Rig Veda Sukta 53
Mandala 3Sukta 5324 Mantras

Sukta 53

Sukta 3.53

Rishi

Viśvāmitra Gāthina (traditional for RV 3.53)

Devata

Indra-Parvata

Chandas

Triṣṭubh (probable)

यह सूक्त इन्द्र को पर्वत के साथ उनके महान रथ पर आने, सोमपान करने और यजमानों को बल, विजय तथा प्रचुर ‘पोषक धाराओं’ (इषः) से समर्थ करने के लिए आमंत्रित करता है। इसमें इन्द्र के वज्र-पराक्रम की स्तुति को कवि के रचित ब्रह्मन् (पवित्र वचन/संस्कार-रूप सूत्र) के साथ पिरोया गया है, ताकि भरत जन के लिए समृद्धि, वीर्य और प्रतियोगिता व युद्ध में सफलता सुनिश्चित हो।

Recitation with translationRig Veda 3.53

Mantras

Mantra 1

इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः । वीतं हव्यान्यध्वरेषु देवा वर्धेथां गीर्भिरिळया मदन्ता ॥

हे इन्द्र और पर्वत! विशाल रथ से आओ; वांछित इषाएँ—पोषण और वीर्य देने वाली धाराएँ—हम तक वहन करो। हे देवो! अध्वर-यज्ञों में हव्यों का आस्वादन करो; हमारी गिराओं से बढ़ो, और उस वृद्धि में इळा के आनन्द से मदमत्त होकर प्रवृत्त होओ।

Mantra 2

तिष्ठा सु कं मघवन्मा परा गाः सोमस्य नु त्वा सुषुतस्य यक्षि । पितुर्न पुत्रः सिचमा रभे त इन्द्र स्वादिष्ठया गिरा शचीवः ॥

हे मघवन्! शान्ति से यहीं ठहरो, दूर न जाओ। अब मैं तुम्हें सुषुत सोम के लिए यजता/आह्वान करता हूँ। जैसे पुत्र पिता के भाग को पाने को हाथ बढ़ाता है, वैसे ही मैं तुम्हारे प्रवाह को ग्रहण करता हूँ—हे इन्द्र, शचीवन्—अति मधुर वाणी से।

Mantra 3

शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय वाहः कृणवाव जुष्टम् । एदं बर्हिर्यजमानस्य सीदाथा च भूदुक्थमिन्द्राय शस्तम् ॥

हे अध्वर्यु! मेरे स्तवन का प्रत्युत्तर दो, और स्वीकृति का वचन उच्चारो—इन्द्र के लिए हम ‘वाहः’ (यज्ञ-पथ/अर्पण-मार्ग) को रुचिकर, जुष्ट बनाएँगे। यजमान के इस बर्हिस् पर आसीन हो; तब इन्द्र के लिए यह उक्थ शस्त—प्रेरित वाणी का सच्चा स्तोत्र—उत्पन्न हो।

Mantra 4

जायेदस्तं मघवन्त्सेदु योनिस्तदित्त्वा युक्ता हरयो वहन्तु । यदा कदा च सुनवाम सोममग्निष्ट्वा दूतो धन्वात्यच्छ ॥

हे मघवन् (उदार दाता), अस्तं—गृह-गमन—तुम्हारे लिए सत्य विश्राम-स्थान हो, नव-उत्पत्ति की योनि हो; तब तुम्हारे युक्त हरि (ताम्रवर्ण अश्व) तुम्हें हमारे पास वहन करें। जब-जब हम सोम को सुनवते (निचोड़ते) हैं, तब अग्नि तुम्हारा दूत बनकर विस्तीर्ण पथों को लाँघता हुआ तुम्हारी ओर दौड़ता है।

Mantra 5

परा याहि मघवन्ना च याहीन्द्र भ्रातरुभयत्रा ते अर्थम् । यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो रासभस्य ॥

हे मघवन् इन्द्र, आगे भी जाओ और लौटकर भी आओ—हे भ्राता—तुम्हारा अर्थ दोनों ही गतियों में है: जहाँ महान रथ का निधान (स्थापन) है, और जहाँ वाजिन् (वेगवान वाहक) रासभ (बलवान वहनकर्ता) का विमोचन (मुक्ति) है।

Mantra 6

अपाः सोममस्तमिन्द्र प्र याहि कल्याणीर्जाया सुरणं गृहे ते । यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो दक्षिणावत् ॥

सोम का पान करके, हे इन्द्र, अपने अस्तं—गृह—की ओर प्रस्थान करो; तुम्हारे घर में कल्याणी जाया, सुरण (आनन्द-समृद्ध) होकर निवास करती है। वहीं महान रथ का निधान (स्थापन) है, और वहीं वाजिन् (वेगवान) का विमोचन है—दक्षिणावत्, अर्थात् दक्षिणा (यज्ञ-दान) से युक्त।

Mantra 7

इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः । विश्वामित्राय ददतो मघानि सहस्रसावे प्र तिरन्त आयुः ॥

ये उपकारी अङ्गिरस—अनेक रूपों वाले, दिव्य द्यौः के पुत्र, असुर (प्रभु) के वीर—विश्वामित्र को समृद्धि के दान देते हुए, सहस्र-सावों (हज़ारों प्रवाहों) से आयु-प्राण को आगे बढ़ाते हैं।

Mantra 8

रूपंरूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं परि स्वाम् । त्रिर्यद्दिवः परि मुहूर्तमागात्स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा ॥

रूप-पर-रूप वह मघवा (दानवीर) होता जाता है, माया-शक्तियाँ रचते हुए अपने ही तनु को चारों ओर से गढ़ता है। जब वह एक मुहूर्त में त्रिवार दिवः के परिक्रमा कर गया, तब अपने ही मन्त्रों से—अनृत (अव्यवस्था) का रक्षक-विरोधी, ऋत (सत्य-व्यवस्था) का स्थापक—वह ऋतावा हुआ।

Mantra 9

महाँ ऋषिर्देवजा देवजूतोऽस्तभ्नात्सिन्धुमर्णवं नृचक्षाः । विश्वामित्रो यदवहत्सुदासमप्रियायत कुशिकेभिरिन्द्रः ॥

महान् ऋषि—देवों से जन्मा, देवों से प्रेरित, नर-चक्षु (मानवों को देखने वाला)—समुद्रवत् सिन्धु को स्थिर कर बैठा। जब विश्वामित्र ने सुदास को पार उतारा, तब कुशिकों के साथ इन्द्र—विरोधी के प्रति प्रतिकूल होकर—आ पहुँचा।

Mantra 10

हंसा इव कृणुथ श्लोकमद्रिभिर्मदन्तो गीर्भिरध्वरे सुते सचा । देवेभिर्विप्रा ऋषयो नृचक्षसो वि पिबध्वं कुशिकाः सोम्यं मधु ॥

हंसों की भाँति तुम उज्ज्वल स्तुति-ध्वनि रचो; अद्रि (सोम-पेषण-शिलाओं) से, और गिर् (ऋचाओं) से मदमत्त होकर, अध्वर में—सुते (निचोड़े हुए) सोम के साथ। हे विप्र ऋषियो, नर-चक्षस्, देवों के साथ—हे कुशिकाओ, उस सोम्य मधु (मधुर सोम-रस) को भरपूर पियो।

Mantra 11

उप प्रेत कुशिकाश्चेतयध्वमश्वं राये प्र मुञ्चता सुदासः । राजा वृत्रं जङ्घनत्प्रागपागुदगथा यजाते वर आ पृथिव्याः ॥

आगे बढ़ो, हे कुशिकाओ; चेतना जगाओ; राये (समृद्धि) के लिए अश्व को मुक्त करो—हे सुदास। राजा ने वृत्र (आवरणकर्ता) को आगे, पीछे, ऊपर—सब ओर से परास्त किया; तब वह पृथ्वी की विशालता से चुने हुए वर (वरदान) के लिए यजन करता है।

Mantra 12

य इमे रोदसी उभे अहमिन्द्रमतुष्टवम् । विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम् ॥

जो इन दोनों रोदसी (द्यावा-पृथिवी) को धारण करता है—मैंने स्तुति से इन्द्र को दृढ़ किया। यह ब्रह्म (मंत्र-शक्ति) विश्वामित्र के भारत जन की रक्षा करता है।

Mantra 13

विश्वामित्रा अरासत ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे । करदिन्नः सुराधसः ॥

विश्वामित्रों ने वज्रधारी इन्द्र के लिए ब्रह्म (वाणी/मंत्र) रचा है। वह सु-राधस (उत्तम दान-सम्पदा) वाला कर्म ही हमारे लिए समृद्ध और शोभन कल्याण कर दे।

Mantra 14

किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशिरं दुह्रे न तपन्ति घर्मम् । आ नो भर प्रमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन्रन्धया नः ॥

कीकटों के बीच तेरी गौएँ/किरणें क्या करती हैं—जहाँ वे न रसपूर्ण दुग्ध देती हैं, न घृत-ताप को प्रज्वलित करती हैं? विकृत गन्ध में विचरने वाले से सच्चा वेद (ज्ञान) हमारे पास ला; और हे मघवन्, जो शाखाहीन/पराया अंकुर सत्कुल-परम्परा का नहीं, उसे हमारे लिए वश में कर।

Mantra 15

ससर्परीरमतिं बाधमाना बृहन्मिमाय जमदग्निदत्ता । आ सूर्यस्य दुहिता ततान श्रवो देवेष्वमृतमजुर्यम् ॥

ससरपरी ने, अनृत/अधर्म मन को दबाते हुए, बृहद् (विस्तार) को नापा; जमदग्नि-दत्त होकर, सूर्य की दुहिता ने देवों के बीच अमृत, अजर श्रवस् (श्रुति-यश) का विस्तार किया।

Mantra 16

ससर्परीरभरत्तूयमेभ्योऽधि श्रवः पाञ्चजन्यासु कृष्टिषु । सा पक्ष्या नव्यमायुर्दधाना यां मे पलस्तिजमदग्नयो ददुः ॥

ससरपरी ने शीघ्रता से इन पाँच-जन्य प्रजाओं के बीच श्रवस् (प्रेरित कीर्ति/श्रवण-तेज) को ऊपर स्थापित किया। वह पंखोंवाली, नया आयु (जीवन-प्राण) धारण कराती हुई—वही, जिसे पलस्ति-जमदग्नि अग्नियों ने मुझे प्रदान किया है।

Mantra 17

स्थिरौ गावौ भवतां वीळुरक्षो मेषा वि वर्हि मा युगं वि शारि । इन्द्रः पातल्ये ददतां शरीतोररिष्टनेमे अभि नः सचस्व ॥

हमारे दोनों (युग्म) बल स्थिर हों; धुरा दृढ़ हो; रस्सियाँ न फिसलें, जुआ न टूटे। ऊबड़-खाबड़ पथ पर इन्द्र स्थैर्य प्रदान करें; हे अरिष्टनेम (अखंड-नाभि) रथ, हमारे साथ जुड़ और हमारे साथ चल।

Mantra 18

बलं धेहि तनूषु नो बलमिन्द्रानळुत्सु नः । बलं तोकाय तनयाय जीवसे त्वं हि बलदा असि ॥

हमारी तनुओं में बल धारण कर, हे इन्द्र; हमारे अनळुत्सु (अटूट ऊर्जाओं) में बल। जीवन के लिए बालक और संतति हेतु बल—क्योंकि तू ही निश्चय बलदाता है।

Mantra 19

अभि व्ययस्व खदिरस्य सारमोजो धेहि स्पन्दने शिंशपायाम् । अक्ष वीळो वीळित वीळयस्व मा यामादस्मादव जीहिपो नः ॥

खदिर (खदिर-वनस्पति) के सार को फैलाकर ग्रहण कर; शिंशपा-काष्ठ के स्पन्दन में ओज (बल) स्थापित कर। हे अक्ष (धुरी), दृढ़ हो—दृढ़तापूर्वक जड़ा रह; अपनी दृढ़ता को और पुष्ट कर। इस पथ/यात्रा से मत फिसल; हे गति-धारक, हमें मत छोड़।

Mantra 20

अयमस्मान्वनस्पतिर्मा च हा मा च रीरिषत् । स्वस्त्या गृहेभ्य आवसा आ विमोचनात् ॥

यह वनस्पति-स्वामी हमारी रक्षा करे—न वह हमें छोड़े, न हमें क्षति पहुँचाए। स्वस्ति के साथ, आश्रय सहित, वह हमें हमारे गृहों तक ले आए; और हर बन्धन से विमोचन दे।

Mantra 21

इन्द्रोतिभिर्बहुलाभिर्नो अद्य याच्छ्रेष्ठाभिर्मघवञ्छूर जिन्व । यो नो द्वेष्ट्यधरः सस्पदीष्ट यमु द्विष्मस्तमु प्राणो जहातु ॥

इन्द्र आज अपनी बहुल सहायताओं से, श्रेष्ठ सहायों से हमारे पास आए; हे मघवन्, हे शूर, हमें अग्रगामी वेग में प्रेरित कर। जो हमसे द्वेष करता है—अधम चेतना वाला—वह गिर पड़े; जिसे हम द्वेष करते हैं, उसका प्राण ही उसे छोड़ दे।

Mantra 22

परशुं चिद्वि तपति शिम्बलं चिद्वि वृश्चति । उखा चिदिन्द्र येषन्ती प्रयस्ता फेनमस्यति ॥

वह तो कुल्हाड़ी तक को दहका देती है; शिम्बल (काँटेदार/कठोर आवरण) तक को चीर डालती है। हे इन्द्र, उखा (चूल्हे की हाँडी) भी—जब आगे बढ़ाकर काम में लगाई जाती है—झाग उछाल देती है। वैसे ही तेरी शक्ति हमारे भीतर जड़ पड़े उपकरणों को भी सक्रिय करे और विजयिनी बनाए।

Mantra 23

न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः । नावाजिनं वाजिना हासयन्ति न गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति ॥

विवेकी जन सायक (अविवेकी/मंदबुद्धि) को—उसे नेता मानकर—मार्गदर्शक नहीं बनाते। बलवान को बलवान के द्वारा उपहासित नहीं होने देते; और गधे को घोड़ों के आगे नहीं रखते।

Mantra 24

इम इन्द्र भरतस्य पुत्रा अपपित्वं चिकितुर्न प्रपित्वम् । हिन्वन्त्यश्वमरणं न नित्यं ज्यावाजं परि णयन्त्याजौ ॥

हे इन्द्र, भरत के ये पुत्र अपपित्व (पतन-रहित रहने) की विद्या जानते हैं, प्रपित्व (अवनति) की नहीं। वे उस अश्व को हाँकते हैं जो थकता नहीं, न कि उसे जो सदा ढलता रहता है; संग्राम में वे धनुष-बल से युक्त पूर्णता-शक्ति को विजय की ओर घुमाकर ले जाते हैं।

Frequently Asked Questions

Indra is the thunderbolt-wielding warrior god who grants victory and abundance. Parvata is his companion here, associated with firm, mountain-like strength and support, joining Indra in receiving offerings and giving aid.

Here brahman means a powerful, well-formed sacred utterance (mantra/poetic formulation). The hymn says the Viśvāmitras shape this speech to energize Indra’s action, and they ask that this act bring prosperity and good giving to the worshippers.

The hymn connects the ritual to real communal aims: protection, endurance, and victory in contest. By praising the Bharatas’ “non-decline,” it frames Indra’s help as sustaining their strength and success in battle and public competition.

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