
Sukta 7.54
Vasiṣṭha
Vāstoṣpati (guardian/presiding power of the dwelling)
Triṣṭubh (probable)
वसिष्ठ का यह संक्षिप्त सूक्त गृह के अधिष्ठाता वस्तोṣ्पति का आह्वान करता है कि वे इस गृहस्थ-परिवार को पहचानें और घर में प्रवेश को मंगलमय तथा उपद्रव-रहित करें। इसमें मनुष्यों और पशुओं—दोनों के लिए शान्ति, आयु और समृद्धि की वृद्धि, तथा दैनिक जीवन में कल्याण और जीवन, कर्म व उपासना के उचित “योजन” (सुव्यवस्थित समन्वय) के द्वारा स्थायी संरक्षण की प्रार्थना की गई है।
Mantra 1
वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः । यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥
हे वास्तोष्पति, हमारी ओर ध्यान दो; हमारे लिए शुभ-प्रवेश (स्वावेश) बनो और रोग-रहित (अनमीव) रहो। हम जो तुमसे याचना करते हैं, उसे स्वीकार करो; हमारे द्विपदों के लिए शान्ति हो, और हमारे चतुष्पदों के लिए भी शान्ति हो।
Mantra 2
वास्तोष्पते प्रतरणो न एधि गयस्फानो गोभिरश्वेभिरिन्दो । अजरासस्ते सख्ये स्याम पितेव पुत्रान्प्रति नो जुषस्व ॥
हे वास्तोष्पति, हमारे लिए प्रातर-रण (आगे ले जाने वाले रक्षक) बनो; गो-सम्पदा और अश्व-सम्पदा से, हे इन्दु (सोम), हमारे जीवन को बढ़ाने वाले (गयस्फान) हो। तुम्हारी सख्यता में हम अजर (अविनाशी) रहें; जैसे पिता पुत्रों को, वैसे हमारी ओर उन्मुख होकर हमें स्वीकार करो।
Mantra 3
वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या । पाहि क्षेम उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे वास्तोष्पते! तेरी शग्मयी (बलवती) संसदा और रण्वयी, गातुमती (आनन्ददायिनी, मार्ग-प्रद) प्रेरणा के साथ हम तेरे संग निवास कर सकें। हमारे क्षेम की रक्षा कर, और योग में भी हमारे लिए वर (श्रेष्ठ) प्रदान कर। तुम सदा स्वस्तिभिः (कल्याणकारी शक्तियों) से हमारी रक्षा करो।
Vāstoṣpati is the presiding power of the dwelling—the guardian who makes a home safe, harmonious, and fit for healthy living.
It asks peace and protection for everyone in the household: people (two-footed) and animals such as cattle and horses (four-footed), reflecting a complete domestic economy.
It is suitable for entering or blessing a new home, for restoring calm after disturbances, and for prayers seeking health, protection, and prosperity in household life.
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