongoing well-being (svasti).
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