Bala KandaPrakarana 420 Verses

Prakarana 4

सोपान-प्रवेश: ‘श्रद्धा’ और ‘सत्संग’ के द्वारा रामकथा-मानस में अवगाहन। यह खंड साधक को बताता है कि कथा का अधिकार (adhikāra) कैसे बनता है—गुरु-कृपा, शुद्ध जिज्ञासा, और राम-प्रियता। यहाँ ‘मानस-सर’ रूपक से यह भी स्थिर होता है कि पाठ/श्रवण केवल साहित्य-रस नहीं, बल्कि कलिमल-शमन और विवेक-प्रबोधन की साधना है।

यह अंश बालकाण्ड के आरम्भिक ‘भूमिका-सोपान’ का घनत्व रखता है। तुलसी गुरु-श्रवण की परम्परा बताते हुए कथा-प्रवाह को प्रामाणिक संवाद-श्रृंखला में बाँधते हैं (शिव से लेकर भरद्वाज तक)। भाव-रसा में शान्त और अद्भुत का संयोग है—कथा की अनन्तता (राम अनंत, अनंत गुन) और श्रोता-योग्यता का विवेक। ‘मानस-सर’ रूपक यहाँ केंद्रीय है: चौपाइयों को पुरइन, दोहा-सोरठा को कमल, अर्थ को पराग, और सत्संग को बसंत-ऋतु बताकर पाठक को जताया जाता है कि यह ग्रन्थ ‘सोपान’ है—जल की तरह मल-हारी, अग्नि की तरह कुतर्क-दहन, चन्द्र की तरह शीतल-आनन्ददायी। सिद्धान्ततः यह खंड निर्गुण-सगुण समन्वय की भूमि बनता है: शिव-प्रेरित कथा, पर लक्ष्य रघुनाथ-भक्ति। अतः बालकाण्ड का यह भाग साधक को ‘श्रवण-मार्ग’ पर स्थापित कर आगे के लीला-वर्णन हेतु पात्र बनाता है।

Spoken translationRamcharitmanas Bala Kanda, Prakarana 4

Verses

चौपाई 30.1-4

जागबलिक जो कथा सुहाई।भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।।

कहिहउँ सोइ संबाद बखानी।सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी।।

संभु कीन्ह यह चरित सुहावा।बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।।

सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा।राम भगत अधिकारी चीन्हा।।

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा।तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।।

ते श्रोता बकता समसीला।सवँदरसी जानहिं हरिलीला।।

जानहिं तीनि काल निज ग्याना।करतल गत आमलक समाना।।

औरउ जे हरिभगत सुजाना।कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना।।

jāgabalika jo kathā suhāī |bharadvāja munibarahi sunāī ||

kahihauṁ soi saṁbāda bakhānī |sunahuṁ sakala sajjana sukhu mānī ||

saṁbhu kīnha yaha carita suhāvā |bahuri kṛpā kari umahi sunāvā ||

soi siva kāga-bhusuṁḍihi dīnhā |rāma-bhagata adhikārī cīnhā ||

tenhi sana jāgabalika puni pāvā |tinh puni bharadvāja prati gāvā ||

te śrotā bakatā sama-sīlā |savaṁda-rasī jānahim hari-līlā ||

jānahim tīni kāla nija gyānā |karatala-gata āmalaka samānā ||

aurau je hari-bhagata sujānā |kahahim sunahim samujhahim bidhi nānā ||

याज्ञवल्क्य ने जो सुंदर कथा बड़े मुनि भरद्वाज को सुनाई, उसी संवाद को मैं कहूँगा और विस्तार से बखानूँगा। हे सभी सज्जन, सुनो और आनंद लो। शंभु ने यह सुहावना चरित्र रचा, फिर कृपा करके उमा को सुनाया। वही शिव ने कागभुशुंडि को दिया, उन्हें राम का भक्त और अधिकारी पहचानकर। उनसे याज्ञवल्क्य ने पुनः पाया, और उन्होंने पुनः भरद्वाज के प्रति गाया। वे श्रोता और वक्ता समान स्वभाव वाले थे, समदर्शी थे, और हरि की लीला जानते थे। अपने ज्ञान से वे तीनों काल जानते हैं, जैसे हथेली में रखा आमलक फल जाना जाता है। और भी जो हरि के ज्ञानी भक्त हैं, वे भी अनेक प्रकार से इसे कहते, सुनते और समझते हैं।

दोहा 30(क)-(ख)

मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत।।⁠30(क)।।

श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।⁠30(ख)।।

maiṁ puni nija gur sana sunī kathā so sūkara-kheta |samujhī nahi tasi bālapana taba ati raheũṁ acet ||⁠30(k)||

śrotā bakatā gyāna-nidhi kathā rāma kai gūṛha |kimi samujhauṁ maiṁ jīva jaṛa kali mala grasita bimūṛha ||⁠30(kh)||

मैंने तब सूकरखेत में अपने गुरु से वह कथा सुनी थी, परन्तु बाल्यकाल में अत्यन्त अचेत होने के कारण उस समय मैं उसे ठीक प्रकार नहीं समझा था। श्रोता और वक्ता दोनों ज्ञान के भंडार हैं और श्री राम की कथा गहरी और गूढ़ है। कलियुग के मल से ग्रसित जड़ और मूढ़ जीव मैं उसे कैसे समझूँ?

चौपाई 31.1-7

तदपि कही गुर बारहिं बारा।समुझि परी कछु मति अनुसारा।।

भाषाबद्ध करबि मैं सोई।मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।।

जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें।तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।।

निज संदेह मोह भ्रम हरनी।करउँ कथा भव सरिता तरनी।।

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि।रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।।

रामकथा कलि पंनग भरनी।पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी।।

रामकथा कलि कामद गाई।सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।

सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि।भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि।।

असुर सेन सम नरक निकंदिनि।साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि।।

संत समाज पयोधि रमा सी।बिस्व भार भर अचल छमा सी।।

जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी।जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।

रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी।तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी।।

सिवप्रय मेकल सैल सुता सी।सकल सिद्धि सुख संपति रासी।।

सदगुन सुरगन अंब अदिति सी।रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।

tadapi kahī gur bārahiṃ bāra |samujhi parī kachu mati anusārā ||

bhāṣā-baddha karabi maiṃ soī |moreṃ mana prabodha jehiṃ hoī ||

jasa kachu budhi bibeka bala mereṃ |tasa kahihauṃ hiyaṃ hari ke prerēṃ ||

nija saṃdeha moha bhrama haranī |karauṃ kathā bhava saritā taranī ||

budha bisrāma sakala jana raṃjanī |rāmakathā kali kaluṣa bibhaṃjanī ||

rāmakathā kali paṃnaga bharanī |puni bibeka pāvaka kahuṃ aranī ||

rāmakathā kali kāmada gāī |sujana sajīvanī mūri suhāī ||

soi basudhātala sudhā taraṃginī |bhaya bhaṃjanī bhrama bheka bhuaṃginī ||

asura sena sama naraka nikaṃdinī |sādhu bibudha kula hita girinaṃdinī ||

saṃta samāja payodhi ramā sī |bisva bhāra bhara acala chamā sī ||

jama gana muhaṃ masi jaga jamunā sī |jīvana mukuti hetu janu kāsī ||

rāmahi priya pāvani tulasī sī |tulasīdāsa hita hiyaṃ hulasī sī ||

sivapraya mekala saila sutā sī |sakala siddhi sukha saṃpati rāsī ||

sadaguna suragana aṃba aditi sī |raghubara bhagati prema paramiti sī ||

तब भी गुरु ने बार-बार कहा, और मेरी बुद्धि के अनुसार मुझे कुछ समझ आ गई। वही कथा मैं लोकभाषा में बाँधूँगा, जिससे मेरे मन को प्रबोध प्राप्त हो। जितना मेरी बुद्धि और विवेक का बल है, उतना ही हृदय में हरि की प्रेरणा से कहूँगा। अपने संदेह, मोह और भ्रम को हरने वाली, भवसागर को तारने वाली यह कथा कहूँगा। रामकथा बुद्धिमानों का विश्राम और सब लोगों के लिए रंजन है, और कलियुग के कलुष को नष्ट करने वाली है। रामकथा कलियुग के सर्प के लिए मोरिनी है, और फिर विवेक की अग्नि की अरणी है। रामकथा कलियुग की कामधेनु है, और सज्जनों के लिए सुंदर संजीवनी है। वह धरातल पर बहने वाली अमृत की नदी है, भय को नष्ट करने वाली है, और भ्रम के मेंढक के लिए सर्पिणी है। जैसे गिरिनंदिनी ने असुरों की सेना का नाश किया, वैसे ही यह नरक का नाश करती है, और गिरिनंदिनी के समान साधुओं और देवों के कुल का हित करती है। वह संतों के समाज रूपी समुद्र से उत्पन्न लक्ष्मी के समान है, और संपूर्ण विश्व का भार धारण करने वाली अचल धरती के समान है। इस जगत में यम के दूतों के मुख को काला करने वाली यमुना के समान है, और जीवों की मुक्ति के लिए काशी के समान है। राम को यह पवित्र तुलसी के समान प्रिय है, और तुलसीदास के हृदय के आनंद के समान प्रिय है। यह शिव को मेकल पर्वत की पुत्री नर्मदा के समान प्रिय है, और सब सिद्धियों, सुख और संपत्ति का भंडार है। देवों की माता अदिति के समान यह सद्गुणों की माता है, और रघुवर की भक्ति और प्रेम की परम सीमा है।

दोहा 31

राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु।।⁠31।।

rāma kathā mandākinī citrakūṭa cita cāru |tulasī subhaga saneha bana siya raghubīra bihāru ||⁠31||

राम की कहानी मंदाकिनी नदी है, और मनोहर हृदय चित्रकूट है। तुलसी कहते हैं: मंगलमय प्रेम वह वन है जिसमें सीता और रघुकुलनाथ आनंद से विचरते हैं।

चौपाई 32.1-7

राम चरित चिंतामनि चारू।संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।।

जग मंगल गुन ग्राम राम के।दानि मुकुति धन धरम धाम के।।

सदगुर ग्यान बिराग जोग के।बिबुध बैद भव भीम रोग के।।

जननि जनक सिय राम प्रेम के।बीज सकल ब्रत धरम नेम के।।

समन पाप संताप सोक के।प्रिय पालक परलोक लोक के।।

सचिव सुभट भूपति बिचार के।कुंभज लोभ उदधि अपार के।।

काम कोह कलिमल करिगन के।केहरि सावक जन मन बन के।।

अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के।कामद घन दारिद दवारि के।।

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के।मेटत कठिन कुअंक भाल के।।

हरन मोह तम दिनकर कर से।सेवक सालि पाल जलधर से।।

अभिमत दानि देवतरु बर से।सेवत सुलभ सुखद हरि हर से।।

सुकबि सरद नभ मन उडगन से।रामभगत जन जीवन धन से।।

सकल सुकृत फल भूरि भोग से।जग हित निरुपधि साधु लोग से।।

सेवक मन मानस मराल से।पावक गंग तंरग माल से।।

rāma carita cintāmani cārū |santa sumati tiya subhaga siṅgārū ||

jaga maṅgala guna grāma rāma ke |dāni mukuti dhana dharama dhāma ke ||

sadagura gyāna birāga joga ke |bibudha baida bhava bhīma roga ke ||

janani janaka siya rāma prema ke |bīja sakala brata dharama nema ke ||

samana pāpa santāpa soka ke |priya pālaka paraloka loka ke ||

saciva subhaṭa bhūpati bicāra ke |kumbhaja lobha udadhi apāra ke ||

kāma koha kalimala karigana ke |kehari sāvaka jana mana bana ke ||

atithi pūjya priyatama purāri ke |kāmada ghana dārida davāri ke ||

mantra mahāmani biṣaya byāla ke |meṭata kaṭhina kuaṅka bhāla ke ||

harana moha tama dinakara kara se |sevaka sāli pāla jaladhara se ||

abhimata dāni devataru bara se |sevata sulabha sukhada hari hara se ||

sukabi sarada nabha mana uḍagana se |rāmabhagata jana jīvana dhana se ||

sakala sukṛta phala bhūri bhoga se |jaga hita nirupadhi sādhu loga se ||

sevaka mana mānasa marāla se |pāvaka gaṅga taṁraga māla se ||

राम के चरित्र एक सुंदर चिंतामणि हैं और संतों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर भूषण हैं। राम के गुणों का समूह जगत का मंगल है; वे मोक्ष, धन, धर्म और भगवान के धाम प्रदान करते हैं। वे ज्ञान, वैराग्य और योग के सद्गुरु हैं और संसार के भयंकर रोग के दिव्य वैद हैं। वे सीता-राम प्रेम की जननी-जनक हैं और सभी व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं। वे पाप, दुःख और शोक का नाश करते हैं और इस लोक तथा परलोक के प्रिय रक्षक हैं। वे राजा विवेक के मंत्री और शूरवीर हैं और असीम लोभ के समुद्र को पी जाने वाले अगस्त्य हैं। वे भक्तों के मन रूपी वन में काम, क्रोध और कलियुग के मल रूपी हाथियों के दल पर टूट पड़ने वाले शावक सिंह हैं। वे त्रिपुरारि शिव के अतिथि पूज्य प्रियतम हैं और दरिद्रता रूपी दावानल को बुझाने वाले कामद घन हैं। वे विषय रूपी सर्प के मंत्र और महामणि हैं और मस्तक पर अंकित कठिन दुर्भाग्य को मिटा देते हैं। वे मोह और अंधकार को दूर करने वाले सूर्य के किरण समान हैं और भगवान के सेवकों की सालि फसल को पालने वाले जलद समान हैं। वे अभीष्ट दान देने वाले कल्पवृक्ष समान हैं और हरि-हर समान सेवन में सुलभ और सुखदाता हैं। वे सुकवि के मन रूपी आकाश के तारे समान हैं और राम भक्तों के लिए जीवन धन समान हैं। वे सभी सुकृतों के फल रूपी भरपूर भोग समान हैं और बिना स्वार्थ के जगत का हित करने वाले साधु पुरुषों समान हैं। वे सेवक के मन रूपी मानसरोवर के हंस समान हैं और गंगा की लहरों की पवित्र माला समान हैं।

दोहा 32(क)-(ख)

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड।।⁠32(क)।।

रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।⁠32(ख)।।

kupatha kutaraka kucāli kali kapaṭa daṁbha pāṣaṇḍa |dahana rāma guna grāma jimi indhana anala pracaṇḍa ||⁠32(ka)||

rāmacarita rākesa kara sarisa sukhada saba kāhu |sajjana kumuda cakora cita hita bisēṣi baṛa lāhu ||⁠32(kha)||

कुमार्ग, कूटतर्क, दुराचार, कलियुग के दोष, छल, अहंकार और पाखंड - ये सब राम के गुणसमूह उसी प्रकार जलाते हैं जैसे प्रचंड अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है। राम का चरित्र पूर्णिमा के चंद्र की किरणों के समान है, सबको सुख देने वाला; किंतु जलकुमुद और चकोर पक्षी के समान सज्जनों के चित्त को यह विशेष हित और महान लाभ पहुँचाता है।

चौपाई 33.1-4

कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी।जेहि बिधि संकर कहा बखानी।।

सो सब हेतु कहब मैं गाई।कथाप्रबंध बिचित्र बनाई।।

जेहि यह कथा सुनी नहिं होई।जनि आचरजु करैं सुनि सोई।।

कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी।नहिं आचरजु करहिं अस जानी।।

रामकथा कै मिति जग नाहीं।असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।।

नाना भाँति राम अवतारा।रामायन सत कोटि अपारा।।

कलपभेद हरिचरित सुहाए।भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।।

करिअ न संसय अस उर आनी।सुनिअ कथा सारद रति मानी।।

kīnhi prasna jehi bhā̃ti bhavānī |jehi bidhi saṅkara kahā bakhānī ||

so saba hetu kahaba maĩ gāī |kathāprabandha bicitra banāī ||

jehi yaha kathā sunī nahĩ hoī |jani ācaraju karaĩ suni soī ||

kathā alaukika sunahĩ je gyānī |nahĩ ācaraju karahĩ asa jānī ||

rāmakathā kai miti jaga nāhī̃ |asi pratīti tinh ke mana māhī̃ ||

nānā bhā̃ti rāma avatārā |rāmāyana sata koṭi apārā ||

kalpabheda haricarita suhāe |bhā̃ti aneka munīsanha gāe ||

kari'a na saṃsaya asa ura ānī |suni'a kathā sārad rati mānī ||

जिस प्रकार भवानी ने प्रश्न किए, और जिस विधि से शंकर ने उनका वर्णन किया। वह सब अपने कारणों सहित मैं गाऊँगा, अद्भुत कथा-प्रबंध रचाकर। जिसने यह कथा पहले नहीं सुनी हो, वह सुनकर आश्चर्य न करे। ज्ञानी जो अलौकिक कथा सुनते हैं, ऐसा जानकर आश्चर्य नहीं करते। राम-कथा की इस संसार में कोई मर्यादा नहीं; ऐसी उनके मन में प्रतीति है। राम ने नाना प्रकार से अवतार लिए, और रामायण सौ करोड़ अपार हैं। हरि के सुंदर चरित्र, कल्प-भेद से भिन्न, मुनीशों ने अनेक प्रकार से गाए हैं। ऐसा मन में लाकर संशय न करें, श्रद्धा और प्रेम से कथा सुनें।

दोहा 33

राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार।।⁠33।।

rāma ananta ananta guna amita kathā bistāra |suni ācaraju na mānihahiṃ jinh keṃ bimala bicāra ||⁠33||

राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं, और उनकी कथाओं का विस्तार अपरिमित है। जिनके विचार निर्मल हैं, वे सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे।

चौपाई 34.1-4

एहि बिधि सब संसय करि दूरी।सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।।

पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी।करत कथा जेहिं लाग न खोरी।।

सादर सिवहि नाइ अब माथा।बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।।

संबत सोरह सै एकतीसा।करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।।

नौमी भौम बार मधु मासा।अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।।

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।।

असुर नाग खग नर मुनि देवा।आइ करहिं रघुनायक सेवा।।

जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना।करहिं राम कल कीरति गाना।।

ehi bidhi saba saṁsaya kari dūrī |sira dhari guru pada paṅkaja dhūrī ||

puni sabahī binavaüṁ kara jorī |karata kathā jehiṁ lāga na khorī ||

sādara sivahi nāi aba māthā |barnaüṁ bisada rāma guna gāthā ||

saṁbata soraha sai ekatīsā |karaüṁ kathā hari pada dhari sīsā ||

naumī bhauma bāra madhu māsā |avadhapurīṁ yaha carita prakāsā ||

jehi dina rāma janama śruti gāvahiṁ |tīratha sakala tahāṁ cali āvahiṁ ||

asura nāga khaga nara muni devā |āi karahiṁ raghunāyaka sevā ||

janma mahotsava racahiṁ sujānā |karahiṁ rāma kala kīrati gānā ||

इस प्रकार सब संशय दूर करके, गुरु के चरणकमलों की धूलि सिर पर धारण करके, पुनः सबको हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ, जिससे इस कथा के कहने में कोई दोष न लगे, अब शिव को श्रद्धापूर्वक मस्तक नवाकर, राम के गुणों की निर्मल कथा वर्णन करूँगा, संवत् सोलह सौ इकतीस में, हरि के चरणों में सिर रखकर यह कथा करूँगा, नवमी को, मंगलवार के दिन, मधु मास में, अयोध्यापुरी में यह चरित्र प्रकट हुआ, जिस दिन राम का जन्म वेद गाते हैं, उस दिन सब तीर्थ वहाँ चलकर आते हैं, असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता आकर रघुनायक की सेवा करते हैं, विद्वान जन्म महोत्सव मनाते हैं, और राम के कल-कीर्तन गान करते हैं।

दोहा 34

मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।⁠34।।

majjahi sajjana bṛnda bahu pāvana sarajū nīra |japahiṃ rāma dhari dhyāna ura sundara syāma sarīra ||⁠34||

सज्जनों के बड़े समूह पवित्र सरयू के जल में स्नान करते हैं, और हृदय में ध्यान धरकर सुंदर श्याम शरीर वाले राम का नाम जपते हैं।

चौपाई 35.1-7

दरस परस मज्जन अरु पाना।हरइ पाप कह बेद पुराना।।

नदी पुनीत अमित महिमा अति।कहि न सकइ सारद बिमलमति।।

राम धामदा पुरी सुहावनि।लोक समस्त बिदित अति पावनि।।

चारि खानि जग जीव अपारा।अवध तजे तनु नहि संसारा।।

सब बिधि पुरी मनोहर जानी।सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।।

बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा।सुनत नसाहिं काम मद दंभा।।

रामचरितमानस एहि नामा।सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।।

मन करि विषय अनल बन जरई।होइ सुखी जौ एहिं सर परई।।

रामचरितमानस मुनि भावन।बिरचेउ संभु सुहावन पावन।।

त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन।कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।।

रचि महेस निज मानस राखा।पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।।

तातें रामचरितमानस बर।धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।।

कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई।सादर सुनहु सुजन मन लाई।।

darasa parasa majjana aru pānā |harai pāpa kaha beda purānā ||

nadī punīta amita mahimā ati |kahi na sakai sārad bimalamati ||

rāma dhāmadā purī suhāvani |loka samasta bidita ati pāvani ||

cāri khāni jaga jīva apārā |avadha taje tanu nahiṁ saṁsārā ||

saba bidhi purī manohara jānī |sakala siddhiprada maṅgala khānī ||

bimala kathā kara kīnha araṁbhā |sunata nasāhiṁ kāma mada daṁbhā ||

rāmacaritamānasa ehi nāmā |sunata śravaṇa pāia biśrāmā ||

mana kari viṣaya anala bana jarī |hoi sukhī jau ehiṁ sara parī ||

rāmacaritamānasa muni bhāvana |biraceu saṁbhu suhāvana pāvana ||

tribidha doṣa dukha dārida dāvana |kali kucāli kuli kaluṣa nasāvana ||

raci mahesa nija mānasa rākhā |pāi susamau sivā sana bhāṣā ||

tāteṁ rāmacaritamānasa bara |dhareu nāma hiyaṁ heri haraṣi hara ||

kahauṁ kathā soi sukhada suhāī |sādara sunahu sujana mana lāī ||

दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान करने से पाप हर जाता है, ऐसा वेद और पुराण कहते हैं। इस पवित्र नदी की महिमा असीम और अत्यंत महान है; निर्मल बुद्धि वाली शारदा भी इसका वर्णन नहीं कर सकतीं। राम के धाम को देने वाली यह सुंदर नगरी सभी लोकों में प्रसिद्ध और अत्यंत पावन है। चार योनियों में उत्पन्न जगत के अपार जीव हैं; जो अयोध्या में शरीर त्यागता है, वह संसार में नहीं लौटता। नगरी को सब प्रकार से मनोहर, सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाली और मंगलों की खानी जानकर, मैंने वहाँ इस निर्मल कथा का आरंभ किया, जिसे सुनते ही काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं। इसका नाम रामचरितमानस है; सुनते ही कानों को विश्राम मिलता है। मन रूपी हाथी विषयों की वन की आग में जलता है; यदि यह इस सरोवर में गिरता है तो सुखी होता है। मुनियों के प्रिय रामचरितमानस को सुंदर और पावन शंभु ने रचा। यह तीन प्रकार के दोष, दुख और दरिद्रता का नाश करने वाला है, और कलियुग के कुचाल और कुल के कलुषों को नष्ट करने वाला है। महेश ने इसे रचकर अपने मन में रखा, और उचित अवसर पाकर शिवा से कहा। इसलिए हर ने अपने हृदय में देखकर हर्षित होकर इसका उत्तम नाम रामचरितमानस धरा। मैं वही सुखद और सुहावनी कथा कहता हूँ; सज्जन लोग मन लगाकर श्रद्धा से सुनें।

दोहा 35

जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।⁠35।।

jasa mānasa jehi bidhi bhayu jaga pracāra jehi hetu |aba soi kahauṁ prasaṅga saba sumiri umā bṛṣaketu ||⁠35||

यह मानस जिस प्रकार से बना, जिस कारण से जगत में इसका प्रचार हुआ, अब उमा और वृषकेतु शिव का स्मरण करके वह सब प्रसंग कहता हूँ।

चौपाई 36.1-5

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी।रामचरितमानस कबि तुलसी।।

करइ मनोहर मति अनुहारी।सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।।

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू।बेद पुरान उदधि घन साधू।।

बरषहिं राम सुजस बर बारी।मधुर मनोहर मंगलकारी।।

लीला सगुन जो कहहिं बखानी।सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।।

प्रेम भगति जो बरनि न जाई।सोइ मधुरता सुसीतलताई।।

सो जल सुकृत सालि हित होई।राम भगत जन जीवन सोई।।

मेधा महि गत सो जल पावन।सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।।

भरेउ सुमानस सुथल थिराना।सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।

Śambhu prasāda sumati hiyaṁ hulasī.Rāmacaritamānasa kabi Tulasī..

Karai manohara mati anuhārī.Sujana sucita suni lehu sudhārī..

Sumati bhūmi thala hṛdaya agādhū.Beda purāna udadhi ghana sādhū..

Baraṣahiṁ Rāma sujasa bara bārī.Madhura manohara maṅgalakārī..

Līlā saguṇa jo kahahiṁ bakhānī.Soi svacchatā karai mala-hānī..

Prema bhagati jo barani na jāī.Soi madhuratā su-sītalatāī..

So jala sukṛta sāli hita hoī.Rāma bhagata jana jīvana soī..

Medhā mahi-gata so jala pāvana.Sakili śravaṇa maga caleu suhāvana..

Bhareu su-mānasa su-thala thirānā.Sukhada sīta ruci cāru cirānā..

शंभु की कृपा से कवि तुलसी के हृदय में सुबुद्धि खिली और उन्होंने श्रीरामचरितमानस की रचना की। वे अपनी बुद्धि के अनुसार इसे मनोहर बनाते हैं; सुजन और सुचेत लोग इसे सुनकर इसका सुधार कर लें। सुबुद्धि भूमि है, हृदय उसमें एक गहरा तालाब है; वेद और पुराण समुद्र हैं, और साधु बादल हैं। वे श्रीराम के सुयश का उत्तम जल बरसाते हैं, जो मधुर, मनोहर और मंगलकारी है। जो सगुण लीलाएं वे कहकर वर्णन करते हैं, वही उस जल की निर्मलता है जो सब मल को नष्ट करती है। जो प्रेम-भक्ति वर्णन करने योग्य नहीं है, वही उस जल की मधुरता और सीतलता है। वह जल शुभ कर्मों के धान के लिए हितकर है, और श्रीराम के भक्त जनों का जीवन है। वह पवित्र जल बुद्धि भूमि पर गिरा, और एकत्र होकर कानों के मार्ग से बहा, जो देखने में सुहावना था। उसने हृदय रूपी सुंदर सरोवर को भर दिया और वहीं स्थिर हो गया, आनंददायक, सीतल, रुचिकर और चिरस्थायी।

दोहा 36

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।⁠36।।

suṭhi sundara saṃbāda bara birace buddhi bicāri |tei ehi pāvana subhaga sara ghāṭa manohara cāri ||⁠36||

अत्यंत सुंदर और उत्कृष्ट संवाद, बुद्धि से विचार करके रचे गए हैं, वे इस पावन और सुभग सरोवर के चार मनोहर घाट हैं।

चौपाई 37.1-8

सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना।ग्यान नयन निरखत मन माना।।

रघुपति महिमा अगुन अबाधा।बरनब सोइ बर बारि अगाधा।।

राम सीय जस सलिल सुधासम।उपमा बीचि बिलास मनोरम।।

पुरइनि सघन चारु चौपाई।जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई।।

छंद सोरठा सुंदर दोहा।सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।।

अरथ अनूप सुमाव सुभासा।सोइ पराग मकरंद सुबासा।।

सुकृत पुंज मंजुल अलि माला।ग्यान बिराग बिचार मराला।।

धुनि अवरेब कबित गुन जाती।मीन मनोहर ते बहुभाँती।।

अरथ धरम कामादिक चारी।कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।।

नव रस जप तप जोग बिरागा।ते सब जलचर चारु तड़ागा।।

सुकृती साधु नाम गुन गाना।ते बिचित्र जल बिहग समाना।।

संतसभा चहुँ दिसि अवँराई।श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।।

भगति निरुपन बिबिध बिधाना।छमा दया दम लता बिताना।।

सम जम नियम फूल फल ग्याना।हरि पत रति रस बेद बखाना।।

औरउ कथा अनेक प्रसंगा।तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।

sapta prabandha subhaga sopānā |gyāna nayana nirakhata mana mānā ||

raghupati mahimā aguna abādhā |baranaba soi bara bāri agādhā ||

rāma sīya jasa salila sudhāsama |upamā bīci bilāsa manorama ||

puraini saghana cāru caupāī |juguti mañju mani sīpa suhāī ||

chanda soraṭhā sundara dohā |soi bahuraṅga kamala kula sohā ||

aratha anūpa sumāva subhāsā |soi parāga makaranda subāsā ||

sukṛta puñja mañjula ali mālā |gyāna birāga bicāra marālā ||

dhuni avareba kabita guna jātī |mīna manohara te bahubhā̃tī ||

aratha dharama kāmādika cārī |kahaba gyāna bigyāna bicārī ||

nava rasa japa tapa joga birāgā |te saba jalacara cāru taṛāgā ||

sukṛtī sādhu nāma guna gānā |te bicitra jala bihaga samānā ||

santasabhā cahũ disi avãrāī |śraddhā ritu basanta sama gāī ||

bhagati nirupana bibidha bidhānā |chamā dayā dama latā bitānā ||

sama jama niyama phūla phala gyānā |hari pata rati rasa beda bakhānā ||

aurau kathā aneka prasaṅgā |tei suka pika bahubarana bihaṅgā ||

सात कांड इसके सुंदर सोपान हैं, और ज्ञान की आँखों से उन्हें देखकर मन प्रसन्न होता है। रघुपति की महिमा गुणों से रहित और अपरिमित है, उसी का वर्णन इस सरोवर का उत्तम और गहरा जल है। राम और सीता का यश अमृत के समान मीठा जल है, और उपमाएँ उसकी लहरियों का मनोहर क्रीड़ा हैं। सुंदर चौपाइयाँ उसके घने कमल-पत्रों के समूह हैं, और कुशल काव्य-युक्तियाँ मणियों से युक्त सुंदर शुक्ति-शंख हैं। छंद, सोरठे और सुंदर दोहे उस सरोवर को शोभायमान करने वाले बहुवर्णीय कमल-कुल हैं। अनूठे अर्थ, उत्तम भाव और सुंदर भाषा उन कमलों का पराग, मकरंद और सुगंध हैं। अच्छे कर्मों का संचय सुंदर भौंरों की माला है, और ज्ञान, वैराग्य और विचार उसके हंस हैं। ध्वनि, अव्यक्त कथन और काव्य के गुण-जातियाँ बहुत प्रकार के मनोहर मछलियाँ हैं। अर्थ, धर्म, काम आदि चारों पुरुषार्थ, ज्ञान और विज्ञान के विचार और उनका कथन हैं। नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्य, ये सब उस सरोवर के जल में वास करने वाले चारु जलचर हैं। सुकृती साधुओं के नाम और गुणों का गान उसके विचित्र जलपक्षियों के समान है। संतों की सभाएँ चारों ओर के आम के बगीचे हैं, और श्रद्धा वसंत ऋतु के समान कही गई है। विविध विधानों से भक्ति का निरूपण, और क्षमा, दया तथा दम (इंद्रिय-निग्रह) लताएँ और मंडप हैं। शम, यम, नियम उनके फूल और फल हैं, और हरि के चरणों में प्रेम-रस का वेदों द्वारा वर्णन है। और अनेक प्रसंगों से युक्त अन्य कथाएँ उनके सुग्गे, कोयल और बहुवर्णीय पक्षी हैं।

दोहा 37

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।⁠37।।

pulaka bāṭikā bāga bana sukha su-bihaṅga bihāru |mālī sumana saneha jala sīñcata locana cāru ||⁠37||

शरीर का पुलक बाटिका, बाग और वन है, और आनंद सुंदर पक्षियों का विहार है। माली शुद्ध मन है, जो सुंदर नेत्रों द्वारा प्रेम के जल से उन्हें सींचता है।

चौपाई 38.1-5

जे गावहिं यह चरित सँभारे।तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।।

सदा सुनहिं सादर नर नारी।तेइ सुरबर मानस अधिकारी।।

अति खल जे बिषई बग कागा।एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।।

संबुक भेक सेवार समाना।इहाँ न बिषय कथा रस नाना।।

तेहि कारन आवत हियँ हारे।कामी काक बलाक बिचारे।।

आवत एहिं सर अति कठिनाई।राम कृपा बिनु आइ न जाई।।

कठिन कुसंग कुपंथ कराला।तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।।

गृह कारज नाना जंजाला।ते अति दुर्गम सैल बिसाला।।

बन बहु बिषम मोह मद माना।नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।

je gāvahiṃ yaha carita saṁbhāre |tei ehi tāla catura rakhavāre ||

sadā sunahiṃ sādara nara nārī |tei surabara mānasa adhikārī ||

ati khala je biṣaī baga kāgā |ehiṃ sara nikaṭa na jāhiṃ abhāgā ||

saṃbuka bheka sevāra samānā |ihāṁ na biṣaya kathā rasa nānā ||

tehi kārana āvata hiyaṁ hāre |kāmī kāka balāka bicāre ||

āvata ehiṃ sara ati kaṭhināī |rāma kṛpā binu āi na jāī ||

kaṭhina kusaṅga kupantha karālā |tinh ke bacana bāgha hari byālā ||

gṛha kāraja nānā jañjālā |te ati durgama saila bisālā ||

bana bahu biṣama moha mada mānā |nadīṃ kutarka bhayaṅkara nānā ||

जो लोग यह चरित्र सावधानी से गाते हैं, वे ही इस तालाब के चतुर रक्षक हैं। जो पुरुष और स्त्रियाँ सदा श्रद्धा से सुनते हैं, वे ही उस मानस तालाब के श्रेष्ठ अधिकारी हैं। जो अत्यंत दुष्ट, कामी, बगुले और कौवे के समान हैं, वे अभागे इस तालाब के निकट नहीं जाते। यहाँ शंबुक, मेंढक और काई नहीं हैं, जो विषय-कथाओं के अनेक प्रकार के रस के समान हैं। इसी कारण बेचारे कामी कौवे और बगुले आते-आते हृदय से हार जाते हैं। इस तालाब में आना अत्यंत कठिन है; राम की कृपा के बिना कोई यहाँ आ नहीं सकता। कुसंग कठिन है और कुपंथ भयंकर है; उनके वचन बाघ, सिंह और सर्प हैं। गृहस्थी के अनेक कार्यों के जंजाल उसके विशाल और अत्यंत दुर्गम पर्वत हैं। मोह, मद और मान उसके अनेक घने और कठिन वन हैं, और कुतर्क उसकी भयंकर नदी है, अनेक रूपों में।

दोहा 38

जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ।तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।⁠38।।

je śraddhā sambala rahita nahiṁ santanha kara sātha |tinha kahuṁ mānasa agama ati jinhahi na priya raghunātha ||⁠38||

जिनमें श्रद्धा नहीं है, जो संतों की संगति में नहीं रहते, और जिन्हें रघुनाथ प्रिय नहीं हैं, उनके लिए मानस सरोवर अत्यंत दुर्गम है।

चौपाई 39.1-7

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई।जातहिं नींद जुड़ाई होई।।

जड़ता जाड़ बिषम उर लागा।गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।।

करि न जाइ सर मज्जन पाना।फिरि आवइ समेत अभिमाना।।

जौं बहोरि कोउ पूछन आवा।सर निंदा करि ताहि बुझावा।।

सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही।राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।।

सोइ सादर सर मज्जनु करई।महा घोर त्रयताप न जरई।।

ते नर यह सर तजहिं न काऊ।जिन्ह के राम चरन भल भाऊ।।

जो नहाइ चह एहिं सर भाई।सो सतसंग करउ मन लाई।।

अस मानस मानस चख चाही।भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।।

भयउ हृदयँ आनंद उछाहू।उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।।

चली सुभग कबिता सरिता सो।राम बिमल जस जल भरिता सो।।

सरजू नाम सुमंगल मूला।लोक बेद मत मंजुल कूला।।

नदी पुनीत सुमानस नंदिनि।कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि।।

jauṁ kari kasṭa jāi puni koī |jātahiṁ nīṁda juṛāī hoī ||

jaṛatā jāṛa biṣama ura lāgā |gaehuṁ na majjana pāva abhāgā ||

kari na jāi sara majjanu pānā |phiri āvai sameta abhimānā ||

jauṁ bahori kou pūchana āvā |sara niṁdā kari tāhi bujhāvā ||

sakala bighna byāpahi nahiṁ tehī |rāma su-kṛpā̃ bilokahiṁ jehī ||

soi sādara sara majjanu karaī |mahā ghora traya-tāpa na jaraī ||

tē nara yaha sara tajahiṁ na kāū |jinha ke rāma carana bhala bhāū ||

jo nahāi caha ehiṁ sara bhāī |so sat-saṅga karau mana lāī ||

asa mānasa mānasa cakha cāhī |bhai kavi buddhi bimala avagāhī ||

bhayau hṛdayaṁ ānaṁda ucchāhū |umageu prema pramoda prabāhū ||

calī subhaga kabitā saritā so |rāma bimala jasa jala bharitā so ||

sarajū nāma sumaṅgala mūlā |loka beda mata maṁjula kūlā ||

nadī punīta su-mānasa naṁdinī |kali-mala tṛna taru mūla nikaṁdinī ||

और यदि कोई बड़ा कष्ट उठाकर वहाँ जाए, तो वहाँ पहुँचते ही उसे नींद और सिरदर्द-सी ज्वर आ जाती है। जड़ता का भयंकर जड़ और शीत उसके हृदय को जकड़ लेता है, और वह अभागा हालाँकि सरोवर तक पहुँच जाता है, पर स्नान नहीं पाता। वह सरोवर में स्नान भी नहीं कर सकता, जल पी भी नहीं सकता, और अपने अभिमान सहित लौट आता है। फिर यदि कोई उससे पूछने आए, तो वह सरोवर की निंदा करके उसे उत्तर देता है। ये सब बाधाएँ उस पर नहीं आतीं, जिस पर राम अपनी कृपा दृष्टि से देखते हैं। वही श्रद्धापूर्वक सरोवर में स्नान करता है, और उसे भयंकर त्रिताप नहीं जलाता। जिनके हृदय में राम के चरणों के प्रति सच्चा प्रेम है, वे जन इस सरोवर को कभी नहीं त्यागते। हे भाई, जो इस सरोवर में स्नान करना चाहता है, वह मन लगाकर सत्संग करे। इस प्रकार मानस सरोवर को मन की आँखों से देखकर कवि की बुद्धि निर्मल हो गई और उसमें अवगाहन करने लगी। उसके हृदय में आनंद और उल्लास भर गए, और प्रेम तथा हर्ष का प्रवाह उमड़कर बहने लगा। उसी से सुंदर कविता की नदी बहने लगी, जो राम के निर्मल यश के जल से परिपूर्ण थी। इसका नाम सरयू है, जो सम्पूर्ण मंगलों का मूल है, और इसके दोनों सुंदर कूल लोक और वेद के मार्ग हैं। यह पवित्र नदी, सुंदर मानस सरोवर की पुत्री, कलियुग के पापों के तृण, वृक्ष और मूल सहित नाश करने वाली है।

दोहा 39

श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।⁠39।।

śrotā tribidha samāja pura grāma nagara duhum̐ kūla |sant-sabhā anupama avadha sakala su-maṅgala mūla ||⁠39||

श्रोता तीन प्रकार के हैं - नगर, ग्राम और शहर जो नदी के दोनों तट पर स्थित हैं; और संतों की सभा अतुलनीय अयोध्या है, जो सभी मंगलमय वस्तुओं का मूल है।

Inside Prakarana 4

Bhakti highlights

मुख्य शिक्षा ‘श्रद्धा + सत्संग’ है: कथा का अधिकार बाह्य पाण्डित्य से नहीं, गुरु-कृपा, शुद्ध जिज्ञासा, और राम-प्रियता से बनता है। श्रवण-मार्ग को साधना घोषित किया गया है—कथा-जल से पाप-धुलाई, कथा-अग्नि से कुतर्क/अहं-दाह, कथा-चन्द्र से मन-शीतलता और प्रसाद। परम्परा-श्रवण (शिव-प्रेरित, याज्ञवल्क्य-वक्तृ, भरद्वाज-श्रोता) बताती है कि भक्ति ‘संवाद’ और ‘विनय’ से पुष्ट होती है। निर्गुण-सगुण समन्वय का संकेत: तत्त्व-गम्भीरता शिव-आश्रित, पर फल रघुनाथ-भक्ति—नाम, गुण, लीला के प्रति एकाग्र प्रेम; यही आगे की कथा-लीला के लिए साधक को पात्र बनाता है।

Compositional abstract

यह अंश बालकाण्ड के आरम्भिक ‘भूमिका-सोपान’ का घनत्व रखता है: तुलसी गुरु-श्रवण की परम्परा बताते हुए कथा-प्रवाह को प्रामाणिक संवाद-श्रृंखला में बाँधते हैं (शिव से लेकर भरद्वाज तक)। भाव-रसा में शान्त और अद्भुत का संयोग है—कथा की अनन्तता (राम अनंत, अनंत गुन) और श्रोता-योग्यता का विवेक। ‘मानस-सर’ रूपक यहाँ केंद्रीय है: चौपाइयों को पुरइन, दोहा-सोरठा को कमल, अर्थ को पराग, और सत्संग को बसंत-ऋतु बताकर पाठक को बतलाया जाता है कि यह ग्रन्थ ‘सोपान’ है—जल की तरह मल-हारी, अग्नि की तरह कुतर्क-दहन, चन्द्र की तरह शीतल-आनन्ददायी। सिद्धान्ततः यह खंड निर्गुण-सगुण समन्वय की भूमि बनाता है: शिव-प्रेरित कथा, पर लक्ष्य रघुनाथ-भक्ति। अतः बालकाण्ड का यह भाग साधक को ‘श्रवण-मार्ग’ पर स्थापित कर आगे के लीला-वर्णन हेतु पात्र बनाता है।

The emotional arc

आरम्भ में ‘शान्त-रस’ का स्थिर आधार—साधक को कथा-प्रवेश की मर्यादा, अधिकार और विनय का बोध। फिर ‘अद्भुत-रस’ का उदय—रामकथा की अनन्तता, गुणों की अपारता, और परम्परा-प्रमाण (संवाद-श्रृंखला) का विस्मय। मध्य में ‘श्रद्धा-रस’ (भक्ति-प्रधान शान्त) गाढ़ा होता है—सत्संग, गुरु-कृपा, शुद्ध जिज्ञासा से पात्रता बनती है। अंत की ओर ‘प्रसाद/आनन्द’—मानस-सर में अवगाहन का आश्वासन: कथा जल की तरह मल-हारी, अग्नि की तरह कुतर्क-दाहक, चन्द्र की तरह शीतल-आनन्ददायी; श्रोता के भीतर विवेक-जागरण और हृदय-शुद्धि की प्रतिज्ञा।

The dialogue

  • तुलसीदास (कवि-स्वर), शिव-प्रसंग का संदर्भ देते हुएसज्जन-श्रोता/संतसमाज (और अप्रत्यक्षतः ‘मन’—मानस-अधिकार का पात्र) · चार-घाट सिद्धान्त का ‘प्रवेश-द्वार’: यहाँ कवि संवाद-परम्परा (शिव→उमा→कागभुशुण्डि→याज्ञवल्क्य→भरद्वाज) स्थापित कर ‘सत्संग-घाट’ का अधिकार-नियम बताता है—श्रद्धा सहित निकट आओ, तभी अवगाहन संभव।

Frequently Asked Questions

परम्परानुसार यह भूमिका-खण्ड ‘अधिकार-निर्माण’ करता है: श्रद्धा-सत्संग सहित श्रवण से कलि-कलुष, कुतर्क, काम-मद-दंभ का शमन; मन में विवेक-जागरण; और रामनाम/रामध्यान में रुचि स्थिर होती है—‘श्रवन पाइअ बिश्रामा’ का फल।

सामान्य सत्संग-परम्परा में ‘राम’ नाम-संकीर्तन/नामा-स्मरण (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘राम नाम’ का जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; विशेषतः ‘रामचरितमानस’ की भूमिका में ‘राम-नाम’ को ही सार्वभौम सम्पुट माना जाता है।

Ask anything about Prakarana 4 of the Ramcharitmanas

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Ramcharitmanas in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Awadhi recitation where available, and more.

Download on the App StoreGet it on Google Play

Continue reading in the Vedapath app

Open in App
Download on the App StoreGet it on Google Play