
Rishi: Atharvanic tradition (hymn to Anumati; specific r̥ṣi attribution varies in ancillary lists)
Devata: Anumati (personified Consent/Approval)
Chandas: Anuṣṭubh (predominant)
यह छह-ऋचा वाला सूक्त अनुमति—दैवी ‘सम्मति’ और अनुमोदनकारी विधान—से यजमान के प्रति शुभ-चिन्तन करने और देवों के बीच हवि को स्वीकार/अनुमोदित करने की प्रार्थना करता है। उसकी स्वीकृति से यज्ञ निर्विघ्न और फलदायी बने—कल्याण, उत्तम खेत-खलिहान, बलवान पुत्र और सुजनित संतान-परम्परा प्राप्त हो। इस स्तुति का बल इस में है कि वह कर्मकाण्ड को देव-स्वीकृत, संरक्षित प्रभावशीलता में रूपान्तरित करती है—अनुमोदन ही समृद्धि और गृहस्थ-निरन्तरता का द्वार बनता है।
Mantra 1
अनुमतिः। अन्व॒द्य नोऽनु॑मतिर्य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ मन्यताम्। अ॒ग्निश्च॑ हव्य॒वाह॑नो॒ भव॑तां दा॒शुषे॒ मम॑
आज अनुमति हमारे यज्ञ को देवों में स्वीकारे। और अग्नि, हव्यवाहन, मेरे दाता-यजमान के लिए उपस्थित हो।
Mantra 2
अन्विद॑नुमते॒ त्वं मंस॑से॒ शं च॑ नस्कृधि । जुष॒स्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि ररास्व नः
हे अनुमति देवी, तू अनुकूल होकर हमारे लिए कल्याण और शुभ कर। विधिपूर्वक अर्पित हवि-आहुति में तू प्रसन्न हो; और हे देवी, हमें प्रजा (संतान) प्रदान कर।
Mantra 3
अनु॑ मन्यतामनु॒मन्य॑मानः प्र॒जाव॑न्तं र॒यिमक्षी॑यमाणम्। तस्य॑ व॒यं हेड॑सि॒ मापि॑ भूम सुमृडी॒के अ॑स्य सुम॒तौ स्या॑म
वह देवी, सहमत होकर, हमारी प्रार्थना को स्वीकार करे—अक्षय धन और प्रजावान पुरुष प्रदान करे। उसके क्रोध/अप्रसन्नता में हम कदापि न पड़ें; उसकी सुमृडिका (कृपामयी रक्षा) और सुमति (शुभ बुद्धि) में हम निवास करें।
Mantra 4
यत् ते॒ नाम॑ सु॒हवं॑ सुप्रणी॒तेऽनु॑मते॒ अनु॑मतं सु॒दानु॑ । तेना॑ नो य॒ज्ञं पि॑पृहि विश्ववारे र॒यिं नो॑ धेहि सुभगे सु॒वीर॑म्
हे सुसंचालिनी अनुमति! तुम्हारा जो नाम सुलभ-आह्वान है—स्वीकृत, उदार दानवाली—उसी के द्वारा, हे सर्व-वरेण्ये, हमारे यज्ञ को पूर्ण करो; और हे सौभाग्यवती देवी, हमारे लिए धन-समृद्धि स्थापित करो, उत्तम वीर-पुत्रों से युक्त।
Mantra 5
एमं य॒ज्ञमनु॑मतिर्जगाम सुक्षे॒त्रता॑यै सुवी॒रता॑यै सुजा॑तम्। भ॒द्रा ह्यऽस्याः॒ प्रम॑तिर्ब॒भूव॒ सेमं य॒ज्ञम॑वतु दे॒वगो॑पा
यह यज्ञ अनुमति के पास आया है—सुक्षेत्रता के लिए, सुवीरता के लिए—सुप्रसूत (सुजात) होकर। क्योंकि उसकी प्रमति (कल्याणकारी व्यवस्था/प्रज्ञा) शुभ हो गई है; देव-रक्षा से सुरक्षित वह इस यज्ञ की रक्षा करे।
Mantra 6
अनु॑मतिः॒ सर्व॑मि॒दं ब॑भूव॒ यत् तिष्ठ॑ति॒ चर॑ति॒ यदु॑ च॒ विश्व॒मेज॑ति । तस्या॑स्ते देवि सुम॒तौ स्या॒मानु॑मते॒ अनु॒ हि मंस॑से नः
अनुमति ही यह सब कुछ बन गई है—जो स्थिर है, जो चलता है, और जो कुछ भी समस्त जगत में कंपित होता है। हे देवी, तेरी सुमति (अनुग्रहपूर्ण बुद्धि) में हम निवास करें; क्योंकि, हे अनुमते, तू हमारे प्रति अनुकूल भाव से ही मनन करती है।
Anumati is the personified power of consent and approval—the divine assent that makes an offering acceptable and lets the desired results (welfare, progeny, prosperity) mature.
It seeks approval of the yajña, protection of the ritual from obstacles, household welfare (śam), agrarian success (good fields), and procreative success (strong sons and progeny).
It is suited to household offerings or the opening/authorization of a rite: recited with simple āhutis into Agni, asking Anumati to accept the offering and bless the patron’s home with increase and children.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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