Adhyaya 35
PrayaschittaSinsPurification57 Shlokas

Adhyaya 35: Madālasa’s Instruction on Purity, Impurity, and Corrective Rites (Śauca and Aśauca)

सदाचारकथनम् (Sadācāra-kathanam) / अलर्कानुशासन (Alarkānuśāsana)

Sins and Their Remedies

इस अध्याय में मदालसा अलर्क को शौच‑अशौच का भेद, शरीर‑वाणी‑मन की शुद्धि, जन्म‑मृत्यु आदि से होने वाले अशौच के काल, तथा स्नान, दान, जप, होम आदि द्वारा शुद्धि और प्रायश्चित्त के नियम बताती हैं। वह सत्य, दया, संयम, गुरु‑पूजा और सदाचार को धर्मरक्षा का आधार मानती हैं।

Divine Beings

Sūrya (as purifying sunlight)Soma (as purifying moonlight)Agni (as the purifying principle of fire/heat)

Key Content Points

Dietary classification: identification of bhojya/abhojya foods, meats, and exceptions (e.g., medicinally consecrated or ritually treated consumption).Material purification protocols: object-specific śuddhi via water, hot water, ash, abrasion, scraping, cooking/baking of earthenware, and specialized agents (acid/alkali) for particular metals.Contact and environmental impurity: rules for cleansing after contact with bodily fluids, insects, carrion, strangers/unknown items, and public thoroughfares; emphasis on ācamana, bathing, sprinkling, and exposure to sun/wind.Aśauca regulations: graded impurity periods after death/birth by varṇa; procedures for cremation, bone-gathering, water-offerings, and restrictions on gifts/oblations during impurity.Kinship logic (sapiṇḍa): how overlapping deaths/births adjust ritual timelines and how rites resume after stipulated days.

Focus Keywords

Markandeya Purana Adhyaya 35Madālasa teachingsAlarkānushāsanaSadachara kathanamśauca and aśauca rulesHindu purity lawsācamana and snāna in Dharmadeath impurity period varnasapiṇḍa aśaucapurification of vessels and clothes

Shlokas in Adhyaya 35

Verse 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अलर्कानुशासने सदाचारकथनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः । पञ्चत्रिंशोऽध्यायः । मदालसोवाच । अतः परं शृणुष्व त्वं वर्ज्यावर्ज्यप्रतिक्रियाम् । भोज्यमन्नं पर्युषितं स्नेहाक्तं चिरसंभृतम् ॥

इस प्रकार मार्कण्डेय पुराण में अलर्क को उपदेश के प्रसंग में ‘सदाचार-वर्णन’ नामक चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब पैंतीसवाँ अध्याय आरम्भ होता है। मदालसा बोली—अब सुनो, किन बातों का परिहार करना चाहिए और किनका नहीं, उनके उपाय और नियम। जो भोजन रात भर रखा हुआ हो, जो घी/तेल से अभ्यक्त हो, तथा जो बहुत समय से संचित हो—वह भी भक्ष्य में गिना गया है।

Verse 2

अस्नेहाश्चापि गोधूमयवगोरसविक्रियाः । शशकः कच्छपो गोधा श्वावित् खड्गोऽथ पुत्रक ॥

इसी प्रकार बिना घी/तेल के बने गेहूँ और जौ के पदार्थ तथा गौ-दुग्ध से बने पदार्थ भी वर्जित हैं। हे पुत्र, खरगोश, कछुआ, गोह (इगुआना), साही और गैंडा भी त्याज्य हैं।

Verse 3

भक्ष्या ह्येते तथा वर्ज्यौ ग्रामशूकरकुक्कुटौ । पितृदेवादिशेषश्च श्राद्धे ब्राह्मणकाम्यया ॥

ये वस्तुएँ भक्ष्य कही गई हैं, तथापि ग्राम्य सूअर और मुर्गा वर्जित हैं। पितरों, देवताओं आदि को अर्पित नैवेद्य का शेष—श्राद्ध में ब्राह्मणों को तृप्त करने की भावना से ग्रहण किया जा सकता है।

Verse 4

प्रोक्षितञ्चौषधार्थञ्च खादन्मांसं न दुष्यति । शङ्खाश्मस्वर्णरूप्याणां रज्जूनामथ वाससाम् ॥

जो मांस प्रोक्षण (शुद्धि-जल/मन्त्र) से संस्कृत हो या औषधि-प्रयोजन से लिया जाए, उसे खाने से दोष नहीं लगता। अब शुद्धि के विषय में—शंख, पत्थर, सोना, चाँदी, रस्सी और वस्त्रों की शौच-विधि कही जाती है।

Verse 5

शाकमूलफलानाञ्च तथा विदलचर्मणाम् । मणिवज्रप्रवालानां तथा मुक्ताफलस्य च ॥

शाक, मूल और फलों पर भी शुद्धि के नियम लागू होते हैं; वैसे ही कटे हुए चर्म/चमड़े के टुकड़ों पर। मणि, हीरा, मूंगा तथा मोतियों के लिए भी शौच-विधि कही गई है।

Verse 6

गात्राणाञ्च मनुष्याणामम्बुना शौचमिष्यते । यथायसानां तोयेन ग्राव्णः सङ्घर्षणेन च ॥

मनुष्यों के अंगों की शुद्धि जल से बताई गई है; जैसे लोहे की शुद्धि जल से होती है, और पत्थरों की शुद्धि घर्षण/रगड़ से।

Verse 7

सस्त्रेहाणाञ्च भाण्डानां शुद्धिरुष्णेन वारिणा । शूर्पधान्याजिनानाञ्च मुषलोलूखलस्य च ॥

चिकनाई से लिप्त पात्रों/बर्तनों की शुद्धि गरम जल से होती है। यही नियम सूप (अनाज फटकने की टोकरी), धान्य, चर्म/खाल, तथा मूसल और ओखली पर भी लागू है।

Verse 8

संहतानाञ्च वस्त्राणां प्रोक्षणात् सञ्चयस्य च । वल्कलानामशेषाणामम्बुमृच्छौचमिष्यते ॥

मुड़े/बँधे वस्त्रों तथा ढेर/संग्रह की शुद्धि छिड़काव (प्रोक्षण) से होती है। समस्त वल्कल (छाल-वस्त्र) की शुद्धि जल और मृत्तिका (मिट्टी) से बताई गई है।

Verse 9

तृणकाष्ठौषधीनाञ्च प्रोक्षणात् शुद्धिरिष्यते । आविकानां समस्तानां केशानाञ्चापि मेध्यता ॥

तृण, काष्ठ और औषधियों की शुद्धि छिड़काव से मानी गई है। समस्त ऊनी वस्तुएँ तथा केश भी स्वभावतः मेध्य (स्वतः शुद्ध/पवित्र) माने गए हैं।

Verse 10

सिद्धार्थकानां कल्केन तिलकल्केन वा पुनः । साम्बुना तात ! भवति उपघातवतां सदा ॥

प्रिय, श्वेत सरसों (सिद्धार्थक) आदि बीजों की शुद्धि जल के साथ कल्क (लेप) से होती है—अपने ही कल्क से या तिल के कल्क से; उपघात से दूषित वस्तुओं के लिए यही नित्य नियम है।

Verse 11

तथा कार्पासिकानाञ्च विशुद्धिर्जलबhasmanā । दारुदन्तास्थिशृङ्गाणां तक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥

इसी प्रकार कपास की वस्तुएँ जल और भस्म से शुद्ध होती हैं; और लकड़ी, दाँत, हड्डी तथा सींग—इनकी शुद्धि सतह को खुरचने/छीलने से मानी गई है।

Verse 12

पुनः पाकेन भाण्डानां पार्थिवानाञ्च मेध्यता । शुचिर्भैक्षं कारुहस्तः पण्यं योषिन्मुखं तथा ॥

फिर पात्र—विशेषकर मिट्टी के—तपाने/पकाने से शुद्ध होते हैं। भिक्षा का अन्न शुद्ध माना जाता है; कारीगरों द्वारा संभाला गया माल व्यापार हेतु शुद्ध माना जाता है; और स्त्री के मुख से स्पर्शित (अन्न/जल आदि) भी नियमानुसार शुद्धि-व्यवहार में आता है।

Verse 13

रथ्यागतमविज्ञातं दासवर्गादिनाहृतम् । वाक्रप्रशास्तं चिरातीतमनैकान्तरितं लघु ॥

जो मार्ग से आया हो, जिसका उद्गम अज्ञात हो, जो दास आदि द्वारा लाया गया हो; जो विश्वसनीय वचन-प्रमाण से अनुमोदित हो, जो बहुत समय बीत जाने पर हो, और जो अनेक अंतरालों से पृथक हो—ये सब शुद्धि-विचार में ‘लघु-दूषण’ की श्रेणी में गिने जाते हैं।

Verse 14

अतिप्रभूतं बालञ्च वृद्धातुरविचेष्टितम् । कर्मान्ताङ्गाराशालाश्च स्तनन्धयसुताः स्त्रियः ॥

अतिस्राव/अत्यधिक मलिनता, बालक, तथा वृद्ध और रोगी की अनियंत्रित क्रियाएँ; कर्मशालाएँ और अंगार/अग्नि के स्थान; और दूध पीते शिशु सहित स्त्रियाँ—ये शौच-अशौच के विचार में विशेष प्रसंग माने गए हैं।

Verse 15

शुचिन्यश्च तथैवापः स्त्रन्त्यो 'गन्धबुद्बुदाः । भूमिर्विशुध्यते कालाद्दाहमार्जनगोक्रमैः ॥

इसी प्रकार दुर्गन्ध और फेन से रहित बहता जल शुद्ध माना जाता है। भूमि समय के प्रवाह से, दहन से, झाड़ू/मार्जन से तथा गौओं के पद-संचार से शुद्ध होती है।

Verse 16

लेपादुल्लेखनात् सेकाद्वेश्मसंमार्जनार्चनात् । केशकीटावपन्ने च गोग्राते मक्षिकान्विते ॥

लेपन, खुरचन, छिड़काव, झाड़ू/मार्जन और गृह-पूजन से घर शुद्ध होता है—चाहे वह बाल और कीड़ों से दूषित हो, गाय के सूँघने से अपवित्र हुआ हो, या मक्खियों से भर गया हो।

Verse 17

मृदम्बुभस्मना तात ! प्रोक्षितव्यं विशुद्धये । औदुम्बराणामम्लेन क्षारेण त्रपुसीसयोः ॥

हे प्रिये, शुद्धि के लिए मिट्टी, जल और भस्म से छिड़काव करना चाहिए। उदुम्बर (गूलर) की लकड़ी की शुद्धि किसी अम्ल पदार्थ से होती है, और टिन तथा सीसा की शुद्धि क्षार से होती है।

Verse 18

भस्माम्बुभिश्च कांस्यानां शुद्धिः प्लावाद् द्रवस्य च । अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैर्गन्धापहरणेन च ॥

काँसे के पात्रों की शुद्धि भस्म और जल से होती है, और द्रव पदार्थों की शुद्धि उफान/उपरि बहा देने (प्लाव) से। जो वस्तु मल से लिप्त हो, उसकी शुद्धि मिट्टी और जल से, तथा दुर्गन्ध दूर करने से भी होती है।

Verse 19

अन्येषाञ्चैव तद्द्रव्यैर्वर्णगन्धापहारतः । शुचि गोत्रप्तिकृत्तोयं प्रकृतिस्थं महीगतं ॥

अन्य पदार्थों की भी शुद्धि उनके-उनके शोधन-साधनों से होती है—रंग-भेद और दुर्गन्ध के हट जाने पर। जल तब शुद्ध है जब वह गौओं को तृप्त करे (पीने योग्य हो), स्वाभाविक अवस्था में हो, और भूमि/स्रोत से ताज़ा निकला हो।

Verse 20

तथा मांसञ्च चण्डालक्राव्यादादिनिपातितम् । रथ्यागतञ्च चेलादि तात ! वातात् शुचि स्मृतम् ॥

हे प्रिये! चाण्डाल आदि मांसभक्षी के द्वारा गिराया हुआ मांस, तथा सड़क के स्पर्श से लगा वस्त्र आदि—ये सब वायु के संस्पर्श से शुद्ध माने गए हैं।

Verse 21

रजोऽग्निरश्वो गौश्छाया रश्मयः पवनो मही । विप्रुषो मक्षिकाद्याश्च दुष्टसङ्गाददोṣिणः ॥

धूल, अग्नि, घोड़ा, गाय, छाया, सूर्यकिरण, वायु, पृथ्वी, जल-बूंदें तथा मक्खी आदि—ये अशुद्ध के संसर्ग से भी मलिन नहीं होते।

Verse 22

अजाश्वौ मुखतो मेध्यौ न गोर्वत्सस्य चाननम् । मातुः प्रस्त्रवणं मेध्यं शकुनिः फलपातने ॥

बकरी और घोड़ा मुख के विषय में मेध्य (शुद्ध) माने गए हैं; परंतु बछड़े का मुख वैसा नहीं। माता का बहता दूध शुद्ध है; और फल गिरने में पक्षी दोषकारक नहीं माना जाता।

Verse 23

आसनं शयनं यानं नावः पथि तृणानि च । सोमसूर्यांशुपवनैः शुध्यन्ते तानि पण्यवत् ॥

आसन, शय्या, वाहन, नौका तथा मार्ग की घास भी—चन्द्रप्रकाश, सूर्यप्रकाश और वायु से—उपयोग हेतु रखे गए माल की भाँति—शुद्ध हो जाते हैं।

Verse 24

रथ्यावसर्पणस्नानक्षुत्पानम्लानकर्मसु । आचामेत यथान्यायं वासो विपरिधाय च ॥

सड़क में चलने-फिरने के बाद, स्नान के बाद, भोजन-पान के बाद, तथा श्रम कराने वाले कार्य के बाद—विधिपूर्वक आचमन करना चाहिए और वस्त्रों को भी यथायोग्य बदल/संवार लेना चाहिए।

Verse 25

स्पृष्टानामप्यसंसर्गैर्विरथ्याकर्दमाम्भसाम् । पक्वेष्टरचितानाञ्च मेध्यता वायुसङ्गमात् ॥

स्पर्शित वस्तुओं में भी यदि आगे अशौच का संसर्ग न हो, तथा सड़क के जल और कीचड़ से प्रभावित वस्तुओं में, और शुद्ध भाव से किए गए पके भोजन के प्रबन्ध में भी, वायु के स्पर्श से शुद्धि प्राप्त होती है।

Verse 26

प्रभूतोपहतात् अन्नात् अग्रं उद्धृत्य सन्त्यजेत् । शेषस्य प्रोक्षणं कुर्याद् आचम्यादिभस् तथा मृदा ॥

अत्यन्त दूषित भोजन में से ऊपर/प्रभावित भाग को निकालकर त्याग देना चाहिए। शेष पर जल का प्रोक्षण करके, फिर आचमन आदि शौच-कर्म करके, और विधि के अनुसार मिट्टी से शुद्धि करनी चाहिए।

Verse 27

उपवासस् त्रिरात्रन्तु दुष्टभक्ताशिनो भवेत् । अज्ञाते ज्ञानपूर्वन्तु तद्दोषोपशमेन तु ॥

दूषित अन्न खाने वाले के लिए तीन रात्रियों का उपवास विहित है। यदि अज्ञान से हुआ हो तो उसी के अनुसार शुद्धि होती है; पर यदि जान-बूझकर हुआ हो तो उस दोष के शमन/निवारण हेतु उचित प्रायश्चित्त करना चाहिए।

Verse 28

उदक्याश्वशृगालादीन् सूतिकान्त्यवसायिनः । स्पृष्ट्वा स्नायीत शौचार्थं तथैव मृतहारिणः ॥

रजस्वला स्त्री, घोड़ा, सियार आदि, सूतिका/प्रसूता स्त्री, या अवसायी (बहिष्कृत) को स्पर्श करने पर शुद्धि हेतु स्नान करना चाहिए; तथा शव-वाहक (मृतक को उठाने वाले) को छूने पर भी स्नान विहित है।

Verse 29

नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्त्रेहं स्नातः शुध्यति मानवः । आचाम्यैव तु निःस्त्रेहं गामालभ्यार्कमीक्ष्य वा ॥

यदि मनुष्य की हड्डी पर चर्बी/चिकनाई लगी हो और पुरुष उसे छू ले, तो स्नान से शुद्ध होता है। पर यदि चिकनाई न लगी हो तो केवल आचमन से शुद्ध होता है; अथवा गाय का स्पर्श करने से, या सूर्य का दर्शन करने से भी शुद्धि होती है।

Verse 30

न लङ्घयेत तथैवासृक्छ्ठीवनोद्वर्तनानि च । नोद्यानादौ विकालेषु प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन ॥

बुद्धिमान व्यक्ति को रक्त, थूक या उबटन के मैल को नहीं लांघना चाहिए और न ही असमय बगीचों आदि में रुकना चाहिए।

Verse 31

न चालपेज्जनद्विष्टां वीरहीनां तथा स्त्रियम् । गृहादुच्छिष्टविण्मूत्रपादाम्भांसि क्षिपेद्वहिः ॥

लोकनिंदित या आश्रयहीन स्त्री से बात नहीं करनी चाहिए। जूठन, मल-मूत्र और पैर धोने का पानी घर के बाहर फेंकना चाहिए।

Verse 32

पञ्च पिण्डाननुधृत्य न स्त्रायात् परवारिणि । स्त्रायीत देवखातेṣu गङ्गाह्रदसरित्सु च ॥

पाँच पिंड निकालकर (अर्पण करके) दूसरे के निजी जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिए। देव-सरोवरों, गंगा आदि नदियों और झीलों में स्नान करना चाहिए।

Verse 33

देवता-पितृ-सच्छास्त्र-यज्ञ-मन्त्रादिनिन्दकैः । कृत्वा तु स्पर्शनालापं शुध्येतार्कावलोकनात् ॥

देवताओं, पितरों, शास्त्रों और यज्ञों की निंदा करने वालों को छूने या उनसे बात करने पर सूर्य के दर्शन करने से शुद्धि होती है।

Verse 34

अवलोक्य तथोदक्यां अन्त्यजं पतितं शवम् । विधर्मि-सूतिका-षण्ढ-विवस्त्रान्त्यावसायिनः ॥

जल में या अन्यत्र पतित, शव, पाखंडी, सूतिका, नपुंसक, नग्न व्यक्ति या चांडाल को देखने पर (सूर्य दर्शन से) शुद्धि करनी चाहिए।

Verse 35

सूतनिर्ग्यातकांश्चैव परदाररताश्च ये । एतदेव हि कर्तव्यं प्राज्ञैः शोधनमात्मनः ॥

जैसे सूतिकाशौच से जुड़े लोगों के साथ और पर-स्त्री में आसक्त जनों के साथ भी; बुद्धिमानों के लिए यही विधि है—अपनी शुद्धि करना।

Verse 36

अभोज्यं सूतिका-षण्ढ-मार्जाराखुश्वकुक्कुटान् । पतिताविद्धचण्डाल-मृतहारांश्च धर्मवित् ॥

धर्मज्ञ को सूतिकाशौचिनी स्त्री से संबंधित, नपुंसक, बिल्ली, चूहा, कुत्ता और मुर्गा—इनसे जुड़ा अन्न अभक्ष्य मानना चाहिए; तथा पतित, वेधित/दूषित, चाण्डाल और शव-वाहन से जीविका करने वालों से संबंधित अन्न भी।

Verse 37

संस्पृश्य शुध्यते स्त्रानादुदक्यां ग्रामशूकरौ । तद्वच्च सूतिकाशौचदूषितौ पुरुषावपि ॥

उनका स्पर्श हो जाए तो स्नान से शुद्धि होती है—जैसे गाँव का सूअर और अपवित्र जल का संसर्ग। वैसे ही सूतिकाशौच से दूषित दो पुरुष भी स्पर्श के बाद स्नान से शुद्ध हो जाते हैं।

Verse 38

यस्य चानुदिनं हानिर्गृहे नित्यस्य कर्मणः । यश्च ब्राह्मणसंत्यक्तः किल्विषी स नराधमः ॥

जिसके घर में नित्यकर्म दिन-प्रतिदिन घटते जाते हैं, और जिसे ब्राह्मण निंद्य मानकर त्याग देते हैं—वह पापी पुरुषों में अधम है।

Verse 39

नित्यस्य कर्मणो हानिं न कुर्वोत कदाचन । तस्य त्वकरणे बन्धः केवलं मृतजन्मसु ॥

नित्यकर्मों में कभी भी चूक नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उनके न करने से उसके लिए बंधन होता है—ऐसे जन्मों में जो मानो मृत-तुल्य (दुःखमय, निष्फल) हों।

Verse 40

दशाहं ब्राह्मणस्तिष्ठेद्दानहोमादिवर्जितः । क्षत्रियो द्वादशाहञ्च वैश्यो मासार्धमेव च ॥

ब्राह्मण को दान, हवन आदि त्यागकर दस दिनों तक अशौच का पालन करना चाहिए। क्षत्रिय को बारह दिन और वैश्य को आधा मास (पंद्रह दिन) तक ऐसा करना चाहिए।

Verse 41

शूद्रस्तु मासमासीता निजकर्मविवर्जितः । ततः परं निजं कर्म कुर्युः सर्वे यथोदितम् ॥

किन्तु शूद्र को अपने नित्य कर्मों से विरत रहकर एक मास तक अशौच में रहना चाहिए। तदनन्तर सभी वर्णों को अपने-अपने निर्धारित कर्तव्य करने चाहिए।

Verse 42

प्रोताय सलिलं देयं बहिर्दग्ध्वा तु गोत्रिकैः । प्रथमे 'ह्नि चतुर्थे च सप्तमे नवमे तथा ॥

मृतक को जलांजलि देनी चाहिए; और (बस्ती के) बाहर दाह संस्कार करके, गोत्र के बन्धुओं को पहले, चौथे, सातवें और नौवें दिन (क्रिया) करनी चाहिए।

Verse 43

भस्मास्थिचयनं कार्यं चतुर्थे गोत्रिकैर्दिने । ऊर्ध्वं सञ्चयनात् तेषामङ्गस्पर्शो विधीयते ॥

गोत्र के संबंधियों द्वारा चौथे दिन अस्थि संचय (हड्डियों को इकट्ठा करना) किया जाना चाहिए। संचय के बाद, उनका स्पर्श करना दोषपूर्ण नहीं है (स्पर्श विहित है)।

Verse 44

सोदकैस्तु क्रियाः सर्वाः कार्याः सञ्चयनात्परम् । स्पर्श एव सपिण्डानां मृताहनि तथोभयोः ॥

अस्थि संचय के बाद, सभी क्रियाएं जल के साथ (तर्पण आदि) करनी चाहिए। सपिण्ड संबंधियों के लिए, मृत्यु के दिन स्पर्श मात्र से अशौच होता है।

Verse 45

अन्वेकमृक्षमाशस्त्र-तोयोद्बन्धन-वह्निषु । विषप्रपातादिमृते प्रायोनाशकयोरपि ॥

वन्य पशु, शस्त्र, जल, फाँसी/गला घोंटने या अग्नि से मरण होने पर; तथा विष, गिरने आदि से हुई मृत्यु में और आत्महत्या/आत्मविनाश के प्रसंग में—आसपास के विधान के अनुसार विशेष नियम लागू होते हैं।

Verse 46

बाले देशान्तरस्थे च तथा प्रव्रजिते मृते । सद्यः शौचमथान्यैश्च त्र्यहमुक्तमशौचकम् ॥

बालक की मृत्यु, दूर देश में स्थित व्यक्ति की मृत्यु, तथा संन्यासी/यति की मृत्यु में—शुद्धि तत्काल होती है। अन्य प्रसंगों में तीन दिन का आशौच कहा गया है।

Verse 47

सपिण्डानां सपिण्डस्तु मृते 'न्यस्मिन्मृतो यदि । पूर्वाशौचसमाख्यातैः कार्यास्त्वत्र दिनैः क्रियाः ॥

सपिण्ड संबंधियों में, जब पहले से आशौच चल रहा हो, उसी बीच यदि कोई अन्य सपिण्ड मर जाए, तो यहाँ बताए गए कर्म पूर्व आशौच में गिने गए दिनों के अनुसार ही करने चाहिए।

Verse 48

एष एव विधिर्दृष्टो जन्मन्यपि हि सूतके । सपिण्डानां सपिण्डेषु यथावत्सोदकेषु च ॥

यही नियम जन्म-जन्य अशुद्धि (सूतक) में भी माना जाता है। सपिण्ड संबंधियों में वह यथावत् लागू होता है, और जल-संबंधी कर्मों में भी।

Verse 49

जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचेलन्तु विधीयते । तत्रापि यदि चान्यस्मिन जातॆ जायेत चापरः ॥

पुत्र के जन्म पर पिता को वस्त्र सहित स्नान करने की आज्ञा है। और उसी प्रसंग में, यदि एक के जन्म के बाद फिर किसी अन्य का भी जन्म हो (अर्थात् जन्म क्रम से हों), तो… (आगे का विधान संदर्भानुसार)।

Verse 50

तत्रापि शुद्धिरुद्दिष्टा पूर्वजन्मवतो दिनैः । दशद्वादशमासार्ध-माससङ्ख्यैर्दिनैर्गतैः ॥

उस स्थिति में भी जितने दिन बीत चुके हों, उनके अनुसार शौच-काल निर्धारित किया गया है—दस या बारह मासों की गणना से, तथा पक्ष और मास के मान से, जैसे-जैसे दिन बीतें।

Verse 51

स्वाः स्वाः कर्मक्रियाः कुर्युः सर्वे वर्णा यथाविधि । प्रेतमुद्दिश्य कर्तव्यमेकोद्दिष्टं ततः परम् ॥

सभी वर्ण अपने-अपने नियम के अनुसार अपने-अपने कर्म करें। तत्पश्चात प्रेत के लिए विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जाए।

Verse 52

दानानि चैव देयानि ब्राह्मणेभ्यो मनीषिभिः । यद्यदिष्टतमं लोके यच्चापि ययितं गृहे ॥

बुद्धिमान व्यक्ति ब्राह्मणों को अवश्य दान दे—जो वस्तु संसार में सबसे अधिक वांछित हो और जो अपने घर में सबसे अधिक प्रिय हो।

Verse 53

तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता । पूर्णैस्तु दिवसैः स्पृष्ट्वा सलिलं वाहनायुधम् ॥

जो अविनाशी पुण्य चाहता हो, वह वही-वैसा दान योग्य पात्र को दे; वही दान अक्षय फल देता है। और दिनों की पूरी संख्या होने पर जल का स्पर्श करके वाहन और शस्त्र पुनः ग्रहण करे।

Verse 54

प्रतोददण्डौ च तथा सम्यग्वर्णाः कृतक्रियाः । स्ववर्णधर्मनिर्दिष्टमुपादानं तथा क्रियाः ॥

अंकुश और दंड के विषय में भी यही नियम है। वर्णजन विधिपूर्वक कर्मकाण्ड पूर्ण करके, आवश्यक उपकरण ग्रहण करें और अपने-अपने वर्णधर्म के अनुसार कार्य करें।

Verse 55

कुर्युः समस्ताः शुचिनः परत्रेह च भूतिदाः । अध्येतव्या त्रयी नित्यं भवितव्यं विपश्चिता ॥

सबको पवित्रता से आचरण करना चाहिए, जिससे इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण हो। तीनों वेदों का नित्य अध्ययन करे और विवेकशील तथा बुद्धिमान बने।

Verse 56

धर्मतो धनमाहार्यं यष्टव्यञ्चापि यत्नतः । यच्चापि कुर्वतो नात्मा जुगुप्सामेति पुत्रक ! ॥

धर्मयुक्त उपायों से धन अर्जित करना चाहिए और प्रयत्नपूर्वक यज्ञ करना चाहिए। और जो कुछ ऐसा किया जाए कि अपना मन आत्म-ग्लानि में न पड़े—वही करना चाहिए, प्रिय पुत्र।

Verse 57

तत्कर्तव्यमशङ्केन यन्न गोप्यं महाजने । एवमाचरतो वत्स ! पुरुषस्य गृहे सतः । धर्मार्थकामसम्प्राप्त्या परत्रेह च शोभनम् ॥

जो कर्म लोक से छिपाने योग्य नहीं है, उसे निःसंकोच करना चाहिए। इस प्रकार गृहस्थ पुरुष के लिए धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि इस लोक और परलोक दोनों में शुभ और मान्य फल देती है, प्रिय बालक।

Frequently Asked Questions

It defines how a disciplined person should distinguish purity from impurity in daily life—especially in food, bodily contact, household objects, and social interactions—and prescribes corrective rites (sprinkling, ācamana, bathing, heat/ash cleansing) to restore ritual and moral order.

It assigns substance-specific śuddhi: water or hot water for vessels and implements; ash and water for certain metals; abrasion/scraping for wood, teeth/bone/horn; cooking/baking for earthenware; and time, wind, sun, or sprinkling for items affected by contact, dust, insects, or public-space contamination.

No. Adhyāya 35 is a dharma-śāstra styled sadācāra section within the Alarkānuśāsana, focusing on śauca/aśauca regulation rather than Shaktic theology (Devi Mahatmyam, Adhyāyas 81–93) or Manvantara chronology.