Rig Veda Sukta 6
Mandala 7Sukta 67 Mantras

Sukta 6

Sukta 7.6

Rishi

Vasiṣṭha (Vāsiṣṭha tradition for Maṇḍala 7; specific attribution within 7.6 not provided in input)

Devata

Agni (as sovereign asura-power; Indra referenced as comparison)

Chandas

Triṣṭubh (probable; not explicitly provided in input)

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है, जो प्रभुत्वशाली ‘असुर-शक्ति’ (स्वामी-तुल्य आध्यात्मिक बल) हैं—पवित्र काष्ठ में प्रज्वलित होकर वे जनों के प्रेरक और रक्षक रूप में प्रकट होते हैं। अग्नि की महिमा यह है कि वे प्राणियों को पश्चिम की अंधकार-गति से मोड़कर प्रकाश के पूर्व की ओर ले जाते हैं, भीतर और बाहर के शत्रुओं को वश में करते हैं, और ब्रह्माण्ड की गहराइयों से स्वर्ग और पृथ्वी तक धन-सम्पदा का वितरण करते हैं।

Recitation with translationRig Veda 7.6

Mantras

Mantra 1

प्र सम्राजो असुरस्य प्रशस्तिं पुंसः कृष्टीनामनुमाद्यस्य । इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि वन्दे दारुं वन्दमानो विवक्मि ॥

मैं सम्राट् असुर (प्रभु-शक्ति) की प्रशस्ति को आगे बढ़ाता हूँ—मनुष्यों की प्रजाओं के लिए उस अनुमाद्य (प्रेरक आनन्द) को। इन्द्र के समान, बलवान् के कृत तवस (पराक्रम) के कर्मों को मैं प्रकट करता हूँ। मैं दारु (पवित्र काष्ठ) को नमस्कार करता हूँ; नमस्कार करते हुए मैं वाणी उच्चारता हूँ।

Mantra 2

कविं केतुं धासिं भानुमद्रेर्हिन्वन्ति शं राज्यं रोदस्योः । पुरंदरस्य गीर्भिरा विवासेऽग्नेर्व्रतानि पूर्व्या महानि ॥

अद्रि (पत्थर) से उत्पन्न, तेजस्वी—कवि, केतु (चिह्न), धासि (आधार)—उस अग्नि को वे प्रेरित करते हैं कि वह द्यावा‑पृथिवी के कल्याणमय राज्यत्व की ओर बढ़े। पुरंदर (दुर्ग‑भेदक) के लिए मैं स्तुतियों से सेवा करता हूँ; अग्नि के प्राचीन, महान व्रतों को मैं जाग्रत करता हूँ।

Mantra 3

न्यक्रतून्ग्रथिनो मृध्रवाचः पणीँरश्रद्धाँ अवृधाँ अयज्ञान् । प्रप्र तान्दस्यूँरग्निर्विवाय पूर्वश्चकारापराँ अयज्यून् ॥

अग्नि निर्बल‑संकल्प, ग्रन्थि‑बद्ध, कुटिल‑वाणी—अश्रद्ध, अवृद्ध, अयज्ञ पणी जनों को नीचे गिराकर दूर हाँक देता है। वह उन दस्युओं को आगे‑आगे खदेड़ता है; पूर्ववर्तियों को वह अग्रस्थान देता है, और परवर्तियों—अयज्युओं (अयज्ञ करने वालों) को पीछे ढकेल देता है।

Mantra 4

यो अपाचीने तमसि मदन्तीः प्राचीश्चकार नृतमः शचीभिः । तमीशानं वस्वो अग्निं गृणीषेऽनानतं दमयन्तं पृतन्यून् ॥

जो अपनी शक्तियों से पश्चिमाभिमुख तमस में मदमत्त होने वालों को पूर्व की ओर कर देता है—कर्म में वही नृतम (अत्यन्त पुरुषार्थी) है। उस वसु के ईशान, अग्नि को मैं स्तुत करता हूँ—अजेय, और पृतन्युओं (युद्धरतों) को वश में करने वाला।

Mantra 5

यो देह्यो अनमयद्वधस्नैर्यो अर्यपत्नीरुषसश्चकार । स निरुध्या नहुषो यह्वो अग्निर्विशश्चक्रे बलिहृतः सहोभिः ॥

जो दीन-हीनों को वध-शक्तियों से निरामय करता है, जिसने उषाओं को आर्य (श्रेष्ठ) की पत्नियाँ बनाया—वह यह्व, नहुष-सम्बद्ध अग्नि, प्रतिकूलों को रोककर, अपने बलों से जनों को बलि-हर्ता (हविष्-वाहक) बनाता है।

Mantra 6

यस्य शर्मन्नुप विश्वे जनास एवैस्तस्थुः सुमतिं भिक्षमाणाः । वैश्वानरो वरमा रोदस्योराग्निः ससाद पित्रोरुपस्थम् ॥

जिसके शरण-शर्म में सब जन ऐसे ही खड़े रहते हैं, सुमति की याचना करते हुए—वह वैश्वानर अग्नि दोनों लोकों के बीच अपना वरणीय आसन पा बैठा है, और अपने माता-पिता (द्यावा-पृथिवी) की गोद में समा गया है।

Mantra 7

आ देवो ददे बुध्न्या वसूनि वैश्वानर उदिता सूर्यस्य । आ समुद्रादवरादा परस्मादाग्निर्ददे दिव आ पृथिव्याः ॥

देव गहन-आधारित वसुओं को देता है; वैश्वानर सूर्य के उदय से देता है। नीचे के समुद्र से और परे के उस पार से—अग्नि देता है, द्युलोक से लेकर पृथिवी तक।

Frequently Asked Questions

In early Vedic usage, “asura” can mean a lordly, sovereign power—not a demon. Here it emphasizes Agni’s commanding spiritual might and rulership (samrāj/īśāna).

It honors the fuel-wood (samidh/dāru) as the vessel that holds the hidden fire. Ritually, it points to kindling; symbolically, it suggests awakening divine light within material life.

Kindle the inner and outer fire: Agni leads from darkness to clarity, disciplines conflict, and brings support and prosperity from every level of the world.

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