
Nārāyaṇasya Guhya-nāmāni Niruktāni (Etymologies of Nārāyaṇa’s Secret Epithets) / नारायणस्य गुह्यनामानि निरुक्तानि
Upa-parva: Nārāyaṇīya (Discourse on Nārāyaṇa and Divine Names)
This chapter presents a sustained self-description by Śrī Bhagavān (identified with Nārāyaṇa/Kṛṣṇa) in which divine epithets are justified through cosmological function, ritual participation, and semantic derivation. The discourse begins by associating the sun and moon with the Lord’s radiance and governance of awakening and heating, then proceeds to explain names such as Hari, Satya/Ṛtadhāman, Govinda, Śipiviṣṭa, Aja, Sātvata, Kṛṣṇa, Vaikuṇṭha, Acyuta, Adhokṣaja, Ghṛtārcis, Tridhātu, Vṛṣākapi, Śuciśravāḥ, and others—often linking each to a specific act (e.g., rescuing the earth), a textual tradition (nirukta, Vedic branches), or a metaphysical attribute (unborn witnesshood). A mythic interlude narrates a high-stakes confrontation between Rudra and Nārāyaṇa in which cosmic stability is disturbed; Brahmā mediates, leading to mutual recognition and emblematic marks (śrīvatsa/śūlāṅka). The chapter closes with pragmatic reassurance to Arjuna: Rudra operates as a forward-moving force in battle, identified with time and wrath-born potency, and is to be approached with disciplined reverence.
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—एक सूने अंतराल में देवर्षि नारद शुकदेव के आश्रम में आते हैं, जहाँ शुक स्वाध्याय में निमग्न हैं; वैराग्य और ज्ञान का प्रसंग स्वयं चलकर द्वार पर आ खड़ा होता है। → शुक वेदोक्त विधि से अर्घ्यादि देकर नारद का सत्कार करते हैं। प्रसन्न नारद पूछते हैं—‘धर्मधारियों में श्रेष्ठ! किस श्रेय के द्वारा मैं तुम्हें जोड़ूँ?’ और फिर मानव-देह की विडम्बना, विषयासक्ति की मूढ़ता, तथा क्रोध-मत्सर-मान-अपमान-प्रमाद जैसे सूक्ष्म शत्रुओं का क्रमशः उद्घाटन करते हैं। → नारद कर्म-बंधन का तीखा चित्र खींचते हैं—इन्द्रियाँ, गुण (सत्त्व-रजस्-तमस्) और अव्यक्त की गणना से जगत-यंत्र का संकेत देते हुए बताते हैं कि मोहग्रस्त जीव मथानी की भाँति कर्मों से मथा जाता है; अपथ्य खाने वाले रोगी की तरह भोग के बाद भी तपता है और चक्रवत् संसार में बार-बार घूमता है। → उपदेश का निष्कर्ष वैराग्य-ज्ञान में स्थिरता है—कर्म-आसक्ति से निवृत्त होकर, भाव-विवर्जित, बन्धन-मुक्त, ‘सर्ववित्, सर्वजित्, सिद्ध’ होने की दिशा; तप को क्रोध से, लक्ष्मी को मत्सर से, विद्या को मान-अपमान से और आत्मा को प्रमाद से बचाने का व्यावहारिक अनुशासन भी साथ चलता है।
Verse 1
एकोनत्रिशर्दाधिकत्रिशततमो< ध्याय: शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश भीष्म उवाच एतस्मिन्नन्तरे शून्ये नारद: समुपागमत् | शुकं स्वाध्यायनिरतं वेदार्थान् वक्तुमीप्सितान्
भीष्मजी बोले—युधिष्ठिर! इसी बीच, जब आश्रम सूना और शांत हो गया, तब देवर्षि नारद वहाँ पधारे। वे स्वाध्याय में रत शुकदेव के पास गए, ताकि वे उन वेदार्थों का उपदेश सुन सकें जिन्हें वे सुनना चाहते थे।
Verse 2
देवर्षि तु शुको दृष्टवा नारदं समुपस्थितम् । अर्घ्यपूर्वेण विधिना वेदोक्तेना भ्यपूजयत्,देवर्षि नारदको उपस्थित देख शुकदेवने वेदोक्त विधिसे अर्घ्य आदि निवेदन करके उनका पूजन किया
देवर्षि नारद को सामने उपस्थित देखकर शुकदेव ने वेदोक्त विधि के अनुसार अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका पूजन-सत्कार किया।
Verse 3
नारदोथाब्रवीत् प्रीतो ब्रूहि धर्मभूृतां वर । केन त्वां श्रेयसा वत्स योजयामीति हृष्टवत्
तब प्रसन्न होकर नारदजी बोले—“वत्स! तुम धर्मधारियों में श्रेष्ठ हो। बताओ, मैं तुम्हें किस परम श्रेय से जोड़ दूँ—किस सर्वोत्तम लाभ की प्राप्ति कराऊँ?” यह उन्होंने हर्षपूर्वक कहा।
Verse 4
नारदस्य वच: श्रुत्वा शुक: प्रोवाच भारत | अस्मिल्लोके हितं यत् स्यात् तेन मां योक्तुमहसि
नारदजी की बात सुनकर शुकदेव बोले—“हे भारत! कृपा करके इस लोक में जो सच्चे हित और परम कल्याण का साधन हो, उसी से मुझे जोड़िए—उसी का उपदेश दीजिए।”
Verse 5
नारद उवाच तत्त्वं जिज्ञासतां पूर्वमृषीणां भावितात्मनाम् | सनत्कुमारो भगवानिदं वचनमत्रवीत्
नारदजी ने कहा—वत्स! पूर्वकाल में पवित्र अन्तःकरण वाले ऋषियों ने तत्त्वज्ञान की जिज्ञासा से प्रश्न किया। उसके उत्तर में भगवान् सनत्कुमार ने यह वचन कहा।
Verse 6
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः । नास्ति रागसमं दु:ःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्
विद्या के समान कोई नेत्र नहीं है। सत्य के समान कोई तप नहीं है। राग के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के सदृश कोई सुख नहीं है।
Verse 7
निवृत्ति: कर्मण: पापात् सततं पुण्यशीलता । सद्वृत्ति: समुदाचार: श्रेय एतदनुत्तमम्
पापकर्मों से दूर रहना, सदा पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करना, श्रेष्ठ पुरुषों के-से बर्ताव और सदाचार का पालन करना—यही सर्वोत्तम श्रेय (कल्याण) का साधन है।
Verse 8
मानुष्यमसुखं प्राप्प य: सज्जति स मुहाृति । नालं स दुःखमोक्षाय संयोगो दुःखलक्षणम्
जहाँ सुख का नाम भी नहीं है, ऐसे इस मानव-शरीर को पाकर जो विषयों में आसक्त होता है, वह मोह को प्राप्त होता है। विषयों का संयोग दुःखरूप ही है, अतः दुःखों से छुटकारा नहीं दिला सकता।
Verse 9
सक्तस्य बुद्धिश्बलति मोहजालविवर्धनी । मोहजालावृतो दुःखमिह चामुत्र सो5श्लुते
विषयासक्त पुरुष की बुद्धि चंचल होती है। वह मोहजाल को बढ़ानेवाली है। मोहजाल से बँधा हुआ पुरुष इस लोक तथा परलोक में दुःख ही भोगता है।
Verse 10
सर्वोपायात् तु कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रह: । कार्य: श्रेयोडर्थिना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यती
जिसे कल्याण-प्राप्ति की इच्छा हो, उसे हर उपाय से काम और क्रोध का दमन करना चाहिए; क्योंकि ये दोनों दोष सदा कल्याण का नाश करने को उद्यत रहते हैं।
Verse 11
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेच्छ़ियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः
मनुष्य को चाहिए कि वह सदा तप को क्रोध से, लक्ष्मी को डाह से, विद्या को मान-अपमान से, और अपने-आप को प्रमाद से बचाए।
Verse 12
आनुृ्शंस्यं परो धर्म: क्षमा च परमं बलम् | आत्मज्ञानं परं ज्ञानं न सत्याद् विद्यते परम्
करुणा (अहिंसक दया) परम धर्म है और क्षमा परम बल है। आत्मज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है, और सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं।
Verse 13
सत्यस्य वचन श्रेय: सत्यादपि हित॑ं वदेत् । यद् भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं मतं मम
सत्य बोलना श्रेष्ठ है; पर सत्य से भी श्रेष्ठ है हितकारक वचन कहना। जिससे प्राणियों का अत्यन्त हित हो—मेरे मत में वही ‘सत्य’ कहलाने योग्य है।
Verse 14
सर्वारम्भपरित्यागी निराशीरन्निष्परिग्रह: । येन सर्व परित्यक्त स विद्वान स च पण्डित:
जिसने समस्त आरम्भों के संकल्प त्याग दिए हैं, जिसके मन में कोई आशा नहीं, जो संग्रह नहीं करता, और जिसने सब कुछ परित्याग कर दिया है—वही विद्वान है, वही पण्डित है।
Verse 15
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थान् यश्चरत्यात्मवशैरिह । असज्जमान: शान्तात्मा निर्विकार: समाहित:
नारद ने कहा—जो आत्मवश की हुई इन्द्रियों से इस लोक में विषयों का अनुभव करता हुआ भी आसक्त नहीं होता, जिसका अन्तःकरण शान्त, निर्विकार और एकाग्र है; और जो देह तथा इन्द्रियों के बीच रहते हुए भी, उन्हें आत्मा-सा प्रतीत होते देखकर भी, उनसे तादात्म्य नहीं करता—वह मुक्त है और बहुत शीघ्र परम कल्याण को प्राप्त होता है।
Verse 16
आत्मभूतैरतदभूत: सह चैव विनैव च । स विमुक्तः परं श्रेयो नचिरेणाधितिष्ठति
जो देह और इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी उनसे तद्रूप नहीं होता—उनके साथ भी और उनसे अलग भी रहता है—वही वास्तव में मुक्त है; वह बहुत शीघ्र परम श्रेय में स्थित हो जाता है।
Verse 17
अदर्शनमसंस्पर्शस्तथासम्भाषणं सदा । यस्य भूतै: सह मुने स श्रेयो विन्दते परम्
नारद ने कहा—हे मुने! जो सदा प्राणियों के प्रति अनासक्त रहता है—न उनकी ओर दृष्टि करता है, न स्पर्श करता है, न उनसे बातचीत करता है—वह परम कल्याण को प्राप्त होता है।
Verse 18
न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतकश्चरेत् । नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित्,किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे। सबके प्रति मित्रभाव रखते हुए विचरे तथा यह मनुष्य-जन्म पाकर किसीके साथ वैर न करे
नारद ने कहा—किसी भी प्राणी की हिंसा न करे। सबके प्रति मैत्रीभाव से युक्त होकर विचरे; और इस दुर्लभ मनुष्य-जन्म को पाकर किसी के साथ वैर न करे।
Verse 19
आकिज्चन्यं सुसंतोषो निराशीस्त्वमचापलम् | एतदाहुः: परं श्रेय आत्मज्ञस्थ जितात्मन:
नारद ने कहा—अपरिग्रह, उत्तम संतोष, निराशा (कामना-रहितता) और अचंचलता—आत्मतत्त्व को जानने वाले तथा आत्मसंयमी पुरुष के लिए यही परम कल्याण कहा गया है।
Verse 20
परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रिय: । अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाभयम्
तात! परिग्रह का परित्याग करके जितेन्द्रिय हो जाओ और उस अशोक पद का आश्रय लो, जो इस लोक और परलोक—दोनों में सर्वथा निर्भय है।
Verse 21
निरामिषा न शोचन्ति त्यजेदामिषमात्मन: । परित्यज्यामिषं सौम्य दुःखतापाद् विमोक्ष्यसे
जो भोग-विषयों की आसक्ति से रहित हैं, वे शोक नहीं करते; इसलिए मनुष्य को अपने भीतर से भोगासक्ति का त्याग करना चाहिए। सौम्य! भोगों का परित्याग कर देने पर तुम दुःख और संताप से मुक्त हो जाओगे।
Verse 22
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना | अजित जेतुकामेन भाव्यं सड्लेष्वसज्धिना,जो अजित (परमात्मा)-को जीतनेकी इच्छा रखता हो, उसे तपस्वी, जितेन्द्रिय, मननशील, संयतचित्त और विषयोंमें अनासक्त रहना चाहिये
जो अजित (परमात्मा) को जीतने की अभिलाषा रखता है, उसे नित्य तप में स्थित, दान्त, मननशील, संयतचित्त और विषयों में अनासक्त रहना चाहिए।
Verse 23
गुणसज्रजेष्वनासक्त एकचर्यारत: सदा । ब्राह्मणो नचिरादेव सुखमायात्यनुत्तमम्
जो ब्राह्मण त्रिगुणात्मक विषयों के संग में भी अनासक्त रहकर सदा एकान्तचर्या में रत रहता है, वह शीघ्र ही अनुपम सुख—मोक्ष—को प्राप्त कर लेता है।
Verse 24
द्वन्द्धारामेषु भूतेषु य एको रमते मुनि: । विद्धि प्रज्ञानतृप्तं तं॑ ज्ञानतृप्तो न शोचति
द्वन्द्वों में रमने वाले प्राणियों के बीच रहकर भी जो मुनि एकाकी भाव में ही आनन्द मानता है, उसे प्रज्ञान से तृप्त समझो; ज्ञान से तृप्त पुरुष कभी शोक नहीं करता।
Verse 25
शुभेर्लभति देवत्वं व्यामिश्रैर्जन्म मानुषम् । अशुभैश्वाप्यधो जन्म कर्मभिलभतेडवश:
जीव सदा कर्मों के अधीन रहता है। शुभ कर्मों के अनुष्ठान से वह देवत्व पाता है, शुभ-अशुभ के मिश्रण से मनुष्य-जन्म, और केवल अशुभ कर्मों से पशु-पक्षी आदि नीच योनियों में जन्म लेता है।
Verse 26
तत्र मृत्युजरादु:खै सततं समभिद्रुत: । संसारे पच्यते जन्तुस्तत्कर्थं नावबुद्धयसे
उन-उन योनियों में जीव को सदा जरा, मृत्यु और नाना प्रकार के दुःखों से संतप्त होना पड़ता है। इस प्रकार संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी मानो संताप की आग में पकाया जाता है—इस सत्य पर तुम ध्यान क्यों नहीं देते?
Verse 27
अहिते हितसंज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसंज्ञक: | अनर्थ चार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थ नावबुद्धयसे
तुमने अहित में ही हित-बुद्धि कर ली है; जो अध्रुव (विनाशशील) वस्तुएँ हैं, उन्हीं को ‘ध्रुव’ (अविनाशी) मान बैठे हो; और अनर्थ में ही तुम्हें अर्थ का बोध हो रहा है। यह बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आती?
Verse 28
संवेष्ट्यमानं बहुभिमोहात् तन्तुभिरात्मजै: । कोषकार इवात्मानं वेष्टयन् नावबुध्यसे
जैसे रेशम का कीड़ा अपने ही शरीर से उत्पन्न तन्तुओं द्वारा अपने-आपको आच्छादित कर लेता है, उसी प्रकार तुम भी मोहवश अपने ही से उत्पन्न सम्बन्ध-बन्धनों द्वारा अपने-आपको बाँधते जा रहे हो; फिर भी यह बात तुम्हारी समझ में नहीं आ रही है।
Verse 29
अलें परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रह: । कृमिर्हि कोषकारस्तु बध्यते स परिग्रहात्
यहाँ विभिन्न वस्तुओं के संग्रह की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संग्रह में महान दोष है। रेशम का कीड़ा अपने संग्रह-दोष के कारण ही बन्धन में पड़ता है।
Verse 30
पुत्रदारकुट॒म्बेषु सक्ता: सीदन्ति जन्तव: । सर:पड्कार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव
नारद ने कहा—जो प्राणी स्त्री, पुत्र और कुटुम्ब में आसक्त रहते हैं, वे वैसे ही दुःख में डूबते हैं जैसे वन के बूढ़े हाथी सरोवर के कीचड़ में फँसकर तड़पते हैं।
Verse 31
महाजालसमाकृष्टान् स्थले मत्स्यानिवोद्धृतान् । स्नेहजालसमाकृष्टान् पश्य जन्तून् सुदु:ःखितान्
जैसे बड़े जाल में फँसकर जल से बाहर निकाली गई मछलियाँ भूमि पर तड़पती हैं, वैसे ही स्नेह के जाल से खिंचे हुए ये प्राणी अत्यन्त दुःखी होते हैं—इन्हें देखो।
Verse 32
कुट॒म्बं पुत्रदारां श्व शरीरं संचयाश्व ये । पारक्यमश्रुवं सर्व कि स्वं सुकृतदुष्कृतम्
इस संसार में कुटुम्ब, स्त्री-पुत्र, शरीर और जो कुछ संग्रह है—सब पराया है, सब नश्वर है। यहाँ अपना क्या है? केवल अपने कर्मों का पुण्य और पाप।
Verse 33
यदा सर्व परित्यज्य गन्तव्यमवशेन ते । अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थ नानुतिष्ठसि
जब तुम्हें विवश होकर सब कुछ छोड़कर यहाँ से जाना ही है, तब इस अनर्थमय जगत् में क्यों आसक्त होते हो? अपने वास्तविक अर्थ—मोक्ष के साधन—का अनुष्ठान क्यों नहीं करते?
Verse 34
अविश्रान्तमनालम्बमपाथेयमदैशिकम् । तमःकान्तारमध्वानं कथमेको गमिष्यसि
नारद ने कहा—वह मार्ग बिना विश्राम के है, बिना सहारे के है, बिना पाथेय के है, बिना पथ-प्रदर्शक के है; अन्धकार के वन-प्रान्त से होकर—तुम अकेले उसे कैसे पार करोगे?
Verse 35
जहाँ ठहरनेके लिये कोई स्थान नहीं, कोई सहारा देनेवाला नहीं, राहखर्च नहीं तथा अपने देशका कोई साथी अथवा राह बतानेवाला नहीं है, जो अन्धकारसे व्याप्त और दुर्गम है, उस मार्गपर तुम अकेले कैसे चल सकोगे? ।।
नारद बोले—जहाँ ठहरने को कोई स्थान नहीं, सहारा देने वाला कोई नहीं, मार्ग के लिए पाथेय नहीं, और अपने देश का कोई साथी या राह बताने वाला भी नहीं; जो मार्ग अँधेरे से ढका और दुर्गम है—उस पर तुम अकेले कैसे चल सकोगे? जब तुम परलोक की राह पकड़ोगे, तब तुम्हारे पीछे कोई नहीं चलेगा। केवल तुम्हारा किया हुआ पुण्य और पाप ही वहाँ जाते समय तुम्हारा अनुसरण करेगा।
Verse 36
विद्या कर्म च शौचं च ज्ञानं च बहुविस्तरम् । अर्थार्थमनुसार्यन्ते सिद्धार्थश्व॒ विमुच्यते
नारद बोले—विद्या, कर्म, शौच (पवित्रता) और अनेक शाखाओं में विस्तृत ज्ञान—ये सब परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही अपनाए जाते हैं। जब वह लक्ष्य सिद्ध हो जाता है—जब परम प्रयोजन पूर्ण हो जाता है—तब मनुष्य मुक्त हो जाता है।
Verse 37
निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रति: । छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृत:
नारद बोले—ग्राम-जीवन में रहने वाले मनुष्य की विषयों के प्रति जो आसक्ति होती है, वह बाँधने वाली रस्सी के समान है। पुण्यात्मा पुरुष उसे काटकर परमार्थ के पथ पर आगे बढ़ जाते हैं; पर जो पापी हैं, वे उसे काट नहीं पाते।
Verse 38
रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् । गन्धपड्कां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुरावहाम्
नारद बोले—यह संसार एक नदी के समान है। सत्य इसका उद्गम है, रूप इसका किनारा, मन इसका प्रवाह, स्पर्श इसके द्वीप और रस इसकी धारा है। गन्ध इसकी कीचड़ है, शब्द इसका जल है, और स्वर्ग-मार्ग इसका दुर्गम घाट है। शरीर-रूपी नौका के सहारे इसे पार किया जा सकता है। क्षमा इसे खेने वाली लग्गी है और धर्म इसे स्थिर रखने वाली रस्सी/लंगर है। यदि त्याग-रूपी अनुकूल पवन मिल जाए, तो यह शीघ्रगामिनी नदी पार हो सकती है; इसलिए इसे पार करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिए।
Verse 39
क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यवटारकाम् । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां नौतार्या तां नदीं तरेत्
नारद बोले—क्षमा जिसकी पतवार है, सत्य जिसका सार है, और धर्म में स्थैर्य जिसकी रस्सी/लंगर है—ऐसी शीघ्रगामिनी संसार-नदी को नौका के सहारे पार करना चाहिए। त्याग-रूपी अनुकूल पवन मिले तो वह और भी सुगमता से पार हो जाती है। इसलिए इसे पार करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिए।
Verse 40
त्यज धर्ममधर्म च तथा सत्यानृते त्यज । उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तं त्यज
नारद ने कहा—धर्म और अधर्म दोनों को छोड़ दो; इसी प्रकार सत्य और असत्य को भी त्याग दो। सत्य-असत्य दोनों का त्याग करके, जिसके द्वारा तुम त्याग करते हो, उस ‘त्याग’ को भी त्याग दो।
Verse 41
त्यज धर्ममसंकल्पादधर्म चाप्यलिप्सया । उभे सत्यानृते बुद्धया बुद्धिं परमनिश्चयात्
नारद ने कहा—संकल्प-रहित होकर ‘धर्म’ का भी त्याग करो, और लिप्सा के अभाव से ‘अधर्म’ का भी त्याग करो। फिर बुद्धि के द्वारा सत्य और असत्य—दोनों को छोड़कर, परम तत्त्व के दृढ़ निश्चय से बुद्धि को भी त्याग दो।
Verse 42
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् | चर्मावनद्ध॑ दुर्गन्धिं पूर्ण मूत्रपुरीषयो:
नारद ने कहा—यह शरीर हड्डियों के खंभों का ढाँचा है, जो स्नायुओं से बँधा है; मांस और रक्त से लिपटा हुआ, चमड़े से मढ़ा हुआ, दुर्गन्धयुक्त, और मूत्र तथा मल से भरा है।
Verse 43
जराशोकसमादविदष्टं रोगायतनमातुरम् । रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यज
नारद ने कहा—इस शरीर का त्याग करो; यह बुढ़ापे और शोक से ग्रस्त है, रोगों का घर और पीड़ा से आतुर है; रज से मलिन और अनित्य है—यह तो केवल प्राणियों का निवास-स्थान मात्र है।
Verse 44
यह शरीर पंचभूतोंका घर है। इसमें हड्डियोंके खंभे लगे हैं। यह नस-नाड़ियोंसे बँधा हुआ
नारद ने कहा—यह समस्त विश्व—जो कुछ चल है और जो कुछ अचल भी है—सब महाभूतों से बना हुआ एक विराट् रूप है, जो परम आश्रय पर स्थित है।
Verse 45
इन्द्रियाणि च पञ्चैव तम: सत्त्वं रजस्तथा । इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञक:
नारद ने कहा—पाँच इन्द्रियाँ तथा तम, सत्त्व और रज—इन सबको मिलाकर सत्रह तत्त्वों का जो समूह होता है, वही ‘अव्यक्त’ कहलाता है।
Verse 46
यह सम्पूर्ण चराचर जगत् पंचमहाभूतोंसे उत्पन्न हुआ है। इसलिये महाभूतस्वरूप ही है। जो शरीरसे परे है, वह महत्तत्त्व अर्थात् बुद्धि, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच सूक्ष्म महाभूत अर्थात् तन्मात्राएँ, पाँच प्राण तथा सत्त्व आदि गुण--इन सत्रह तत्त्वोंके समुदायका नाम अव्यक्त है ।।
नारद ने कहा—इस जगत् में इन्द्रियों के समस्त विषय वास्तव में व्यक्त और अव्यक्त—इन दोनों में समाहित हैं। व्यक्त और अव्यक्त से बना यह समुच्चय ‘चौबीस तत्त्वों’ का समूह कहलाता है।
Verse 47
इनके साथ ही इन्द्रियोंके पाँच विषय अर्थात् स्पर्श, शब्द, रूप, रस और गन्ध एवं मन और अहंकार--इन सम्पूर्ण व्यक्ताव्यक्तको मिलानेसे चौबीस तत्त्वोंका समूह होता है, उसे व्यक्ताव्यक्तमय समुदाय कहा गया है ।।
नारद ने कहा—इन सब तत्त्वों से संयुक्त होने पर जीव ‘पुरुष’ कहलाता है। और इसी देहधारी अवस्था में त्रिवर्ग, सुख-दुःख तथा जीवन-मरण भी स्थित रहते हैं।
Verse 48
य इदं वेद तत्त्वेन स वेद प्रभवाप्ययौ । इन सब तत्त्वोंसे जो संयुक्त है, उसे पुरुष कहते हैं। जो पुरुष धर्म, अर्थ, काम, सुख- दुःख और जीवन-मरणके तत्त्वको ठीक-ठीक समझता है, वही उत्पत्ति और प्रलयके तत्त्वको भी यथार्थरूपसे जानता है ।।
नारद ने कहा—जो इस तत्त्व को यथार्थ रूप से जानता है, वही उत्पत्ति और प्रलय को भी जानता है। ज्ञान के विषय में जो कुछ भी जानने योग्य है, उसे परम्परा से ही समझना चाहिए। जो इन्द्रियों से ग्रहण किया जाता है, वह ‘व्यक्त’ कहलाता है; और जो इन्द्रियों से परे है तथा लक्षणों से अनुमानित होता है, वह ‘अव्यक्त’ कहा जाता है।
Verse 49
इन्द्रियैर्ग.ह्यते यद् यत् तत् तद् व्यक्तमिति स्थिति: । अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिड्रग्राह्ममतीन्द्रियम्
नारद ने कहा—जो-जो पदार्थ इन्द्रियों से ग्रहण किए जाते हैं, वे ‘व्यक्त’ माने जाते हैं—यही निश्चित सिद्धान्त है। जो इन्द्रियों से परे है और केवल लक्षणों से जाना जाता है, उसे ‘अव्यक्त’ समझना चाहिए।
Verse 50
इन्द्रियैर्नियतैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते । लोके विततमात्मानं लोकांक्षात्मनि पश्यति
जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, वह देही वर्षा की धाराओं से तृप्त प्यासे मनुष्य की भाँति तृप्त हो जाता है। वह ज्ञानी पुरुष लोक में आत्मा को सब प्राणियों में व्याप्त और सब प्राणियों को आत्मा में स्थित देखता है।
Verse 51
परावरदृश: शक्तिर्ज्ञनमूला न नश्यति । पश्यत: सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा
पर और अपर को देखने वाली, ज्ञानमूलक विवेक-शक्ति नष्ट नहीं होती। जो यथार्थदर्शी है, वह सब प्राणियों को सदा, सब अवस्थाओं में देखता है।
Verse 52
ज्ञानेन विविधान् क्लेशानतिवृत्तस्य मोहजान्
जो ज्ञान के द्वारा मोहजनित नाना प्रकार के क्लेशों को पार कर चुका है—
Verse 53
लोके बुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यते | जो ज्ञानके बलसे मोहजनित नाना प्रकारके क्लेशोंसे पार हो गया है, उसके लिये जगतमें बौद्धिक प्रकाशसे कोई भी लोक-व्यवहारका मार्ग अवरुद्ध नहीं होता ।।
लोक में बुद्धि के प्रकाश से लोक-व्यवहार का मार्ग बाधित नहीं होता। जो ज्ञान के बल से मोहजनित नाना प्रकार के दुःखों को पार कर गया है, उसके लिए कोई भी उचित व्यवहार-मार्ग अवरुद्ध नहीं रहता। वह जीव को अनादि-अनन्त, आत्मा में स्थित और अविनाशी जानता है।
Verse 54
यो जन््तु: स्वकृतैस्तैस्तै: कर्मभिर्नित्यदु:खित:
जो जीव अपने ही किए हुए उन्हीं-उन्हीं कर्मों के कारण सदा दुःखी रहता है—
Verse 55
स दुःखप्रतिघातार्थ हन्ति जन्तूननेकथा । जो जीव अपने ही किये हुए विभिन्न कर्मोके कारण सदा दुःखी रहता है, वही उस दुःखका निवारण करनेके लिये नाना प्रकारके प्राणियोंकी हत्या करता है ।।
अपने दुःख को दूर करने की इच्छा से मनुष्य अनेक प्रकार से प्राणियों की हिंसा करता है। पर जो जीव अपने ही किए हुए विविध कर्मों के कारण सदा दुःखी रहता है, वही उस दुःख के निवारण हेतु नाना जीवों का वध करता है। फिर उसी से वह पुनः कर्म का संग्रह करता है और अनेक जन्मों में प्रविष्ट होता है।
Verse 56
अजस्रमेव मोहान्धो दुःखेषु सुखसंज्ञित:
वह निरन्तर मोह से अन्धा होकर दुःख में ही सुख की संज्ञा कर बैठता है।
Verse 57
ततो निबद्धः स्वां योनिं कर्मणामुदयादिह
फिर कर्मों के उदय से वह यहाँ इस लोक में अपनी ही योनि में बँध जाता है।
Verse 58
स त्वं निवृत्तबन्धस्तु निवृत्तश्नापि कर्मत:
पर तुम तो बन्धनों से निवृत्त हो और कर्म (बंधनकारक प्रवृत्ति) से भी विरत हो।
Verse 59
सर्ववित् सर्वजित् सिद्धो भव भावविवर्जित: । इसलिये तुम कर्मोसे निवृत्त, सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त, सर्वज्ञ, सर्वविजयी, सिद्ध और सांसारिक भावनासे रहित हो जाओ ।।
इसलिए तुम कर्मों से निवृत्त होकर, सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त, सर्वज्ञ, सर्वविजयी, सिद्ध और सांसारिक भावों से रहित हो जाओ। संयम से और तपस्या के बल से नये बन्धनों को काटकर, बहुत-से ज्ञानी पुरुष ऐसी अबाध सिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं, जिससे अनन्त सुख का उदय होता है।
Verse 328
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें अनध्यायके कारणका कथन नामक तीन सौ जअद्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्व में “अनध्याय के कारण का कथन” नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। यह उपसंहार भीष्म के उस उपदेश की पूर्णता बताता है कि धर्मानुसार कब और क्यों वेदाध्ययन स्थगित किया जाता है।
Verse 329
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि एकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहद़्ा भारत शान्तिपवके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 513
सर्वभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते | उस परावरदर्शी ज्ञानी पुरुषकी ज्ञाममूलक शक्ति कभी नष्ट नहीं होती। जो सम्पूर्ण भूतोंको सभी अवस्थाओंमें सदा देखा करता है
सर्वभूतों का संयोग अशुभ से नहीं होता। परावरदर्शी ज्ञानी पुरुष की ज्ञानमूलक शक्ति कभी नष्ट नहीं होती। जो समस्त भूतों को सब अवस्थाओं में सदा देखता है, वह सब प्राणियों के सहवास में आकर भी कभी अशुभ कर्मों से युक्त नहीं होता, अर्थात् अशुभ कर्म नहीं करता।
Verse 536
अकर्तारममूर्त च भगवानाह तीर्थवित् | मोक्षके उपायको जाननेवाले भगवान् नारायण कहते हैं कि आदि-अन्तसे रहित, अविनाशी, अकर्ता और निराकार जीवात्मा इस शरीरमें स्थित है
अकर्ता और अमूर्त—ऐसा तीर्थवित् भगवान कहते हैं। मोक्ष के उपाय को जानने वाले भगवान नारायण कहते हैं कि आदि-अन्त से रहित, अविनाशी, अकर्ता और निराकार जीवात्मा इस शरीर में स्थित है।
Verse 553
तप्यते5थ पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुर: । तदनन्तर वह और भी बहुत-से नये-नये कर्म करता है और जैसे रोगी अपथ्य खाकर दुःख पाता है, उसी प्रकार उस कर्मसे वह अधिकाधिक कष्ट पाता रहता है
तदनन्तर वह उसी कर्म के फल से फिर तपता है। जैसे रोगी अपथ्य खाकर दुःख पाता है, वैसे ही वह बहुत-से नये-नये कर्म करता चला जाता है और उन कर्मों से अधिकाधिक कष्ट भोगता रहता है।
Verse 563
बध्यते मथ्यते चैव कर्मभिर्मन्थवत् सदा । जो मोहसे अन्धा (विवेकशून्य) हो गया है, वह सदा ही दुःखद भोगोंमें ही सुखबुद्धि कर लेता है और मथानीकी भाँति कर्मोसे बँधता एवं मथा जाता है
नारदजी बोले—मनुष्य अपने ही कर्मों से मथानी की भाँति सदा बँधता और मथा जाता है। जो मोह से अन्धा, विवेकशून्य हो गया है, वह दुःखद भोगों में ही सुखबुद्धि कर लेता है; इसलिए कर्म के बन्धन में निरन्तर पिसता रहता है।
Verse 576
परिभ्रमति संसारं चक्रवद् बहुवेदन: । फिर प्रारब्ध कर्मोके उदय होनेपर वह बद्ध प्राणी कर्मके अनुसार जन्म पाकर संसारमें नाना प्रकारके दुःख भोगता हुआ उसमें चक्रकी भाँति घूमता रहता है
नारदजी बोले—अनेक वेदनाओं से दबा हुआ वह बद्ध प्राणी प्रारब्ध कर्म के उदय होने पर कर्मानुसार जन्म पाता है और संसार में नाना प्रकार के दुःख भोगता हुआ चक्र की भाँति घूमता रहता है।
How divine names function as epistemic labels: the chapter argues that epithets are not ornamental but encode cosmological roles, ritual relations, and metaphysical attributes, requiring disciplined interpretation (nirukta).
A unified metaphysics underlies diverse divine forms and names: the ultimate principle is described as unborn, witnessing, and order-sustaining, while sectarian difference is moderated through claims of non-separation and shared cosmic purpose.
Yes. By presenting the Lord as kṣetrajña (witness of beings), aja (unborn), kūṭastha (immutable ground), and as the basis of dharma and inner purity, the chapter positions correct understanding of names and functions as supportive of mokṣa-oriented insight.