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Sukta 10.65
Viśve Devāḥ (All Gods) / enumerated deities
यह सूक्त विश्वे देवाः का एक व्यापक आह्वान है, जिसमें अनेक प्रमुख वैदिक शक्तियों के नाम लेकर उनसे प्रार्थना की गई है कि वे “एकमत होकर” यज्ञ और मानव-कल्याण की रक्षा व पुष्टि करें। इसमें ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था), धारण करने वाले माता-पिता द्यावा-पृथिवी, तथा देवताओं की रक्षक और सर्वव्यापी मार्गदर्शक शक्ति का ताना-बाना बुना गया है, और अंत में स्थायी स्वस्ति (कल्याण) के लिए प्रार्थना की गई है।
Mantra 1
अग्निरिन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा वायुः पूषा सरस्वती सजोषसः । आदित्या विष्णुर्मरुतः स्वर्बृहत्सोमो रुद्रो अदितिर्ब्रह्मणस्पतिः ॥
अग्नि, इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमन्, वायु, पूषन्, सरस्वती—एक मन होकर; आदित्यगण, विष्णु, मरुत, स्वः और बृहद् का व्यापक विस्तार, सोम, रुद्र, अदिति और ब्रह्मणस्पति—ये सब देवशक्तियाँ एक साथ हमारे अन्तःयज्ञ को धारण करें और सिद्ध करें।
Mantra 2
इन्द्राग्नी वृत्रहत्येषु सत्पती मिथो हिन्वाना तन्वा समोकसा । अन्तरिक्षं मह्या पप्रुरोजसा सोमो घृतश्रीर्महिमानमीरयन् ॥
इन्द्र और अग्नि—वृत्र-वधों में सत्य-स्वामी—एक-दूसरे को प्रेरित करते हुए, एक ही धाम में देह सहित सहवासी हैं। अपने ओज से उन्होंने विशाल अन्तरिक्ष को भर दिया; और घृत-श्री से दीप्त सोम उनके महिमान को उन्नत करता है।
Mantra 3
तेषां हि मह्ना महतामनर्वणां स्तोमाँ इयर्म्यृतज्ञा ऋतावृधाम् । ये अप्सवमर्णवं चित्रराधसस्ते नो रासन्तां महये सुमित्र्याः ॥
उन महान, अनर्वण, ऋत-ज्ञ और ऋत-वर्धक देवों की महिमा से मैं स्तोत्रों को उठाता/प्रवर्तित करता हूँ। जिनकी दान-सम्पदा विचित्र/बहुविध है, जो अप्सु-प्रवाह, अर्णव में विचरते हैं—वे हमें विस्तार के लिए सुमित्रता, शुभ मैत्री-रूप सहायताएँ प्रदान करें।
Mantra 4
स्वर्णरमन्तरिक्षाणि रोचना द्यावाभूमी पृथिवीं स्कम्भुरोजसा । पृक्षा इव महयन्तः सुरातयो देवाः स्तवन्ते मनुषाय सूरयः ॥
वे अपने ओज से अन्तरिक्ष के स्वर्णिम/दीप्तिमान विस्तारों को, रोचन लोकों को, द्यावा-भूमी को और पृथ्वी-आधार को स्थिर रखते हैं। बलवान अश्वों की भाँति शक्ति बढ़ाते हुए, सुरातयः—सुदाता देव—मनुष्य के लिए ऋषियों द्वारा स्तुत होते हैं, कि मानव प्रकाश में बढ़े।
Mantra 5
मित्राय शिक्ष वरुणाय दाशुषे या सम्राजा मनसा न प्रयुच्छतः । ययोर्धाम धर्मणा रोचते बृहद्ययोरुभे रोदसी नाधसी वृतौ ॥
मित्र के लिए और वरुण के लिए—उस दाशुष (दानकर्ता/यजमान) को—कौशल और सम्यक् सिद्धि प्रदान करो; वे दोनों सम्राट् हैं, जो अपने संकल्प में कभी च्युत नहीं होते। जिनका विशाल धाम धर्म (ऋत-नियम) से प्रकाशित होता है, और जिनके आलिंगन में दोनों रोदसी (द्यावा-पृथिवी) दृढ़ होकर स्थित और पोषित रहती हैं।
Mantra 6
या गौर्वर्तनिं पर्येति निष्कृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः । सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते ॥
जो गौ (गाय) नियत पथ/वर्तन (वर्तनिन्) के चारों ओर परिक्रमा करती है, और दूध दुहती हुई—व्रत (ऋत-नियम) की नेत्री—अविरत चलती है; वही वाणी से उद्घोष करती हुई दाशुष (दानकर्ता) के लिए वरुण को हवि अर्पित करती है, और देवों के लिए विवस्वत् (दीप्तिमान) को हविषा दान करती है।
Mantra 7
दिवक्षसो अग्निजिह्वा ऋतावृध ऋतस्य योनिं विमृशन्त आसते । द्यां स्कभित्व्यप आ चक्रुरोजसा यज्ञं जनित्वी तन्वी नि मामृजुः ॥
दिव्य-प्रकाश वाले, अग्नि-जिह्वा, ऋत-वर्धक—वे ऋत के योनि को स्पर्श करते हुए, उसे विवेचते हुए, आसन करते हैं। द्यौ को स्तम्भित करके, उन्होंने बल से आपः (जल) को प्रवाहित किया; यज्ञ को जन्म देकर, उसे तनु (देह) में रचकर, उसे सुसज्जित/शुद्ध करके तैयार किया।
Mantra 8
परिक्षिता पितरा पूर्वजावरी ऋतस्य योना क्षयतः समोकसा । द्यावापृथिवी वरुणाय सव्रते घृतवत्पयो महिषाय पिन्वतः ॥
वे दो माता-पिता—परिक्षिता, प्राचीन, प्रथम संयोग से ही आवरण करने वाले—ऋत की योनि में एक ही गृह में साथ निवास करते हैं। द्यावा-पृथिवी, एक-व्रत वाले वरुण के लिए, घृतयुक्त और प्रचुर उस समृद्ध दुग्ध-रस को महिष (महान) के लिए उभारते-पोषते हैं, जिससे विराट् बल का पोषण हो।
Mantra 9
पर्जन्यावाता वृषभा पुरीषिणेन्द्रवायू वरुणो मित्रो अर्यमा । देवाँ आदित्याँ अदितिं हवामहे ये पार्थिवासो दिव्यासो अप्सु ये ॥
हम परजन्य और वात को पुकारते हैं—वे वृषभ, जो परिपूर्णता का वर्षण करते हैं; हम इन्द्र–वायु, वरुण, मित्र, अर्यमन् को पुकारते हैं। हम देवों को—आदित्यों को और अदिति को—आह्वान करते हैं: जो पार्थिव में स्थित हैं, जो दिव्य हैं, और जो अप्सु (जल-तत्त्व) में विचरते हैं।
Mantra 10
त्वष्टारं वायुमृभवो य ओहते दैव्या होतारा उषसं स्वस्तये । बृहस्पतिं वृत्रखादं सुमेधसमिन्द्रियं सोमं धनसा उ ईमहे ॥
हम त्वष्टा—रूप-रचयिता—और वायु, तथा ऋभुओं को, जो कर्म को आगे बढ़ाते हैं, खोजते-चाहते हैं; हम दैव्य होतृगणों को और स्वस्ति के लिए उषा को चाहते हैं। हम बृहस्पति को—वृत्र-भक्षक, सुमेधस—और इन्द्रिय सोम को, धन-सम्पदा के लिए, याचते हैं।
Mantra 11
ब्रह्म गामश्वं जनयन्त ओषधीर्वनस्पतीन्पृथिवीं पर्वताँ अपः । सूर्यं दिवि रोहयन्तः सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तो अधि क्षमि ॥
ब्रह्म (सृजनशील वाणी) गौ और अश्व को जनित करता है—ज्ञान की किरणों और ऊर्जा-शक्तियों को; वह औषधियों को, वनस्पतियों के अधिपतियों को, पृथ्वी को, पर्वतों को और आपः (जल) को भी उत्पन्न करता है। मनोमय दिवि में सूर्य को आरोहण कराते हुए, सुदानव (उदार) जन आर्य (श्रेष्ठ) व्रतों को—धर्ममय आचरण के नियमों को—क्षमा (पृथ्वी) पर प्रसारित करते हैं।
Mantra 12
भुज्युमंहसः पिपृथो निरश्विना श्यावं पुत्रं वध्रिमत्या अजिन्वतम् । कमद्युवं विमदायोहथुर्युवं विष्णाप्वं विश्वकायाव सृजथः ॥
हे अश्विनौ, तुमने भुज्यु को संकट से पार पहुँचाया; वध्रिमती के पुत्र श्याव को तुमने प्राणित किया। विमद के लिए तुमने कमद्युव को वहन किया; और विश्वकाय के लिए विष्णापू को गति में प्रवृत्त किया। इस प्रकार तुम उद्धारक युगल-शक्तियाँ हो, जो प्राण को आपत्ति से उठाकर उसके सम्यक् गमन को पुनः स्थापित करती हो।
Mantra 13
पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो धर्ता सिन्धुरापः समुद्रियः । विश्वे देवासः शृणवन्वचांसि मे सरस्वती सह धीभिः पुरंध्या ॥
पावीर्ववी—वह गर्जन-शक्ति; एकपाद—एक-पद वाली शक्ति; अज—अजन्मा; दिवो धर्ता—स्वर्ग का धारक; सिन्धु और समुद्रीय आपः—ये सब देवगण मेरे वचनों को सुनें। और सरस्वती भी, दीप्त धियों और पूर्ण प्रज्ञा (पुरंध्या) के साथ, हमारे साथ रहे।
Mantra 14
विश्वे देवाः सह धीभिः पुरंध्या मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः । रातिषाचो अभिषाचः स्वर्विदः स्वर्गिरो ब्रह्म सूक्तं जुषेरत ॥
समस्त देवगण, दीप्त प्रज्ञा और पूर्ण विवेक के साथ—यजनीय, अमृत, ऋत के ज्ञाता—इस सु-उक्त सूक्त को, इस ब्रह्म-वाणी को, जो स्वर्ग-लोक का प्रकाश धारण करती है, स्वीकार करें। वे दान-सम्पदा और सहायक शक्तियों सहित हमारे समीप आएँ, और हमारे लिए उच्च स्वर्ग का प्रकाश उपलब्ध कराएँ।
Mantra 15
देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः । ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
वसिष्ठ उन अमृत देवों को नमस्कार करता है, जिन्होंने समस्त भुवनों पर अपने स्थान स्थापित किए हैं। वे आज हमें व्यापक-गामी कल्याण-पथ प्रदान करें; और आप सदा स्वस्ति और सम्यक्-समरसता की शक्तियों से हमारी रक्षा करें।
They are the collective “All Gods,” a unified host of divine powers. The hymn even names many of them—Agni, Indra, Varuṇa, Mitra, Vāyu, Sarasvatī, the Ādityas, Viṣṇu, the Maruts, Soma, Rudra, Aditi, and Brahmaṇaspati.
The hymn asks the gods to work together in harmony, uphold ṛta (right order), strengthen the sacrifice, and protect the worshipper with svasti—ongoing well-being, safety, and right harmony.
It connects ritual life to cosmic foundations. Heaven-and-Earth are pictured as the ancient parents dwelling in ṛta, nourishing divine strength—showing that right action and worship are meant to align with the universe’s lawful order.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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