
Yuddha-yajña-vyākhyāna (The Battle as Sacrifice): Ambarīṣa–Indra Saṃvāda
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Upa-Parva (राजधर्मानुशासन उपपर्व)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to specify the destinations (lokas) attained by courageous, non-retreating warriors who die while engaged. Bhīṣma introduces an ancient precedent: Ambarīṣa (Nābhāga), having reached the difficult-to-attain heaven, observes the exceptional ascent of his former commander Sudeva and questions Indra about the cause. Indra explains by mapping the battlefield onto a sacrificial system (yuddha as yajña): combatants become the consecrated participants, weapons and blood are analogized to ladles and oblations, and battlefield sounds are likened to sāman chants. The text then provides evaluative criteria: one who advances for the leader’s cause without turning back attains Indra-like realms; one who retreats in terror and is slain reaches an unstable hellish state. It also articulates constraints and exclusions—certain protected persons are not to be harmed—while affirming that mourning rites are not framed as obligatory for the fallen steadfast warrior, who is said to be honored in heaven. The chapter closes with Bhīṣma noting Ambarīṣa’s acceptance of the doctrine concerning warriors’ attainment.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से पूछते हैं—जो शूरवीर शत्रु के सामने डटकर युद्ध करते हैं और पीठ नहीं दिखाते, वे रणभूमि में मारे जाकर किन लोकों को प्राप्त होते हैं? → भीष्म इस प्रश्न को केवल सिद्धान्त से नहीं, एक पुरातन आख्यान से खोलते हैं—नाभागि अम्बरीष और इन्द्र (शक्र) का संवाद। अम्बरीष दुर्लभ स्वर्ग में जाकर इन्द्र के समीप सेनापति-सहित दिव्य वैभव देखता है और यह जानने को व्याकुल होता है कि यह तेज, ऋद्धि और पद किस कर्म-फल से प्राप्त हुआ। → इन्द्र अम्बरीष को प्रत्यक्ष कर्म-फल का रहस्य सुनाते हैं—धर्मपूर्वक पृथ्वी-पालन, युद्धधर्म का पालन, और रण में अडिग रहकर प्राण देना स्वर्गीय सिद्धि का द्वार है; रणभूमि में गिरे वीरों की ओर अप्सराएँ ‘मम भर्ता भवेत्’ कहकर दौड़ती हैं—यह वीरगति की स्वर्गीय स्वीकृति का चरम चित्र बनता है। → इन्द्र-वचन सुनकर अम्बरीष योद्धाओं की ‘आत्म-सिद्धि’ (वीरगति का फल) को स्वीकार करता है और भीष्म युधिष्ठिर को निष्कर्ष देते हैं कि जो युद्ध में धर्म से स्थित रहकर, भय-त्याग कर, पीठ न दिखाकर प्राण देता है, वह उच्च लोकों को प्राप्त होता है। → युद्धधर्म को ‘तप, पुण्य, सनातनधर्म और चारों आश्रमों के तुल्य’ बताने के बाद यह संकेत रह जाता है कि किन शर्तों में युद्धधर्म अधर्म बन जाता है—और उस सीमा-रेखा का निर्णय आगे के उपदेशों में खुलता है।
Verse 1
युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो शूरवीर शत्रुके साथ डटकर युद्ध करते हैं और कभी पीठ नहीं दिखाते, वे समरांगणमें मृत्युको प्राप्त होकर किन लोकोंमें जाते हैं, यह मुझे बताइये
युधिष्ठिर ने पूछा—पितामह! जो शूरवीर शत्रु के साथ सम्मुख होकर डटकर युद्ध करते हैं और कभी पीठ नहीं दिखाते, वे रणभूमि में मृत्यु पाकर किन लोकों में जाते हैं? यह मुझे बताइए।
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अम्बरीषस्य संवादमिन्द्रस्थय च युधिष्ठिर,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठि!! इस विषयमें अम्बरीष और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
भीष्म ने कहा—युधिष्ठिर! इस विषय में भी एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है—अम्बरीष और इन्द्र का संवाद।
Verse 3
अम्बरीषो हि नाभागि: स्वर्ग गत्वा सुदुर्लभम् । ददर्श सुरलोकस्थं शक्रेण सचिवं सह,नाभागपुत्र अम्बरीषने अत्यन्त दुर्लभ स्वर्गलोकमें जाकर देखा कि उनका सेनापति देवलोकमें इन्द्रके साथ विराजमान है
भीष्म ने कहा—नाभागपुत्र अम्बरीष अत्यन्त दुर्लभ स्वर्गलोक में जाकर देवताओं के लोक में स्थित, शक्र (इन्द्र) के साथ बैठे हुए अपने (सेनापति/सचिव) को देखे।
Verse 4
सर्वतेजोमयं दिव्यं विमानवरमास्थितम् | उपर्युपरि गच्छन्तं स्वं वै सेनापतिं प्रभुम्,वह सम्पूर्णत: तेजस्वी, दिव्य एवं श्रेष्ठ विमानपर बैठकर ऊपर-ऊपर चला जा रहा था। अपने शक्तिशाली सेनापतिको अपनेसे भी ऊपर होकर जाते देख सुदेवकी उस समृद्धिका प्रत्यक्ष दर्शन करके उदारबुद्धि राजा अम्बरीष आश्चर्यसे चकित हो उठे और इन्द्रदेवसे बोले
भीष्म ने कहा—सम्पूर्ण तेज से निर्मित दिव्य श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर वह उनका स्वामी सेनापति ऊपर-ऊपर जा रहा था। अपने से भी ऊपर अपने शक्तिशाली सेनापति को ऐसी समृद्धि में बढ़ते देख उदारबुद्धि राजा अम्बरीष विस्मित हो इन्द्र से बोले।
Verse 5
स दृष्टवोपरि गच्छन्तं सेनापतिमुदारधी: । ऋद्धि दृष्टवा सुदेवस्य विस्मित: प्राह वासवम्,वह सम्पूर्णत: तेजस्वी, दिव्य एवं श्रेष्ठ विमानपर बैठकर ऊपर-ऊपर चला जा रहा था। अपने शक्तिशाली सेनापतिको अपनेसे भी ऊपर होकर जाते देख सुदेवकी उस समृद्धिका प्रत्यक्ष दर्शन करके उदारबुद्धि राजा अम्बरीष आश्चर्यसे चकित हो उठे और इन्द्रदेवसे बोले
भीष्म ने कहा—उदारबुद्धि राजा अम्बरीष ने अपने सेनापति को अपने से ऊपर जाते देखा और सुदेव की उस अद्भुत ऋद्धि-समृद्धि को देखकर विस्मित होकर वासव (इन्द्र) से कहा।
Verse 6
अमग्बरीष उवाच सागरान्तां महीं कृत्स्नामनुशास्य यथाविधि । चातुर्वण्यें यथाशास्त्र प्रवृत्ती धर्मकाम्यया,अम्बरीषने पूछा--देवराज! मैं समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका विधिपूर्वक शासन और संरक्षण करता था। शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार धर्मकी कामनासे चारों वर्णोके पालनमें तत्पर रहता था
अम्बरीष ने कहा—देवराज! मैं समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वी का यथाविधि शासन-रक्षण करता था और शास्त्रानुसार धर्म की कामना से चातुर्वर्ण्य के कर्तव्यों में प्रवृत्त रहता था।
Verse 7
ब्रह्मचर्येण घोरेण गुर्वाचारेण सेवया । वेदानधीत्य धर्मेण राजशास्त्रं च केवलम्
अम्बरीष ने कहा—घोर ब्रह्मचर्य, गुरु के प्रति उचित आचार और सेवा के द्वारा; धर्मानुसार वेदों का अध्ययन करके तथा केवल राजशास्त्र भी सीखकर (मैंने शिक्षा पाई)।
Verse 8
मैंने घोर ब्रह्मचर्यका पालन करके गुरुके बताये हुए आचार और गुरुकी सेवाके द्वारा धर्मपूर्वक वेदोंका अध्ययन किया तथा राजशास्त्रकी विशेष शिक्षा प्राप्त की ।। अतिथीनन्नपानेन पितृश्न स्वधया तथा । ऋषीन् स्वाध्यायदीक्षाभिददेवान् यज्ैरनुत्तमै:,सदा ही अन्न-पान देकर अतिथियोंका, श्राद्धकर्म करके पितरोंका, स्वाध्यायकी दीक्षा लेकर ऋषियोंका तथा उत्तमोत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका पूजन किया
अम्बरीष बोले—मैंने घोर ब्रह्मचर्य का पालन किया, गुरु के बताए हुए आचार में स्थित रहकर गुरु की सेवा की; इस प्रकार धर्मपूर्वक वेदों का अध्ययन किया और राजशास्त्र की विशेष शिक्षा भी प्राप्त की। मैं अतिथियों को अन्न-पान देकर तृप्त करता था, पितरों को विधिपूर्वक स्वधा सहित श्राद्ध से संतुष्ट करता था, ऋषियों का स्वाध्याय-संबंधी दीक्षा-व्रतों द्वारा आदर करता था और देवताओं की पूजा उत्तमोत्तम यज्ञों के अनुष्ठान से करता था।
Verse 9
क्षत्रधर्मे स्थितो भूत्वा यथाशास्त्रं यथाविधि । उदीक्षमाण: पृतनां जयामि युधि वासव,देवेन्द्र! मैं शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्षत्रिय-धर्ममें स्थित होकर सेनाकी देख-भाल करता और युद्धमें शत्रुओंपर विजय पाता था
अम्बरीष बोले—देवेन्द्र वासव! मैं क्षत्रिय-धर्म में स्थित होकर, शास्त्र और विधि के अनुसार सेना की देख-भाल करता था और युद्ध में शत्रुओं पर विजय पाता था।
Verse 10
देवराज सुदेवो5यं मम सेनापति: पुरा । आसीदू योध: प्रशान्तात्मा सो5यं कस्मादतीव माम्,देवराज! यह सुदेव पहले मेरा सेनापति था। शान्त स्वभावका एक सैनिक था; फिर यह मुझे लाँचकर कैसे जा रहा है?
अम्बरीष बोले—देवराज! यह सुदेव पहले मेरा सेनापति था—शान्त स्वभाव का अनुशासित योद्धा। फिर यह आज मुझे इस प्रकार पूर्णतः त्यागकर कैसे चला जा रहा है, देवराज?
Verse 11
अनेन क्रतुभिमर्ुख्यै्नेष्टं नापि द्विजातय: । तर्पिता विधिवच्छक्र सोडयं कस्मादतीव माम्,(ऐश्वर्यमीदृशं प्राप्त: सर्वदेवै: सुदुर्लभम् इन्द्रदेव! इसने न तो बड़े-बड़े यज्ञ किये और न विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको ही तृप्त किया। वही यह सुदेव आज मुझको लाँधघकर ऊपर-ऊपरसे कैसे जा रहा है? इसे ऐसा ऐश्वर्य कहाँसे प्राप्त हो गया, जो सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है?
अम्बरीष बोले—हे शक्र! इसने न तो प्रधान-प्रधान यज्ञ किए हैं, न ही विधिपूर्वक द्विजों को तृप्त किया है। फिर यह आज मुझे इतना अधिक कैसे लाँघ रहा है? इसे ऐसा ऐश्वर्य कहाँ से मिला, जो समस्त देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है?
Verse 12
शक्र उवाच यदनेन कृतं कर्म प्रत्यक्ष ते महीपते ।। पुरा पालयत: सम्यक् पृथिवीं धर्मतो नृप । इन्द्रने कहा--पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! पूर्वकालमें जब आप धर्मके अनुसार भलीभाँति इस पृथ्वीका पालन कर रहे थे, उस समय सुदेवने जो पराक्रम किया था, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा था ।। शत्रवो निर्जिता: सर्वे ये तवाहितकारिण: ।। संयमो वियमश्चैव सुयमश्न महाबल: । राक्षसा दुर्जया लोके त्रयस्ते युद्धदुर्मदा: । पुत्रास्ते शतशुड्गस्य राक्षसस्य महीपते ।। महीपाल! उन दिनों आपके तीन शत्रु थे--संयम, वियम और महाबली सुयम। वे सब- के-सब आपका अहित करनेवाले थे। वे शतशूंग नामक राक्षसके पुत्र थे। लोकोंमें किसीके लिये भी उन तीनों रणदुर्मद राक्षसरोंपर विजय पाना कठिन था। सुदेवने उन सबको परास्त कर दिया था ।। अथ तस्मिन् शुभे काले तव यज्ञ वितन्वत: । अश्वमेधं महायागं देवानां हितकाम्यया । तस्य ते खलु विधघ्नार्थ आगता राक्षसास्त्रय: ।। एक समय जब आप देवताओंके हितकी इच्छासे शुभ मुहूर्तमें अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे, उन्हीं दिनों आपके उस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये वे तीनों राक्षस वहाँ आ पहुँचे ।। कोटीशतपरीवारां राक्षसानां महाचमूम् | परिगृह्य तत: सर्वा: प्रजा बन्दीकृतास्तव ।। विह्वलाश्ष प्रजा: सर्वा: सर्वे च तव सैनिका: । उन्होंने सौ करोड़ राक्षसोंकी विशाल सेना साथ लेकर आक्रमण किया और आपकी समस्त प्रजाओंको पकड़कर बंदी बना लिया। उस समय आपकी समस्त प्रजा और सारे सैनिक व्याकुल हो उठे थे ।। निराकृतस्त्वया चासीत् सुदेव: सैन्यनायक: । तत्रामात्यवच: श्र॒ुत्वा निरस्त: सर्वकर्मसु ।। उन दिनों सेनापतिके विरुद्ध मन्त्रीकी बात सुनकर आपने सेनापति सुदेवको अधिकारसे वंचित करके सब कार्योसे अलग कर दिया था ।। श्रुत्वा तेषां वचो भूय: सोपधं वसुधाधिप । सर्वसैन्यसमायुक्त: सुदेव: प्रेरितस्त्वया ।। राक्षसानां वधार्थाय दुर्जयानां नराधिप । पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! फिर उन्हीं मन्त्रियोंकी कपटपूर्ण बात सुनकर आपने उन दुर्जय राक्षसोंके वधके लिये सेनासहित सुदेवको युद्धमें जानेकी आज्ञा दे दी ।। नाजित्वा राक्षसीं सेनां पुनरागमनं तव ।। बन्दीमोक्षमकृत्वा च न चागमनमिष्यते । और जाते समय यह कहा--'राक्षसोंकी सेनाको पराजित करके उनके कैदमें पड़ी हुई प्रजा और सैनिकोंका उद्धार किये बिना तुम यहाँ लौटकर मत आना” ।। सुदेवस्तद्वचः श्र॒त्वा प्रसथ्थानमकरोन्नूप ।। सम्प्राप्तश्न स तं॑ देशं यत्र बन्दीकृता: प्रजा: । पश्यति सम महाघोरां राक्षसानां महाचमूम् ।। नरेश्वरर! आपकी वह बात सुनकर सुदेवने तुरंत ही प्रस्थान किया और वह उस स्थानपर गया, जहाँ आपकी प्रजा बंदी बना ली गयी थी। उसने वहाँ राक्षसोंकी महाभयंकर विशाल सेना देखी ।। दृष्टवा संचिन्तयामास सुदेवो वाहिनीपति: । नेयं शक््या चमूर्जेतुमपि सेन्द्रेः सुरासुरैः ।। नाम्बरीष: कलामेकामेषां क्षपयितु क्षम: । दिव्यास्त्रबलभूयिष्ठ: किमहं पुनरीदृश:ः ।। उसे देखकर सेनापति सुदेवने सोचा कि यह विशाल वाहिनी तो इन्द्र आदि देवताओं तथा असुरोंसे भी नहीं जीती जा सकती। महाराज अम्बरीष दिव्य अस्त्र एवं दिव्य बलसे सम्पन्न हैं, परंतु वे इस सेनाके सोलहवें भागका भी संहार करनेमें समर्थ नहीं हैं। जब उनकी यह दशा है, तब मेरे-जैसा साधारण सैनिक इस सेनापर कैसे विजय पा सकता है? ।। ततः सेनां पुनः सर्वा प्रेषयामास पार्थिव । यत्र त्वं सहितः सर्वर्मन्त्रिभि: सोपधैर्न॒प ।। राजन्! यह सोचकर सुदेवने फिर सारी सेनाको वहीं वापस भेज दिया, जहाँ आप उन समस्त कपटी मन्त्रियोंके साथ विराजमान थे ।। ततो रुद्रं महादेवं प्रपन्नो जगत: प्रतिम् । श्मशाननिलयं देवं तुष्टाव वृषभध्वजम् ।। तदनन्तर सुदेवने श्मशानवासी महादेव जगदीश्वर रुद्रदेवकी शरण ली और उन भगवान् वृषभध्वजका स्तवन किया ।। स्तुत्वा शस्त्र समादाय स्वशिरश्छेत्तुमुद्यत: । कारुण्याद् देवदेवेन गृहीतस्तस्य दक्षिण: ।। सपाणि: सह शस्त्रेण दृष्टवा चेदमुवाच ह । स्तुति करके वह खड़्ग हाथमें लेकर अपना सिर काटनेको उद्यत हो गया। तब देवाधिदेव महादेवने करुणावश सुदेवका वह खड़्गसहित दाहिना हाथ पकड़ लिया और उसकी ओर स्नेहपूर्वक देखकर इस प्रकार कहा ।। रुद्र उवगाच किमिदं साहसं पुत्र कर्तुकामो वदस्व मे । रुद्र बोले--पुत्र! तुम ऐसा साहस क्यों करना चाहते हो? मुझसे कहो ।। इन्द्र रवाच स उवाच महादेवं शिरसा त्ववनीं गतः ।। भगवन् वाहिनीमेनां राक्षसानां सुरेश्वर । अशक्तोऊहं रणे जेतुं तस्मात् त्यक्ष्यामि जीवितम् ।। गतिर्भव महादेव ममार्तस्य जगत्पते । नागन्तव्यमजित्वा च मामाह जगतीपति: ।। अम्बरीषो महादेव क्षारित: सचिवै: सह । तमुवाच महादेव: सुदेव॑ पतितं क्षितौ । अधोमुखं महात्मानं सत्त्वानां हितकाम्यया ।। धनुर्वेदे समाहूय सगुणं सहविग्रहम् । रथनागाश्व॒कलिल दिव्यास्त्रसमलंकृतम् ।। रथं च सुमहाभागं येन तत् त्रिपुरं हतम् । धनु: पिनाकं खडगं च रौद्रमस्त्रं च शड्कर: ।। निजघानासुरान् सर्वान् येन देवस्त्रयम्बक: । उवाच च महादेव: सुदेवं वाहिनीपतिम् ।। इन्द्र कहते हैं--राजन्! तब सुदेवने महादेवजीको पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा--'भगवन! सुरेश्वर! मैं इस राक्षस सेनाको युद्धमें नहीं जीत सकता; इसलिये इस जीवनको त्याग देना चाहता हूँ। महादेव! जगत्पते! आप मुझ आर्तको शरण दें। मन्त्रियोंसहित महाराज अम्बरीष मुझपर कुपित हुए बैठे हैं। उन्होंने स्पष्टरूपसे आज्ञा दी है कि इस सेनाको पराजित किये बिना तुम लौटकर न आना।' तब महादेवजीने पृथ्वीपर नीचे मुख किये पड़े हुए महामना सुदेवसे समस्त प्राणियोंके हितकी कामनासे कुछ कहनेकी इच्छा की। पहले उन्होंने गुण और शरीरसहित धनुर्वेदको बुलाकर रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई सेनाका आवाहन किया, जो दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंसे विभूषित थी। इसके बाद उन्होंने उस महान् भाग्यशाली रथको भी वहाँ उपस्थित कर दिया, जिससे उन्होंने त्रिपुरका नाश किया था। फिर पिनाक नामक धनुष, अपना खड्ग तथा अस्त्र भी भगवान् शंकरने दे दिया, जिसके द्वारा उन भगवान् त्रिलोचनने समस्त असुरोंका संहार किया था। तदनन्तर महादेवजीने सेनापति सुदेवसे इस प्रकार कहा ।। रुद्र उ्वाच रथादस्मात् सुदेव त्वं दुर्जयस्तु सुरासुरै: । मायया मोहितो भूमौ न पद कर्तुमरहसि ।। अत्रस्थस्त्रिदशान् सर्वान् जेष्यसे सर्वदानवान् | राक्षसाश्न पिशाचाश्व न शक्ता द्रष्टमीदृशम् ।। रथ॑ सूर्यसहस््राभं किमु योद्धं त्वया सह | रुद्र बोले--सुदेव! तुम इस रथके कारण देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हो गये हो, परंतु किसी मायासे मोहित होकर अपना पैर पृथ्वीपर न रख देना। इसपर बैठे रहोगे तो समस्त देवताओं और दानवोंको जीत लोगे। यह रथ सहस्रों सूर्योके समान तेजस्वी है। राक्षत और पिशाच ऐसे तेजस्वी रथकी ओर देख भी नहीं सकते; फिर तुम्हारे साथ युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? ।। इन्द्र उवाच स जित्वा राक्षसान् सर्वान् कृत्वा बन्दीविमोक्षणम् | घातयित्वा च तान् सर्वान् बाहुयुद्धेत्वयं हतः । वियमं प्राप्प भूपाल वियमश्न निपातित: ।।) इन्द्र कहते हैं--राजन्! तत्पश्चात् सुदेवने उस रथके द्वारा समस्त राक्षसोंको जीतकर बंदी प्रजाओंको बन्धनसे छुड़ा दिया और समस्त शत्रुओंका संहार करके वियमके साथ बाहुयुद्ध करते समय स्वयं भी मारा गया, साथ ही इसने उस युद्धमें वियमको भी मार डाला ।। इन्द्र उवाच एतस्य विततस्तात सुदेवस्य बभूव ह । संग्रामयज्ञ: सुमहान् यश्चान्यो युद्धयते नर:,इन्द्र बोले--तात! इस सुदेवने बड़े विस्तारके साथ महान् रणयज्ञ सम्पन्न किया था। दूसरा भी जो मनुष्य युद्ध करता है, उसके द्वारा इसी तरह संग्राम-यज्ञ सम्पादित होता है
शक्र बोले—पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! पूर्वकाल में जब आप धर्म के अनुसार भलीभाँति पृथ्वी का पालन कर रहे थे, तब सुदेव ने जो कर्म किया था, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा था।
Verse 13
संनद्धो दीक्षित: सर्वो योध: प्राप्प चमूमुखम् । युद्धयज्ञाधिकारस्थो भवतीति विनिश्चय:,कवच धारण करके युद्धकी दीक्षा लेनेवाला प्रत्येक योद्धा सेनाके मुहानेपर जाकर इसी प्रकार संग्रामयज्ञका अधिकारी होता है। यह मेरा निश्चित मत है
जो योद्धा कवच धारण कर युद्ध-दीक्षा ले चुका हो, वह सेना के अग्रभाग पर पहुँचकर संग्राम-यज्ञ का अधिकारी हो जाता है—यह मेरा निश्चित मत है।
Verse 14
अम्बरीष उवाच कानि यज्ञे हवींष्यस्मिन् किमाज्यं का च दक्षिणा । ऋषच्विजजश्षात्र के प्रोक्तास्तन्मे ब्रूहि शतक्रतो,अम्बरीषने पूछा--शतक्रतो! इस रणयज्ञमें कौन-सा हविष्य है? क्या घृत है? कौन- सी दक्षिणा है और इसमें कौन-कौन-से ऋत्विज् बताये गये हैं? यह मुझसे कहिये
अम्बरीष ने पूछा—शतक्रतो! इस रणयज्ञ में कौन-सा हविष्य है? क्या घृत है? कौन-सी दक्षिणा है? और इसमें कौन-कौन से ऋत्विज् बताए गए हैं? यह मुझे बताइए।
Verse 15
इन्द्र रवाच ऋषत्विज: कुण्जरास्तत्र वाजिनो<थ्वर्यवस्तथा । हवींषि परमांसानि रुधिरं त्वाज्यमुच्यते,इन्द्रने कहा--राजन्! इस युद्धयज्ञमें हाथी ही ऋत्विज् हैं, घोड़े अध्वर्यु हैं, शत्रुओंका मांस ही हविष्य है और उनके रक्तको ही घृत कहा जाता है
इन्द्र ने कहा—राजन्! इस युद्धयज्ञ में हाथी ही ऋत्विज् हैं, घोड़े अध्वर्यु हैं; शत्रुओं का मांस ही हविष्य है और उनका रक्त ही घृत कहा जाता है।
Verse 16
शृगालगृभ्रकाकोला: सदस्यास्तत्र पत्रिण: | आज्यशेषं पिबन्त्येते हवि: प्राश्नन्ति चाध्वरे,सियार, गीध, कौए तथा अन्य मांसभक्षी पक्षी उस यज्ञशालाके सदस्य हैं, जो यज्ञावशिष्ट घृत (रक्त) को पीते और उस यज्ञमें अर्पित हविष्य (मांस) को खाते हैं
सियार, गीध, कौए तथा अन्य मांसभक्षी पक्षी उस यज्ञ के सदस्य हैं; वे यज्ञावशिष्ट घृत (रक्त) पीते हैं और उस अध्वर में अर्पित हविष्य (मांस) खाते हैं।
Verse 17
प्रासतोमरसंघाता: खड्गशक्तिपरश्चधा: । ज्वलन्तो निशिता: पीता: खुचस्तस्याथ सत्रिण:,प्रास, तोमरसमूह, खड्ग, शक्ति, फरसे आदि चमचमाते हुए तीखे और पानीदार शस्त्र यज्ञकर्ताके लिये खुक॒का काम देते हैं
प्रास, तोमर-समूह, खड्ग, शक्ति, फरसे आदि—चमकते, तीखे और रक्तरंजित—उस यज्ञकर्ता के लिए मानो खुक्का (निरुपद्रव उपकरण) बन जाते हैं।
Verse 18
चापवेगायतस्ती क्षण: परकायावभेदन: । ऋणजु: सुनिशित: पीत: सायकश्न स्रुवो महान्,धनुषके वेगसे दूरतक जानेके कारण जो विशाल आकार धारण करता है, वह शत्रुके शरीरको विदीर्ण करनेवाला तीखा, सीधा, पैना और पानीदार बाण ही यजमानके हाथमें स्थित महान् ख्रुव है
अम्बरीष ने कहा—यजमान के हाथ में स्थित महान् शृव (हविष्य-लड्ढा) वास्तव में बाण के समान है—धनुष के वेग से खिंचा हुआ, सीधा, अत्यन्त तीक्ष्ण, पैना और हवि से ‘पीता’ हुआ; वह शत्रु के शरीर को विदीर्ण करने में समर्थ है।
Verse 19
दीपिचर्मावनद्धश्न नागदन्तकृतत्सरु: । हस्तिहस्तहर: खड्ग: स्फ्यो भवेत् तस्य संयुगे,जो व्याप्रचर्मकी म्यानमें बँधा रहता है, जिसकी मूँठ हाथीके दाँतकी बनी होती है तथा जो गजराजोंके शुण्डदण्डको काट लेता है, वह खड़्ग उस युद्धमें स्फ्यका काम देता है
अम्बरीष ने कहा—जो खड्ग चीते के चर्म की म्यान में बँधा हो, जिसकी मूठ हाथी-दाँत की बनी हो, और जो गजराज की सूँड़ तक काट दे—वही उस युद्ध में उसके लिए स्फ्य (रक्षा-उपकरण) के समान होता है।
Verse 20
ज्वलितैर्निशितै: प्रासशक््त्यूष्टिसपरश्वधै: । शैक्यायसमयैस्ती क्ष्णरभिघातो भवेद् वसु
अम्बरीष ने कहा—हे वसु! पत्थर और लोहे से बने, ज्वलित और अत्यन्त नुकीले प्रास, शक्ति, उष्टि तथा परश्वधों से एक तीव्र, काटनेवाला प्रहार उठ खड़ा होता है।
Verse 21
आवेगाद्ू यच्च रुधिरं संग्रामे स्रवते भुवि
अम्बरीष ने कहा—और संग्राम में वेग के कारण जो रक्त बहकर पृथ्वी पर फैलता है…
Verse 22
छिन्धि भिन्धीति य: शब्द: श्रूयते वाहिनीमुखे,सेनाके मुहानेपर जो “काट डालो', फाड़ डालो' आदिका भयंकर शब्द सुना जाता है, वही सामगान है। सैनिकरूपी सामगायक शत्रुओंको यमलोकमें भेजनेके लिये मानो सामगान करते हैं। शत्रुओंकी सेनाका प्रमुख भाग उस वीर यजमानके लिये हविर्धान (हविष्य रखनेका पात्र) बताया गया है
अम्बरीष ने कहा—सेना के मुहाने पर जो “छिन्न करो, भिन्न करो” का शब्द सुनाई देता है, वही तो सामगान है। मानो सामगायक-रूप सैनिक शत्रुओं को यमलोक भेजने के लिए साम गा रहे हों। और उस वीर यजमान के लिए शत्रु-सेना का अग्रभाग ही हविर्धान (हविष्य रखने का पात्र) कहा गया है।
Verse 23
सामानि सामगास्तस्य गायन्ति यमसादने । हविर्धान॑ तु तस्याहुः परेषां वाहिनीमुखम्,सेनाके मुहानेपर जो “काट डालो', फाड़ डालो' आदिका भयंकर शब्द सुना जाता है, वही सामगान है। सैनिकरूपी सामगायक शत्रुओंको यमलोकमें भेजनेके लिये मानो सामगान करते हैं। शत्रुओंकी सेनाका प्रमुख भाग उस वीर यजमानके लिये हविर्धान (हविष्य रखनेका पात्र) बताया गया है
अम्बरीष बोले— उसके लिये यमलोक में सामगान गाया जाता है; अर्थात् रणभूमि में जो “काट डालो, फाड़ डालो” जैसे भयानक शब्द उठते हैं, वही उसके साम हैं। वे सैनिक मानो सामगायक बनकर शत्रुओं को यमधाम भेजने के लिये गाते हैं। और शत्रु-सेना का अग्रभाग—उसका मुख—उस वीर यजमान के लिये हविर्धान, अर्थात् हवि रखने का पात्र कहा गया है।
Verse 24
कुज्जराणां हयानां च वर्मिणां च समुच्चय: । अग्नि: श्येनचितो नाम स च यज्ञे विधीयते,हाथी, घोड़े और कवचधारी वीर पुरुषोंके समूह ही उस युद्धयज्ञके श्येनचित नामक अन्नि हैं
अम्बरीष बोले— हाथियों, घोड़ों और कवचधारी वीरों का जो घना समूह है, वही ‘श्येनचित’ नामक अग्नि है; और वही इस यज्ञ में नियत की जाती है।
Verse 25
उत्तिष्ठते कबन्धो5त्र सहस्ने निहते तु यः । स यूपस्तस्य शूरस्य खादिरोडष्टास्नरिरुच्यते,सहसीरों वीरोंके मारे जानेपर जो कबन्ध खड़े दिखायी देते हैं, वे ही मानो उस शूरवीरके यज्ञमें खदिरकाष्ठके बने हुए आठ कोणवाले यूप कहे गये हैं
अम्बरीष बोले— यहाँ जब सहस्रों मारे जाते हैं, तब जो धड़ (कबन्ध) खड़े दिखाई देते हैं, वे उस शूरवीर के यज्ञ में खदिर-काष्ठ के बने आठ-कोण वाले यूप के समान कहे गये हैं।
Verse 26
इडोपहूता: क्रोशन्ति कुञ्जरास्त्वंकुशेरिता: । व्याघुष्टतलनादेन वषट्कारेण पार्थिव
अम्बरीष बोले— हे पार्थिव! इडा के आह्वान से बुलाए गये और अंकुश से हाँके गये हाथी चीत्कार करते हैं; और हथेलियों के प्रहार की गूँज तथा ‘वषट्’ के उच्चारण के साथ सारा दृश्य कोलाहल से भर उठता है।
Verse 27
ब्रह्मस्वे ह्वियमाणे तु त्यक्त्वा युद्धे प्रियां तनुम्ू
अम्बरीष बोले— जब ब्रह्मस्व (ब्रह्मधर्म का धन और कर्तव्य) के लिये आह्वान हो, तब युद्ध में प्रिय देह का भी त्याग कर देना चाहिए।
Verse 28
भर्तुरर्थे च यः शूरो विक्रमेद् वाहिनीमुखे
अम्बरीष ने कहा—जो वीर अपने स्वामी के हित के लिए सेना के अग्रभाग में पराक्रमपूर्वक बढ़ता है, वही निष्ठापूर्ण सेवा और धर्मनिष्ठ संकल्प का चिह्न है।
Verse 29
नीलचर्मावृतै: खड्गैर्बाहुभि: परिघोपमै:
अम्बरीष ने उन योद्धाओं का वर्णन किया जिनकी भुजाएँ लोहे के परिघ के समान हैं और जो काले चमड़े से मढ़ी म्यानों वाले खड्ग धारण करते हैं—यह रूप उनकी भयानक युद्ध-तत्परता और प्रचण्ड बल का द्योतक है।
Verse 30
यस्तु नापेक्षते कंचित् सहायं विजये स्थित:
अम्बरीष ने कहा—पर जो विजय की स्थिति में भी किसी का सहारा नहीं देखता, किसी पर निर्भर नहीं होता और किसी सहायक की चाह नहीं रखता—उसमें आत्मनिर्भरता के साथ ऐसा स्वभाव प्रकट होता है जो सहज ही गर्व और धर्मसम्मत परामर्श से दूरी की ओर ढल सकता है।
Verse 31
विगाहा[ वाहिनीमध्यं तस्य लोका यथा मम । जो विजयके लिये युद्धमें डटा रहकर शत्रुकी सेनामें घुस जाता है और दूसरे किसी भी सहायककी अपेक्षा नहीं रखता, उसे मेरे समान ही लोक प्राप्त होते हैं ।। यस्य शोणितसंघाता भेरीमण्ड्रककच्छपा,नदी योधस्य संग्रामे तदस्याव भृथं स्मृतम् । जिस योद्धाके युद्धरूपी यज्ञमें रक्तकी नदी प्रवाहित होती है, उसके लिये वह अवभृथस्नानके समान पुण्यजनक है। रक्त ही उस नदीकी जलराशि है, नगाड़े ही मेढक और कछुओंके समान हैं, वीरोंकी हड्डियाँ ही छोटे-छोटे कंकड़ और बालूके समान हैं, उसमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन है, मांस और रक्त ही उस नदीकी कीच हैं, ढाल और तलवार ही उसमें नौकाके समान हैं, वह भयानक नदी केशरूपी सेवार और घाससे ढकी हुई है। कटे हुए घोड़े, हाथी और रथ ही उसमें उतरनेके लिये सीढ़ी हैं, ध्वजा-पताका तटवर्ती बेंतकी लताके समान हैं, मारे गये हाथियोंको भी वह बहा ले जानेवाली है, रक्तरूपी जलसे वह लबालब भरी है, पार जानेकी इच्छावाले मनुष्योंके लिये वह अत्यन्त दुस्तर है, मरे हुए हाथी बड़े-बड़े मगरमच्छके समान हैं, वह परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली नदी अमंगलमयी प्रतीत होती है, ऋष्टि और खड़ग--ये उससे पार होनेके लिये विशाल नौकाके समान हैं। गीध-कंक और काक छोटी-छोटी नौकाओंके समान हैं, उसके आस-पास राक्षस विचरते हैं तथा वह भीरु पुरुषोंको मोहमें डालनेवाली है
अम्बरीष ने कहा—जो विजय के लिए युद्ध में डटा रहकर शत्रु-सेना के मध्य में घुस जाता है और किसी अन्य सहायक की अपेक्षा नहीं रखता, वह मेरे समान लोक प्राप्त करता है। और जिस योद्धा के युद्धरूपी यज्ञ में रक्त की नदी बहती है—जहाँ नगाड़े मेढक और कछुओं के समान हैं—उसके लिए उस भयानक धारा में उतरना अवभृथ-स्नान, अर्थात् यज्ञ की अंतिम पवित्र डुबकी के समान माना जाता है।
Verse 32
वीरास्थिशर्करा दुर्गा मांसशोणितकर्दमा । असिचर्मप्लवा घोरा केशशैवलशाद्धला
अम्बरीष ने उस भयानक दृश्य का वर्णन किया—जहाँ दुर्ग की कंकरीट वीरों की हड्डियाँ हैं, कीचड़ मांस और रक्त है, और तलवारों व चर्मों के बेड़े ही पार लगाने का साधन हैं। वह घोर और मलिन है; केशरूपी शैवाल से अटी पड़ी है और अपवित्र थक्कों से भरी हुई—यह चित्र हिंसा और उसके विनाश के प्रति घृणा जगाने के लिए है।
Verse 33
अश्वनागरथैश्वैव संच्छिन्नै: कृतसंक्रमा । पताकाध्वजवानीरा हतवारणवाहिनी
अम्बरीष ने कहा—घोड़े, हाथी और रथ कट-फटकर चूर हो गए; सेना की सुव्यवस्थित चढ़ाइयाँ और पार-उतार टूट गए। ध्वज-पताकाएँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं और गजरथ-दल नष्ट हो चुका था।
Verse 34
शोणितोदा सुसम्पूर्णा दुस्तरा पारगैनरि: । हतनागमहानक्रा परलोकवहाशिवा
अम्बरीष ने कहा—रक्त-जल वाली वह नदी पूरी तरह भरी हुई है; घाट जानने वालों के लिए भी उसे पार करना कठिन है। उसमें महान् मगरमच्छ हैं, मरे हुए हाथी बिखरे पड़े हैं; वह प्राणियों को परलोक की ओर बहा ले जाती है—फिर भी (अपने भयावह कर्म में) उसे ‘शिवा’ अर्थात् ‘मंगलमयी’ कहा जाता है।
Verse 35
ऋष्टिखड्गमहानौका गृध्रकड्कबलप्लवा । पुरुषादानुचरिता भीरूणां कश्मलावहा
अम्बरीष ने कहा—यह महान् ‘नौका’ भालों और खड्गों से बनी है; इसके बेड़े गिद्ध-सदृश कठोर दलों से रचे गए हैं। इसे नरभक्षी अनुचर चलाते हैं, और यह कायरों के लिए मोह तथा धर्म-संकट का कारण बनती है।
Verse 36
वेदिर्यस्य त्वमित्राणां शिरोभ्यश्न प्रकीर्यते
अम्बरीष ने कहा—तुम शत्रुओं के लिए यज्ञ-वेदी हो; उन वैरियों के सिरों पर तुम इस प्रकार बिखेरे और ढेर किए जाते हो, मानो उनके पतन का ही अनुष्ठान संपन्न हो रहा हो।
Verse 37
पत्नीशाला कृता यस्य परेषां वाहिनीमुखम्
अम्बरीष ने कहा—जिसके लिए शत्रुओं की सेना का अग्रभाग ही ‘पत्नीशाला’ बना दिया जाए—अर्थात् जिसका रण-अग्रदल घरेलू आश्रय और भोग-विलास का स्थान बनकर रह जाए—वह नेतृत्व और धर्माचरण के कर्तव्यों में वास्तव में दृढ़ नहीं रह सकता।
Verse 38
हविर्धानं स्ववाहिन्यास्तदस्याहुर्मनीषिण: । जो वीर शत्रुसेना के मुहानेको पत्नीशाला बना लेता है, मनीषी पुरुष उसके लिये अपनी सेनाके प्रमुख भागको युद्ध-यज्ञके हवनीय पदार्थोंके रखनेका पात्र बताते हैं ।। सदस्या दक्षिणा योधा आग्नीथ्रश्नोत्तरां दिशम्
मनीषीजन कहते हैं कि इस युद्ध-यज्ञ में आहुति रखने का प्रधान पात्र अपनी ही सुव्यवस्थित सेना है। जो वीर शत्रुसेना के मुख को ही ‘पत्नीशाला’ बना देता है—अर्थात् अग्रभाग में शत्रु को तोड़कर अपमानित कर देता है—वही अपने पक्ष के लिए विजय-आहुतियों का मुख्य पात्र कहलाता है। योद्धा दक्षिणा हैं, सदस्य ऋत्विज हैं, और आग्नीध्र उत्तर दिशा में स्थित रहता है।
Verse 39
शत्रुसेनाकलत्रस्य सर्वलोका न दूरत: । जिस वीरके लिये दक्षिणदिशामें स्थित योद्धा सदस्य हैं, उत्तरदिशावर्ती योद्धा आग्नीध्र (ऋत्विक्) हैं एवं शत्रुसेना पत्नीस्वरूप है, उसके लिये समस्त पुण्यलोक दूर नहीं हैं ।। ३८ हे यदा तूभयतो व्यूहे भवत्याकाशमग्रत:
जिस वीर के लिए शत्रुसेना पत्नी के समान सदा सन्निकट रहती है, जिसके लिए दक्षिण दिशा के योद्धा सदस्य हैं और उत्तर दिशा के योद्धा आग्नीध्र (ऋत्विक) हैं—उसके लिए समस्त पुण्यलोक दूर नहीं रहते।
Verse 40
सास्य वेदिस्तदा यज्ञै्नित्यं वेदास्त्रयो5ग्नय: । जब अपनी सेना तथा शत्रुसेना एक-दूसरेके सामने व्यूह बनाकर उपस्थित होती है, उस समय दोनोंमेंसे जिसके सम्मुख केवल जनशून्य आकाश रह जाता है, वह निर्जन आकाश ही उस वीरके लिये युद्ध-यज्ञकी वेदी है। उस स्थानपर मानो सदा यज्ञ होता है तथा तीनों वेद और त्रिविध अग्नि सदा ही प्रतिष्ठित रहते हैं ।। यस्तु योध: परावृत्त: संत्रस्तो हन्यते परै:
जब अपनी सेना और शत्रुसेना आमने-सामने व्यूह रचकर खड़ी होती हैं, तब दोनों में से जिसके सम्मुख केवल जनशून्य आकाश रह जाता है, वही निर्जन आकाश उस वीर के लिए युद्ध-यज्ञ की वेदी है। वहाँ मानो नित्य यज्ञ होता रहता है और तीनों वेद तथा त्रिविध अग्नि सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। पर जो योद्धा भय से पीठ फेरता है, वह शत्रुओं द्वारा मारा जाता है।
Verse 41
यस्य शोणिततवेगेन वेदि: स्यात् सम्परिप्लुता
जिसके रक्त के प्रचण्ड वेग से वेदी सर्वथा जलमग्न हो जाए।
Verse 42
यस्तु सेनापतिं हत्वा तद्यानमधिरोहति
पर जो सेनापति को मारकर उसी के यान (रथ/वाहन) पर आरूढ़ होता है।
Verse 43
नायकं तत्कुमारं वा यो वा स्याद् यत्र पूजित:
चाहे वह नायक हो, वह राजकुमार हो, या वहाँ जो कोई भी पूजित/सम्मानित हो—
Verse 44
जीवग्राहं प्रगृह्लाति तस्थ लोका यथा मम । जो शत्रुपक्षेके सेनापति, उसके पुत्र अथवा उस पक्षके किसी भी सम्मानित वीरको जीते-जी पकड़ लेता है, उसको मेरे-जैसे लोक प्राप्त होते हैं ।। ४३ $ ।। आहवे तु हतं शूरं न शोचेत कथंचन
जो युद्ध में शत्रुपक्ष के सेनापति, उसके पुत्र अथवा उस पक्ष के किसी भी सम्मानित वीर को जीवित पकड़ लेता है, उसे मेरे समान लोक प्राप्त होते हैं। परन्तु रण में मारे गए शूरवीर के लिए किसी प्रकार का शोक न करे।
Verse 45
नहाजन्न॑नोदकं॑ तस्य न स्नानं नाप्पोशौचकम्
उसके लिए न स्नान का जल आवश्यक है, न स्नानकर्म, और न ही जल से शुद्धि।
Verse 46
वराप्सर:सहस्राणि शूरमायोधने हतम्
रणभूमि में मारे गए शूरवीर के लिए वरदानस्वरूप सहस्रों अप्सराएँ नियत हैं।
Verse 47
एतत् तपश्न पुण्यं च धर्मश्वैव सनातन:
यही तप है, यही पुण्य है, और यही सनातन धर्म है।
Verse 48
वृद्धबालौ न हन्तव्यौ न च स्त्री नैव पृछत:
वृद्ध और बालक का वध नहीं करना चाहिए; स्त्री को भी कदापि आघात न पहुँचाना चाहिए—ऐसे जन हिंसा के लक्ष्य नहीं हैं।
Verse 49
तृणपूर्णमुखश्चैव तवास्मीति च यो वदेत् । युद्धमें वृद्ध, बालक और स्त्रियोंका वध नहीं करना चाहिये, किसी भागते हुएकी पीठमें आघात नहीं करना चाहिये, जो मुँहमें तिनका लिये शरण में आ जाय और कहने लगे कि मैं आपका ही हूँ, उसका भी वध नहीं करना चाहिये || ४८ $ ।। जम्भं वृत्रं बलं पाकं शतमायं विरोचनम्,जम्भ, वृत्रासुर, बलासुर, पाकासुर, सैकड़ों माया जाननेवाले विरोचन, दुर्जय वीर नमुचि, विविधमायाविशारद शम्बरासुर, दैत्यवंशी विप्रचित्ति, सम्पूर्ण दानवदल तथा प्रह्नादको भी युद्धमें मारकर मैं देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुआ हूँ
जो मुँह में तिनका भरकर—शरणागति का संकेत देकर—कहे, ‘मैं आपका हूँ’, उसका भी वध नहीं करना चाहिए।
Verse 50
दुर्वार्य चैव नमुचिं नैकमायं च शम्बरम् | विप्रचित्तिं च दैतेयं दनोः पुत्रांश्व सर्वश: । प्रहादं च निहत्याजी ततो देवाधिपो5भवम्,जम्भ, वृत्रासुर, बलासुर, पाकासुर, सैकड़ों माया जाननेवाले विरोचन, दुर्जय वीर नमुचि, विविधमायाविशारद शम्बरासुर, दैत्यवंशी विप्रचित्ति, सम्पूर्ण दानवदल तथा प्रह्नादको भी युद्धमें मारकर मैं देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुआ हूँ
मैंने युद्ध में दुर्वार्य नमुचि, अनेक माया-निपुण शम्बर, दैत्य विप्रचित्ति, दनु के समस्त पुत्रों तथा प्रह्लाद को भी मारकर, तब देवाधिपति के पद पर प्रतिष्ठा पाई।
Verse 51
भीष्म उवाच इत्येतच्छक्रवचनं निशम्य प्रतिगृह्म॒ च । योधानामात्मन: सिद्धिमम्बरीषो5भिपन्नवान्,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इन्द्रका यह वचन सुनकर राजा अम्बरीषने मन-ही-मन इसे स्वीकार किया और वे यह मान गये कि योद्धाओंको स्वतः सिद्धि प्राप्त होती है
भीष्म बोले—युधिष्ठिर! शक्र (इन्द्र) के ये वचन सुनकर और मन-ही-मन उन्हें स्वीकार कर, राजा अम्बरीष इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि योद्धाओं के लिए सिद्धि अपने-आप प्राप्त होती है।
Verse 98
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्राम्बरीषसंवादे अष्टनवतितमो<ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के राजधर्मानुशासनपर्व में इन्द्र–अम्बरीष संवाद का अट्ठानवेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 216
सास्य पूर्णाहुतिहोंमे समृद्धा सर्वकामधुक् । वीरोंके शरीरसे संग्रामभूमिमें बड़े वेगसे जो रक्तकी धारा बहती है, वही उस युद्धयज्ञके होममें समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली समृद्धिशालिनी पूर्णाहुति है
इस युद्ध-यज्ञ के होम में जो समृद्ध, सर्वकामधुक् पूर्णाहुति है, वह रणभूमि में वीरों के शरीर से बड़े वेग से बहने वाली रक्त-धारा ही है। वही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, समृद्धिशालिनी पूर्णाहुति मानी गई है।
Verse 266
उदगाता तत्र संग्रामे त्रिसामा दुन्दुभि्न॑प । राजन! वाणीद्वारा ललकारने और महावतोंके अंकुशोंकी मार खानेपर हाथी जो चिग्घाड़ते हैं, कोलाहल और करतलध्वनिके साथ होनेवाली वह चिग्घाड़नेकी आवाज उस यज्ञमें वषट्कार है। नरेश्वर! संग्राममें जिस दुन्दुभिकी गम्भीर ध्वनि होती है, वही सामवेदके तीन मन्त्रोंका पाठ करनेवाला उदगाता है
राजन्! उस संग्राम में दुन्दुभि ही त्रिसाम का पाठ करने वाला उद्गाता है। वाणी द्वारा की गई ललकार, और महावतों के अंकुश से आहत हाथियों की चिग्घाड़—जो कोलाहल और करतल-ध्वनि के साथ मिलकर उठती है—उस यज्ञ में वषट्कार बन जाती है। नरेश्वर! संग्राम-दुन्दुभि की गम्भीर ध्वनि ही मानो सामवेद के तीन मन्त्रों का पाठ करने वाला उद्गाता है।
Verse 276
आत्मानं यूपमुत्सृज्य स यज्ञोडनन्तदक्षिण: । जब लुटेरे ब्राह्मणके धनका अपहरण करते हों, उस समय वीर पुरुष उनके साथ किये जानेवाले युद्धमें अपने प्रिय शरीरके त्यागके लिये जो उद्यम करता है अथवा जो देहरूपी यूपका उत्सर्ग करके प्रहार ही कर बैठता है, उसका वह युद्ध ही अनन्त दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञ कहलाता है
जब लुटेरे ब्राह्मण के धन का अपहरण करें, तब जो वीर पुरुष उनके साथ होने वाले युद्ध में अपने प्रिय शरीर के त्याग के लिए उद्यम करता है—या देह-रूपी यूप का उत्सर्ग करके प्रहार ही कर बैठता है—उसका वह युद्ध ही अनन्त दक्षिणाओं से युक्त यज्ञ कहलाता है।
Verse 286
न भयाद् विनिवर्तेत तस्य लोका यथा मम | जो शूरवीर अपने स्वामीके लिये सेनाके मुहानेपर खड़ा होकर पराक्रम प्रकट करता है और भयसे कभी पीठ नहीं दिखाता, उसको मेरे समान लोकोंकी प्राप्ति होती है
भय से कभी पीछे न हटे। जो शूरवीर अपने स्वामी के लिए सेना के मुहाने पर खड़ा होकर पराक्रम प्रकट करता है और भय से कभी पीठ नहीं दिखाता, उसे मेरे समान लोकों की प्राप्ति होती है।
Verse 293
यस्य वेदिरुपस्तीर्णा तस्य लोका यथा मम । जिसके युद्ध-यज्ञकी वेदी नीले चमड़ेकी बनी हुई म्यानके भीतर रखी जानेवाली तलवारों तथा परिघके समान मोटी-मोटी भुजाओंसे बिछ जाती है, उसे वैसे ही लोक प्राप्त होते हैं, जैसे मुझे मिले हैं
जिसके युद्ध-यज्ञ की वेदी नीले चमड़े की बनी हुई म्यान में रखी जाने वाली तलवारों तथा परिघ के समान मोटी-मोटी भुजाओं से बिछ जाती है, उसे वैसे ही लोक प्राप्त होते हैं, जैसे मुझे मिले हैं।
Verse 353
नदी योधस्य संग्रामे तदस्याव भृथं स्मृतम् । जिस योद्धाके युद्धरूपी यज्ञमें रक्तकी नदी प्रवाहित होती है, उसके लिये वह अवभृथस्नानके समान पुण्यजनक है। रक्त ही उस नदीकी जलराशि है, नगाड़े ही मेढक और कछुओंके समान हैं, वीरोंकी हड्डियाँ ही छोटे-छोटे कंकड़ और बालूके समान हैं, उसमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन है, मांस और रक्त ही उस नदीकी कीच हैं, ढाल और तलवार ही उसमें नौकाके समान हैं, वह भयानक नदी केशरूपी सेवार और घाससे ढकी हुई है। कटे हुए घोड़े, हाथी और रथ ही उसमें उतरनेके लिये सीढ़ी हैं, ध्वजा-पताका तटवर्ती बेंतकी लताके समान हैं, मारे गये हाथियोंको भी वह बहा ले जानेवाली है, रक्तरूपी जलसे वह लबालब भरी है, पार जानेकी इच्छावाले मनुष्योंके लिये वह अत्यन्त दुस्तर है, मरे हुए हाथी बड़े-बड़े मगरमच्छके समान हैं, वह परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली नदी अमंगलमयी प्रतीत होती है, ऋष्टि और खड़ग--ये उससे पार होनेके लिये विशाल नौकाके समान हैं। गीध-कंक और काक छोटी-छोटी नौकाओंके समान हैं, उसके आस-पास राक्षस विचरते हैं तथा वह भीरु पुरुषोंको मोहमें डालनेवाली है
अम्बरीष बोले—योद्धा के लिए संग्राम में बहने वाली रक्त-नदी ही उसका अवभृथ-स्नान मानी गई है। जो युद्ध-यज्ञ में प्रविष्ट होता है, उसके लिए वह भयानक, दुस्तर धारा भी यज्ञ-समाप्ति की शुद्धि के समान हो जाती है। रक्त उसका जल है, नगाड़ों का निनाद उसके जलचर हैं, वीरों की हड्डियाँ कंकड़-बालू के समान हैं; उसमें उतरना अत्यन्त कठिन है। मांस और शोणित उसकी कीच हैं, ढाल और तलवार उसकी नौका के समान हैं, और वह केशरूपी सेवार तथा घास से ढकी हुई है। कटे हुए घोड़े, हाथी और रथ उतरने की सीढ़ियाँ हैं; ध्वजा-पताका तटवर्ती बेंत की लताओं के समान हैं; वह मारे गए हाथियों को भी बहा ले जाती है। रक्त-जल से वह लबालब भरी है; पार जाने की इच्छा रखने वालों के लिए वह परम दुस्तर है; मरे हुए हाथी बड़े-बड़े मगरमच्छों के समान हैं। परलोक की ओर बहती हुई वह नदी अमंगलमयी-सी प्रतीत होती है; ऋष्टि और खड्ग उससे पार होने के लिए विशाल नौकाओं के समान हैं। गीध, कंक और काक छोटी-छोटी नौकाओं के समान हैं; उसके आस-पास राक्षस विचरते हैं और वह भीरु पुरुषों को मोह में डालने वाली है।
Verse 363
अश्वस्कन्धैर्गजस्कन्धैस्तस्य लोका यथा मम । जिसके युद्ध-यज्ञकी वेदी शत्रुओंके मस्तकों, घोड़ोंकी गर्दनों और हाथियोंके कंधोंसे बिछ जाती है, उस वीरको मेरे-जैसे ही लोक प्राप्त होते हैं
अम्बरीष बोले—जिस वीर के युद्ध-यज्ञ की वेदी शत्रुओं के मस्तकों, घोड़ों की गर्दनों और हाथियों के कंधों से बिछ जाती है, वह मेरे-जैसे ही लोक प्राप्त करता है।
Verse 403
अप्रतिष्ठ: स नरकं याति नास्त्यत्र संशय: । जो योद्धा भयभीत हो पीठ दिखाकर भागता है और उसी अवस्थामें शत्रुओंद्वारा मारा जाता है, वह कहीं भी न ठहरकर सीधा नरकमें गिरता है, इसमें संशय नहीं है
अम्बरीष बोले—जो योद्धा भयभीत होकर पीठ दिखाकर भागता है और उसी अवस्था में शत्रुओं द्वारा मारा जाता है, वह अप्रतिष्ठ होकर सीधे नरक में गिरता है; इसमें संशय नहीं।
Verse 413
केशमांसास्थिसम्पूर्णा स गच्छेत् परमां गतिम् । जिसके रक्तके वेगसे केश, मांस और हड्डियोंसे भरी हुई रणयज्ञकी वेदी आप्लावित हो उठती है, वह वीर योद्धा परम गतिको प्राप्त होता है
अम्बरीष बोले—जिसके रक्त के वेग से केश, मांस और हड्डियों से भरी हुई रण-यज्ञ की वेदी आप्लावित हो उठती है, वह वीर योद्धा परम गति को प्राप्त होता है।
Verse 423
स विष्णुविक्रमक्रामी बृहस्पतिसम: प्रभु: । जो योद्धा शत्रुके सेनापतिका वध करके उसके रथपर आरूढ़ हो जाता है, वह भगवान् विष्णुके समान पराक्रमशाली, बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् तथा शक्तिशाली वीर समझा जाता है
अम्बरीष बोले—जो योद्धा शत्रु के सेनापति का वध करके उसके रथ पर आरूढ़ हो जाता है, वह भगवान् विष्णु के समान पराक्रमशाली, बृहस्पति के समान बुद्धिमान् तथा शक्तिशाली वीर माना जाता है।
Verse 443
अशोच्यो हि हतः शूर: स्वर्गलोके महीयते । युद्धस्थलमें मारे गये शूरवीरके लिये किसी प्रकार भी शोक नहीं करना चाहिये। वह मारा गया शूरवीर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है, अतः कदापि शोचनीय नहीं है
युद्धभूमि में मारा गया शूरवीर शोक के योग्य नहीं है; वह स्वर्गलोक में सम्मानित होता है, इसलिए उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।
Verse 456
हतस्य कर्तुमिच्छन्ति तस्य लोकान् शृणुष्व मे । युद्धमें मारे गये वीरके लिये उसके आत्मीयजन न तो स्नान करना चाहते हैं, न अशौचसम्बन्धी कृत्यका पालन, न अन्नदान (श्राद्ध) करनेकी इच्छा करते हैं, और न जलदान (तर्पण) करनेकी। उसे जो लोक प्राप्त होते हैं, उन्हें मुझसे सुनो
युद्ध में मारे गए वीर के लिए उसके स्वजन न स्नान करना चाहते हैं, न अशौच के कर्म, न अन्नदान (श्राद्ध), न जलदान (तर्पण)। उसे जो लोक प्राप्त होते हैं, वे मुझसे सुनो।
Verse 466
त्वरमाणाभिधावन्ति मम भर्ता भवेदिति | युद्धस्थलमें मारे गये शूरवीरकी ओर सहसौ्रों सुन्दरी अप्सराएँ यह आशा लेकर बड़ी उतावलीके साथ दौड़ी जाती हैं कि यह मेरा पति हो जाय
‘यह मेरा पति हो जाए’—ऐसी आशा लेकर सहस्रों सुन्दरी अप्सराएँ उतावली होकर युद्धभूमि में मारे गए शूरवीर की ओर दौड़ पड़ती हैं।
Verse 2036
संख्यासमयविस्तीर्णमभिजातोद्धवं बहु । उज्ज्वल और तेज धारवाले, सम्पूर्णतः लोहेके बने हुए तथा तीखे प्रास, शक्ति, ऋष्टि और परशु आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्रार जो आघात किया जाता है, वही उस युद्धयज्ञका बहुसंख्यक, अधिक समयसाध्य और कुलीन पुरुषद्वारा संगृहीत नाना प्रकारका द्रव्य है
उस युद्ध-यज्ञ में बहुतेरे और नाना प्रकार के ‘द्रव्य’ वही अस्त्र-शस्त्र हैं—उज्ज्वल, तीक्ष्ण धार वाले, पूर्णतः लोहे से बने—जैसे प्रास, शक्ति, ऋष्टि, परशु आदि, जिनसे आघात किया जाता है; उनकी बहुलता, दीर्घ तैयारी और कुलीन पुरुषों द्वारा संचित होना ही उस भयानक कर्मकाण्ड का विस्तृत उपकरण है।
Verse 4736
चत्वारश्नाश्रमास्तस्य यो युद्धमनुपालयेत् । जो युद्धधर्मका निरन्तर पालन करता है, उसके लिये यही तपस्या, पुण्य, सनातनधर्म तथा चारों आश्रमोंके नियमोंका पालन है
जो निरन्तर युद्धधर्म का पालन करता है, उसके लिए वही आचरण तपस्या और पुण्य है; वही सनातन धर्म के अनुरूप है, और मानो उसने चारों आश्रमों के नियमों का पालन कर लिया हो।
The dilemma concerns moral evaluation after lethal conflict: whether dying in disciplined engagement confers merit and elevated realms, and conversely whether fear-driven withdrawal constitutes a decisive ethical failure with adverse consequences.
The chapter teaches that public duty is judged by steadiness, intention, and adherence to norms; symbolic ritual language is used to emphasize that action in high-stakes domains must be governed by disciplined obligation rather than panic or opportunism.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter offers a doctrinal payoff: a graded account of posthumous destinations tied to conduct (Indra-like lokas for steadfast duty; instability/hell for terrified retreat), presented as authoritative via an ancient heavenly exemplum.