Atharva Veda Anuvaka 2
Kanda 710 Suktas26 Mantras

Anuvaka 2

मुख्य विषय: दैवी प्रेरणा, सामाजिक अधिकार, उर्वरता और वर्षा के द्वारा प्राप्त पौष्टिक समृद्धि—गृहस्थ जीवन और सार्वजनिक सफलता को स्थिर करने वाली। उप-विषय: (1) सरस्वती पोषण और वरणीय/इच्छित निधियों (vāryāṇi) की दात्री। (2) सविता का सत्यसव—सच्ची प्रेरणा—जो संकल्प को दिशा देता और संपत्ति/वस्तुओं को आकर्षित करता है। (3) सभा–समिति में सफलता: रक्षित, प्रभावशाली वाणी द्वारा मनोनुकूल निर्णय। (4) वर्चस् (तेज) और प्रतिस्पर्धा में प्रतिद्वन्द्वियों पर श्रेष्ठता। (5) धातृ और प्रजापति जैसे ‘स्थापक’ देवों द्वारा गृहस्थी की स्थिरता; उर्वरता और वर्षा से पोषण-वृद्धि।

Suktas in Anuvaka 2

Sukta 11

यह एक-ऋचा पौष्टिक सूक्त सरस्वती का आह्वान करता है—उन्हें अक्षय, पोषण देने वाली स्तन-रूपा धारा कहा गया है, जिससे “वरणीय/श्रेष्ठ निधियाँ” (vāryāṇi) उत्पन्न होकर फलती-फूलती हैं। उन्हें आनंद-प्रदा, अनुग्रह-प्रार्थिनी, सहज आह्वेय और उदार मानकर स्तुति की जाती है, ताकि उनकी प्रवहमान समृद्धि से धन-वैभव की निरंतर वृद्धि, समृद्धि और कल्याण सुनिश्चित हो।

Rishi: As per AV 7.11 anukramaṇī tradition (variable) | Devata: Sarasvatī | 1 Mantras

Sukta 12

अथर्ववेद 7.12 सभा (असेंबली) और समिति (परिषद्) में प्रवेश के लिए एक सामाजिक-सफलता का मंत्र है, जो संरक्षण, स्वीकार्यता और प्रभावशाली वाणी की कामना करता है। इसमें सभा और समिति को प्रजापति की परस्पर-सामंजस्यपूर्ण “पुत्रियाँ” कहा गया है; परिषद् के सौभाग्य में मान्य भाग के लिए इन्द्र का आह्वान किया गया है; और श्रोता-समुदाय का ध्यान व सहमति वक्ता की ओर मोड़ने हेतु मन-परिवर्तनकारी सूत्र का प्रयोग किया गया है।

Rishi: Atharvanic tradition (often treated as an Atharvan/Angiras-type social charm; specific r̥ṣi not marked in the provided excerpt). | Devata: Sabhā and Samiti (personified), with Prajāpati as genealogical source; Ancestors as witnesses. | 4 Mantras

Sukta 13

यह संक्षिप्त आथर्वणिक शत्रुनाशन-सूक्त सौर उपमा पर कार्य करता है: जैसे उषाकाल में सूर्य ताराओं के प्रकाश को ढककर मानो ‘हर’ लेता है, वैसे ही साधक अनुष्ठानपूर्वक शत्रु-प्रतिद्वन्द्वियों के वर्चस् (तेज, प्रभाव, प्रतिष्ठा) का अपने पक्ष में अपहरण/अधिग्रहण करता है। यह दो-मन्त्रों का अभिचार-प्रयोग है, जिसका उद्देश्य निकट आते सपत्नों (प्रतिस्पर्धी/शत्रु) को प्रकट करना और उन्हें निष्प्रभ कर देना है—वे ‘सोए’ रह जाएँ, और जपकर्ता विजयी दीप्ति में स्थित रहे।

Rishi: Atharvanic tradition (unspecified in excerpt). | Devata: Sūrya (as paradigmatic victor); the operative target is the dvīṣant (enemy). | 2 Mantras

Sukta 14

यह चार-मंत्रों वाला सविता-स्तोत्र देवता की “सत्य प्रेरणा” (सत्यसव) को साधकर उपासक की मति/संकल्प को शुभ मार्ग पर स्थिर करता है और वांछनीय वस्तुओं (वार्याणि)—विशेषतः गौ-धन तथा स्थिर समृद्धि—को आकर्षित करता है। “प्रथम पिता” को ऊँचाई और विस्तृत अवकाश प्रदान करने वाले सविता के आदिकालीन कर्म का स्मरण कर यह स्तुति वर्तमान समृद्धि को ऋत/धर्म और पितृ-कल्याण की परंपरा में, विश्व-व्यवस्था के विधिसम्मत अनुवर्तन के रूप में स्थापित करती है।

Rishi: Traditionally Savitar-hymn seers (RV parallels suggest a learned, RV-derived stratum; exact AV anukramaṇī attribution to be checked) | Devata: Savitar | 4 Mantras

Sukta 15

यह एक-मंत्र पौष्टिक सूक्त सविता से “सत्य-प्रेरक” (सत्यसवा) अनुग्रह की याचना करता है—जो सुंदर, विवेकपूर्ण और सर्वजन-हितकारी हो। इसमें समृद्धि को ऐसी वस्तु के रूप में देखा गया है जिसे प्रचुरता से “दोहा” जा सकता है—हज़ार धाराओं-सी—ताकि भग उसे प्रत्येक के न्यायोचित भाग के रूप में बाँटें, और उससे कल्याण तथा वरणीय सौभाग्य प्राप्त हो।

Rishi: Kāṇva tradition (Kanva indicated within the verse; hymn attributed within Kāṇva sphere) | Devata: Savitar (primary); Bhaga (prosperity-distributor, secondary) | 1 Mantras

Sukta 16

यह एक-मंत्रात्मक पौष्टिक (समृद्धि) सूक्त सविता और बृहस्पति से प्रार्थना करता है कि वे यजमान/लाभार्थी की प्राणशक्ति, बोध-स्वच्छता और सामाजिक-दीप्त ‘सौभाग्य’ का विस्तार करें। इसमें यह भी याचना है कि वह व्यक्ति पूर्णतः ‘सफलता के लिए सन्नद्ध’ हो, विघ्नों को लाँघ सके, और समस्त देवताओं की सम्मति तथा अनुग्रह—एक पुष्टि करने वाली दिव्य सभा के रूप में—उसे प्राप्त हो।

Rishi: Atharvanic compiler tradition (specific ṛṣi attribution not given in the input; commonly assigned by Anukramaṇī) | Devata: Savitar and Bṛhaspati; ‘All the Gods’ as confirming assembly | 1 Mantras

Sukta 17

Rishi: Atharvanic tradition (anonymous/collective in many paustika units) | Devata: Dhātṛ, Savitṛ, Prajāpati, Agni, Tvaṣṭṛ, Viṣṇu (prosperity-and-progeny complex) | 4 Mantras

Sukta 18

अथर्ववेद 7.18 एक संक्षिप्त वर्षा-आकर्षण (वर्षा-वशीकरण) सूक्त है, जिसमें मेघ को एक सीलबंद पात्र/थैली के रूप में देखा गया है और उसे फाड़कर खोलने की आज्ञा दी जाती है, ताकि दिव्य जल समुदाय के लिए नीचे बरस पड़े। इसमें पृथ्वी को ग्रहणशील क्षेत्र-देह के रूप में और धातृ को उस विश्व-नियामक के रूप में आह्वान किया गया है जो “जल-चर्म/जल-थैली को खोलता है,” और इस प्रकार ऐसी वर्षा सुनिश्चित करता है जो पोषक हो, विनाशकारी नहीं। दूसरा मंत्र लक्ष्य को केवल वर्षा तक सीमित न रखकर संतुलित ऋतु-व्यवस्था तक फैलाता है—दहकते अनावृष्टि-ताप और प्राणघातक पाले से रहित—ताकि जहाँ सोम (मंगलमय प्राण-शक्ति/ऋत-व्यवस्था) निवास करता है वहाँ कल्याण और उर्वरता बनी रहे।

Rishi: Atharvanic tradition (rain-compulsion corpus) | Devata: Nabhas (cloud), Pṛthivī, Dhātṛ (as regulator of rain) | 2 Mantras

Sukta 19

यह एक-ऋचा का पौष्टिक सूक्त प्रजापति और धातृ की जनक तथा स्थिरकारी शक्तियों का आह्वान करता है, ताकि संतान दृढ़तापूर्वक “स्थापित” हो और शुभ-चित्त/सुस्वभाव वाली बने। साथ ही यह गृह-एकता की कामना करता है—स्वजन “सामंजस्य में, एक मन के, एक ही गर्भ/उत्पत्ति के”—और अंत में पुष्टिपति द्वारा यजमान के केंद्र में स्थित निरंतर पोषणयुक्त समृद्धि-वृद्धि के वरदान पर समाप्त होता है।

Rishi: Atharvanic tradition | Devata: Prajāpati, Dhātṛ, Puṣṭipati (personified nourishment) | 1 Mantras

Sukta 20

यह छह-ऋचा वाला सूक्त अनुमति—दैवी ‘सम्मति’ और अनुमोदनकारी विधान—से यजमान के प्रति शुभ-चिन्तन करने और देवों के बीच हवि को स्वीकार/अनुमोदित करने की प्रार्थना करता है। उसकी स्वीकृति से यज्ञ निर्विघ्न और फलदायी बने—कल्याण, उत्तम खेत-खलिहान, बलवान पुत्र और सुजनित संतान-परम्परा प्राप्त हो। इस स्तुति का बल इस में है कि वह कर्मकाण्ड को देव-स्वीकृत, संरक्षित प्रभावशीलता में रूपान्तरित करती है—अनुमोदन ही समृद्धि और गृहस्थ-निरन्तरता का द्वार बनता है।

Rishi: Atharvanic tradition (hymn to Anumati; specific r̥ṣi attribution varies in ancillary lists) | Devata: Anumati (personified Consent/Approval) | 6 Mantras

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