Nārāyaṇasya Guhya-nāmāni Niruktāni (Etymologies of Nārāyaṇa’s Secret Epithets) / नारायणस्य गुह्यनामानि निरुक्तानि
महाजालसमाकृष्टान् स्थले मत्स्यानिवोद्धृतान् । स्नेहजालसमाकृष्टान् पश्य जन्तून् सुदु:ःखितान्
जैसे बड़े जाल में फँसकर जल से बाहर निकाली गई मछलियाँ भूमि पर तड़पती हैं, वैसे ही स्नेह के जाल से खिंचे हुए ये प्राणी अत्यन्त दुःखी होते हैं—इन्हें देखो।
नारद उवाच