Rig Veda Sukta 64
Mandala 10Sukta 6417 Mantras

Sukta 64

Sukta 10.64

Rishi

Uncertain from provided excerpt alone (RV 10.64 has its own Anukramaṇī attribution; requires external index)

Devata

Collective gods (open inquiry which deity grants grace and help)

Chandas

Triṣṭubh (probable; requires metrical confirmation)

यह सूक्त खोजपूर्ण आवाहन से आरम्भ होता है: कवि पूछता है कि देवों में से कौन वास्तव में सुनता है, आनन्द प्रदान करता है, और उपासक की ओर रक्षक सहायता लेकर उन्मुख होता है। फिर यह प्रार्थना व्यापक होकर समस्त दिव्य शक्तियों—विशेषतः जीवन-पोषक आपः (जल) और नदियों—की सामूहिक याचना बन जाती है, और अंत में ऋत के अधिष्ठाता तथा संरक्षण के सार्वभौम धारक आदित्यों और अदिति की स्तुति पर समाप्त होती है।

Mantras

Mantra 1

कथा देवानां कतमस्य यामनि सुमन्तु नाम शृण्वतां मनामहे । को मृळाति कतमो नो मयस्करत्कतम ऊती अभ्या ववर्तति ॥

देवों के किस प्रकार, और किस गमन-पथ में, हम उस ‘सुमन्तु’—जो सचमुच सुनता है—के नाम को मन में धारण करें? कौन हमें मृदुता/आनन्द देता है, कौन हमारे लिए कल्याणकारी सुख रचता है; कौन-सी शक्ति अपनी ऊति (सहायता) लेकर हमारी ओर प्रवृत्त होती है?

Mantra 2

क्रतूयन्ति क्रतवो हृत्सु धीतयो वेनन्ति वेनाः पतयन्त्या दिशः । न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधि कामा अयंसत ॥

कर्मों के क्रतु (संकल्प-शक्ति) हृदयों में ऋतु के अनुसार प्रवृत्त होते हैं; धीतियाँ (प्रेरित विचार) आकांक्षा करती हैं, और वेना (कामनाएँ) दिशाओं की ओर उड़ती हैं। इनसे परे कोई अन्य मृदुता-दाता नहीं मिलता; देवों पर ही मेरी कामनाएँ अधिष्ठित हो गई हैं।

Mantra 3

नरा वा शंसं पूषणमगोह्यमग्निं देवेद्धमभ्यर्चसे गिरा । सूर्यामासा चन्द्रमसा यमं दिवि त्रितं वातमुषसमक्तुमश्विना ॥

वाणी से तुम नराशंस, गूढ़ पूषण, और देवों द्वारा प्रज्वलित अग्नि की स्तुति करते हो। तुम सूर्य और मास, चन्द्रमा, स्वर्ग में यम, त्रित, वात, उषस्, रात्रि, और अश्विनौ—इन सब देवशक्तियों की स्तुति करते हो, जो जागरण और व्यवस्था के लिए आहूत हैं।

Mantra 4

कथा कविस्तुवीरवान्कया गिरा बृहस्पतिर्वावृधते सुवृक्तिभिः । अज एकपात्सुहवेभिॠक्वभिरहिः शृणोतु बुध्न्यो हवीमनि ॥

किस प्रकार, किस वाणी से, महावीर-ध्वनि वाले कवि—बृहस्पति—सु-रचित स्तुतियों से बढ़ते हैं? सुह्वान ऋक्-गायकों के साथ अज एकपाद सुनें; और गहन-तल का सर्प—बुध्न्य—हविष् के अवसर पर श्रवण करे।

Mantra 5

दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते राजाना मित्रावरुणा विवाससि । अतूर्तपन्थाः पुरुरथो अर्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु ॥

दक्ष के जन्म और व्रत में, हे अदिति, तुम दो राजाओं—मित्र और वरुण—का पूजन करती हो। अजेय पथों वाले, अनेक रथों वाले अर्यमन्—सप्त-होता—विविध रूपों वाले जन्मों में (ऋत का) अधिकार और आर्य-मार्ग की श्रेष्ठ गति स्थापित करते हैं।

Mantra 6

ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मितद्रवः । सहस्रसा मेधसाताविव त्मना महो ये धनं समिथेषु जभ्रिरे ॥

हमारे हवन को सुनने वाले वे अर्वन्त—वेगवान वाजिन्, मित-द्रव (मापित वेग) वाले—सब हमारे आह्वान को सुनें। जो महान शक्तियाँ अपने स्वभाव-बल से सहस्रगुणा मेधा-लाभ करती हैं, और जो संग्रामों में धन को ले आई हैं—वे हमारी सहायता को आएँ।

Mantra 7

प्र वो वायुं रथयुजं पुरंधिं स्तोमैः कृणुध्वं सख्याय पूषणम् । ते हि देवस्य सवितुः सवीमनि क्रतुं सचन्ते सचितः सचेतसः ॥

अपने स्तोत्रों से रथ-युग्त वायु को आगे लाओ; और सख्य-भाव के लिए पूषण को—समृद्धि-शक्ति, जो अस्तित्व को भर देती है—प्रशंसित करो। क्योंकि वे, सचेत और जाग्रत, सविता देव के प्रेरक पथ में उसकी क्रतु-शक्ति के साथ चलते हैं और उद्देश्यपूर्ण प्रज्ञा से अपने को जोड़ते हैं।

Mantra 8

त्रिः सप्त सस्रा नद्यो महीरपो वनस्पतीन्पर्वताँ अग्निमूतये । कृशानुमस्तॄन्तिष्यं सधस्थ आ रुद्रं रुद्रेषु रुद्रियं हवामहे ॥

त्रि:सप्त प्रवहमान नदियों को, महान जलों को, वनस्पतियों के अधिपतियों को, पर्वतों को, और हमारी रक्षा के लिए अग्नि को हम पुकारते हैं। फैलने वाले कृशानु को, और समान आसन में तिष्य को हम आवाहन करते हैं; और रुद्रों में रुद्रिय—रुद्र को—हम बुलाते हैं।

Mantra 9

सरस्वती सरयुः सिन्धुरूर्मिभिर्महो महीरवसा यन्तु वक्षणीः । देवीरापो मातरः सूदयित्न्वो घृतवत्पयो मधुमन्नो अर्चत ॥

सरस्वती, सरयू और सिन्धु अपनी ऊर्मियों सहित—महान और महाबली—पोषक सहायता लेकर, वहन करने योग्य धाराओं के साथ, हमारे पास आएँ। हे देवी आपः, माताएँ, जो हमारी वृद्धि को प्रेरित करती हो—घृत-समृद्ध और मधु-मीठे दुग्ध से हमें अर्चना करो (प्रकाश से भर दो)।

Mantra 10

उत माता बृहद्दिवा शृणोतु नस्त्वष्टा देवेभिर्जनिभिः पिता वचः । ऋभुक्षा वाजो रथस्पतिर्भगो रण्वः शंसः शशमानस्य पातु नः ॥

और विशाल द्यौ की माता हमारी सुनें; देवजन्मा गणों सहित पिता त्वष्टा हमारे वचन को स्वीकार करें। ऋभुक्षन्, वाज, रथस्पति, तथा रंव (आनन्ददायक) भग—ये सब—हमारे लिए उस साधक के स्तुतिवचन की रक्षा करें जो प्रयत्न करता और सिद्धि में बढ़ता है।

Mantra 11

रण्वः संदृष्टौ पितुमाँ इव क्षयो भद्रा रुद्राणां मरुतामुपस्तुतिः । गोभिः ष्याम यशसो जनेष्वा सदा देवास इळया सचेमहि ॥

रंव (आनन्ददायक) है वह निवास, जो एकत्र दृष्टि में आता है—पोषण-समृद्ध गृह के समान; और रुद्रों, मरुतों के लिए अर्पित स्तुति कल्याणकारी है। गो-सम्पदा सहित हम यशस्वी हों, जनों में कीर्तिमान हों; और हे देवो, सदा हम इळा (पोषक धारा) के साथ संयुक्त होकर चलें।

Mantra 12

यां मे धियं मरुत इन्द्र देवा अददात वरुण मित्र यूयम् । तां पीपयत पयसेव धेनुं कुविद्गिरो अधि रथे वहाथ ॥

हे मरुतो, हे इन्द्र, हे देवो, वरुण और मित्र—जो ध्येय-प्रेरित बोध तुमने मुझे दिया है, उसे तुम वैसे ही पुष्ट करो जैसे दूध से धेनु को पोषित किया जाता है। क्या तुम मेरी गिराओं (वचनों) को अपने रथ पर अधिरोहित कर वहन करोगे—उन्हें देव-गति में प्रवाहित करोगे?

Mantra 13

कुविदङ्ग प्रति यथा चिदस्य नः सजात्यस्य मरुतो बुबोधथ । नाभा यत्र प्रथमं संनसामहे तत्र जामित्वमदितिर्दधातु नः ॥

हे मरुतो, क्या तुम हमारी ओर भी वैसे ही ध्यान दोगे जैसे कभी दिया था—हमारी ओर, जो तुम्हारे ही सजातीय, एक ही कुल-परम्परा के हैं? जहाँ नाभि-स्थल पर हम प्रथम बार एक साथ जुड़े थे, वहीं अदिति हमारे लिए जामित्व—सच्ची कुटुम्बता, अनन्त में एक ही उद्गम की एकता—स्थापित करे।

Mantra 14

ते हि द्यावापृथिवी मातरा मही देवी देवाञ्जन्मना यज्ञिये इतः । उभे बिभृत उभयं भरीमभिः पुरू रेतांसि पितृभिश्च सिञ्चतः ॥

क्योंकि द्यावा और पृथिवी—ये दोनों महान माताएँ—देवी हैं; जन्म से देवों को जनती हैं और यहाँ यज्ञ के योग्य हैं। दोनों, अपने धारण-बलों से, दोनों लोकों को धारण करती हैं; और पितरों के साथ मिलकर वे बहुतेरे रेतांसि—सृष्टि के बीज—सींचती/उँडेलती हैं।

Mantra 15

वि षा होत्रा विश्वमश्नोति वार्यं बृहस्पतिररमतिः पनीयसी । ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदवीवशन्त मतिभिर्मनीषिणः ॥

वह होत्रा—याजकीय पुरोहित-कार्य—विस्तृत है; वह समस्त वरणीय धन को प्राप्त करती है—बृहस्पति और अति-प्रशंसनीय अरमति के साथ। जहाँ ग्रावा ‘मधु-प्रेसक’ कहलाता है, वहाँ मनीषी ऋषियों ने अपनी मतियों से ‘बृहत्’ को गुंजायमान किया—हम में महान वाणी को जगाते हुए।

Mantra 16

एवा कविस्तुवीरवाँ ऋतज्ञा द्रविणस्युर्द्रविणसश्चकानः । उक्थेभिरत्र मतिभिश्च विप्रोऽपीपयद्गयो दिव्यानि जन्म ॥

इस प्रकार कवि—प्रबल-वीर्यवान, ऋत-ज्ञ (ऋत-व्यवस्था का जानने वाला), द्रविण का अभिलाषी और निधियों में आनन्दित—यहाँ उक्थों (स्तुतियों) और मतियों (प्रेरित विचारों) से, विप्र ने गया (जीवन-शक्ति) के दिव्य जन्मों को पोषित किया।

Mantra 17

एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्वो विश्व आदित्या अदिते मनीषी । ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन ॥

इस प्रकार प्लेटे का बुद्धिमान पुत्र, हे अदिति, हे समस्त आदित्यगण, तुम्हें बढ़ाता रहा। स्वामी और बलवान होकर, अमर्त्य (अमर) शक्ति के द्वारा, दिव्य जन ने गया (जीवन-शक्ति) से तुम्हारी स्तुति की।

Frequently Asked Questions

It is a hymn of inquiry and prayer asking which divine power truly hears and helps. It invokes the gods collectively, especially the Waters and the Ādityas with Aditi, for protection, joy, and nourishment.

They represent the divine Waters as living, maternal powers that sustain life. In Vedic imagery, their flowing abundance is like ghee-rich, honey-sweet nourishment that increases strength and well-being.

Aditi is honored as the great, expansive divine Mother associated with the Ādityas. She symbolizes protection, freedom from constraint, and the stable order that supports life and right conduct.

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