
Sukta 7.52
Vasiṣṭha
Ādityas / Mitra-Varuṇa / Dyāvāpṛthivī (invoked as archetypal foundations)
Triṣṭubh (likely; verify)
वसिष्ठ का यह संक्षिप्त सूक्त आदित्यों—विशेषतः मित्र और वरुण—से स्थैर्य, रक्षा, वंश-परंपरा की सुरक्षा तथा पैतृक या बाह्य कारणों से उत्पन्न दोष/अपराध-बोध से मुक्ति की प्रार्थना करता है। इसमें यजमानों के लिए यह भी कामना है कि वे द्यावा-पृथिवी (स्वर्ग और पृथ्वी) की भाँति ‘आधार-तुल्य’ बनें। अंत में अंगिरसों के सवितृ के धन/निधि को प्राप्त करने का दर्शन आता है, और समस्त देवताओं की सम्मति से यज्ञकर्ता को आशीष देने की बात कही गई है।
Mantra 1
आदित्यासो अदितयः स्याम पूर्देवत्रा वसवो मर्त्यत्रा । सनेम मित्रावरुणा सनन्तो भवेम द्यावापृथिवी भवन्तः ॥
हम अदिति के पुत्र—आदित्य—होें; देवपथ में भी और मर्त्यलोक में भी दृढ़ आधार बनें। हे मित्र-वरुण, विजय पाने वाले और निरन्तर विजय पाने वाले, हम विजय प्राप्त करें; और द्यावा-पृथिवी के समान—स्थिर होते हुए—हम भी स्थिर आधार बनें।
Mantra 2
मित्रस्तन्नो वरुणो मामहन्त शर्म तोकाय तनयाय गोपाः । मा वो भुजेमान्यजातमेनो मा तत्कर्म वसवो यच्चयध्वे ॥
मित्र और वरुण हमारे लिए महान आश्रय बढ़ाएँ—हमारे बालक और संतति की रक्षा करते हुए। पराए से उत्पन्न पाप के कारण हम न भोगें; और हे वसुगण, जो कर्म तुम (फलरूप से) बाँधते हो, वह हम पर न बाँधो।
Mantra 3
तुरण्यवोऽङ्गिरसो नक्षन्त रत्नं देवस्य सवितुरियानाः । पिता च तन्नो महान्यजत्रो विश्वे देवाः समनसो जुषन्त ॥
वेगवान् अङ्गिरस, देव सविता के पथ पर चलते हुए, उस रत्न-निधि को प्राप्त करते हैं। और वह महान्, यज्ञ-योग्य पिता उसे हमें प्रदान करे; तथा एक-मन होकर समस्त देवगण हमारे भीतर उसमें प्रसन्न हों।
It asks the Ādityas—especially Mitra and Varuṇa—for stable protection, safety of children and descendants, and freedom from blame or harmful consequences that do not truly belong to the worshipper.
It means: “May we not have to suffer for a fault that was born from someone else”—a prayer not to be burdened by чужed guilt or unjust consequences.
They are invoked as the archetype of steadiness and support. The hymn prays that the worshippers, too, become firm foundations for right work and life, upheld by truth and order.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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