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Sukta 10.4
Agni
यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें प्राचीन राजा और गृहस्वामी के रूप में, जो यजमान के लिए शरण बनते हैं, जैसे निर्जन भूमि में जीवनदायी स्रोत। इसमें अग्नि के गूढ़ किंतु सक्रिय स्वरूप पर आश्चर्य व्यक्त किया गया है—वे छिपे हुए पड़े रहते हैं, फिर उछलकर आहुति का ‘रस’ चखते हैं—और उनसे प्रार्थना की गई है कि वे परिवार, संतान तथा शरीर की अखंडता और जीवन-यात्रा की रक्षा करें। समग्रतः यह सफल यज्ञ के आह्वान के साथ-साथ समृद्धि और वंश-परंपरा की सुरक्षा की प्रार्थना है।
Mantra 1
प्र ते यक्षि प्र त इयर्मि मन्म भुवो यथा वन्द्यो नो हवेषु । धन्वन्निव प्रपा असि त्वमग्न इयक्षवे पूरवे प्रत्न राजन् ॥
तेरे लिए मैं यज्ञ अर्पित करूँ; अपना मनन आगे बढ़ाता हूँ, ताकि तू हमारे आह्वानों में वन्दनीय हो। जैसे मरुभूमि में झरना, वैसे तू अग्र-रक्षक आश्रय है—हे अग्नि—प्राचीन राजन्—यज्ञ करने की इच्छा रखने वाले पूरु के लिए।
Mantra 2
यं त्वा जनासो अभि संचरन्ति गाव उष्णमिव व्रजं यविष्ठ । दूतो देवानामसि मर्त्यानामन्तर्महाँश्चरसि रोचनेन ॥
हे यविष्ठ (अत्यन्त युवा) अग्नि! जिस प्रकार गौएँ उष्ण गोठ की ओर इकट्ठी होती हैं, वैसे ही जन-समुदाय तुम्हारे चारों ओर समवेत होते हैं। तुम देवों के दूत हो, मनुष्यों के लिए संदेशवाहक; भीतर से महाविस्तृत होकर तुम रोचन (दीप्तिमय लोक) में विचरते हो।
Mantra 3
शिशुं न त्वा जेन्यं वर्धयन्ती माता बिभर्ति सचनस्यमाना । धनोरधि प्रवता यासि हर्यञ्जिगीषसे पशुरिवावसृष्टः ॥
जैसे माता बढ़ते हुए शिशु को पालती और धारण करती है, वैसे ही वह तुम्हें—विजयी तेज को—सहचर्य में सहमत होकर संभालती है। धनुष से तुम प्रवाहमान अवरोह-पथ पर निकल पड़ते हो; जीतने की उत्कंठा से, पशु की भाँति मुक्त छोड़े गए।
Mantra 4
मूरा अमूर न वयं चिकित्वो महित्वमग्ने त्वमङ्ग वित्से । शये वव्रिश्चरति जिह्वयादन्रेरिह्यते युवतिं विश्पतिः सन् ॥
हम मोहित हैं—अमोहित भी—हे चित्कित्व (ज्ञानी)! पर हे अग्नि, तुम तो अपने महत्त्व को निश्चय ही जानते हो। तुम गुप्त होकर शयित रहते हो, फिर भी जिह्वा से आहार लेते हुए विचरते हो; गृहपति होकर तुम बार-बार चाटते हो, युवती—नवीन अर्पण/ऊर्जा—की खोज में।
Mantra 5
कूचिज्जायते सनयासु नव्यो वने तस्थौ पलितो धूमकेतुः । अस्नातापो वृषभो न प्र वेति सचेतसो यं प्रणयन्त मर्ताः ॥
प्राचीन जन्मों में कहीं वह फिर नया होकर जन्म लेता है; वन में वह धूसर, धूम-केतु (धुएँ का ध्वज) लिए खड़ा रहता है। जलों से अनस्नात, वह वृषभ की भाँति आगे बढ़ता है—उसे ही जाग्रत मर्त्य कर्म के लिए आगे ले जाते हैं।
Mantra 6
तनूत्यजेव तस्करा वनर्गू रशनाभिर्दशभिरभ्यधीताम् । इयं ते अग्ने नव्यसी मनीषा युक्ष्वा रथं न शुचयद्भिरङ्गैः ॥
जैसे चोर अपने ही तन को त्यागकर, वन में विचरने वाले, दस रस्सियों से चारों ओर कस दिए जाते हैं—वैसे ही यह मेरी मनीषा तुम पर लगी है। हे अग्ने, यह तुम्हारे लिए नूतनतर प्रज्ञा है; इसे रथ की भाँति, शुचि (दीप्त) अंगों/शक्तियों से युक्त करके जोतो।
Mantra 7
ब्रह्म च ते जातवेदो नमश्चेयं च गीः सदमिद्वर्धनी भूत् । रक्षा णो अग्ने तनयानि तोका रक्षोत नस्तन्वो अप्रयुच्छन् ॥
हे जातवेदस्, तुम्हारे लिए ब्रह्म (पवित्र वचन) भी है और नमस् (वंदना) भी; और यह गीति भी—यह सदा वर्धिनी (वृद्धि करने वाली) हो। हे अग्ने, हमारे तनय और तोक (संतान-परंपरा) की रक्षा करो; और हमारी तनुओं की भी रक्षा करो, कि वे धर्म-धारण से विच्युत न हों।
It invokes Agni to accept the offering, empower the sacrifice, and act as a protective refuge for the worshipper—especially safeguarding home, family, and continuity.
Because fire is concealed in fuel and kindling until awakened; once lit, it actively consumes the offering. The imagery teaches that Agni’s power is subtle but becomes visible through ritual and attention.
It can be recited when lighting a lamp or sacred fire, while offering ghee or simple oblations, and as a prayer for protection of health, children, and household well-being.
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