Atharva Veda Anuvaka 4
Kanda 410 Suktas84 Mantras

Anuvaka 4

मुख्य विषय: संरक्षण और विजय के लिए अनुष्ठान-शक्ति—क्रोध/उत्साह (मन्यु) और अग्नि को साधकर दुष्ट शक्तियों का विनाश, गृह-रक्षा और जीवन-धारण। उपविषय: (1) युद्ध-दीक्षा और शत्रु-भंजन उग्रता (मन्यु इन्द्र-सदृश बल के रूप में), (2) अग्नि पाप-नाशक तथा साक्षी—शत्रु-प्रयोगित अभिचार/विरोधी कर्मों को पलटने वाला, (3) ब्रह्म-ओदन/ओदन—जीवन-धारक, मृत्यु-पार कराने वाला संस्कार-भोज्य, (4) रक्षोघ्न सीमा-रक्षा—रात्रि-चर प्राणियों के विरुद्ध, (5) कृमि और रोग-कारकों के विरुद्ध औषधि-वनस्पति, (6) समृद्धि और हित-कल्याण की स्थापना।

Suktas in Anuvaka 4

Sukta 31

अथर्ववेद 4.31 एक युद्धप्रधान ‘मन्यु’-सूक्त है, जो रण-उन्माद को दिव्य सहायक के रूप में अभिषिक्त करता है और युद्ध-दल को ‘अग्नि के रूप’ में अग्रसर होने वाली, शस्त्र-तीक्ष्ण करने वाली, अजेय सेना बना देता है। यह कुलों/गणों को संग्राम के लिए व्यवस्थित करता है, विजय-घोष को ऊँचा उठाता है, और हृदय-जनित भय के द्वारा शत्रुओं के भगाने तथा मन्यु (और अंत में वरुण) के अधीन संचित धन/लूट को सुरक्षित करने की कामना करता है।

Rishi: Angiras/Atharvanic (Manyu-hymn tradition; exact r̥ṣi not recoverable here) | Devata: Manyu (personified Wrath), with Agni/Maruts as functional comparanda | 7 Mantras

Sukta 32

यह त्रिष्टुभ युद्ध-स्तोत्र मन्यु (क्रोध) को एक दिव्य, इन्द्र-सदृश शक्ति के रूप में जाग्रत करता है, जो शत्रुओं को तोड़ता, छिपे हुए संकटों को बेधता और विजय को अनिवार्य करता है। मन्यु को इन्द्र, वरुण, जातवेदस् और होतृ जैसी अनेक सार्वभौम तथा यज्ञीय शक्तियों के साथ एकात्म करके यह सूक्त सर्वव्यापी युद्ध-रक्षा को संकेन्द्रित करता है, जो यजमान के लिए लूट-धन और समृद्धि भी सुनिश्चित करती है।

Rishi: Traditionally connected with Angiras/Atharvanic seers; in RV parallels, Manyu-hymns are ascribed to seers of the Bharadvāja/Angiras sphere (assignment varies by anukramaṇī traditions). | Devata: Manyu (personified Wrath; Indra-like battle power) | 7 Mantras

Sukta 33

यह आठ-ऋचा वाला अथर्ववैदिक सूक्त अग्नि को ‘पाप-नाशन’—अघ (दुष्टता, पाप, अमंगल, कर्मकाण्डीय अशौच) को भस्म करने वाले—रूप में आवाहन करता है। निष्कासन-स्वरूप पुनरुक्ति-सी मंत्र-रचना के द्वारा यह प्रार्थना करता है कि अग्नि की ज्वालाएँ और किरणें यजमान के शरीर तथा उसके परिवेश को शुद्ध करें, भय-आपत्ति को दूर कर ‘रयि’ (समृद्धि) और ‘स्वस्ति’ (कल्याण) स्थापित करें। सूक्त की शक्ति को सर्वतोमुखी परिशोधन के रूप में प्रस्तुत किया गया है—अन्तःस्थ नैतिक/वैदिक दोष और बाह्य शत्रु-प्रभाव, दोनों, अग्नि के ताप और तेज से भस्म हो जाएँ।

Rishi: Atharvanic tradition (seer not specified in the provided input; commonly treated as Atharvan/Angiras-type for such Agni-expulsion hymns) | Devata: Agni (as pāpa-nāśana, purifier) | 8 Mantras

Sukta 34

यह सूक्त पके हुए ओदन (ब्रह्मौदन/विष्टारिण) को यज्ञ के साक्षात् शरीर के रूप में प्रतिष्ठित करके उसे पवित्र करता है: छन्द उसके पंख बनते हैं, सत्य उसका मुख, और तपस् उसकी जननकारी ऊष्मा। अभिषिक्त अन्न को ब्राह्मणों के बीच स्थापित करके यह स्तुति पोषण को यज्ञ-सिद्धि में विस्तार देने का लक्ष्य रखती है—समृद्धि, ‘लोक-विजयी’ पुण्य और स्वर्ग-प्राप्य प्रभावशीलता—और साथ ही यजमान पर किसी भी प्रकार की हानिकारक प्रतिघात-प्रतिक्रिया न पड़े, यह स्पष्ट रूप से सुनिश्चित करती है।

Rishi: Atharvanic tradition (speculative-ritual hymn) | Devata: Brahmaudana / Yajña personified (ritual entity as devatā) | 8 Mantras

Sukta 35

अथर्ववेद 4.35 एक मृ्त्यु-संतारण (मृत्यु को पार कराने वाला) भैषज्य-स्तोत्र है, जो ब्रह्म-ओदन (संस्कारित उबला हुआ चावल) को एक ब्रह्माण्डीय, जीवन-धारक तत्त्व के रूप में पवित्र ठहराता है, जिसके द्वारा पाठक अकाल मृत्यु से ‘पार’ हो जाता है। इसमें ओदन को प्रजापति के तपस्-जन्य सृजन-कर्म के साथ तथा एक तेजस्वी, सर्वदिशा-रक्षक ब्रह्म/बृहस्पति-तत्त्व के साथ एकीकृत किया गया है, जो प्राण को पुनः स्थापित करता है और काल के चक्रों (मास, वर्ष, दिन-रात्रि) से भी परे टिकता है। ‘तेन ओदनेन अति तराणि मृत्युम्’—यह ध्वनि-रूप पुनरुक्त प्रार्थना स्तोत्र की क्रियात्मक ‘मुद्रा’ बनकर उसकी सिद्धि-शक्ति को स्थापित करती है।

Rishi: Atharvanic tradition (Aṅgiras/Atharvan attribution typical for apamṛtyu material; exact r̥ṣi to be verified against Anukramaṇī for AV 4.35). | Devata: Brahman/Brāhmaṇaspati principle embodied in brahma-odana; life-breath (Prāṇa) and death-transcendence motif. | 7 Mantras

Sukta 36

अथर्ववेद 4.36 एक रक्षोघ्न–अभिचारिक सूक्त है, जो गृह-सीमा को रात्रि में विचरने वाले भक्षकों—राक्षस, पिशाच और क्रव्याद—विशेषतः अमावस्या-रात्रि में सक्रिय रहने वालों—से सुदृढ़ करता है। इसमें अग्नि वैश्वानर द्वारा दाहक निष्कासन को मंत्र के ‘सहस्’ (आक्रामक/वशीकारी बल) के साथ जोड़ा गया है; और अंत में निरृति के द्वारा बंधन तथा विनाश का विधान है, ताकि प्रत्येक शत्रुतापूर्ण आगमन को जला कर, पराभूत कर, और रोक कर बाँध दिया जाए।

Rishi: Atharvanic tradition (rakṣoghna seer; specific r̥ṣi not stated in the provided excerpt) | Devata: Rakṣas/Piśāca/Kravyād (as adversaries); the effective agent is the mantra’s ‘sahas’ (coercive power) | 10 Mantras

Sukta 37

अथर्ववेद 4.37 एक भैषज्य-सूक्त है, जो औषधि को जीवित, व्यक्तित्वयुक्त वैद्य-रूप में सशक्त करता है, ताकि वह कृमि (कीड़े/परजीवी) तथा रोग के राक्षस-सदृश कारकों का विनाश करे। इसकी प्रभावशीलता को यह पूर्वज-परंपरा के प्रमाण पर टिकाता है—अथर्वणों और प्रसिद्ध ऋषियों (कश्यप, कण्व, अगस्त्य) के उदाहरणों पर—और फिर तीव्र रक्षोघ्न वाणी में उन्नत होकर गन्धर्व–अप्सरा-सम्बन्धी प्रभावों को, विशेषतः कामोन्माद/आवेश और गृह-व्यवस्था में विघ्न से जुड़े प्रभावों को, बाहर निकाल देता है।

Rishi: Traditionally Atharvanic seers; the verse itself cites Atharvans, Kaśyapa, Kaṇva, Agastya as precedent authorities | Devata: Oṣadhi (the Herb) as personified healer; secondarily anti-rākṣasa power | 12 Mantras

Sukta 38

यह अथर्ववैदिक मंत्र-रक्षा समृद्धि को सुनिश्चित करने हेतु दूरगामी, रक्षक शक्ति को गृह की असुरक्षित संपदा—विशेषतः गौ-धन और अर्जित लाभ—से बाँध देता है। इसमें एक शुभ अप्सरा का आवाहन है जो भाग्य को “छानती और बिखेरती” है, तथा वाजिन्-सदृश एक संरक्षक बल का भी, जो अंतरिक्ष में और सूर्य की किरणों के साथ चलता है—ताकि इच्छित लाभ घर तक आ जाएँ और वहीं स्थिर, सुरक्षित बने रहें।

Rishi: Atharvanic tradition (specific r̥ṣi not supplied in the input; commonly Atharvan/Angiras attribution for such charms in later indices) | Devata: Protective strength addressed as vājín (guardian potency; functionally a cattle-protector) | 7 Mantras

Sukta 39

अथर्ववेद 4.39 समृद्धि और प्राण-बल का एक मंत्र-रूप आकर्षण है, जिसमें अन्तरिक्ष (मध्य-आकाश) को विश्व-धेनु के रूप में कल्पित किया गया है और वायु (पवन/प्राण) को उसका बछड़ा, जो उससे पोषण का दोहन करता है। सामाजिक और ब्रह्माण्डीय शक्तियों को ‘सन्नति’ (परस्पर-सामंजस्य) में स्थापित करके और अग्नि जातवेदस् के द्वारा कर्म को सील/सम्पन्न करके, यह सूक्त यजमान के लिए आयु, जीवन-रस, तेज, कामना-पूर्ति, सन्तान, अभ्युदय और धन का ‘दुग्ध-दोहन’ करने का प्रयत्न करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (Anukramaṇī attribution for AV 4.39; commonly Atharvan/Angiras-type seer lists—edition-dependent). | Devata: Antarikṣa as dhenu (cosmic source) with Vāyu as operative deity (calf/extractor). | 10 Mantras

Sukta 40

अथर्ववेद 4.40 दिशाओं से आने वाले अभिचार/टोने-टोटके को पहचानकर उसे बलपूर्वक उलट देने वाला सूक्त है। इसमें सर्वज्ञ साक्षी अग्नि जातवेदस् को संबोधित कर, किसी भी दिशा या उपदिशा से किए गए शत्रु-यज्ञ/अर्पण और जादू को पकड़ा जाता है और आक्रमणकारियों को ‘पराञ्च’ (पीछे हटे/दूर हटे) किया जाता है; प्रत्यग् (लौटती हुई) शक्ति से उन्हें कंपाया/प्रतिघातित किया जाता है। अंत में प्रतिसर (बंधन/ताबीज) द्वारा रक्षा को सील किया जाता है। इस सूक्त की शक्ति यह है कि वह संकट को दिशात्मक-स्थान में मानचित्रित कर, अग्नि, पवित्र तेज और शारीरिक रक्षाबंध के माध्यम से उसे निष्प्रभावी कर देता है।

Rishi: Atharvanic tradition (often anonymous/Angiras-type in AV counter-sorcery hymns) | Devata: Agni Jātavedas; with Soma invoked as supporting power; directions as operative field | 8 Mantras

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