Divine BirthShiva-ParvatiRama-Sita Vivaha

Bala Kanda

बालकाण्ड

उत्तरकाण्ड का समग्र भाव-प्रवाह ‘विरह-समाधान’ से ‘शान्त-तत्त्व’ की ओर अग्रसर होता है। आरम्भ में अयोध्या और भरत का दीर्घ विरह राम-आगमन के ‘अनुष्ठानिक’ उत्कर्ष में पिघलता है—करुणा से हर्ष/आनन्द की ओर। फिर राज्याभिषेक बाह्य उत्सव न रहकर ‘चित्ताभिषेक’ बनता है: राम-सीता की शोभा (भक्ति-श्रृंगार) और सेवक-त्राण (दास्य) के साथ शान्त-रस गाढ़ा होता है। मध्य-उत्तर में अद्भुत का उभार (माया/ब्रह्माण्ड-दर्शन, भक्ति-प्रताप) साधक को विस्मय से वैराग्य की ओर मोड़ता है। अंततः कलियुग-वर्णन, अधम-लक्षणों की सूची और ‘बिनु X न Y’ जैसे सूत्र शान्त-रस को नीति-उपदेश की धार देते हैं—करुणा (भ्रमित जीव पर दया) और वैराग्य (असार जगत से विरक्ति) के साथ कथा का निष्कर्ष ‘भक्ति-चिन्तामणि’ की स्थिरता में होता है।

Prakaranas in Bala Kanda

37 prakaranas with 760 verses.
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